July 31, 2026
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    दुनिया में भारत की बढ़ती जगह

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    ओपिनियन / शौर्यपथ / दुनिया की सात विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी-7 के विस्तार की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल अप्रत्याशित नहीं है। कोविड-19 के कारण इस वक्त विश्व-व्यवस्था में उथल-पुथल जारी है। कोरोना से जंग जीतकर चीन दुनिया भर में अपनी हैसियत बढ़ाने में जुटा है, तो विश्व का सबसे ताकतवर देश अमेरिका अभी तक इस वायरस से पार नहीं पा सका है। इसके साथ ही कई अन्य घरेलू चुनौतियों से भी वाशिंगटन इस समय जूझ रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था भी ढलान पर है। ऐसे में, उसे उन राष्ट्रों की जरूरत आन पड़ी है, जिनके साथ उसके अच्छे संबंध रहे हैं। यही वजह है कि सितंबर में होने वाली जी-7 की बैठक में शामिल होने के लिए उसने भारत, रूस, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया को आमंत्रित किया है। रूस पहले भी इस समूह का सदस्य रह चुका है, लेकिन यूक्रेन-क्रीमिया विवाद के बाद साल 2014 में उसे इस समूह से बाहर कर दिया गया था।
    बहरहाल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने इस प्रयास में चीन से दूरी बरती है। इसका सीधा मतलब है कि वाशिंगटन और बीजिंग की तनातनी अभी खत्म नहीं होने वाली। अमेरिका कोरोना वायरस बनाने का आरोप चीन पर मढ़ता रहा है। ह्वाइट हाउस का मानना है कि अगर चीन ने समय पर इस वायरस की सूचना दुनिया को दे दी होती, तो स्थिति आज इतनी भयावह नहीं होती। इसके अलावा, दोनों देश पहले से ही व्यापारिक युद्ध में उलझे हुए हैं। चीन जिस तेजी से दुनिया में अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है, उनसे भी अमेरिकी राष्ट्रपति नाराज हैं। अमेरिका और चीन में कायम इसी दरार के कारण ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को न्योता भेजा है। वह रूस और चीन की बढ़ती नजदीकी से चिंतित हैं। उन्हें लगता है कि दोनों देशों की बढ़ती दोस्ती से विश्व-व्यवस्था में अमेरिका का कद प्रभावित हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया को आगे बढ़ाने के पीछे यही वजह है। ऑस्ट्रेलिया चीन के खिलाफ काफी मुखर है। हाल ही में संपन्न विश्व स्वास्थ्य महासभा में भी उसने उस प्रस्ताव के पक्ष में अपना मत दिया था, जिसमें कोरोना वायरस की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए एक स्वतंत्र जांच कमेटी बनाने पर सहमति बनी थी।
    भारत को इसलिए इस समूह में शामिल होने के लिए बुलाया गया है, क्योंकि अमेरिका के साथ हमारी अच्छी सामरिक साझेदारी बनी है। दोनों देश हाल के वर्षों में एक-दूसरे के करीब आए हैं। कोरोना संक्रमण के बावजूद भारत ने अमेरिका को पर्याप्त मात्रा में हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन जैसी जरूरी दवाई भेजी। क्वाड (भारत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका व जापान का समूह) और इंडो-पैसिफिक में भी भारत एक प्रभावशाली राष्ट्र बनकर उभरा है। लिहाजा, अमेरिका चाहता है कि विश्व मंच पर नई दिल्ली के बढ़ते रुतबे का उसे फायदा मिले। दक्षिण कोरिया भी चूंकि अमेरिका का अच्छा दोस्त है, इसलिए उससे भी जी-7 में शामिल होने का अनुरोध किया गया है।
    सवाल अब यह है कि क्या ये चारों देश राष्ट्रपति ट्रंप का प्रस्ताव स्वीकार करेंगे? और, यदि जी-7 का विस्तार होता है, तो विश्व-व्यवस्था किस कदर प्रभावित होगी? भारत ने जरूर इस गुट में शामिल होने पर सहमति दे दी है और ऑस्ट्रेलिया व दक्षिण कोरिया से भी शायद ही इनकार हो, लेकिन रूस को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। रूस कई वजहों से उलझन में है। हाल के वर्षों में चीन के साथ उसकी निकटता काफी ज्यादा बढ़ी है। यूक्रेन-क्रीमिया विवाद के बाद दोनों देशों ने करीब 400 अरब डॉलर का गैस-समझौता किया, जबकि गैस की कीमत को लेकर दशकों से दोनों में आम राय नहीं बन सकी थी। चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘बेल्ट रोड इनीशिएटिव’ में भी रूस पर खासा भरोसा किया गया है। इसके अलावा, पिछले साल दोनों देशों के बीच 110 अरब डॉलर का आपसी कारोबार हुआ है, जबकि 1998 के बाद से पश्चिमी देशों के साथ मास्को की दूरी बढ़ती गई है, साल 2014 के बाद से तो और भी ज्यादा। हालांकि, रूस की मुखालफत जी-7 के यूरोपीय देश भी कर रहे हैं। कनाडा ने तो खुलकर अपना विरोध जताया है।
    रही बात विश्व-व्यवस्था के प्रभावित होने की, तो इस पर तभी असर पड़ेगा, जब जी-7 (अब संभवत: जी-10 या जी-11) के सभी सदस्य देशों में आपसी तालमेल बने। यह सही है कि अभी विश्व की कुल पूंजी का आधा से ज्यादा हिस्सा इन्हीं देशों के पास है, लेकिन उनमें आपसी टकराव इस कदर है कि साल 2018 की बैठक में जो संयुक्त घोषणापत्र जारी किया गया, उसे चंद घंटों में ही अमेरिका ने खारिज कर दिया था। पिछले साल तो ऐसा कोई घोषणापत्र जारी तक न हो सका। इतना ही नहीं, यह एक ऐसा वैश्विक संगठन है, जिसकी कोई वैधानिक हैसियत नहीं है। इसका अपना सचिवालय तक नहीं है। सभी सदस्य स्वेच्छा से एक-दूसरे की मदद करते हैं। ऐसे में, यदि इसका विस्तार होता है और इन देशों में आम राय नहीं बन पाती है, तो यह गुट विश्व-व्यवस्था पर बहुत ज्यादा असर शायद ही डाल पाए। आज विभिन्न राष्ट्रों के बीच एक सोच बनाना काफी मुश्किल काम है भी। जी-20 और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों को इसका खूब एहसास है। इसलिए अभी बहुत ज्यादा उम्मीद इससे नहीं पाली जा सकती। फिर भी, यदि सभी सदस्य देश एक-दूसरे के हितों को महत्व देंगे, जैसा कि इसके गठन के समय वायदा किया गया था, तो सितंबर की बैठक के बाद हम एक नई व्यवस्था को साकार होते देख सकते हैं।
    फिलहाल, हमारे लिए तो सुखद स्थिति ही है। चीन बेशक अमेरिका के इस कदम से नाराज है, लेकिन हमें अपने हितों को प्राथमिकता देनी होगी। अगर जी-10 या जी-11 अस्तित्व में आता है, तो चीन पर इसका दबाव अवश्य बनेगा। हो सकता है कि उसकी मौजूदा आक्रामक रणनीति में भी हमें बदलाव देखने को मिले। जी-7 एक महत्वपूर्ण वैश्विक मंच है। पिछले साल इसकी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल भी हुए थे। लिहाजा इसकी सदस्यता का यह प्रस्ताव विश्व-व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) अरविंद गुप्ता, डायरेक्टर, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन

     

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