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बलोदाबाज़ार / शौर्यपथ / बलोदाबाज़ार जिले में पदस्थ सामुदायिक चिकित्सा अधिकारियों (CHO) की बुधवार को मानसिक स्वास्थ्य पर एक दिवसीय ऑनलाइन प्रशिक्षण हुआ । यह प्रशिक्षण डॉ प्रियंका शुक्ल,मिशन संचालक, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन व राज्य नोडल अधिकारी हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर (HWC) डॉ.सुरेन्द्र पामभोई के निर्देशन पर किया गया । राज्य सलाहकार डॉ.नरेंद्र सिन्हा के माध्यम से जिले मे नवाचार के रूप मे इन सीएचओ की ऑनलाइन Continuous Medical Education (सीएमई ) ट्रेनिंग हुई।
इस CME का उद्देस्य CHOs को हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर की 12 सेवाओ के बारे में जागरूक करना था जिससे वह अपने स्वास्थ्य केंद्र में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा सकें ।
प्रशिक्षण के पहले माड्यूल में सामान्य मानसिक रोग व शराब – तंबाकू की आदत के विषय में डॉ. राकेश कुमार, राज्य मास्टर ट्रेनर, मानसिक स्वास्थ्य व जिला नोडल अधिकारी, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम) डॉ. सुजाता पाण्डेय, द्वारा ``गूगल मीट” के माध्यम से प्रदान किया गया ।
प्रशिक्षण में मानसिक रोग जैसे अवसाद (depression), उन्माद (मेनिया), bipolar, और शिज़ोफ्रेनिया के लक्षण के बारे मे विस्तार से बताया गया जिससे CHOs रोग के लक्षण को पहचान कर रोगी को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) रिफ़र कर पाएंगे। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में बेंगलुरु-स्थित नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS) के Champ Project से प्रशिक्षित ग्रामीण चिकित्सा सहायक द्वारा उनका उपचार व दवा उपलब्ध हो पाएगी।
बलोदा बाज़ार जिले में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.खेमराज सोनवानी एवं जिला कार्यक्रम प्रबंधक सुश्री श्रृष्टि मिश्रा के नेतृत्व में आयुष्मान भारत के अंतर्गत 63 हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर संचालित हैं जिनमें 17 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 46 उप स्वास्थ्य केंद्र हैं जिनमें 18 उप स्वास्थ्य केन्द्रों में सामुदायिक चिकित्सा अधिकारी (CHO) पदस्थ हैं।
राजनांदगांव / शौर्यपथ / एक ओर जहां कोविड-19 के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है वहीं दूसरी ओर पढ़ई तंूहर दुआर को अधिक सफल बनाने के उद्देश्य से राजनांदगांव जिले के मोहला विकासखंड अंतर्गत शासकीय प्राथमिक शाला रेंगाकठेरा में संसदीय सचिव इन्द्रशाह मंडावी ने स्मार्ट शाला का शुभारंभ किया। उल्लेखनीय है कि शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रेंगाकठेरा के शिक्षक मोहम्मद सईद कुरैशी ने स्वयं के व्यय से प्राथमिक शाला रेंगाकठेरा के बच्चों को बौद्धिक विकास एवं डिजिटल पढ़ाई कराने के उद्देश्य से स्मार्ट टी.वी. उपलब्ध कराया है जिसके कारण बच्चों में पढ़ाई के प्रति ललक एवं रुचि बढ़ी है और विद्यार्थियों को भी ऑनलाईन शिक्षा के लिए बेहतर सुविधा उपलब्ध हो सकी है।
शिक्षक सईद कुरैशी के इस पहल को मोहला-मानपुर विधायक इन्द्रशाह मंडावी एवं स्थानीय समाज सेवी संजय जैन ने शिक्षकों के लिए अनुकरणीय पहल बताया है। सईद कुरैशी इंग्लिश विषय के शिक्षक है जो एससीईआरटी रायपुर के पुस्तक प्रकाशक टीम के सदस्य भी है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए एवं छात्रों के हित में समय-समय पर निजी खर्च के द्वारा नवाचार भी करते रहते है। जिसके कारण इन्हें इस वर्ष राज्यपाल शिक्षक सम्मान के लिए भी चयनित किया गया है।
विधायक मंडावी ने अपने उद्बोधन में कहा कि सभी स्कूलों में डिजिटल पढ़ाई को बढ़ावा देकर लीड कर रहे जिला शिक्षा अधिकारी श्री हेतराम सोम, डीएमसी भूपेश साहू, जिला मीडिया प्रभारी सतीश ब्यौहरे और एबीईओ मोहला राजेन्द्र कुमार देवांगन की प्रसंशा की। उन्होंने कहा कि मोहला-मानपुर विकासखंड के बच्चे पढ़ाई के क्षेत्र में अग्रणी है। विगत कुछ सालों से यहां के बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बेहतर परिणाम ला रहें हैं और भविष्य में भी शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करते रहेंगे क्योंकि हमारा क्षेत्र पूरी तरह से विकास के पथ पर अग्रसर है। वर्तमान में मोहला के कई स्कूल डिजिटल पढ़ाई की दिशा में कदम बढ़ा रहे है। शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षकों को प्रेरित करके समुदाय से सहयोग लेकर की जा रही इस नवाचारी पहल की प्रसंशा करते हुए संसदीय सचिव श्री इंद्रशाह मंडावी ने इसे अनुकरणीय बताया।
इस मौके पर सभी अतिथियों ने शिक्षकों को इस शुभ कार्य के लिए बधाई दी। स्मार्ट क्लास उद्घाटन समारोह में शिक्षाविद संजय जैन, श्रीमती नम्रता सिंह, श्रीमती कमला देवी पिस्दा, जनपद सदस्य श्रीमती सत्यभामा कलामे, शमा परवीन, प्राचार्य वी.पी. प्रजापति, राजेन्द्र कुमार देवांगन, एबीईओ विष्णु साहू, संकुल समन्वयक अमर सिंह ठाकुर, सुनील शर्मा, नंदकुमार साहू, श्रीमती प्रेमलता शर्मा, श्रीमती सुनीता वर्मा,आभिकेश वर्मा, दिनेश बघेल, युगल किशोर सिन्हा, वी.पी. भुवार्य एवं शाला विकास समिति के सभी सदस्यगण, पालकगण उपस्थित रहे।
राजनांदगांव / शौर्यपथ / कलेक्टर टोपेश्वर वर्मा के निर्देश पर आबकारी विभाग द्वारा अवैध शराब परिवहन एवं भण्डारण करने वालों पर सतत कार्रवाई की जा रही है। सहायक आयुक्त आबकारी राजनांदगांव श्री नवीन प्रताप सिंह तोमर ने बताया कि 29 जुलाई 2020 कोआबकारी विभाग राजनांदगांव द्वारा आटरा से भकुर्रा मार्ग में नाका लगाकर वाहन चेकिंग के दौरान मोटर साइकिल हीरो ॥स्न स्रद्गद्यह्व3 वाहन क्रमांक सीजी 08 एजे 3249 में अवैध मदिरा परिवहन करते हुए कुमरदा थाना डोंगरगांव निवासी लोमेश रावटे एवं सुमित रावटे के पास 75 पाव देशी दारू संत्री नंबर 1 केवल महाराष्ट्र में विक्रय के लिए वैध का लेबल लगा प्रत्येक पाव में 180 एमएल कुल मात्रा 13.5 बल्क लीटर तथा मोटरसाइकिल जप्त कर आरोपी के विरुद्ध आबकारी अधिनियम की धारा 34(2), 36 59 (क) का प्रकरण दर्ज कर विवेचना किया जा रहा है।
एक अन्य रेड कार्रवाई दौरान हाटबंजारी चौक में वाहन चेकिंग दौरान वाहन मोटरसाइकिल क्रमांक सीजी 08 एके 9577 में 63 पाव देशी मदिरा संत्री नंबर वन महाराष्ट्र राज्य निर्मित अवैध मदिरा परिवहन करते हुए जोशी लमती थाना गेंदाटोला निवासी पीताम्बर निषाद को अवैध परिवहन करते हुए छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम की धारा 34(1) 34(2) 36 एवं 59क के तहत प्रकरण पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया है। कार्रवाई दौरान आबकारी उपनिरीक्षक वृत्त चिचोला-अंबागढ़ चौकी सीपी सिंह, आबकारी आरक्षक सुरेन्द्र कुमार झारिया, आबकारी आरक्षक अनिल सिन्हा उपस्थित थे।
इसी तरह ग्राम बोदेला में अवैध मदिरा धारण करने पर बोदेला थाना तुमडीबोड निवासी ललित कुमार साहू को 92 पाव देशी दारू संत्री नंबर 1 केवल महाराष्ट्र में विक्रय के लिए वैध का लेबल लगा प्रत्येक पाव में 180 एमएल कुल मात्रा 16.56 बल्क लीटर जप्त कर आरोपी के विरुद्ध आबकारी अधिनियम की धारा 34(2), 36 59 (क) का प्रकरण दर्ज कर विवेचना किया जा रहा है। कार्रवाई के दौरान सहायक जिला आबकारी अधिकारी वृत्त राजनांदगांव (ब) निरूपमा लोन्हारे तथा आबकारी आरक्षक लाल सिंह राजपूत व संतोष अहिरवार उपस्थित थे।
राजनांदगांव / शौर्यपथ / कार्यक्रम अधिकारी महिला एवं बाल विकास श्रीमती रेणु प्रकाश ने अंबागढ़ चौकी में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा वितरित टेक होम राशन एवं सूखा राशन के संबंध में निरीक्षण किया और हितग्राहियों से जानकारी ली। हितग्राहियों ने बताया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा नियमित रूप से टेक होम राशन एवं सूखा राशन दिया जा रहा है। उन्होंने सभी सीडीपीओ को जमीनी स्तर पर इसके संबंध में निरीक्षण करने के निर्देश दिए।
कार्यक्रम अधिकारी श्रीमती रेणु प्रकाश ने तुलसी मां बम्लेश्वरी स्वसहायता समूह कोडूटोला सेन्टर, सामग्री मिक्सिंग एवं पैकेजिंग कार्य का निरीक्षण किया। उन्होंने कहा कि समूह की महिलाएं सक्रियतापूर्वक कार्य कर रही है और मास्क का उपयोग कर रही है। उन्होंने सभी को एप्रन एवं ग्लब्स का उपयोग सुनिश्चित करने के भी निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि खाद्य सामग्री को और भी सुव्यवस्थित तरीके से रखा जा सकता है। उन्होंने समूह की महिलाओं द्वारा सामग्री को भुनने एवं पीसने के नवाचार की सराहना की। सभी रिकार्ड का संधारण भलीभांति होने पर उन्होंने संतोष जाहिर किया।
दुर्ग / शौर्यपथ / राखी के इस पवित्र त्यौहार में कई भाई ऐसे भी है जो देश की सेवा कर रहे है और अपने परिवार से दूर है ऐसे सैनिक भाई जो देश के अंदर है और देश की सीमा में . इन्ही भाइयो के लिए दुर्ग एनएसयुआई की महिला विंग द्वारा भियो को आज राखी भेजी गयी . कोरोना आपदा के वैश्विक महामारी के बावजूद भी हिन्दू धर्म के इस पवित्र त्यौहार में किसी भी सैनिक भाइयो की कलाई सुनी ना रहे इसी मंशा से आज दुर्ग की एनएसयुआई महिला विंग द्वारा दुर्ग के बीएसएफ केम्प , एसटीऍफ़ बटालियन में पोस्ट द्वारा राखी भेजी गयी . कोरोना आपदा में ड्यूटी कर रहे इन सैनिक भाइयो को राखी के साथ एनएसयुआई की बहनों ने शुभकामनाये सन्देश देते हुए कहा कि ..
हमारे देश के सैनिक और सुरक्षा बल सलामत रहे
हम सब की दुवाए और प्यार आपके साथ है ,
इस रक्षाबंधन के त्यौहार पर राखी के माध्यम से आप सभी को शुभकामनाये सन्देश भेज रही हूँ
ये राखी का पवित्र बंधन आप सभी की सदैव रक्षा करेगी यही इश्वर से प्रार्थना करती हूँ ..
आपकी बहना मनीषा, गीतांजलि , पूर्वी , महेश्वरी , नंदनी एवं अन्य .
एनएसयुआई की महिला विंग के साथ शहर अध्यक्ष हितेश सिन्हा , अमन दुबे , गोल्डी कोसरे व कार्यकारी अध्यक्ष सोनू साहू का विशेष सहयोग रहा .
खेल / शौर्यपथ / टीम इंडिया के स्टार क्रिकेटर और लिमिटेड ओवर फॉर्मैट में टीम के उप-कप्तान रोहित शर्मा को मौजूदा समय के बेस्ट बल्लेबाजों में गिना जाता है। सफेद गेंद क्रिकेट में वो बेस्ट सलामी बल्लेबाज कहे जाते हैं। रोहित जब पारी का आगाज करने जाते हैं, तो वो शुरुआत में थोड़ा धीरे खेलते हैं और कुछ नर्वस भी नजर आते हैं, लेकिन एक बार टिकने के बाद वो विरोधी गेंदबाजों की बैंड बजा डालते हैं। रोहित की पारी की शुरुआत को देखकर विरोधी गेंदबाजों को लगता है कि वो उन पर हावी हो सकते हैं। न्यूजीलैंड के तेज गेंदबाज लॉकी फर्गुसन ने रोहित की जमकर तारीफ की है। उन्होंने कहा कि अगर आप रोहित को आउट नहीं कर पाते हैं, तो यह बल्लेबाज मैच से आपको पूरी तरह से बाहर कर सकता है।
रोहित के पास तमाम शानदार शॉट्स हैं, और वो बहुत ही आसानी से छक्के भी जड़ते हैं। रोहित जितनी देर क्रीज पर टिकते जाते हैं, विरोधी टीमों को दिक्कतें भी उसके साथ ही बढ़ती रहती हैं। यही वजह है कि रोहित इकलौते ऐसे बल्लेबाज हैं, जिनके खाते में वनडे इंटरनैशनल में तीन डबल सेंचुरी दर्ज हैं। वनडे इंटरनैशनल का हाइएस्ट स्कोर भी रोहित (264) के नाम ही दर्ज है। 2014 में उन्होंने यह पारी श्रीलंका के खिलाफ खेली थी। इसके अलावा टी20 इंटरनैशनल में रोहित चार सेंचुरी जड़ चुके हैं और अभी तक कोई भी क्रिकेटर टी20 इंटरनैशनल में इतनी सेंचुरी नहीं जड़ सका है।
'स्मिथ, वॉर्नर और विराट को गेंदबाजी करना भी चैलेंजिंग'
स्पोर्ट्सकीड़ा पर जब फर्गुसन से पूछा गया कि किस बल्लेबाज को गेंदबाजी करना उन्हें सबसे मुश्किल लगता है, तो उन्होंने कहा, 'अच्छा सवाल है, ऐसे कुछ बल्लेबाज हैं। रोहित शर्मा मुझे बहुत चैलेंजिंग लगते हैं। अगर आप उन्हें जल्द आउट नहीं करते हैं, तो वो बड़ा स्कोर बना लेते हैं। वो आपकी गेंद की लेंथ को बहुत जल्दी पिक करते हैं और मेरी यही ताकत है। वो वर्ल्ड क्लास बल्लेबाज हैं।' इस लिस्ट में फर्गुसन ने ऑस्ट्रेलिया के स्टीव स्मिथ, डेविड वॉर्नर के अलावा टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली को भी शामिल किया।
'रोहित शर्मा असाधारण बल्लेबाज'
उन्होंने कहा, 'स्टीव स्मिथ, डेविड वॉर्नर, विराट कोहली- ये सभी वर्ल्ड क्लास बल्लेबाज किसी कारण से हैं। इनको गेंदबाजी करना हमेशा मुश्किल होता है। आपको अच्छा लगता है, जब आप टॉप-ऑर्डर के बल्लेबाजों को आउट कर लेते हैं और आपको मिडिल ऑर्डर और लोअर ऑर्डर के बल्लेबाजों को गेंदबाजी करने का मौका मिलता है।' उन्होंने कहा, 'मैं रोहित शर्मा का बड़ा फैन हूं, मुझे लगता है कि वो एक असाधारण बल्लेबाज हैं।'
मेरी कहानी / शौर्यपथ / मैं जब बहुत छोटा था, तब मुझे पता नहीं था कि ‘जाट’ किसको कहते हैं। उन्हीं दिनों मैं एक मैच खेलने रोहतक गया था। जैसे ही मुझे पता चला कि वहां जाट बहुत होते हैं, तो मैंने कोच सर से कहा कि मुझे जाट दिखाइएगा। कोच साहब हंसने लगे। मैं दिल्ली में रहता था, रोहतक एक दूसरे प्रदेश का हिस्सा था, इसलिए मैं जानता नहीं था। उससे पहले दिल्ली से बाहर ज्यादा गया भी नहीं था।
मेरे करियर में रणजी ट्रॉफी का एक मैच बहुत यादगार है। पहली पारी में मैं ‘जीरो’ पर आउट हो गया था। मैच के दौरान मुझे हाथ में बहुत ज्यादा चोट लग गई थी। हाथ की चमड़ी पूरी छिल गई थी। डॉक्टर ने कहा कि 15 दिन तक बल्ला भी नहीं पकड़ पाओगे। यह मैच वानखेड़े स्टेडियम में था। तब वानखेड़े स्टेडियम में ‘साइड’ में प्रैक्टिस विकेट हुआ करती थीं। वहां ‘स्लाइड’ मारी, तो हाथ बुरी तरह छिल गया। डॉक्टर ने कहा कि अगर बैट पकड़ोगे, तो ‘इन्फेक्शन’ का खतरा है। बावजूद इसके मैंने बल्लेबाजी की। हम दो सौ से ज्यादा के लक्ष्य का पीछा कर रहे थे। उस मैच में मैंने 120 रन नॉट आउट बनाए, वह भी एक हाथ से बल्लेबाजी करके। मैच उत्तर प्रदेश के खिलाफ था। पहली पारी में हमारे ऊपर 60 रनों की ‘लीड’ थी, तब भी हमने वह मैच जीता था। उस साल मैंने चार शतक लगाए थे। कप्तानी करते हुए पहले चार मैचों में ये लगातार चार शतक लगे थे।
इसके बाद 2003 में भारतीय टीम विश्व कप खेलकर लौटी थी। सौरव गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम ने फाइनल तक का सफर तय किया था, पर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को हरा दिया था। वहां से लौटने के बाद खिलाड़ियों को ‘ब्रेक’ चाहिए था। इसी समय भारतीय टीम को बांग्लादेश के खिलाफ सीरीज खेलनी थी। इसी सीरीज के लिए मुझे पहली बार भारतीय टीम के लिए चुना गया। मुझे ‘सेलेक्ट’ तो पहले ही होना चाहिए था। मैंने जिम्बॉब्वे के खिलाफ एक दिन में 200 रन बनाए थे। उस साल मैंने तीन ‘बैक टु बैक’ दो सौ किए थे। मैंने ये तीन दोहरे शतक रेलवे, साइड गेम में जिम्बॉब्वे के खिलाफ और फिर सीजन के पहले मैच में रेलवे के खिलाफ लगाए थे, फिर भी मेरे ‘सेलेक्शन’ में देरी हुई। मुझे लगातार लग रहा था कि अब मुझे मौका मिलना चाहिए, पर मौका मिल नहीं रहा था। मेरी बेचैनी और ‘नर्वसनेस’ बढ़ते जा रहे थे। मुझे लग रहा था कि बांग्लादेश के खिलाफ मौका मिल तो गया है, पर अगर सीरीज में रन नहीं बने, तो कहीं दोबारा सब कुछ फिर से तो शुरू नहीं करना पड़ेगा। कीर्ति आजाद सेलेक्टर थे। उन दिनों टीम में सेलेक्शन की जानकारी या तो फोन से मिलती थी या फिर टीवी चैनल से। मोबाइल का दौर इतना नहीं था। जब यह खबर आई, तो मेरी नानी मुझे मंदिर लेकर गई थीं। मेरी नानी वैसे भी मंदिर बहुत जाती थीं।
भारतीय टीम में चुने जाने का संतोष बहुत बड़ा था, क्योंकि मैंने बहुत रन बनाए थे। मैं काफी समय से टीम में चुने जाने का इंतजार कर रहा था। इंटरनेशनल टीम में चुने जाने से पहले मेरे 15 से ज्यादा फस्र्ट क्लास शतक थे। आजकल तो खिलाड़ी एक-दो शतक लगाते हैं और फिर आईपीएल के जरिए टीम में आ जाते हैं। मेरी औसत 55-56 रनों की थी, जब मुझे टीम इंडिया में चुना गया। इसके बाद अगले चार साल में मुझे लगभग 20-22 मैचों में ही मौका मिला। जिसमें मेरे दो शतक थे। टेस्ट टीम में भी मेरा ‘सेलेक्शन’ हो गया था। उसमें भी मैं शतक लगा चुका था। अब 2007 विश्व कप की टीम चुने जाने का वक्त था। 2007 विश्व कप में मेरे साथ बिल्कुल वही हुआ था, जो आज अंबाती रायडू के साथ हुआ है। मैं लगातार टीम के साथ था। मैच खेल रहा था। एक मैच में मेरी ‘परफॉरमेंस’ खराब थी और उसमें रॉबिन उथप्पा ने अच्छा प्रदर्शन किया था।
पहले मैं टीम से बाहर हुआ और फिर ‘स्क्वाड’ से भी बाहर हो गया। इसके बाद विश्व कप की टीम से भी बाहर हो गया। जब आप विश्व कप से एक सीरीज पहले टीम से बाहर हो जाएं, तो बहुत निराशा होती है। अगर आप एक साल पहले बाहर हो जाएं, तो हालात स्वीकार करने का समय मिल जाता है। आपको पता चल जाता है कि आप टीम की ‘स्कीम ऑफ थिंग्स’ में नहीं हैं, लेकिन अगर आप एक सीरीज पहले बाहर हों, तो बहुत बुरा लगता है। मेरे साथ यह भी था कि 2007 से पहले मैं कोई विश्व कप खेला नहीं था। अंडर-19 विश्व कप भी मैंने ‘मिस’ किया था, जिसमें युवराज सिंह, मोहम्मद कैफ खेलकर उभरे थे। उस समय जोनल वनडे हुआ करते थे। उसमें मैंने पांच मैच खेले थे। पांचों मैच में मेरे 50 रन थे। चार मैंचों में मैं नॉट आउट था। इसके बाद भी मुझे मौका नहीं मिला था। फिर 2007 की विश्व कप टीम में भी जब मुझे मौका नहीं मिला, तो बहुत निराशा हुई। इतनी ज्यादा कि मुझे लगा कि मैं क्रिकेट खेलना छोड़ ही दूंगा।
(जारी)गौतम गंभीर, पूर्व क्रिकेटर और सांसद
जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / तमिलनाडु के घने जंगलों में बसा है पुल्लूचेरी। हिन्दुस्तान के सुदूर इलाकों में बसे गांव-बस्ती की तरह पुल्लूचेरी तक पहुंचने से पहले ही तरक्की की सड़़क खत्म हो जाती थी। मदुरई से करीब 15 किलोमीटर दूर बसे इसी गांव की हैं चिन्ना पिल्लई। चिन्ना सिर्फ 12 साल की थीं, जब उनकी शादी कर दी गई और थोड़े दिनों बाद ही उन्हें अलागर कोविल गांव के खेतों में मजदूरी के लिए ले जाया गया। वहां के खेतों में काम करने वाले ज्यादातर श्रमिक आस-पास की बस्तियों से आते थे। इनमें चिन्ना का गांव भी शामिल था।
एक के बाद एक चिन्ना दो बेटे और तीन बेटियों की मां बन गईं, और उनकी जिंदगी बेबस खेतिहर मजदूरों की तरह जमींदारों और साहूकारों की उधारी व कर्ज तले दबती चली गई। चिन्ना और पति पेरुमल जी-तोड़ खेतों में मेहनत करते, मगर कर्ज कम होने का नाम ही न लेता। साहूकार बेबस मजदूरों से तीन सौ गुना सूद वसूलते थे, मगर कोई उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। खेत मालिक भी बहुत कम मजदूरी देते थे। चिन्ना को यह सब मंजूर न था। वह कहती हैं- ‘मैं अपने खेत मालिक से लगातार विनम्रता के साथ दोहराती रहती कि वह हम सबकी दिहाड़ी बढ़ा दें। कुछ इससे नाराज भी हो गए, मगर यह हमारा हक था और हम अपना हक ही तो मांग रहे थे।’
चिन्ना अपने जैसी महिला मजदूरों की टीम लीडर थीं, और उन सबकी स्थिति लगभग एक जैसी थी। क्योंकि वे सब असंगठित थीं, इसलिए वे खेत मालिकों पर कोई दबाव भी नहीं बना सकती थीं। चिन्ना ने इस नियति से मुठभेड़ का इरादा बांधा। उन्होंने 1990 में छोटी-छोटी बचत के जरिए अपने भविष्य को सुरक्षित करने की मुहिम शुरू की। इसके लिए उन्होंने अपने समूह की महिलाओं को सबसे पहले भरोसे में लिया। 15 महिलाओं ने 20 रुपये महीना बचाना शुरू किया। जो पैसे जमा होते, वे समूह की किसी जरूरतमंद महिला को कर्ज के रूप में दिए जाते और उस महिला को उस पर 60 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होता। साहूकारों के 300 प्रतिशत के मुकाबले यह छोटी ब्याज दर थी।
चंद महीनों में ही यह स्वयं सहायता समूह ‘कलंजियम’ लोगों में अपना भरोसा बढ़ाता गया और चिन्ना की कोशिशों ने आहिस्ता-आहिस्ता उनके समुदाय की महिलाओं को आत्मनिर्भर बना दिया। आलम यह था कि सदस्य न सिर्फ आपात स्थिति में कर्ज लेते, बल्कि छोटे-मोटे करोबार के लिए भी वे इसकी मदद लेने लगे। धन फाउंडेशन से जुड़ने के बाद इस स्वयं सहायता समूह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगभग तीन दशक पहले चिन्ना पिल्लई ने पुल्लूचेरी की गरीब औरतों को सशक्त बनाने का जो बीज बोया था, वह अब 13 राज्यों के 12 लाख परिवारों का विशाल वृक्ष बन गया है।
शुरू-शुरू में तो महिलाओं के पति इस मुहिम का विरोध करते थे, क्योंकि उन्हें यकीन नहीं हो पा रहा था, फिर इसकी बैठकों में भाग लेने के लिए कई बार वे खाना पकाने में देर कर देती थीं, इसलिए भी वे नाराज हो जाते, लेकिन फिर वे खुद उन्हें अपनी साइकिल पर बिठाकर लाने लगे। चिन्ना चाहती हैं कि महिलाएं इतनी सबल हों कि वे अपने परिवार और संतान का भविष्य संवार सकें। वह इसके लिए शिक्षा को बहुत अहम मानती हैं। उन्हें खुद तो पढ़ने-लिखने का मौका नहीं मिला, लेकिन उनकी दूरदर्शिता ने उनके बच्चों को तालीम से महरूम नहीं होने दिया। वह कहती हैं- ‘बदलाव का सबसे बड़ा औजार है शिक्षा। मैं चाहती हूं कि हमारी अगली पीढ़ी इतनी सुशिक्षित और सशक्त हो कि कोई उसके भरोसे का फायदा न उठा सके। मैं चाहती हूं कि देश के किसी भी गरीब को अपनी आर्थिक बदहाली के कारण गरिमामय जिंदगी जीने से वंचित न रहना पड़े।’
चिन्ना को एक-एक लाख रुपये के तीन पुरस्कार मिले। उन्होंने उनकी आधी रकम अपने पास रखी और आधी अपने आंदोलन को दान में दे दी। इनमें से एक पुरस्कार उन्हें जनवरी 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों मिला था। वह पुरस्कार था- स्त्री शक्ति पुरस्कार। उनकी ख्याति से ईष्र्यालु लोगों ने परेशान करने का मौका तब भी नहीं छोड़ा। वह याद करती हैं कि उन्हें यह सम्मान लेने दिल्ली जाना था, तो कहा गया कि आप विमान से जाएंगी, तो आपको दिल का दौरा पड़ जाएगा और मुझे टे्रन से ले जाया गया। लेकिन इस पुरस्कार समारोह में प्रधानमंत्री ने जो किया, उसने देश-दुनिया में चिन्ना को श्रद्धा के आसन पर बिठा दिया। दरअसल, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह कहते हुए चिन्ना के पैर छू लिए थे कि ‘मैं चिन्ना में शक्ति देखता हूं।’
चिन्ना की ख्याति ने उनके गांव और समुदाय को देश भर में नाम और सम्मान दिलाया है। उन्हें जानकी देवी बजाज पुरस्कार के अलावा तमिलनाडु सरकार के प्रतिष्ठित अवैयार अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। अभी हाल ही में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। सम्मान मिलने के बाद चिन्ना के अल्फाज थे- दुनिया में मशहूर तो मैं अटलजी के कारण ही हुई।
प्रस्तुति: चंद्रकांत सिंह
चिन्ना पिल्लई सामाजिक कार्यकर्ता
नजरिया / शौर्यपथ / जब भारत जनवरी 2021 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्य के रूप में शामिल हो जाएगा, तब वहां अनेक मसलों से रूबरू होगा। क्या संयुक्त राष्ट्र आने वाले दिनों में दुनिया के लोगों के लिए मानवीय सहायता और गलत काम करने वालों के विरुद्ध न्याय को बेहतर तरीके से सुनिश्चित कर पाएगा? सीरिया, यमन और अफगानिस्तान जैसे देशों में चल रहे संघर्ष के समाधान में क्या वह मदद कर सकेगा? अशांत जगहों से भाग रहे शरणार्थियों की रक्षा करेगा?
चीन, रूस या अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों में भी मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, लेकिन ऐसे देशों की आलोचना न करने की वजह से मानवाधिकार समूहों ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की बार-बार आलोचना की है। जवाब में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र व उसके सदस्य देशों से आग्रह किया कि वे अधिकारों की बढ़ती चुनौतियों पर अधिक ध्यान देने के मकसद से ‘कॉल टु एक्शन ऑन ह्यूमन राइट्स’ की पहल करें। अब दुनिया भर में उत्पीड़न का सामना करने वालों के अधिकारों के बचाव की दिशा में भारत से भी बड़ी उम्मीदें होंगी। भारत सरकार ने कहा है कि सुरक्षा परिषद में भारत तर्क व संयम की आवाज बुलंद करेगा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत दृढ़ विश्वास के साथ काम करेगा।
दुर्भाग्य से अन्य देशों में मानवाधिकारों के सम्मान को बढ़ावा देने के मामले में भारत का रिकॉर्ड खराब रहा है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत ने आमतौर पर देश-विशिष्ट प्रस्तावों पर ही अमल किया है। भारत रोहिंग्या मामले अर्थात म्यांमार में जातीय शोषण या फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते के ड्रग युद्ध जैसे मामलों में संयुक्त राष्ट्र की पहल का समर्थन करने में नाकाम रहा है। कुछ ही मौके आए हैं, जब भारत ने आवाज उठाई है। अतीत में देखें, तो भारत ने श्रीलंका में कथित युद्ध अपराधों की जवाबदेही की चर्चा की थी। हाल की बात करें, तो हांगकांग में अधिकारों की रक्षा के प्रति भारत ने चिंता का इजहार करते हुए कहा है कि इसे ‘ठीक से, गंभीरता से और निष्पक्ष रूप से देखा जाए’।
भारत दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में अपने सैनिक भेजकर महत्वपूर्ण योगदान करता रहा है और सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनने की इच्छा रखता है। संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान किसी संघर्ष के बाद स्थितियों की निगरानी, जांच और मानवाधिकार पर ध्यान केंद्रित रखते हैं। भारत को ऐसी कोशिशों का विस्तार करते हुए नेतृत्व और समर्थन का प्रदर्शन करना चाहिए। दुनिया में मानवाधिकार के पक्ष में खड़े होने के लिए अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड को भी देखना चाहिए। जहां भारत लंबे समय से ज्यादा स्वतंत्र समाज रहा है, वहीं चीन एकदलीय अधिनायकवादी राज्य है। हाल ही में भारत ने भी चीन जैसी पाबंदियों की कुछ नकल की है। जब सूचना, संचार, मनोरंजन, शिक्षा और व्यवसाय इत्यादि क्षेत्रों में इंटरनेट बुनियादी आजादी का हिस्सा हो गया है, तब भारत में कुछ पाबंदियां दिखी हैं।
अमेरिका में पुलिस द्वारा अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद जो आंदोलन हुआ, उसने दुनिया या भारत पर कोई खास असर नहीं डाला है। भारतीय पुलिस में भी ज्यादती का पुराना ढर्रा जारी है। हाशिये पर पड़े वंचितों के संरक्षण की जरूरत पर अधिकारी चुप रहते हैं। उधर, अमेरिका में पुलिस ने न सिर्फ अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया है, बल्कि प्रदर्शनकारियों की रक्षा में नाकाम रही है। कुछ मामलों में तो पुलिस खुद हमलों में शामिल दिखी है।
आज भारत निर्णायक मोड़ पर है। जब भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शामिल हो जाएगा, तब उसके पास दो विकल्प होंगे, या तो वह मानवाधिकार का सम्मान करने वाले देशों के पक्ष में खड़ा हो जाए या फिर चीन, रूस, ब्राजील जैसे देशों के साथ तालमेल बनाकर चलता रहे। ये देश अक्सर मानवाधिकार के मामले में वैश्विक नियम आधारित कानूनी प्रणाली को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश करते हैं। दुनिया में आक्रामक होता चीन, कोरोना की वजह से सेहत व आजीविका पर दोहरे संकट की पृष्ठभूमि में साल 2021 का आगाज भारत के लिए अहम मौका होगा। देखना है, देश मानवाधिकारों के समर्थकों के साथ खड़ा होता है या मानवाधिकारों को कमजोर करने वालों के साथ?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) मीनाक्षी गांगुली,दक्षिण एशिया निदेशक, ह्यूमन राइट्स वाच
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारत में राफेल जैसे लड़ाकू विमान का लंबे समय से चल रहा इंतजार खत्म हो गया। पांच विमानों की पहली खेप के भारत पहुंचते ही हमारी ताकत में जो इजाफा हुआ है, उससे निश्चित ही हमारी सेनाओं के मनोबल में वृद्धि हुई होगी। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हम रक्षा सौदों में दो दशक से ज्यादा ढिलाई की वजह से कोई भी लड़ाकू विमान खरीद नहीं पा रहे थे।
जब 2016 में फ्रांस के साथ 36 राफेल के लिए सौदा हुआ, तब हमें भूलना नहीं चाहिए कि उसे लेकर किस तरह के विवाद हुए थे। राजनीतिक क्षेत्र में किस तरह से चर्चाएं हुई थीं। बहुत अप्रिय ढंग से आरोप-प्रत्यारोप लगे थे। संभव है, राजनीतिक विवाद न होते और रक्षा सौदों के प्रति हमारे प्रतिष्ठानों में पूरी निष्ठा व त्वरा होती, तो भारत को नए विमानों के लिए इतना लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता।
पिछली सदी में सुखोई विमान खरीदे गए थे, अब 23 साल बाद राफेल मिला है, तो भारत में इसके मानसिक-सामरिक महत्व को समझा जा सकता है। अव्वल तो भारतीय गगन में एक असुरक्षा का भाव आने लगा था, पुराने पड़ चुके मिग विमानों की दुखद स्थिति आए दिन रुलाने लगी थी। ऐसे विमानों को उड़ाने की जरूरत पड़ रही थी कि जिन्हें उड़ते ताबूत तक कह दिया जाता था। बेशक, अब राफेल के आने के बाद हम अपनी वायुसेना के और उज्ज्वल भविष्य की ओर देख सकेंगे। सुखोई-30 जैसे विमान अभी भी सेवारत हैं, लेकिन सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें राफेल या उससे भी विकसित 200 से ज्यादा विमानों की जरूरत है। और अभी तो पांच विमानों के साथ शुरुआत हुई है, अगले साल तक जब सभी 36 राफेल भारत आ जाएंगे, तो जाहिर है, देशवासियों को ज्यादा सुरक्षा का एहसास कराएंगे। राफेल का आना बड़ी खुशखबरी है, लेकिन हमें अपना पारंपरिक संयम भी नहीं खोना चाहिए। भारत ने हथियार या विमान कभी भी किसी पर हमले के लिए नहीं खरीदे हैं, हमारी एक-एक रक्षा खरीद अपने बचाव के लिए है। हमें किसी अन्य देश की जमीन नहीं चाहिए, हमें किसी पर हमला नहीं करना है, हमें केवल अपना बचाव करना है। हां, जो हमसे दुश्मनी पालना चाहते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि भारत ईंट का जवाब पत्थर से दे सकता है। साथ ही, इस रक्षा उपलब्धि के पक्ष या विपक्ष में किसी तरह की सियासत से बचना चाहिए।
राफेल का आना हमारे लिए एक प्रेरणा भी है कि हम आगे के लिए और तैयार रहें। संसाधनों से भरे भारत में अब उस दौर का आगाज हो जाना चाहिए, जब हमें किसी भी देश से कोई रक्षा उपकरण खरीदने की जरूरत नहीं पड़े। अभी भारत स्वयं अगर बहुत सक्षम नहीं है, तो उसे दूसरे विकसित सहयोगी देशों के साथ मिलकर अपनी ही सीमा में रक्षा निर्माण उद्यम लगाना चाहिए। यह प्रयास शुरुआत में बहुत महंगा भले लगे, लेकिन दूरगामी रूप से भारत को इससे व्यापक मजबूती मिलेगी।
रक्षा के मोर्चे पर कोई भी तैयारी जयघोष के साथ हो, यह जरूरी नहीं। ऐसी तैयारियों को चुपचाप अंजाम देकर परिणाम देश के सामने रख देना चाहिए। राफेल या सुखोई जैसे विमानों के नए संस्करणों पर भारत को काम करना चाहिए। हमें पुराने साथी देशों जैसे रूस को भी साथ रखना होगा। राफेल की रोशनी में उन तमाम रक्षा खरीद और निर्माण योजनाओं में तेजी आनी चाहिए, जिनसे अपना देश और मजबूत होगा।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
