July 25, 2026
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    दुर्ग नगर निगम: ऑनलाइन और ऑफलाइन टेंडर का 'अजब खेल', शासन के राजस्व को करोड़ों की चपत! Featured

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    दुर्ग। नगर पालिक निगम दुर्ग इन दिनों भ्रष्टाचार के नए प्रतिमान गढ़ रहा है। निगम प्रशासन में 'शहरी सरकार' की मिलीभगत और ठेकेदारों की 'सेटिंग' का ऐसा खेल चल रहा है, जिसने ऑनलाइन और ऑफलाइन टेंडरिंग की पारदिर्शता को एक मजाक बना दिया है। ताज्जुब की बात यह है कि जहाँ ऑनलाइन प्रक्रिया से सरकार को लाखों का फायदा हो रहा है, वहीं ऑफलाइन के नाम पर निगम की तिजोरी को खुलेआम चूना लगाया जा रहा है।

    ऑनलाइन में 20% 'Below', ऑफलाइन में 20% 'Above': कैसा है यह दोहरा मापदंड?

    निगम के गलियारों में चर्चा है कि हाल ही में जारी करोड़ों रुपए के कार्यों की निविदाओं में भारी विसंगति है। तथ्य चौंकाने वाले हैं—वही ठेकेदार जो ऑनलाइन टेंडर में कार्य पाने के लिए 10 से 20 प्रतिशत 'बिलो' (Below) रेट पर आवेदन कर रहे हैं, वही ऑफलाइन निविदाओं में 10 से 20 प्रतिशत 'एबव' (Above) रेट हासिल करने के लिए कतार में सबसे आगे खड़े हैं।

    यह सीधा और सत्यापित सत्य है कि जहाँ ऑनलाइन टेंडर से शासन के राजस्व की बचत हो रही है, वहीं ऑफलाइन टेंडर के जरिए 'टेबल के नीचे' के राजस्व को बढ़ाने की प्रबल संभावना बन गई है।

    अरुण सिंह की कमी खल रही: विपक्ष की चुप्पी पर उठे सवाल

    आज दुर्ग निगम की जनता को पूर्व वरिष्ठ पार्षद अरुण सिंह की कमी शिद्दत से महसूस हो रही है। भाजपा के इस युवा और प्रखर चेहरे ने धीरज बाकलीवाल की सरकार के समय इसी तरह की कमीशनखोरी और ऑफलाइन टेंडरों के खेल के खिलाफ सदन में आवाज बुलंद की थी।

    विडंबना यह है कि वर्तमान में सत्ता पक्ष तो मौन है ही, विपक्ष के नेता भी मात्र 'रबर स्टैम्प' बनकर रह गए हैं। चर्चा है कि विपक्ष का आंदोलन केवल 'कमरा आवंटन' तक सीमित था और प्रोटोकॉल मिलते ही जनता के हितों की बलि चढ़ा दी गई।

    'विकास की वीरांगना' को पोस्टर का रिटर्न गिफ्ट?

    हाल ही में महापौर के जन्मदिन पर शहर भर में लगे "विकास की वीरांगना" वाले पोस्टरों की सच्चाई अब सामने आ रही है। निगम के इतिहास में पहली बार ठेकेदारों की पूरी फौज बधाई संदेशों में नजर आई। जानकारों का कहना है कि अब उन्हीं चेहरों को 'रिटर्न गिफ्ट' के तौर पर कार्यों की बड़ी सूची थमाई जा रही है। 70 में से चुनिंदा 50 ठेकेदारों के बीच काम का बंटवारा पहले ही तय होने की खबरें हैं।

    आयुक्त सुमित अग्रवाल की पहल बनाम शहरी सरकार की जिद

    निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए 20 लाख तक के कार्यों को भी ऑनलाइन प्रक्रिया में डालने का साहस दिखाया, जिससे निगम को लाखों के राजस्व का लाभ हुआ। सूत्रों के अनुसार, आयुक्त महोदय ऑफलाइन प्रक्रिया के पक्ष में नहीं थे, लेकिन शहरी सरकार की 'जिद' के आगे ऑफलाइन निविदाएं निकाली गईं। अब सवाल यह है कि महापौर अलका बाघमार इस राजस्व हानि पर मौन क्यों हैं? क्या "विकास की वीरांगना" जैसे शब्द केवल विज्ञापनों तक सीमित हैं?

    जांच का विषय: 'वर्क ऑर्डर' के बदले 5% कैश!

    नगर निगम परिसर में यह चर्चा आम है कि हर टेंडर के कार्यादेश (Work Order) की प्रति प्राप्त करने के लिए भी 2 से 5 प्रतिशत नकद राशि का भुगतान करना होगा। हालांकि यह जांच का विषय है, लेकिन जिस तरह से टेंडर से पहले ही 'किसको, कितना और कहाँ' हिस्सा देना है, यह तय हो चुका है, उससे भ्रष्टाचार की बू स्पष्ट आ रही है।

    निष्कर्ष:

    दुर्ग की जनता आज अपने फैसले पर पछता रही है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और सत्ता-विपक्ष एक ही थाली के चट्टे-बट्टे नजर आएं, तो भ्रष्टाचार का फलना-फूलना लाजमी है। अब देखना यह होगा कि क्या शासन स्तर पर इस 'ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन' के खेल की जांच होगी या फिर भ्रष्टाचार की इस आग में निगम का राजस्व इसी तरह स्वाहा होता रहेगा?

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