August 04, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    किसानों को 6 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि तीन किस्तों में देने वाले भाजपा नेता एकमुश्त भुगतान का ज्ञान न दें दुर्ग । शौर्यपथ । किसान न्याय योजना की राशि एक साथ देने से संबंधित प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु देव साय के बयान को कांग्रेस ने हास्यास्पद करार दिया है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री राजेंद्र साहू ने कहा कि मोदी सरकार किसानों को 6 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि और कोरोना संकट काल में गरीब जनधन खाताधारकों को महज 15 सौ रुपए की राशि 3 किस्तों में दे रही है। साय में हिम्मत है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से किसानों और गरीबों को एकमुश्त भुगतान कराएं। राशि भुगतान को लेकर साय समेत भाजपा नेताओं को ज्ञान देने की जरूरत नहीं है। राजेंद्र ने कहा कि विष्णु देव साय केंद्रीय इस्पात मंत्री रह चुके हैं। केंद्र में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए वे मोदी सरकार से धान के समर्थन मूल्य में मात्र 53 रुपए की बढ़ाकर 1868 रुपए करने की बजाय सीधे 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल करने की मांग करें। साय को मोदी सरकार से श्रमिक कल्याण रोजगार योजना को छत्तीसगढ़ में लागू करने की मांग भी करना चाहिए। राजेंद्र ने साय पर हमला बोलते हुए कहा कि उन्हें प्रदेश की कांग्रेस सरकार से 18 माह का हिसाब मांगने की बजाय 15 साल के रमन सरकार और 6 साल के मोदी सरकार के कार्यों का हिसाब मांगना चाहिए। मोदी और रमन सिंह ने कितने वादे पूरे किए? इसका हिसाब साय को मांगना चाहिए। किसानों के धान का बोनस हजम करने वाले, रतनजोत से डीजल बनाने के नाम पर घोटाला, मोबाइल बांटकर घोटालेबाजी करने वाले भाजपा नेताओं को भूपेश सरकार से हिसाब मांगने से पहले अपने काले कारनामों का हिसाब देना चाहिए। राजेंद्र ने कहा कि भूपेश बघेल सरकार ने किसानों का कर्जा माफ किया है। धान की खरीदी 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से की गई है। गोधन न्याय योजना के माध्यम से पशुधन की रक्षा करने के साथ ही पशुपालकों की आय बढ़ाने के साथ पशुधन का संरक्षण कर रही है। भाजपा के 15 साल के शासनकाल के दौरान हर योजना में सिर्फ भ्रष्टाचार हुआ है। दूसरी ओर, भूपेश सरकार ने सरकार की योजनाओं का पैसा सीधे किसानों, गरीबों और आदिवासियों के बैंक खाते में डाला है। साय को हिसाब पूछना है तो 15 साल तक रमन सरकार के भ्रष्टाचार का हिसाब मांगे। कांग्रेस सरकार को नसीहत देने की जरूरत नहीं है।

    मनोरंजन / शौर्यपथ / बॉलीवुड की मशहूर अदाकारा श्रीदेवी का आज 57वां जन्मदिन है. उनके जन्मदिन के इस खास मौके पर फैंस उन्हें खूब याद कर रहे हैं. दिवंगत एक्ट्रेस श्रीदेवी ने अपने अंदाज और अपनी फिल्मों के जरिए बॉलीवुड की दुनिया में जबरदस्त पहचान बनाई थी. जन्मदिन के इस खास अवसर पर श्रीदेवी का एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है, जिसमें वह हाथ पर सिर रखकर बैठी नजर आ रही हैं. दरअसल, श्रीदेवी का यह वीडियो कौन बनेगा करोड़पति से जुड़ा है, जहां उनसे उन्हीं के गाने के म्यूजिक डायरेक्टर के बारे में पूछा जाता है.उनसे यह सवाल बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन करते हैं.
    श्रीदेवीका यह वीडियो उनके फैनपेज ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट से शेयर किया है, जिसे अब तक 14 हजार से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है. वीडियो में श्रीदेवी को एक गाना सुनाया जाता है और पूछा जाता है कि इसके म्यूजिक डायरेक्टर कौन थे. श्रीदेवी को म्यूजिक डायरेक्टर का नाम नहीं याद आता है. इसपर अमिताभ बच्चन कहते हैं कि गाना बहुत सुंदर गाया है आपने. इसपर श्रीदेवी ने कहा, "यह चांदनी फिल्म का गाना है. यश जी ने मुझे कहा कि ये गाना आप गाओगी, तो मैंने इस बात को गंभीरता से ले लिया. लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने क्या कहा."

    13 अगस्त 1963 को जन्मी श्रीदेवी ने न केवल बॉलीवुड बल्कि तेलुगु, तमिल, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों में भी अपनी जबरदस्त पहचान बनाई थी. एक्ट्रेस को फर्स्ट फीमेल सुपरस्टार के नाम से भी जाना जाता था. श्रीदेवी ने अपनी फिल्मों और अपने काम के लिए कई अवॉर्ड भी अपने नाम किये थे. एक्ट्रेस ने 24 फरवरी 2018 में दुनिया को अलविदा कह दिया था. उनके निधन के बाद बॉलीवुड इंडस्ट्री के साथ-साथ फैंस को भी काफी झटका लगा था. श्रीदेवी ने चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर 1967 में एक्टिंग करियर की शुरुआत की थी.

     

    नजरिया / शौर्यपथ / लैंगिक समानता के क्षेत्र में 11 अगस्त, 2020 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में न केवल बेटियों को बेटों के बराबर के अधिकार पर अपनी मुहर लगाई, अपितु इस विषय से जुड़ी कानूनी अनिश्चितता को भी दूर कर दिया है।
    सन 1956 के हिंदू उत्तराधिकार कानून में हिंदू परिवार की संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार नहीं था। यह संविधान के उन आदर्शों के उलट था, जिसमें पुरुषों और महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिलना था। साल 2005 में इस कमी को दूर करने का प्रयास किया गया। हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन करके बेटियों को भी पिता की संपत्ति और दायित्व में बेटों के बराबर अधिकार दे दिया गया था। निश्चित रूप से यह बहुत बड़ा कदम था, इसे 9 सितंबर, 2005 से लागू कर दिया गया। बेटियों के अधिकार को लेकर किसी को कोई भ्रम न था, लेकिन उसके लागू होने की तिथि को लेकर देश भर में विवाद था और आम लोगों के बीच ही नहीं, बल्कि अदालतों के निर्णयों में भी विरोधाभास रहा।
    चूंकि 2005 के संशोधन को उसी साल 9 सितंबर से लागू किया गया, इसलिए कुछ लोगों का तर्क था कि यह उन मामलों में लागू नहीं होगा, जिनमें संपत्ति के स्वामी की मृत्यु इसके पहले हो गई हो। अदालतों के फैसले भी अलग-अलग आ रहे थे। परस्पर विरोधी फैसलों के कारण इस विषय पर कानूनी असमंजस की स्थिति बनी हुई थी और इस अस्पष्टता को दूर करना जरूरी था। सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा के मामले में सभी भ्रांतियों को दूर करते हुए न्यायिक रुख स्पष्ट कर दिया है। इसके माध्यम से यह साफ हो गया है कि हिंदू अविभक्त परिवार की संपत्ति में बेटियों को भी बेटों की तरह जन्मना और समांशी अधिकार हासिल है। उनके इस अधिकार पर इस बात का कोई असर नहीं पडे़गा कि उनका जन्म 2005 के संशोधन के पहले हुआ था। यदि पिता की मृत्यु 9 सितंबर, 2005 के पहले हुई हो, तब भी बेटियों के अधिकारों पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि इस निर्णय के माध्यम से बेटियों के अधिकार को विस्तार दिया गया है। इसका किसी रिश्तेदार के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता।
    पारंपरिक हिंदू विधि में बेटियों को समांशी नहीं माना जाता था, इसलिए उन्हें परिवार की संपत्ति में जन्मना अधिकार नहीं था। अपने संविधान के माध्यम से हमने ऐसे समाज की कल्पना ही नहीं, अपितु वादा भी किया, जिसमें पुरुष और महिला के बीच कोई भेदभाव नहीं हो। हिंदू विवाह, दत्तक ग्रहण तथा उत्तराधिकार के क्षेत्र में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिया गया। पारंपरिक मिताक्षरा कानून में बेटी को पिंडदान करने का अधिकार नहीं था, इसलिए उसे न तो गोद लिया जा सकता था और न ही संपत्ति में अधिकार था। इन कानूनों ने नए युग का सूत्रपात किया। बेटियों को केवल अधिकार ही नहीं, अपितु उनके दायित्व को भी सुनिश्चित किया। इसका एक उदाहरण दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 है। इसके तहत अन्य बातों के अलावा बच्चों पर अपने माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दी गई है। इसका अर्थ यह लगाया जाता रहा कि यह जिम्मेदारी केवल बेटों तक ही सीमित है। बेटियों को लोग इससे इसलिए मुक्त मानते थे, क्योंकि उन्हें दूसरे घर जाना होता है, पर सुप्रीम कोर्ट ने डॉ विजय मनोहर बनाम काशीराम राजाराम के निर्णय में 1987 में ही स्पष्ट कर दिया था कि केवल बेटे ही नहीं, अपितु बेटी भी और यहां तक कि शादीशुदा बेटी भी अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने को बाध्य है।
    लैंगिक समानता के आदर्शों को पूरा करने के लिए हर स्तर पर कार्य हुआ है, जिससे बेटियां मजबूत हुई हैं। ऐसे में, उत्तराधिकार के मामले में बेटियों को कमतर रखना संविधान की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप नहीं था। इसी कमी को दूर करने के लिए 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन किया गया। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के अनुसार, यह देर से लिया गया सही निर्णय था, मगर इस कानून के लागू होने की तिथि के बारे में अस्पष्टता बनी हुई थी। ताजा निर्णय के माध्यम से भ्रम का वातावरण समाप्त हुआ है और लैंगिक समानता से जुड़ी भ्रांतियों का भी निवारण हुआ है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) हरबंश दीक्षित, विधि विशेषज्ञ व सदस्य, उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग

     

    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारत का एक प्रमुख आईटी हब माने जाने वाले बेमिसाल शहर बेंगलुरु में सद्भाव का प्रभावित होना न केवल चिंताजनक, बल्कि शर्मनाक भी है। सोशल मीडिया पर महज एक पोस्ट की वजह से भीड़ ऐसे भड़की कि तीन लोगों को अपनी जान देकर और 100 से ज्यादा लोगों को घायल होकर कीमत चुकानी पड़ी। इसके अलावा 110 से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए हैं। हिंसक भीड़ को संभालने में 60 से अधिक पुलिस वाले घायल हुए हैं। सद्भावना से खिलवाड़ के कारण 200 से ज्यादा परिवारों पर सीधे असर पड़ा है और अपेक्षाकृत शांत रहने वाले बेंगलुरु के दामन पर एक दाग आ लगा है। पढ़े-लिखे समझे जाने वाले शहरों में भी अगर एक पोस्ट मात्र से अमन-चैन का माहौल खराब हो सकता है, तो इससे पता चलता है कि भारत में सतर्कता कितनी जरूरी है।
    पोस्ट करने वाला शख्स कांग्रेस विधायक का भतीजा बताया जा रहा है, हालांकि उसका कहना है कि उसने पोस्ट नहीं डाली, इसके बावजूद एहतियात बरतते हुए पुलिस ने उसे गिरफ्तार करके ठीक किया है। पूरे मामले की जांच होनी चाहिए कि आखिर पोस्ट किसने लिखी? इसके पीछे कोई साजिश तो नहीं है? सभ्य समाज के लोगों के साथ-साथ सरकार को भी सजग रहना चाहिए, नाना प्रकार के अनर्गल और गैर-कानूनी पोस्ट सोशल मीडिया पर चलती रहती हैं, जिनसे लोगों की भावनाएं आहत होती रहती हैं। कई बार लोग पोस्ट की आक्रामकता या हिंसा झेल लेते हैं, पर कई बार भावना भड़क उठती है। अत: अव्वल तो यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी अवैध-हिंसक-दुर्भावनाओं से भरी पोस्ट को चलने ही न दिया जाए। अगर कोई ऐसी पोस्ट को आगे बढ़ाता है, तो उसे ऐसे दंडित करना चाहिए कि समाज के सामने एक नजीर बन जाए।
    दूसरी ओर, किसी भी तरह की हिंसा के लिए भीड़ जुटाने की बढ़ती गैर-कानूनी प्रवृत्ति की पड़ताल भी जरूरी है। एक लोकतांत्रिक देश में ऐसे भीड़-तंत्र को बढ़ाने के अपने खतरे हैं। पुलिस का खुफिया तंत्र मजबूत होना चाहिए, ताकि किसी भी तरह के आपराधिक मकसद या कानून हाथ में लेने के इरादे से कोई साजिश मुमकिन न हो। लोकतंत्र में भीड़ की इस भ्रांति पर अंकुश भी जरूरी है कि वह कुछ भी कर सकती है। दिल्ली में जो दंगे हुए थे, उसमें भी कदम-कदम पर दोनों समुदायों की ओर भीड़ की गलत भूमिका दिखी थी। बेंगलुरु में भी यही हुआ, भीड़ ने विधायक के घर, पुलिस वालों और थाने को निशाना बनाया। उपद्रवियों ने सुबह तक का इंतजार नहीं किया, रात ही ऐसे निकल चले कि गोलीबारी की नौबत आ गई। खुफिया एजेंसियों को यह देखना होगा कि बेंगलुरु में हुई इस हिंसा के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं थी। कर्नाटक के गृह मंत्री ने बिल्कुल सही कहा है, ‘तोड़फोड़ से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता’। बेंगलुरु के डीजे हल्ली व केजी हल्ली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले इलाकों में कफ्र्यू लगा दिया गया है। किसी भी भीड़ को सड़क पर उतरने का मौका नहीं मिलना चाहिए। संयम बरतने के साथ ही, पुलिस साइबर सेल और आईटी कंपनियों को भी पूरी सावधानी बरतनी चाहिए कि सोशल मीडिया के किस भी मंच पर द्वेष-रोष भरे घात-प्रतिघात का नया सिलसिला न चले। साइबर वल्र्ड की गंदगी को वहीं पूरी चौकसी व कड़ाई से साफ करने की जरूरत है, ताकि वह किसी शहर में सड़क पर न नजर आए।

     

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / बुलंदशहर की छात्रा सुदीक्षा के साथ जो कुछ हुआ, वह शर्मनाक है। यह घटना बताती है कि देश में अब भी छेड़खानी और बलात्कार मानो सामान्य बात है। लेकिन दुख की बात यह है कि हम अब भी अपने जन-प्रतिनिधियों से कानून-व्यवस्था में सुधार लाने या लड़कियों की सुरक्षा आदि की मांग नहीं करते, बल्कि हमारे लिए जरूरी कुछ अन्य मुद्दे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि कानूनी धाराओं के बेहतर क्रियान्वयन न हो पाने की वजह से ऐसे अपराध दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। अगर पुलिस राह चलते छेड़खानी करने वाले शोहदों को सख्त धाराओं के तहत गिरफ्तार करे और सजा दिलाए, तो संभव है कि उनकी लड़कियों को छेड़ने की फिर कभी हिम्मत नहीं हो। मगर ऐसा हो, तब तो? कुछ दायित्व समाज को भी निभाने होंगे। हरेक माता-पिता को यह बात बचपन में ही अपनी संतान के मन में डालनी होगी कि उन्हें लड़कियों का सम्मान करना चाहिए, अपमान नहीं। अगर हम सब ऐसा कुछ कर सके, तो यकीनन किसी और प्रतिभाशाली सुदीक्षा को यूं अपनी जान नहीं गंवानी पड़ेगी।
    शिवानी गांधी
    बहराइच, उत्तर प्रदेश

    सबक हम लेते नहीं
    लगता है कि लोगों ने निर्भया कांड से सबक नहीं लिया है। तभी तो महिलाओं और बच्चियों के साथ दरिंदगी अनवरत जारी है। आए दिन अखबारों में प्रमुखता से छपने वाली ऐसी खबरें पीड़ा पहुंचाती हैं। सरकार ने कठोर कानून जरूर बनाए हैं, अपराधियों को सजा भी मिल रही है, लेकिन शैतान की हैवानियत जारी है। निर्भया के दरिंदों को जब फांसी दी गई थी, तब यह अनुमान लगाया गया था कि अब इस तरह की घटनाएं कम होंगी। मगर लगता है कि इससे कोई सबक नहीं लिया गया। सुदीक्षा के साथ हुई छेड़खानी इसका ताजा उदाहरण है। इन घटनाओं के अपराधी पकड़े भी जाते हैं, तो उन्हें सजा मिलने में इतना अधिक वक्त लग जाता है कि इंसाफ काफी पीछे छूट जाता है। ऐसे मामलों में तुरंत कार्रवाई और दोषियों को त्वरित सजा वक्त का तकाजा है।
    अमृतलाल मारू
    धार, मध्य प्रदेश

    सराहनीय काम
    बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में अच्छी इंटरनेट-सेवा मुहैया कराने के लिए ‘ऑप्टिकल फाइबर केबल’ की शुरुआत की। यह निश्चय ही लाभदायक और सराहनीय काम है। इससे अंडमान-निकोबार द्वीप की सुरक्षा में भी मदद मिलेगी और पर्यटन को भी खासा बढ़ावा मिलेगा। अब तक यहां आने वाले पर्यटक अच्छी इंटरनेट-सेवा की कमी महसूस करते रहे हैं। अब ऐसा नहीं हो सकेगा। यहां इंटरनेट की अच्छी सुविधा मिलने से ज्ञान-विज्ञान की शाखाएं भी खुल सकेंगी। इन सबसे डिजिटल इंडिया अभियान को विशेष गति मिलेगी।
    सोनू कुमार गोस्वामी, अररिया, बिहार

    डॉक्टरों से भेदभाव
    कोरोना मरीजों, डॉक्टरों, नर्सों आदि के साथ हमारे समाज में जैसा बर्ताव किया जा रहा है, उसका कारण मानव का स्वार्थी और असंवेदनशील होना है। सच तो यह है कि हमें निरंतर असंवेदनशीलता सिखाई जाती है। जन्म लेते ही बच्चा परिवार में स्व-केंद्रित होना सीखता है, इसलिए भविष्य में यह भूल जाता है कि समाज के प्रति भी उसके कुछ दायित्व हैं। इसका खामियाजा बच्चे के मां-बाप को भी भुगतना पड़ता है। कोरोना के संक्रमण-काल में लोगों का यह भेदभाव इसी का संकेत है। हालांकि, इसमें कुछ लोग अपवाद भी हैं, जिनसे ही यह धरती बेहतर ढंग से चल रही है। इन्हीं अपवादों में कोरोना वॉरियर्स हैं, जो अपनी जान की परवाह किए बिना संक्रमित लोगों का जीवन बचा रहे हैं। इसलिए उनके साथ किसी भी तरह का भेदभाव मानवता के खिलाफ है। हमें इससे बचना चाहिए।
    अभिषेक सिंह, जौनपुर

     

    ओपिनियन / शौर्यपथ / राजनीति में जितने काम जनता के सामने किए जाते हैं, उससे कहीं ज्यादा मेहनत परदे के पीछे की जाती है। अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव इसका अपवाद नहीं है। वहां भारतीय मूल की कमला हैरिस को डेमोक्रेटिक पार्टी ने उप-राष्ट्रपति पद का अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के दौरान अपना दावा पेश करते हुए वह जो बिडेन के खिलाफ आक्रामकता की हद तक मुखर हो चुकी हैं। जाहिर है, डेमोक्रेटिक पार्टी ने जो बिडेन और कमला हैरिस की जोड़ी चुनावी मैदान में उतारकर अमेरिकी मतदाताओं को एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है।
    अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नवंबर में होने जा रहे हैं। कमला हैरिस अधिक से अधिक भारतीय मतदाताओं को डमोके्रटिक उम्मीदवार जो बिडेन के पक्ष में लुभा सकती हैं। साल 2016 के चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, वहां करीब 41 लाख भारतीय मूल के नागरिक हैं, जिनमें से लगभग 18 लाख मतदान के योग्य हैं। माना यही जाता है कि भारतीय मूल के मतदाता पारंपरिक तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में अपना वोट गिराते रहे हैं, लेकिन व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के प्रवेश के बाद से माहौल कुछ हद तक बदला है। अब कयास यह लगाया जाने लगा है कि डेमोक्रेटिक के ये पारंपरिक वोटर उससे छिटककर रिपब्लिकन पार्टी के पाले में जा सकते हैं। ‘हाउडी मोदी’ जैसे आयोजन के बाद इस फेरबदल के अनुमान में कहीं ज्यादा तेजी आई है।
    लिहाजा, ऐसे किसी उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतारने का दबाव डेमोक्रेटिक पर था, जो उसके पारंपरिक गढ़ को मजबूत करते हुए रिपब्लिकन की ‘सपोर्ट बेस’ में सेंध लगा सकें। कमला हैरिस का व्यक्तित्व इसमें पार्टी की मदद करता दिखता है। वह पुराने दिनों में एक चर्चित वकील रह चुकी हैं। सेक्स हिंसा के खिलाफ उनकी टिप्पणी काफी सुर्खियों में रही। बेशक आलोचकों की नजर में वह एक उलझी हुई दावेदार हैं, क्योंकि राष्ट्रपति पद के लिए अपना दावा पेश करते समय वह जिन ‘प्रगतिशील’ नीतियों की हिमायती दिखीं, उनमें से कई को वह वकालत के अपने शुरुआती वर्षों में खारिज कर चुकी हैं। बहरहाल, देर से ही सही, पर अश्वेतों के प्रति पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ वह जिस तरह से मुखर हुईं, उससे भी उनकी एक सकारात्मक छवि बनी है। इसी तरह, स्वास्थ्य-सेवा में सुधार, बिना दस्तावेज के रह रहे आप्रवासियों को नागरिकता मुहैया कराने, बंदूकों की खुली बिक्री पर पाबंदी लगाने, तर्कसंगत कर सुधार जैसे मसलों पर भी वह खुलकर अपनी राय रखती रही हैं। इन सबसे उनका अपना एक मतदाता-वर्ग तैयार हुआ है।
    कमला हैरिस का मुखर होना भी उनके पक्ष में जाता है। राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के वक्त जो बिडेन पर की गई उनकी टिप्पणी तो अब भी कई लोगों के जेहन में ताजा होगी। उन्होंने जो बिडेन को तब घेरा था, जब उनकी बिडेन के दिवंगत बेटे से खूब बनती थी। इससे यह धारणा बनी है कि कमला चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवारों पर हमलावर होने में जो बिडेन की खासा मदद कर सकती हैं। जो बिडेन ने उनकी दावेदारी पेश करते हुए कहा भी कि काम करने के तरीके पर हमारे आपसी मतभेद हो सकते हैं, लेकिन रणनीति पर नहीं।
    मगर हमारे लिए अहमियत यह रखती है कि भारत के प्रति वह क्या सोचती हैं? अभी तक यह साफ-साफ नहीं कहा जा सकता कि वह नई दिल्ली से कितनी करीब हैं, लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी को भारत का हितैषी माना जाता है। चूंकि जो बिडेन पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी प्राथमिकता में भारत शीर्ष पर होगा, इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि कमला हैरिस नई दिल्ली और वाशिंगटन की मित्रता को एक नए मुकाम पर पहुंचाने में मददगार साबित हो सकेंगी। बेशक डोनाल्ड ट्रंंप के अब तक के कार्यकाल में भारत और अमेरिका के रिश्ते आगे बढ़े हैं, लेकिन एच1-बी वीजा पर उनका सख्त रुख नई दिल्ली के मुफीद नहीं माना गया, जबकि जो बिडेन यह एलान कर चुके हैं कि अगर वह राष्ट्रपति के रूप में चुने गए, तो इस वीजा पर लगी पाबंदी हटा ली जाएगी।
    कमला अमेरिकी समाज में गहरा रहे विभाजन को थामने में भी सहायक हो सकेंगी। वह अश्वेत डोनाल्ड हैरिस और श्यामला गोपालन की संतान हैं। अमेरिका में, और खासतौर से अश्वेतों में जिस तरह से बेरोजगारी बढ़ी है, उससे रिपब्लिकन सरकार के प्रति उनमें नाराजगी तेज हुई है। रही-सही कसर कोरोना महामारी ने पूरी कर दी है। कोविड-19 से जान-माल की भारी कीमत चुका रहे अमेरिका में अश्वेत इस बीमारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। और माना जाता है कि श्वेतों-अश्वेतों के बीच का सामाजिक भेद इसकी एक बड़ी वजह है। कमला हैरिस को चुनाव मैदान में उतारकर डेमोक्रेटिक पार्टी अमेरिकी समाज को एकजुट करने का संकेत दे रही है। अगर ऐसा होता है, तो यकीनन यह भारत के हित में भी होगा। वहां जिस तरह से भारतीय मूल के आप्रवासियों की आमद बढ़ी है, उसके कारण से भारत सरकार पर यह दबाव भी बढ़ा है कि भारतीय अनिवासी वहां किसी तरह के भेदभाव का शिकार न बनें।
    बहरहाल, कमला हैरिस असल अर्थों में भारत के लिए कितनी सहायक हो सकेंगी, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इसका अनुमान चुनावी अभियान में पार्टी द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों से जरूर लगाया जा सकेगा। कश्मीर-विवाद, पाकिस्तान में जड़ जमा चुके आतंकवाद, चीन की विस्तारवादी नीति, मध्य एशिया में बढ़ता तनाव जैसे मसलों को लेकर पार्टी की रणनीति का खुलासा चुनावी मैदान में हो सकता है। फिर, परमाणु मसलों पर भी डेमोक्रेटिक पार्टी का रुख भारत के खिलाफ रहा है। ऐसे में, यह देखना होगा कि पार्टी अब इस बारे में क्या सोचती है? सही-सही जवाब के लिए अभी हमें कुछ इंतजार करना होगा, मगर इतना तो तय है कि कमला हैरिस का दांव खेलकर डेमोक्रेटिक ने वहां की चुनावी बिसात को बदल दिया है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) शशांक, पूर्व विदेश सचिव

     

    दुर्ग। शौर्यपथ। केंद्र की मोदी सरकार ने आम जनता की मूलभूत ज़रूरत शुद्ध जल के लिए अमृत मिशन योजना का शुभारंभ किया इस योजना के तहत निकाय क्षेत्र में इन दिनों पुराने पाइप लाइन को बदल कर नए पाइप लाइन बिछाने का कार्य जोरो पर है । वही कार्य इन दिनों दुर्ग निगम क्षेत्र में भी संचालित हो रहा है लगभग 144 करोड़ के इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी महाराष्ट्र की कम्पनी लक्ष्मी कंस्ट्रक्शन को मिला है । शासन की तय सीमा 30 माह में कम्पनी की यह कार्य करना है जिसमे शहर की पाइप लाइन के साथ 6 टंकियों के निर्माण की भी जवाबदारी है । महती और बड़े प्रोजेक्ट में निगम प्रशासन की बारीकी मॉनिटरिंग की अत्यंत आवश्यकता है जिसका अभाव दुर्ग निगम में लगातार नजऱ आ रहा है । नियमत: जनवरी 2018 से शुरू कार्य की सीमा जून 2020 तक खत्म हो जानी थी किन्तु वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि यह कार्य साल भर बाद ही खत्म होगा ।
    एक्सटेंशन का भी नही मिला फायदा ...
    कम्पनी को निर्धारित समय पर कार्य पूर्ण नही करने से भुगतान में भुगतान राशि का 6 प्रतिशत नुकसान होता है स्थिति को देखते हुए निगम कमिश्नर को यह अधिकार होता है कि वह कार्य सीमा में कुछ महीनों का एक्सटेंशन दे सकते है दुर्ग निगम में भी यही हुआ कोरोना आपदा के कारण कार्य मे 4 से 8 महीने का एक्सटेंशन दे दिया गया । जबकि लक्ष्मी कंस्ट्रक्शन द्वारा मात्र दो महीने का कार्य ही नही हो सका किन्तु 4 से 8 महीने का एक्सटेंशन देने से कंपनी के करीबन 10 लाख सूखे बच गए । अब लक्ष्मी कंस्ट्रक्शन द्वारा तेजी से कार्य किया जा रहा है इतनी तेजी से कि गुणवत्ता को भी दरकिनार किया जा रहा है और निगम प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी / इंजीनियर मौन है । वैसे भी अगर गुणवत्ता हीन कार्य की सूचना भी दी जाती है तो जि़म्मेदार निगम अधिकारी भीम राव द्वारा तुरंत संज्ञान ना लेकर ठेकेदारों से बात करने की सलाह दी जाती है । निगम द्वारा प्रदत्त आलीशान चेम्बर में बैठकर ही कागजो में गुणवत्ता की बात की जा रही है निगम अधिकारियों द्वारा । स्थिति तो यहां तक है कि प्रमाण देने के बाद भी निगम आयुक्त जांच की बात तो कहते है किंतु जांच कब होगी यह नही बताते ।

    दिखावटी कार्यवाही का आश्वाशन ..

    यदि मामले को निगम आयुक्त के संज्ञान में भी लाया जाता है तो एक सख्त अधिकारी की तरह अधिनस्त कर्मचारियों को तुरंत कॉल कर जांच की बात कहते है किंतु यह बात भी दिखावटी ही प्रतीति होती है । ऐसे ही एक मामले में शौर्यपथ समाचार ने कुछ जगहों पर स्तरहीन कार्य की मय प्रमाण सहित बात की तो आयुक्त द्वारा तुरंत संज्ञान लेकर जांच कराने का आदेश तो दे दिया किन्तु आदेश का पालन अधिनस्त कर्मचारी वर्तमान समय तक नही कर पाए । क्या इसका यह अर्थ नही निकलता कि या तो निगम आयुक्त के अधिनस्त निगम आयुक्त के आदेश को हल्के में लेते है या फिर अधिनस्त कर्मचारी और निगम आयुक्त शिकायत कर्ता के साथ सिर्फ दिखावे का कार्य कर रहे है ।
    लेबर कांट्रेक्ट की आड़ में पेटी कांट्रेक्ट...
    वर्तमान में दुर्ग निगम क्षेत्र में पाइप फिटिंग के बाद फिलिंग का कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है जिसमे कार्य एजेंसी द्वारा शहर के ठेकेदारों को पेटी कांट्रेक्ट में कार्य देने का मामला सामने आ रहा है किंतु इसे चतुराई से लेबर कांट्रेक्ट का रूप देकर मामले को दबाया जा रहा है । कागजो में मजबूत अमृत मिशन के कार्य मे गुणवत्ताहीन कार्य के कई मामले उजागर हुई किन्तु निगम आयुक्त मौन , ईई मौन , इंजीनियर मौन और दुर्ग शहर की जनता परेशान ..

    मरवाही  /शौर्यपथ / गृह मंत्री  ताम्रध्वज साहू ने गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिले के मुख्यालय पेन्ड्रा में कलेक्टर कार्यालय में गृह (पुलिस) विभाग के जिला स्तरीय अधिकारियों की बैठक लेकर कानून व्यवस्था की समीक्षा की। मंत्री साहू ने कहा कि पुलिस विभाग  की कार्य शैली ऐसी होनी चाहिए कि जनता के मन में पुलिस के लिए सम्मान हो और अपराधियों के मन में पुलिस के लिए भय हो। उन्होंने अपराधों पर नियंत्रण के लिए पुलिसबल को सजग होकर कार्य करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि पुलिस त्वरित कार्रवाई में जुट जाए तो अपराधों की गुत्थी आसानी से सुलझायी जा सकती है। इसके साथ ही जनता में पुलिस के प्रति विश्वास भी बढ़ता है। पुलिस का व्यवहार आम नागरिकों से सम्मानजनक और सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिले में कोरोना संक्रमण की रोकथाम में पुलिस विभाग की बेहद अहम भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि पुलिस थानों में बलवृद्धि एवं बलों की क्षमता के विकास हेतु शासन द्वारा प्रयास किया जा रहा है। गृह मंत्री ने जिले में सड़क दुर्घटनाओ को रोकने के लिए यातायात नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए। बैठक में विधायक श्रीमती रेणु जोगी, राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष  थानेश्वर साहू, कलेक्टर  डोमन सिंह, पुलिस अधीक्षक सूरज सिंह परिहार सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

    रायपुर / शौर्यपथ / सृष्टि निर्माता ने छत्तीसगढ़ को अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य से नवाजा है। दक्षिण कौशल का यह क्षेत्र रामायणकालीन संस्कृति का परिचायक रहा है। ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्व की यह स्थली रामगढ़ की पहाड़ी के नाम से जाना जाता है। यह स्थल जिला मुख्यालय अम्बिकापुर से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर उदयपुर विकासखण्ड के समीप स्थित है। समुद्र तल से इसकी ऊॅचाई लगभग 3 हजार 202 फीट है।
    महाकवि कालिदास की अनुपम रचना ‘‘ मेघदूतम’’ की रचना स्थली और विश्व की सर्वाधिक प्राचीनतम् शैल नाट्यशाला के रूप में विख्यात ‘‘रामगढ़’’ पर्वत के साये में इस ऐतिहासिक धरोहर को संजोए रखने और इसके संवर्धन के लिए हर साल आषाढ़ के पहले दिन यहां रामगढ़ महोत्सव का आयोजन किया जाता रहा है। रामगढ़ पर्वत के निचले शिखर पर स्थित ‘‘सीताबेंगरा’’ और ‘‘जोगीमारा’’ की गुफाएं प्राचीनतम शैल नाट्यशाला के रूप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ये गुफाएं तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मौर्यकाल के समय की मानी जाती हैं। जोगीमारा गुफा में मौर्य कालीन ब्राह्मी लिपि में अभिलेख तथा सीताबेंगरा गुफा में गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि में अभिलेख के प्रमाण मिलते है। जोगीमारा गुफा की एक और विशेषता है कि यहां भारतीय भित्ति चित्रों के सबसे प्राचीन नमूने अंकित हैं।
    पुरातात्विक दस्तावेजों के रूप में मूर्तियों, शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों का बड़ा महत्व माना जाता है। रामगढ़ मंे ऐसे महत्व की वस्तुएं उपलब्ध है। जोगीमारा गुफा में लगभग 8 मूर्तियां संग्रहित हैं। यह मूर्तियां लगभग 2 हजार वर्ष पुरानी हैं।
    रामगढ़ पहाड़ी के ऊर्ध्व भाग में दो शिलालेख मौजूद हैं। प्रस्तर पर नुकीले छेनी से काटकर लिखे गए इस लेख की लिपि पाली और कुछ-कुछ खरोष्टी से मिलती जुलती है। लिपि विशेषज्ञों ने इसे एक मत से पाली लिपि माना है। इस पर निर्मित कमलाकृति रहस्यमय प्रतीत होती है। यह आकृति कम बीजक ज्यादा महसूस होता है।
    रामगढ़ के निकट स्थित महेशपुर वनस्थली महर्षि की तपोभूमि थी। रामगढ़ को महाकवि कालीदास की अमरकृति मेघदूतम् की रचनास्थली मानी जाती है। इस स्थल पर ही लगभग 10 फीट ऊपर ’’कालीदासम’’ खुदा हुआ मिला है।
    सीताबेंगरा के ही पार्श्व एक सुगम सुरंग मार्ग है, जिसे हाथी पोल कहते हैं। इसकी लम्बाई लगभग 180 फीट है। इसका प्रवेश द्वार लगभग 55 फीट ऊंचा है। इसके अंदर से ही इस पार से उस पार तक एक नाला बहता है। इस सुरंग में हाथी आसानी से आ-जा सकता है। इसलिए इसे हाथी पोल कहा जाता है। सुरंग के भीतर ही पहाड़ से रिसकर एवं अन्य भौगोलिक प्रभाव के कारण एक शीतल जल का कुण्ड बना हुआ है। कवि कालीदास ने मेघदूत के प्रथम श्लोक में जिस ’’यक्षश्चक्रे जनकतनया स्नान पुण्योदकेषु’’ का वर्णन किया है वह सीता कुण्ड यही है। इस कुण्ड का जल अत्यन्त निर्मल एवं शीतल है।
    कालिदास युगीन नाट्यशाला और शिलालेख, मेघदूतम् के प्राकृतिक चित्र, वाल्मीकी रामायण के संकेत तथा मेघदूत की आधार कथा के रूप में वर्णित तुम्वुरू वृतांत और श्री राम की वनपथ रेखा रामगढ़ को माना जा रहा है। मान्यता यह है कि भगवान राम ने अपने वनवास का कुछ समय रामगढ़ में व्यतीत किया था। भगवान राम के वनवास के दौरान सीताजी ने जिस गुफा में आश्रय लिया था वह ”सीताबेंगरा“ के नाम से प्रसिद्ध हुई। यही गुफाएँ रंगशाला के रूप में कला-प्रेमियों के लिए तीर्थ स्थल है। यह गुफा 44.5 फुट लंबी ओर 15 फुट चौड़ी है।
    सीताबेंगरा के बगल में ही एक दूसरी गुफा है, जिसे जोगीमारा गुफा कहते हैं। इस गुफा की लम्बाई 15 फीट, चौड़ाई 12 फीट एवं ऊंचाई 9 फीट हैं। इसकी भीतरी दीवारे बहुत चिकनी वज्रलेप से प्लास्टर की हुई हैं। गुफा की छत पर आकर्षक रंगबिरंगे चित्र बने हुए हैं। इन चित्रों में तोरण, पत्र-पुष्प, पशु-पक्षी, नर-देव-दानव, योद्धा तथा हाथी आदि के चित्र हैं। इस गुफा में चारों ओर चित्रकारी के मध्य में पांच युवतियों के चित्र हैं, जो बैठी हुई हैं। इस गुफा में ब्रह्मी लिपी में कुछ पंक्तियां उत्कीर्ण हैं।
    सरगुजा अपने अतीत के गौरव और पुरातात्विक अवशेषों के कारण अपना एक ऐतिहासिक महत्व रखता है। यहां आने वाले पर्यटकों को रामायणकालीन युग का अहसास होता है।

    // मनरेगा अभिसरण से पशुधन, डेयरी एवं चारागाह विकास के कार्य, केन्द्रीय ग्रामीण विकास तथा पशुपालन एवं डेयरी विकास विभाग ने जारी किए संयुक्त दिशा-निर्देश
    // राज्य मनरेगा आयुक्त कार्यालय ने कलेक्टरों को जारी किया परिपत्र, मनरेगा कार्यों में पशुधन, डेयरी एवं चारागाह विकास के कार्यों को प्राथमिकता से शामिल करने के निर्देश

    रायपुर / शौर्यपथ / गांवों में चारागाह विकसित करने ग्रामीण विकास और पशुधन विकास विभाग मिलकर काम करेंगे। मनरेगा तथा पशुपालन एवं डेयरी विभाग की योजनाओं के अभिसरण से ये कार्य किए जाएंगे। केन्द्रीय ग्रामीण विकास तथा पशुपालन एवं डेयरी विभाग द्वारा इसके लिए संयुक्त दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। राज्य मनरेगा आयुक्त कार्यालय ने सभी कलेक्टरों को परिपत्र जारी कर मनरेगा के अंतर्गत चारागाह, पशुधन और डेयरी विकास के कार्यों को प्राथमिकता से शामिल करने के निर्देश दिए हैं।
    मनरेगा से अधोसंरचनागत व्यवस्था और हरे चारे का उत्पादन
    मनरेगा आयुक्त कार्यालय ने कलेक्टरों को ग्रामीण विकास मंत्रालय के निर्देश तथा केन्द्रीय पशुपालन एवं डेयरी विभाग के साथ अभिसरण संबंधी संयुक्त दिशा-निर्देशों की जानकारी देते हुए कहा है कि पशुधन, डेयरी और चारागाह विकास को बढ़ावा देने के लिए मनरेगा के अंतर्गत अनुमेय व्यक्तिमूलक एवं सामुदायिक कार्य लिए जाएंगे। इसके तहत व्यक्तिगत एवं सामुदायिक पशु शेड, बकरी शेड, सुअर शेड और मुर्गीपालन शेड बनाए जा सकेंगे। स्वसहायता समूहों के लिए कृषि उत्पादों तथा सार्वजनिक खाद्यान्न भंडारगृह एवं ग्रामीण हाट निर्माण के काम भी इसमें लिए जा सकते हैं। व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वर्मी कंपोस्ट पिट तथा नाडेप व बर्कली कंपोस्ट पिट भी बनाए जा सकते हैं।
    पशुपालन केंद्रों (स्पअमेजवबा थ्ंतउे) और मवेशी आश्रयगृहों को बढ़ावा देने वहां मनरेगा से सिंचाई के लिए अधोसंरचना तैयार किए जा सकते हैं। पर इन कार्यों में जलापूर्ति के लिए पाइपलाइन नेटवर्क, बोरवेल या ट्यूबवेल के काम मनरेगा से नहीं किए जा सकेंगे। संबंधित तकनीकी विभाग से परामर्श लेकर हितग्राही के या सार्वजनिक जमीन पर चराई-भूमि विकास, चारा वाले वृक्षों या उद्यानिकी पौधों के रोपण, साल भर उगने वाले घास जैसे अजोला, नैपियर, अंजन और फॉक्स-टेल ग्रास तथा पशुओं के खाने योग्य फली वाले पौधे उगाने के काम मनरेगा के तहत लिए जा सकते हैं। इस तरह की गतिविधि एक जमीन पर केवल एक बार ही ली जा सकती है। इनकी खेती के लिए एक बार बीज या थरहा पर खर्च की अनुमति चारागाह भूमि विकास के अंतर्गत दी जा सकेगी।
    मवेशी संवर्धन का जिम्मा पशुधन विकास विभाग का, आकांक्षी जिलों में चारागाह विकास के लिए त्रिवर्षीय योजना
    पशुपालन को बढ़ावा देने पशुधन उत्पादन, डेयरी विकास, पशुओं की बीमारियों से सुरक्षा व संरक्षण तथा पशुधन व चारा विकास में सुधार से संबंधित कार्यों की जिम्मेदारी पशुधन विकास विभाग की होगी। विभाग जिला स्तरीय अधिकारियों, दुग्ध संघों, स्वसहायता समूहों तथा राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से चर्चा व समन्वय कर मनरेगा के तहत अनुमेय कार्यों के चयन में सहायता करेगी। साथ ही चारागाह विकास को बढ़ावा देने के लिए तकनीकी सहयोग प्रदान करेगी। पशुपालन और डेयरी विकास के लिए मनरेगा के अंतर्गत निर्मित संसाधनों के सफल उपयोग के लिए पशुधन विकास विभाग पशुपालकों को लिंकेज व वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएगी। व्यक्तिमूलक और सामुदायिक चारागाह के विकास के लिए पंचायतों का चयन कर उनकी सूची राज्य सरकार और केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को भेजेगी।
    पशुधन विकास विभाग ऐसे हितग्राही किसानों और पशुपालकों की भी पहचान करेगी जो हरे चारे या अजोला की खेती में रुचि रखते हों, किसी दुग्ध संघ के सदस्य हों या जिन्हें पशु शेड की जरूरत हो। वार्षिक कार्ययोजना तैयार करने के लिए यह सूची संबंधित ग्रामसभा को उपलब्ध कराई जाएगी। ग्रामसभा में ही हितग्राहियों का चयन किया जाएगा। सभी आकांक्षी जिलों में से हर वर्ष चारे की कमी वाले 100 ग्राम पंचायतों का चयन कर अगले तीन वर्ष तक के लिए चारागाह विकास के कार्य लिए जाएंगे। गैर-आकांक्षी जिलों के लिए राज्य शासन का पशुधन विकास और ग्रामीण विकास विभाग मिलकर सामुदायिक व व्यक्तिमूलक चारागाहों के विकास की रूपरेखा बनाएंगी।
    मनरेगा अभिसरण से होने वाले चारागाह, पशुधन और डेयरी विकास कार्यों का समन्वय एवं मॉनिटरिंग अभिसरण के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में पहले से ही गठित राज्य स्तरीय समन्वय समिति तथा जिला स्तर पर जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में कार्यरत जिला स्तरीय समन्वय समिति द्वारा की जाएगी। मनरेगा आयुक्त कार्यालय ने सभी कलेक्टरों को यह सुनिश्चित करने कहा है कि अभिसरण से लिए जाने वाले कार्य मनरेगा के अंतर्गत अनुमेय हों और उनकी स्वीकृति में सभी जरूरी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।

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