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जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / अमेरिकी प्रांत कैनसस में एक छोटा-सा शहर है जंक्शन सिटी। आज भी बमुश्किल पच्चीस-तीस हजार की आबादी होगी। वारेन एडम्स और मैरी एडम्स इसी शहर के बाशिंदे थे। फौजी पृष्ठभूमि होने की वजह से दोनों की मुलाकात दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई थी। वारेन एक सैनिक थे और मैरी उन दिनों नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थीं। जब युद्ध छिड़ा, मैरी ने अपने माता-पिता को बताए बिना ही फौज ज्वॉइन कर ली थी। उस समय लगभग डेढ़ लाख अमेरिकी महिलाओं ने मैरी की तरह देशसेवा का प्रण लिया था। नर्सिंग का प्रशिक्षण पूरा होने के बाद मैरी को कैनसस के फोर्ट रिले में नियुक्ति मिल गई, जहां वह जख्मी सैनिकों की खिदमत करती थीं।
एडम्स दंपति के पास दौलत भले न थी, मगर उनमें प्यार और हौसला खूब था, और इसकी बदौलत ही वे एक सुकून भरी जिंदगी जी रहे थे। मियां-बीवी, दोनों काफी मेहनत करते, ताकि अपने पांचों बच्चों को जमाने के लिहाज से सारी सुविधाएं दे सकें। इन्हीं पांच संतानों में से एक हैं मैरीलीन हेसन। मैरीलीन जब नौ साल की थीं, तब अचानक पिता का साया उन सबके सिर से उठ गया। वारेन एडम्स दिल के दौरे का शिकार हो गए थे। हालांकि, उसके पहले वह कभी बीमार नहीं पडे़ थे, इसलिए पांच से 15 साल के बच्चों को समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह क्या हुआ?
मैरी एडम्स के पास पति की मौत का शोक मनाने का वक्त नहीं था। वह एक हिम्मती महिला थीं और फिर घर के हालात भी इसकी इजाजत नहीं देते थे। अपने बच्चों को मायूस, पस्तहिम्मत देखना उन्हें गवारा नहीं हुआ। उन्होंने ऑफिस जाना शुरू कर दिया। काम पर जाने से पहले वह पांचों बच्चों की एक-एक जरूरत का ख्याल रखतीं और सबको कोई न कोई एक सबक देकर निकलतीं, ताकि वे अनुशासन में रहें।
घर की कमाई आधी रह गई थी, मगर पांच-सात साल के बच्चे इतने होशमंद कहां होते हैं कि मां की मजबूरियों को समझ पाते? वे कई बार किसी चीज की जिद करने लगते, तो मां उदास हो जातीं। पर नौ साल की मैरीलीन मां की पीड़ा समझने लगी थीं। अतंत: मैरी एडम्स ने वॉर बॉन्ड की राशि से एक इमारत खरीदी, जिसमें चार छोटे-छोटे अपार्टमेंट थे। उन्होंने उनको किराये पर लगाया, ताकि कुछ पैसे आ सकें। लेकिन बच्चे बड़े हो रहे थे, और सबके स्कूल-कॉलेज के खर्चे व घर की जरूरतें भी बढ़ती जा रही थीं। पैसे कम पड़ ही जाते। अंतत: उन्होंने बच्चों के स्कूल के कैफेटेरिया में पार्ट टाइम नौकरी भी की, ताकि कुछ कमाई के साथ-साथ बच्चों के करीब रह सकें। उनका अब बस एक ही सपना था कि बच्चे अच्छी तालीम हासिल कर एक बेहतर मुकाम हासिल करें।
घर के प्रत्येक बडे़ बच्चे को यह हिदायत थी कि वह अपने से छोटे भाई-बहन की देखभाल करे। मैरीलीन अपनी मां के संघर्ष को काफी करीब से देख रही थीं। इसने उनके ऊपर गहरा असर डाला। पढ़ाई के साथ-साथ वह छोटे भाई-बहन को तो संभालतीं, और अपार्टमेंट में साफ-सफाई जैसे छोटे-मोटे काम भी कर देतीं, ताकि उससे कुछ पैसे मिलें और मां की मदद हो सके। मां हर महीने मैरीलीन को पांच डॉलर बिलों के भुगतान के लिए और सात डॉलर घर के राशन के लिए देतीं और कहतीं, ‘मुझे उम्मीद है तुम सही फैसले करोगी।’
मैरीलीन ने 1979 में अलबामा यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में एमए किया। उनके पास कोलंबिया बिजनेस स्कूल और हॉर्वर्ड बिजनेस स्कूल की भी डिग्रियां हैं। अलबामा यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने यूएस ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स में नौकरी शुरू की। लेकिन उनकी मंजिल तो कुछ और थी। साल 1983 उनके लिए एक बड़ा मौका लेकर आया और उन्होंने लॉखीद मार्टिन कंपनी ज्वॉइन की। रक्षा क्षेत्र की अमेरिका की अग्रणी कंपनी। दुनिया भर के देशों को लड़ाकू विमान, ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर और रक्षा उपकरण मुहैया कराने वाली सबसे बड़ी वैश्विक कंपनियों में एक।
मैरीलीन ने इसके बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह कंपनी के विभिन्न विभागों से अनुभव बटोरकर आगे बढ़ती रहीं। उनकी काबिलियत और दूरदर्शिता ने नवंबर 2012 में उन्हें कंपनी के निदेशक मंडल में पहुंचा दिया और महज तीन महीने के भीतर वह लॉखीद मार्टिन की सीईओ की कुरसी पर बैठी थीं। उनके नेतृत्व में लॉखीद के कारोबार ने शानदार ऊंचाइयां देखीं। और इसी मार्च में जब उन्होंने यह पद छोड़ा, तब तक इसकी पूंजी तीन गुनी हो चुकी थी।
साल 2010 से 2020 तक मैरीलीन हेसन को लगातार दुनिया की शीर्ष पचास प्रभावशाली, शक्तिशाली महिलाओं या फिर सीईओ में गिना जाता रहा। दो वर्ष पूर्व वह सर्वश्रेष्ठ सीईओ चुनी गईं। कभी एक-एक डॉलर को बेहद किफायत से खर्र्चने वाली मैरीलीन आज सात अरब से अधिक की संपत्ति की मालकिन हैं। मगर इस मुकाम पर भी वह अपनी मां को कहीं अधिक कर्मठ मानती हैं। ये उन्हीं के शब्द हैं, ‘मेरी मां ने वह सब किया, जो बडे़-बड़े नेता करते हैं। उन्होंने भविष्य के लीडरों को हौसले दिए।’
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह मैरीलीन हेसन बिजनेस लीडर, पूर्व सीईओ
नजरिया / शौर्यपथ /भले ही भारत में कोविड-19 संक्रमण बढ़ रहा है, रोजाना करीब 50,000 मामले आ रहे हैं, लेकिन सरकार ने अनलॉक 3.0 लागू करने का फैसला लिया है। अनलॉक 3.0 निश्चित रूप से आर्थिक गतिविधियों को तेज करने वाला है। कुछ आर्थिक वृद्धि दर्ज भी हुई है, लेकिन इसे अर्थव्यवस्था में पूरी बहाली मान लेना अतिशयोक्ति होगी। आर्थिक गतिविधियों को रियायत मिली है, लेकिन अभी अर्थव्यवस्था मंदी से उबरने के किसी भी संकेत से दूर है। हालांकि, इस साल मानसून की बारिश अच्छी होने की उम्मीद है, साथ ही, कृषि ऐसा अकेला क्षेत्र है, जहां मजबूत वृद्धि की संभावना जताई जा रही है।
पिछले वित्त वर्ष में चार प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि के साथ कृषि क्षेत्र देश में तीसरे स्थान पर रहा था। आज ऐसी संभावना नहीं है कि कृषि 2019-20 के समान विकास दर दर्ज करे। मुद्दा यह है कि क्या चार-पांच प्रतिशत की विकास दर के साथ हमारा कृषि क्षेत्र बाकी अर्थव्यवस्था को भी संभालने के लिए पर्याप्त है। ध्यान रहे, बाकी क्षेत्रों में नकारात्मक विकास दर देखी जा रही है। समग्र विकास को अगर देखें, तो कृषि विकास अप्रासंगिक लग सकता है, क्योंकि कृषि का राष्ट्रीय आय में योगदान सिर्फ 15 प्रतिशत है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि कृषि विकास देश में आर्थिक गतिविधियों का एक मुख्य संचालक है। चूंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग घटी हुई है, इसलिए पूरी अर्थव्यवस्था लंबे समय से संकट में है।
इस पर अब आम सहमति है कि मौजूदा मंदी मुख्य रूप से घटती मांग का नतीजा है। कृषि विकास कितना प्रभावशाली है, इसे आंकने के लिए कृषि उत्पादन में वृद्धि की बजाय किसान की आय को देखना चाहिए। कृषि उत्पादन में वृद्धि का तात्पर्य किसानों की आय में वृद्धि से है। किसानों की आय अनेक चीजों पर निर्भर है। सबसे अहम बात, यह किसानों की उपज की कीमत पर निर्भर है, मगर अभी इस मोर्चे पर शुरुआती संकेतक बहुत उत्साहजनक नहीं हैं। थोक मूल्य सूचकांक पिछले तीन महीनों में थोक मूल्यों में गिरावट के साथ अपस्फीति की ओर इशारा कर रहा है। कीमतें घट रही हैं और किसानों की आय भी। मुद्र्रास्फीति में गिरावट का मतलब है कि अधिकांश खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट का रुख है। भले ही अनाज की कीमतों में सकारात्मक मुद्रास्फीति जारी है, लेकिन अन्य अधिकांश खाद्य पदार्थ, जैसे फल, सब्जियां, अंडे, मुर्गी और मछली की कीमतों में गिरावट जारी है। गिरावट का यह क्रम अब दूध की कीमतों में भी दिख रहा है और अन्य महत्वपूर्ण नकदी फसलों, जैसे कपास व तिलहन में भी। इसलिए भले ही कृषि उत्पादन में वृद्धि जारी हो, मगर यह वृद्धि किसानों के लिए बेहतर आय में नहीं बदल रही है। कृषि की लागत में वृद्धि के साथ अधिकांश छोटे और सीमांत किसानों की आय में वृद्धि की बजाय गिरावट की आशंका है।
पिछले दो वर्षों के दौरान किसान कुछ भाग्यशाली थे, जब राजनीतिक अभियानों के कारण सरकारों ने बड़ी मात्रा में अनाज खरीद की थी, पर इसका दूसरा पहलू यह है कि इस साल सरकारी खरीद की सुविधा पहले की तरह रहने की संभावना नहीं है। अनाज भंडार अभी भरे हुए हैं। किसानों की आय जब दबाव में है, तब कमजोर गैर-कृषि क्षेत्रों से भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचने की आशंका है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि अब कुल आय का केवल एक-तिहाई हिस्सा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बाकी दो-तिहाई हिस्से में छोेटे और मध्यम उद्यम हैं, जो महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। गांवों में आय या कमाई घटने का एक और कारण भी है कि कई शहरी प्रवासी अपने गांव लौट आए हैं।
ऐसे में, भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दिखने की संभावना तब तक नहीं है, जब तक कि कृषि को राजकोषीय प्रोत्साहन न हासिल हो। ऐसे वित्तीय उपाय करने होंगे, जिससे कृषि वस्तुओं की व्यापक मांग पैदा हो। सरकार को अपना खर्च बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी। न केवल खरीद और सब्सिडी में वृद्धि के माध्यम से, बल्कि गैर-कृषि ग्रामीण क्षेत्र को भी बढ़ावा देकर मांग में वृद्धि की जा सकती है। राजकोषीय प्रोत्साहन का एक और बड़ा दौर न केवल जरूरी है, बल्कि खरीफ फसलों के इस मौसम में अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए भी जरूरी है। भारतीय किसानों ने अपना काम किया है, अब समय है कि सरकार अपना काम करे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)हिमांशु, एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयू
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / बढ़ते कोरोना संक्रमण के समय डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के वेतन सुनिश्चित करने के लिए यदि सुप्रीम कोर्ट की जरूरत पड़ रही है, तो यह न केवल दुखद, बल्कि शर्मनाक भी है। डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी केवल देश के नागरिक ही नहीं, बल्कि इस वक्त कोरोना के खिलाफ लड़ रहे योद्धा हैं, ऐसे योद्धाओं के वेतन-भत्ते सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। पर पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक और त्रिपुरा जैसे राज्यों ने डॉक्टरों के भुगतान में देरी या ढिलाई की है। कुछ राज्यों ने डॉक्टरों के क्वारंटीन समय को भी छुट्टी माना है, यह तो और दुखद है। यह सब जानते हैं कि सौ से ज्यादा डॉक्टरों की मौत कोरोना से लड़ते हुई है और बड़ी संख्या में डॉक्टर कोरोना को पराजित करके ड्यूटी पर लौटे हैं, ऐसे में, तमाम सरकारों को इस सेवक बिरादरी का विशेष ध्यान रखना चाहिए था और शिकायत सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने की नौबत नहीं आनी चाहिए थी। इन कोरोना योद्धाओं के उत्साह और समर्पण को बनाए रखने के लिए भी विशेष पहल जरूरी है। उन इलाकों में तो खास तौर पर संवेदनशील पहल-प्रोत्साहन की जरूरत है, जहां मरीजों की सेवा से डॉक्टरों के बचने की शिकायतें आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को निर्देश देते हुए आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत कदम उठाने का आदेश दिया, तो कोई आश्चर्य नहीं। केंद्र को इन बातों का खुद भी ध्यान रखना होगा और महामारी के समय सारा भार राज्यों के कंधों पर नहीं छोड़ना चाहिए। जिन राज्यों ने डॉक्टरों के वेतन में कोताही बरती है, उन्हें सुधार के लिए विवश करना समय की मांग है।
ध्यान रहे, आज कोरोना के खिलाफ युद्ध जिस मुकाम पर है, हम अपनी लड़ाई या तैयारी में कहीं से भी कमी नहीं आने दे सकते। भारत में अकेले गुरुवार को 55,000 से ज्यादा नए मामले सामने आए हैं। संक्रमितों ने 16 लाख का आंकड़ा पार कर लिया है। जाने गंवाने वालों की संख्या 36,000 के आंकड़े को छू चुकी है। आज चार लाख से अधिक संक्रमण के साथ महाराष्ट्र सबसे अधिक प्रभावित राज्य बना हुआ है, लेकिन यह ज्यादा अफसोसजनक है कि डॉक्टरों की वेतन संबंधी शिकायतें महाराष्ट्र से भी आई हैं। कहना न होगा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब जैसे अपेक्षाकृत विकसित राज्यों को कोरोना के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करना चाहिए था।
केंद्र ने भले ही अनलॉक होने की ओर बढ़ने संबंधी कुछ घोषणाएं की हैं, लेकिन सच यही है कि राज्यों की चिंता लगातार बढ़ रही है। ठीक होने वालों की संख्या बढ़ी है, 10 लाख से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं, चिंता यह कि संक्रमण के मामले अब 21 दिन में ही दोगुना होने लगे हैं। विशेषज्ञों का मामना है, संख्या देखकर घबराने की ज्यादा जरूरत नहीं, हो सकता है कि जैसे-जैसे जांच की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे मामले भी बढ़ते लग रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों की जल्दी से जल्दी जांच व उसकी रिपोर्ट की ओर सरकार को और ध्यान देना चाहिए। जांच और नतीजों की खामियों को दूर करना भी जरूरी है। कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच दिशा-निर्देशों का स्पष्ट होना भी जरूरी है। यह भी विडंबना ही है कि लॉकडाउन और अनलॉक होने की प्रक्रिया साथ-साथ चल रही है। राज्यों के अंदर व राज्यों के बीच बेहतर समन्वय अब और जरूरी हो गया है, साथ ही, केंद्र की जिम्मेदारी भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / एक बहुप्रतीक्षित सपना साकार होने के करीब है, जब रामलला की मनोहारी छवि एक भव्य मंदिर में विराजेगी। निस्संदेह, करोड़ों देशवासियों की आस्था के विजय-पर्व पर भावनाओं का सैलाब उमड़ आना अपेक्षित है। लिहाजा, दशकों से तंबू-प्रवास में रह रहे रामलला के भव्य मंदिर की शुरुआत को उत्सव का स्वरूप क्यों न दिया जाए? एक तरफ, अयोध्या में इसकी तैयारियों की भव्यता अपने चरम पर है, तो वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम की जन्मस्थली वाले प्रदेश में ही इंसानी संवेदनाओं की हत्या सारी मर्यादाओं को तार-तार कर रही है। हैवानियत की एक तस्वीर लिए मन बार-बार पूछ रहा है कि राम तो आएंगे, पर उनका रामराज्य कब आएगा? कहते हैं कि पैदा होने से पहले और मरने के बाद इंसान जाति-धर्म के बंधनों से मुक्त रहता है। फिर उस शव की जाति उसका पीछा क्यों नहीं छोड़ पाई, जो एक स्त्री का था? तथाकथित निम्न जाति की स्त्री होने में भला उसका क्या कुसूर था कि सम्मान के साथ विदा लेने का उसका हक भी उससे छीन लिया गया?
एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड
गरीबों की सुध
गरीबों का कोई नहीं होता, पर उसकी वजह से सब जरूर होते हैं। इतिहास से लेकर वर्तमान तक यह वाक्य सही जान पड़ता है। गरीबों का न कोई धर्म होता है, न जाति, और न कोई उनके सम्मान की कद्र करता है। वे तो बस इस भेड़चाल भरी दुनिया में पिसते रहते हैं। उनके लिए योजनाएं बंद एसी कमरों में बनती हैं, अफसरों व नेताओं को उनकी दयनीय स्थिति सुधारने के उपाय तलाशने के लिए विदेश भेजा जाता है, पर आजादी के सात दशकों के बाद भी गरीबी देश में बनी हुई है। यहां तक कि अब उसमें एक बार फिर वृद्धि होती दिख रही है। कोरोना संक्रमण ने गरीबों के लिए चुनौती बढ़ा दी है। क्या हमारे नीति-नियंता उनकी सुध लेंगे?
हर्ष कुमार, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
एक नई चुनौती
कोरोना के गंभीर संक्रमण-काल में प्राकृतिक आपदा भी गंभीर चुनौती पेश कर रही है। ऐसा लग रहा है कि एक समस्या खत्म हुई नहीं कि दूसरी आ गई है। हालांकि, इसकी एक वजह हम खुद भी हैं, क्योंकि प्रकृति में मानव का हस्तक्षेप काफी भयावह है। उत्तर बिहार और असम में तो स्थिति कहीं ज्यादा चिंताजनक है, जहां एक बड़ी आबादी बाढ़ से घिरी हुई है। यहां न जाने कितने लोग बेघर हो चुके हैं और वे सड़कों पर ही रहकर अपना गुजारा कर रहे हैं। मुुश्किल यह भी है कि जब बाढ़ का पानी उतरता है, तो कई तरह की बीमारियां पैदा होती हैं, जिससे इंसानी जान-माल की व्यापक क्षति होती है। इसलिए यह जरूरी है कि बाढ़ पीड़ितों के हितों में सरकार विशेष कदम उठाए। हालांकि, यह आम लोगों का भी फर्ज है कि बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए वे आगे आएं और बढ़-चढ़कर मदद करें।
उदय कुमार ,जादोपुर, गोपालगंज
खत्म हो दादागिरी
पूरी दुनिया को कोरोना बीमारी देने के कारण चीन सभी के लिए सिरदर्द बना हुआ है। ऐसे में, उसके खिलाफ सभी राष्ट्रों को मिलकर ठोस रणनीति बनानी चाहिए। इसमें संयुक्त राष्ट्र को भी शामिल किया जाना चाहिए। दिक्कत यह भी है कि चीन अब भी विस्तारवादी नीति अपना रहा है। हमारे साथ लद्दाख में उलझने के अलावा वह कई अन्य देशों से भी सीमा विवाद में शामिल है। इसलिए यह समझ में नहीं आता कि परेशानी झेलने के बाद भी दुनिया के देश चीन के खिलाफ एकजुट प्रयास क्यों नहीं कर रहे? संभव है, इसके पीछे उसका एक बड़ी आर्थिक ताकत होना कारण हो। हालांकि, बड़ी से बड़ी आर्थिक ताकत को भी अकेला कर दिया जाए, तो वह सुधर जाती है। चीन के साथ यही रणनीति अपनाई जानी चाहिए। सभी देशों को उससे रिश्ता खत्म कर लेना चाहिए।
सुमित कुमार रस्तोगी
संभल, उत्तर प्रदेश
ओपिनियन / शौर्यपथ / चीन पिछले कई वर्षों से भारत को घेरने की योजना पर काम कर रहा है। इसके लिए वह हमारे पड़ोसी देशों पर किसी न किसी तरह से अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है। पाकिस्तान को तो वह अपना ‘आयरन ब्रदर’ बना ही चुका है, कुछ ऐसा ही कथित ‘मजबूत भाईचारा’ वह अफगानिस्तान और नेपाल के साथ भी निभाना चाहता है। इसके अलावा, म्यांमार के साथ आर्थिक गलियारे के निर्माण पर सहमति बनाकर, बांग्लादेश में भारी निवेश करके, मालदीव के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाकर और श्रीलंका की निर्माण-परियोजनाओं पर अपनी पकड़ मजबूत करके वह क्षेत्र में भारत-विरोधी नीति को लगातार हवा दे रहा है। ऐसे में, असली सवाल यही है कि चीन की काट हम किस तरह निकालें? इसका सही-सही जवाब तभी मिल सकेगा, जब गंभीरता से यह चिंतन हो कि उप-महाद्वीप के तमाम पड़ोसी देशों से भौगोलिक, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रिश्ता चीन की तुलना में कहीं ज्यादा गहरा होने के बावजूद हमसे चूक कहां हुई?
दरअसल, भारत ने आसपास के देशों से रिश्ते बेहतर बनाने के बहुत सीमित प्रयास किए हैं। बेशक, हाल के वर्षों में ‘नेबरहुड फस्र्ट’ यानी पड़ोस-प्रथम की नीति अपनाई गई है, लेकिन इस पर फिलहाल संजीदा काम होता दिख नहीं रहा है। कुछ यही हाल दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) का भी है। पाकिस्तान के साथ खराब रिश्ते की वजह से यह मंच अब बहुत ज्यादा कारगर नहीं रहा। हां, बंगाल की खाड़ी पर निर्भर दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के सात देशों के संगठन बिम्सटेक से उम्मीद पाली जा सकती है, पर इसके लिए भी भारत को अपने तईं प्रयास करने होंगे। द्विपक्षीय और क्षेत्रीय सहयोग की भी यही तस्वीर है। बांग्लादेश, भूटान, नेपाल व भारत के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने पर सहमति बन चुकी है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसमें मनमाफिक प्रगति नहीं हुई है। क्षेत्र में सभी देशों के लिए सुरक्षा और विकास की खास नीति पर भी मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में जोर दिया गया है, पर इसका असर दिखना अभी बाकी है।
एक मुश्किल यह भी है कि हम पड़ोस के देशों से विभिन्न परियोजनाओं के लिए समझौते तो कर लेते हैं, लेकिन उनको अमल में लाना कभी-कभी तकनीकी वजहों से काफी मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि कभी तय वक्त पर धनराशि नहीं जारी हो पाती, तो कभी सामान की आपूर्ति रुक जाती है। इसके बरअक्स, चीन कहीं अधिक तेजी से अपनी परियोजनाएं पूरी करता है। जाहिर है, हर देश के साथ अलग-अलग तरीके से हमें अपना द्विपक्षीय रिश्ता आगे बढ़ाना होगा। अगर इस पर गंभीरता से काम हुआ, तो पड़ोसी देश भी हमारे साथ ‘चीन कार्ड’ नहीं खेल सकेंगे, जो अभी इसलिए अमल में लाया जाता है, ताकि हम पर दबाव बने।
हमें कई दूसरे उपाय भी करने होंगे। मसलन, प्राकृतिक आपदाओं को संभालने के लिए एक संयुक्त कार्ययोजना बनाने की पहल करना। अभी बाढ़, तूफान जैसी कुदरती आपदाओं से जितने हम पीड़ित होते हैं, उतने ही हमारे पड़ोसी देश भी होते हैं। इसीलिए हमें क्षेत्रीय स्तर पर एक ऐसा तंत्र बनाना चाहिए कि मुसीबत के समय सभी देशों को उससे मदद मिल सके। इसी तरह, जलवायु परिवर्तन की समस्या से सामूहिक तौर पर लड़ने के लिए भी हमें पड़ोसी देशों को तैयार करना चाहिए।
‘एजुकेशन हब’ बनकर भी भारत पड़ोसी देशों से मित्रता मजबूत कर सकता है। आसपास के देशों के छात्र यहां आकर अपना कौशल निखार सकते हैं। मगर इसके लिए उन्हें बेहतर शैक्षणिक माहौल दिए जाने की व्यवस्था करनी होगी। ‘मेडिकल टूरिज्म’ भी एक अन्य क्षेत्र है, जहां भारत नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है। कोविड-19 महामारी ने मजबूत स्वास्थ्य ढांचे के महत्व पर खासा जोर दिया है। इसी तरह, पड़ोसी देशों के नौजवानों से उभरती तकनीक और प्रौद्योगिकी की जानकारी साझा करना भी हमारे हित में होगा।
यह सब करने के लिए जहां सरकार की तरफ से नीतिगत फैसले की दरकार है, वहीं नई परिपाटी शुरू करने भी जरूरत है, ताकि योजनाओं को जमीन पर उतारा जा सके। जैसे, वीजा जारी करने की प्रक्रिया को सरल बनाना। इतना ही नहीं, अमेरिका की तरह हमारे यहां भी ‘ग्रीन कार्ड’ जैसी व्यवस्था शुरू की जा सकती है, जिससे रोजगार पाने की उम्मीद रखने वाले दूसरे देशों के नौजवान भारत की तरफ आकर्षित हों। इससे न सिर्फ विदेशी कामगारों का दस्तावेजीकरण हो सकेगा, बल्कि अपने देश की आर्थिक सेहत भी सुधर सकेगी। द्विपक्षीय और क्षेत्रीय सहयोग की परस्पर लाभकारी व्यवस्था भी बननी चाहिए, ताकि पड़ोसी देशों को यह मालूम चले कि चीन की दोस्ती में वे उसके आर्थिक उपनिवेश बन जाएंगे, जबकि भारत का साथ उन्हें एक बराबरी का एहसास दिलाएगा।
चिंता की बात यह भी है कि भारत और आसपास के देशों में बमुश्किल व्यापार होता है। हम महज चार-पांच फीसदी कारोबार ही पड़ोसी देशों के साथ करते हैं। जाहिर तौर पर इसमें सुधार जरूरी है। फिर, ‘बॉर्डर ट्रेड’ यानी सीमावर्ती इलाकों में आपसी व्यापार को भी बढ़ावा देना चाहिए। इससे न सिर्फ रोजगार के नए दरवाजे खुलेंगे, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचेगा। म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश आदि देशों के साथ हम यह प्रयोग कर सकते हैं। इससे क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखला की अवधारणा को भी बल मिलेगा, जिससे आपस में विश्वास की डोर मजबूत होगी। ऐसी कोई शृंखला इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कोरोना की वजह से वैश्विक आपूर्ति शृंखला काफी प्रभावित हुई है। मगर हां, इसके लिए हमें अपने वीजा नियमों और सीमा शुल्क से जुड़े प्रावधानों की गंभीर समीक्षा करनी पडे़गी।
उपमहाद्वीप के तमाम देशों से रिश्ते मजबूत बनाने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि कोविड-19 के कारण क्षेत्रीय भू-राजनीति पर काफी असर पड़ा है। ऐसे में, पुरानी नीतियों से हम चीन को जवाब नहीं दे सकते। परस्पर लाभ पहुंचाने वाले द्विपक्षीय रिश्ते और पड़ोसी देशों को पर्याप्त तवज्जो देने वाली पड़ोसी-प्रथम की नीति पर हमें आगे बढ़ना चाहिए। बंगाल की खाड़ी और समुद्री सुरक्षा पर भी अधिक ध्यान देना होगा, क्योंकि बंगाल की खाड़ी में चीन की गतिविधियां काफी बढ़ गई हैं। भारत सरकार बेशक इस दिशा में प्रयास कर रही है, पर अब भी काफी कुछ किया जाना है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)अरविंद गुप्ता, पूर्व डिप्टी एनएसए, डायरेक्टर, वीआईएफ
दुर्ग / शौर्यपथ / दुनिया में वैश्विक महामारी कोरोना के कहर के कारण लाखो करोडो लोगो को भुखमरी का सामना करना पड़ रहा है . इस महामारी के कारण लॉक डाउन के नियमो में सरकार समय समय पर स्थिति अनुसार बदलाव कर रही है ताकि कोरोना संक्रमण के विस्तार पर काबू पा सके इसके लिए प्रदेश के दुर्ग जिले के कलेक्टर भूरे द्वारा लगातार बेहतर स्वास्थ्य सुविधा का विस्तार के साथ साथ कोरोना संक्रमण के विस्तार पर भी कड़े निर्णय लिए जा रहे है ताकि स्थिति काबू में रहे और जान माल का नुक्सान न हो . नवनियुक्त कलेक्टर डॉ. भूरे द्वारा वर्तमान में पूर्ण लॉक डाउन घोषित किया गया 23 जुलाई से इस घोषित लॉक डाउन में किरण और राशन दुकानों को भी बंद रखने का आदेश दिया गया किन्तु त्योहारी सीजन को देखते हुए पहले दो दिन फिर उसके अगले दो दिन के लिए कुछ रियायत बरती गयी और अति आवश्यक वस्तु में राशन दूकान और किरण दूकान को खोलने की अनुमति दी गयी साथ ही इस नियम का कड़ाई से पालन करने के आदेश दिए गए ताकि इनके अलावा कोई और दूकान ना खुले .
कलेक्टर के आदेश का पालन करते हुए कई व्यापारियों ने अपनी दूकान बंद रखी इसमें रोज कमाने खाने वाले छोटे छोटे व्यापारी से लेकर बड़े बड़े व्यापारी भी शामिल है किन्तु फिर भी कुछ ऐसे लोगो द्वारा दूकान खोला गया जिसे अनुमति नहीं थी इस पर जिला प्रशासन द्वारा जुर्माना की कार्यवाही कर चेतवानी दी गयी की गैर अनुमति प्राप्त दूकान ना खोले . किन्तु दुर्ग इंदिरा मार्केट में गणेश मेडिकल के सामने डिस्पोजल की दूकान के संचालक द्वारा लगातार चार दिनों तक प्रशासन को चकमा देते हुए दूकान संचालित किया जाता रहा . जिसकी खबर शौर्यपथ समाचार द्वारा प्रकाशित की गयी . आज गोयल डिस्पोजल की दूकान को चालु हालत में देखते ही निगम के बाज़ार प्रभारी द्वारा जुर्माना लगाने पर दुकानदार द्वारा शासन के नियमो को ना मानने और उलटे दुर्गेश गुप्ता बाज़ार विभाग प्रभारी से हर्जाना माँगा जाने लगा . गोयल पलास्टिक के संचालक द्वारा तैश में आ कर यहाँ तक कह दिया गया कि जो भी आएगा बंद कराने उसे 30000 हज़ार रूपये और नौकरों की तनखा देनी होगी चाहे कलेक्टर ही क्यों ना आ जाये.
ये सही है कि वर्तमान समय में सभी को आमदनी की चिंता है परिवार की चिंता है इसके बावजूद ऐसे भी गरीब है जो सुबह कमाते है और शाम को खाते है उन लोगो के द्वारा भी शासन के नियमो का पालन किया जा रहा है ऐसे में गोयल प्लास्टिक के संचालक द्वारा शासन से इस तरह का बर्ताव समझ से परे है अगर प्रशासन ऐसे लोगो पर सख्त कार्यवाही नहीं करेगा तो कोई बड़ी बात नहीं कि गोयल प्लास्टिक के संचालको जैसा बर्ताव हर व्यापारी करने लगेगा और शासन के बनाए नियमो की धज्जी उडती रहेगी .
निगम आयुक्त की प्रथम जिम्मेदारी
दुर्ग के निगम आयुक्त एक ओर जहां नाली में कचरा फेकने वालो से एक हजार से कई हजार तक जुर्मान वसूल कर अपनी प्रशासनिक शक्ति का परिचय दे चुके है ऐसे में चार दिनों से लगातार नियमो का उल्लंघन करने वाले गोयल प्लास्टिक पर सख्त कार्यवाही ना कर आम जनता को क्या सन्देश देना चाहते है कि जो शासन के नियमो का पालन करेगा उसे हजारो का जुर्माना देना होगा और जो प्रशासनिक अधिकारियों से ऊँची आवाज में बात कर नियमो को तोड़ेगा उसे माफ़ कर दिया जाएगा या मामूली जुर्माना से बरी कर दिया जाएगा .
तहसीलदार खेम लाल वर्मा को करनी चाहिए सख्त कार्यवाही
दूकान दार द्वारा शासकीय अधिकारियों से बहस के दौरान नियमो को तोड़ने वाले दुकानदार द्वारा तेज आवाज़ में बात करना और हर्जाने की मांग करना इन सबकी जानकारी के बाद भी किसी तरह की कोई कार्यवाही का ना करना आखिर क्या सन्देश जा रहा है समाज को कि रसूखदारो के लिए कोई नियम नहीं नियम सिर्फ गरीबो के लिए है कमजोरो के लिए है क्या शहर की ऐसी व्यवस्था प्रणाली दोहरी निति को प्रदर्शित नहीं कर रही ?
क्या कलेक्टर डॉ.भूरे मामले को लेंगे संज्ञान
दुर्ग कलेक्टर ने जिले के नगरीय निकाय क्षेत्र में 23 जुलाई से पूर्ण लॉक डाउन का आदेश दिया और इस आदेश के तहत सभी व्यापारिक संस्थानों को ( अतिआवश्यक श्रेणी को छोड़ कर ) बंद करने का आदेश दिया किन्तु त्योहारी सीजन में जनता के हितो का ख्याल रखते हुए किराना व राशन दुकानों को 4 दिनों की छुट दी गयी . इन चार दिनों की छुट में प्लास्टिक डिस्पोजल की दूकान शामिल नहीं थी इसके बावजूद गोयल प्लास्टिक द्वारा लगातार दूकान खोला गया जिसे बंद करने का निवेदन रोज निगम प्रशासन द्वारा किया गया किन्तु संचालक द्वारा शासन के नियमो को पैर की धुल समझा गया जैसा की निचे दिए गए वीडियो में दिख रहा है और जुर्माना जो शासन के आदेश पर लिया जा रहा है उस पर आपत्ति करते हुए कलेक्टर के फैसले को गलत ठहराते हुए उलटे प्रशासनिक अधिकारियों से ही हर्जाना माँगा जा रहा है अगर इसी तरह सभी दुकानदार बर्ताव करने लगे तो फिर जिला कलेक्टर के आदेश का क्या औचित्य रह जायेगा . नवनियुक्त कलेक्टर डॉ. भूरे जनता के हितो को ध्यान में रखते हुए जनता के लिए ही दिन रात कार्य कर रहे है किन्तु ऐसे व्यापारियों के कारण शासन के नियमो की जो धज्जी उड़ रही जो चिंगारी पैदा हो रही कही ऐसा ना हो कि कल को सभी गोयल प्लास्टिक के संचालक जैसा ही रुख करे और लॉक डाउन का नियम सिर्फ एक मजाक बन जाए . चार दिनों में कोई सख्त कार्यवाही ना करने वाले निगम आयुक्त की कार्यशैली पर भी प्रश्न चिन्ह लग रहा है आज की घटना से . क्या आज की घटना की जानकारी मिलने पर जिले के कलेक्टर डॉ. भूरे मामले को संज्ञान में लेंगे ?
दुर्ग / शौर्यपथ / दुर्ग एनएसयूआई जि़लाध्यक्ष आदित्य सिंह ने कलेक्टर और भिलाई विधायक देवेंद्र यादव को ज्ञापन सौंपकर कर कोरोना संक्रमण के नियंत्रण एवं रोकथाम को देखते हुए गणेश उत्सव के सम्बंध में जारी आदेश के कंडिका क्रमांक 9 को संशोधित करने की माँग की है ।
आदित्य सिंह ने बताया कि जि़ला प्रशासन ने आमजनों की आस्था का ख़्याल रखते हुए विभिन्न नियम और शर्तों पर इसकी अनुमति दी है जो कि स्वागत योग्य है परंतु इसी क्रम में शासन द्वारा जारी आदेश के कंडिका क्रमांक 9 में उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति बिना मास्क के मूर्ति दर्शन या पूजा के लिए बिना मास्क के आता है तो समबंधित व्यक्ति के साथ-साथ समिति के विरुद्ध भी वैधानिक कार्यवाही की जाए,इस आदेश के पश्चात् गणेश समितियों के मन में भय एवं चिंता की व्याकुलता व्याप्त है।
देश भर में गणेश पूजा बड़े ही धूम धाम के साथ मनाया जाता है परंतु इस वर्ष कोरोना महामारी लोगों की आस्था में भी ख़लल डाल रखा है ऐसे समय में लोगों की आस्था को देखते हुए गणेश उत्सव मनाए जाने के निर्णय में इस आदेश से समिति के लोगों की अच्छी ख़ासी चिंता बढ़ा दी है।
समितियों ने कहा है कि शासन के आदेश का पालन करते हुए फि़जि़कल डिस्टेंस का पालन भी करवाया जाएगा तथा मास्क पहनने समबंधित सभी प्रकार के जागरूकता अभियान चलाए जाएँगे,परंतु यदि कोई व्यक्ति बिना मास्क के मूर्ति दर्शन एवं पूजा के लिए पंडाल में आते है तो समबंधित व्यक्ति के ऊपर कार्यवाही की जाए जिससे की कड़ाई से सभी आदेशों का पालन किया जा सके। ज्ञापन सौपने वालोंमेशरद मिश्रा,जे.संजीव,आसिफ़ खान,फऱाज़ अहमद एवं विभिन्न गणेश समिति के साथी भी उपस्थित थे।
दुर्ग / शौर्यपथ / महापौर धीरज बाकलीवाल एवं आयुक्त इंद्रजीत बर्मन द्वारा पुलगांव स्थित गौठान का आकस्मिक निरीक्षण किया गया। कसारीडीह की कल्याणम महिला स्व सहायता समूह द्वारा गौठान का संचालन किया जा रहा है। महापौर बाकलीवाल ने आज गौठान संचालन समिति को अनुबंध पत्र सौंपे। महापौर के समक्ष आयुक्त बर्मन द्वारा अनुबंध पत्र में हस्ताक्षर किये गये। इस दौरान डाक्टर शम्स, डॉ0 दामिनी देशमुख, संचालन समिति के पदाधिकारी और सदस्य उपस्थित थे।
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार को बने लगभग 2 साल होने आये किन्तु निगम में भाजपा की सत्ता काबिज थी . कारण कुछ भी रहा हो किन्तु छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार को बने साल भर बाद भी दुर्ग निगम क्षेत्र में निर्मित गौठान का सञ्चालन नहीं हो रहा था . दुर्ग निगम में कांग्रेस की सरकार के बनते ही महापौर बाकलीवाल द्वारा गौठान के कार्यो में तेजी आयी और कोरोना आपदा के दरम्यान ही गौठान संचालक समुह को हरेली त्योहार के दिन से गोधन न्याय योजना का शुभारंभ कर कल्याणम महिला स्व सहायता समूह को गौठान संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। संचालन अनुबंध पत्र में आज हस्ताक्षर कर महिला स्व सहायता समूह को दस्तावेज सौंपे गये।
इस दौरान महापौर एवं आयुक्त ने गौठान के गायों की स्थिति का जायजा लिया। उन्होनें डाक्टर शम्स और डॉ0 देशमुख द्वारा प्रतिदिन गायों के स्वास्थ्य की जांच और ईलाज की जानकारी ली। गौठान में मवेशियों के अनुसार सभी व्यवस्था ठीक पायी गयी। महापौर ने निगम अधिकारियों को मवेशियों के लिए गाजर घांस की खरीदी करने निर्देश दिये।
दुर्ग / शौर्यपथ / जिले के पुलिस अधीक्षक प्रशांत ठाकुर ने राष्ट्रीय राजमार्ग-53 में कुम्हारी में हो रहे निर्माणाधीन फ्लाई ओव्हर का निरीक्षण किया। इस दौरान उनके साथ अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर रोहित झा, अति.पुलिस अधीक्षक, डीएसपी ट्राफिक गुरजीत सिंह उपस्थि थे। निरीक्षण करने के बाद एस पी प्रशांत ठाकुर ने एएसपी रोहित झा और ट्राफिक डीएसपी गुरजीत सिंह को निर्देश देते हुए कहा कि रायपुर से दुर्ग आने वाले हल्के वाहन/चार पहिया वाहन चालकों को कैवल्यधाम टर्निग के पास से सर्विस रोड का उपयोग कर सुविधा पूर्वक डायवर्सन पार कर सकते है। इसी प्रकार दुर्ग से रायपुर जाने वाले हल्के वाहन/चार पहिया वाहन चालकों को भवानी पेट्रोल पम्प के पास सर्विस रोड का उपयोग कर सुविधा पूर्वक डायवर्सन पार कर सकते है। यातायात पुलिस को विपरीत दिशा से वाहन चलाने वाले चालकों पर कार्यवाही करने के निर्देश दिया गया ।
वही श्री ठाकुर ने लोक निर्माण विभाग राष्ट्रीय राजमार्ग को निर्देश
दिया कि राष्ट्रीय राजमार्ग-53 में कुम्हारी मार्ग में सड़क के खराब हो चुके हिस्सो का मरम्मत कार्य एवं डामरीकरण कराये और डामरीकरण के पश्चात सड़क पर व्हाईट प्लास्टिक पेन्ट से मार्किग करे जिससे वाहन चालकों को सुविधा हो तथा वाहन चालको की सुविधा के लिए सूचनात्मक साईन बोर्ड लगाया जाये। निर्माणधीन क्षेत्र में जहां-जहां पर्याप्त स्थान है वहां रोड की चैड़ाई को बढ़ाने के लिए भी एसपी ने कहा। डायवर्सन रोड पर जगह-जगह ''नो पार्किगÓÓ व ''रांग साईड मूव्हमेंटÓÓ संबंधी चेतावनी परक बोर्ड लगाने के भी निर्देश दिये। एसपीप्रशांत ठाकुर के निरीक्षण के दौरान यातायात पुलिस के अधिकारियों सहित निर्माण एजेन्सी के इंजीनियर व मैनेजर उपस्थित थे।
दुर्ग / शौर्यपथ / कोरोना संक्रमण काल में ईदुल फित्र की तरह ईदुल अजहा भी मनाया जाएगा। एक अगस्त को ईद का त्यौहार देखते हुए प्रशासनिक तौर पर खरीदारी करने छूट दी गई थी। अब नमाज को लेकर शहर की तमाम मस्जिद कमेटियों ने अपने यहां नियम तय कर लिए हैं। जामा मस्जिद सेक्टर-6 के ईदगाह में एक अगस्त को सुबह 6:15 बजे ईदुल अजहा की नमाज में इमाम सहित सिर्फ 5 लोग शामिल होंगे। जामा मस्जिद सेक्टर-6 के इमामो खतीब मुहम्मद इकबाल हैदर अशरफी ने बताया कि कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए जमात के तौर पर मस्जिद या ईदगाह में नमाज अदा करने की इजाजत नहीं है। इसलिए शहर के मुस्लिम समुदाय ने जैसे ईदुल फित्र के मौके पर हुकूमत की आवाज पर लब्बैक कहते हुए तमाम नियमों का पालन किया ठीक वैसे ही ईदुल अजहा पर पाबंदी के बीच नमाज होगी।
इस तरह पढ़ें ईद की नमाज
हाफिज हैदर ने बताया कि जामा मस्जिद सेक्टर-6 के ईदगाह में सुबह 6 बज कर 15 मिनट तक नमाज होने के बाद लोग अपने घरों में नमाजे शुक्राना बशक्ले चाश्त या इशराक 2 या 4 रकअत में अदा कर सकते हैं। इसके बाद कुरबानी अदा कर सकते हैं। कुरबानी का यह सिलसिला 3 दिन तक चलेगा। उन्होंने कहा कि घरों में नमाज में खास तौर पर खयाल रखें कि जमाअत से अदा कर सकते हैं लेकिन तन्हा पढऩा ज्यादा बेहतर होगा। सलाम फेरने के बाद तकबीरे तशरीक यानि अल्लाहो अकबर-अल्लाहो अकबर, ला इलाहा इललल्लाह, वल्लाहो अकबर-वल्लाहो अकबर व लिल्लाहि हम्द तीन बार पढ़ लें और 34 मरतबा अल्लाहो अकबर-अल्लाहो अकबर और हो सके तो 100 या 300 बार सुबहान अल्लाहि वबे हम्दिही आप पढ़ लें।

कब्रिस्तान में लगा रहेगा ताला
शहर के कब्रिस्तान हैदरगंज कैम्प-1 में भी ईदुअ अजहा के मौके पर तीन दिन तक ताला लगा रहेगा। कब्रिस्तान इंतेजामिया कमेटी के शमशीर कुरैशी ने बताया ईद पर परंपरा अनुसार लोग ईदगाह/मस्जिदों में नमाज के बाद सबसे पहले कब्रिस्तान जाकर अपने दिवंगत परिजनों की कब्र पर दुआएं करते हैं। इन दिनों चूंकि कोरोना संक्रमण का खतरा है और शासन के आदेश अनुसार सार्वजनिक स्थलों पर लोगों की आवाजाही पर रोक है। इसे देखते हुए कब्रिस्तान में ईदुल अजहा पर ताला लगा रहेगा, जिससे यहां सार्वजनिक रूप से कोई भी इक_ा न हो सके। वहीं मैयत होने की हालत में सीमित लोगों को कब्रिस्तान में आने दिया जाएगा।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
