July 17, 2026
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    मानव समाज को समर्पित श्री अनूपचंद कोठारी (जैन) का अंतिम प्रयाण , जैन समाज के गौरव की श्री अनूपचंद जी की पार्थिव देह मेकाहारा को उनकी इच्छा अनुसार दान की गयी

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    रायपुर / शौर्यपथ / जैन समाज के गौरव समाजसेवी श्री अनूप चंद कोठारी (जैन) का दुःखद निधन हो गया। देह दान की इच्छा के अनुरूप उनका पार्थिव शरीर परिजनों द्वारा आज 08 जून को मेकाहारा रायपुर में दान किया गया।
    मानव समाज के लिए समर्पित छत्तीसगढ़ के प्रथम माइनिंग व्यवसायी व समाज सेवी श्री अनूपचंद कोठारी (जैन) का निधन प्रदेश व राष्ट्र के लिए अपूरणीय क्षति है। राजनांदगांव के छोटे से गांव कुसुम कसा से अपनी जीवन यात्रा प्रारंभ करने वाले स्व. श्री अनूप चंद कोठारी (जैन) का समाज को समर्पित जीवन राजनांदगांव जैन श्वेतांबर मूर्ति पूजक संघ के अध्यक्ष के रूप में शुरू हुआ था।
    इस दौरान उन्होंने भव्य जैन बगीचा (दादाबाड़ी) निर्माण के कार्य को चुनौती के साथ पूर्ण किया। जिसका उद्घाटन तत्कालीन मुंख्यमंत्री श्री विरेंद्र कुमार सखलेचा द्वारा 16 मई 1979 को किया गया। तत्पश्चात वे निरंतर 63 वर्षों से समाज सेवा के कार्यों में लगे रहे तथा मृत्यु उपरांत भी अपनी देह दान कर समाज के सामने एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश कर के गए हैं।
    समाज को समर्पित उनका संपूर्ण जीवन निःस्वार्थ रहा। धर्मशालाओं के निर्माण में योगदान, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की शिक्षा व जीविकोपार्जन में मदद, स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन, गरीबों को राशन वितरण, स्वरोजगार में मदद करना इत्यादि के अनेकों कार्य बिना प्रचार प्रसार जीवन पर्यंत वे करते रहे। राजनांदगांव में लायंस क्लब के माध्यम से भी उन्होंने अनेक उल्लेखनीय कार्य किए जिन्हें लोग आज भी याद करते हैं।
    वे माइनिंग व्यवसाय से जुड़े छत्तीसगढ़ के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने पूरे राष्ट्र में अपने कारोबार को सेवा की भावना के साथ फैलाया। भारत सरकार की कई दुर्गम खदानों को शुरू करवाया। वे अपने व्यवसाय में भी सेवा भावना के कारण पहचाने जाते थे। उनसे जुड़े अनेक मजदूरों, ड्राइवरों व कर्मचारियों को उन्होंने सफल व्यापारी बनने में मदद की। खनन कार्य में लगे सैकड़ों ट्रकों व मशीनों को अपने कर्मचारियों को भेंट कर उन्हें मज़दूर से व्यापारी बनने के अवसर प्रदान किए।
    वर्तमान में वे कांग्रेस मुख्यालय राजीव भवन व जैन मंदिर के बगल में टीवी टावर रोड, शंकर नगर रायपुर मे रहते थे। वे अपने पीछे संपतलाल, भीखमचंद, उत्तमचंद (भाई), अनिल, अशोक, अजय (पुत्र), सतीश, यश, संतोष (भतीजे), सौम्य,आकाश (पोते), आर्यन ( पड़पोता) का भरा पूरा परिवार छोड़ कर गए हैं।

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