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मनोरजन / शौर्यपथ / लॉकडाउन में इन दिनों बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद सुर्खियों में बने हुए हैं। वह पिछले कई दिनों से मुंबई में फंसे प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजने का काम कर रहे हैं। सोनू के इस कदम की हर तरफ चर्चा हो रही है। इतना ही नहीं उन्होंने सोशल मीडिया पर एक नंबर जारी कर दिया है, जिसमें कॉल करके कोई भी मदद मांग सकता है। इस बीच एक यूजर ने सोनू सूद से कहा कि वह अपनी गर्लफ्रेंड से चाहता है। इस पर सोनू ने भी मजेदार जवाब दिया।
एक शख्स ने सोनू सूद को टैग कर ट्वीट करते हुए कहा, 'सोनू सूद भैया, एक बार मेरी गर्लफ्रेंड से मिलवा दीजिए, बिहार ही जाना है। सोनू ने इस शख्स के ट्वीट को भी नजरअंदाज नहीं किया और बहुत ही मजेदार जवाब दिया है। उन्होंने रिप्लाई देते हुए कहा, 'थोड़े दिन दूर रहकर देख ले भाई। सच्चे प्यार की परीक्षा भी हो जाएगी।'
इससे पहले एक यूजर ने सोनू सूद से शराब की दुकान तक पहुंचाने की बात कही थी इस पर भी सोनू ने बेहतरीन जवाब दिया था। सोनू ने कहा था कि भई ठेके से घर तक पहुंचाना हो तो बता देना। हाल ही में सोनू ने फीवर डिटजिटल 100 Hours 100 Stars में बात करते हुए कहा था, 'जो लोग इन दिनों बोर हो रहे हैं आप दूसरों के लिए समय निकाल सकते हैं। मैं अपने दोस्तों से भी कहता हूं कि आप थोड़ा एक्स्ट्रा खाना बनाएं और किसी जरूरतमंद इंसान या उनके परिवार को दें। अगर ऐसा होता है तो कोई भी खाली पेट नहीं सोएगा।'
नजरिया / शौर्यपथ / वे डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पेशेवर हैं, जो भारत से संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) आए थे। कुछ लोग यहां अध्ययन के लिए इस योजना के साथ आए थे कि अगर सब ठीक रहा, तो यहीं बस जाएंगे। और कुछ अन्य ऐसे भी हैं, जो बिंदीदार लाइनों वाले उस अनुबंध के साथ यहां स्थाई निवास के इरादे से पहुंचे थे, जिसे ग्रीन कार्ड भी कहा जाता है और जिससे अंतत: नागरिकता हासिल हो जाती है।
अपने ग्रीन कार्ड का इंतजार करते उनमें से कुछ बूढ़े भी हो रहे हैं। वे असुरक्षित, निराश और अब पहले से कहीं अधिक भयभीत भी हो गए हैं। यदि कोरोना वायरस महामारी द्वारा पैदा आर्थिक संकट के कारण उनमें से कुछ की नौकरी चली गई, तो वे ग्रीन कार्ड के लिए अपनी पात्रता गंवा देंगे। कुछ की नौकरी जा भी चुकी है। ऐसे लोगों को प्रत्यर्पण का सामना करना पडे़गा। ऐसा ही उन लोगों के परिवारों के साथ भी होगा, जो कोरोना संक्रमण की वजह से जान गंवा चुके हैं।
वे हताश हैं और इतने हताश कि अपने विस्मय की हद तक वे एक शक्तिशाली अमेरिकी सीनेटर से मुकाबला कर रहे हैं। लोग आश्वस्त हैं कि यही इकलौता आदमी है, जो उनके और ग्रीन कार्ड के बीच खड़ा है : रिचर्ड डर्बिन, इलिनोइस के वरिष्ठ डेमोके्रटिक सीनेटर। ग्रीन कार्ड के भारतीय उम्मीदवार विश्वास करते हैं कि डर्बिन उनका प्रत्यर्पण कराने के लिए दृढ़ हैं। डर्बिन उनके साथ ही उनके उन बच्चों का भी प्रत्यर्पण कराएंगे, जो अमेरिका के अलावा किसी अन्य देश को जानते भी नहीं हैं। ग्रीन कार्ड के लिए आशावान ये लोग अगले सप्ताह से टीवी और अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन चलाने की योजना बनाए बैठे हैं, ताकि अपनी तकलीफ से ज्यादा से ज्यादा लोगों को अवगत करा सकें। इमिग्रेशन वॉयस, एक एक्टिविस्ट ग्रुप है, जो फिलहाल इन भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। यह गु्रप ग्रीन कार्ड प्रतीक्षा अवधि में कटौती के लिए कानूनों में संशोधन करने की दिशा में अभियान चला रहा है। इस एक्टिविस्ट गु्रप ने सीनेटर रिचर्ड डर्बिन पर ‘नस्लवादी’ होने का आरोप भी लगाया है।
अमेरिका हर साल रोजगार-आधारित और परिवार-आधारित लगभग दस लाख ग्रीन कार्ड देता है। अमेरिका ने कार्य-आधारित श्रेणी में किसी एक देश के आवेदकों के लिए सात प्रतिशत की कैप या कोटा तय कर रखा है। दूसरे देशों के प्रत्याशियों की तुलना में भारतीय प्रत्याशियों की संख्या प्रतीक्षा पंक्ति में बहुत ज्यादा है। जो लोग बच जाते हैं, बैकलॉग में जुड़ जाते हैं। इनमें ज्यादातर भारतीय होते हैं। जुड़ते-जुड़ते यह प्रतीक्षा सूची इतनी लंबी हो गई है कि अमेरिका के एक परंपरावादी थिंक-टैंक कैटो इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि अभी कोई अगर आवेदन करे, तो उसे लगभग 150 वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है, जाहिर है, यह एक असंभव स्थिति है।
समस्या के समाधान के लिए वर्षों से प्रयास चल रहे हैं। एक समाधान है, जो डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, दोनों को सबसे अधिक स्वीकार्य है, वह है देश के लिए लगे सात प्रतिशत के कैप को हटाना। इसके लिए संशोधन को पिछले अगस्त में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में पारित किया गया था, लेकिन सीनेट में इसके पारित होने को सिर्फ एक सीनेटर रिचर्ड डर्बिन ने रोक दिया था। उन्होंने उस संशोधन के जवाब में एक प्रतिकूल विधेयक पेश कर दिया, जो ग्रीन कार्ड की संख्या के विस्तार के कारण निर्मित बैकलॉग के मुद्दे को संबोधित करने की कोशिश करता है।
भारत सरकार इन लोगों की मुश्किलों से वाकिफ है। यूएस सिटिजनशिप के अनुसार, इन भारतीयों की संख्या 3,06,000 है, जबकि एक अन्य संस्था इमीग्रेशेन वॉयस के अनुसार, इनकी संख्या 15 लाख है। भारत सरकार अमेरिका में अपने हितचिंतकों के साथ खामोशी से इस मुद्दे को उठाती है, लेकिन वह बहुत कुछ करने में असमर्थ है। स्थितियों की विषमता के आगे भारत सरकार विवश है। भारत सरकार लगातार यह पैरवी कर रही है कि अमेरिका भारत से ज्यादा अप्रवासियों को अपने यहां स्वीकार करे।
यह अमेरिका में रहने की आशा के साथ वहां अध्ययन या काम करने की योजना बनाने वाले भारतीयों के लिए एक बड़ा संदेश है। ग्रीन कार्ड की कतार में शायद जीवन की सार्थकता नहीं है। इस कतार की दूसरी छोर पर रिचर्ड डर्बिन जैसा कोई इंतजार कर रहा है और यह कोई सोच की आत्म-केंद्रित परिभाषा या मानसिकता भर नहीं है। यशवंत राज, अमेरिका में हिन्दुस्तान टाइम्स संवाददाता
सम्पादकीय / शौर्यपथ / देश में ज्यादातर यात्राएं रद्द हैं, तो स्वाभाविक है, लेकिन किन्हीं जरूरी तय यात्राओं का आखिरी चरण में रद्द होना निंदनीय ही नहीं, दुखद भी है। 25 मई को विशेष हवाई सेवा की शुरुआत हुई और पहले ही दिन 80 से ज्यादा फ्लाइट्स का रद्द होना न जाने कितने लोगों को परेशानी में डाल गया। अव्वल तो हवाई अड्डे पहुंचना ही टेढ़ी खीर है। भारी खर्च करके पहुंच भी गए, तो फ्लाइट का रद्द हो जाना व्यापक विफलता के सिवा और क्या है? कहना न होगा, इन दिनों यात्राओं के साथ हमने बहुत बुरा सुलूक करना शुरू कर दिया है। पैदल यात्रा हो या हवाई यात्रा हर जगह लोगों को परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है, तो इसके लिए सिवाय प्रशासन के कोई और जिम्मेदार नहीं है। जिनकी यात्राएं रद्द हो गईं, उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा? बेशक, कोरोना काल में फ्लाइट के रद्द होने के कारण बढ़ जाएंगे। छोटे-छोटे कारणों से भी फ्लाइट को रद्द करना आम हो जाएगा। अत: यह बहुत जरूरी है कि जिनकी फ्लाइट रद्द हो गई, उनको अगली फ्लाइट से मंजिल तक पहुंचाया जाए। स्वास्थ्य जांच, सैनिटाइजेशन इत्यादि कुछ कारण हैं, जिनका महत्व बहुत बढ़ गया है। इसके अलावा, राज्य सरकारों को भी यह शक्ति मिली हुई है कि वे जब चाहें, अपने यहां विभिन्न कारणों से फ्लाइट को आने-जाने से रोक सकती हैं। जब तक कोरोना है, यह चिंता और चुनौती हमारे साथ रहने वाली है।
आने वाले दिनों में एयरलाइंस संचालकों को ज्यादा चौकसी और सेवा भाव से काम करना है। लोग बहुत जरूरी होने पर ही यात्रा पर निकल रहे हैं, वे पर्यटन या कहीं स्नेह मिलन के लिए नहीं जा रहे हैं। जो यात्राएं जीवन या व्यापार के लिए बहुत आवश्यक हैं, अभी उन्हीं की जरूरत है। तो लोगों की यह मजबूरी एयरलाइंस के भी ध्यान में रहनी चाहिए, तभी कोरोना के समय में उनकी सार्थकता सिद्ध होगी। टैक्सी सेवा हो या रेल या हवाई सेवा, हर तरह की परिवहन सेवाओं को लोगों और देश की नई उम्मीदों पर मुकम्मल उतरना है। इन सेवाओं के संचालक जितनी संवेदना के साथ सक्रिय होंगे, उतने ही कम विवाद होंगे और लोगों को भी सुविधा होगी। मिसाल के लिए, ईद के दिन भी सुप्रीम कोर्ट को एयरलाइंस के खिलाफ सुनवाई करनी पड़ी है, तो यह कोई प्रशंसनीय बात नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन को भी याद दिलाया है कि एयरलाइंस की आर्थिक सेहत से ज्यादा जरूरी है, लोगों की स्वास्थ्य सुरक्षा। एयरलाइंस अपने फायदे के लिए किसी सीट को खाली नहीं छोड़ रहे हैं। जब यह चर्चा कोरोना की शुरुआत से ही हो रही है कि हवाई जहाज में बीच की सीट खाली रहेगी, तब हवाई जहाज में बीच की सीट खाली करवाने के लिए भला सुप्रीम कोर्ट को क्यों आगे आना पड़ा है? क्या आने वाले दिनों में रेल और बसों में भी बीच की सीट या बर्थ को खाली रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पडे़गा?
यह बहुत संभलकर और नियोजित तरीके से आगे बढ़ने का समय है। जो महाराष्ट्र शरुआत में हवाई सेवा के लिए तैयार नहीं था, वह भला क्यों तैयार हो गया? महाराष्ट्र या मुंबई जैसे जो शहर कोरोना के हॉटस्पॉट बने हुए हैं, उन्हें भला बाकी देश से क्यों जोडे़ रखा जाए? बेशक, तमाम परिवहन सेवाएं शुरू हों, लेकिन ध्यान रहे, वे बीमारी या परेशानी का माध्यम कतई न बनें।
शौर्यपथ / किसी भी उद्योग के लिए दो घटक अहम होते हैं। एक, पूंजी और दूसरा, मजदूर। हालांकि, कोरोना-काल में मजदूरों की दयनीय दशा को देखते हुए पूंजी की महत्ता अधिक प्रभावी लग रही है, लेकिन श्रम शक्ति के बिना भी उद्योगों का चलना मुश्किल है। ऐसे में, प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के बाद उन्हें रोजगार देना एक बड़ी चुनौती है। राज्य सरकारें इस दिशा में काम कर रही हैं, लेकिन कुछ और भी करने की जरूरत है। अगर मजदूरों को संगठित करके अपने ही प्रदेशों में रखा जाए, तो बाहर के उद्योगपति अवश्य वहां उद्योग लगाने को मजबूर होंगे, जहां मजदूर मिलेंगे। इसलिए बिहार जैसे राज्यों के पास कई संभावनाएं हैं। मगर इसके लिए सरकार और मजदूरों के बीच एक विश्वास का रिश्ता होना चाहिए। अभी प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर बनने की बात कही है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
क्यों दें ऐसी परीक्षा
आज दरभंगा की ज्योति ने जो करनामा किया है, उस पर बिहार ही नहीं, पूरे भारत और विश्व को नाज है, क्योंकि वह अपने पिता को गुरुग्राम से दरभंगा तक साइकिल पर ले आई। अब सारे लोग ज्योति के स्वागत के लिए उमड़ रहे हैं। कोई उन्हें मिठाई दे रहा है, तो कोई पढ़ाने का भरोसा। रोजगार देने तक के वादे किए जा रहे हैं। मगर क्या किसी भी बच्ची या बच्चे को ऐसा सम्मान पाने के लिए इस तरह की कठोर परीक्षा देनी होगी? आज ज्योति के नाम की गूंज अमेरिका तक पहुंच चुकी है, इसलिए सभी उसे सिर-आंखों पर बिठाए हुए हैं। लेकिन समाज में ऐसी कई ज्योति हैं, जो मुश्किल हालात में हैं। उन पर लोगों की नजर नहीं है, क्योंकि वे खबरों में नहीं हैं। क्या इस तरह की पब्लिसिटी बंद नहीं हो जानी चाहिए? ऐसी नौबत ही न आने दें कि किसी बच्ची को ऐसी दुखद परीक्षा से गुजरना पड़े।
लौटती कांग्रेस
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी, जो वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर में बुझ-सी गई थी, आहिस्ते-आहिस्ते अपनी पकड़ बनाने लगी है। कोरोना या अन्य किसी भी घटना में कांग्रेस खुद को जनता से जोड़ रही है। एक समय था, जब वह लोगों से कट गई थी। सोशल मीडिया पर तो मानो थी ही नहीं। लेकिन अब उसने वहां भी भाजपा की तर्ज पर खुद को खड़ा किया है। मजदूरों की समस्या को सर्वप्रथम कांग्रेस ने ही उठाया और मदद की जिम्मेदारी ली। फिर तो मजदूरों पर बात चल निकली। आगामी चुनाव में कांगे्रस को यह सक्रियता फायदा पहुंचा सकती है।
शिक्षा का बदलता स्वरूप
लंबे समय से यह बात कही जा रही है कि स्कूल-कॉलेज में ऑनलाइन पढ़ाई संभव नहीं है, लेकिन मौजूदा परिस्थिति में लगता है कि हमारे लिए ऑनलाइन शिक्षा ही एकमात्र विकल्प है। इस वैश्विक महामारी में बच्चे कितने दिनों तक स्कूल नहीं जा पाएंगे, यह कहना मुश्किल है। ऐसे में, सरकार ने निर्देश जारी किए हैं कि स्कूली बच्चों के लिए नए सत्र की शुरुआत ऑनलाइन शिक्षा से की जाए। अब सवाल यह है कि ऑनलाइन शिक्षा किस हद तक सफल होगी? फिलहाल इसका ठीक-ठीक जवाब नहीं दिया जा सकता, परंतु गांव के बच्चों को इससे परेशानी हो सकती है। वहां संचार के साधन भी बमुश्किल उपलब्ध हैं। बिजली की उपलब्धता भी एक समस्या है। फिर जन-जागरूकता, संसाधनों की व्यवस्था और सुरक्षा के उपाय पर भी सोचना जरूरी है। हालांकि एक राहत भी है। अभी हम देख रहे थे कि छोटा बच्चा भी पांच-छह किलो का बस्ता ढोकर स्कूल जाता था। ऑनलाइन शिक्षा में बच्चों को इस समस्या से नहीं जूझना होगा।
ओपिनियन / शौर्यपथ / इस फैसले का इससे बुरा वक्त कोई और नहीं हो सकता था। पिछले हफ्ते केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों से कहा कि वे अपने यहां डिजिटल मीटर सुनिश्चित करें, ताकि किसानों को दी जाने वाली बिजली सब्सिडी खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ाया जा सके। इस फैसले का चारों दक्षिणी राज्यों में भारी विरोध शुरू हो गया है।
बीते रविवार को तमिलनाडु बिजली विभाग के अधिकारी कडलूर जिले में कुछ खेतों पर गए और वहां डिजिटल मीटर लगाने पर जोर दिया। इसका किसानों ने भारी विरोध किया। यह खबर जैसे ही टीवी पर प्रसारित हुई, मुख्यमंत्री ई के पलानीसामी हरकत में आ गए, और बिजली विभाग के प्रभारी मंत्री ने आनन-फानन में फैसला वापस लेने की घोषणा की। पड़ोसी तेलंगाना में चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली सरकार ने भी एक कैबिनेट प्रस्ताव पास करके बिजली सब्सिडी वापस लेने से इनकार कर दिया है। सरकारी प्रवक्ता का कहना है कि मुफ्त बिजली चुनावी वायदा है और इसे वापस नहीं लिया जा सकता। इसी तरह, आंध्र प्रदेश ने भी इस फैसले को लागू करने से मना कर दिया है।
केरल में मुख्यमंत्री पी विजयन ने विद्युत संशोधन विधेयक-2020 पर चिंता जताई है और कहा है कि इससे राज्य सरकार उपभोक्ताओं को दी जाने वाली विभिन्न तरह की सब्सिडी जारी नहीं रख पाएगी। मुख्यमंत्री ने केंद्र को याद दिलाया कि बिजली समवर्ती सूची का हिस्सा है और यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि राज्य के अधिकारों का हनन न हो। भाजपा शासित कर्नाटक ने तो अभी तक ऐसा कोई रुख नहीं दिखाया है, लेकिन एक संयुक्त बयान में कई बिजली संघ और किसान नेताओं ने इस कदम का कड़ा विरोध किया है। संघों ने चिंता जताई है कि जब पूरा देश एक खतरनाक महामारी से लड़ रहा है, तब केंद्र ढांचागत सुधार की ओर बढ़ रहा है, जबकि ऐसे सुधारों में गंभीर विचार-विमर्श की दरकार होती है।
केंद्र ने इससे पहले भी दो बार विद्युत अधिनियम में संशोधन के प्रयास किए थे। नए संशोधनों के साथ वह कोशिश कर रहा है कि राज्य भी अपने बिजली कानून बदलने में उसका साथ दें। मगर यह मुद्दा विवादास्पद हो गया है, क्योंकि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इन सुधारों को केंद्र की तरफ से राज्यों को कोरोना से लड़ने के लिए दी जाने वाली रियायतों से जोड़ दिया है। वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में राज्य अपने सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का पांच प्रतिशत कर्ज उठा सकेंगे, जो फिलहाल तीन फीसदी है। इससे राज्यों को 4.28 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त धन मिलेगा। लेकिन इसके लिए अन्य तमाम शर्तों में एक बिजली सुधार भी शामिल है।
किसान मीटर लगाए जाने के खिलाफ हैं, क्योंकि उन्हें अभी तक मुफ्त में बिजली मिलती रही है। उन्हें डर है कि मीटर लगाकर सरकार दरअसल, बिजली बिल वसूलना चाहती है। दूसरी तरफ, सरकार का तर्क है कि ऐसा करके वह बिजली चोरी से होने वाली बर्बादी रोकना चाहती है और सिस्टम को सुधारना चाहती है। मीटर लग जाने के बाद बिजली कंपनियां अपने उपभोक्ताओं की पहचान कर सकेंगी और यह सुनिश्चित कर सकेंगी कि वादे के मुताबिक उन्हें बिजली मिलती रहे। केंद्र प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण यानी डीबीटी का विस्तार किसानों तक करना चाहता है। इस योजना के तहत, किसानों से डिजिटल मीटर लगाने और बिजली बिल जमा करने को कहा जा रहा है। उपयुक्त साक्ष्य पेश करते ही बैंक खातों में डीबीटी के जरिए सब्सिडी जमा करने का वायदा है। मगर किसानों की कई आपत्तियां हैं। उनका पहला तर्क तो यही है कि पर्याप्त नकदी न रहने की वजह से वे बिजली बिल नहीं चुका सकते। फिर, वे इस पूरी प्रक्रिया को अव्यावहारिक भी बता रहे हैं, क्योंकि पूर्व में भी खेतों में मीटर लगाने के प्रयास किए गए थे, पर उनका विफल अंत हुआ था। एक तर्क यह भी है कि कृषि क्षेत्र पहले से ही संकट में है और राहत मांग रहा है। ऐसे में, मीटर लगाने का आदेश देकर सरकार उन पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। तमिलनाडु में मुफ्त बिजली का लाभ पाने वाले किसानों की संख्या 21 लाख है, जबकि तेलंगाना में 25 लाख और आंध्र प्रदेश में 23 लाख है।
किसानों और राज्य बिजली विभाग में काम करने वाले लोगों की एक अन्य चिंता भी है। उन्हें लगता है कि यह पिछले दरवाजे से निजीकरण की कोशिश है। उनका मानना है कि केंद्र सरकार निजी क्षेत्र को राज्यों में बिजली वितरण की अनुमति देने की जुगत में है। और, यदि निजी कंपनियों को सब्सिडी या मुफ्त बिजली देने को कहा जाएगा, तो वे कतई रुझान नहीं दिखाएंगी, क्योंकि उनका उद्देश्य मुनाफा कमाना रहता है।
राज्य सरकारों के लिए भी स्थिति सुखद नहीं है। वे किसानों को मुफ्त बिजली दे रही हैं और अन्य तमाम श्रेणियों के उपभोक्ताओं को सब्सिडी बांट रही हैं। इन सबके बाद ही सरकारी बिजली कंपनियों को भुगतान किया जाता है। यह भुगतान भी नियमित या मासिक आधार पर नहीं होता। उन्हें पैसे तभी दिए जाते हैं, जब राज्य सरकार उसे वहन करने में सक्षम होती है। दूसरी ओर, बिजली वितरण करने वाली सरकारी कंपनियां मनमाफिक बिजली नहीं खरीद पातीं, क्योंकि उन्हें बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियों का बिल चुकाना होता है। इस तरह, यह पूरा दुश्चक्र ही बिजली क्षेत्र को अस्थिर बना देता है। केंद्र का मानना है कि नए सुधारों से बिजली क्षेत्र अधिक कुशलता से काम कर सकता है।
निजी कंपनियों ने इस कदम का स्वागत किया है, क्योंकि उनको लगता है कि इस क्षेत्र को उनके लिए खोल दिए जाने से अधिक निवेश लाया जा सकता है। वे भुगतान तंत्र को मजबूत बनाए जाने और सरकारी व निजी क्षेत्र की संस्थाओं के बीच अधिकारियों के अधिकारों को स्पष्ट किए जाने की पक्षधर हैं। दिल्ली में बिजली की आपूर्ति निजी हाथों में है। इससे यहां वितरण में सुधार हुआ है, बिजली की चोरी कम हुई है और उपभोक्ताओं की जेब पर भी बोझ नहीं बढ़ा है। बेशक, मौजूदा मुश्किल समय में एक विवादास्पद मसले पर खुले दिमाग से चर्चा मुश्किल है। मगर केंद्र सरकार अभूतपूर्व आर्थिक मंदी का सामना कर रही है, और कोरोना संकट में उसके पास विकल्प बहुत सीमित हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार
सेहत / शौर्यपथ / बालों की खूबसूरती और मजबूती के लिए आप क्या कुछ नहीं करते। हेयर स्पा, तेल मालिश एवं अलग-अलग सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल भी। लेकिन कुछ आहार भी आपके बालों की खूबसूरती और मजबूती को लौटा सकते हैं बगैर किसी झंझट के। जानिए यह 5 आहार जिन्हें खाने से आपके बालों की सारी समस्याएं हल हो सकती हैं।
१. गाजर -लाल-मीठी गाजर स्वाद के साथ आपको सेहत और सौंदर्य भी देती है। यह विटामिन ए का एक अच्छा स्त्रोत है साथ ही इसमें मौजूद कैरोटीन आपके बालों और आंखों को सुरक्षित और खूबसूरत बनाए रखता है। यह आपके बालों को जड़ से मजबूती प्रदान करेगी।
2 .पालक - पालक का सेवन करना बहुत फायदेमंद है। सेहत के साथ ही यह आपके बालों को झड़ने से भी रोकेगी। आयरन से भरपूर होने के कारण इसक सेवन आपकी इस समस्या को बिल्कुल खत्म कर देगा।
3.शकरकंद - शकरकंद जिसे स्वीट पोटेटो भी कहते हैं, विटामिन ए से भरपूर होता है जो आपके बालों को मजबूती देकर झड़ने से रोकता है, साथ ही जड़ों में मौजूद तेल को भी सुरक्षित रखता है, जिससे आपके बालों को पोषण मिलता रहता है।
4.दही - दही खाने से भी बालों का झड़ना रुकता है और इससे बाल खूबसूरत व चमकदार बनते हैं। इसमें पाया जाने वाला विटामिन बी6 और विटामिन डी आपके बालों में जान लाकर उन्हें सजीव करता है।
५.किशमिश - बालों की लंबाई नहीं बढ़ने से परेशान न हों, क्योंकि किशमिश खाने से आपके बालों का विकास तेजी से होता है।इसमें आयरन के साथ-साथ मिनरल्स भी भरपूर मात्रा में होते हैं जो आपके बालों को पोषण देते हैं।
सेहत / शौर्यपथ / मैथीदाने का प्रयोग आप खाने के स्वाद को बढ़ाने में करते हैं, लेकिन इसके सेहत और सौंदर्य लाभ आपको हैरत में डाल देंगे। आइए जानते हैं इनके अनमोल गुण।
मैथीदाने का चूर्ण प्रतिदिन खाने से आपका वजन नियंत्रित रहता है और वसा की मात्रा धीरे-धीरे कम हो जाती है। इस तरह से आप अपना वजन भी कम कर सकते हैं।
मैथीदाने का नियमित सेवन दिल की बीमारियों को भी दूर रखने में भी मदद करता है। यह दिल का दौरा पड़ने की आशंका को बेहद कम कर देता है और आप अपने हृदय को रख सकते हैं बिलकुल स्वस्थ।
मधुमेह के मरीजों के लिए मैथीदाना बहुत फायदेमंद होता है। इसको रोज रात में भिगोकर रखने के बाद रोज सुबह चबाकर खाने से और इसके पानी के सेवन से लाभ मिलता है।
बालों की खूबसूरती के लिए भी मैथीदाना फायदेमंद है। इसका पेस्ट बनाकर बालों में लगाने से बालों से रूखापन गायब होता है, साथ ही बाल मजबूत बनते हैं।
चेहरे की खूबसूरती बढ़ाने में भी यह मैथीदाना कुछ कम गुणवान नहीं है। इसे पीसकर चेहरे पर लगाने से त्वचा में चमक के साथ कसाव आता है। इसके अलावा रूखी त्वचा वालों के लिए यह बहुत लाभप्रद है, क्योंकि यह त्वचा को नमी प्रदान करता है।
खाना खजाना / शौर्यपथ / रमजान/ईद-उल-फितर (ईदुल फित्र) का त्योहार नजदीक आते ही हर बाशिंदे के मन में सिवइयों के मीठे स्वाद का एक अलग ही अहसास भर जाता है। इसी के मद्देनजर रमजान माह के आखिरी अशरे के साथ ही ईदुल फितर की आहट से बाजार में सिवइयां व शीर-खुरमे से सजने लगे हैं।
यूं तो मीठी ईद और सिवइयां एक-दूसरे के पर्याय हैं, लेकिन इसके अलावा और भी कई व्यंजन इस त्योहार पर बनते हैं। ईद के बाजारों में सिवइयों के दिल लुभाते ढेरों के अलावा शीरमाल, बाकरखानी, अंगूरदाना वगैरह भी खूब बनते हैं। साथ ही घरों में मांसाहारी व्यंजन भी बनते हैं।
आइए जानते हैं मीठी ईद पर बनाए जाने वाले विशेष पकवान :-
* दूध फेनी :
ईद पर सिवइयां और फेनी अच्छे-अच्छों के मुंह में पानी ला देती है। सिवइयों और फेनी में बुनियादी फर्क यह है कि फेनी तार के गुच्छे की तरह होती है। इसे बनाने में ज्यादा मेहनत लगती है। इसे घी में तला
जाता है। यह रंगीन भी मिलती है।
कम तली हुई सफेद और ज्यादा तली हुई लाल या जाफरानी रंग की फेनी होती है। फेनी को दूध के साथ ही खाया जाता है। सिवइयां नमकीन भी मिलती हैं।
* शीरमाल :
यह मैदे, घी और शकर से बनी मीठी रोटी है। शीर का अर्थ है दूध। खास बात यह है कि यह बाजार में तैयार बना हुआ मिलता है। इसे गोश्त के साथ भी खाया जाता है।
स्वाद में यह कुछ-कुछ मीठे पाव-सा और लजीज लगता है। वैसे शीरमाल फारसी का शब्द है और इसका
अर्थ होता है दूध से गूंथे आटे की रोटी। शादियों में भी यह खूब चलता है।
* बाकरखानी :
ईदुल फितर पर बाकरखानी का अपना अलग मजा है। यह मैदे, सूखे मेवे और मावे की बनती है। इसे तंदूर या ओवन में सेंका जाता है। उस पर सूखे मेवे सजाए जाते हैं।
यह लखनऊ और हैदराबाद में भी काफी लोकप्रिय है। बाकरखानी खाने में ज्यादा मिठासभरी होती है। इसे
दूध के साथ भी खाया जाता है। यह पचने में भी हल्की होती है।
* अंगूरदाना :
रोजा-इफ्तारी में इसका खूब चलन है। अंगूरदाना दरअसल उड़द की दाल से बनने वाली मोटी बूंदी है। यह मीठी होती है। इसके अलावा इफ्तार में नुक्ती भी खूब खाई जाती है। यह बेसन से बनती है। इन दिनों
सेव की तरह के खारे भी काफी पसंद किए जाते हैं।
* मीठी सिवइयां : शीर-खुरमा
सिवइयां मशीन से भी बनती हैं और हाथ से भी। यह मैदे की होती हैं। जब इसे दूध और मेवे के साथ बनाया जाता है तो यह शीर-खुरमा कहलाता है।
शीर यानी दूध, खुरमा या कोरमा यानी कि सूखे मेवे का मिक्चर। इसमें खोपरा, किशमिश, छुहारा, काजू आदि शामिल रहते हैं। इसे मीठे दूध में भीगी सिवइयों पर सजाया जाता है।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ /सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश के साथ ही नौतपा 25 मई से 2 जून तक तपेगा। इस वर्ष वक्री ग्रहों की स्थिति से बने संयोग रोहिणी में प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति बनाएंगे। इस बीच भीषण गर्मी के अलावा बारिश के भी संयोग बताए जा रहे हैं अर्थात रोहिणी गलेगी।
इसबार ग्रहों की विकट स्थिति के कारण प्राकृतिक आपदाओं का दौर बना हुआ है। जिससे महामारी भीषण गर्मी, आंधी, तूफान के साथ हवा, आगजनी, हवाई दुर्घटनाएं, राजनैतिक उथल-पुथल की स्थितियां बनी हैं।
नौतपा : वैज्ञानिक तथ्य
वैज्ञानिक मतानुसार नौतपा के दौरान सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर आती हैं, जिस कारण तापमान बढ़ता है। अधिक गर्मी के कारण मैदानी क्षेत्रों में निम्न दबाव का क्षेत्र बनता है, जो समुद्र की लहरों को आकर्षित करता है। इस कारण ठंडी हवाएं मैदानों की ओर बढ़ती हैं। चूंकि समुद्र उच्च दबाव वाला क्षेत्र होता है, इसलिए हवाओं का यह रुख अच्छी बारिश का संकेत देता है।
नौतपा : ज्योतिष शास्त्र
ज्योतिष शास्त्र अनुसार रोहिणी नक्षत्र का अधिपति ग्रह चन्द्रमा और देवता ब्रह्मा है। सूर्य ताप तेज का प्रतीक है, जबकि चन्द्र शीतलता का। चन्द्र से धरती को शीतलता प्राप्त होती है। सूर्य जब चन्द्र के नक्षत्र रोहिणी में प्रवेश करता है, तो इससे उस नक्षत्र को अपने पूर्ण प्रभाव से ले लेता है। जिस वजह से पृथ्वी को शीतलता प्राप्त नहीं होती। ताप अधिक बढ़ जाता है। वैसे तो सूर्य 15 दिनों तक रोहिणी नक्षत्र में भ्रमण करता है, लेकिन शास्त्रीय मान्यता अनुसार प्रारंभ के नौ दिन ही नौतपा के तहत स्वीकार किए जाते हैं।
साल में एक बार रोहिणी नक्षत्र की दृष्टि सूर्य पर पड़ती है। यह नक्षत्र 15 दिन रहता है लेकिन शुरू के पहले चन्द्रमा जिन 9 नक्षत्रों पर रहता है वह
दिन नौतपा कहलाते हैं। इसका कारण इन दिनों में गर्मी अधिक रहती है।
मई माह के अंतिम सप्ताह में सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी कम हो जाती है। इससे धूप और तीखी हो जाती है। नक्षत्रों के काल गणना को आधार मानने वाले प्राचीन ज्योतिष मत में परस्पर सांमजस्य बिठाने का प्रयास कर रहे हैं।
नवतपा के संबंध में कहा जाता है कि,
ज्येष्ठ मासे सीत पक्षे आर्द्रादि दशतारका।
सजला निर्जला ज्ञेया निर्जला सजलास्तथा।।
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में आद्रा नक्षत्र से लेकर दस नक्षत्रों तक यदि बारिश हो तो वर्षा ऋतु में इन दसों नक्षत्रों में वर्षा नहीं होती, यदि इन्हीं नक्षत्रों में तीव्र गर्मी पड़े तो वर्षा अच्छी होती है।
भारतीय ज्योतिष में नवतपा को परिभाषित कर लिया गया है, चंद्रमा जब ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में आर्द्रा से स्वाति नक्षत्र तक अपनी स्थितियों में हो एवं तीव्र गर्मी पड़े, तो वह नवतपा है।
भारत में ऐसे बहुत लोगों का मानना है कि सूर्य वृष राशि में ही पृथ्वी पर आग बरसाता है और खगोल शास्त्र के अनुसार वृषभ तारामण्डल में यह नक्षत्र हैं कृतिका, रोहिणी और मृगशिरा कृतिका सूर्य, रोहिणी चंद्र, मृगशिरा मंगल अधिकार वाले नक्षत्र हैं इन तीनों नक्षत्रों में स्थित सूर्य गरमी ज्यादा देता है ।
अब प्रश्न यह कि इन तीनों नक्षत्रों में सर्वाधिक गरम नक्षत्र अवधि कौन होगा इसके पीछे खगोलीय आधार है इस अवधि में सौर क्रांतिवृत्त में शीत प्रकृति रोहिणी नक्षत्र सबसे नजदीक का नक्षत्र होता है।
जिसके कारण सूर्य गति पथ में इस नक्षत्र पर आने से सौर आंधियों में वृद्धि होना स्वाभाविक है इसी कारण परिस्थितिजन्य सिद्धांत कहता है कि जब सूर्य वृष राशि में रोहिणी नक्षत्र में आता है उसके बाद के नव चंद्र नक्षत्रों का दिन नवतपा है।
ज्योतिष के सिद्धांत के अनुसार नौतपा में अधिक गर्मी पड़ना अच्छी बारिश होने का संकेत माना जाता है। अगर नौतपा में गर्मी ठीक न पड़े, तो अच्छी बारिश के आसार कम हो जाते हैं।
इस बार वक्री ग्रह होने की वजह से कहीं-कहीं बादल फटने के समाचार भी मिलेंगे। कहीं वर्षा से जन-धन की हानि के योग भी बनते हैं।
सूर्य की गर्मी और रोहिणी के जल तत्व के कारण मानसून गर्भ में आ जाता है और नौतपा ही मानसून का गर्भकाल माना जाता है। जिस समय में सूर्य रोहिणी नक्षत्र में होता है उस समय चन्द्र नौ नक्षत्रों में भ्रमण करते हैं, यही कारण है कि इसे नौतपा कहा जाता है।
जब सूर्य वृषभ राशि में रोहिणी नक्षत्र में भ्रमण करते हैं, तब गर्मी तेज होती है चन्द्र की पत्नी माने जाने वाले रोहिणी नक्षत्र में गरम आंधियां ज्यादा प्रभाव दिखाती हैं।
इस वर्ष नौतपा या नवतपा अर्थात रोहिणी नक्षत्र का प्रभाव 25 मई को शुरू हो जाएगा।
धर्म संसार / शौर्यपथ / मुसलमानों का सबसे बड़ा त्योहार कहा जाने वाला ईद-उल-फितर पर्व न सिर्फ हमारे समाज को जोड़ने का मजबूत सूत्र है, बल्कि यह इस्लाम के प्रेम और सौहार्दभरे संदेश को भी पुरअसर ढंग से फैलाता है। मीठी ईद भी कहा जाने वाला यह पर्व खासतौर पर भारतीय समाज के ताने-बाने और उसकी भाईचारे की सदियों पुरानी परंपरा का वाहक है। इस दिन विभिन्न धर्मों के लोग गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं और सेवइयां अमूमन उनकी तल्खी की कड़वाहट को मिठास में बदल देती है।
ईद-उल-फितर भूख-प्यास सहन करके एक महीने तक सिर्फ खुदा को याद करने वाले रोजेदारों को अल्लाह का इनाम है। सेवइयां में लिपटी मोहब्बत की मिठास इस त्योहार की खूबी है। ईद-उल-फितर एक रूहानी महीने में कड़ी आजमाइश के बाद रोजेदार को अल्लाह की तरफ से मिलने वाला रूहानी इनाम है। ईद समाजी तालमेल और मोहब्बत का मजबूत धागा है, यह त्योहार इस्लाम धर्म की परंपराओं का आईना है। एक रोजेदार के लिए इसकी अहमियत का अंदाजा अल्लाह के प्रति उसकी कृतज्ञता से लगाया जा सकता है।
दुनिया में चांद देखकर रोजा रहने और चांद देखकर ईद मनाने की पुरानी परंपरा है और आज के हाईटेक युग में तमाम बहस-मुबाहिसे के बावजूद यह रिवाज कायम है। व्यापक रूप से देखा जाए तो रमजान और उसके बाद ईद व्यक्ति को एक इंसान के रूप में सामाजिक जिम्मेदारियों को अनिवार्य रूप से निभाने का दायित्व भी सौंपती है।
रमजान में हर सक्षम मुसलमान को अपनी कुल संपत्ति के ढाई प्रतिशत हिस्से के बराबर की रकम निकालकर उसे गरीबों में बांटना होता है। इससे समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी का निर्वहन तो होता ही है, साथ ही गरीब रोजेदार भी अल्लाह के इनामरूपी त्योहार को मना पाते हैं। व्यापक रूप से देखें तो ईद की वजह से समाज के लगभग हर वर्ग को किसी न किसी तरह से फायदा होता है। चाहे वह वित्तीय लाभ हो या फिर सामाजिक फायदा हो।
भारत में ईद का त्योहार यहां की गंगा-जमुनी तहजीब के साथ मिलकर उसे और जवां और खुशनुमा बनाता है। हर धर्म और वर्ग के लोग इस दिन को तहेदिल से मनाते हैं। ईद के दिन सिवइयों या शीर-खुरमे से मुंह मीठा करने के बाद छोटे-बड़े, अपने-पराए, दोस्त-दुश्मन गले मिलते हैं तो चारों तरफ मोहब्बत ही मोहब्बत नजर आती है। एक पवित्र खुशी से दमकते सभी चेहरे इंसानियत का पैगाम माहौल में फैला देते हैं। अल्लाह से दुआएं मांगते व रमजान के रोजे और इबादत की हिम्मत के लिए खुदा का शुक्र अदा करते हाथ हर तरफ दिखाई पड़ते हैं और यह उत्साह बयान करता है कि लो ईद आ गई।
कुरआन के अनुसार पैगंबरे इस्लाम ने कहा है कि जब अहले ईमान रमजान के पवित्र महीने के एहतेरामों से फारिग हो जाते हैं और रोजों-नमाजों तथा उसके तमाम कामों को पूरा कर लेते हैं तो अल्लाह एक दिन अपने उक्त इबादत करने वाले बंदों को बख्शीश व इनाम से नवाजता है। इसलिए इस दिन को 'ईद' कहते हैं और इसी बख्शीश व इनाम के दिन को ईद-उल-फितर का नाम देते हैं।
रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है। इस पूरे माह में रोजे रखे जाते हैं। इस महीने के खत्म होते ही 10वां माह शव्वाल शुरू होता है। इस माह की पहली चांद रात ईद की चांद रात होती है। इस रात का इंतजार वर्षभर खास वजह से होता है, क्योंकि इस रात को दिखने वाले चांद से ही इस्लाम के बड़े त्योहार ईद-उल-फितर का ऐलान होता है। इस तरह से यह चांद ईद का पैगाम लेकर आता है। इस चांद रात को 'अल्फा' कहा जाता है।
जमाना चाहे जितना बदल जाए, लेकिन ईद जैसा त्योहार हम सभी को अपनी जड़ों की तरफ वापस खींच लाता है और यह अहसास कराता है कि पूरी मानव जाति एक है और इंसानियत ही उसका मजहब है।
धर्म संसार / शौर्यपथ /मंगलवार की प्रकृति उग्र है। मंगलवार का दिन हनुमानजी और मंगलदेव का है। लाल किताब के अनुसार मंगल नेक के देवता हनुमानजी और बद के देवता वेताल, भूत या जिन्न है। हर कार्य में मंगलकारी परिणाम प्राप्त करने के लिए मंगलवार का उपवास रखना चाहिए।
ये कार्य करें :
1. इस दिन लाल चंदन या चमेली के तेल में मिश्रित सिन्दूर लगाएं।
2. मंगलवार ब्रह्मचर्य का दिन है। यह दिन शक्ति एकत्रित करने का दिन है।
3. दक्षिण, पूर्व, आग्नेय दिशा में यात्रा कर सकते हैं।
4. शस्त्र अभ्यास, शौर्य के कार्य, विवाह कार्य या मुकदमे का आरंभ करने के लिए यह उचित दिन है।
5. बिजली, अग्नि या धातुओं से संबंधित वस्तुओं का क्रय-विक्रय कर सकते हैं।
6. मंगलवार को ऋण चुकता करने का अच्छा दिन माना गया है। इस दिन ऋण चुकता करने से फिर कभी ऋण लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
लाल किताब के अनुसार निम्नलिखित उपाय पूछकर कर सकते हैं-
7. मंगल को नीम के पेड़ में शाम को जल चढ़ाएं और चमेली के तेल का दीपक जलाएं। ऐसा कम से कम 11 मंगलवार करें। हो सके तो इस दिन कहीं पर नीम का पेड़ लगाएं।
8. मंगलवार का व्रत रखकर हनुमानजी की उपासना करें। फिर किसी भी हनुमान मंदिर में मंगरवार को नारियल, सिंदूर, चमेली का तेल, केवड़े का इत्र, गुलाब की माला, पान का बीड़ा और गुड़ चना चढ़ाएं। गुड़ खाएं और खिलाएं।
9. मंगल खराब की स्थिति में सफेद रंग का सुरमा आंखों में डालना चाहिए। सफेद ना मिले तो काला सुरमा डालें।
10. बहते पानी में तिल और गुड़ से बनी रेवाड़ियां प्रवाहित करें या खांड, मसूर व सौंफ का दान करें।
11. मीठी तंदूरी रोटी कुत्ते को खिलाएं या लाल गाय को रोटी खिलाएं।
12. बुआ अथवा बहन को लाल कपड़ा दान में दें।
13. रोटी पकाने से पहले गर्म तवे पर पानी की छींटे दें।
14. मंगलवार के दिन लाल वस्त्र, लाल फल, लाल फूल, लाल चंदन और लाल रंग की मिठाई चढ़ाने से मनचाही कामना पूरी होती है।
15. मंगलवार के दिन मंदिर में ध्वजा चढ़ाकर आर्थिक समृद्धि की प्रार्थना करनी चाहिए। पांच मंगलवार तक ऐसा करने से आर्थिक परेशानी हट जाती है।
16. मंगलवार को बढ़ के पत्ते पर आटे के पांच दीपक बनाकर रखें और उन्हें हनुमानजी के मंदिर में प्रज्वलित करके रख आएं।
ये कार्य न करें :
1. मंगलवार सेक्स के लिए खराब है। इस दिन सेक्स करने से बचना चाहिए।
2. मंगलवार को नमक और घी नहीं खाना चाहिए। इससे स्वास्थ्य पर असर पड़ता है और हर कार्य में बाधा आती है।
3. पश्चिम, वायव्य और उत्तर दिशा में इस दिन यात्रा वर्जित।
4. मंगलवार को मांस खाना सबसे खराब होता है, इससे अच्छे-भले जीवन में तूफान आ सकता है।
6. मंगलवार को किसी को ऋण नहीं देना चाहिए वर्ना दिया गया ऋण आसानी से मिलने वाला नहीं है।
7. इस दिन भाइयों से झगड़ा नहीं करना चाहिए। हालांकि किसी भी दिन नहीं करना चाहिए।
शौर्यपथ /मेरी कहानी /पढ़ाई उस लड़के के लिए एक ऐसा मुश्किल पहाड़ थी, जिस पर चढ़ना नामुमकिन था। पढ़ाई में आलम ऐसा था कि हर राह-मंजिल पर डांट-फटकार बरसती रहती थी। गणित देखकर दिमाग पैदल हो जाता, विज्ञान सिर के ऊपर से निकल जाता, भाषा ऐसे लंगड़ाती कि पूरे ‘रिजल्ट’ को बिठा देती। कई बार ऐसी पिटाई की नौबत आन पड़ती कि अपना भूगोल ही खतरे में पड़ जाता। हाथ भले पढ़ाई में तंग था, लेकिन दिमाग में बदमाशियां इफरात थीं। हरकतें ऐसी थीं कि एक दिन प्रिंसिपल साहब ने यहां तक कह दिया, ‘यह लड़का या तो जेल पहुंचकर मानेगा या फिर करोड़पति बन जाएगा।’ शिक्षकों ने बहुत पढ़ाया-समझाया, प्रिंसिपल ने भी लाख कोशिशें कीं, लेकिन पढ़ाई उस लड़के के पल्ले नहीं पड़ी, और अंतत: वह दिन आ गया, जब वह लड़का स्कूल से बाहर कर दिया गया। उम्र महज 15 साल थी, मैट्रिक का मुकाम भी दूर रह गया। पढ़ाई छूट गई, अब क्या होगा? मां बैले डांसर थीं और कभी एयर होस्टेस रही थीं। पिता काम लायक भी कामयाब नहीं थे। ऐसे में घर का बड़ा लड़का ही पटरी से उतर गया। जो लोग पढ़ाई के लिए कहते थे, वही पूछने लगे कि अब यह लड़का क्या करेगा?
एक दिन वह लड़का उसी छूटे स्कूल के बाहर बैठकर सोच रहा था। बाकी लड़के स्कूल जा रहे थे। उनमें से कुछ शायद मुस्करा भी रहे थे। दुनिया में ऐसे लोग बहुत हैं, जो सिर्फ किसी की नाकामी का इंतजार करते हैं, घात लगाए बैठे रहते हैं कि कब किसी को नाकामी का घाव लगे और उस पर नमक छिड़का जाए। ऐसी निर्मम दुनिया में स्कूल ने उसे ऐसे ठुकरा दिया था कि किसी दूसरे स्कूल में दाखिले की सोचना भी फिजूल था। उसके साथ ऐसा क्यों हुआ? वह क्यों न पढ़ सका? कहां कमी रह गई? क्या जिंदगी में आज तक हर काम बुरा ही किया है? वहां बैठे-बैठे पहले तो वह लड़का अपनी तमाम बुरी यादों से गुजरा। बीते लम्हों के हादसों के तमाम मंजर जब खर्च हो गए, तब सोच की सही लय लौटी। दिलो-दिमाग में सवाल पैदा हुआ, क्या आज तक की जिंदगी में कभी उसे तारीफ मिली है? वह कौन-सा काम था, जिसके लिए उसे तारीफ मिली थी? आखिर ऐसा कोई तो काम होगा? फिर उसे याद आया कि उसने एक बार स्कूल की पत्रिका के प्रकाशन में शानदार योगदान दिया था, जिसके लिए उसे सबसे तारीफ हासिल हुई थी। जिसके हाथ में भी वह पत्रिका गई थी, लगभग सभी ने उसेबधाई दी थी।
पत्रिका का प्रकाशन अकेला ऐसा काम था, जिससे उस लड़के को कुछ समय के लिए ही सही, स्कूल में शोहरत नसीब हुई थी। लड़के ने अपना हुनर खोज लिया था, उसे अपनी काबिलियत दिख गई थी। उसे लग गया था कि यही वह काम है, जो वह सबसे बेहतर कर सकता है। वह उठा, पूरे जोश के साथ स्कूल के अंदर गया और अभिवादन के बाद प्रिंसिपल से बोला, ‘सर, आप कहते हैं, मैं कुछ नहीं कर सकता, लेकिन एक काम है, जो मैं बेहतर कर सकता हूं, जिसके लिए मुझे आपसे तारीफ भी मिल चुकी है। मैं छात्रों के लिए एक अच्छी पत्रिका निकालूंगा। आपसे मदद की उम्मीद रहेगी।’ प्रिंसिपल भी उसका जोश देख खुश हो गए। उन्होंने लड़के को मदद के आश्वासन और शुभकामनाओं के साथ विदा किया। फिर क्या था, वह लड़का दिन-रात पत्रिका की तैयारी में जुट गया। पैसा, संसाधन, सामग्री, सहयोग इत्यादि वह जुटाता गया। छात्रों को ही नहीं, उनके अभिभावकों को भी अपने शीशे में उतारने में वह लड़का इतना माहिर था कि सभी ने मिलकर उसकी मदद की और सवा साल की बेजोड़ मेहनत के बाद उसकी पत्रिका स्टूडेंट का पहला अंक 1 जनवरी, 1968 को बाजार में आ गया। वह पत्रिका छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच हाथों-हाथ ऐसी बिकी कि सबने उस 17 साल के लड़के रिचर्ड ब्रेंसन को सिर-आंखों पर बिठा लिया।
ब्रेंसन बहुत कम उम्र में दूसरों के लिए नजीर बन गए। वह समझ गए थे, जिंदगी में वही काम करना चाहिए, जो हम सबसे बेहतर कर सकते हैं या जिसमें हम सबसे ज्यादा हुनरमंद हैं या जिसके लिए लोग हमारी तारीफों के पुल बांधते हों। ब्रेंसन के एक हुनर ने उनके लिए आगे बढ़ने की ऐसी राह बना दी कि उन्होंने कभी पलटकर नहीं देखा। आज वह वर्जिन ग्रुप की 400 से ज्यादा सफल कंपनियों के मालिक हैं और दुनिया के मशहूर अमीरों में उनकी गिनती होती है। नाकामियों से निकलने के लिए अपने गिरेबां में कैसे झांकना पड़ता है, रिचर्ड ब्रेंसन इसकी बेहतरीन मिसाल हैं। गौर कीजिएगा, जिस लड़के को कभी स्कूल से निकाल दिया गया था, उस लड़के की कामयाबी आज दुनिया के तमाम सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन संस्थानों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय रिचर्ड ब्रेंसन (मशहूर उद्यमी),नई दिल्ली।
जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / बेनाला (विक्टोरिया) की एंजला बार्कर के हिस्से में खुशियां बेशुमार थीं। वह अच्छी एथलीट थीं। ऊंची कूद में उनका नाम था। नेटबॉल में वह सेंटर पोजीशन पर खेला करती थीं। स्क्वायड बास्केटबॉल में माहिर थीं। दोस्तों के साथ गाना उनका शगल था। साइकोलॉजी में करियर बनाने की मंशा थी। हर फैसले में साथ देने वाला परिवार था। और एक सजीला ब्वॉयफ्रेंड हाथ थामने को तैयार था। मानो ईश्वर ने उनके लिए बाहों भर कायनात तय कर रखा था। मगर जो तय नहीं था, वह थी उनकी नियति।
यह घटना 2002 की है। तब एंजला सोलह साल की थीं। ब्वॉयफ्रेंड डेल कैरी लेपोइडविन के आक्रामक व्यवहार को वह समझने लगी थीं। उसका वक्त-बेवक्त हाथ उठाना उन्हें अखरने लगा था। लिहाजा इस रिश्ते को सींचना उनके लिए मुश्किल हो गया। उन्होंने लेपोइडविन को छोड़ने का मन बना लिया। 7 मार्च वह दिन था, जब देर शाम एक सुपरमार्केट की कार-पार्किंग में उन्होंने लेपोइडविन को मना किया। नाराज लेपोइडविन हैवानों की तरह उन पर टूट पड़ा। उसने लात-घूंसों की बौछार कर दी। एंजला का पूरा शरीर ऐंठ गया। उनके कान और मुंह से खून निकलने लगा। वह उन्हें तब तक पीटता रहा, जब तक कि वह बेहोश न हो गईं।
डॉक्टरों के लिए एंजला ‘वेजेटेटिव-स्टेट’ में पहुंच चुकी थीं, यानी करीब-करीब कोमा की स्थिति। दिमाग के अंदरुनी हिस्सों में गंभीर चोट थी। चेहरा पूरा सूज गया था। मां हेलेन बार्कर बताती हैं, ‘एंजला एक निर्जीव देह की तरह हमारे सामने पड़ी थी। हम यह मान चुके थे कि अब वह ज्यादा दिनों तक हमारे बीच नहीं रहेगी। मगर कहीं न कहीं यह आस भी थी कि ईश्वर इतना बेरहम नहीं हो सकता।’ और, जब तीन हफ्तों के बाद एंजला की आंखें खुलीं, तो वह अपनी आवाज खो चुकी थीं और चलना भी उनके लिए सपना हो चला था।
वह करीब आठ हफ्तों तक अस्पताल में रहीं। फिर उन्हें बेनाला के ओल्ड एज नर्सिंग होम में भेज दिया गया। सभी यही कह रहे थे कि उनका बाकी जीवन अब बिस्तर पर ही बीतने वाला है। लेकिन मजबूत इरादों वाली एंजला को यह मंजूर नहीं था। सभी को गलत साबित करने में उन्हें तकरीबन तीन साल लगे। वह बताती हैं, ‘मुझे पता था कि हर चीज मेरे खिलाफ है। मगर मुझे बिस्तर से उतरना था। अपने पांवों पर खड़ा होना था। बोलना था। अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करनी थी। पुराने दिनों को फिर से जीना था।’
इन तीन वर्षों का सफर काफी कष्टदायक रहा। इस दौरान उन्होंने न जाने किस हद तक दर्द झेले। यह उनकी जिद ही थी कि बिस्तर का साथ जल्द छूट गया। अब व्हील चेयर उनका साथी है। पिता इयान बार्कर बताते हैं, ‘जब वह घर लौटी, तो उसकी आंखें भींगी हुई जरूर थीं, पर उनमें उसका आत्मविश्वास साफ झलक रहा था। हां, अपनी आवाज को फिर से पाने में उसे पांच साल लग गए।’
एंजला आज भी टूटे-फूटे शब्दों में ही बोल पाती हैं, लेकिन हिंसा के खिलाफ उनके ये शब्द काफी धारदार होते हैं। साल 2004 में ऑस्ट्रेलिया की संघीय सरकार ने उनके जज्बे को आदर्श बताकर लव्स मी, लव्स मी नॉट नाम से एक डीवीडी जारी की, जो घरेलू हिंसा के खिलाफ सरकारी अभियान का हिस्सा है। आज भी एंजला तमाम दर्द के बावजूद हिंसा के खिलाफ लोगों को जागरूक करने में पीछे नहीं रहतीं। अब तक हजारों छात्रों, पुरुषों, महिलाओं, स्वास्थकर्मियों, पुलिसकर्मियों, राजनेताओं, कैदियों से वह संवाद कर चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र तक में अपनी बात रख चुकी हैं। वह कहती हैं, ‘हिंसा खत्म करने में शिक्षा की भूमिका काफी अहम है। बच्चों को जन्म से ही एक-दूसरे का सम्मान करना और एक-दूसरे को समान समझना सिखाया जाना चाहिए। नौजवान भी रिश्तों में दुव्र्यवहार के बीज पहचानना सीखें, क्योंकि प्यार की पहली अवस्था में उन्हें भी मेरी तरह सब कुछ खुशनुमा लग सकता है। शारीरिक और भावनात्मक दुव्र्यवहार करने वाला कभी भी प्रेमी नहीं हो सकता।’
एंजला को हादसे से पहले के 12 महीने याद नहीं हैं। मगर यह पता है कि उनका ब्वॉयफ्रेंड अब दूसरे के साथ ऐसा नहीं कर सकता। वह साढ़े दस साल के लिए हवालात के अंदर है। हालांकि मां हेलन इस सजा को नाकाफी मानती हैं। वह आज भी कहती हैं कि उनकी बेटी को ताउम्र दर्द देने वाला इंसान जिंदगी भर जेल में बंद रहना चाहिए। उसने एंजला का सब कुछ छीन लिया। मगर एंजला के मन में ऐसा कोई मलाल नहीं है। वह अपनी खुशमिजाजी छोड़ना नहीं चाहतीं।
साल 2010 में एंजला बेनाला छोड़कर मेलबर्न आ गईं। जल्द ही उन्हें नेशनल ऑस्ट्रेलिया बैंक में पार्ट-टाइम नौकरी भी मिल गई। उन्हें 2011 में विक्टोरियन यंग ऑस्ट्रेलियन ऑफ द ईयर अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है। मेलबर्न की 100 प्रभावशाली शख्सियतों में भी वह शुमार हैं। आज भी जब उनकी यादों को कुरेदा जाता है, तो वह कहना नहीं भूलतीं- खुद पर विश्वास रखो, कुछ भी पाना असंभव नहीं।
प्रस्तुति : हेमेन्द्र मिश्र
एंजला बार्कर ऑस्ट्रेलियाई सामाजिक कार्यकर्ता
नजरिया / शौर्यपथ / कठिन दौर की कैसी होती है राजनीति? कुछ राजनीतिक विचारकों का मानना है कि कठिन दौर की राजनीति जीवन की कठोर सच्चाइयों से निर्मित होती है, न कि दूरस्थ आशावाद से। भविष्य के सपने और मिथकीय सच्चाई, दोनों ही थोड़ी देर के लिए स्थगित हो जाते हैं। आज हमारे जीवन के केंद्र में वायरस है। अत: आज की राजनीति भी वायरस के विमर्श पर केंद्रित है।
आज की राजनीति विषाणु व जैविक देह की रक्षा के इर्द-गिर्द घूम रही है। आज नेताओं की क्षमता व प्रभाव की रेटिंग उनके इस विषाणु को रोकने-थामने में सफलता-विफलता के आधार पर हो रही है। यह न सिर्फ भारत, बल्कि आज पूरी दुनिया के राजनीतिक-विमर्श के केंद्र में है। चीन, ब्राजील, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, अमेरिका, इटली या भारत, सभी देशों के शासनाध्यक्षों का मूल्यांकन देश या देश के बाहर इन्हीं आधारों पर हो रहा है। दुनिया की राजनीति, जिसके केंद्र में जहां पहले मानवाधिकार, समानता, उपेक्षित समूहों के प्रश्न महत्वपूर्ण होते थे, वहां अब इस वायरस के विरुद्ध लड़ाई, इसके लिए संसाधन व उनका वितरण राजनीति के केंद्र में है। जो देश इस लड़ाई में अच्छा प्रदर्शन करेगा, उसकी राजनीति और राजनेताओं को पूरी दुनिया में सम्मान मिलेगा। पूरी दुनिया में चिकित्सा की राजनीति व राजनीति की चिकित्सा का दौर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के इर्द-गिर्द खड़ा हो रहा विवाद भी यही साबित करता है कि अब महामारी व संक्रमण के विमर्श को राजनीति में प्रतीकात्मक शक्ति प्राप्त हो जाएगी। जो भी इस नैरेटिव को अपने पक्ष में रच लेगा, वह राजनीति में प्रभावी हो जाएगा।
भारत में कोरोना के समय और उत्तर कोरोना काल में भी विकास व कल्याणकारी योजनाओं की राजनीति कुछ पीछे चली जाएगी। पहले नेताओं की छवि उनके द्वारा शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं और राज्य के संसाधनों के विकासपरक वितरण से बनती-बिगड़ती थी। बिजली, सड़क, पानी विकास के मानक थे, जिनसे नेताओं की सफलता-विफलता का मूल्यांकन होता था। राजनीति की इस नई प्रवृत्ति को दुनिया के कुछ सिद्धांतकारों ने बॉयो-पॉलिटिक्स के उभार का दौर माना है। कोरोना महामारी ने जनतांत्रिक राजनीति के चरित्र में आमूल-चूल परिवर्तन ला दिया है, भले ही ये परिवर्तन अस्थाई हों।
महामारियां आज भी और पहले भी सामाजिक अंतर्विरोध को बढ़ाती रही हैं और अमीरी-गरीबी के बीच की खाई को और गहरी कर देती हैं। यह पूरी दुनिया में हो रहा है। ऐसे में, भारतीय राजनीति में भी फिर से गरीब, मजदूर जैसे सामाजिक रूप केंद्र में आ सकते हैं। इस नए दौर में भारतीय राजनीति की भाषा में एक बड़ा बदलाव आएगा। जन-स्वास्थ्य, असुरक्षा बोध, चिकित्सकीय सुविधा जैसे शब्द हमारी राजनीति की भाषा में महत्वपूर्ण हो जाएंगे। जाति की जगह ‘जैविक देह’ की चिंता हमारी राजनीति को शक्ल देगी। संभव है, जातिगत आधार पर राज्य से सुविधाओं की मांग थोड़ी देर के लिए गरीब, मजदूर व श्रमिक वर्ग के प्रश्नों के साथ जुड़ जाए।
भारतीय राजनीति में जनता व नेता के बीच संवाद अब वर्चुअल तो हो ही जाएगा। साक्षात संवाद के अवसर कम होते जाएंगे। कुछ समय तक तो सोशल साइट्स, ऑनलाइन संवाद, न्यूज चैनल व अखबार ही संवाद के माध्यम रहेंगे। जो भी इनकी परिधि में नहीं होगा, वह राजनीतिक संवादों की सीमा के बाहर हो जाएगा।
जन-स्वास्थ्य में उपेक्षितों-वंचितों की जगह क्या हो, उनके साथ कैसा व्यवहार हो रहा है, ये धीरे-धीरे राजनीतिक मूल्यांकन के संकेतक बनते जाएंगे। ये संकेतक कोरोना बाद भी महत्वपूर्ण रहेंगे। इस महामारी से लड़ने के लिए केंद्र द्वारा राज्यों को दी जा रही मदद भी राजनीति का हिस्सा बनेगी। राज्य-सत्ता पहले से ज्यादा प्रभावी व मुखर हो सकती है। ऐसे में, सत्ता पक्ष और विपक्ष में संवाद-विवाद मानवीय अस्तित्व के बड़े सवालों की ओर बढ़ सकते हैं। कोरोना संकट के इस हस्तक्षेप ने अर्थव्यवस्था की निरंतरता को भंग कर दिया है। फलत: आर्थिक मंदी के शिकार सामाजिक समूहों के मुद्दे भारत में अब जनतांत्रिक राजनीति के अहम प्रश्न हो सकते हैं। संभव है, सत्ता केंद्रित राजनीति की स्वार्थपरकता कुछ कमजोर हो व सेवाभाव की राजनीति का विस्तार हो। विपदाओं के समय का जवाब सेवाभाव ही होता है, इसी पैमाने पर राजनीति को पहले से भी ज्यादा परखा जाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
