July 31, 2026
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    दुर्ग नगर निगम: 'कागजी सुशासन' की महापौर या अतिक्रमण की मूक दर्शक? Featured

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    दुर्ग। राजनीति में कथनी और करनी का अंतर जब गहरा हो जाए, तो वह 'असफलता' का प्रमाण बन जाता है। दुर्ग नगर पालिक निगम की महापौर श्रीमती अलका बाघमार इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर वायरल एक विवादित वीडियो और उसके बाद दी गई अपनी 'अजीबोगरीब' सफाई को लेकर चर्चा में हैं।

    गाली पर खेद, पर विफलता का क्या?

    पिछले दिनों एक ठेले वाले को अपशब्द कहते हुए महापौर का वीडियो वायरल हुआ। इस पर सफाई देते हुए उन्होंने इसे 3 महीने पुराना बताया और कहा कि "लगातार समझाइश के बाद भी ठेला नहीं हटाने पर मुंह से शब्द निकल गए।"

    यहाँ सवाल यह नहीं है कि उनके मुंह से क्या निकला, सवाल यह है कि 3 महीने बाद भी वह ठेला वहीं क्यों खड़ा है? यदि शहर की प्रथम नागरिक एक गुमटी नहीं हटवा पा रही हैं, तो क्या इसे उनकी लाचारी माना जाए या प्रशासनिक विफलता? महापौर ने अनजाने में ही सही, पर यह स्वीकार कर लिया है कि दुर्ग में अतिक्रमण हटाने के उनके तमाम दावे केवल 'कागजी शेर' हैं।

    अमीरों पर मेहरबानी, गरीबों पर 'जुबानी' वार

    महापौर की 'मानवता' और 'कड़े कदम' की थ्योरी उस वक्त हवा हो जाती है, जब नजर शहर के रसूखदारों के अवैध कब्जों पर पड़ती है। जनता पूछ रही है:

    ओम ज्वैलर्स ने बरामदे से लेकर सड़क तक जो अवैध साम्राज्य फैलाया है, उस पर महापौर की 'कड़ी कार्रवाई' की धार कुंद क्यों पड़ गई?

    गणेश मंदिर के सामने राम रसोई के संचालक द्वारा खुलेआम सड़क पर किए गए निर्माण पर महापौर मौन क्यों हैं?

    बस स्टैंड की हजारों स्क्वायर फीट जमीन पर अनुबंध खत्म होने के बाद भी कब्जा जमाए बैठे रसूखदार के साथ महापौर मंच साझा कर उन्हें 'समाजसेवी' का सर्टिफिकेट क्यों बांट रही हैं?

    चौतरफा अतिक्रमण: बदहाल दुर्ग की तस्वीर

    कुआं चौक से लेकर महाराजा चौक और बोरसी चौक तक, यातायात व्यवस्था दम तोड़ रही है। साईं द्वारा के पास फल दुकानों के कारण जाम की स्थिति हो या शनिवार को चर्च रोड पर लगने वाला अवैध बाजार—प्रशासनिक इच्छाशक्ति पूरी तरह नदारद है। इंदिरा मार्केट के भीतर बड़े व्यापारियों ने सड़कों तक दुकानें सजा ली हैं, लेकिन महापौर केवल 'कपड़ा लाइन' का अतिक्रमण हटाकर अपनी पीठ थपथपा रही हैं।

    "क्या आने वाले 4 साल भी इसी तरह 'मौन' रहकर और सोशल मीडिया पर भावनात्मक संदेश देकर बिताए जाएंगे?"

    निष्कर्ष: सुशासन या सिर्फ महिमामंडन?

    सोशल मीडिया पर चंद समर्थकों द्वारा महापौर का महिमामंडन जमीनी हकीकत को नहीं बदल सकता। एक तरफ गरीबों को अपशब्द और दूसरी तरफ अवैध कब्जाधारियों को संरक्षण—यह दोहरा मापदंड दुर्ग की जनता देख रही है।

    श्रीमती अलका बाघमार को यह समझना होगा कि शहर 'भावनात्मक पोस्ट' से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से चलता है। यदि वह एक कुआं चौक को 3 महीने में अतिक्रमण मुक्त नहीं करा पाईं, तो यह उनकी कार्यशैली पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है। अब देखना यह होगा कि महापौर अपनी इस 'स्वीकृत असफलता' को सफलता में बदलती हैं या फिर दुर्ग इसी तरह अवैध कब्जों का बंधक बना रहेगा।

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