August 06, 2026
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    दुनिया आपदाओं का अपना घर

    • rounak group

    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / ऐसा लगता है, दुनिया आपदाओं का अपना घर बन गई है। भारत के पूर्वी छोर पर पिछले सप्ताह अम्फान ने हमला बोला था और अब पश्चिमी तट पर निसर्ग ने वार किया है। यह विज्ञान की उपलब्धि है कि ऐसे तूफानों के आगमन की पूर्व सूचना मिल जाती है, जिसकी वजह से संकट ज्यादा कहर नहीं बरपा पाता। भारत की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में 1961 के बाद यह सबसे बड़ा तूफान आया, तो वहां के लोगों की चिंताओं को समझा जा सकता है। यह चिंता तब और बढ़ जाती है, जब हम कोरोना पीड़ित पृष्ठभूमि में तूफान को देखते हैं। जब अस्पताल भरे हुए हैं, जब मुंबई कोरोना संक्रमण के मामले में आगे है, तब वहां तेज तूफान या चक्रवात कितनी तबाही ला सकता था, इसकी कल्पना से ही मन सिहर जाता है। भला हो, वैज्ञानिकों और मौसम विभाग के अधिकारियों का, जिन्होंने समय रहते केरल से लेकर गुजरात तक सभी को आगाह कर दिया। एनडीआरएफ की टीमों के अलावा, नौसेना के पोत और अन्य सरकारी महकमे भी सजग हो गए। आपदा के बीच एक और अच्छी बात यह रही कि इस चक्रवात ने अपने केंद्र की दिशा थोड़ी बदली और मुंबई से करीब 95 किलोमीटर दूर तट से टकराया।
    आने वाले दिनों में इस आपदा से हुए नुकसान के आंकडे़ स्पष्ट होंगे, लेकिन इतना तय है कि ऐसी आपदाओं ने लोगों को सोचने पर विवश कर दिया है। आज यह सवाल सबके दिमाग में है कि ऐसा क्यों हो रहा है और समग्रता में पृथ्वी और उसके अनुकूल जीवन के प्रति लोगों का लगाव बढ़ना ही चाहिए। मंगलवार को असम में भारी बारिश और भूस्खलन में कई लोग मारे गए हैं, केरल में मानसून की बारिश और उससे जनजीवन पर असर दिखने लगा है। धीरे-धीरे मानसून आगे बढे़गा और कहीं कम या कहीं ज्यादा बारिश से भी लोग परेशान होंगे। जुलाई की शुरुआत तक मौसमी बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ जाएगा, ऐसे में, कोरोना की त्रासदी कितनी भयावह होगी, यह हमें अभी से सोचकर तैयार रहना चाहिए। यह कठिन समय हमारे संयम और ज्ञान की पूरी परीक्षा ले रहा है। अनुभवों से हमने यही सीखा है कि आपदाओं का सिलसिला जब चले, तब समाज को एकजुट हो जाना चाहिए। व्यक्तिगत घृणा, स्वार्थ, पक्षपात किनारे रखकर सार्वजनिक हित के बारे में चिंता करनी चाहिए। ध्यान रहे, ऐसे समय में जितनी अधिक राजनीति या स्वार्थ सेवा होगी, हम खुद को उतनी ही ज्यादा परेशानियों से घिरा पाएंगे।
    आने वाले दिनों में बारिश और मौसम संबंधी अन्य भविष्यवाणियों को ज्यादा पुख्ता व उपयोगी बनाने की जरूरत है। निसर्ग की ही बात करें, तो अनुमान था कि तूफान 120 किलोमीटर प्रति घंटा से ज्यादा की रफ्तार नहीं पकडे़गा, पर इसमें कहीं-कहीं 140 किलोमीटर की भी गति देखी गई है। अनुमान से ज्यादा पेड़ गिरे हों, छतें उजड़ी हों, तो आश्चर्य नहीं। आपदाओं के समय में भविष्यवाणी व सटीक आकलन की जरूरत बहुत बढ़ गई है, तभी जान-माल के नुकसान को न्यूनतम किया जा सकेगा। गौर करने की बात है, जब भारत का पश्चिमी छोर तूफान झेल रहा था, तब पूर्वी छोर ने भूकंप के झटके महसूस किए। दिल्ली के आसपास भी कोरोना के समय में भूकंप के तीन से ज्यादा झटके महसूस किए गए हैं। ऐसे में, मौसम विभाग, आपदा प्रबंधन टीमों और हमें सचेत रहना चाहिए, तभी हम आपदाओं का मजबूती से मुकाबला कर पाएंगे।

     

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