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May 31, 2026
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शौर्यपथ / आयुर्वेद मानव जाति के लिए ज्ञात सबसे आरंभिक चिकित्‍सा शाखा है। प्राकृतिक चिकित्सा इसका एक अंग मात्र है। आयुर्वेद का जन्म भारत में हुआ। इसके सूत्र हमें ऋग्वेद और अथर्ववेद में मिलते हैं। आयुर्वेद के जनक और आयुर्वेद के मूल सिद्धांत को जानिए।
आयुर्वेद के जनक : आयुर्वेद के जनक : 1.अश्विनीकुमार 2.धन्वंतरि, 3.चरक, 4.च्यवन, 5.सुश्रुत। इसके अलावा ऋषि अत्रि, भारद्वाज, दिवोदास (काशिराज), नकुल, सहदेव, अर्कि, जनक, बुध, जावाल, जाजलि, पैल, करथ, अगस्त्य, अथर्व, अत्रि तथा उनके छः शिष्य अग्निवेश, भेड़, जातूकर्ण, पराशर, सीरपाणि, हारीत और बागभट्ट भी आयुर्वेद के जानकार थे। इसमें से बागभट्ट ने आयुर्वेद को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
धन्वंतरि, चरक, च्यवन, सुश्रुत और बागभट्ट को आयुर्वेद को व्यवस्थित रूप देने का श्रेय जाता है। अथर्ववेद में आयुर्वेद के कई सूत्र मिल जाएंगे। धन्वंतरि, चरक, च्यवन और सुश्रुत ने विश्व को पेड़-पौधों और वनस्पतियों पर आधारित एक चिकित्साशास्त्र दिया। भारत में सुश्रुत को पहला शल्य चिकित्सक माना जाता है। आज से करीब 2,600 साल पहले सुश्रुत युद्ध या प्राकृतिक विपदाओं में जिनके अंग-भंग हो जाते थे या नाक खराब हो जाती थी, तो उन्हें ठीक करने का काम करते थे। सुश्रुत ने 1,000 ईसापूर्व अपने समय के स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के साथ प्रसव, मोतियाबिंद, कृत्रिम अंग लगाना, हड्डी जोड़ना, पथरी का इलाज और प्लास्टिक सर्जरी जैसी कई तरह की जटिल शल्य चिकित्सा के सिद्धांत प्रतिपादित किए थे।
आयुर्वेद के आचार्य महर्षि चरक की गणना भारतीय औषधि विज्ञान के मूल प्रवर्तकों में होती है। ऋषि चरक ने 300-200 ईसापूर्व आयुर्वेद का महत्वपूर्ण ग्रंथ 'चरक संहिता' लिखा था। उन्हें त्वचा चिकित्सक भी माना जाता है। आचार्य चरक ने शरीरशास्त्र, गर्भशास्त्र, रक्ताभिसरणशास्त्र, औषधिशास्त्र इत्यादि विषय में गंभीर शोध किया तथा मधुमेह, क्षयरोग, हृदय विकार आदि रोगों के निदान एवं औषधोपचार विषयक अमूल्य ज्ञान को बताया।
चरक एवं सुश्रुत ने अथर्ववेद से ज्ञान प्राप्त करके 3 खंडों में आयुर्वेद पर प्रबंध लिखे। उन्होंने दुनिया के सभी रोगों के निदान का उपाय और उससे बचाव का तरीका बताया, साथ ही उन्होंने अपने ग्रंथ में इस तरह की जीवनशैली का वर्णन किया जिसमें कि कोई रोग और शोक न हो। आठवीं शताब्दी में चरक संहिता का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ और यह शास्त्र पश्चिमी देशों तक पहुंचा। चरक और च्यवन ऋषि के ज्ञान पर आधारित ही यूनानी चिकित्सा का विकास हुआ।
इसी तरह पांचवीं सदी में बागभट्ट नामक महान आयुर्वेदाचार्य हुए। उनका प्रसिद्ध ग्रंथ 'अष्टांग हृद्या संहिता' और अष्टांगसंग्रह है। अष्टांगसंग्रह के अनुसार इनका जन्म सिंधु देश में हुआ। इनके पितामह का नाम भी वाग्भट था। इनके पिता का नाम सिद्धगुप्त था। ये अवलोकितेश्वर गुरु के शिष्य थे।
आयुर्वेद का आविष्‍कार भी ऋषि-मुनियों ने अपने मोक्ष मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए ही किया था लेकिन बाद में इसने एक चिकित्सा पद्धति का रूप ले लिया।
आयुर्वेद के मूल सिद्धांत
1. आयुर्वेद प्रकृति के अनुसार जीवन जीने की सलाह देता है।
2. सेहतमंद बने रहकर मोक्ष प्राप्त करना ही भारतीय ऋषियों का उद्देश्य रहा है।
3. आयुर्वेद कहता है कि 'पहला सुख निरोगी काया'।
4. आयुर्वेद मानता है कि हमारी अधिकतर बीमारियों का जन्म स्थान हमारा दिमाग है। इच्छाएं, भाव, द्वेष, क्रोध, लालच, काम आदि नकारात्मक प्रवृत्तियों से कई तरह के रोग उत्पन्न होते हैं।
5. आयुर्वेद के अनुसार भोजन को यदि उत्तम भावना और प्रसन्नता से पकाकर और उसी भावना से खाया जाए तो वह अमृत के समान गुणों का हो जाता है।
6.आयुर्वेद के अनुसार भोजन के लगभग 1 घंटे बाद पानी पीने से खाए गए भोजन का लाभ मिलता है और व्यक्ति निरोगी भी रहता है।
7. त्रिदोष: आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शारीर में तीन जैविक-तत्व होते हैं जिन्हें त्रिदोष कहा जाता है। शारीर के भीतर इन तीन तत्वों का उतार-चढ़ाव लगा रहता है। इनका संतुलन गड़बड़ाने या कम ज्यादा होने से रोग उत्पन्न होते हैं। यह तीन दोष हैं- वात (वायु तत्व) पित्त (अग्नि तत्व) और कफ। वात के 5 उपभाग है 1- प्राण वात, 2- समान वात, 3- उदान वात, 4- अपान वात और 5- व्‍यान वात। पित्त के भी 5 उपभाग है 1- साधक पित्‍त, 2- भ्राजक पित्‍त, 3- रंजक पित्‍त, 4- लोचक पित्‍त और 5- पाचक पित्‍त। इसी तरह से कफ के भी 5 उपभाग है- 1- क्‍लेदन कफ, 2- अवलम्‍बन कफ, 3- श्‍लेष्‍मन कफ, 4- रसन कफ और 5- स्‍नेहन कफ।
आयुर्वेद के आठ अंग
1. काया चिकित्सा : इसमें शरीर को औषधि प्रदान की जाती है।
2. काउमारा भर्त्य : इसमें बच्चों की चिकित्सा की जाती है।
3. सल्यतंत्र : इसमें सर्जरी की जाती है।
4. सलाक्यतंत्र : कान, नाक, आंख और मुंह के रोगों के लिए चिकित्सा।
5. भूतविद्या : मानसिक विकारों के लिए चिकित्सा।
6. अगदतंत्र : विष या जहर आदि के लिए चिकित्सा।
7. रसायनतंत्र : विटामिन और पोषक तत्वों से संबंधी चिकित्सा।
8. वाजीकरणतत्र : यौन सुख से जुड़ी समस्या संबंधी चिकित्सा।
आयुर्वेद के पंचकर्म:- इसके मुख्‍य प्रकार बताएं जा रहे हैं परंतु इसके उप प्रकार भी है। यह पंचकर्म क्रियाएं योग का भी अंग है।
1. वमन क्रिया : इसमें उल्टी कराकर शरीर की सफाई की जाती है। शरीर में जमे हुए कफ को निकालकर अहारनाल और पेट को साफ किया जाता है।
2. विरेचन क्रिया : इसमें शरीर की आंतों को साफ किया जाता है। आधुनिक दौर में एनिमा लगाकर यह कार्य किया जाता है परंतु आयुर्वेद में प्राकृतिक तरीके से यह कार्य किया जाता है।
3. निरूहवस्थी क्रिया : इसे निरूह बस्ति भी कहते हैं। आमाशय की शुद्धि के लिए औषधियों के क्वाथ, दूध और तेल का प्रयोग किया जाता है, उसे निरूह बस्ति कहते हैं।
4. नास्या : सिर, आंख, नाक, कान और गले के रोगों में जो चिकित्सा नाक द्वारा की जाती है उसे नस्य या शिरोविरेचन कहते हैं।
5. अनुवासनावस्ती : गुदामार्ग में औषधि डालने की प्रक्रिया बस्ति कर्म कहलाती है और जिस बस्ति कर्म में केवल घी, तैल या अन्य चिकनाई युक्त द्रव्यों का अधिक मात्रा में प्रयोग किया जाता है उसे अनुवासन या 'स्नेहन बस्ति कहा जाता है।

धर्म संसार / शौर्यपथ / चांद का धरती के जल से संबंध है। जब पूर्णिमा आती है तो समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है, क्योंकि चंद्रमा समुद्र के जल को ऊपर की ओर खींचता है। मानव के शरीर में भी लगभग 85 प्रतिशत जल रहता है। पूर्णिमा के दिन इस जल की गति और गुण बदल जाते हैं। कहते हैं कि चंद्र की घटती और बढ़ती गति का मन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है इसीलिए प्रमुख रूप से 5 बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
चंद्र कलाएं : अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, ध्रुति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण और पूर्णामृत। इसी को प्रतिपदा, दूज, एकादशी, पूर्णिमा आदि भी कहा जाता है। प्रत्येक कला आपके जीवन पर भिन्न प्रकार का प्रभाव डालती है।
1. पूर्णिमा की रात मन ज्यादा बेचैन रहता है और नींद कम ही आती है।
2. कमजोर दिमाग वाले लोगों के मन में आत्महत्या या हत्या करने के विचार बढ़ जाते हैं।
3. इस दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए। इसके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम हो सकते हैं।
4. वैज्ञानिकों के अनुसार इस दिन चन्द्रमा का प्रभाव काफी तेज होता है इन कारणों से शरीर के अंदर रक्‍त में न्यूरॉन सेल्स क्रियाशील हो जाते हैं और ऐसी स्थिति में इंसान ज्यादा उत्तेजित या भावुक रहता है। एक बार नहीं, प्रत्येक पूर्णिमा को ऐसा होता रहता है तो व्यक्ति का भविष्य भी उसी अनुसार बनता और बिगड़ता रहता है।
5. जिन्हें मंदाग्नि रोग होता है या जिनके पेट में चय-उपचय की क्रिया शिथिल होती है, तब अक्सर सुनने में आता है कि ऐसे व्यक्‍ति भोजन करने के बाद नशा जैसा महसूस करते हैं और नशे में न्यूरॉन सेल्स शिथिल हो जाते हैं जिससे दिमाग का नियंत्रण शरीर पर कम, भावनाओं पर ज्यादा केंद्रित हो जाता है। ऐसे व्यक्‍तियों पर चन्द्रमा का प्रभाव गलत दिशा लेने लगता है। इस कारण पूर्णिमा व्रत का पालन रखने की सलाह दी जाती है।
उपाय :
1. अमावस्या या पूर्णिमा के दिन नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पवित्र हो जाएं फिर एक मिट्टी का दीपक हनुमानजी के मंदिर में जलाएं और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
2. इस दिन तुलसी के पत्ते या बिल्वपत्र नहीं तोडऩा चाहिए।
3. पूर्णिमा की रात में चांद की रोशनी स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होती है। पूर्णिमा की रात में कुछ देर चांदनी में बैठने से मन को शांति मिलती है।
4. कुछ देर चांद को देखने से आंखों को ठंडक मिलती है और साथ ही रोशनी भी बढ़ती है।
5. इस दिन धन्यान करने का बहुत ही ज्यादा लाभ मिलता है।

दुर्ग / शौर्यपथ / शिक्षा का अधिकार कानून के अंतर्गत प्रदेश के 6400 प्रायवेट स्कूलों में लगभग 2.85 लाख अध्ययनरत् है और इस वर्ष 2020-21 में भी अब तक लगभग 30 हजार बच्चों को प्रायवेट स्कूलों में प्रवेश दिया गया है। ऐसे प्रवेशित बच्चों के ऊपर किये जा रहे व्यय की प्रतिपूर्ति राज्य के द्वारा की जा रही है, लेकिन लगभग 250 करो? प्रतिपूर्ति राशि बकाया है, जो विगत दो वर्षो से प्रायवेट स्कूलों को प्राप्त नहीं हुआ है, जिसको लेकर प्रायवेट स्कूलों के द्वारा लगातार मांग किया जा रहा है।
छत्तीसगढ पैरेंट्स एसोसियेशन के प्रदेश अध्यक्ष क्रिष्टोफर पॉल ने मुख्यमंत्री और स्कूल शिक्षा प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर प्रायवेट स्कूलों की बकाया प्रतिपूर्ति राशि अविलंब जारी करने और राशि भी बढाने की मांग किया गया है।
पॉल का कहना है कि प्रतिवर्ष विधानसभा मे प्रश्न भी पूछे जाते है कि आरटीई की राशि कितना आंबटन हुआ और कितना बकाया है, कितने बच्चो को प्रायवेट स्कूलों को प्रवेश दिया गया है, लेकिन यह प्रश्न नहीं पूछा जाता है कि कितने आरटीई के प्रवेशित बच्चों ने प्रायवेट स्कूलों को छोड़ दिया और शालात्यागी बच्चे किन कारणों से प्रायवेट स्कूल छोड रहे है। प्रदेश में अब तक लगभग 15 हजार आरटीई के अंतर्गत प्रवेशित बच्चों ने प्रायवेट स्कूल छोड दिया है, इसकी जानकारी लगातार एसोसियेशन के द्वारा स्कूल शिक्षा विभाग को भी दिया जा रहा है, लेकिन इस पर विभाग ने कभी गंभीरता से जांच तक नहीं कराया, जो चिंता का विषय है, क्योंकि समय पर राशि जारी नहीं होने से प्रवेशित बच्चों को स्वयं अपने लिए कॉपी-किताब, जूते-मोजे और ड्रेस खरीदने पढते है, जिसके लिए प्रत्येक पालक को लगभग 10 हजार व्यय करना पड़ता है, जो एक गरीब पालक के लिए समस्या बन जाता है, जिससे तंग आकर पालक अपने बच्चों को प्रायवेट स्कूलों से निकाल कर सरकारी स्कूलों में डालने के लिए मजबूर हो रहे है। राज्य कि यह जिम्मेदारी है, वे गरीब तबके के बच्चों को प्रायवेट स्कूलों में प्रवेश दिलाये और शिक्षा पूर्ण होने तक उनकी निगरानी करें, मगर ऐसा नहीं हो रहा है, क्योंकि पहले प्रवेश देने में आना-कानी किया जाता है और प्रवेश देने के पश्चात् उनका कोई सुध लेने वाला नहीं होता है। शिक्षा का अधिकार कानून को कागजों में नहीं क्लास रूम में कड़ाई से पालन कराने की जरूरत है।

खाना खजाना /शौर्यपथ /सरसों का साग और मक्की की रोटी बनाने के लिए सामग्री-
साग के जरूरी चीजें-
-750 ग्राम सरसों का साग
-250 ग्राम पालक का साग
-250 ग्राम बथुए का साग
-2 कप पानी
-एक चुटकी नमक
-1 1/2 कप मक्की का आटा
-4 हरी मिर्च
-25 ग्राम अदरक
-6 लहसुन की कली
-2 प्याज
-घी
-1/2 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर
-1/2 टी स्पून गरम मसाला
-1/2 टी स्पून धनिया पाउडर
सरसों का साग बनाने का तरीका-
सरसों का साग बनाने के लिए सबसे पहले प्रेशर कुकर में तीनों साग को डालकर उसके साथ नमक और पानी डालकर धीमी आंच पर 1 1/2 घंटे तक पकाएं। अब
साग का पानी निचोड़कर उसका पानी एक तरफ रख दें। साग को कुकर में अच्छे से मैश कर लें। अब इसमें मक्की का आटा डालकर साग में मिला लें। इसके बाद कुकर में साग के पानी के साथ नॉर्मल ताजा पानी डालकर कर इसे धीमी आंच पर पकाएं। साग में हरी मिर्च और अदरक डालकर साग को गाढ़ा होने तक पकाएं।
साग का तड़का-
साग के लिए तड़का तैयार करने के लिए प्याज, अदरक, लहसुन, लाल मिर्च, गरम मसाला, धनिया डालकर भून लें। ध्यान रखें प्याज को गोल्डन ब्राउन होने तक भूने। अब तड़के को साग में डालकर मिक्स कर लें। अब गार्निशिंग के लिए जूनियन कटी अदरक का इस्तेमाल करते हुए गर्मा-गर्म साग मक्की की रोटी के साथ सर्व करें।
मक्की की रोटी-
-1/2 किलो मक्की का आटा
-आटा गूंथने के लिए पानी
-तलने के लिए घी
मक्की की रोटी बनाने का तरीका-
मक्की की रोटी बनाने के लिए सबसे पहले मक्की का आटा लकर उसे आटे की ही तरह गूंथ लें। अब तवा गर्म करके उस पर थोड़ा सा घी डालें ताकि रोटी तवे पर चिपके नहीं। अब चकले पर गोल आकार की मक्की की रोटी तैयार करके आराम से तवे पर डालें। रोटी पर घी लगाकर गोल्डन ब्राउन होने तक सेकें। मक्के की रोटी को सरसों का साग, गुड़ और सफेद मक्खन के साथ सर्व करें।

सेहत /शौर्यपथ /सिर दर्द, बदन दर्द जैसी परेशानियों से निजात पाने के लिए अगर आप भी बिना डॉक्टर को दिखाए कोई भी पेन किलर ले लेते हैं तो सतर्क हो जाएं। ऐसा करना आपकी सेहत पर भारी पड़ सकता है। क्या आप जानते हैं डॉक्टर की सलाह के बिना किसी भी दवाई का सेवन करने की आदत गंभीर रोगों को जन्म दे सकती है। आइए जानते हैं किस दवा का सेवन करने से शरीर को होता है क्या नुकसान।
क्यों पड़ती है पेन किलर की जरूरत-
-जोड़ों के दर्द से राहत पाने के लिए
-किसी दुर्घटना में लगी चोट के दर्द को कम करने के लिए
-जलने या कटनी की अवस्था में
डॉक्टर से बिना सलाह लिए पेन किलर खाने से होते हैं ये साइड इफेक्ट-
पेन किलर दवाओं में एडिक्टिव तत्व पाए जाते हैं। लंबे समय तक इन दवाओं का सेवन करने पर शरीर को इनकी आदत हो जाती है। इसके अलावा यह दवाएं लीवर और किडनी की सेहत को भी काफी नकसान पहुंचाती हैं। इनका सेवन करने से ब्रेन हेमरेज और खून पतला होने का खतरा बढ़ जाता है। पेन किलर लेने वाले व्यक्ति में गैस की समस्या, पेट में तेजी से दर्द, लूज मोशन, जी मिचलाना आदि लक्षण साइड इफेक्ट के रूप में नजर आने शुरू हो जाते हैं।
कफ सिरप -
-गले में दर्द या खराश
-छाती में जकड़न
-खांसी के साथ कफ या सूखी खांसी
कफ सिरप के साइड इफेक्ट-
कफ सिरप के साइड इफेक्ट होने पर व्यक्ति में सुस्ती, याददाश्त में कमी, घबराहट, हाई ब्लड प्रेशर, दिल की धड़कन का अनियमित होना, नोजिया आदि जैसे लक्षण देखाई देने लगते हैं।
सलाह-
अगर आपको मामूली खांसी है तो आप गुनगुने पानी में नमक डालकर गरारे कर सकते हैं। इसके अलावा अदरक और तुलसी से बने काढ़े का सेवन भी राहत देने का काम करता है।
लैक्जेटिव मेडिसिन-
लैक्जेटिव मेडिसिन की जरूरत कब्ज की समस्या को दूर करने के लिए पड़ती है। इसके अलावा सर्जरी या डिलीवरी से पहले भी पेट साफ करने के लिए डॉक्टर इन दवाइयों का सेवन करने की सलाह देते हैं।
लैक्जेटिव मेडिसिन के साइड इफेक्ट-
लंबे समय तक इन दवाओं का सेवन करने पर व्यक्ति को पेट में दर्द, लूज मोशन, किडनी में स्टोन, डिहाइड्रेशन, हार्ट मसल्स का कमजोर पड़ना आदि जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं।
सलाह-
लैक्जेटिव मेडिसिन के साइड इफेक्ट नजर आने पर डॉक्टर रोगी को खूब पानी पीने की सलाह देते हैं। ऐसे मरीज अपनी डाइट में अमरूद पपीता जैसे फाइबर युक्त फलों और हरी सब्जियों को शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा रोगी ब्रेकफास्ट में स्प्राउट, दलिया, उपमा आदि जैसी चीजें शामिल कर सकता है।
एंटीबायोटिक्स-
व्यक्ति को एंटीबायोटिक्स खाने की सलाह तब दी जाती है जब उसे बुखार या किसी तरह की एलर्जी की कोई शिकायत हो। इस तरह की दवाएं बैक्टीरिया और फंगस को नष्ट करने में मदद करती हैं।
एंटीबायोटिक्स के साइड इफेक्ट-
बिना पूछे एंटीबायोटिक्स का सेवन करने पर त्वचा में एलर्जी, लूज मोशन जैसी समस्याएं व्यक्ति को परेशान कर सकती हैं। लंबे समय तक इन दवाओं का सेवन करने पर व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के साथ अच्छे बैक्टेरिया भी खत्म होने शुरू हो जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इन दवाइयों से वायरस और बैक्टीरिया अपना रेंजिस्टेंस बढ़ा लेते हैं, जिससे उन पर किसी भी तरह की दवा का असर नहीं होता।

सेहत /शौर्यपथ किसी सब्जी का स्वाद बढ़ाना हो या फिर सलाद की प्लेट सजानी हो, दोनों ही चीजें प्याज के बिना अधूरी हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं इसके अलावा भी प्याज का सेवन करने के कई जादुई फायदे होते हैं, जिनके बारे में शायद ही आप जानते होंगे। जी हां सर्दियों में प्याज का सेवन न सिर्फ आपकी सेहत का ध्यान रखता है बल्कि आपकी मुसकुराहट भी खूबसूरत बने रहे, इसका भी ध्यान रखता है। आइए जानते हैं प्याज का सेवन करने के कुछ ऐसे ही गजब के फायदे।
सर्दियों में शरीर को गर्म रखने के लिए अक्सर गर्म तासीर वाली चीजें खाने की सलाह दी जाती है। ऐसे आहार में प्‍याज का नाम भी शामिल है। सर्दियों में प्याज का सेवन करने से शरीर गर्म रहने के साथ कई तरह के संक्रमण और बीमारियों से भी बचा रहता है।
प्याद का सेवन करने के कई गजब के फायदे-
-शरीर को गर्म रखता है प्याज-
प्याज की तासीर गर्म होती है। इसका सेवन करने से शरीर गर्म बना रहता है। प्राचीन चीनी उपचार पद्धतियों में भी प्याज के रस का उपयोग शरीर को गर्म रखने के लिए किया गया है। इतना ही नहीं चीन में तो प्याज को ऊर्जा का पावरहाउस तक माना जाता है।
-मौसमी संक्रमण से बचाता है-
प्याज एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटीसेप्टिक और एंटी-बैक्टीरियल गुणों से भरपूर होता है। यही वजह है कि प्याज का सेवन सर्दियों में काफी लाभकारी माना जाता है। प्याज का सेवन करने से सर्दी, खांसी, कान का दर्द, बुखार और त्वचा की समस्याओं में भी राहत मिलती है।

-दांतों की देखभाल
कच्चे प्याज को चबाने से मुंह के स्वाद को संतुलित करते हुए मसूड़ों के संक्रमण और मुंह के रोगों के खतरे को कम किया जा सकता है।
स्तन कैंसर से बचाव-
कच्चे प्याज का सेवन करने से महिलाओं में स्तन कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है। 2008 से 2014 के बीच किए गए एक अध्ययन के अनुसार, देखा गया कि प्‍याज का सेवन करने से महिलाओं में स्‍तन कैंसर का खतरा कम हुआ।
-बेहतर पाचन और वजन घटाने में मददगार-
प्याज फाइबर और प्री-बायोटिक्स का एक बड़ा स्रोत हैं, जो आंत के स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक माना जाता हैं। विशेषज्ञों की मानें तो प्री-बायोटिक्स आहार शरीर में कैल्शियम के अवशोषण में सुधार करने में मदद कर सकता है, जो मजबूत हड्डियों के लिए बेहद जरूरी है। लाल प्याज में क्वेरसेटिन नाम का फ्लेवोनॉइड होता है, जो शरीर के विभिन्न हिस्सों में वसा के संचय को रोकने में मदद करता है। यह फ्लेवोनॉइड चयापचय दर को बढ़ाता है।

धर्म संसार / शौर्यपथ /कार्तिक पूर्णिमा व देव दीपावली का पर्व कल देशभर में मनाया जाएगा। इसी के साथ ही कार्तिक मास स्नान भी कल से समाप्त हो जाएगा। एक मास के कार्तिक स्नान के आखिरी दिन पूर्णिमा को श्रद्धालु मंदिरों में दीप दान करते हैं। इसी दीप दान को देव दीपावली के नाम से जाना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही माता तुलसी वनस्पति के रूप में पृथ्वी पर प्रगट हुई थीं। पुराणों में कार्तिक मास की महत्ता के साथ ही कार्तिक पूर्णिमा के महत्व को भी विस्तार से वर्णन किया गया है।
हिन्दू पंचांग के अनुसार, इस बार कार्तिक पूर्णिमा 29 और 30 नवंबर 2020 (रविवार, सोमवार) को है। 29 नवंबर को दोपहर 12:30 बजे पूर्णिमा तिथि शुरू होगी और 30 नवंबर को दोपहर 02:25 बजे तक रहेगी। पूर्णिमा का व्रत करने वालों के लिए रविवार को पूर्णिमा होगी जबकि स्नान-दान करने वाले सोमवार को पूर्णिमा मनाएंगे।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन मंदिरों में दीपदान करना व दीपदर्शन करना बहुत ही शुभ होता है। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दि भगवान के विष्णु के साथ गौरी-महादेव का पूजन किया जाता है। साल की 12 पूर्णिमाओं में से कार्तिक, माघ और वैशाख पूर्णिमा को विशेष ही पुण्यदायी माना गया है।
कार्तिक पूर्णिमा पूजा विधि-
कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रात: गंगा स्नान या पास की नदी/जलाशय में स्नान करना चाहिए।
घर के बाहर जाना संभव न हो तो घर में ही स्नान के बाद गंगाजल छिड़क सकते हैं।
स्नान करने के बाद भगवान विष्णु, शिव-पार्वती की पूजा करनी चाहिए।
कार्तिक पूर्णिमा की शाम को मंदिरों दीपक जलाना चाहिए। साथ शिव मंदिर में जाकर शिव परिवार (शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नंदी) का दर्शन करना चाहिए।
कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था त्रिपुरासुर का अंत
इस संदर्भ में एक कथा है कि त्रिपुरासुर नाम के दैत्य के आतंक से तीनों लोक भयभीत थे। त्रिपुरासुर ने स्वर्ग लोक पर भी अपना अधिकार जमा लिया था। त्रिपुरासुर ने प्रयाग में काफी दिनों तक तप किया था। उसके तप से तीनों लोक जलने लगे। तब ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिए, त्रिपुरासुर ने उनसे वरदान मांगा कि उसे देवता, स्त्री, पुरुष, जीव, जंतु, पक्षी, निशाचर न मार पाएं। इसी वरदान से त्रिपुरासुर अमर हो गया और देवताओं पर अत्याचार करने लगा।
सभी देवताओं ने मिलकर ब्रह्मा जी से इस दैत्य के अंत का उपाय पूछा, ब्रह्मा जी ने देवताओं को त्रिपुरासुर के अंत का रास्ता बताया। देवता भगवान शंकर के पास पहुंचे और उनसे त्रिपुरासुर को मारने के लिए प्रार्थना की। तब महादेव ने त्रिपुरासुर के वध का निर्णय लिया। महादेव ने तीनों लोकों में दैत्य को ढूंढ़ा। कार्तिक पूर्णिमा के दिन महादेव ने प्रदोष काल में अर्धनारीश्वर के रूप में त्रिपुरासुर का वध किया। उसी दिन देवताओं ने शिवलोक यानि काशी में आकर दीपावली मनाई।
कार्तिक पूर्णिमा का पर्व सोमवार (30 नवंबर 2020 को) को अगर भरण और रोहिणी नक्षत्र में स्नान-दान के साथ मनाया जाएगा। सोमवार को सुबह पूर्णिमा तिथि को रोहणी नक्षत्र होने से इस पर्व का महत्व और भी बढ़ गया है। पू्र्णिमा तिथि तो रविवार को दोपहर 12:30 के बाद शुरू हो जाएगी, लेकिन उदया तिथि सोमवार को होने के करण ग्रहस्थ लोग सोमवार को कार्तिक पूर्णिमा मनाएंगे। कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली, तुलसी प्राकट्योत्सव और गुरुनानक देव जी का प्रकाश पर्व भी मनाया जाएगा। इस प्रकार गुरुनानक देव जी का 151 प्रकाशोत्सव होगा।
कार्तिक पूर्णिमा 2020 तिथि:
29 नवंबर 2020, रविवार: पूर्णिमा तिथि आरंभ-दोपहर 12 बजकर 47 मिनट पर
30 नवंबर 2020, सोमवार: पूर्णिमा तिथि समाप्‍त - दोपहर 02 बजकर 59 मिनट पर
देव दीपावली का पर्व भगवान विष्णु से जुड़ा है। मान्यता है कि इस दिन बनारस के घाटों पर देवता देव दीपावली मनाने आते हैं। कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली को लेकर पुराणों में कई कथाओं का वर्णन मिलता है।
लक्ष्मी जी की कृपा पाने को कार्तिक पूर्णिमा को करें ये 3 उपाय
1- तुलसी की पूजा करें। तुलसी को मां लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। कार्तिक पू्र्णिमा को ही तुलसी पृथ्वी पर वनस्पति के रूप में आई। इसलिए आज के दिन उनकी पूजा का विधान है। मान्यता है कि ऐसे करने वालों पर माता लक्ष्मी कृपा बरसाती हैं।
2- गंगा/नदी में स्नान कर पूजापाठ और दान करने के बाद मंदिरों में घी का दिया जलाएं। ऐसा करने से देवता प्रसन्न होते हैं और सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद देते हैं।
3- घर अपने अपने पितरों के नाम पर दीपक रखें। परिवार की आर्थिक तंगी दूर करने के लिए पितरों को खुश करना बेहद जरूरी माना जाता है। देव दीपावली को पितर देवताओं को दीप दान करने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा 30 नवंबर सोमवार को है। इस दिन स्नान के साथ दान का भी बहुत महत्व है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस बार कार्तिक पूर्णिमा पर सर्वार्थसिद्धि योग व वर्धमान योग बन रहे हैं। इस योग के कारण कार्तिक पूर्णिमा का महत्व और भी बढ़ जाता है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा में या तुलसी के पास दीप जलाने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
कार्तिक पूर्णिमा पर इस बार कोरोना के कारण कई जगह गंगा स्नान की अनुमति नहीं है। इसलिए श्रद्धालु घर पर नहाने के लिए रखे गए पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान का पुण्य ले सकते हैं।
ज्योतिषाचार्य डा.सुशांत राज के अनुसार इस दिन किए जाने वाले दान-पुण्य समेत कई धार्मिक कार्य विशेष फलदायी होते हैं। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा की संध्या पर भगवान विष्णु का मत्स्यावतार हुआ था। दूसरी मान्यता के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन महादेव ने त्रिपुरासुर का वध किया था।
तीसरा उपच्छाया ग्रहण 30 नवंबर को
तीसरा उपच्छाया ग्रहण भी 30 नवंबर को ही है। यह वास्तव में चंद्रग्रहण नहीं होता। इस उपच्छाया ग्रहण की समयावधि में चंद्रमा की चांदनी में केवल धुंधलापन आ जाता है। इससे ग्रहण के सूतक भी नहीं लगेगा। भारत सहित यह उपच्छाया अधिकतर यूरोप, एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, दक्षिण-पश्चिमी दक्षिण अमरीका (पूर्वी ब्राजील, उर्गवे, पूर्वी अर्जेन्टीना), प्रशांत तथा हिन्द महासागर आदि क्षेत्रो में दिखाई देगा। भारत के कई प्रांतों में यह उपच्छाया दिखाई नही देगी।

सेहत / शौर्यपथ / सर्दियां शुरू हो चुकी हैं, ऐसे मौसम में अगर शहद को अपनी डाइट में शामिल कर लिया जाए तो यह सेहत के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है। शहद पोषक तत्वों से से भरपूर है। यह सिर्फ बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि ज्यादा उम्र के लोगों के लिए भी फायदेमंद होता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन- बी, सी, आयरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम, सोडियम जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं।
शहद हमारी सेहत के लिए सबसे बेहतर और अनमोल नेचुरल प्रोडक्ट्स में से एक है। यह खाने में जितना टेस्टी लगता है, उतना ही हमारे शरीर को फायदा भी पहुंचाता है। शहद का इस्तेमाल सिर्फ श0रीर को पोषण देने के लिए ही नहीं, बल्कि कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के उपचार के लिए भी किया जाता है। इसका इस्तेमाल घाव भरने से लेकर कैंसर के उपचार तक में किया जाता है।
किन समस्याओं में लाभकारी है शहद
आमतौर पर शहद का इस्तेमाल नेत्र रोग , ब्रोंकियल अस्थमा , तपेदिक , प्यास, हिचकी, थकान, चक्कर आना, हेपेटाइटिस, कब्ज, अपच, बवासीर, एक्जिमा, अल्सर और घावों को भरने के उपचार में किया जाता है। साथ ही शरीर में पोषण की कमी को दूर करने के लिए भी शहद को एक सप्लीमेंट की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
क्लिनिकल रिसर्च के मुताबिक ऐसे कई सबूत हैं, जिनमें घावों, मधुमेह मेलेटस , कैंसर, अस्थमा, और हृदय, न्यूरोलॉजिकल और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोगों के नियंत्रण और उपचार में शहद के उपयोग का सुझाव दिया गया है।
क्या कहती है स्टडी
क्लीनिकल रिसर्च के एक रिव्यू के मुताबिक शहद को विभिन्न औषधीय प्रयोजनों के लिए एक नेचुरल मेडिकल एजेंट माना जा सकता है। इसके लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं कि रोगों के प्रबंधन के लिए शहद काफी उपयोगी साबित हो सकता है।
सेहत के लिए कैसे फायदेमंद है शहद
1 एंटीऑक्सीडेंट से है भरपूर
शहद में एंटीऑक्सीडेंट की मौजूदगी इसे आपकी त्वचा और बालों के साथ ही संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक बनाती है।
2 खराब कॉलेस्ट्रोल को कम करता है
शहद का सेवन करने से शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है। साथ ही यह शरीर में अच्छे कोलेस्ट्रॉल को भी बढ़ाता है। इसके अलावा इससे शरीर में सूजन की समस्या दूर होती है। जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद होता है।
3 गले के लिए है फायदेमंद
सर्दियों का मौसम है, ऐसे में आपको खांसी-जुकाम जैसी समस्याएं होना आम बात है। सर्दियों में रोजाना नियमित रूप से 1 चम्मच शहद का सेवन करने से आपके गले को पोषण मिलता है, जो आपको खांसी-जुकाम जैसी समस्याओं से बचाने में मदद करता है।
4 दिल का रखता है ख्याल
शहद में मीठी सौंफ मिलाकर खाने हमारा हृदय मजबूत बनता है। दिल के स्वास्थ्य के लिए शहद बहुत गुणकारी है। शहद के सेवन से हृदय को ठीक तरह से काम करने में भी मदद मिलती है।
5 पाचन को दुरुस्त करता है
कब्ज, पेट फूलने और जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए शहद का सेवन बहुत फायदेमंद होता है। तो ऐसे में आप दवा की जगह शहद का सेवन कर सकती हैं। शहद में एंटी-बैक्टीरियल गुण मौजूद होते हैं जो हमारे पाचन तंत्र को दुरुस्त करने में मददगार साबित होते हैं।

खाना खजाना//शौर्यपथ / खाने का स्वाद बढ़ाने में उसके साथ परोसी जाने वाली चटनी का बहुत बड़ा हाथ होता है। ऐसी ही एक चटनी का नाम है अमरूद की चटनी। यह एक खट्टी मिट्ठी चटनी है जिसे अमरूद से बनाया जाता है। अमरुद की चटनी खाने में बहुत मजेदार और चटपटी होती है। यदि आप भी खाने के साथ चटनी खाना पसंद करते हैं तो ट्राई करें अमरूद की यह टेस्टी चटनी।
अमरूद की चटनी के लिए सामग्री-
-250 ग्राम अमरूद बारीक कटा हुआ
-1/2 टी स्पून नमक
-1 टेबल स्पून नींबू का रस
-1 हरी मिर्च कटी हुई
-1 टेबल स्पून अदरक कटा हुआ
-1 टी स्पून लाल मिर्च
-2 टेबल स्पून हरा धनिया कटा हुआ
अमरूद की चटनी बनाने का तरीका-
अमरूद की चटनी बनाने के लिए सबसे पहले आप सभी सामग्री को एक साथ मिक्सी में डालकर ​पीस लें। आपकी अमरूद की चटनी सर्व करने के लिए तैयार है।

सेहत /शौर्यपथ / ज्योतिष विज्ञान में स्वर शकुन का बहुत ही महत्व है। स्वर दो होते हैं चंद्र स्वर और सूर्य स्वर। नासिका के दाहिने छिद्र से आने वाली सांस को सूर्य स्वर कहते हैं‌ और बांयी ओर के छिद्र से आने वाली श्वांस को चंद्र स्वर कहते हैं। इसे हम स्वर विज्ञान भी कहते हैं। यात्रा करते समय या अन्य किसी महत्वपूर्ण कार्य के समय यदि हमें कहीं जाना होता है तो इस शकुन को आप अपना सकते हैं। शास्त्रों में लिखा है- ’जेहिं स्वर चले, ताहीं पग दीजे। भद्रा या भरणी, कोई न लीजे।’ अर्थात बाहर जाते समय या यात्रा करते समय या किसी महत्वपूर्ण काम के लिए बाहर निकलते समय अपनी नाक पर हथेली रखे और महसूस करें कि नाथ के कौन से छिद्र से अधिक गहरी सांस आ रही है। दाहिने छिद्र से या बांये छिद्र से। जिस तरफ की सांस तेज चल रही हो, उसे स्वर चलना कहते हैं। यदि आपकी नाक के दाहिने छिद्र से सांस तेज चल रही है तो आप घर की देहरी को दाहिने पैर से लांघकर बाहर निकलेंगे। आपकी यात्रा, आपका कार्य होने की बहुत अधिक सफल होने की संभावनाएं बन जाती हैं। इसी प्रकार यदि आपकी नाक का बांया स्वर अधिक तेज चल रहा हो तो आप सबसे पहले बांया पैर ही बाहर निकालें।
इसके अलावा भी स्वर विज्ञान के बहुत से उपयोग हैं। भोजन करते समय आपका सूर्य स्वर नासिका के दाहिने छिद्र से तेज सांस आ रहा हो तो आपको भोजन के संपूर्ण रस मिलेंगे और वह आपकी पाचन क्रियाएं चुस्त-दुरुस्त रहेंगी। भोजन जल्दी हजम होगा। दाहिना स्वर सूर्य स्वर माना जाता है। इसका स्वभाव गर्म होता है और यह पेट की जठराग्नि को तेज कर देता है जिससे खाया हुआ समस्त भोजन ठीक प्रकार से पच जाता है।
चंद्र स्वर अर्थात नाक के बाएं छिद्र से सांस आने के समय भोजन करने से भोजन को पचने में देर लगती है। कभी-कभी तो कब्ज की भी शिकायत हो जाती है। किसी राजनेता, अधिकारी और वरिष्ठजन से मिलते समय ध्यान रखें आपका चंद्र स्वर चलना चाहिए। इससे आपके कार्य विनम्रता पूर्वक पूर्ण हो सकेंगे। जोश, हिम्मत, आवेश एवं शीघ्रता के काम में सूर्य स्वर महत्वपूर्ण है। सूर्य स्वर चलने से खेलकूद,भागदौड़ एवं किसी विरोधी से बात करना, मेहनत और परिश्रम के कार्य आदि ऐसे कार्य सूर्य स्वर के चलने में सफल होते हैं।
यदि हमारे स्वर कार्य के अनुसार नहीं चल रहा है तो स्वर को बदला भी जा सकता है। मान लीजिए हमें किसी अधिकारी के पास जाकर बात करनी है और हमारा दाहिना स्वर यानी कि सूर्य स्वर चल रहा है तो वहां कार्य की संभावना क्षीण हो जाती है। इसलिए स्वर को बदलने के लिए भी एक उपक्रम है। यदि आपका दाहिना स्वर चल रहा है तो आप अंगूठे से अनुलोम-विलोम प्रक्रिया के तरह अपनी नाक का दाहिना छिद्र दबाएंगे और बाएं छिद्र से बार-बार सांस लेंगे। धीरे-धीरे आपका स्वर बदल जाएगा और चंद्र स्वर चलना आरंभ हो जाएगा।

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