July 23, 2026
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    सुशासित सूबे को रुलाता कोरोना

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    ओपिनियान / शौर्यपथ / तमिलनाडु के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह अच्छी तरह से शासित राज्य रहा है। इस सूबे को यह उपलब्धि इसलिए हासिल हुई है, क्योंकि बीते वर्षों में इसने तमाम मुश्किलों का बखूबी सामना किया है। फिर चाहे वह संकट प्राकृतिक हो या सामाजिक विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा अथवा अर्थव्यवस्था से जुड़ा कोई मसला- तमिलनाडु बड़ी आबादी वाले राज्यों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता रहा है। मगर मौजूदा सूबाई सरकार जिस तरह से कोरोना वायरस महामारी से मुकाबिल है, उससे ये तमाम उपलब्धियां तार-तार हो रही हैं। वायरस संक्रमण के मामले में यह देश का तीसरा सबसे बड़ा सूबा बन गया है। यहां मृत्यु-दर भी धीरे-धीरे बढ़ रही है और चेन्नई के अस्पतालों में मरीजों के लिए बेड कम पड़ने लगे हैं।
    मुख्यमंत्री के पलानीसामी की मन:स्थिति इसी से जाहिर होती है कि पिछले हफ्ते पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था, ‘सिर्फ ईश्वर को पता है कि तमिलनाडु में कोविड-19 का अंत कब होगा’। शुरुआती गलतियों के बाद राज्य ने अपनी नीतियां फिर से बनाई हैं, लेकिन लगता है कि नुकसान हो चुका है। सवाल यह है कि पहले बेहतरीन काम करने वाले इसके प्रशासनिक तंत्र के साथ आखिर हुआ क्या?
    उल्लेखनीय है कि यह राज्य 2004 की सुनामी से जल्द ही उबरने में कामयाब हो गया था, जबकि उस आपदा में इसका बड़ा हिस्सा तबाह हो गया था। 2015 की बाढ़ के समय भी इसने मिला-जुला प्रदर्शन किया था, क्योंकि तब भौतिक संपदा की हानि बेशक हुई, मगर अधिकतर लोगों की जान बचा ली गई थी। कई बड़े चक्रवातों का इसने बखूबी सामना किया है। पिछले वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन के मौके पर केंद्र ने जब ‘गुड गवर्नेंस इंडेक्स’ जारी किया था, तो उसमें भी यह सूबा शीर्ष पर था। कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों, वाणिज्य व उद्योग, मानव संसाधन विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक सुशासन, सामाजिक कल्याण व विकास, न्यायिक व सार्वजनिक सुरक्षा, पर्यावरण व जन-हितकारी शासन जैसे क्षेत्रों में मूल्यांकन के बाद यह सूची जारी की गई थी। पलानीसामी के लिए यह रैंकिंग नया जीवन लेकर आई, जो स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के कारण मुश्किल में थे। इसी के बाद उनकी कुरसी पर नजर टिकाए नंबर दो नेता पन्नीरसेल्वन को किनारे करके वह अन्नाद्रमुक के सर्वेसर्वा बन गए।
    मगर कोविड-19 के विरुद्ध तमिलनाडु की रणनीति इस बात को साबित करती है कि केंद्र प्रायोजित रैंकिंग क्षेत्रीय सरकार के प्रदर्शन का सही मापक नहीं हो सकती। अतीत में यह राज्य तीन स्तंभों के आधार पर कामयाब माना गया था- कुशल नौकरशाही, सामाजिक रूप से संवेदनशील राजनीतिक नेतृत्व और सजग जनता। अभी इन तीनों ही स्तंभों में दरार दिख रही है।
    सबसे पहले बात नौकरशाही की। यहां के नौकरशाह अपने कुशल कामकाज के लिए जाने जाते हैं। इसी दक्षता के कारण तमिलनाडु अपनी सामाजिक योजनाओं को जनता तक पहुंचाता रहा है। बेहतर प्रशासन की वजह से राज्य में कानून-व्यवस्था भी अच्छी रही है। जाहिर है, यह राजनीतिक नेतृत्व है, जो फिसलता दिख रहा है। शीर्ष पर कोई मजबूत नेता न होने के कारण कमजोरी साफ-साफ दिख रही है। नतीजतन, नेतृत्व को पूजने वाली जनता भी अब बेचैन होने लगी है।
    कोविड-19 के खिलाफ जो रणनीति बनाई गई, उसमें कई गलतियां रहीं। शुरुआत में जब तबलीगी जमात के संक्रमित प्रवासियों के बारे में पता चला, तो संक्रमण थामने के कदम जरूर उठाए गए, लेकिन उनकी धार्मिक पहचान भी बताई जाती रही। हालांकि, जल्द ही राज्य ने अपनी गलती दुरुस्त कर ली और साप्रदायिक उन्माद से बचने के लिए संक्रमितों का नाम लेना बंद कर दिया। इसी तरह, लॉकडाउन और संपर्कों को खोजने की रणनीति ने भी कुछ हद तक काम किया, पर कोयांबदु थोक मार्केट कोरोना का नया हॉटस्पॉट बन गया। यहां से खुदरा व्यापारी अपने-अपने जिलों में संक्रमण ले गए।
    शुरुआत में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सी विजय भास्कर कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई का चेहरा बने। कुछ मौकों पर उन्हें मुख्यमंत्री के साथ देखा गया। पर तबलीगी जमात की वजह से संक्रमण में आया उछाल जैसे ही थमा, मुख्यमंत्री ने अति आत्मविश्वास में यह घोषणा कर दी कि महामारी सिमटने लगी है। हालात विपरीत होते ही उन्हें अपने शब्द वापस लेने पड़े। इसके समाधान के लिए उन्होंने मीडिया को जानकारी देने की जिम्मेदारी विजय भास्कर से वापस लेते हुए राज्य के स्वास्थ्य सचिव को दे दी। तब यही अनुमान लगाया गया कि मुख्यमंत्री को यह कदम इसलिए उठाना पड़ा, क्योंकि उनके अन्य कैबिनेट सहयोगी विजय भास्कर के रोजाना मीडिया में आने से असहज हो रहे थे।
    बहरहाल, स्वास्थ्य सचिव भी नाकाम साबित हुईं, क्योंकि संक्रमण फैलता रहा। आरोप उछला कि उन्हें चेन्नई नगर आयुक्त का साथ नहीं मिला, जो इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह इलाका हॉट स्पॉट घोषित था। चेन्नई में संक्रमण बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री 2004 की सुनामी में बेहतर काम करने वाले आईएएस अधिकारी जे राधाकृष्णन को लेकर आए। मगर मुख्यमंत्री इसके बाद भी नहीं रुके। जल्द ही उन्होंने अपने पांच कैबिनेट मंत्रियों को शहर के विभिन्न हिस्सों का प्रभारी बनाया, फिर भी हालात नहीं संभले। मुख्यमंत्री को यह समझने में थोड़ा वक्त लगा कि बहुत सारे रसोइए शोरबे को खराब कर रहे हैं। पलानीसामी ने आत्मघाती गोल 19 जून को किया, जब उन्होंने 12 दिनों के सख्त लॉकडाउन की घोषणा कर दी, जबकि देश अनलॉक-1 की ओर बढ़ चला था।
    नौकरशाही पर मुख्यमंत्री की कमजोर पकड़ के कारण जिलाधिकारियों ने चेन्नई से आने वाले प्रवासियों को रोकने के लिए अलग-अलग नियम लागू किए। हालांकि, खुद को निष्पक्ष बताने के लिए यहां का प्रशासन दूसरे राज्यों की तुलना में अधिक टेस्ट भी करने लगा है। शनिवार को यहां 35 हजार टेस्ट किए गए, जो पश्चिम बंगाल में पूरे महीने की जांच के बराबर है। जांच का दायरा बढ़ते ही संक्रमितों की संख्या में भी उछाल आने लगा है।
    अभी भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। बेशक जांच ज्यादा होने लगी है, पर संक्रमण-दर पिछले कुछ दिनों से या तो स्थिर है या कम हो रही है। राधाकृष्णन को मोर्चे पर लगाने के बाद जरूर समन्वित प्रयास होते दिख रहे हैं, मगर तमिलनाडु अब भी खतरे से उबरा नहीं है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार

     

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