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कांग्रेस नेतृत्व वाले ढ्ढहृष्ठढ्ढ्र गठबंधन ने सौंपा नोटिस, 118 सांसदों के हस्ताक्षर — लेकिन आज तक कोई स्पीकर पद से नहीं हटाया जा सका
नई दिल्ली / एजेंसी /
भारतीय संसद के इतिहास में एक बार फिर संवैधानिक और राजनीतिक भूचाल आ गया है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी दलों (ढ्ढहृष्ठढ्ढ्र गठबंधन) ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ उन्हें पद से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव (क्रद्गद्वश1ड्डद्य रूशह्लद्बशठ्ठ) का औपचारिक नोटिस लोकसभा सचिवालय को सौंप दिया है। यह आज़ाद भारत के संसदीय इतिहास में चौथा अवसर है, जब किसी लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ ऐसा कदम उठाया गया हो।
विपक्ष ने यह नोटिस संविधान के अनुच्छेद 94(ष्) के तहत दिया है। प्रस्ताव पर 118 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिनमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (स्क्क) और ष्ठरू्य शामिल हैं। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस (ञ्जरूष्ट) ने फिलहाल इस प्रस्ताव से दूरी बनाते हुए "संयम" की रणनीति अपनाई है।
?? विपक्ष के गंभीर आरोप
विपक्ष का आरोप है कि लोकसभा अध्यक्ष का आचरण पक्षपातपूर्ण है और
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जा रहा,
सदन की कार्यवाही सत्ता पक्ष के पक्ष में एकतरफा ढंग से चलाई जा रही है,
8 विपक्षी सांसदों के निलंबन पर त्वरित कार्रवाई की गई, जबकि बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के मामले में कोई कदम नहीं उठाया गया,
प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़े विषय पर विपक्ष की महिला सांसदों पर की गई टिप्पणियों को लेकर भी गहरी नाराजगी जताई गई है।
?? स्पीकर का फैसला और तकनीकी विवाद
नोटिस दिए जाने के बाद ओम बिरला ने नैतिक आधार पर बड़ा फैसला लेते हुए कहा है कि जब तक इस प्रस्ताव का निपटारा नहीं हो जाता, वे सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करेंगे।
इधर, इस पूरे घटनाक्रम में एक तकनीकी चूक भी सामने आई है—नोटिस में वर्ष 2026 की जगह 2025 लिखे जाने को लेकर सत्तापक्ष ने विपक्ष पर तंज कसा है।
??? आगे की संवैधानिक प्रक्रिया
संविधान के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए
14 दिन का पूर्व नोटिस अनिवार्य है,
इसके बाद यदि कम से कम 50 सांसद समर्थन देते हैं, तो प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान हो सकता है।
सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव पर बजट सत्र के दूसरे चरण में 9 मार्च के आसपास चर्चा संभव है।
??? सरकार का पलटवार
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्ष के कदम को राजनीतिक स्टंट बताते हुए कहा कि
"विपक्ष के पास इसे पारित कराने के लिए संख्या बल नहीं है। यह प्रस्ताव पहले की तरह असफल होगा।"
?? इतिहास की कसौटी पर प्रस्ताव
भारतीय संसदीय इतिहास गवाह है कि—
1954 में जी.वी. मावलंकर,
1966 में सरदार हुकम सिंह,
1987 में बलराम जाखड़
के खिलाफ भी ऐसे नोटिस लाए गए, लेकिन एक भी प्रस्ताव सफल नहीं हुआ।
?? महत्वपूर्ण तथ्य:
भारत के विधायी इतिहास में आज तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को अविश्वास/हटाने के प्रस्ताव के जरिए पद से नहीं हटाया जा सका है।
?? निष्कर्ष
10 फरवरी 2026 को लाया गया यह नोटिस न केवल सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव का प्रतीक है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या संसदीय परंपराएं राजनीति की आग में झुलस रही हैं?
अब सबकी निगाहें संसद पर टिकी हैं—
क्या इतिहास बदलेगा या एक बार फिर परंपरा ही जीतेगी?
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
