July 17, 2026
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    बेइज्जती से जन्मी कामयाबी

    • rounak group

    मेरी कहानी /शौर्यपथ /चूंकि गंदगी करना दुनिया का सबसे खराब काम है, इसलिए सफाई करना श्रेष्ठतम। फिर भी दुनियादारी का ऐसा उल्टा विधान है कि गंदगी करने वाला अमीर होता है और सफाई करने वाला गरीब। वह लड़का भी गरीब था और बर्तन धोने का काम करता था। मन भले बहुत न जमा हो, पर धोने में हाथ जम गया था। ढूंढ़ता रहता था, कहीं और धोने की कोई अच्छी नौकरी मिल जाए, तो जेब में दो डॉलर और डलें। एकाध पीढ़ी पहले गुलाम रहे परिवार के इस लड़के की पढ़ाई-लिखाई तो लगभग शुरू होते ही छूट गई थी। संसाधनों से वंचित और आकार में विशाल उसके परिवार में न तो पढऩे का माहौल था और न शिक्षा पर भरोसा। किशोर होते ही लड़के मजदूरी के लिए निकल लेते थे। उस लड़के के साथ भी यही हुआ। एक-एक अक्षर छू-छूकर बमुश्किल पढ़ पाता था, लेकिन अखबार में बर्तन धोने वालों के लिए निकली नौकरियों वाले कॉलम को जरूर देखता था। उस दिन भी उसने कॉलम देखा और निराश हो गया, कुछ भी रुचिकर नहीं था। उसने अखबार को हवा में उछाला और अचानक उसकी नजर एक विज्ञापन पर जा लगी, वहां लिखा था - एक्टर्स वांटेड। उसने अखबार को सुलझाकर थामा, किसी नाटक मंडली को अभिनेताओं की जरूरत है। ऑडिशन चल रहा है। लड़के ने गौर किया, ऑडिशन वाली जगह दूर नहीं थी, तो चलो परख लें किस्मत। एक बार कोशिश करने में क्या बुरा है? और वह ऑडिशन के लिए सही समय पर पहुंच गया। नीग्रो नाटक मंडली थी। ऑडिशन की बारी आई, तो निर्देशक ने उस लड़के के हाथों में एक किताब देकर कहा, 'लो, यह पढ़कर सुना दोÓ।
    हाथ में किताब क्या आई, मुसीबत ले आई। एक तो टो-टो कर पढऩा और ऊपर से अंग्रेजी शब्दों का बहामियन उच्चारण। बार-बार कोशिश करते हुए भी बंटाधार हो गया। हाथों से किताब छिन गई, मानो खुशकिस्मती लुट गई। निर्देशक ऐसा भड़का कि उस दुबले-पतले 16-17 साल के लड़के को दरवाजे की ओर धकिया दिया। दुखी लड़के ने पलटकर देखा और फिर सरेआम फटकार का सिलसिला चला, 'दफा हो जाओ यहां से, दूसरों का समय बरबाद करने आए हो? बाहर निकलो, जाओ कुछ और करो, बर्तन धोना या वैसा ही कोई काम पकड़ लो। तुम पढ़ नहीं सकते, तुम बोल नहीं सकते, तुम एक्टर नहीं बन सकते।Ó
    लड़के ने अभी पीठ भी नहीं दिखाई थी कि दरवाजा बंद हो गया। अपमान का कोई एक घूंट हो, तो पचा लिया जाए, लेकिन यहां तो सामने जहर का जखीरा ही उलट दिया गया। निर्देशक की बातें दिल पर जा लगीं। गरीब थे, गुलामों का खानदान था, लेकिन कभी किसी ने इतनी बुरी तरह दुत्कारा नहीं था। कला की दुनिया में ऐसी बेरहमी? मैं पढ़-बोल नहीं सकता, मैं एक्टर नहीं बन सकता, यहां तक तो फिर भी ठीक है, लेकिन उस निर्देशक ने यह कैसे कह दिया कि मुझे बर्तन धोने का काम करना चाहिए? मैंने तो वहां बताया भी नहीं था कि मैं यही काम करता हूं। क्या मेरा चेहरा बोल रहा है कि मैं बर्तन धोने वाला हूं? सच है, मैं बर्तन धोता हूं, तो क्या एक्टर नहीं बन सकता?
    ऐसा लगा कि यह सवाल आसपास की हवा, पौधे, पेड़, सड़क, घर, भवन, सब पूछने लगे हैं। यह सवाल लड़के के अंदर भी गूंजने लगा और तभी दुनिया में एक महान अभिनेता सिडनी पोइटियर (जन्म 1927) का विकास शुरू हुआ। उस दिन ऑडिशन देकर सिडनी वापस बर्तन धोने पहुंच गए थे। अब जब-जब बर्तन चमकाते, उनका संकल्प भी निखर-उभर आता, एक्टर बनके दिखाना है। सिडनी ने तय कर लिया कि पहले अपनी कमियों को दूर करना है।
    फिर स्कूल जाने का सवाल ही नहीं उठता था और न कहीं विधिवत अभिनय सीखना मुमकिन था। जो करना था, खुद करना था। न पैसा, न मौका, न सुविधा। वह जहां बर्तन धोते थे, वहीं एक उम्रदराज वेटर से पढऩा सीखने लगे। काम खत्म करके रोज अखबार पढऩे का अभ्यास तेज हुआ। अपने बहामियन उच्चारण से अलग शुद्ध अमेरिकी उच्चारण की कोशिशें रंग लाने लगीं। सही से पढऩा और अच्छे से बोलना सीखने में बस पांच महीने लगे। छठे महीने में उसी नाटक मंडली में न सिर्फ ऑडिशन कामयाब रहा, बल्कि अगले नाटक में मुख्य भूमिका भी नसीब हुई। नाटक करते-करते फिल्में मिलने लगीं, दुनिया एक्टर के रूप में पहचानने लगी। फिर वह समय भी आया, जब अभिनय की दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान ऑस्कर उनकी झोली में आया। 1963 में लिलिज ऑफ द फिल्ड के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर हासिल हुआ। वह यह सम्मान पाने वाले दुनिया के पहले अश्वेत अभिनेता हैं। सिडनी अक्सर अपमान के उस लम्हे को याद करते हैं और यह भी मानते हैं कि वह न होता, तो यह मुकाम भी न होता।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय सिडनी पोइटियर प्रसिद्ध अभिनेता, फिल्मकार

     

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