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व्रत त्यौहार / शौर्यपथ /भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्री बलरामजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन श्री बलरामजी का जन्म हुआ था। हल षष्ठी की व्रतकथा यह है...
प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका मन गौ-रस (दूध-दही) बेचने में लगा हुआ था। उसने सोचा कि यदि प्रसव हो गया तो गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा।
यह सोचकर उसने दूध-दही के घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए चल दी किन्तु कुछ दूर पहुंचने पर उसे असहनीय प्रसव पीड़ा हुई। वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां एक बच्चे को जन्म दिया।
वह बच्चे को वहीं छोड़कर पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई। संयोग से उस दिन हल षष्ठी थी। गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने सीधे-सादे गांव वालों में बेच दिया।
उधर जिस झरबेरी के नीचे उसने बच्चे को छोड़ा था, उसके समीप ही खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक उसके बैल भड़क उठे और हल का फल शरीर में घुसने से वह बालक मर गया।
इस घटना से किसान बहुत दुखी हुआ, फिर भी उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया। उसने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेट में टांके लगाए और उसे वहीं छोड़कर चला गया।
कुछ देर बाद ग्वालिन दूध बेचकर वहां आ पहुंची। बच्चे की ऐसी दशा देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसके पाप की सजा है।
वह सोचने लगी कि यदि मैंने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो मेरे बच्चे की यह दशा न होती। अत: मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए।
ऐसा निश्चय कर वह उस गांव में पहुंची, जहां उसने दूध-दही बेचा था। वह गली-गली घूमकर अपनी करतूत और उसके फलस्वरूप मिले दंड का बखान करने लगी। तब स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ और उस पर रहम खाकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया।
बहुत-सी स्त्रियों द्वारा आशीर्वाद लेकर जब वह पुन: झरबेरी के नीचे पहुंची तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है। तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्म हत्या के समान समझा और कभी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया।
मुंगेली /शौर्यपथ / इन दिनों मुंगेली नगर पालिका सुर्खियो में है चाहे नाली घोटाला मामला हो या अध्यक्ष पद की ताजपोशी। जिस नाली घोटाले मामले में नगर पालिका अध्यक्ष संतुलाल सोनकर सहित 6 लोगो के खिलाफ जुर्म दर्ज है और वर्तमान में सभी आरोपी फरार है।उक्त कारणवश संतुलाल सोनकर से नगर पालिका अध्यक्ष पद का प्रशासनिक तौर पर साइन पावर वापस ले लिया गया है। और अब यह कयास लगाया जा रहा है कि फिर से नगर पालिका परिषद का चुनाव होना है। जिसमे भाजपा से अध्यक्ष पद के लिए पार्षद गायत्री आनंद देवांगन की प्रबल दावेदारी मानी जा रही है।
गायत्री आनंद देवांगन मुंगेली की जानी-मानी हस्ती है बताया जा रहा है कि गायत्री आनंद देवांगन पूर्व केबिनेट मंत्री व वर्तमान मुंगेली विधायक पुन्नूलाल मोहले के काफी करीबी है। गायत्री आनंद देवांगन के ब्यापक जनाधार को देखते हुए पलड़ा भारी दिख रहा है वही गायत्री देवांगन जनता के बीच सक्रिय रहकर जनहितैषी कार्यो को करते आ रही है। जिसके कारण जनता के साथ-साथ अपने दल के नेताओ में उनकी अच्छी पैठ है अब आगामी चुनाव में जनहितैषी कार्यो पर पहल करने वाली गायत्री देवांगन सब पर भारी पड़ सकती है साथ ही नाली घोटाला के बाद जनता को स्वच्छ छवि के अध्यक्ष की आस है। जिस आस में गायत्री आनंद देवांगन का नाम सबसे पहले नम्बर पर है,मुंगेली के राजनीतिक रंगत में भाजपा एक बार फिर उभरने के लिए गायत्री आनंद देवांगन को आगे कर सकती है।
गायत्री देवांगन प्रसिद्ध अधिवक्ता आनंद देवांगन की पत्नी है और आनंद देवांगन की स्वच्छ छवि एवं ईमानदार होने के कारण बीजेपी में अध्यक्ष पद की दौड़ में आगे है।
विभागीय अधिकारियो ने की नवीन प्राथमिक शाला कोडेमरा छोटेपारा के साज सजावट की सराहना
राजनांदगांव/ शौर्यपथ / राजनांदगांव जिले के बीहड़ आदिवासी क्षेत्र मोहला विकासखण्ड में एक छोटा सा गॉव छोटेपारा कोडेमरा स्थित है। इस ग्राम की आबादी बहुत कम है और यहाॅँ महज 30 से 35 घर निर्मित है। इस ग्राम में सन् 2006 से प्राथमिक शाला में पदस्थ शिक्षक धर्मेंद्र कुमार सिन्हा ने अपने अथक परिश्रम और सकारात्मक कार्य करने की सोच से शाला परिसर में गार्डन व किचन गार्डन बनाने का यह कार्य जनसमुदाय व ग्रामपंचायत की मदद से पूर्ण किया। पहले जब इस शिक्षक ने छोटेपारा में कार्यभार ग्रहण किया, तब यहाॅ स्कूल भवन भी नही बना था और लोगों के घरों के बरामदे में 2 वर्षों तक बच्चों को अध्ययन करवाया। फिर शाला भवन निर्माण पूरा भी नही हुआ था तब से शाला में कक्षा लगाया गया ।
सरपंच को बोल कर शाला के अधूरे कार्य को पूर्ण कराया गया। अब तक उक्त शाला भवन का लोकार्पण नही हुआ है परंतु अब शाला भवन और शाला परिसर में बहुत सारे सकारात्मक परिवर्तन हो गये है। शाला परिसर में गार्डन के लिए क्यारी निर्माण शिक्षकों ने मिलकर स्वयं के व्यय से 5000 हजार रुपए की लागत से किया हैं जिसमे शिक्षक राजू राम रात्रे ने भी अपना पूरा सहयोग दिया हैं। दोनों शिक्षकों के बीच बेहतर तालमेल एवं एक जैसी विचारधारा होने से यह कार्य बिना किसी रुकावट के संम्पन्न हो गया। ग्राम पंचायत कोडेमरा के दोनो शिक्षकों ने बताया कि यहाॅ के सरपंच श्रीमती राजकुमारी कुंजाम, पंच गैंदलाल नेताम और पंच सरजुराम से भी उन्हें शाला संबंधी विभिन्न विषयो पर विशेष सहयोग प्राप्त होता रहता है।
एपीसी सतीश ब्यौहरे व मोहला एबीईओ राजेन्द्र देवांगन तथा अन्य विभागीय अधिकारियो ने भी शासकीय नवीन प्राथमिक शाला कोडेमरा छोटेपारा के साज सजावट की सराहना की है तथा दोनो शिक्षको और ग्रामीणों के कार्य को अन्य शालाओं के लिए अनुकरणीय बताया है। शाला परिवार के सक्रिय सहयोग से कोडेमरा में शिक्षा का विकास बेहतर हो रहा है।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / जीरा कभी दाल में तड़के की तरह, तो कभी दही का स्वाद बढ़ाने के लिए जाना जाता है। वहीं दूसरी ओर गुड़ को मीठे व्यंजनों को बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। गुड़ और जीरा दोनों ही पोषक तत्वों से भरपूर हैं। इसलिए सुबह खाली पेट गुड़ और जीरे का पानी पीने से शरीर को कई बीमारियों से बचाया जा सकता है।
गुड़ और जीरे के अपने-अपने फायदे हैं। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि ये दो सामग्रियां साथ में मिलकर सेहत को कैसे लाभ पहुंचा सकती हैं? अगर नहीं.. तो अब जानिये गुड़ और जीरे का पानी आपके लिए कैसे फैदेमंद है।
जीरा और गुड़ के पानी के स्वास्थ्य लाभ
1. आपको नेचुरली डिटॉक्स करता है
फूड केमिस्ट्री में 2009 के एक अध्ययन के अनुसार, गुड़ में एंटीऑक्सीडेंट और खनिज इसे एक साइटोप्रोटेक्टिव गुण देते हैं। जिसका अर्थ है कि यह न केवल फेफड़ों से बलगम को साफ कर सकता है, बल्कि श्वसन और पाचन तंत्र को भी साफ कर सकता है। रोजाना कम से कम एक बार गुड़ और जीरे का पानी पीने से आपके पूरे शरीर को डिटॉक्स करने में मदद मिल सकती है।
2. पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद
खाना खाने के बाद गुड़ और दही के साथ जीरा सिर्फ भोजन का स्वाद बढ़ाने के लिए ही नहीं दिया जाता है, बल्कि यह दोनों चीजें आपके पाचन तंत्र को दुरुस्त रख सकती हैं। ये दोनों गट बैक्टीरिया को उत्तेजित करते हैं और पाचन एंजाइमों के स्राव में सहायता करते हैं। गुड़ और जीरा उन लोगों के लिए भी बहुत अच्छा है जो कब्ज और अन्य पाचन समस्याओं से पीड़ित हैं।
3. इम्युनिटी बढ़ाने में मददगार
गुड़ पोषक तत्वों से भरपूर है और इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करता है। यही कारण है कि सर्दियों के दौरान गुड़ का अधिक सेवन किया जाता है। यह आपके शरीर को सर्दी, फ्लू और अन्य बीमारियों को दूर रखने में मदद करता है। साथ ही, जीरा गट हेल्थ के लिए फायदेमंद है और हेल्दी गट का मतलब है बेहतर इम्युनिटी।
4. वज़न घटाने में सहायक
वजन घटाने के लिए जीरे और गुड़ का पानी विशेष रूप से फायदेमंद है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह शरीर से सारी गंदगी को बाहर निकालता है। हालांकि वज़न कम करने के लिए आपको सिर्फ यह पानी पीने से मदद नहीं मिलेगी, इसके लिए आपको एक्सरसाइज भी करनी होगी। मगर गुड़ और जीरे का पानी आपकी वेट लॉस जर्नी आसान बना सकता है।
5. पीरियड्स को नियंत्रित करता है
पीरियड्स के दौरान हम निश्चित रूप से हार्मोनल असंतुलन को नजरअंदाज नहीं कर सकते। इसलिए, मासिक धर्म की मामूली अनियमितता के लिए जीरा और गुड़ का सेवन करें। हालांकि, यदि आप गंभीर अनियमितताओं का अनुभव करती हैं, तो डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है।
यहां है गुड़ और जीरे का पानी तैयार करने की विधि
लगभग डेढ गिलास पानी उबालें, फिर उसमें एक चम्मच जीरा और थोड़ा गुड़ डालें।
इस मिश्रण को अच्छे से उबालें जब तक यह एक गिलास न रह जाए।
उसके बाद इसे छान लें और गुनगुना होने पर पिएं।
सेहत / शौर्यपथ / एक हालिया अध्ययन के मुताबिक पांच मिनट का श्वसन व्यायाम रक्तचाप को कम करने में दवा की तरह प्रभावी साबित हो सकता है। इस व्यायाम को एक खास डिवाइस की मदद से करना होगा। इस अभ्यास को दरअसल सांस लेने की मांसपेशियों के लिए एक तरह का शक्ति प्रशिक्षण कहा है। इसमें एक हाथ से मेडिकल डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है, जो एक ट्यूब के जरिए व्यक्ति के श्वास लेता है। टीवी देखते हुए भी डिवाइस के जरिए व्यायाम का अभ्यास किया जा सकता है। कोलोराडो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के मुताबिक इसके अभ्यास से बुजुर्गों में रक्तचाप कम होने के साथ साथ हृदय रोग का जोखिम भी कम होगा। यह एथलीटों को तेज मैराथन दौड़ने में भी मदद कर सकता है।
दवा रहित विकल्प है यह डिवाइस
हाई-रेसिस्टेंस इंस्पिरेटरी मसल स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (आईएमएसटी) में हाई इंटेंसिटी व्यायाम का प्रशिक्षण किया जाता है। इसमें तेज, उच्च दर की श्वसन किया से हृद्य की सेहत दुरुस्त रहती है, याददाश्त बेहतर रहती है और साथ ही खेल प्रदर्शनों में सुधार होता है। यह तकनीक रक्तचाप को कम करने के लिए दौड़ने की तुलना में अधिक प्रभावी हो सकती है। खासकर पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं के लिए यह फायदेमंद है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के प्रोफेसर डौग सील्स ने इसे एक आसान और ड्रग-मुक्त विकल्प बताया है।
दो समूहों में बांटे प्रतिभागी
श्वसन रोग में रोगियों को उनके डायाफ्राम और अन्य श्वास की मांसपेशियों को मजबूत करने में मदद के लिए 1980 के दशक में विकसित डिवाइस को प्रति दिन 30 मिनट के लिए इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया था। लेकिन हाई इंटेंसिटी इंटरवल ट्रेनिंग (एचआईआईटी) से प्रेरित शोधकर्ता अब मानते हैं कि उच्च प्रतिरोध पर एक दिन में 30 सांस बार सांस लेने पर भी कई फायदे हैं। अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 50 से 79 आयु के 36 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया, जिनका रक्तचाप सामान्य से थोड़ा अधिक था। इनमें से आधे लोगों ने छह सप्ताह तक उच्च प्रतिरोध आईएमएसटी प्रशिक्षण किया और अन्य ने दवाओं का सहारा लिया।
दवाओं और चहलकदमी जितनी प्रभावी डिवाइस
आईएमएसटी करना छोड़ने के छह सप्ताह बाद भी प्रतिभागियों में सुधार बरकरार रहा। इस समूह वाले 45 प्रतिशत प्रतिभागियों में सुधार देखा गया। उनमें धमनियों के विस्तार की क्षमता बढ़ी और नाइट्रिक ऑक्साइड के स्तर में इजाफा हुआ। आईएमएसी समूह में रक्तचाप में औसतन नौ अंक की गिरावट आई, जो आमतौर पर सप्ताह में पांच दिन 30 मिनट चलने से आती है। वह गिरावट कुछ रक्तचाप कम करने वाली दवाओं के प्रभाव के बराबर भी है।
खाना खजाना / शौर्यपथ / अक्सर शाम के समय लोगों का मन कुछ चटपटा स्ट्रीट फूड जैसा खाने का करने लगता है। कचौड़ी का नाम ऐसे ही फेमस स्ट्रीट फूड में शामिल है। अगर आप भी अपनी शाम की भूख को मिटाने के लिए कुछ हेल्दी और चटपटा ट्राई करना चाहते हैं तो झटपट बनाएं प्याज की कचौड़ी। आइए जान लेते हैं क्या है इसकी रेसिपी।
प्याज की कचौड़ी बनाने के लिए सामग्री-
-तेल
-आधा छोटा चम्मच जीरा
-आधा छोटा चम्मच धनिया के बीज
-सौंफ
-हींग
-बारीक कटी हुई 1 मिर्च
-आधा छोटा चम्मच अदरक का पेस्ट
-2 प्याज
-आधा छोटा चम्मच मिर्च पाउडर
-एक चौथाई छोटा चम्मच हल्दी
-एक चौथाई छोटा चम्मच गरम मसाला
-अमचूर पाउडर
-एक चौथाई छोटा चम्मच चीनी
-नमक
-आधा कप बेसन
-2 टेबल स्पून हरा धनिया
-2 कप मैदा
-1 बड़ा चम्मच रवा या सूजी
-2 टेबल स्पून घी
प्याज की कचौड़ी बनाने की विधि-
प्याज की कचौड़ी बनाने के लिए सबसे पहले इसका आटा तैयार कर लें। इसके लिए, एक बर्तन में दो कप मैदा, एक बड़ा चम्मच सूजी, थोड़ा सा नमक व घी डालकर मिक्स करें। अब आप इसमें थोड़ा-थोड़ा पानी डालकर आटा गूंथे और इसे सेट होने के लिए कुछ देर के लिए ऐसे ही छोड़ दें।
अब, आप फिलिंग की तैयारी करें। इसके लिए आप एक पैन में ऑयल डालकर गर्म करें। अब इसमें जीरा, हींग, सौंफ व धनिया डालकर चटकने दें। इसके बाद इसमें हरी मिर्च व अदरक का पेस्ट डालकर कुछ सेकंड के लिए भूनें। अब इसमें कटे हुए प्याज डालें और इसे कुछ देर के लिए भूनें। जब प्याज का कलर चेंज हो जाए तो गैस को स्लो करके इसमें हल्दी, लाल मिर्च, गरम मसाला, अमचूर पाउडर, नमक व चीनी डालकर मिक्स करें।
इसे हल्का चलाती रहें।अब इसमें बेसन डालकर अच्छी तरह भूनें। आखिर में इसमें हरा धनिया डालें और गैस बंद कर दें। आपकी स्टफिंग बनकर तैयार है। इसे इस्तेमाल से पहले पूरी तरह से ठंडा होने दें। इसके बाद आप थोड़ा सा आटा लेकर उसे गोल करें। अब उसे चपटा कर लें और इसमें 1 टेबल स्पून तैयार प्याज़ की स्टफिंग बीचों-बीच रख दें।
अब आप किनारों को आपस में मिलाएं और उसे बंद करें। अब आप इसे हल्का सा दबाकर चपटा करने के बाद एक कड़ाही में तेल डालकर उसे गर्म होने दें।जब तेल मीडियम गर्म हो जाए तो इसमें तैयार कचौड़ी डाल दें।अब आप इसे मीडियम आंच पर दोनों साइड्स से अच्छी तरह सिकने तक पकाएं।इसे एक टिश्यू पेपर पर निकालें। आखिर में प्याज़ कचौरी को हरी चटनी और इमली की चटनी के साथ परोसें।
शौर्यपथ /महिलाओं को होने वाले मेनोपॉज के बारे में तो आपने कई बार सुना होगा पर क्या आप जानते हैं मेनोपॉज सिर्फ महिलाओं को ही नहीं बल्कि पुरुषों को भी होता है। सुनकर आप शायद हैरान भी हो जाएं, पर यह सही बात है। हालांकि पुरुषों को होने वाला मेनोपॉज महिलाओं से अलग होता है। महिलाओं में मासिक धर्म यानी पीरियड्स के बंद हो जाने की स्थिति को मेनोपॉज या रजोनिवृत्ति कहते हैं। यह एक स्वाभाविक शारीरिक बदलाव है, जिससे एक उम्र के बाद हर महिला गुजरती है। महिलाओं में मेनोपॉज इस बात का संकेत है कि वह महिला अब प्रजनन नहीं कर सकती है। वहीं पुरुषों के लिए रजोनिवृत्ति शब्द का प्रयोग कभी-कभी उम्र बढ़ने के कारण टेस्टोस्टोरोन का स्तर कम होने या टेस्टोस्टोरोन की जैव उपलब्धता में कमी बताने के लिए किया जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं आखिर क्या है मेल मेनोपॉज, इसके लक्षण और बचाव के उपाय।
क्या है मेल मेनोपॉज- पुरुष रजोनिवृत्ति यानी मेनोपॉज को सामान्य शब्दों में एंड्रोपॉज कहा जाता है। जो उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों के हार्मोन में आए परिवर्तनों की वजह से होता है। इस तरह के लक्षणों को टेस्टोस्टेरोन की कमी, एंड्रोजन की कमी और देर से शुरू होने वाले हाइपोगोनैडिज्म के रूप में भी जाना जाता है। पुरुष रजोनिवृत्ति में उन पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन उत्पादन में गिरावट होती है जो 50 या उससे अधिक उम्र के होते हैं।
मेल मेनोपॉज बढ़ती उम्र के साथ होने वाली एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। जिसमें आमतौर पर व्यक्ति के भीतर कोई लक्षण नजर नहीं आते हैं। यदि व्यक्ति के भीतर अवसाद या कोई अन्य लक्षण नजर आते हैं तो उसे उपचार की आवश्यकता होती है। जिसका होम्योपैथिक चिकित्सा में इलाज संभव है। होम्योपैथी में इस समस्या से जुझ रहे व्यक्ति का इलाज बिना किसी साइड-इफेक्ट के प्राकृतिक तौर पर किया जाता है। मेल मेनोपॉज जैसी हार्मोनल समस्या न सिर्फ यौन समस्याओं को बढ़ाती हैं बल्कि इसका बुरा असर शरीर के बाकी अंगों पर भी पड़ता है। लेकिन होम्योपैथिक उपचार के दौरान हार्मोन की गड़बड़ी ठीक होकर पहले की तरह काम करने लगती है।
पुरुषों में मेनोपॉज के लक्षण-
महिलाओं की ही तरह पुरुषों को होने वाला मेनोपॉज उनकी रोजमर्रा के जीवन को काफी हद तक प्रभावित करता है। इसकी पहचान पुरुष अपने जीवन में होने वाले इन बदलाव को देखकर कर सकते हैं। जैसे-
-ऊर्जा का स्तर कम होना।
- उदास रहना
-अवसाद या अधिकतर समय उदास रहना
- ध्यान केंद्रित करने में समस्या आना
-नींद न आना या अनिद्रा की समस्या
-वजन बढ़ना और मांसपेशियों का कमजोर होना
-सेक्स की इच्छा का कम होना
-नपुंसकता
-पुरुषों के स्तन में वृद्धि होना
-बांझपन
-बालों का झड़ना
-हड्डियों का कमजोर होना
महिलाओं से कैसे अलग है पुरुष रजोनिवृत्ति-
पुरुष रजोनिवृत्ति महिला रजोनिवृत्ति से कई मायनों में अलग होती है। जानकारी के लिए बता दें कि सभी पुरुषों में रजोनिवृत्ति या मेनोपॉज नहीं होता। दूसरा, इसमें पुरुषों के प्रजनन अंगों का पूर्ण रूप से बंद होना शामिल नहीं है। हालांकि, कम हार्मोन स्तर के परिणामस्वरूप यौन समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
पुरुषों में मेनोपॉज के कारण-
टेस्टोस्टेरोन की कमी आना शारीरिक परिवर्तन है। मुख्य रूप से यह 50 वर्ष की आयु के बाद देखने को मिलता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ हर साल पुरुषों के टेस्टोस्टेरोन के स्तर में औसतन 1 प्रतिशत की गिरावट आती है, जो कि मेनोपॉज का एक प्रमुख कारण है। हालांकि, आनुवंशिक कारणों के साथ कोई पुराना रोग जैसे मधुमेह, एचआईवी, फेफड़े से जुड़ा रोग, सूजन संबंधी गठिया रोग या गुर्दे की बीमारियां भी इसके जल्दी शुरु होने का कारण बन सकते हैं। इतना ही नहीं बढ़ता मोटापा, अधिक धूम्रपान, तनाव और खान-पान की खराब आदतों की वजह से भी औसत स्वस्थ व्यक्ति की तुलना में यह आपको जल्दी हो सकता है।
यदि कोई पुरुष शरीर में टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम होने के बावजूद इस समस्या पर ध्यान नहीं देता तो भविष्य में इसका असर उसकी सेक्स लाइफ पर पड़ सकता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति सेक्स ड्राइव में कमी, कामेच्छा में कमी, सुबह के इरेक्शन की आवृत्ति में कमी के साथ इरेक्टाइल डिसफंक्शन का भी शिकार हो सकता है।
क्या करना सही-
पुरुष रजोनिवृत्ति, वह समस्या है जिस पर अक्सर भारतीय पुरुष ध्यान नहीं देते हैं। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो उम्र बढ़ने के साथ हर पुरुष के साथ होती है। हालांकि इसके कोई स्पष्ट कारण या सकेंत नहीं है। बावजूद इसके कुछ बातों का ध्यान रखते हुए इस दौर को थोड़ा आसान और बेहतर जरूर बनाया जा सकता है।
यदि आप या परिवार के किसी सदस्य को रजोनिवृत्ति से जुड़ा कोई लक्षण महसूस हो रहा है, तो तुरंत अपने डॉक्टर से सलाह लें। आप जो भी छोटी-बड़ी चीजें महसूस कर रहे हैं, उन सभी को नोट कर लें। इस समस्या पर ज्यादातर लोग शर्म की वजह से बात नहीं करते हैं। ध्यान रखें शर्माने की जरूरत नहीं है क्योंकि हर व्यक्ति के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं। यदि इस दौरान आप उदासी और अकेलेपन जैसी चीजें महसूस कर रहे हैं तो मदद के लिए संपर्क करें।
मेनोपॉज के निदान के लिए टेस्टोस्टेरोन टेस्ट किया जाता है। हालांकि, मेनोपॉज की पुष्टि करने से पहले डॉक्टर कई स्तरों से आश्वस्त होते हैं। पुष्टि के बाद आप उपचार के लिए भी जा सकते हैं। मेनोपॉज के दौरान टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी के जरिए इसके लक्षणों में सुधार किया जा सकता है। हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरपी महिला और पुरुष दोनों करवा सकते हैं।हालांकि इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि रिप्लेसमेंट थेरपी से कई मामलों में हृदय रोग जैसे कई साइड इफेक्ट भी देखने को मिलते हैं।
न्यूट्रिशनिस्ट और वैलनेस एक्सपर्ट वरुण कत्यालके अनुसार बढ़ती उम्र में व्यक्ति को संतुलित और पौष्टिक आहार का विकल्प चुनना चाहिए। इसके अलावा जंक फूड से बचने की कोशिश करें। वसा, शर्करा और प्रोटीन का सेवन व्यक्ति के टेस्टोस्टेरोन के स्तर को भी प्रभावित करता है। अपने आहार में जिंक (मशरूम, पालक, ब्रोकली आदि), ओमेगा-3 (नट्स, सैल्मन, सार्डिन, चिया सीड्स, आदि), विटामिन डी, और कैल्शियम (डेयरी उत्पाद, सोया आदि) जैसे पर्याप्त पोषक तत्वों को शामिल करें। ऐसे खाद्य पदार्थों से बचें जो बहुत मीठे या नमकीन, कैफीन और खराब वसा वाले होते हैं। इनका अधिक सेवन करने से शरीर की कार्यक्षमता ही नहीं हार्मोन उत्पादन का कार्य भी बाधित होता है।
पुरुष रजोनिवृत्ति के लक्षणों के लिए सबसे बेहतरीन उपचार स्वस्थ जीवन शैली है। उदाहरण के लिए, आपका डॉक्टर आपको नीचे बताई गई सलाह दे सकता हैं।
-स्वस्थ आहार खाएं
-नियमित व्यायाम करें
-पर्याप्त नींद लो
-अपने तनाव को कम करें
इन जीवनशैली को अपनाकर सभी पुरुष लाभान्वित हो सकते हैं। इन आदतों को अपनाने के बाद जो पुरुष रजोनिवृत्ति के लक्षणों का अनुभव कर रहे हैं, उनके स्वास्थ्य में परिवर्तन देखने को मिल सकता है।
वास्तु टिप्स / शौर्यपथ /जीवन में अपने घर के लिए व्यक्ति दिन-रात जुटा रहता है। वर्तमान में जमीन की कमी और अधिक लोगों को आवास उपलब्ध कराने के लिए फ्लैट का चलन बढ़ा है। शहरों में मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बन रही हैं। आवास में सुख-शांति और समृद्धि के लिए वास्तु के नियमों का पालन करना बहुत जरुरी है। मकान केवल चार दीवारों से घिरी हुई आकृति नहीं है। यदि घर में शांति नहीं है तो सब बेकार है। ऐसे में यदि आप भी फ्लैट लेने का विचार कर रहे हैं तो वास्तु के नियमों का आकलन अवश्य कराएं। जानिए फ्लैट खरीदते वक्त किन बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।
-भूमि के बारे में पूरी जानकारी अवश्य लें। जमीन कैसी है, भवन निर्माण से पहले भूमि किस काम के लिए प्रयुक्त होती थी, इसका पता करें। बिल्डिंग बनाने से पहले जमीन पर कोई क्रब या कब्रिस्तान तो नहीं था। वास्तु नियमों के अनुसार बिल्डिंग के नीचे दबी वस्तु सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती हैं। हालांकि तीन मंजिल से ऊपर फ्लैट पर इस तरह के दोष का असर नहीं होता। यानी तीन मंजिल से ऊपर का फ्लैट है तो फिर बिल्डिंग की जमीन की पूर्व स्थिति अधिक मायने नहीं रखती।
-घर में रसोई सबसे महत्वपूर्ण है। फ्लैट में रसोई की स्थिति को अवश्य जांच लें। आग्नेय कोण में बनी रसोई सबसे श्रेष्ठ होती है। इस दिशा में बिजली के उपकरण रखने में भी कोई परेशानी नहीं होती है। यदि फ्लैट वास्तु के अनुसान निर्मित है तो इस दिशा के स्वामी ग्रह प्रसन्न रहते हैं। इससे घर में सुख-समृद्धि और प्रसन्नता बनी रहती है।
-फ्लैट में ध्यान रखें बाथरूम और टॉयलेट नैऋत्य दिशा यानी दक्षिण-पश्चिम और ईशान कोण में नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा है तो घर में कलह और तनाव बना रहेगा। उत्तर-पूर्वी यानी ईशान कोण जल का प्रतीक है। यहां पीने के पानी का स्रोत होना चाहिए। वायव्य कोण में सेप्टिक टैंक एवं शौचालय हेाना उत्तम रहता है।
-भवन में बेडरूम पूर्व-दक्षिण दिशा में नहीं होना चाहिए। ऐसा होने पर जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। खुशियां प्रभावित होने लगती हैं।
सेहत / शौर्यपथ /आयुर्वेद के अनुसार मिट्टी के बर्तन में पका भोजन खाने से व्यक्ति कई तरह के रोगों से दूर रहता है। कब्ज, गैस जैसी समस्याएं व्यक्ति से कोसों दूर रहती हैं। आपने भी अक्सर घर के बड़े-बुर्जुगों को यह कहते सुना होगा कि मिट्टी के बर्तन में बना खाना खाने से शरीर को कई फायदे होते हैं। दरअसल, मिट्टी के बर्तन में पका खाना न सिर्फ स्वादिष्ट बल्कि पौष्टिक भी होता है। इन बर्तनों पर भोजन पकाने से उसके पोषक तत्व खत्म नहीं होते हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ फायदे जो व्यक्ति को मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाकर खाने से मिलते हैं।
नेहा पठानिया पारस अस्पताल, गुड़गांव में सीनियर न्यूट्रिशनिस्ट और वेट लॉस एंड थेरप्यूटिक डाइट एक्स्पर्ट कहती हैं कि आजकल व्यस्त जीवनशैली के चलते लोगों को खान-पान की अच्छी आदतों के साथ हेल्दी लाइफस्टाइल मेंटेन करना भी काफी मुश्किल हो गया है। जिसकी वजह से लोग बीमार भी अधिक पड़ने लगे हैं। लेकिन बात अगर मिट्टी के तवे पर बनाई जाने वाली रोटी की करें तो यह आपकी समस्या काफी हद तक कम करने में आपकी मदद कर सकती है। मिट्टी के तवे पर रोटी बनाकर खाने से न सिर्फ आपका पाचन तंत्र स्वस्थ बना रहता है बल्कि आप कई रोगों से भी दूर रहते हैं।
मिट्टी के तवे पर बनी रोटी खाने के ये हैं फायदे-
गैस से छुटकारा-
घंटों एक ही जगह बैठकर काम करने से अधिकतर लोगों को पेट में गैस की समस्या होने लगती है। अगर आप भी इस समस्या से जुझ रहे हैं तो मिट्टी के तवे पर रोटी पकाकर खाएं। आपको जल्दी ही पेट गैस की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा।
कब्ज से राहत-
गलत खान-पान आजकल ज्यादातर लोगों के लिए कब्ज का कारण बनता जा रहा है।इस परेशानी से राहत पाने के लिए मिट्टी के तवे पर सेंकी रोटी को अपनी डाइट में शामिल करें।
रोगों से बचाए रखने में करता है मदद-
मिट्टी के तवे पर रोटी पकाकर खाने से यह मिट्टी के तत्वों को अवशोषित करके रोटी की पौष्टिकता बढ़ देता है। इसमें मौजूद प्रोटीन बीमारियों से बचाने में भी मदद करते हैं।
नहीं जलती है रोटी
मिट्टी के तवे को गर्म होने में समय लगता है, इसलिए एक बार ये गर्म हो जाएं तो इसमें रोटी सेंकते समय ये जलती नहीं है। और काफी समय तक रोटियां खराब भी नहीं होती है।
मिट्टी का तवा दूसरे तवों से क्यों है बेहतर-
विशेषज्ञों की मानें तो मिट्टी के तवे पर रोटी बनाने से उसका एक भी पोषक तत्व नष्ट नहीं होता है। जबकि एल्यूमीनियम के बर्तन में खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से 7 प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। साथ ही कांसे के बर्तन में बने खाने से 3 प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। केवल मिट्टी के बर्तन में बने खाने में 100 प्रतिशत पोषक तत्व मौजूद रहते हैं।
रखें इन बातों का ध्यान-
-मिट्टी के तवे पर रोटी कभी भी तेज आंच पर न सेंकें। ऐसा करने से आपका तवा चटक सकता है।
- इस तवे का इस्तेमाल करते समय इस पर पानी लगाना चाहिए।
-मिट्टी के तवे को कभी भी साबुन से नहीं धोना चाहिए। ऐसा करने से यह साबुन को अवशोषित कर लेता है।
-मिट्टी के तवे को साफ करने के लिए साफ कपड़े का यूज करें।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ /बदलती जीवनशैली में लोगों का खानपान बदला है। इसके साथ फूड एलर्जी के मामले भी बढ़े हैं। मगर कई बार गलत धारणा के चलते भी लोग यह मान लेते हैं कि वे फूड एलर्जी का शिकार हैं। जबकि सच्चाई यह होती है कि अक्सर वह एक ऐसी स्थिति में होते हैं, जिसका आसानी से निदान और उपचार किया जा सकता है। एक हालिया अध्ययन के मुताबिक जिसे लोग फूड एलर्जी मानकर बैठे होते हैं, दरअसल वह कुछ और ही समस्या हो सकती है।
ग्लासगो कैलेडोनियन विश्वविद्यालय में हुए एक हालिया अध्ययन के अनुसार 35 प्रतिशत तक लोग खुद को या अपने बच्चों में गलत धारणा के चलते फूड एलर्जी या फूड इंटोलरेंस मान बैठते हैं और गलत तरीके से इसका निदान करते हैं। सही चिकित्सकीय सलाह लेने के बजाय वह खुद ही इसका उपचार शुरू कर देते हैं। अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं ने सबसे आम गलत धारणाओं को बताया है, जो फूड एलर्जी को लेकर हैं।
खाने के बाद लक्षण मतलब फूड एलर्जी
अक्सर लोग यह सोचते हैं कि कोई फूड आइटम खाने के बाद उनमें लक्षण नजर आए हैं, इसलिए यह फूड एलर्जी है। मगर ऐसा जरूरी नहीं है। भोजन के प्रति प्रतिकूल प्रतिक्रिया की कई वजह हो सकती हैं और यह सभी लक्षण ‘खाद्य अतिसंवेदनशीलता’ के तहत आते हैं। दरअसल फूड एलर्जी में ऐसी प्रतिक्रियाएं होती हैं, जिनमें प्रतिरक्षा प्रणाली शामिल होती। एलर्जी प्रतिक्रियाएं जिनमें एंटीबॉडी इम्युनोग्लोबुलिन ई शामिल है, इसे अक्सर आईजीई-मीडिएट (आईजीई) एलर्जी के रूप में जाना जाता है।
ब्रिटेन की करीब 10 प्रतिशत आबादी इससे प्रभावित होने का अनुमान है। इसमें हल्के से लेकर गंभीर तक लक्षण दिखाई दे सकते हैं, जैसे- खुजली वाली आंखें, एनाफिलेक्सिस- एक गंभीर, तेज एलर्जी प्रतिक्रिया, जिससे गले या जीभ में गंभीर सूजन, सांस लेने में कठिनाई हो सकती है, ब्लड प्रेशर बहुत कम हो सकता है यह मृत्यु की वजह भी बन सकती है। ये लक्षण आमतौर पर बहुत तेजी से उभरते हैं। खाना खाने के तुरंत बाद और गंभीर होने पर तुरंत इलाज की जरुरत होत है। अन्य एलर्जी प्रतिक्रिया, जिनमें प्रतिरक्षा प्रणाली शामिल होती है, इन्हें गैर-आईजीई मीडिएट एलर्जी कहा जाता है।
इसमें लक्षणों की शुरुआत तत्काल या धीमी हो सकती है। इसमें लाल दाने, खुजली, सीने में जलन शामिल हो सकती है। यह लक्षण फूड इंटोलरेंस से मिलते-जुलते हैं। आईजीई स्थिति में एलर्जी फूड से परहेज करना बेहद जरूरी होता है। लेकिन यह इसके कारणों पर निर्भर होता है।
ऑनलाइन एलर्जी टेस्ट करना
कुछ लोग इसका समाधान ऑनलाइन ब्राउजिंग के जरिए तलाशने लगते हैं या लक्षण आने पर केमिस्ट के पास चले जाते हैं। इसके बाद संबंधित फूड आइटम की लंबी सीरीज से उनका परहेज शुरू हो जाता है, जबकि फूड एलर्जी से संबंधित कई परीक्षण साक्ष्य-आधारित नहीं हैं। इनके चक्कर में खुद ही कई फूड आइटम का सेवन बंद कर दिया जाता है और यह अनुचित है। प्रमुख शोधकर्ता और ह्यूमन न्यूट्रीशन के लेक्चरर और डाइटीशियन मैरियन कनिंघम का कहना है कि इससे न केवल पोषण की कमी का जोखिम बढ़ता है, बल्कि एन्जाइटी होने लगती है। सामाजिक जीवन पर प्रभाव पड़ने लगता है और क्लालिटी लाइफ प्रभावित होने लगती है। वर्तमान में उपलब्ध एकमात्र साक्ष्य-आधारित एलर्जी परीक्षण आईजीई (तत्काल प्रतिक्रिया) है। यह स्किन टेस्ट और आईजीई ब्लड टेस्ट होते हैं।
खाने से दूरी एक्जिमा से बचाएगी
यह धारणा बिल्कुल गलत है। एक्जिमा से बचने के लिए सिर्फ खाना जिम्मेदार नहीं होता, पर्यावरणीय प्रभाव भी पड़ता है। इसके चक्कर में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि खाने से दूरी बनाने पर क्या वास्तव में मदद मिल रही है। शोधकर्ताओं का कहना है कि एक्जिमा वाले कुछ लोगों को गंभीर आईजीई फूड एलर्जी के कारण कुछ खाद्य पदार्थों से बचने की जरूरत हो सकती है। मगर खाने में किसी भी बदलाव या प्रतिबंध से पहले डॉक्टरी परामर्श जरूरी है। साथ ही कुछ खाद्य पदार्थों को छोड़ने की बजाय सावधानीपूर्वक योजना और निरंतर सतर्कता की आवश्यकता होती है।
*ढाई बछर म बगरगे ढाई आखर प्रेम*
"आगे सुराज के दिन रे संगी, बांध ले पागा साज ले बंडी, कर्मा गीत गा के आजा,
झूम जा संगी मोर"
जन्मदिन विशेष / शौर्यपथ / ए गीत ल गावत मेंह 15अगस्त माने सुराजी के दिन तिरंगा फहरा के पारा भर के लईका मन ल बूंदी सेव बांटत रहेंव।तभे मोर छोटे बेटा विरासत हर पूछीस- पापा जी ,भौंरा, गेंड़ी और सोंटा खाना क्या होता है?
ओखर सवाल सुनके में ह भक खा गेंव फेर ओला बताएंवं -बेटा ,लट्टू को भौंरा कहते हैं। बांस से निर्मित होती है "गेंड़ी", हरेली त्यौहार के दिन गेंड़ी चढ़ने एवं नृत्य करने का रिवाज है। छत्तीसगढ़ के राऊत समाज के लोग दीपावली के समय देवी देवता की आराधना करते हुए तेंदू पेड़ की लाठी लहराते नाचते हैं।दोहा बोलते हुए, मोटी रस्सी से अन्य साथियों के हाथ पैर को सटा सट मारते हैं।इस प्रकिया को ही सोंटा खाना कहते हैं। लेकिन अचानक सोंटा भौंराऔर गेंड़ी के बारे जानने की जिज्ञासा का जन्म तुम्हारे मन में क्यों हुआ?
इस पर बेटे ने समाचार पत्रों में प्रकाशित माननीय मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल जी का भौंरा चलाते, गेंड़ी चढ़ते और सोंटा खाते हुए फोटो को दिखा कर बताया इसे देखते ही मुझे जानने की जिज्ञासा हुई।
ए घटना हर मोला भरोसा देवा दीस कि घर के सियान जागत रही त बाहिर के पहूना कभू घर के सियान नई बन सकय।आज गरब के साथ एखर बखान करत छत्तीसगढ़ के रहोइया कहत हांवंय ---
"हमर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री आए छत्तीसगढ़िया,
दिखत म सुंदर अउ
आदत म बढ़िया"
*ढाई साल म बाढ़गे ढाई आखर प्रेम*
छत्तीसगढ़ के जौन रीति- रिवाज ,तीज -तिहार खाई- खजानी मन हर नंदावत रहिन तेन लअब छत्तीसगढ़ के लईका लईका जान जाहीं। काबर कि खाली ढ़ाई साल के अपन कार्यकाल म मुख्यमंत्री जी ह अपन,मन वचन अउ करम म कबीर दास जी के दोहा ल चरितार्थ कर दिस हावय------
" ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय"। संगवारी हो मया दुलार के धार ह
छत्तीसगढ़िया मन के हिरदे म अरपा पैरी अउ महानदी के धार कस बारहों महीना बोहाथे।ए धारा ह हमर भूंइया के पहिचान आए।जेहर सुखावत रहिस, काबर की इहां के नरवा गरवा घुरवा अउ बारी कोति देखोईया पहिली के "रखवार माने सरकार" ह चेत नई लगाईस।फेर भूपेश सरकार ह कुरसी म बइठते सांथ "गड़बो नवा छत्तीसगढ़" के नवा मंतर ल जन जन के कान म फूंक दीस।
*गोबर बनीस गरीब के गरब*
छत्तीसगढ़ के इतिहास म पहिलि घंव गोबर के गुन ल बढ़ाए के उपाय मुख्यमंत्री भुपेश जी के देखरेख म सुरू होइस।पहिली पहिली तो लोगन अइसन उदिम ल हंसी-मजाक म उड़ावत रहिन,फेर गांव सहर म आज गोबर के राज चलत हे।गोबर ले बने खातू ल बेंच बेंच के दाई दीदी मन के स्वावलंबी समूह के परिवार अपन फटफटी चढ़े के सपना पूरा करत हांवंय। महीन ल महान बनाए के अइसनेहे गुन ल देखावत मुख्यमंत्री जी ह छत्तीसगढ़ के चिंन्हारी ल बंचाए बर कई ठिन नवाचारी कदम बढाइस हावय ।जेमा विश्व आदिवासी दिवस,तीजा, हरेली, भक्त माता कर्मा जयंती के दिन सरकारी छुट्टी फैसला हर जबड़ बरदान बनगे हे।
*विश्व आदिवासी दिवस म छुट्टी काबर*
छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा म 31प्रतिशत अबादी अनुसूचित जाति --जनजातिके हावय। जेमा42जनजाति के मिंझरा हे।जिंखर कला संस्कृति ह छत्तीसगढ़ ल गांव के चौपाल ले उंचा के संसार के कपार म बैठारिस हावय।देस के सुराजी खातिर 1857के क्रांति के पहिली1824म आदिवासी समाज के बीर बहादुर ललना मन ह बघवा कस गरजत फिरंगी मन के माथ म पसीना लान देवंय।अइसन आदिवासी समाज ल सुमिरे बर खास दिन 9 अगस्त के छुट्टी सही अरथ म आदिवासी माटी के मान आए।
*हरेक के पीरा हरे के परब हरेली के पूछारी*
छत्तीसगढ़ के पहली अउ जनमन के बड़े तिहार हरेली हर आय। एखर बर सरकारी छुट्टी दे के भूपेश सरकार हर ऐतिहासिक फैसला लीस हावय।अब छत्तीसगढ़ के संगे संगे दूसर राज म हरेली के डंका अइसे बाजही जैसे दूसर राज के तिहार के डंका छत्तीसगढ़ म बाजथे। अइसन करके नवा सरकार हर नवा जोत जलावत संदेसा दीस हावय----
जिस गांव में पानी नहीं गिरता,
वहां की फसलें खराब हो जाती हैं,
जहां त्यौहारों का मान नहीं होता,
वहां की नस्लें तबाह हो जाती हैं।
*भूंइया के भगवान किसान के मान*
छत्तीसगढ़ ल धान के कटोरा केहे जाथे। किसान के जांगर अउ नांगर के चलते कोठी म धान पलपलाथे।फेर भूंइया के भगवान किसान के दसा ल अकाल -दूकाल करजा-बोड़ी हर बिगाड़त रहिस।एला समझ के किसान के पीरा हरे बर,धान के संगे संग साग- भाझी बोंय बर,मछरी पालन बर,बने दाम म अनाज खरीदी, सस्ता बिजली,बिजली चलित पम्प देहे के भूपेश सरकार के फैसला हर हरित क्रांति लान दीस हावय। गोधन न्याय योजना, राजीव गांधी किसान एवं ग्रामीण भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना के बल म किसान परिवार के पोठ रोठ होय के ,"गेंहू म बोंए राई "के चरचा देसभर म होवत हे।इही पाय के छत्तीसगढ़ राज ल बड़े-बड़े राष्ट्रीय पुरस्कार मिलत हावय।
*आधा दाम म बिजली मिलत हे,लोग लईका पढ़त लिखत हें*
छत्तीसगढ़ राज ल विद्युत कुबेर तको केहे जाथे।इहां बिजली ह बाढ़े पूरा के पानी कस बारहों महीना भरे रहिथे,इही पाए के पहली घंव इहां के जम्मो घर म 400 यूनिट तक आधा दाम म बिजली देहे अभूतपूर्व फैसला मुख्यमंत्री जी करिन।ए योजना हर गरीब परिवार बर बरदान बनगीस हे।
*लोक कलाकार मन के कका*
छत्तीसगढ़ राज बने के बाद पहली घंव बछर भर बड़े-बड़े लोकोत्सव के आयोजन होय लागीस हे। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जी ह "कलाकार मन के कका"बनके उंखर मुरझावत चेहरा म उजास लाए के काम करे हावय। गांव गांव के कलामंच,रमायन मंडली ल बढ़हर देहे बर जबड़ नगदी ईनाम देहे के फैसला करे हावय। कोरोनावायरस के चपेट में आय कतको कलाकार ल सहारा दीस हावय।
*संवार दीस माता कौशल्या के मंदिर*
गरब के बात आय कि देस भर छत्तीसेगढ़ म माता कौशल्या के मंदिर चंदखुरी म हावय।जेखर बने साल सम्हाल करोइया कोनो आघू नई आइन।माता कौशल्या के मंदिर अउ छत्तीसगढ़ के भांचा भगवान श्रीराम के वनगमनपथ ल संवारे के काम तको भूपेश सरकार हर करत हावय तभे तो जनमन के बोल गूजत हे---
बिगड़े हुए वक्त को संवारे वो घड़ीसाज है भूपेश ,
मंदिरों की घंटियों में गूंजे
वो पवित्र आवाज है भूपेश
*बेटी सबके सेथी, बेटी आय पोथी*
एक जमाना म छत्तीसगढ़ ला "बैकवर्ड स्टेट" के नाम मिले रहीस। जेला धोवत मुख्यमंत्री जी ह आज " मोर डेवलपमेंट स्टेट"के नवा पहिचान देवा दीस हावय। इहां के बेटी मन ला बेटा बरोबर मान मिलत हे। पढ़े-लिखे बर पहली घंवं सरकारी अंग्रेजी स्कूल चालू होए हावे ।दाई महतारी मन के इलाज पानी बर एंबुलेंस अउ हाट बाजार में चलत फिरत अस्पताल तको मिलत हावय। इही पाए के चारों मुड़ा मिलजुल के लोगन कहत हांवय---
चले तो हवा रुके तो चांद जैसा है ,
ए शख्स धूप में देखो तो छांव जैसा है।
*मोर दुलरवा बेटा भूपेश*
छत्तीसगढ़ महतारी के बेटी अउ मुख्यमंत्री जी के दुलौरिन दाई स्व.बिंदेश्वरी हर बालपन ले जान डारे रहीस कि मोर बेटा एक दिन छत्तीसगढ़ के राजकाज संभालही।इही पाय के ओखर मन में भाव रहय
" दिन बड़ा बने कटथे,
कहूं देख ले थों बड़े फजर ओखर फेस, बनही एक दिन ओहर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, जेखर नाम हवय दुलरवा बेटा भूपेश ।बालपन ले मुख्यमंत्री जी के महतारी हर ओला संस्कार देवत पाठ पढ़ाए हावय---
जीवन की किताबों पर,
बेशक नया कव्हर चढ़ाएं,
पर बिखरे पन्नों को पहले प्यार से चिपकाएं।
मुख्यमंत्री जी ल जनमदिन के गाड़ा गाड़ा बधाई अउ मंगलकामना हे। जय- विजय छत्तीसगढ़।
*विजय मिश्रा "अमित"*
पूर्वअति.महाप्रबंधक(जन.)
छग स्टेट पावर कंपनीज
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / अक्सर महिलाओं की यह शिकायत रहती है कि बरसात के मौसम में डिब्बे में रखे-रखे स्नैक्स या नमकीन जैसी चीजें सीलने की वजह से खराब हो जाती है। अगर आपके साथ भी यही समस्या बनी रहती है तो टेंशन छोड़ अपनाएं ये टिप्स एंड ट्रिक्स। इन टिप्स को अपनाकर आप मानसून में किसी भी स्नैक्स को बड़ी आसानी से खराब होने से बचा सकती हैं। आइए जानते हैं आखिर क्या हैं ये आसान किचन टिप्स।
नमी वाली जगह से रखें दूर-
कई बार नमी वाली जगह पर नमकीन रखने से उसमें फंगस लग जाती है। ऐसे में इसे खराब होने से बचाने के लिए आप उसे ऐसी जगह पर रखें जहां नमकीन को हवा लगे। इसके अलावा नमकीन के डिब्बे को फर्श पर रखने की जगह किचन कैबिन या फिर खिड़की के पास रखें। बारिश के मौसम में स्नैक्स ज्यादातर नमी के कारण खराब हो जाते हैं।
प्लास्टिक जार का न करें इस्तेमाल-
बरसात के समय में नमकीन को प्लास्टिक के डिब्बे में नहीं बल्कि कांच के जार में रखें। प्लास्टिक के डिब्बे में नमकीन रखने से वह जल्दी खराब हो सकती हैं लेकिन, शीशे के जार में यह सुरक्षित रहती है।
धूप से बचाएं-
अक्सर आपने सुना होगा मसाले, दाल, चावल या आटा धूप में रखने से ठीक हो जाते हैं। लेकिन नमकीन के साथ ऐसा नहीं है। यह धूप में रखने से ठीक नहीं बल्कि खराब हो जाती है। धूप और हवा नमकीन को खराब करने के लिए काफी है।
ये टिप्स भी है कमाल-
-जार से नमकीन निकालने के बाद उसका कवर अच्छी तरह बंद कर दें।
-एक ही जार में मिक्स नमकीन रखने की जगह, एक जार में एक ही तरह का नमकीन रखें।
-नमकीन को प्लास्टिक में नहीं कांच के जार में रखें। इससे बरसात के मौसम में नमकीन ज्यादा दिन तक सुरक्षित रहती है।
सेहत /शौर्यपथ /बारिश के मौसम में वायरल फीवर का डर ज्यादा रहता है। हम आपको बता रहे हैं इससे बचाव के 5 रामबाण घरेलू नुस्खे, लेकिन उससे पहले जानते हैं वायरल फीवर के लक्षण-
वायरल फीवर के लक्षण-
वायरल फीवर होने पर गले में दर्द,
सिर दर्द,
जोड़ों में दर्द,
आंखों का लाल होना,
माथे का बहुत तेज गर्म होना,
खांसी,
थकान,
उल्टी,
दस्त जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
वायरल फीवर के नाम से ही समझा जा सकता है कि ये एक व्यक्ति से दूसरे को भी हो सकता है।
जानिए इससे बचाव के घरेलू नुस्खे-
1 हल्दी और सौंठ का पाउडर- सौंठ यानी कि अदरक का पाउडर और अदरक में होते है फीवर को ठीक करने वाले गुण। इसलिए एक चम्मच काली मिर्च के चूर्ण में एक छोटी चम्मच हल्दी, एक चम्मच सौंठ का चूर्ण और थोड़ी सी चीनी मिलाएं। अब इसे एक कप पानी में डालकर गर्म करें, फिर ठंडा करके पिएं। इससे वायरल फीवर खत्म होने में मदद मिलेगी।
2 तुलसी का इस्तेमाल करें- तुलसी में एंटीबायोटिक गुण होते हैं जिससे शरीर के अंदर के वायरस खत्म होते हैं। इसलिए एक चम्मच लौंग के चूर्ण में 10-15 तुलसी के ताजे पत्तों को मिलाएं। अब इसे 1 लीटर पानी में डालकर इतना उबालें जब तक यह सूखकर आधा न हो जाए। अब इसे छानें और ठंडा करके हर 1 घंटे में पिएं। ऐसा करने से वायरल से जल्द ही आराम मिलेगा।
3 धनिये की चाय पिएं- धनिये में कई औषधीय गुण होते हैं। इसकी चाय बनाकर पीने से भी वायरल में जल्द आराम मिलता है।
4 मेथी का पानी पिएं- एक कप मेथी के दानों को रातभर भिगों लें और सुबह इसे छानकर हर एक घंटे में पिएं।
5 नींबू और शहद- नींबू का रस और शहद भी वायरल फीवर के असर को कम करते हैं। आप शहद और नींबू का रस का सेवन भी कर सकते हैं।
आस्था /शौर्यपथ /वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में रखी हुई हैं। इनमें से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जिन्हें यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है। यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है। उल्लेखनीय है कि यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है। 23 अगस्त
2007 में यूनेस्को के विश्व स्मृति रजिस्टर में ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियां शामिल की गईं थी। आओ जानते हैं ऋग्वेद के 25 आश्चर्यजनक तथ्य।
1. दुनिया का पहला धर्म और विज्ञान का ग्रंथ ऋग्वेद है। इसे दुनिया की प्रथम पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है।
2. ऋग्वेद का ज्ञान हजारों वर्ष पुराना है जिसे वाचिक परंपरा के माध्यम से संवरक्षित रखा गया। हालांकि संस्कृत पांडुलिपियां बनाने की शुरुआत हुई तब ऋग्वेद को लिपिबद्ध किया गया। इसीलिए यह नहीं समझना चाहिए कि वैदिक काल 1500 ई.पू. विद्यमान था।
3. ऋग्वेद के ही ज्ञान को विषयबद्ध किए जाने के चलते यजुर्वेद, सामवेद और बाद में अथर्ववेद लिखा गया। जो कुछ भी इन तीनों में है वह सभी ऋग्वेद में मिलेगा।
4. वेद के तीन भाग राम के काल में पुरुरवा ऋषि ने किए थे, जिसे वेदत्रयी कहे गए हैं। फिर अंत में अथर्ववेद को लिखा अथर्वा ऋषि ने। महाभारत काल में ऋषि वेदव्यसजी ने इस ज्ञान को पुन: क्रमबद्ध करके अपने शिष्यों को सुनाया।
5. 'वेद' परमेश्वर के मुख से निकला हुआ 'परावाक' है, वह 'अनादि' एवं 'नित्य' कहा गया है। वह अपौरूषेय ही है। इस सर्वप्रथज्ञ ब्रह्मा ने सुना, फिर अग्नि, वायु, आदित्य और (तु अर्थात) अंगिरा से ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।
6. ऋग्वेद से ही अन्य वेदों का जन्म हुआ और सभी वेदों से उपनिषदों की रचना हुई। उपनिषद 1008 थे जिसमें से अब केवल 108 पाए जाते हैं।
7. वेद और उपनिषदों के आधार पर ही गीता का ज्ञान प्रकट हुआ। गीता सभी वेद और उपनिषदों का सार या कहें कि निचोड़ है।
8. ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। ऋग्वेद सबसे पहला वेद है जो पद्यात्मक है। इसके 10 मंडल (अध्याय) में 1028 सूक्त है जिसमें 11 हजार मंत्र हैं। इस वेद की 5 शाखाएं हैं - शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन।
9. ऋग्वेद में तात्कालिन काल की भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है।
10. ऋग्वेद में में जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है। इसके साथ ही अणु-परमाणु और अंतरिक्षा आदि के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है।
11. ऋग्वेद में ब्रह्मांड कैसा है और परमात्मा का अस्तित्व है या नहीं इस संबंध में बहुत ही गहन और गंभीर वर्णन प्रमाणों और तर्कों के साथ मिलता है।
12. ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि सूक्त यानी दवाओं का जिक्र मिलता है। इसमें औषधियों की संख्या 125 के लगभग बताई गई है, जो कि 107 स्थानों पर पाई जाती है। औषधि में सोम का विशेष वर्णन है। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने की कथा भी मिलती है।
13. ऋग्वेद में उस काल का सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक इतिहास का वर्णम भी मिलता है
14. ऋग्वेद में ही विश्व प्रसिद्ध दाशराज्ञ के युद्ध का वर्णन है जिसे विश्व इतिहास में 'बैटल ऑफ टेन किंग' के नाम से भी जाना जाता है।
इसमें आर्यों की राजनीतिक प्रणाली एवं इतिहास के विषय में जानकारी प्राप्त होती है
15. ऋग्वेद के मन्त्रों या ऋचाओं की रचना किसी एक ऋषि ने एक निश्चित अवधि में नहीं की, अपितु विभिन्न काल में विभिन्न ऋषियों द्वारा ये रची और संकलित की गयीं।
16. ऋग्वेद में यातुधानों को यज्ञों में बाधा डालने वाला तथा पवित्रात्माओं को कष्ट पहुंचाने वाला कहा गया है।
17. ऋग्वेद काल में सुर, असुर, राक्षस, दानव, किन्नर, नाग, गंधर्व, चारण, आदि विभाजन को महत्व दिया जाता था चार वर्णों को नहीं।
18. ऋग्वेद में कई ऋषियों द्वारा रचित विभिन्न छंदों में लगभग 400 स्तुतियां या ऋचाएं हैं। ये स्तुतियां अग्नि, वायु, वरुण, इन्द्र, विश्वदेव, मरुत, प्रजापति, सूर्य, उषा, पूषा, रुद्र, सविता आदि देवताओं को समर्पित हैं।
19. ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के रचयिता अनेक ऋषि हैं जबकि द्वितीय के गृत्समय, तृतीय के विश्वासमित्र, चतुर्थ के वामदेव, पंचम के अत्रि, षष्ठम् के भारद्वाज, सप्तम के वसिष्ठ, अष्ठम के कण्व व अंगिरा, नवम् और दशम मंडल के अनेक ऋषि हुए हैं।
20. ऋग्वेद में दो प्रकार के विभाग मिलते हैं- 1.अष्टक क्रम और 2.मण्डलक्रम। अष्टक क्रम में समस्त ग्रंथ आठ अष्टकों तथा प्रत्येक अष्टक आठ अध्यायों में विभाजित है। प्रत्येक अध्याय वर्गो में विभक्त है। समस्त वर्गो की संख्या 2006 है। इसी प्रकार मण्डलक्रम में समस्त ग्रन्थ 10 मण्डलों में विभाजित है। मण्डल अनुवाक, अनुवाक सूक्त तथा सूक्त मंत्र या ॠचाओं में विभाजित है। दशों मण्डलों में 85 अनुवाक, 1028 सूक्त हैं। इनके अतिरिक्त 11 बालखिल्य सूक्त हैं। ऋग्वेद के समस्य सूक्तों के ऋचाओं (मंत्रों) की संख्या 10600 है।
21. ऋग्वेद के उपवेद:- ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद है। आयुर्वेद के कर्ता धन्वंतरि देव हैं।
22. ऋग्वेद के उपनिषद:- वर्तमान में ऋग्वेद के 10 उपनिषद पाए जाते हैं। संभवत: इनके नाम ये हैं- ऐतरेय, आत्मबोध, कौषीतकि, मूद्गल, निर्वाण, नादबिंदू, अक्षमाया, त्रिपुरा, बह्वरुका और सौभाग्यलक्ष्मी।
23. ऋग्वेद के ब्रह्मण ग्रंथ : ब्राह्मण ग्रंथों की संख्या 13 है, जिसमें ऋग्वेद के 2 ब्रह्मण ग्रंथ हैं। 1. ऐतरेयब्राह्मण-(शैशिरीयशाकलशाखा) और 2. कौषीतकि- (या शांखायन) ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)। वेद के मंत्र विभाग को 'संहिता' भी कहते हैं। संहितापरक विवेचन को 'आरण्यक' एवं संहितापरक भाष्य को 'ब्राह्मण ग्रंथ' कहते हैं।
24. अरण्यक ग्रंथ : ऐतरेय और सांख्य।
25. ऋग्वेद में ज्ञान, विज्ञान, खगोल, भूगोल, धर्म, अध्यात्म, राजनीति, समाज, शिक्षा, संस्कृति, नैतिकता, नियम, ईश्वर, देवता, भगवान, मोक्ष आदि मानव जीवन से जुड़ी सभी तरह की जानकारियां मिलती है जो आज भी प्रासंगिक है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
