August 05, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    नजरिया / शौर्यपथ /अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फिर से चुने जाने की संभावना हाल के दिनों में धूमिल हुई है। उन्होंने खुद इस बात को स्वीकार किया, जब फॉक्स न्यूज के एंकर सीन हैनिटी के साथ इंटरव्यू के दौरान वह भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि जो बिडेन ‘आपके राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं, क्योंकि कुछ लोग मुझे प्यार नहीं करते’। रियलक्लियर पॉलिटिक्स के सर्वे के मुताबिक, ट्रंप 9.3 अंकों से बिडेन से पीछे चल रहे हैं, जबकि फाइवथर्टीएट के सर्वे के मुताबिक, वह 9.6 अंकों से पीछे हैं। वह विस्कॉन्सिन, मिशिगन, पेंसिल्वेनिया और फ्लोरिडा जैसे राज्यों में भी पीछे हैं, जिनकी गिनती स्विंग स्टेट्स (अस्पष्ट चुनावी रुझान वाले राज्यों) में होती है और जहां 2016 में उन्होंने जीत हासिल की थी। जॉर्जिया और एरिजोना में वह दौड़ में हैं, जहां हरेक राष्ट्रपति चुनाव में कमोबेश रिपब्लिकन को ही वोट मिलता रहा है। टेक्सास की भी तस्वीर यही है, जहां के मतदाता मुख्य रूप से रिपब्लिकन पार्टी को ही चुनते रहे हैं।
    जब से ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं, तब से गॉलअप पोल की अनुमोदन रेटिंग में उन्हें कभी भी 49 फीसदी के ऊपर जाते नहीं देखा गया। पर अभी उनकी छवि को बट्टा इसलिए लगा है, क्योंकि अपने कार्यकाल की दो सबसे बड़ी मुश्किलों से ठीक से निपटने में वह सफल नहीं माने गए हैं। इसमें से पहला संकट कोविड-19 महामारी है, जिससे अब तक 1,28,000 से अधिक अमेरिकियों की जान जा चुकी है और करीब 28 लाख लोग संक्रमित हैं। दूसरी मुश्किल जाहिर तौर पर नस्लवाद-विरोधी आंदोलन है, जो देश में गहराई तक फैल गया है।
    कोरोना वायरस को ट्रंप ने अनाधिकार प्रवेश करने वाला खतरा माना, जो उनके कार्यकाल की सबसे बेशकीमती उपलब्धि और दूसरे कार्यकाल का टिकट चुरा बैठा है। उनकी वह कीमती उपलब्धि थी, मुल्क की बढ़ती अर्थव्यवस्था। और फिर, देश में अधिक ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने विरोध-प्रदर्शनों का इस्तेमाल किया, ताकि नवंबर के चुनाव में वह अपने समर्थकों को एकजुट कर सकें । मगर अभी समय है। लुढ़कने से पहले अपने कदम वापस खींचने के लिए ट्रंप खूब जाने जाते हैं। अक्तूबर, 2016 के ‘एक्सेस हॉलीवुड टेप’ को याद कीजिए, जिसमें ट्रंप किस तरह महिलाओं के खिलाफ अशालीन टिप्पणी करते हुए डींगें मार रहे थे। तब उनके चुनाव अभियान में जुटे कई लोगों ने हार मान ली थी। लेकिन वह 2016 का ‘अक्तूबर सरप्राइज’ था, यानी ऐसा अप्रत्याशित घटनाक्रम, जो चुनावी गुणा-गणित को पलटने में सक्षम हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिस प्रत्याशी पर आरोप लगते हैं, उसे इससे उबरने या इसका तोड़ निकालने के लिए पूरा समय नहीं मिल पाता। यह शब्द अमेरिकी चुनाव में बतौर मुहावरा खूब इस्तेमाल होता है। पर हम सभी जानते हैं कि ट्रंप इससे बखूबी बच निकले।
    भारत में भी इसके अगले महीने कुछ इसी तरह का घटनाक्रम रहा। उसका कोई नाम तो नहीं है, लेकिन इसे ‘इंडियाज नवंबर सरप्राइज’ कहा जा सकता है। यह 9 नवंबर को ट्रंप के अप्रत्याशित चयन से सामने आया, क्योंकि हिलेरी क्लिंटन की जीत को लेकर भारत आश्वस्त था। इसी खुमारी में भारतीय राजनयिक परेशान थे कि किसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बधाई फोन ट्रंप तक पहुंचे। हालांकि जल्द ही वे यह बताने में सफल रहे कि मोदी उन वैश्विक नेताओं में एक थे, जिन्होंने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को पहले फोन किया था। यहां महत्वपूर्ण बात बधाई फोन कॉल नहीं, क्योंकि वह 10 नवंबर की सुबह भी लग सकती थी, खास बात यह है कि नई दिल्ली को जो बिडेन के साथ भी अपने संपर्क के रास्ते खुले रखने चाहिए। यदि अब तक ऐसा नहीं किया गया है, तो इसकी जरूरत पड़ सकती है।
    बिडेन भारत के लिए अजनबी भी नहीं हैं। भारत को समर्थन देने का उनका लंबा रिकॉर्ड है। इसमें बतौर सीनेटर असैन्य परमाणु समझौता का समर्थन शामिल है। वह 2013 में उप-राष्ट्रपति के रूप में भारत आ चुके हैं और तब उन्होंने भारत में अपने रिश्तेदार के होने की बात कही थी, जिनसे वह अपना उपनाम साझा करते हैं। इससे भी अच्छी बात यह है कि इस हफ्ते की शुरुआत में उन्होंने कहा है कि यदि वह राष्ट्रपति बनते हैं, तो भारत के साथ अपने संबंध को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे और एच-1बी वीजा निलंबन को रद्द कर दिया जाएगा। बिडेन कदम बढ़ा चुके हैं। ऐसे में, अब भारत क्या करेगा?

     

    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / नस्लभेद एक ऐसी खामी है, जो इंसानी समाज का पीछा नहीं छोड़ रही है। दुनिया में एक समय रंग के आधार पर इंसानों की खरीद-फरोख्त से लेकर आज अमेरिका में उठते नस्लवादी जुमलों तक अनेक ऐसे स्याह पहलू हैं, जो न केवल दुखद, बल्कि शमर्नाक हैं। भले ही 17वीं सदी से एक नस्लीय विज्ञान खड़ा करने की कोशिश हुई है, जिसके तहत किसी नस्ल को रंग के आधार पर श्रेष्ठ, तो किसी को कमतर बताने का उपक्रम रहा है। लेकिन धीरे-धीरे यह सिद्ध होता गया है कि इंसानों के बीच कोई खास फर्क नहीं है। रंग के आधार पर किसी नस्ल को कमतर या श्रेष्ठ नहीं बताया जा सकता। त्वचा का बदलता रंग एक विकासवादी प्रक्रिया का हिस्सा है।
    त्वचा के रंग की विविधता पर हाल ही में एक ऐतिहासिक अध्ययन सामने आया है। जीन के विकास का पता लगाने में जुटी टीम ने यह जांचा कि जीन दुनिया भर में कैसे यात्रा करते हैं। टीम इस नतीजे पर पहुंची है कि अफ्रीकी मूल के लोगों के एक बडे़ हिस्से में जीन में ऐसे बदलाव हुए, जो उनकी त्वचा के रंग के लिए जिम्मेदार हैं। साइंस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि दो जीन, एचईआरसी 2 और ओसीए 2, यूरोपीयों की हल्की त्वचा, आंखों और बालों से जुड़े हैं। वास्तव में, अफ्रीका एक ऐसा महादेश है, जहां हर रंग के लोग पाए जाते हैं। अत: यह नहीं कहा जा सकता कि रंग के आधार पर उनमें कोई किसी से श्रेष्ठ या कमतर है। त्वचा का रंग एक जैविक प्रक्रिया मात्र है। कोई तुक नहीं कि नस्लवाद जारी रखा जाए।
    18वीं शताब्दी में स्वीडिश प्रकृतिवादी कोरोलस लिनिअस ने इंसानों को चार समूहों में बांटा था, यूरोपीय, अमेरिकी, एशियाई और अफ्रीकी। 19वीं सदी के पहले दशक में अमेरिका में एक मानव विज्ञानी सैमुअल जॉर्ज मॉर्टन हुए, जो दुनिया भर से मिली खोपड़ियों को मापते रहे और यह बताया कि रंग व श्रेष्ठता का रिश्ता मस्तिष्क के आकार से जुड़ा है। वह बताना चाहते थे कि श्वेत लोगों की खोपड़ी बड़ी होती है और इसीलिए वे श्रेष्ठ होते हैं, जबकि सच यह कि खोपड़ी के आकार से श्रेष्ठता का कोई लेना-देना नहीं है। अश्वेतों की भी खोपड़ी बड़ी होती है और श्वेतों में भी छोटी खोपड़ी पाई जाती है। पहले भी ऐसे वैज्ञानिक थे, जो बड़ी खोपड़ी और श्रेष्ठता के बीच किसी रिश्ते को खारिज करते थे, पर ऐसे वैज्ञानिकों को नजरंदाज कर दिया जाता था। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि श्वेत श्रेष्ठ हैं, इसलिए वे अश्वेतों पर राज करने के अधिकारी हैं और इसी गलत विचार का परिणाम है कि आज भी श्वेत पुलिस वाले निर्दोष अश्वेत के गले पर सवार हो उसके प्राण ले लेते हैं। अनेक वैज्ञानिक यह मानते रहे हैं कि दुनिया में करीब 63 नस्ल के इंसान रहते हैं, लेकिन श्रेष्ठता नस्ल से तय नहीं होती। 1990 से 2003 के बीच हुए डीएनए अनुसंधान के तहत आनुवंशिकी के साथ मानव वंश को डिकोड करने के बाद पाया गया कि सभी मानव समान हैं, उनमें असाधारण रूप से 99.9 प्रतिशत साम्यता है। जो 0.1 प्रतिशत अंतर है, वह सिर्फ हमारे वातावरण और कुछ अन्य बाहरी कारकों से तय होता है। वैज्ञानिक आईक्यू या बौद्धिक स्तर के आधार पर भी नस्लभेद को खारिज कर चुके हैं। संदेश स्पष्ट है, यदि हर इंसान को एक तरह का पालन-पोषण, शिक्षा और परिवेश मिले, तो इंसानों के बीच कोई असमानता नहीं रह जाएगी।

     

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूर घर वापस आ गए थे, लेकिन अब राजनीतिक हथियार की तरह उपयोग होने के बाद धीरे-धीरे उन्हीं शहरों में लौटने लगे हैं, जहां से उन्होंने वापसी की थी। मजदूरों की वापसी की मजबूरी समझी जा सकती है, क्योंकि जिस वक्त वे अपने घर लौटे थे, तब सरकार सहित तमाम संस्थानों ने उनको अपने ही राज्य में कुशलता के आधार पर रोजगार देने की बात कही थी, लेकिन मजदूरों के हाथ खाली ही रहे। अब जब सब कुछ धीरे-धीरे खुल रहा है, तो इन मजदूरों के लिए दो वक्त की रोटी जुटा पाना भी मुश्किल हो रहा है। परिवार के भरण-पोषण के लिए वे फिर परदेश का रुख करने लगे हैं, जबकि वहां इस बात की गारंटी कोई लेने को तैयार नहीं है कि यदि इस प्रकार की विपदा फिर आती है, तो क्या उन्हें सरकार पर भरोसा करना चाहिए? ऐसे में, क्या यह अच्छा नहीं होगा कि हुनर के हिसाब से उनको अपने राज्यों में ही काम मिले, ताकि उन्हें फिर से प्रवासी बनने की पीड़ा न भुगतनी पड़े?
    अभिनव त्रिपाठी
    बेल्थरा रोड, बलिया

    उकसावे में नेपाल
    आजकल भारत और नेपाल के बीच तनाव चल रहा है। बिगड़ते आपसी रिश्ते की वजह नेपाल में बढ़ता राष्ट्रवाद है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तमाम घरेलू मुद्दों पर असफल हो चुके हैं। अपनी सरकार बचाने के लिए वे लोगों में राष्ट्रवादी सोच भरना चाहते हैं। राष्ट्रवाद का होना अच्छी बात है, लेकिन जब यह साम्राज्यवाद के साथ मिल जाता है, तब बहुत खतरनाक हो जाता है। ऐसा हमें यूरोप में देखने को मिला था, जब साम्राज्यवाद से जुड़कर राष्ट्रवाद 1914 में यूरोप को महाविपदा की ओर ले गया। नेपाल का राष्ट्रवाद भी इसी कदम पर बढ़ता दिख रहा है, जो उसे महाविपदा की ओर ले जाएगा।
    चेतन कुमार कर्ण

    साथ दे विपक्ष
    लोकतंत्र में विपक्ष की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उसका काम सरकार को सलाह देना, गलत निर्णय का विरोध करना और सही फैसले का स्वागत करना है। विपक्ष का काम यह नहीं है कि वह सरकार के अच्छे कामों का भी विरोध करे। वर्तमान परिस्थिति में विपक्ष सरकार को सुझाव दे, न कि विकास के कामों को रोकने का प्रयास करे। जैसे, चीन के मुद्दे पर विपक्ष को सरकार और सेना के साथ चलना चाहिए। साथ ही सेना की कार्यशैली पर उसे सवाल नहीं उठाना चाहिए। मगर विपक्ष के ऐसा न करने से जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है। सत्ता पाने के लिए हर हद तक उतर जाना राजनीतिक दलों को शोभा नहीं देता।
    रितेश आनंद, गोड्डा, झारखंड

    सावधानी जरूरी
    विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख के अनुसार, कोरोना महामारी का अभी सबसे बुरा समय आना बाकी है। यहां उल्लेखनीय है कि चीन में लगभग छह महीने पहले कोविड-19 का पहला मामला सामने आया था। तब अनुमान लगाया गया था कि इससे अधिकतम आठ सौ लोग मारे जाएंगे, लेकिन आज कोरोना से एक करोड़ से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और पांच लाख से ज्यादा लोगों की जान यह वायरस ले चुका है। एक कहावत है कि अगर आप गीदड़ का शिकार करने जा रहे हैं, तो तैयारी शेर के शिकार की होनी चाहिए। लेकिन अपने यहां जन-सामान्य में कोविड-19 को लेकर उल्टा ही ट्रेंड दिख रहा है। बिना मास्क के घूमना, दो गज की दूरी का पालन न करना और इस बीमारी को हल्के में लेना इसके संक्रमण के ग्राफ को प्रतिदिन नई ऊंचाइयां दे रहा है। सरकार ने विगत तीन महीने में जागरूकता पैदा कर दी है, लेकिन कुछ लोग अपनी ही धुन में हैं। वे अपनी और अपने परिवार के लोगों के लिए तो संकट बुला ही रहे हैं, समाज और देश का भी अहित कर रहे हैं।
    मनोज कुमार शर्मा, स्याना

     

     

    ओपिनियन /शौर्यपथ / बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ, जब अमेरिका ने चीन की संचार कंपनी हुआवेई पर पाबंदी लगा दी थी। यहां तक कि अमेरिकी कंपनियों को भी उससे कोई संबंध रखने से रोक दिया गया। हुआवेई के स्मार्टफोन जो दुनिया भर में खासे लोकप्रिय हो रहे थे, उन पर अब गूगल प्ले स्टोर की सुविधा खत्म कर हो गई है। हुआवेई को सबसे ज्यादा झटका 5जी सेवा के मामले में लगा है। इसकी तकनीक विकसित करने के मामले में वह सबसे आगे है और अमेरिका को छोड़कर अभी तक जहां-जहां भी 5जी सेवा शुरू हुई है, ज्यादातर जगह हुआवेई की तकनीक ही इस्तेमाल हो रही है। अमेरिका का तर्क है कि हुआवेई चीन सरकार से नजदीकी रिश्ते रखने वाली कंपनी है, और वह चीन के लिए जासूसी का काम भी करती है। अमेरिका ने यही आरोप एक और चीनी कंपनी जेडटीई पर भी लगाए हैं और उस पर भी पाबंदी लग चुकी है। यह भी माना जाता है कि अमेरिका ने जो आरोप लगाए हैं, उसके पुख्ता सुबूत न होने के बावजूद इतने कड़े कदम उठाए गए हैं। ये कदम भी तब उठाए गए हैं, जब चीन और अमेरिका के बीच या तो व्यापारिक तनाव हैं या राजनयिक।
    इसके मुकाबले अगर हम भारत द्वारा 59 चीनी मोबाइल एप पर पाबंदी को देखें, तो यह न तो उतना बड़ा कदम ही दिखता है और न ही उतना कड़ा। वह भी तब, जब चीन भारत से एक बहुत बड़े सामरिक तनाव में उलझा हुआ है। ऐसे मौकों पर इस तरह की पाबंदियां कोई नई बात नहीं हैं, इसलिए पूरी दुनिया ने भी इसे सहजता से ही लिया है। यूं भी इन दिनों अक्सर कहा जाता है कि पूरी दुनिया में युद्ध का सबसे बड़ा हथियार डाटा ही है, इसलिए भी ऐसे मौकों पर उन रास्तों को बंद करना जरूरी हो जाता है, जिनसे एक देश का डाटा दूसरे देश में पहुंच सकता है। फिर यह कदम भी उस चीन के खिलाफ उठाया गया है, जो इस तरह की पाबंदियों के मामले में सबसे आगे रहा है। वाट्सएप जैसे तमाम एप पर वहां पहले से ही पाबंदी है।
    कई तरह से भारत का डाटा चीन के सर्वरों में पहुंच रहा है, यह कोई ऐसी जानकारी नहीं है, जिसकी भनक हाल-फिलहाल में ही लगी हो। इन्हीं 59 में से एक एप यूसी ब्राउजर पर तो कुछ समय पहले भी भारत में पाबंदी लगाई गई थी, लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया। तर्क तब भी डाटा का ही था। इसलिए डाटा के मामले में अभी जो चीन पर सर्जिकल स्ट्राइक की बात हो रही है, वह राजनयिक और कई भावनात्मक कारणों से जरूर महत्वपूर्ण हो सकती है, पर इससे आगे जाकर उससे कोई बड़ी उम्मीद फिलहाल नहीं बांधी जा सकती।
    दुनिया के कारोबार में डाटा बड़ी टेढ़ी चीज है। किन्हीं एक-दो देशों के एप या सर्वरों पर पाबंदी लगाकर भी आप यह नहीं सोच सकते कि इससे डाटा का प्रवाह रुक जाएगा। डाटा का बाजार इस समय शायद दुनिया का सबसे जटिल बाजार है, जिसमें कौन-सा कहां पैदा हो रहा है, कहां जा रहा है, कहां जमा हो रहा है, कहां बिक रहा है और कहां उसका इस्तेमाल हो रहा है, उसके बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। मोबाइल एप, ईमेल सर्वर और वेबसाइट आपको जो मुफ्त सेवा देते हैं, उसके बदले वे आपकी जरूरत, पसंद-नापसंद, जान-पहचान, पूछताछ, खरीदारी, आदतों से जुड़े आंकड़े जमा करते हैं और इसके पहले कि आपका अगला दिन शुरू हो, उन्हें कई जगह बेचा जा चुका होता है। डाटा के इस बाजार में विक्रेता भी हैं, उनका भंडारण करने वाले, विश्लेषण करने वाले भी हैं, उनके दलाल भी हैं, उनके खरीदार भी हैं और चोर-उचक्के भी।
    यह माना जाता है कि साइबर युग में डाटा का महत्व उतना ही है, जितना औद्योगिक क्रांति के बाद के युग में पेट्रोल का था। डाटा ही वह ईंधन है, जिससे इंटरनेट की दुनिया और इंटरनेट की कंपनियां चलती हैं। यह डाटा ही है, जिसके कारण गूगल दुनिया के बाजार में कोई भी सामान बेचे बगैर 66 अरब डॉलर के सालाना कारोबार वाली ऐसी कंपनी बन गई है, जिसकी कुल संपत्तियां 131 अरब डॉलर से भी ज्यादा हैं। डाटा से कमाई करने वाली कंपनियां आज जिस जगह पर पहुंच चुकी हैं, पेट्रोलियम का कारोबार करने वाली कोई भी कंपनी आज उसके आस-पास भी नहीं दिखती। और इस समय, जब पेट्रोलियम का बाजार लगातार उतार-चढ़ाव के झटकोंके बीच डोल रहा है, डाटा का कारोबार लगातार ऊपर की ओर जा रहा है।
    ऐसे में, यह उम्मीद व्यर्थ है कि महज चंद पाबंदियों से डाटा का प्रवाह पूरी तरह रुक जाएगा, जिसने एक तरफ तो हार्डवेयर के जरिए हमारे बाजार के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमा रखा है, और दूसरी तरफ, वह डाटा कारोबार का बड़ा खिलाड़ी भी बन चुका है। और अगर हम भारत से चीन की ओर जाने वाले सभी तरह के डाटा पर जैसे-तैसे पूरी तरह पाबंदी लगा भी दें, तब भी इसे खुले बाजार से खरीदने का रास्ता उसके पास हमेशा रहेगा। पिछले कुछ समय में चीनी सर्वरों के जरिए जिस तरह से ऑस्ट्रेलिया में हैकिंग की लगातार कई कोशिशें हुई हैं, वह यह भी बताता है कि चीन ने साइबर डकैती की क्षमताएं भी हासिल कर ली हैं।
    इस मामले में भी चीन से मुकाबले का रास्ता वही है, जो अन्य क्षेत्रों में है। चीन पर निर्भरता कम करने के लिए बडे़ पैमाने पर आधुनिक मैन्युफेक्चरिंग को भारत में स्थापित करने की बात की जाती रही है, यह बात अलग है कि यह काम कभी पूरे दिल से नहीं हुआ। इसी तरह, दवा उद्योग में कच्चे माल के लिए आधुनिक रसायन उद्योग में बड़ी कोशिशों की चर्चा पिछले कुछ समय में चलनी शुरू हुई है। यही काम हमें डाटा उद्योग में भी करना होगा। इस कारोबार का बड़ा खिलाड़ी बने बगैर हम साइबर अर्थव्यवस्था में पिछडे़ ही रहेंगे।
    आत्म गौरव के क्षणों में अक्सर हम भारत को सॉफ्टवेयर उद्योग का सुपर पावर कह देते हैं, लेकिन सच यही है कि अच्छी कमाई के बावजूद हम इस क्षेत्र में अभी तक आउटसोर्सिंग हब बनने से बहुत आगे नहीं बढ़ सके हैं। मामला सिर्फ चीन का विकल्प बनने का नहीं है, कारोबार की उस मंजिल को पकड़ने का है, जिसकी ओर दुनिया बढ़ रही है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार

     

    होनी चाहिए निष्पक्ष जाँच ...
    मामले पर जिस तरह परिवार के सदस्य एक दुसरे पर आरोप लगा रहे है और यहाँ तक कि पीडित भरत गौर को पूर्ण स्वस्थ बता रहे है . मामले में आखिर भरत गौर को क्यों बिमारी का सहारा लेकर इस तरह जिला पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पहुंचना पडा और आखिर मामले में कौन प्रताडि़त है , कौन वो शख्स है जिसे कांग्रेस नेता बता रही है पूजा कौर जो सत्ता की ताकत दिखा रहा है मामले की सच्चाई का सबके सामने आने से ही असलियत पता चलेगी कि पूजा गौर सही कह रही है या भरत गौर ...

    दुर्ग / शौर्यपथ / पीडि़त कितना असहाय है ये दिखाने के लिए कई बार पीडि़त अपने आपको लाचार और बेसहारा बताने कई तरह के उपाय करते है और प्रशासन की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करने का असफल प्रयास भी करते है किन्तु सच्चाई आज नहीं तो कल खुल ही जाती है . कुछ ऐसा ही मामला उजागर हुआ जिसमे खाट में पुलिस अधीक्षक कार्यालय आने वाला शख्स कब्ज़े की जमीन के हक के लिए पुलिस प्रशासन की ओर अपना ध्यान खींचने में सफल भी हो गया .
    बता दे कि शनिवार के दिन छावनी से एक शख्स भरत गौर जिला पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पहुंचा . आम स्थिति में पहुँचता तो अलग बात थी किन्तु भरत गौर खाट में पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पहुंचा जिसके कारण पुलिस प्रशासन हतप्रत हो गया और तुरंत सिटी एसपी विवेक शुक्ला द्वारा मामले को संज्ञान में लेकर पीडि़त भरत गौर को जिला चिकित्सालय दुर्ग पहुँचाया गया . खबर शहर में आग की तरह फ़ैल गयी .
    पीडि़त भरत गौर का आरोप है कि उसके बड़े भाई के परिवार ने किसी जमीन पर कब्ज़ा किया हुआ है और भरत गौर लगातार 3 साल से मामले के विवाद के कारण प्रताडि़त हो रहा है .
    मामले की खबर लगते ही शौर्यपथ टीम ने पीडि़त को परेशान करने वाले परिवार जो पीडि़त भरत गौर के बड़े भाई है उनसे संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया . इस प्रयास के तहत चौकाने वाले मामले का खुलासा हुआ . पीडि़त भरत गौर की भतीजी पूजा से जब मामले की जानकारी ली गयी तो ज्ञात हुआ भरत गौर पूर्ण स्वस्थ है और जिस जमीन के विवाद की बात कह रहा है वो जमीन वर्तमान में कमला गौर जो भरत की भाभी के नाम पर है जिसमे भरत गौर का कोई हक नहीं है साथ ही इस मामले पर कुछ दिनों पहले ही छावनी एसडीएम ने फैसला कमला गौर के पक्ष में दिया था . जिसके कारण भरत गौर मामले को टूल देने खाट पर पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पहुँच गया . जबकि सीसी टीवी सहित ऐसे कई प्रमाण है जिससे ये साबित किया जा सकता है कि शनिवार की सुबह भरत गौर पूर्ण स्वस्थ था और अपने घर के कार्य में लगा हुआ था साथ ही पूजा गौर ने एक विडिओ भी भेजा जिसमे भरत गौर पानी भरते हुए एवं कुत्ता घुमाते हुए नजर आ रहा है . भरत गौर सब्जी बजने का कार्य करता है और दोनों भाइयो में ( भरत गौर व उसके बड़े भाई ) में किसी भी पैत्रिक संपत्ति का कोई विवाद नहीं है .
    पूर्व में भी की फर्जी शिकायत ..
    पूजा गौर का कहना है कि पूर्व में भी भरत गौर द्वारा फर्जी तरीके से झूठी शिकायत की गयी जिसके कारण समाज में बहुत बदनामी भी हुई किन्तु पुलिस जाँच में शिकायत फर्जी पाना साबित हुआ . भरत गौर द्वारा लगातार भिन्न भिन्न तरीको से परेशां किया जा रहा है कहते हुए पूजा गौर ने कहा कि भरत गौर के सेल द्वारा जो कांग्रेस का नेता है के द्वारा भी परेशां किया जाता रहा है .

    राजनांदगांव / शौर्यपथ / जिले के खैरागढ़ इलाके में दर्जनों ग्रामीणों से रकम दोगुनी करने का झांसा देकर लाखों रुपए की ठगी करने के मामले में पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए खैरागढ़ भाजपा मंडल अध्यक्ष कमलेश कोठले समेत चार लोगों को हिरासत में लिया है। वहीं इस पूरे मामले का मास्टर माईंड तरूण साहू समेत तीन फरार हैं। खैरागढ़ के ग्रामीण इलाकों में करीब 10 साल के भीतर चिटफंड कंपनी के जरिए आरोपियों ने बड़ी रकम लोगों से ऐंठ ली है। रकम वापस करने की मियाद पूरी होने से पहले ही कंपनी ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया। लाखों रुपए का चपत लगने के बाद लोगों ने पुलिस में मामले की शिकायत की।
    मिली जानकारी के मुताबिक खैरागढ़ भाजपा मंडल अध्यक्ष कमलेश कोठले और उसके साथी तरूण साहू (अर्जुंदा-बालोद), राजकुमार साहू (खैरागढ़), चम्मनदास साहू (अर्जुन्दा बालोद), सत्यपाल वर्मा (चीचा दुर्ग), रंजीत सोनकर (बालाघाट), राजेन्द्र स्वान्सी (रांची) ने सर्वोदय मल्टीट्रेड लिमिटेड कंपनी के अधीन माईक्रो इन्वेसमेंट का डायरेक्टर बनकर खैरागढ़ क्षेत्र में लोगों से मासिक, छैमासी, सालाना, पांच वर्ष तथा 15 वर्ष के लिए अलग-अलग ब्याज दरों पर रकम जमा कराया।

    बालोद / शौर्यपथ / प्रदेश की महिला एवं बाल विकास तथा समाज कल्याण मंत्री श्रीमती अनिला भेंडिया आज डौण्डीलोहारा विकासखण्ड के विभिन्न ग्रामों का भ्रमण कर विकास कार्यों का भूमिपूजन किया। उन्होंने किसानों से चर्चा कर खेती किसानी की तैयारी की जानकारी ली। मंत्री श्रीमती भेंडिया ने जिन कार्यो का भूमिपूजन किया उसमें ग्राम परसाडीह(ज) में शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला में अहाता निर्माण कार्य और सहकारी समिति भवन के सामने सीमेंटीकरण कार्य, ग्राम अछोली में शासकीय हाईस्कूल में अहाता निर्माण कार्य और सामुदायिक भवन निर्माण कार्य, ग्राम चिखली में सामुदायिक भवन निर्माण कार्य, ग्राम कोड़ेकसा में शासकीय हाईस्कूूल में अहाता निर्माण कार्य, ग्राम खड़बत्तर में शासकीय प्राथमिक शाला में अतिरिक्त कक्ष निर्माण और ग्राम गोटीटोला में सामुदायिक भवन निर्माण कार्य शामिल है।
    मंत्री श्रीमती भेंडिया ने किसानों से चर्चा कर खेती किसानी की तैयारी की जानकारी ली। उन्होंने धान बुवाई की प्रगति, खाद-बीज की उपलब्धता आदि की जानकारी ली। किसानों ने बताया कि खाद-बीज की समस्या नहीं है। मंत्री श्रीमती भेंडिया ने कहा कि शासन द्वारा अरहर बीज मिनीकिट उपलब्ध कराया जा रहा है, अपने खेतों के मेंड़ में अरहर लगाए। उन्होंने किसानों को कोदो, कुटकी तथा मक्का का भी फसल लेने तथा वृक्षारोपण के लिए प्रेरित किया। उन्होंने किसानों से कहा कि नामंातरण, सीमंाकन तथा राजस्व संबंधी अन्य लंबित प्रकरणों से अवगत कराएॅ। मंत्री श्रीमती भेंडिया ने ग्रामीणों से कहा कि वे शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का ज्यादा से ज्यादा लाभ उठाएॅ। उन्होंने नोवेल कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव हेतु ग्रामीणों को मास्क भी वितरण किया। इस अवसर पर गणमान्य नागरिक श्री अनिल लोढ़ा सहित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, तहसीलदार श्री रामरतन दुबे, नायब तहसीलदार सुश्री राजश्री पाण्डेय विभिन्न विभागों के अधिकारी, कर्मचारी व ग्रामीण मौजूद थे।

    नवागढ़ / शौर्यपथ /  रविवार को नवागढ़ थाना प्रभारी अम्बर सिंह भारद्वाज ने नवागढ़ दवा विक्रेता संघ के साथ बैठक ली । थाना प्रभारी ने नवागढ़ क्षेत्र में युवाओं में बढ़ती नशाखोरी पर लगाम लगाने के लिए दवा विक्रेताओं को आवश्यक दिशा निर्देश दिए। जिसपर सभी विक्रेताओं ने एक स्वर में साथ देने की बात कही। इसके साथ ही दवा विक्रेता संघ नवागढ़ द्वारा नव पदस्थ थाना प्रभारी अम्बर सिंह भारद्वाज का सम्मान भी किया गया। इस दौरान उपनिरीक्षक घनश्याम चिंडा, मिथलेश बिसेन,आलोक दुबे,राहुल खुराना,राजेंद्र मिश्रा,शिव सोनकर,राजा बिसेन,मिलाप साहू,रिंकू खान,पप्पू गुम्बर आदि उपस्थित रहे।

    दुर्ग / शौर्यपथ / निगम मंडल अध्यक्ष दुर्ग जिले से मुस्लिम समाज के कार्यकर्ता को बनाया जाए दुर्ग का मुस्लिम समाज हमेशा कांग्रेस के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ा रहा है जब कांग्रेस के अच्छे दिन नहीं चल रहे थे उस समय भी दुर्ग का मुस्लिम समाज कांग्रेस के साथ खड़ा था कुछ चुनाव मे तो दुर्ग शहर के मुस्लिम क्षेत्र से कांग्रेस को विजय श्री मिली थी बाकी वार्ड में कांग्रेस को बहुत बुरी हार का सामना करना पड़ा था यहां तक की न्यूज़पेपर में छपा था कि दुर्ग मे कांग्रेस तकियापारा से विजयी हुई दुर्ग के मुस्लिम समाज का सबसे पहला हक भी बनता है अपील करते हैं कि समाज से उन कार्यकर्ताओं को बनाया जाए जो कभी कांग्रेस की पार्षद टिकट भी ना मांगा हो और कांग्रेसका वफादार सिपाही बनकर हमेशा कांग्रेस के साथ खड़ा रहा आदरणीय मुख्यमंत्री जी आदरणीय गृहमंत्री जी आदरणीय विधायक दुर्ग शहर अरुण वोरा जी इस तरफ जरूर ध्यान दें आप सबसे गुजारिश है मुस्लिम समाज आपका शुक्रगुजार होंगा।
    बैठक में शामिल मुस्लिम युवा मंच के अध्यक्ष इलियास भाई अंजुमन फाउंडेशन के अध्यक्ष सैयद सैफ अली दुर्ग शहर कांग्रेस के महामंत्री जुनेद लाल आजमी सिप्तैन रजा गुलाम भाई समर अली मुजाहिद खान सरफराज खान सोनू जाफर भाई सलीम खान अलीम भाई हसनैन रजा वसीम और बहुत से कार्यकर्ता उपस्थित थे।

    रायपुर / शौर्यपथ / पूर्व मुख्यमंत्री रमनसिंह द्वारा ट्वीट कर कांग्रेस सरकार से वायदों का हिसाब मांगे जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि वादा खिलाफी का लम्बा रिकार्ड बनाने वाले रमन सिंह किस नैतिकता से कांग्रेस सरकार से मात्र डेढ़ साल में ही वायदों का हिसाब मांग रहे है । कांग्रेस की सरकार और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने डेढ़ साल में अपने जन घोषणा पत्र के 36 वायदों में से 22 वायदों को पूरा कर दिया है ।कांग्रेस की सरकार को पांच साल के लिए जनादेश मिला है।कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के जनघोषणा पत्र में पांच साल कार्यकाल में पूरा करने के लिए वायदा किया था आने साढ़े तीन सालों में कांग्रेस की सरकार अपने सारे वायदों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है।
    कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि कांग्रेस से डेढ़ साल में ही सारे वायदों को पूरा करने की अपेक्षा करने वाले रमन सिंह भूल रहे है उन्होंने 2003के भाजपा के संकल्प पत्र के वायदों को 15 साल तीन बार सरकार चलाने के बाद भी पूरा नही किया था ।रमन सिंह और भाजपा ने 2003 में वायदा किया था हर आदिवासी परिवार को 10 लीटर वाली जर्सी गाय देंगे कभी पूरा नही किया ।भाजपा ने हर आदिवासी परिवार से एक को सरकारी नौकरी देने का वायदा किया ।भाजपा ने 2003 में ही राज्य के बेरोजगार युवाओं को 500 रु बेरोजगारी भत्ता देने का वायदा किया था जो कभी पूरा नही किया ।किसानों को धान पर पूरे पांच साल बोनस का वायदा कर सिर्फ चुनावी साल में बोनस देने वाले रमन सिंह आज किस नैतिकता से 2500 रु में धान खरीदी पर सवाल खड़ा कर रहे है ।
    कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस की सरकार ने मोदी सरकार की अड़ंगेबाजी और धमकी से डरे बिना किसानों को धान की पूरी कीमत देने का रास्ता निकाला ।भाजपा की केंद्र सरकार की किसान विरोधी नीति के कारण ही वायदा निभाने कांग्रेस ने राजीव गांधी न्याय योजना लागू की किसानों को धान के कीमत की अंतर राशि की पहली क़िस्त का भुगतान हो गया शेष दूसरी और तीसरी क़िस्त का भुगतान 20 अगस्त तक हो जाएगी।
    कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि कांग्रेस सरकार के वायदों को पूरा करने की गति और गरीब किसान गांव विरोधी नीतियों को मिल रहे जन समर्थन से रमन सिंह और भाजपा विचलित हो गए हैं ।मुद्दा विहीन भाजपा नेता रोज अप्रसांगिक बयान बाजी कर खुद को चर्चा में बने रहने का बहाना खोज रहे हैं।

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