August 04, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    शौर्यपथ / ऋषि-मुनियों और अवतारों की भूमि 'भारतÓ एक रहस्यमय देश है। भारत में ऐसे कई स्थान हैं जिनका आज भी रहस्य बरकरार है। इन अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने का क्या कोई प्रयास कर रहा है? वैसे तो भारत में हजारों अनसुलझे रहस्य हैं लेकिन यहां प्रस्तुत हैं प्रमुख 10 अनसुलझे रहस्य।
    1. रहस्यों से भरे मंदिर : श्रीपद्मनाभम मंदिर, वृंदावन निधिवन का रंगमहल, कन्याकुमारी मंदिर, करनी माता का मंदिर, शनि शिंगणापुर, सोमनाथ मंदिर, कामाख्या मंदिर, महाकाल मंदिर, काल भैरव उज्जैन मंदिर, अजंता-एलोरा के मंदिर, खजुराहो का मंदिर, ज्वालादेवी का मंदिर, लेपाक्षी का मंदिर और जगन्नाथ का मंदिर। ऐसे सैंकड़ों मंदिर है जो किसी न किसी रहस्य के कारण आज भी उनका रहस्य अनसुलझा है।
    2. समुद्र के नीचे द्वारिका : गुजरात के तट पर भगवान श्रीकृष्ण की बसाई हुई नगरी यानी द्वारिका। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं। यह रहस्य अभी भी बरकरार है कि यह नगरी किसी तरह नष्ट हो गई थी और यह कितने हजार वर्ष प्राचीन है।
    3. कैलाश पर्वत और मानसरोवर : यह दुनिया का सबसे रहस्यमयी और विचित्र स्थान है। इसे अप्राकृतिक शक्तियों का केंद्र माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह धरती का केंद्र है। यह एक ऐसा भी केंद्र है जिसे एक्सिस मुंडी कहा जाता है। एक्सिस मुंडी अर्थात दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र। यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है, जहां दसों दिशाएं मिल जाती हैं। इस स्थान से जुड़े अनगिनत रहस्य हैं।
    4. सोन के भंडार : श्रीपद्मनाभम मंदिर के अलावा कहते हैं कि बिहार के राजगीर में छुपा है मौर्य शासक बिम्बिसार का अमूल्य स्वर्ण भंडार। बिहार का एक छोटा-सा शहर राजगीर, जो कि नालंदा जिले में स्?थित है, कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जाता है। यह शहर प्राचीन समय में मगध की राजधानी था। इसी राजगीर में है सोन भंडार गुफा। इस गुफा के बारे में कहा जाता है कि इसमें बेशकीमती खजाना छुपा है जिसे कि आज तक कोई नहीं खोज पाया है। यह खजाना मौर्य शासक बिम्बिसार का बताया जाता है, हालांकि कुछ लोग इसे पूर्व मगध सम्राट जरासंध का भी बताते हैं।
    5. अलेया भूत लाइट : पश्चिम बंगाल के दलदली इलाकों में कई बार रहस्यमयी रोशनी देखे जाने की जानकारी मिली थी। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह उन मछुआरों की आत्माएं हैं, जो मछली पकड़ते वक्त किसी वजह से मर गए थे। लोग इन्हें भूतों की रोशनी भी कहते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि जिन मछुआरों को यह रोशनी दिखती है, वे या तो रास्ता भटक जाते हैं या ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह पाते। इन दलदली क्षेत्रों से कई मछुआरों की लाशें भी मिली हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन यह मानने को तैयार नहीं कि यह भूतों के चलते ऐसा हुआ। हालांकि अभी तक इस रहस्य से भरी गुत्थी सुलझ नहीं पाई है। वैज्ञानिकों को अंदेशा है कि दलदली क्षेत्रों में अक्सर मीथेन गैस बनती है और वे किसी तत्व के संपर्क में आने से रोशनी पैदा करती है।
    6. रूपकुंड झील : मानसरोवर के अलावा भारत में ऐसी कई झीलें या ताल हैं जो कि बहुत ही रहस्यमयी है जैसे महाराष्ट्र में बुलढाना जिले में स्थित लोणार की झील। इसी तरह रूपकुंड झील या नदी हिमालय पर्वतों में स्थित है। इस तट पर मानव कंकाल पाए गए हैं। पिछले कई वर्षों से भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के विभिन्न समूहों ने इस रहस्य को सुलझाने के कई प्रयास किए, पर वे नाकाम रहे। भारत के उत्तरी क्षेत्र में खुदाई के समय नेशनल जिओग्राफिक (भारतीय प्रभाग) को 22 फुट का विशाल नरकंकाल मिला है। उत्तर के रेगिस्तानी इलाके में एम्प्टी क्षेत्र के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र सेना के नियंत्रण में है। यह वही इलाका है, जहां से कभी प्राचीनकाल में सरस्वती नदी बहती थी। माना जा रहा है कि इस तरह के विशालकाय मानव 5 लाख वर्ष पूर्व से 1 करोड़ 20 लाख वर्ष पूर्व के बीच में धरती पर रहा करते थे जिनका वजन लगभग 550 किलो हुआ करता था।
    7. जतिंगा गांव : असम में स्थित यह गांव पक्षी आत्महत्या की घटनाओं के लिए सुर्खियों में बना हुआ है। कहा जाता है कि पक्षी यहां आकर आत्महत्या करते हैं। जापान के माउंट फूजी तलहटी में आवकिगोहारा के घने जंगल में जिस तरह से लोग आत्महत्या करने आते हैं, ठीक उसी तरह से मानसून की बोझिल रात में जतिंगा के आसमान पर मंडराने लगता है मौत का काला साया। रोशनी की ओर झुंड के झुंड पखेरू आते हैं और काल के गाल में समा जाते हैं। चिडिय़ों के इस प्रकार सामूहिक आत्महत्या के पीछे क्या कारण है इस बात का पता आज तक नहीं लगाया जा सका। इस बात का पता लगाने के लिए कई शोध हो चुके हैं, परंतु प्रकृति के इस गूढ़ रहस्य के बारे में अभी भी ठोस रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। असम के कछार स्थित इस घाटी के रहस्यों को जानना जरूरी है।
    8. भारत की गुफाएं : भारत में बहुत सारी प्राचीन गुफाएं हैं, जैसे बाघ की गुफाएं, अजंता- एलोरा की गुफाएं, एलीफेंटा की गुफाएं और भीम बेटका की गुफाएं। ये सभी गुफाएं किसने और कब बनाईं? इसका रहस्य अभी सुलझा नहीं है। अखंड भारत की बात करें तो अफगानिस्तान के बामियान की गुफाओं को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। भीमबेटका में 750 गुफाएं हैं जिनमें 500 गुफाओं में शैलचित्र बने हैं। यहां की सबसे प्राचीन चित्रकारी को कुछ इतिहासकार 35 हजार वर्ष पुराना मानते हैं, तो कुछ 12,000 साल पुरानी। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित पुरापाषाणिक भीमबेटका की गुफाएं भोपाल से 46 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। ये विंध्य पर्वतमालाओं से घिरी हुई हैं। भीमबेटका मध्यभारत के पठार के दक्षिणी किनारे पर स्थित विंध्याचल की पहाडिय़ों के निचले हिस्से पर स्थित है। पूर्व पाषाणकाल से मध्य पाषाणकाल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र रहा।
    9. तिब्बत का यमद्वार : प्राचीन काल में तिब्बत को त्रिविष्टप कहते थे। यह अखंड भारत का ही हिस्सा हुआ करता था। तिब्बत को चीन ने अपने कब्जे में ले रखा है। तिब्बत में दारचेन से 30 मिनट की दूरी पर है यह यम का द्वार। यम का द्वार पवित्र कैलाश पर्वत के रास्ते में पड़ता है। हिंदू मान्यता अनुसार, इसे मृत्यु के देवता यमराज के घर का प्रवेश द्वार माना जाता है। यह कैलाश पर्वत की परिक्रमा यात्रा के शुरुआती प्वाइंट पर है। तिब्बती लोग इसे चोरटेन कांग नग्यी के नाम से जानते हैं, जिसका मतलब होता है दो पैर वाले स्तूप। ऐसा कहा जाता है कि यहां रात में रुकने वाला जीवित नहीं रह पाता। ऐसी कई घटनाएं हो भी चुकी हैं, लेकिन इसके पीछे के कारणों का खुलासा आज तक नहीं हो पाया है। साथ ही यह मंदिरनुमा द्वार किसने और कब बनाया, इसका कोई प्रमाण नहीं है। ढेरों शोध हुए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका।
    10. भारत के विचित्र मानव : ऐसे कई लोग हैं जिनके बारे में दावा किया जाता है कि वे हजारों वर्षों से जीवित हैं। अश्वत्थामा, हनुमानजी, जामवंत, विभीषण, पराशुराम, महर्षि व्यास, कृपाचार्य, राजा बली आदि।
    भारत में देवहरा बाबा के बारे में दावा किया जाता है कि वे 750 वर्ष तक जिंदा रहे। उनकी मौत 1990 में हो गई थी। त्रैलंग स्वामी जिन्हें 'गणपति सरस्वतीÓ भी कहते हैं, उनकी उम्र 286 वर्ष की थी। त्रैलंग स्वामी का जन्म नृसिंह राव और विद्यावती के घर 1601 को हुआ था। वे वाराणसी में 1737-1887 तक रहे। इसी तरह शिवपुरी बाबा थे, जो 27 सितंबर 1826 में जन्मे और जनवरी 1963 में उन्होंने देह त्याग दी। बंगाल के संत लोकनाथजी का जन्म 31 अगस्त 1730 को हुआ और 3 जून 1890 को उन्होंने देह छोड़ दी।...इसी तरह महावतार बाबा के बारे में कहा जाता है कि वे पिछले 5000 वर्षों से जीवित हैं। सवाल लंबे काल तक जिंदा रहने का नहीं कई चमत्कारिक, सिद्ध, जादूगर और अजीब ही तरह के करतब बताने वाले लोग भी रहे हैं।

    धर्म संसार / शौर्यपथ / इसके बाद नारदजी शिशुपाल को उसके तीन जन्मों के बारे में बताते हैं। नारदजी बताते हैं कि सनक और सनंदन के श्राप के चलते जय और विजय आकाश से धरती की ओर गिरने लगे और फिर वे ऋषि कश्यप की पत्नी दिति के गर्भ से जुड़वा भाइयों के रूप में हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में जन्में। दोनों ही महाशक्तिशाली दैत्य थे और उनके कारण धरती पर अत्याचार और अन्याय का शासन स्थापित हो चला था। हिरण्याक्ष का वध श्रीहरि ने वराह रूप धारण करके किया तो हिरण्यकश्यप का वध नृसिंह अवतार धारण करके किया।
    इसके बाद नारदजी बताते हैं कि पुन: तुम दोनों का जन्म दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण के रूप में हुआ। तब श्रीहरि विष्णु ने राम बनकर पहले कुंभकर्ण और बाद में रावण का वध किया। रावण के रूप में तुम थे तो विजय कुंभकर्ण था। फिर नारदजी कहते हैं- अब यह तुम्हारा अंतिम जन्म था जिसमें तुम श्रीकृष्ण की बुआ के पुत्र शिशुपाल के रूप में जन्में और प्रभु ने अपने हाथों तुम्हें मानव शरीर से मुक्त करके तुम्हारा उद्धार किया। यह सुनकर जय अर्थात शिशुपाल पूछता है कि मुनिराज कृपया ये तो बताइये की इस जन्म में मेरा साथी विजय कहां है? इस पर नारदजी कहते हैं कि वह श्रीकृष्ण की बड़ी बुआ के पुत्र के रूप में दंतवक्र के रूप में तुम्हारे साथ ही इस धरती पर जन्मा था। शीघ्र ही वह भी भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मुक्ति पाएगा। यह सुनकर जय पूछता है- परंतु कब तक? तब नारदजी कहते हैं- जब पांडवों का राजसूय यज्ञ होने के पश्चात भगवान द्वारिका लौटेंगे जब वह द्वारिका पर आक्रमण करेगा तब परंतु अभी तो इंद्रप्रस्थ में ही भगवान उत्सव का आनंद ले रहे हैं। उनके साथ इंद्रप्रस्थ में पधारे हुए सभी अतिथिगण भी पांडवों का वैभव देखकर चकित हो रहे हैं।
    फिर उधर बलराम, दुर्योधन, द्रुपद आदि सहित सभी लोग इंद्रप्रस्थ के वैभव का अवलोकन करते हैं। उनके चमत्कारिक और जगमगाते महल को देखकर सभी अचंभित हो रहे होते हैं। शकुनि और दुर्योधन को समझ में नहीं आता है कि ये कैसा मायाजाल है। दुर्योधन संकेतों से शकुनि को आगे बढ़ने का कहता है।
    शकुनि एक महल के अंदर के एक कक्ष के द्वार
    पर खड़ा होकर कहता है- आओ चलो, चलो अंदर। तब जैसी ही दुर्योधन द्वार के अंदर जाने लगता है तो उससे टकरा जाता है। उसकी नाक पर लग जाती है। शकुनि भी कहता है- अरे भांजे। तब दुर्योधन हाथ लगाकर देखता है तो पता चलता है कि द्वार की जगह तो दीवार है जो द्वार जैसी दिखाई दे रही है। शकुनि भी भीतर जाने का प्रयास करता है तो टकरा जाता है। दोनों अचरज में पड़ जाते हैं तब शकुनि कहता है- चलो भांजे चलो, ये कैसी माया है।
    फिर वह दूसरे खुले दरवाजे के पास जाते हैं तो उन्हें लगता है कि यह भी भ्रम होगा जब वह उसमें जाने का प्रयास करते हैं तो गिरते गिरते बचते हैं क्योंकि असल में वह दरवाजा ही होता है दीवार नहीं। शकुनि कहता है- भांजे चलो। दोनों उसमें प्रवेश कर जाते हैं। वहां अदंर उन्हें भव्य महल नजर आता है जिसके ऊपर चारों ओर बालकनी रहती है और ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां भी होती है। उन्हें महल के बीचोबीच विशालकाय चमचमाता कालीन बिछा हुआ नजर आता है।

    वह कालीन के पास जाते हैं तो शकुनि कहता है इतना सोना। फिर आगे बढ़ने लगते हैं तो उन्हें अजीबसा नजर आता है। शकुनि कहता है- भांजे ये क्या अचंभा है ये पानी कहां से आ गया? उस जगह को तरणताल समझकर तब दोनों अपने वस्त्र ऊपर करके आगे बढ़ते हैं लेकिन जैसे ही पैर रखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि पानी जैसा दिखाई दे रहा हैं किंतु पानी नहीं है। इस पर शकुनि कहता है भांजे ये पानी है या पानी नहीं है? फिर वो दोनों पैरों से भूमि को ठोककर देखते हैं तो पानी महसूस नहीं होता है। तभी उन्हें बालकनी से महिलाओं के हंसी-ठिठोली की आवाज सुनाई देती है। फिर वे दोनों अपने वस्त्र (धौती) को नीचे करके निश्चिंत होकर चलने लगते हैं तभी आगे थोड़ी दूर चलकर वे एक पट्टेदार जगह पर खड़े होकर पीछे देखते हैं तो पानी गायब हो जाता है और उन्हें भूमि ही नजर आती है लेकिन ज्योंहि वह आगे देखते हैं तो उन्हें पुन: पानी नजर आता है।

    तब दुर्योधन असमंजस में पड़कर सकुचाकर कहता है- चुपचाप आगे चलिये मामाश्री। शकुनि कहता है- हां चलो भांजे चलो। दोनों आगे चलकर पुन: दूसरी पट्टेदार भूमि पर खड़े होकर पीछे देखते हैं तो उन्हें पानी नजर नहीं आता है और आगे देखते हैं तो पुन: तरणताल जैसा नजर आता है। फिर वह दोनों एक दूसरे की ओर देखकर हंसने लगते हैं और शकुनि कहता है- चलो भांजे चलो। तब जैसे ही दुर्योधन आगे कदम बढ़ाता है वैसे ही वह तरणताल में गिर जाता है और गिला हो जाता है। यह देखकर बालकनी में स्थित द्रौपदी अपनी सखियों के साथ यह दृश्य देखकर हंसने लगती है। शकुनि उसे हाथ पकड़कर बाहर निकालता है।
    बाहर निकलकर वह ऊपर देखता है कि द्रौपदी जोर-जोर से हंस रही है। भिगा हुआ खड़ा दुर्योधन कहता है- मामाश्री चलो यहां से। तभी द्रौपदी कहती है- देवरजी! ओ देवरजी ये हस्तिनापुर नहीं है जहां देखे बिना भी चल सकते हैं। ये तो इंद्रप्रस्थ के महल है जहां आंखें खोल कर चलना पड़ता है। ऐसा कहकर वह व्यंगात्मक हंसी हंसने लगती है। यह सुनकर दुर्योधन क्रोधित होकर कहता है- आज की हंसी तुझे महंगी पड़ेगी रानी, बहुत महंगी पड़ेगी। चलो मामाश्री। ऐसा कहकर दुर्योधन वहां से चला जाता है।
    उधर, श्रीकृष्ण और बलराम के साथ पांचों पांडवों को हंसते हुए बताया जाता है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं- अच्छा तो महाराज आज्ञा दें। मराजा युधिष्ठिर कहते हैं- अरे इतनी शीघ्रता भी क्या है? हम आपको अभी जाने नहीं देंगे कन्हैया। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- महाराज जाना तो होगा ही। कितने दिन हो गए हम दोनों द्वारिका से बाहर हैं, वहां की व्यवस्था भी तो संभालनी पड़ेगी। इस पर युधिष्ठिर कहते हैं कि परंतु मुझे आप दोनों को छोड़ने का जी नहीं करता। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि इसीलिए तो मैं दाऊ भैया को यहीं छोड़े जा रहा हूं और उनका भी मन है कि वे कुछ दिन यहीं ठहरें और उनके बदले में मैं अपने प्रिय सखा अर्जुन को ले जा रहा हूं।
    इस पर बलरामजी कहते हैं जाने दीजिये महाराज युधिष्ठिर कन्हैया को। वहां रुक्मिणी भी तो अधीर हो रही होगी। यह सुनकर सभी हंसने लगते हैं। फिर अर्जुन और श्रीकृष्ण को ‍वहां से द्वारिका के लिए विदा किया जाता है।

    इधर, शकुनि कहता है दुर्योधन से कि लो भांजे तुम्हारा काम तो बन गया। कृष्ण और अर्जुन दोनों द्वारिका चले गए हैं। अब तुम्हें बलराम मिल गए हैं और वह भी अकेले। वो यहीं पर रुके हुए हैं। तो बस अब पूरी तरह से बलराम की सेवा करो और उनकी खूब चापलूसी करो हां। चाहे जैसे भी हो तुम्हें उन्हें अपना गुरु बनाना ही होगा। भांजे यदि तुमने ऐसा कर लिया तो विजयश्री तुम्हारे भी भाल पर होगी हां। यह सुनकर दुर्योधन कहता है- ठीक है मामाश्री ठीक है।
    फिर जब बलरामजी यमुना किनारे ध्यान और संध्यावंदन कर रहे होते हैं तब शकुनि और दुर्योधन वहां पहुंच जाते हैं। ध्यान करने के बाद वे सूर्य को अर्ध्य देते हैं और फिर जब वे पलटकर पुन: लौटने लगते हैं तो देखते हैं कि उनके मार्ग में फूल बिछे हुए हैं। वो ये देखकर आश्चर्य से प्रसन्न हो जाते हैं। फिर वह फूलों पर कुछ दूर चलने के बाद कहते हैं- कोई है, कोई है? मेरी राहों में फूल बिछाकर मेरा सम्मान किया है, उस पर मैं प्रसन्न हूं। जिस व्यक्ति ने मेरा स्वागत किया है उसे मैं देखना चाहता हूं।

    कुछ देर बार दुर्योधन हाथ जोड़े उनके समक्ष उपस्थित होता है। यह देखकर बलरामजी कहते हैं- दुर्योधन तुम? तब दुर्योधन कहता है- हां बलराम भैया। तभी शकुनि भी पीछे से आकर कहता है- प्रणाम द्वारिकाधीश। स्वागत है आपका द्वारिकाधीश। तब बलराम कहते हैं कि परंतु ऐसा स्वागत करने की क्या जरूरत थी? तब शकुनि कहता है कि ऐसा स्वागत कुछ महान हस्तियों का ही किया जाता है द्वारिकाधीश। आप शायद जानते नहीं कि हस्तिनापुर का युवराज दुर्योधन आप ही की पूजा करता है। यह सुनकर दुर्योधन उनके चरणों में फूल अर्पित करके घुटने के बल बैठ जाता है। तब बलराम कहते हैं- अरे ये क्या कर रहे हो दुर्योधन? इस पर शकुनि कहता है ये तो अपने देवता की पूजा कर रहा है पूजा द्वारिकाधीश।
    फिर शकुनि भीम और श्रीकृष्ण के संबंध में बलरामजी से उल्टी-सीधी बातें करके उनके मन में शंका उत्पन्न करता है। वह कहता है कि भीम कह रहा था कि गदा युद्ध में मैं बलराम भैया से भी ज्यादा निपुण हो गया हूं और श्रीकृष्ण कह रहे थे कि बलराम भैया तो मुझे नाहक ही हर बात पर डांटते रहते हैं। फिर शकुनि कहता है कि सच तो ये है बलराम भैया द्वारिका की रक्षा तो आपन ही करते हैं आप ही द्वारिकाधीश है।...इस तरह शकुनि श्रीकृष्ण और बलरामजी के बीच दरार पैदा करने का प्रयास करता है।
    इस तरह दुर्योधन और शकुनि चापलूसी करके बलराम को गद्गद कर देते हैं और बलरामजी के मन में भीम के प्रति शंका भर देते हैं। तब अंत में बलरामजी दुर्योधन को गदा चलाना सिखाने के लिए तैयार हो जाते हैं। फिर दुर्योधन विधिवत रूप से बलरामजी को अपना गुरु बनाता है और फिर बलरामजी उसे गदा देकर कहते हैं कि तुम्हारा अध्ययन शीघ्र ही शुरु हो जाएगा शिष्य दुर्योधन।...जय श्रीकृष्णा।

    नजरिया / शौर्यपथ /नब्बे वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त, 1947 को हमारे देश को आजादी मिली थी। अंगे्रजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए जो कीमत और कुर्बानी हमारे पुरखों ने चुकाई है, वह हमारे लिए पे्ररणा का स्रोत है। लेकिन इस मौके पर यह जानना भी जरूरी है कि जो देश धर्म, दर्शन, कला और विज्ञान के क्षेत्र में शताब्दियों तक विश्व के मानचित्र पर चमकता रहा, वह गुलाम कैसे हो गया? आपसी फूट, विशेषकर यहां के शासकों तथा राजवंशों में पारस्परिक ईष्र्या, ऊंच-नीच के भेद, जनसमूह में राजनीतिक ज्ञान के अभाव, अर्थ-संचय, वैज्ञानिक उन्नति के प्रति उदासीनता, और इन सबसे बढ़कर हर स्थिति में चुपचाप बैठे रहने की प्रवृत्ति ने हमें पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों का गुलाम बना दिया। इसलिए गुलामी के इन कारणों को समझना जरूरी है, ताकि भविष्य में कभी देश गुलाम न हो।
    स्वाधीनता कभी-कभी भौतिक दुर्बलता के कारण हाथ से निकल जाती है, परंतु पराधीनता राष्ट्रीय चरित्र की दुर्बलता से उत्पन्न होती है। और जब पराधीन राष्ट्र में ठोकर खाते-खाते सोई हुई ऊंची भावनाएं जागती हैं, तब वह स्वतंत्रता का अधिकारी बनता है और उसकी प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। उसकी ऊंची भावनाएं त्याग और तपस्या के रूप में व्यक्त होती हैं। हमारा स्वाधीनता दिवस उन्हीं उदात्त भावनाओं, देशभक्तों के त्याग, तपस्या और बलिदान की वृत्ति का प्रतीक है। पर हमें नहीं भूलना चाहिए कि स्वाधीनता को प्राप्त करना कठिन होता है, उसको खो देना नहीं। इसलिए निरंतर सतर्कता स्वाधीनता का मूल्य है। अपनी स्वतंत्रता कायम रखने के लिए निरंतर सतर्क रहने की आवश्यकता है और स्वाधीनता का भार हरेक नागरिक पर है। चरित्र में कहीं भी दुर्बलता आना ‘स्वार्थ बुद्धि का बलवती होना, सत्य से डिग जाना’ यह सब व्यक्ति व राष्ट्र, दोनों के लिए घातक है।
    यह सच है कि स्वतंत्रता मिलने पर अपनी कमियों का पता चलता है। आज हमारा देश इस बात का अनुभव कर रहा है। प्राय: उन सभी चीजों की कमी है, जिनके सहारे कोई देश सम्मान पाता है। चीजों को खरीदने और बनाने के लिए संसाधन नहीं, विशेषज्ञ नहीं। आज जो राष्ट्र संपन्न हैं, वे और उन्नत होते जाएंगे और यदि हम शीघ्र उनके बराबर नहीं आ जाते, तो फिर हमारी स्वंतत्रता दबाव में रहेगी। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति ऐसी है कि नहीं कहा जा सकता कि शांति कब तक बनी रहेगी। राष्ट्रों में लोभ और भय के कारण इतनी तनातनी है कि किसी भी दिन, किसी भी कोने में लड़ाई छिड़ सकती है और जिस प्रकार, 1914 में सर्बिया की एक घटना ने महायुद्ध शुरू करा दिया था, उसी प्रकार एक चिनगारी आज महायुद्ध को जन्म दे सकती है, और अब जो महायुद्ध होगा, वह पहले से कहीं भीषण होगा। तात्पर्य यह कि हमें थोडे़ समय में अपने घर को संभालना है। यह काम असाधारण धैर्य, साहस और त्याग बुद्धि से ही हो सकता है। यदि भविष्य में राष्ट्र को कष्ट से मुक्त रखना है, तो आज प्रत्येक भारतीय को कष्ट सहने के लिए तैयार रहना होगा।
    हमारे यहां कई तरह की विचारधाराएं हैं, कई राजनीतिक दल हैं। लोगों को अपने विचारों के अनुसार समुदाय बनाने का पूरा अधिकार है। विचारों के विनिमय से सत्य का परिचय होता है। अपने विचारों से राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित करने का अधिकार भी सबको है। बिना ऐसी स्वतंत्रता के लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं चल सकती। परंतु हमें दो बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। एक, हममें सहिष्णुता होनी चाहिए। हमें यह मानना चाहिए कि जितना विचार स्वातंत्र्य हमको है, उतना ही दूसरों को है। दूसरी, विचार-विनिमय में विरोधी के व्यक्तित्व पर आक्षेप करना ऐसी कटुता उत्पन्न कर देता है, जो राष्ट्रीय जीवन को विषाक्त कर देता है।
    हमारी निजी स्वतंत्रता वहीं तक है, जहां तक वह राष्ट्र की स्वतंत्रता को बाधा नहीं पहुंचाती। हमारे आपसी मतभेदों से राष्ट्र की उन्नति में किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़नी चाहिए। चाहे जो भी दल शासनारूढ़ हो, उसको अपने सिद्धांतों के अनुसार काम के संचालन में तभी सुविधा होगी, जब देश संपन्न और बलवान होगा। प्रत्येक नागरिक और दल को इस संक्रमण काल में संकीर्ण घेरों से ऊपर उठना होगा। इस स्वतंत्रता दिवस के दिन हम यह संकल्प करें कि अपने राष्ट्र को सुखी, संपन्न और शक्तिशाली बनाने में हम अपनी ओर से हर प्रयास करेंगे।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) निरंकार सिंह, पूर्व सहायक संपादक, हिंदी विश्वकोश

     

    सम्पादकीयलेख / शौर्यपथ / कर सुधार की ओर भारत ने जो कदम उठाए हैं, वे जरूरी व स्वागतयोग्य हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में कराधान व्यवस्था को सुधारने के इरादे से जो घोषणाएं की हैं, उनसे टैक्स चुकाने वालों को निश्चित ही खुशी हो रही होगी। इन सुधारों का मुख्य लक्ष्य यदि ईमानदार करदाताओं को बढ़ावा देना है, तो इसकी जरूरत दशकों से महसूस की जा रही थी। अव्वल तो स्वयं प्रधानमंत्री ने बता दिया है कि 130 करोड़ लोगों के देश में केवल डेढ़ करोड़ कर चुकाते हैं। कर चुकाने की क्षमता इससे कहीं ज्यादा लोगों में होगी, लेकिन ज्यादातर लोग कमाई छिपाकर टैक्स चुकाने से बचते रहे हैं। कर वसूली की जो पुरानी या लगभग सामंती व्यवस्था रही है, उसमें कई बार कर चुकाने वाला भी कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। शहर या इलाके के आयकर अधिकारियों में बहुत ताकत होती है और वे अपना ‘टारगेट’ चुनने के लिए लगभग स्वतंत्र होते हैं। आयकर अधिकारियों की मनमानी और कई बार सरकारों की स्थानीय राजनीति के तहत भी आयकर चुकाने वाले नागरिक निशाने पर आ जाते हैं। अब नए दौर के हिसाब से हो रहे सुधारों से हम बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं।

    सरकार करों के फेसलेस मूल्यांकन अर्थात सीधे संपर्क के बिना ही कर निर्धारण की ओर जो कदम उठा रही है, उसमें व्यावहारिक पहलुओं पर विशेष ध्यान देना होगा। ठीक इसी तरह से कर चुकाने में कोई शिकायत होने पर फेसलेस अपील की सुविधा दी जा रही है, तो जाहिर है, ऑनलाइन सिस्टम को बहुत आसान रखना होगा। इसके साथ ही टैक्स चार्टर का जमीनी लाभ दिखना जरूरी है, ताकि बाकी लोग भी कर देने के लिए प्रेरित हों। प्रधानमंत्री ने देश के लोगों से आगे बढ़कर ईमानदारी के साथ कर देने का आह्वान किया है, तो इस जरूरत को भी समझा जा सकता है। कोरोना और आर्थिक सुस्ती की वजह से सरकार के राजस्व पर असर पड़ा है। सरकार को यह भी लग रहा है कि बुरे दौर में कर वसूली पिछले वर्षों के मुकाबले घटेगी, यह स्वाभाविक भी है, इसलिए सरकार यह सुधार लेकर आई है। राजस्व बढ़ाने का एक उपाय कर दायरा बढ़ाना होता है, पर आज देश जिस दौर में है, लोगों पर नए टैक्स नहीं लादे जा सकते। अत: वर्तमान करदाताओं को ईमानदारी से और पारदर्शी कर भुगतान की सुविधा देकर सरकार ठीक ही कर रही है। प्रधानमंत्री ने यह भी इशारा किया है कि कर सुधार एक सतत प्रक्रिया है, समय-समय पर सुधार होते रहे हैं, इससे संकेत मिलता है कि अभी अन्य कर सुधार भी संभव हैं।

    इसमें कोई शक नहीं कि ईमानदार करदाता की राष्ट्र-निर्माण में बड़ी भूमिका होती है। ईमानदार करदाता के जीवन को आसान बनाने के लिए अमेरिका और कुछ अन्य देशों में बेहतर प्रावधान हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कर चुकाने वालों की वक्त आने पर मदद करने की परंपरा है, जिसके तहत कोरोना के समय भी कर चुकाने वालों के लिए विशेष राहत, रियायत के प्रबंध किए गए हैं। भारत में भी ऐसे करदाताओं के बारे में सोचना चाहिए, जो वर्षों से कर चुका रहे थे, लेकिन इस बार रोजगार-धंधे के प्रभावित होने से नहीं चुका पा रहे हैं। करदाताओं को कर चुकाने में सुविधा-सम्मान देने के साथ अन्य प्रकार से भी प्रोत्साहित करने पर विचार करना चाहिए। कर मानव सभ्यता की पुरानी परंपरा है, यह जितनी सहज और शालीन हो, उतना अच्छा है।

     

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / शीर्ष अदालत ने अपने फैसले से एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि वह पिता की संपत्ति में बेटियों को भी बराबर का अधिकारी मानती है। इससे निश्चय ही बेटियों और बेटों में होने वाला भेदभाव कुछ हद तक कम हो सकेगा। सवाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नहीं, बल्कि यह है कि जब बेटियां सुरक्षित ही नहीं रहेंगी, तो संपत्ति का भला क्या लाभ? जिस तरह से आए दिन बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि वर्तमान परिवेश में बेटियों को संपत्ति से ज्यादा सुरक्षा की जरूरत है। छोटे शहर हों या महानगर, ग्रामीण इलाके हों या शहरी क्षेत्र, हर जगह बेटियों पर जुल्म बढ़े हैं। दिल्ली में 12 वर्षीया बच्ची के साथ दरिंदगी होती है, तो बुलंदशहर में राह चलते छेड़खानी, ये घटनाएं बताती हैं कि बेटियों को सुरक्षा देने में हमारी सरकार, समाज और कानून बुरी तरह विफल रहे हैं। विधायिका, न्यापालिका और कार्यपालिका को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए और बेटियों के अनुकूल समाज बनाना चाहिए।
    प्रत्यूष आनंद, नवादा, बिहार

    जिम्मेदार बनें हम
    देश के दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मंगलवार की अपनी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अधिक से अधिक जांच पर जोर दिया। यह बताता है कि कोरोना महामारी से निपटने में यह कदम किस हद तक कारगर है। उन्होंने उन राज्यों को खासतौर से जांच की रफ्तार और दायरा बढ़ाने की अपील की, जहां संक्रमण-दर और मृत्यु-दर अधिक हैं। सरकार की गंभीरता जनहित में उचित है, लेकिन हम भारतीयों को जैसे ही छूट मिलती है, हमारा ‘इम्यून सिस्टम’ उछल-कूद मचाने लगता है और हम पाबंदियों की परवाह किए बिना अपने पुराने ढर्रे पर आकर आस-पड़ोस और मोहल्ले में कोरोना का ‘निमंत्रण-पत्र’ बांटने लगते हैं। इसीलिए सरकारों व प्रशासन को उन पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, जो दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हैं। ऐसा करने पर ही हम इस महामारी का मुकाबला कर सकेंगे।
    सुभाष बुड़ावन वाला
    रतलाम, मध्य प्रदेश

    अलविदा इंदौरी साहब
    ‘सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है...’ इस तरह की वीरोचित और न्यायपरक पंक्तियां लिखने वाले राहत इंदौरी साहब अब हमारे बीच नहीं हैं। वह हमेशा के लिए रुखसत हो गए। उनका पूरा जीवन एक ऐसे आदमी की अत्यंत संघर्षमय कहानी है, जो अपने अदम्य साहस और जीवटता से शून्य से शिखर तक पहुंचता है। उन्होंने अपनी बेखौफ अभिव्यक्ति से देश के आमजन, मजदूर, किसान, गरीब आदि को आवाज दी। यही वजह है कि वह हर किसी के अजीज बन गए। उनका यूं जाना इसलिए ज्यादा खलता है, क्योंकि अभी देश पर भय और दहशत की एक विचित्र धुंध छाई हुई है। निश्चय ही, वह अपनी शायरी से हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे।
    निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

    सख्त कार्रवाई हो
    दुनिया कितनी आगे निकल गई है, किंतु हम अब भी छोटी-छोटी बातों पर सौहार्द बिगाड़ देते हैं और जनजीवन अस्त-व्यस्त कर देते हैं। समाज के समझदार लोगों को ऐसे वक्त में तुरंत आगे आना चाहिए और नासमझों को समझाने के प्रयास कर उद्वेलित भावनाएं शांत करनी चाहिए। सरकार तो कानून-व्यवस्था के जरिए अमन स्थापित करती ही है। सवाल यह है कि क्या मिला उन लोगों को, जिन्होंने कतिपय लोगों की भावनाएं उद्वेलित कर शांत बेंगलुरु को अशांत कर डाला? एक गलती करे और पूरा शहर उसे भुगते, यह किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं। भविष्य में ऐसी गलती न हो, इसका ख्याल समाज के जिम्मेदार लोगों और सरकार, दोनों को रखना होगा। देशहित व जनहित में यह जरूरी है।
    महेश नेनावा, इंदौर, मध्य प्रदेश

     

    ओपिनियन / शौर्यपथ /अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण के शुभारंभ को समूचे भारत और विश्व भर में फैले भारतीय मूल के लोगों और भारत प्रेमियों ने जी भरकर देखा। अगणित लोगों को यह दृश्य एक स्वप्नपूर्ति का अनुभव और आनंद दे गया। लंबे संघर्ष के बाद यह महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त हुई है। असंख्य भारतीयों के चेहरों पर समाधान का तेज और आंखों में हर्ष के आंसू भी देखने को मिले। कई लोगों के लिए यह कार्य-पूर्ति का क्षण था, परंतु वास्तव में यह कार्यारंभ का क्षण है।
    भारत में धर्म और सामाजिक जीवन एक-दूसरे से भिन्न नहीं देखे गए हैं। सभी समान हैं। ऐसी भारतीय मान्यता है, और इसे भारत जीता भी आया है। ‘युबांतु’ एक अफ्रीकी संकल्पना है। उसका अर्थ है, ‘मैं हूं, क्योंकि हम हैं’। मैं, मेरा परिवार, ग्राम, राज्य, राष्ट्र, मानवता, मानवेतर जीव सृष्टि, निसर्ग, ये सभी परस्पर जुड़ी हुई क्रमश: विस्तारित होने वाली विभिन्न इकाइयां हैं, यही एकात्म है। इनमें परस्पर संघर्ष नहीं, समन्वय है; स्पद्र्धा नहीं, संवाद है। इन सभी इकाइयों का समुच्चय हमारा जीवन है। ये सब हैं, इसीलिए हम सब हैं। इनके बीच का संतुलन धर्म है और यह संतुलन बनाए रखना ही धर्म स्थापना है। सैकड़ों वर्षों तक भारत सर्वाधिक समृद्ध देश था। सामथ्र्य संपन्न होने पर भी भारत ने अन्य देशों पर युद्ध नहीं लादे। व्यापार के लिए दुनिया के सुदूर कोनों तक जाने के बावजूद भारत ने न उपनिवेश बनाए, न उनका शोषण किया; न उन्हें लूटा, न ही उनका धर्म-परिवर्तन किया और न उन्हें गुलाम बनाकर उनका सौदा किया। भारत में मंदिर आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ श्रेष्ठ लोकाचार और आर्थिक समृद्धि के कारण रहे हैं और केंद्र भी।
    1951 मे सोमनाथ मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा करते समय भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के भाषण में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वह कहते हैं, ‘इस पुनीत अवसर पर हम सबके लिए यही उचित है कि हम आज इस बात का व्रत लें कि जिस प्रकार हमने आज अपनी ऐतिहासिक श्रद्धा के इस प्रतीक में फिर से प्राण-प्रतिष्ठा की है, उसी प्रकार हम अपने देश के जन-साधारण के उस समृद्धि मंदिर में भी प्राण-प्रतिष्ठा पूरी लगन से करेंगे, जिस समृद्धि मंदिर का एक चिन्ह सोमनाथ का पुराना मंदिर था।... साथ ही सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण तब तक मेरी समझ में पूरा नहीं होगा, जब तक कि इस देश की संस्कृति का स्तर इतना ऊंचा न हो जाए कि यदि कोई आज का अलबरूनी हमारी वर्तमान स्थिति को देखे, तो हमारी संस्कृति के बारे मे दुनिया को वही बताए, जो भाव उसने उस समय प्रकट किए थे’। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर स्वदेशी समाज में लिखते हैं, ‘हम वास्तव में जो हैं, वही बनें। ज्ञानपूर्वक, सरल और सचल भाव से, संपूर्ण रूप से हम अपने आपको प्राप्त करें।’
    वर्ष 1987 में राम-जानकी रथ यात्रा चल रही थी, तब सरसंघचालक बालासाहब देवरस से एक कार्यकर्ता ने पूछा- गौ हत्या प्रतिबंध का आंदोलन, कश्मीर के 370 में सुधार आदि विषय, मांग करके हमने छोड़ दिए, ऐसा लगता है। क्या राम मंदिर के विषय में भी वैसा ही होगा? तब बालासाहब देवरस का उत्तर था, ‘हम इसी निमित्त राष्ट्रीय जागरण करते हैं। यह जागरण सतत किसी न किसी निमित्त से करते रहना चाहिए। आज हिंदू समाज की राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर बहुत नीचा है। इसी कारण ये सारी समस्याएं हैं। जिस दिन संपूर्ण समाज की राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर पर्याप्त उन्नत होगा, तब हो सकता है, इन सभी विषयों के समाधान एक साथ हो जाएं’।
    मैल्कॉम ग्लेडवेल की पुस्तक टिपिंग प्वॉइंट : हाउ लिटिल थिंग कैन मेक अ बिग डिफरेंस की व्याख्या वह यूं करते हैं, ‘टिपिंग प्वॉइंट वह बिंदु है, जिस पर छोटे परिवर्तन या घटनाओं की एक शृंखला पर्याप्त महत्वपूर्ण हो जाती है, जिससे बडे़, अधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं’। आज बालासाहब के शब्दों का स्मरण करते हुए लगता है कि उस भाव को व्यक्त करते समय क्या उनका संकेत टिपिंग प्वॉइंट की ओर था?
    संघ के ज्येष्ठ प्रचारक और चिंतक दत्तोपंत ठेंगड़ी एक बात हमेशा कहा करते थे, ‘समाज में कुछ लोगों का राष्ट्रीय दृष्टि से जागृत और खूब सक्रिय होना शाश्वत परिवर्तन नहीं लाता है। जब सामान्य व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना का स्तर थोड़ा भी ऊंचा उठता है, तब बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं। इसलिए समय-समय पर कुछ मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय जागरण के प्रयास सतत करते रहने से ही धीरे-धीरे सामान्य व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना का स्तर ऊंचा उठेगा। इन सबके सम्मिलित प्रभाव से राष्ट्रहित के अनेक छोटे-बड़े महत्व के अन्य आवश्यक कार्य सहज होते जाएंगे’।
    लगता है, बालासाहब देवरस और ठेंगड़ी जी द्वारा वर्णित वह ‘टिपिंग प्वॉइंट’ निकट आ रहा है, रवींद्रनाथ ठाकुर का वह स्वदेशी समाज सक्रिय हो रहा है। राष्ट्र जीवन के अनेक क्षेत्रों में, अनेक वर्षों से लंबित राष्ट्रहित के मूलभूत परिवर्तन एक के बाद एक हो रहे हैं। देश की रक्षा नीति और विदेश नीति में मूलभूत परिवर्तन विश्व अनुभव कर रहा है। विकेंद्रित और कृषि आधारित अर्थ नीति के आधार पर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का संकल्प प्रकट हो रहा है। भारत की जड़ों से जुड़कर विश्व के आकाश को आगोश में लेने के लिए ऊंची उड़ान भरने वाले पंख देने वाली नई शिक्षा नीति की घोषणा हुई है। समाज के स्वयं के उद्यम और नवाचारों को प्रोत्साहन मिलने का वातावरण बन रहा है। यह सारा एक साथ होता नजर आ रहा है। इस परिवर्तन को 2014 से हुए केंद्रीय सत्ता परिवर्तन के साथ जोड़कर देखना स्वाभाविक है। 16 मई, 2014 के दिन चुनाव परिणामों की घोषणा होने का बाद 18 मई रविवार के संडे गार्जियन के महत्वपूर्ण संपादकीय में एक मूलभूत और गहरी बात कही गई थी, ‘यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारतीय समाज में अंतर्निहित परिवर्तनों की वजह से ही नरेंद्र मोदी आए हैं, किसी दूसरे तरीके से नहीं’। राष्ट्रीय चेतना के सामान्य स्तर के ऊंचा उठने के कारण ही सभी प्रकार के इष्ट परिवर्तन शुरू हुए हैं और सत्ता परिवर्तन भी उसी का भाग है।
    अपना दायित्व निभाने के लिए भारत वर्ष अपनी चिर-परिचित शक्ति के साथ खड़ा हो रहा है। अब तक रुके हुए या रोके गए सभी आवश्यक कार्य होना शुरू हो गए हैं। संपूर्ण समाज को सजग रहकर सक्रिय होना होगा। यह वही आत्म-आभास है, जिससे जरूरी आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता अवश्यंभावी है। एक संघ गीत में कहा गया है, अरुणोदय हो चुका वीर, अब कर्मक्षेत्र में जुट जाएं, अपने खून-पसीने द्वारा नवयुग धरती पर लाएं।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) मनमोहन वैद्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर कार्यवाह

     

    राजनांदगांव / शौर्यपथ / गांवों में स्वच्छता को बढ़ावा देने राज्य स्तर से स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) योजना अंतर्गत चार करोड़ 34 लाख रूपए के पुरस्कार दिए जाएंगे। ग्राम पंचायतों और प्रतिभागियों को गांधी जयंती पर 2 अक्टूबर को पुरस्कृत करेंगे। राज्य स्वच्छता पुरस्कार-2020 के तहत स्वच्छ सुंदर शौचालय पुरस्कार के प्रत्येक विजेता हितग्राही को 5001 रूपए का पुरस्कार दिया जाएगा। इसके लिए जिला स्तर पर दस-दस हितग्राहियों का चयन किया जाएगा। स्वच्छ सुंदर सामुदायिक शौचालय पुरस्कार जिला एवं राज्य स्तर पर दिए जाएंगे। जिला स्तर की विजेता ग्राम पंचायत को 21 हजार रूपए और राज्य स्तरीय विजेता पंचायत को एक लाख रूपए की पुरस्कार राशि दी जाएगी। राज्य स्तर पर उत्कृष्ट सेग्रिगेशन शेड के लिए चयनित ग्राम पंचायत को एक लाख रूपए दिए जाएंगे। माहवारी स्वच्छता प्रबंधन के लिए दो श्रेणियों में विजेताओं का चयन किया जाएगा। जिला स्तर की विजेता पंचायत को 21 हजार रूपए और राज्य स्तरीय विजेता को 51 हजार रूपए के पुरस्कार से नवाजा जाएगा।
    विद्यार्थियों में भी स्वच्छता के प्रति जागरूकता लाने स्कूलों के माध्यम से उत्कृष्ट निबंध सृजन प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। जिला स्तर पर पूर्व माध्यमिक और हाईस्कूल दो अलग-अलग वर्गों में आयोजित इस प्रतियोगिता के दोनों वर्गों के विजेताओं को 21 हजार रूपए प्रथम पुरस्कार, 11 हजार रूपए द्वितीय पुरस्कार और पांच हजार रूपए तृतीय पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। जिला स्तर पर आयोजित उत्कृष्ट नारा लेखन प्रतियोगिता के तीन विजेताओं को 21 हजार रूपएए 11 हजार रूपए और पांच हजार रूपए की पुरस्कार राशि दी जाएगी। दीवार लेखन प्रतियोगिता के तहत जिला स्तर पर स्वच्छाग्रही या स्वसहायता समूह के प्रतिभागियों द्वारा दस सर्वश्रेष्ठ लेखन को प्रत्येक को पांच हजार रूपए का पुरस्कार दिया जाएगा।
    प्लास्टिक मुक्त ग्राम पंचायतों को जिला एवं राज्य स्तर पर पुरस्कृत किया जाएगा। जिला स्तरीय विजेता को 21 हजार रूपए और राज्य स्तरीय विजेता को एक लाख रूपए का पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत काम कर रहे स्वसहायता समूहों में से उत्कृष्ट स्वच्छाग्रही समूह पुरस्कार के जिला स्तरीय विजेता को 21 हजार रूपए एवं राज्य स्तरीय विजेता को 51 हजार रूपए की पुरस्कार राशि दी जाएगी। राज्य स्तर पर उत्कृष्ट बायोगैस संयंत्र पुरस्कार की विजेता ग्राम पंचायत को 51 हजार रूपए दिए जाएंगे। एस.ई.सी.एल. की सहायता से संचालित दिव्यांगों के लिए सामुदायिक शौचालय निर्माण की पायलट परियोजना के अंतर्गत तीन सर्वश्रेष्ठ ग्राम पंचायतों को ढाई लाख रूपए, डेढ़ लाख रूपए और एक लाख रूपए के पुरस्कार से नवाजा जाएगा।
    सामुदायिक शौचालय के उत्कृष्ट ड्राइंग-डिजायन प्रतियोगिता के तहत तीन वर्गों में पुरस्कार दिए जाएंगे। राज्य स्तरीय इस प्रतियोगिता में साढ़े तीन लाख रूपए, साढ़े चार लाख रूपए और साढ़े पांच लाख रूपए लागत के सामुदायिक शौचालय का उत्कृष्ट ड्राइंग-डिजाइन प्रस्तुत करने वाले एक-एक आर्किटेक्ट या इंजीनियर को 51 हजार रूपए का पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। सेग्रिगेशन शेड का उत्कृष्ट ड्राइंग-डिजाइन बनाने वाले तीन विजेताओं को राज्य स्तर पर 21 हजार रूपए, 11 हजार रूपए और पांच हजार रूपए के पुरस्कार दिए जाएंगे। गांव को स्वच्छ बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ कार्ययोजना (Best working plan) सुझाने वाले तीन व्यक्तियों को 21 हजार रूपए, 11 हजार रूपए और पांच हजार रूपए के पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इसी तरह से ग्रामीण स्वच्छता के संबंध में सर्वश्रेष्ठ नवाचार का सुझाव देने वाले तीन प्रतिभागियों को 21 हजार रूपए, 11 हजार रूपए और पांच हजार रूपए के पुरस्कार दिए जाएंगे।
    इन प्रतिस्पर्धात्मक पुरस्कारों के साथ ही प्रदेश के एक जिले को एक करोड़ रूपए का स्वच्छता स्थायित्व पुरस्कार, तीन विकासखंडों को 50-50 लाख रूपए और पांच ग्राम पंचायतों को 20-20 लाख रूपए के पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इन पुरस्कारों के लिए आवेदन 30 जुलाई से लिए जाएंगे। प्रविष्टि जमा करने की अंतिम तिथि 15 अगस्त रखी गई है। प्रविष्टि निर्धारित प्रारूप में आवेदन और फोटो के साथ संबंधित जनपद पंचायत के माध्यम से भेजी जा सकती हैं।
    सामुदायिक शौचालय के उत्कृष्ट ड्राइंग-डिजायन प्रतियोगिता, सेग्रिगेशन शेड के उत्कृष्ट ड्राइंग-डिजाइन प्रतियोगिता, गांव को स्वच्छ रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ कार्ययोजना Best working plan और ग्रामीण स्वच्छता के संबंध में सर्वश्रेष्ठ नवाचार के सुझाव के लिए प्रविष्टि स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के राज्य कार्यालय को भेजना होगा। अलग-अलग पुरस्कारों के लिए प्राप्त प्रविष्टियों के अंतर्विकासखंड दल, अंतर्जिला दल और राज्य स्तरीय दल या एजेंसी द्वारा भौतिक सत्यापन के बाद विकासखंड स्तरीय, जिला स्तरीय एवं राज्य स्तरीय पुरस्कार चयन समिति द्वारा विजेताओं का चयन किया जाएगा।

    राजनांदगांव / शौर्यपथ / कलेक्टर टोपेश्वर वर्मा ने आगामी त्यौहार को देखते हुए कोविड-19 की रोकथाम एवं जीवन की सुरक्षा के लिए सभी नागरिकों को सजगता और सतर्कता रखने कहा है। उन्होंने कहा है कि कोरोना प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने के कारण जिले में दो सब्जी विक्रेताओं की मृत्यु हो गई है।
    उन्होंने नागरिकों से अपील करते हुए कहा है कि भीड़ वाली जगहों में जाने से बचें। मास्क का प्रयोग करें एवं सोशल डिस्टेसिंग में रहे। सेनेटाईजर का उपयोग करें एवं हाथ को बार-बार साबुन से धोते रहे तथा स्वच्छता बनाए रखे। कोविड-19 के प्रोटोकॉल का पालन कर जिम्मेदार नागरिक का फर्ज निभाएं।

    राजनांदगांव / शौर्यपथ / भारत निर्वाचन आयोग द्वारा फोटोयुक्त निर्वाचक नामावलियों का विशेष संक्षिप्त पुर्नरीक्षण अर्हता 1 जनवरी 2021 का पुर्नरीक्षण संशोधित कार्यक्रम जारी किया गया है। जिसके अनुसार 16 नवम्बर 2020 को मतदाता सूची का प्रारंभिक प्रकाशन किया जाएगा। 16 नवम्बर 2020 से 15 दिसम्बर 2020 तक दावा-आपत्ति लिए जाएंगे। 5 जनवरी 2021 को निर्वाचक रजिस्टीकरण अधिकारी द्वारा प्राप्त दावा-आपत्ति का निराकरण किया जाएगा एवं 15 जनवरी 2021 को मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन किया जाएगा।
    जिन नागरिकों की उम्र अर्हता तिथि 1 जनवरी 2021 को 18 वर्ष पूर्ण हो जाएगी, वे अपना नाम मतदाता सूची में जोडऩे हेतु प्रारूप-6 के माध्यम से अपने समीप के मतदान केन्द्र में आवेदन पत्र प्रस्तुत कर सकते हैं। जिन मतदाताओं की मृत्यु हो गई है या अपने मतदान केन्द्र से बाहर निवास कर रहे हैं, शादी होकर ससुराल चले गए हैं, ऐसे मतदाता का नाम प्रारूप-7 के माध्यम से विलोपित किया जाएगा। मुद्रण त्रुटियों के लिए प्रारूप-8 के माध्यम से मुद्रण त्रुटियों के संशोधन हेतु आवेदन पत्र प्रस्तुत कर सकते हैं।

    सेहत / शौर्यपथ / अदरक एक ऐसी जड़ीबूटी है, जिसका आयुर्वेद की दुनिया में कई हजारों सालों से इस्तेमाल किया जा रहा है. हां, ये केवल एक ऐसी ही जड़ीबूटी नहीं है, जो आपके खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाती है. ये एक स्वास्थ्यवर्धक जड़ीबूटी है, जो आपको स्वस्थ रखने में मदद करती है. हालांकि, क्या आप जानते हैं कि आपके बालों के लिए अदरक बहुत ही लाभकारी होती है.

    अदरक की ही तरह इसका रस भी बेहद लाभकारी होता है और इसमें बहुत से जरूरी न्यूट्रीएंट्स होते हैं, जो आपके बालों को बढ़ाते हैं. तो चलिए आपको बताते हैं कि अदरक का रस बालों को कैसे बढ़ाता है और किस तरह से बालों के लिए फायदेमंद होता है.

    बालों को बढ़ाने के लिए फायदेमंद क्यों होता है अदरक का रस
    अदरक में जरूरी विटामिन्स और मिनरल्स होते हैं. जैसे मैगनीशियम, पोटैशियम और फॉसफोरस, जो आपकी स्कैल्प को जरूरी पोषण देते हैं और बालों को बढ़ने में मदद करते हैं. इस वजह से पारंपरिक तौर पर बहुत से लोग पहले से ही अदरक का इस्तेमाल बालों को बढ़ाने के लिए करते आ रहे हैं.

    अदरक के रस में एंटी इंफ्लामेटरी और एंटीमाइक्रोबायल प्रोपर्टीज होती हैं जो स्कैल्प में खून का सर्कुलेशन बढ़ाते हैं और हेयर फॉलिसेल्स को स्टिम्यूलेट करते हैं, ताकि आपके बाल बढ़ सकें. कई बार बालों के झड़ने का मुख्य कारण डैंडरफ होता है. जब आपका स्कैल्प अस्वस्थ होता है तो उससे आपके सिर में डैंडरफ हो जाता है. अदरक के रस में मौजूद एंटीफंगल प्रोपर्टीज आपकी स्कैल्प को साफ रखती हैं.

    इस वजह से अदरक का रस बालों को बढ़ने में मदद करता है और आपको भी इन 4 तरीकों से अदरक के रस का इस्तेमाल करना चाहिए.

    1. अदरक का रस
    आप चाहें तो अदरक के रस को सीधे अपनी स्कैल्प पर लगा सकते हैं और उन्हें मजबूत और स्वस्थ बना सकते हैं.

    आपको चाहिए
    - एक ताजी अदरक,
    - एक कॉटन पैड

    ऐसे करें इस्तेमाल
    - एक कटोरी में अदरक का रस निकाल लें.
    - अब इस रस को अपने बालों की स्कैल्प पर कॉटन बॉल की मदद से लगाएं. इस रस को अपनी स्कैल्प पर लगाएं. ध्यान रहे कि आप इसे अपने बालों में न लगाएं.
    - अब कम से कम आधे घंटे तक इसे बालों में लगे रहने दें.
    - शैंपू से अपने बाल धो लें.
    - इसके बाद कंडिशनर लगाएं.
    - बेहतर नतीजों के लिए हफ्ते में कम से कम तीन बार इसका इस्तेमाल करें.

    2. अदरक का रस, ऑलिव ऑयल, नींबू का रस
    बालों को शाइनी और स्मूथ बनाने के लिए ऑलिव ऑयल बेहद ही लाभकारी होता है. ये आपकी स्कैल्प को मोइश्चराइज रखता है और बालों को ड्राय होने से बचाता है. वहीं नींबू का रस विटामिन सी का अच्छा स्त्रोत है. इसमें एंटीऑक्सिडेंट्स ब हैं, जो स्कैल्प पर कोलॉजेन के प्रोडक्शन को बूस्ट करता है.

    आपको चाहिए
    - 2 टेबलस्पून अदरक का रस
    - 3 टेबलस्पून ऑलिव ऑयल
    - आधा टीस्पून नींबू का रस

    ऐसे करें इस्तेमाल
    - एक कटोरी में तीनों चीजों को मिला लें.
    - अब इस मिक्स्चर को अपने स्कैल्प पर लगाएं.
    - इसे 30 मिनट के लिए स्कैल्प पर लगा छोड़ दें और फिर अपने बाल धो लें.
    - हफ्ते में एक से दो बार इस नुस्खे का इस्तेमाल करें.

    3. अदरक का रस, नारियल का तेल और लहसून
    नारियल के तेल का इस्तेमाल बहुत सी महिलाएं अपने बालों को स्वस्थ रखने के लिए करती होंगी. इसमें अधिक मात्रा में लॉरिक एसिड, होता है, जो बालों को डैमेज होने से बचाता है और बालों को बढ़ाता है. वहीं लहसून भी बालों के लिए काफी अच्छा होता है. नारियल के तेल में विटामिन बी, सी और लॉरिक एसिड होता है, जो स्कैल्प को नरिश करता है.

    आपको चाहिए
    - 1 टीस्पून अदरक का जूस
    - 4 टीस्पून नारियल का तेल
    - 3 लहसून की तुरी
    - 6 टीस्पून नारियल का दूध
    - 2 टीस्पून शहद

    ऐसे करें इस्तेमाल
    - एक कटोरी में सब चीजों को मिला लें.
    - अब इसे अपनी स्कैल्प पर लगाएं.
    - कम से कम 30 मिनट के लिए इसे लगा छोड़ दें.
    - अब अपने बालों को अच्छे से धो लें.
    - बेहतर नतीजों के लिए इस नुस्खें का हफ्ते में एक बार इस्तेमाल करें.

    4. अदरक का रस और तिल का तेल
    विटामिन ई और बी, प्रोटीन और मिनरल से भरपूर तिल ता तेल बालों को अंदर तक नरिश करता है और बालों को बढ़ने में मदद करता है.

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