August 05, 2026
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    घर से दफ्तर तक बदलाव

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              ओपिनियन / शौर्यपथ /इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार, दीवारो-दर को गौर से पहचान लीजिए... उमराव जान फिल्म के एक गीत की यह पंक्ति आज काफी मौजूं है। घर, दफ्तर और बाहर, अगर दीवारों-दर ही बदल चुके हों, तो? और अगर आप भी बदल गए हों, तो? बदलाव तय है। मशहूर चिंतक, लेखक थॉमस फ्रीडमैन ने कहा है कि हम इतिहास की एक नई विभाजन रेखा पर खड़े हैं। दुनिया का इतिहास अब ईसा से पहले और ईसा के बाद के पैमाने पर नहीं, बल्कि कोरोना से पहले और कोरोना से बाद के कालखंडों में विभाजित होगा। ‘उत्तर कोरोना काल’ में जो चीजें सबसे ज्यादा बदली हुई होंगी, उनमें से एक है- हमारा सामाजिक व्यवहार और दूसरा है- काम करने का हमारा तरीका।
    पहले भी लोग घर से या दफ्तर के बाहर से काम करते थे, लेकिन वे अपवाद थे। अब कोरोना के समय दफ्तर जाने वाले अपवाद हैं। इसीलिए सबके मन में सवाल है कि ऐसे ही क्यों नहीं चल सकता? दफ्तर की क्या जरूरत है? कई छोटे दफ्तर चलाने वाले तो फैसला कर चुके हैं कि अब दफ्तर बंद करके किराया बचाया जाए। दुनिया की चर्चित आर्थिक पत्रिका इकोनॉमिस्ट ने एक लेख में ऑफिस का मर्सिया लिख दिया है। डेथ ऑफ द ऑफिस शीर्षक वाले लेख में बताया गया है कि इस बीमारी के आने से पहले ही दफ्तर खतरे में थे, अब यह खतरा और भी बढ़ गया है। हालांकि लेखक रियायत देते हैं कि फिलहाल ऑफिस की जान नहीं जाने वाली।
    इधर रियल एस्टेट कंसल्टेंसी नाइट फ्रैंक ने भारत में कमर्शियल रियल एस्टेट के जिम्मेदार लोगों के बीच एक सर्वे किया है। इसके मुताबिक, 72 प्रतिशत लोग सोच रहे हैं कि छह महीने बाद भी दफ्तर के आधे लोगों से घर से ही काम लेना जारी रखा जाए। जल्दी ही उन दफ्तरों के बारे में फैसला होना है, जहां लॉकडाउन लगने के बावजूद लोगों ने घर से काम करके कामकाज पर असर नहीं आने दिया है। ऐसी कंपनियों का सोचना है कि क्या सबको काम पर वापस बुलाना है या कम लोगों को दफ्तर बुलाकर बाकी के घर को ही दफ्तर मान लिया जाए? मैकिंजी के सर्वेक्षण में शामिल एक कंपनी के सीईओ ने इस पर बहुत दिलचस्प टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है कि इसे ‘वर्क फ्रॉम होम’ कहने की बजाय ‘स्लीपिंग इन ऑफिस’ कहना बेहतर होगा। घर से काम कर रहे लोगों और उनके घरवालों से बात कीजिए, तो यह बात सटीक लगेगी। ज्यादातर का कहना है कि अब वे पहले से ज्यादा व्यस्त हैं। ज्यादा समय काम कर रहे हैं और इस चक्कर में घर का संतुलन भी बिगड़ रहा है, क्योंकि सब अपने-अपने कंप्यूटर या मोबाइल के जरिए किसी न किसी मीटिंग या क्लास में व्यस्त रहते हैं।
    वैसे ऑफिस कम रेजिडेंस यानी घर और दफ्तर एक साथ की अवधारणा नई नहीं है। आम तौर पर इसका अर्थ एक बड़ा बंगलेनुमा घर होता है, जिसमें रहने का हिस्सा अलग और दफ्तर का हिस्सा अलग होता है। बडे़ अधिकारियों की जिंदगी आज भी ऐसे घरों में गुजरती है। दफ्तर बंद होने के बाद उसके कमरे बंद और घर की जिंदगी शुरू।
    मगर कोरोना आने के साथ असंख्य लोगों के घर उनके दफ्तर बन गए। दिक्कत यह है कि सारे घर ऐसे नहीं हैं, जिनमें अलग से दफ्तर बन जाएं, तो अपने बेडरूम, ड्रॉइंग रूम या डाइनिंग टेबल को ही दफ्तर बनाना पड़ता है। बीच में कूकर की सीटी भी बजेगी और दरवाजे की घंटी भी। एक से ज्यादा लोग काम कर रहे हों, तो जगह की तंगी भी है। एक दिग्गज का कहना है कि भारत के ज्यादातर घर वर्क फ्रॉम होम के हिसाब से तैयार नहीं हैं। यानी इस रास्ते पर आगे बढ़ना है, तो घरों में बदलाव करने होंगे। इस बदलाव का खर्च भी क्या कंपनियां उठाएंगी?
    जाहिर है, सारी बड़ी कंपनियां यह हिसाब जोड़ रही हैं कि जो कर्मचारी घर पर रहकर दफ्तर चलाएंगे, उन्हें इसके लिए कितना खर्च करना पडे़गा और कंपनी को कितना देना पड़ेगा। घर में काम से कंपनी को बचत हो रही है या नुकसान? अभी फिजिकल डिस्टेंसिंग भी देखनी है यानी एक कर्मचारी को बैठाने के लिए चार की जगह चाहिए। एक जगह ज्यादा कर्मचारियों को बैठाने से हमेशा खतरा बना रहेगा। दक्षिण कोरिया के एक कॉल सेंटर में एक ही हॉल में काम करने वाले 43 प्रतिशत लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए।
    अब ओपन ऑफिस और कंपनी के सारे कामकाज एक जगह लाकर बड़ा सेंट्रल कॉम्प्लेक्स बनाने की दिशा में काम खतरनाक है। अगर कोई बीमारी फैल गई, तो पूरा काम ठप हो जाएगा। इसीलिए काम को एक से ज्यादा जगह बांटकर रखना समझदारी मानी जाएगी। शिकागो यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च से पता चलता है कि अमेरिका में 37 प्रतिशत काम ऐसे हैं, जो हमेशा के लिए घर से किए जा सकते हैं।
    एक दूसरी बड़ी बहस यह भी छिड़ी हुई है कि क्या दफ्तर सिर्फ काम के लिए होते हैं? टीम भावना, कंपनी से जुड़ाव और नौकरी न बदलने की इच्छा, इन सबके पीछे दफ्तर की भी भूमिका होती है। काम के बीच चाय-कॉफी पर चर्चा, विमर्श, दोस्तियां, रोमांस इत्यादि से भी इंसान अपने दफ्तर से जुड़ता है।
    बहरहाल, मैकिंजी की रिपोर्ट में ऐसा एक सूत्र है, जो सबके काम का है और वह है, ‘सीखने की कला सीखो। महामारी के बाद के दौर में काम की पूरी दुनिया बदली हुई होगी, कंपनियां बदल जाएंगी और आपके अपने बहुत से लोग बदल चुके होंगे। ऐसे में, वही कारोबार आगे बढ़ पाएंगे, जो अपने लोगों को तेजी से इस बदलती दुनिया के साथ बदलने का रास्ता सीखने लायक बनाएंगे या सीखने के लिए जरूरी कौशल दे पाएंगे और अभी यह काम बहुत कम लोगों को आता है।’
    फेसबुक और ट्विटर, दोनों ने कहा है कि वे अपने बहुत से कर्मचारियों को हमेशा के लिए घर से काम करने की छूट दे रहे हैं। उधर, एक रियल एस्टेट कंपनी ने एक नए ऑफिस का डिजाइन बना दिया है, जिसमें काम करने वालों के बीच छह फुट की दूरी का इंतजाम होगा। यह तय है कि हर आदमी घर से काम नहीं कर सकता और काम के जितने भी तरीके निकाले जाएंगे, उन पर सवाल उठेंगे। बहरहाल, दुनिया किसी भी शक्ल में खुले, हमें आगे तो बढ़ना ही होगा।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

     

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