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May 31, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

नई दिल्‍ली / शौर्यपथ / देश की राजधानी दिल्ली में कोरोना वायरस के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है. बढ़ते मौतों के आंकड़े को ध्यान में रखते हुए दिल्ली के निगमबोध घाट पर कोविड-19 से होने वाली मौतों के अंतिम संस्कार के लिए एक्स्ट्रा प्लेटफार्म बनाए गए हैं. इन एक्स्ट्रा प्लेटफार्म पर लकड़ी से अंतिम संस्कार होगा और यह सभी 13 प्लेटफार्म निगमबोध घाट के पास यमुना किनारे बनाए गए हैं. हम आपको बता दें कि निगमबोध घाट पर अब तक कोविड-19 के शवों के लिए 48 प्लेटफार्म लकड़ी के हैं और तीन प्लेटफार्म CNG के लिए हैं.
गौरतलब है कि दिल्‍ली में कोरोना के केसों की संख्‍या 47, 102 तक पहुंच गई है. मुंबई और दिल्‍ली इस समय कोरोना वायरस से सबसे ज्‍यादा संक्रमित शहरों में से हैं. देश की राजधानी में अब तक 1904 लोगों की कोरोना संक्रमण के कारण मौत हुई है. दिल्‍ली में 17, 457 लोग इलाज के बाद ठीक हो चुके है, इस तरह यहां कोरोना के एक्टिव केसों की संख्‍या 27 हजार 741 है. भारत की बात करें तो यहां अब तक कोरोना के तीन लाख 66 हजार 946 केस सामने आए हैं. देश में अब तक 12 हजार 237 लोगों की मौत कोरोना वायरस के कारण हुई है. एक लाख 94 हजार 325 लोग इलाज के बाद ठीक हो चुके हैं और देश मे कोरोना के एक्टिव केस एक लाख 60 हजार 384 हैं.

 

सेहत / शौर्यपथ / आलू हमारी रसोई में सबसे आवश्यक सामग्री में से एक है, वहीं हर तरह के व्यंजनों में हम इसका उपयोग करते हैं। इसके साथ ही एक चमकदार त्वचा के लिए भी आलू का इस्तेमाल किया जाता है। यदि आलू को आइस क्यूब के रूप में चेहरे पर लगाया जाए तो यह न केवल आपकी त्वचा में रेडनेस को कम करता है, वहीं सूजन से भी छुटकारा दिलाता है।

कैसे करें तैयार


आलू के आइस क्यूब को तैयार करने के लिए आपको एक आलू व नींबू की आवश्यकता है। आलू का रस निकाल लें। इसमें कुछ बूंदें नींबू की डालें। इन्हें अच्छी तरह मिला लें।

आइस ट्रे में इन्हें निकालें, फिर 1 दिन बाद इसे बाहर निकालें।

इन आइस क्यूब को तुरंत डायरेक्ट अपने चेहरे पर न लगाएं, वरन इसे किसी कपड़े में लपेटकर फिर अपने चेहरे पर लगाएं।

कुछ देर तक अपने चेहरे पर इसे लगा रहने दें, फिर कुछ देर बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लें।

फायदे

त्वचा में चमक लाने के लिए यह फायदेमंद है। इसके इस्तेमाल से चेहरे की त्वचा चिकनी होगी और मुंहासे खत्म हो जाएंगे।

आलू के आइस क्यूब्स अंडर आई डार्क सर्कल्स का इलाज करने में मदद करते हैं।

चेहरे पर धूप की वजह से आई टैनिंग को कम करने का काम करता है और चेहरे पर ग्लो आता है।
मुंहासों के दाग इसके नियमित इस्तेमाल से गायब होने लगते हैं।

 

सेहत / शौर्यपथ / गर्मी के मौसम में पसीना। गर्मी से अधिकतर लोग परेशान रहते हैं लेकिन एक हेल्दी त्वचा के लिए पसीना आना जरूरी होता है। कई लोग मानते हैं कि पसीना आपकी त्वचा को तैलीय बनाता है और सभी छिद्रों को अवरुद्ध करता है, लेकिन यह सच नहीं है। वास्तव में यदि आप पसीना नहीं बहाते हैं तो इसका मतलब है कि आपके छिद्र पहले से ही भरे हुए हैं और आपकी त्वचा मुंहासे-ब्रेकआउट के लिए लगभग तैयार है।

जब आपको गर्मी लगती है और पसीना आता है तो आपको प्यास भी लगती है जिससे आप ज्यादा पानी पीते हैं। इससे आपकी त्वचा को कई तरह के फायदे पहुंचते हैं। आइए जानते हैं पसीना आपकी त्वचा के लिए फायदेमंद क्यों है।
पसीना आपके शरीर के सभी हानिकारक विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। ये टॉक्सिन जब पसीने के रूप में नहीं निकलते हैं, तो त्वचा को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप मुंहासे व दाने होते हैं।
जब आपको पसीना आता है तो आपके शरीर से minerals and natural salt निकलता है, जो एक प्राकृतिक एक्सफोलिएटर की तरह काम करता है। यह रोम छिद्रों को साफ करता है और त्वचा में जमी गंदगी और अशुद्धियों को साफ करता है, साथ ही रूखी त्वचा और एलर्जी की समस्या को भी कम करता है।
चेहरे पर जमी गंदगी और अशुद्धियों को दूर करता है।
पसीना हमारे शरीर से सभी गंदगी और बची हुई मृत त्वचा कोशिकाओं को बाहर निकालने में मदद करता है, साथ ही त्वचा को साफ करता है।

पसीना आपकी त्वचा को फ्रेश महसूस कराता है। यदि आप कभी भी वर्कआउट करके या तेज चलने के 1 घंटे के बाद आईने में देखते हैं, तो आपकी त्वचा में एक अलग ही चमक नजर आती है। यह आपके चेहरे पर आए स्वेटिंग के कारण होता है, जो आपकी त्वचा में जमी गंदगी को साफ करता है।

खेल / शौर्यपथ / ब्यूनस आयर्स। मुफलिसी में पले-बढ़े अर्जेंटीना के इन युवाओं के लिए उम्मीद की किरण थी तो बस फुटबॉल। अभावों के बीच अभ्यास में इन्होंने भविष्य का लियोनेल मेस्सी या कार्लोस टेवेज बनने का सपना संजोया लेकिन कोरोनावायरस महामारी ने इनकी उम्मीदों पर मानों तुषारापात कर दिया।

यहां फोर्ट अपाचे के अपार्टमेंट ब्लॉक के बाहर कार्लोस टेवेज का भित्तिचित्र और उसके नीचे लिखा वाक्य ‘मैं उस जगह से आया हूं, जहां कामयाब होना नामुमकिन माना जाता है’, इन युवा फुटबॉलरों के लिए संजीवनी की भांति रहा है।


टेवेज ब्यूनस आयर्स के सबसे गरीब इलाके से निकलकर दूसरी श्रेणी के क्लब अलमाग्रो तक पहुंचे। 16 बरस के आसपास के तमाम फुटबॉलरों के लिए उनकी कामयाबी मील का पत्थर बन गई लेकिन फिर कोरोनावायरस ने दुनिया में दस्तक दी।
पिछले 80 दिन से यहां कोई खेल नहीं हुआ है और ना ही भविष्य में जल्दी होने की संभावना है। ऐसे में अर्जेंटीना के गरीब इलाकों से निकले फुटबॉलरों की बेहतर जिंदगी की एकमात्र उम्मीद भी छिनती नजर आ रही है।

एक फुटबॉलर ने कहा, ‘इस महामारी ने सब कुछ छीन लिया। यह भयावह है। हम घर में बैठे हुए हैं।’ ब्राजील, चिली या पेरू जैसे बाकी लातिन अमेरिकी देशों की तरह तबाही का मंजर अर्जेंटीना में नहीं दिखा लेकिन फुटबॉल के दीवाने इस देश में महामारी के दूरगामी दुष्प्रभाव युवा फुटबॉलरों के कैरियर पर जरूर दिख रहे हैं। इनमें से कइयों ने फुटबॉल छोड़ने का मन बना लिया तो कई ड्रग्स या शराब की लत के शिकार हो रहे हैं । कई खतरनाक अवैध खेलों में शामिल हो गए हैं जो फुटबॉल मैदानों के पास रहने वाले खिलाड़ियों और दर्शकों के बीच इस समय लोकप्रिय है।
सांता क्लारा क्लब के अध्यक्ष डेनियल लोपेज ने कहा, ‘सड़क पर यह सब दिख रहा है। बच्चों ने यहां शरण ली थी पर अब नहीं रह सकते।’ इस क्लब में 170 लड़के लड़कियां प्रशिक्षण ले रहे थे लेकिन अब इस क्लब को किचन में बदल दिया गया है, जहां गरीबों के लिए खाना पकता है।

मनोरंजन / शौर्यपथ / बॉलीवुड अभिनेता अजय देवगन ने हाल ही में एक फिल्म 'लालबाजार' को अपनी आवाज दी है। यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली है। इस फिल्म का प्रीमियर 19 जून को जी5 पर किया जाने वाला है। हाल ही में इस फिल्म की स्टार कास्ट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें सभी कलाकारों ने अजय देवगन को अपनी आवाज देने के लिए शुक्रिया कहा।


देव डी और ब्लैक फ्राईडे जैसी फिल्में करने वाले कलाकार देवेंद्र भट्टाचार्य का कहना था कि मैंने लाल बाजार इसलिए की क्योंकि इस बार उन्हें कोलकाता का एक नया रूप देखने को मिला। आमतौर पर फिल्मों में जब भी दिखाया जाता है तो कोलकाता का दुर्गा पूजा धूल और नगाड़ों के तरीके से ही दिखाया जाता है। जबकि इस फिल्म में शायद पहली बार कोलकाता की पुलिस और उसके बारे में इतनी गहराई से बताया गया और यही बात मुझे बहुत अच्छी लगी जैसे यह ऑफर मिला मैंने इस फिल्म के लिए और इस रोल के लिए झट से हां बोल दिया।

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लाल बाजार में ही काम करने वाली अभिनेत्री सौरासनी मैत्र का कहना था कि यह फिल्म 2 भाषाओं में शूट की गई है हम नहीं चाहते थे कि कोलकाता की जो असली बंगाली संस्कृति है उसे कहीं मिस किया जाए साथ ही में हम यह भी नहीं चाहते थे कि इसको एक ही भाषा में रखकर इसके दर्शक सीमित किया जाएं। इसलिए हमने हिंदी और बंगाली दोनों में ही इसे शूट किया। एक बार हम बंगाली में शूट करते थे पूरा सीन लेते थे और दूसरी बार हम हिंदी में लिया करते थे तो जैसे बंगाली समझ में आती है वह बंगाली में स्वयं को देखें और जो हिंदी में जाना चाहता है वह हिंदी में फिल्म देखें।

इस फिल्म में ऋषिता भट्ट भी दिखाई देने वाली हैं जो कि एक टीवी पत्रकार के रूप में नजर आने वाली है। अपने इस रोल के बारे में बताते हुए ऋषिता भट्ट ने कहा कि रोल की तैयारी के लिए मैंने किसी भी पत्रकार को नहीं चुना ना मैंने उनसे बात की लेकिन मुझे यह रोल बहुत अच्छा लगा। मेरे इस रोल में प्रोफेशनल जिंदगी भी दिखाई दिखाई देने वाली हैं, साथ ही मेरी पर्सनल लाइफ पर भी जोर दिया गया है। कैसे इन दोनों को साथ में लेकर में चल रही हूं वह आपको फिल्में देखना मिलेगा इससे ज्यादा मैं कुछ अभी तो नहीं बता सकती लेकिन इतना कह सकती हूं कि मेरे लिए वेब सीरीज दो भाषाओं में शूट करना मजेदार ही रहा है।
सबसे अच्छी बात यह रही कि जब भी मैं ट्रैवल करती थी मुझे बार-बार परेशान नहीं होना पड़ता था मैं शूट करती थी वहीं पर अपनी डबिंग करती थी और काम पूरा खत्म करके ही अपने घर लौटती थी।


फिल्म लालबाजार असली घटना पर आधारित है जिसमें रेड लाइट एरिया में होने वाली कुछ हत्याओं को दिखाया गया है और कैसे कोलकाता पुलिस ने सुलझाया है इस बारे में बताया गया है। यह फिल्म 19 जून को जी5 पर रिलीज होने वाली है।

खानाखाजना / शौर्यपथ / आंवले का लजीज मुरब्बा
सामग्री : 1 किलो ताजे आंवला, 10 ग्राम चूना, 25 ग्राम मिश्री, सवा किलो शक्कर, 1 चम्मच काली मिर्च, 5-7 केसर के लच्छे, पाव चम्मच इलायची पावडर।
विधि : 1 किलो ताजे एवं साफ-सुथरे आंवले लेकर पानी में तीन दिन भीगने दें। इसके बाद उन्हें पानी से निकालकर कांटों से गोद लें और चूना पानी में घोलकर उसमें आंवले को तीन दिन तक भीगने दें। चौथे दिन साफ पानी से धोकर मिश्री तथा पानी में उन्हें भाप दें। फिर कपड़े पर फैलाकर सुखा लें।

अब चाशनी बनाकर उसमें आंवले छोड़ दें और पकाएं। जब आंवले अच्छी तरह गल जाएं तब उसमें काली मिर्च, केसर और इलायची मिला दें। तत्पश्चात मुरब्बा ठंडा करके मर्तबान में भरकर रख दें। तैयार आंवले का मुरब्बा दिल को ताकत और दिमाग को तरोताजा करने साथ-साथ सेहत के बहुत ही लाभदायी है।
भरवां आंवले का अचार
सामग्री : 1 किलो ताजे बड़े आकार के आंवले, 100 ग्राम राई, 100 ग्राम सरसों, 100 ग्राम पिसी लाल मिर्च, आधा चम्मच हल्दी, 25 ग्राम सौंफ, चुटकीभर हींग, 500 ग्राम मीठा तेल, नमक स्वादानुसार।
विधि : आंवलों को धोकर कपड़े से साफ पौंछ कीजिए। अब एक बर्तन में आंवले डालकर दो बड़े चम्मच तेल डालकर धीमी आंच पर पकाएं। हल्के से पकने पर उन्हें आंच से उतार कर ठंडा कर लें। तत्पश्चात आंवलों की गुठलियां अलग कर दें।
अब कड़ाही में तेल गरम करके उसे थोड़ा-सा ठंडा कर लें। इस तेल में उपरोक्त सभी मसालें डालकर चलाएं। पूरी तरह ठंडा होने पर आंवले में चम्मच की सहायता से मसाला भर दें और जार में भरकर बंद कर दें। लीजिए तैयार है आंवले का स्वादिष्ट चटपटा भरवां अचार। आंवला पाचनशक्ति बढ़ाकर भूख बढ़ाता है आलस्य को दूर करता है।
आंवले की तरी वाली सब्जी

सामग्री : 200 ग्राम बेसन, 10-15 कली सूखे आंवले (जो बाजार में सूखे हुए मिलते हैं), 4-5 हरी मिर्च, 4-5 कली लहसुन, अदरक एक गांठ (बारीक कटी हुई), 250 ग्राम प्याज (किसी हुई), 1 चम्मच लाल मिर्च, 1 चम्मच सूखा धनिया, 1 चम्मच हल्दी, 2 बड़े चम्मच मॉयन के लिए तेल 1/2 (आधा) चम्मच सौंफ, जीरा, अजवाइन, तेलपात, स्वादानुसार नमक, गरम मसाला, तलने के लिए तेल।


खुरमे बनाने की विधि : सबसे पहले 10-15 सूखे आंवलों को गरम तेल में तलिए, ठंडा होने पर बारीक मिक्सी में पीसिए। आंवला और बेसन साथ में मिलाकर छान लीजिए। ऊपर दी गई सामग्री में से आधी सामग्री बेसन के साथ मिला लीजिए (प्याज, हरी मिर्च, अदरक, लहसुन, सौंफ, अजवाइन, लाल मिर्च, स्वादानुसार नमक, मॉयन के लिए दो चम्मच तेल) आदि सभी सामग्री डालकर खुरमे की तरह आटा गूंथ लें। गैस पर कड़ाही रखकर तेल गरम करके गूंथे हुए आटे की छोटे, गोल, चपटे खुरमे बनाकर तलिए, सुनहरा होने पर निकालिए।
तरी के लिए सामग्री : सबसे पहले कड़ाही में दो बड़े चम्मच तेल डालकर गरम करें। फिर उसमें जीरा व तेजपान और उपरोक्त बची हुई आधी सामग्री (अदरक, हरी मिर्च, प्याज, लहसुन) डालकर सुनहरा होने तक भूनें। फिर उसमें एक-एक चम्मच सूखा धनिया, लाल मिर्च, हल्दी डालकर भूनें।

जब मसाले तेल छोड़ने लगे तो आधा लीटर पानी डालकर एक उबाली लें, और आंवले के खुरमे डाल दें। फिर 15 से 20 मिनट तक पकने दें। पकने के बाद आधा चम्मच गरम मसाला व हरा धनिया डालकर गर्म-गर्म पराठे के साथ सर्व करें।

धर्म संसार / शौर्यपथ / सांदीपनि ऋषि विष्णु के मत्स्य अवतार की कथा के बाद कहते हैं कि अब मैं तुम्हें श्रीहरि के कच्छप अवतार की कथा सुनाता हूं।

फिर सांदिपनि ऋषि महाराज महाबली और उनके असुरों एवं इंद्र और उनके देवताओं द्वारा समुद्र मंथन, अमृत वितरण के दौरान युद्ध और असुरों द्वारा धनवं‍तरि देव से अमृत का कलश छुड़ाकर भाग जाना फिर श्रीहरि के मोहिनी रूप में प्रकट होने की कथा को श्रीकृष्‍ण और बलराम को सुनाते हैं।

रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा


सभी असुर अमृत कलश के अमृत को पहले पीने की होड़ के चलते आपस में लड़ते हैं तभी मोहिनी रूप धारण कर भगवान विष्णु असुरों के समक्ष प्रकट होकर नृत्य करने लगते हैं। सभी का ध्यान उस ओर चला जाता है। राहु, केतु और महाबली सभी दैत्य उनका नृत्य देखने के बाद पूछते हैं सुंदरी कौन हो तुम? सभी देवता भी वहां आकर खड़े हो जाते हैं।

मोहिनी रूप धारण किए विष्णु पहले तो कहते हैं कि मैं स्वच्छंद नारी हूं। कुलीन लोगों का मनोरंजन करती हूं। फिर वे असुरों को धर्म और न्याय की बात बताकर लुभाते हैं और कहते हैं कि जो उच्च कुल का होता है वह कलह को छोड़कर न्याय करता है। फिर मोहिनी असुरों को अपने शब्द और मोहजाल में फांसकर कहती हैं कि मैं यही सोचकर इतनी दूर से आपकी सभा देखने आई थी कि परंतु यहां तो कलह कलेश है, द्वैष है, अन्याय है तो यहां मेरा मन नहीं लगेगा। अच्छा मैं चलती हूं। तभी एक असुर कहता है, हे मोहिनी तुम्हारे यहां आने से ऐसा लगा जैसे वसंत ऋतु आ गई हो। अगर हम यह कलह छोड़कर द्वैष मिटा दें तो क्या तुम यहां रुकोगी? और हम सबका मनोरंजन करोगी?

मोहिनी कहती हैं बड़े चतुर हो परंतु तुमने न्याय की बात नहीं की? तब असुर कहता है हम अन्याय भी नहीं करेंगे। तब मोहिनी कहती हैं परंतु इसका निर्णय कौन करेगा? तब वह असुर कहता है तुम। महाबली भी कहते हैं हां तुम। हम न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म का सारा निर्णय तुम पर छोड़ते हैं। यह सुनकर मोहिनी कहती हैं प्रमाण। तब एक असुर अमृत कलश दिखाकर कहता है प्रमाण तो ये है। ये है अमृत कलश जिसे चाहे पिला दो और जिसे चाहे प्यासा मार डालो।

फिर मोहिनी उस असुर के हाथ से अमृत कलश लेकर कहती हैं, ना ना ना, इतना बड़ा उत्तरदायित्व मेरे कंधों पर ना डालो। मेरे कंधे बड़े कोमल है। मेरा मन बड़ा चंचल है। शास्त्र कहता है कि कुलीन पुरुषों को किसी स्वच्छंद नारी पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। तुम महर्षि कश्यप के कुल से हो, फिर सोच लो।

तब महाबली कहते हैं, देवी बड़े से बड़ा वीर, कुलीन, महात्मा और योगी जब किसी सुंदर स्त्री के नयनों से घायल हो जाता है तो वह अपना सबकुछ उसकी ठोकरों में डाल देता है। तब उसे उचित-अनुचित, पाप-पुण्य का कोई भान नहीं रहता। यही दशा हमारी है। जो तुम्हारी इच्‍छा हो वही करो। योग्य-अयोग्य, पात्र-कुपात्र तुम्ही जानों। जिसे अमृत के योग्य समझो उसे अमृत दो और जिसे अपने सौंदर्य के योग्य समझो उसे अपने सौंदर्य का रसपान कराओ और जिसे अपने योग्य समझो उसे अपना आप सौंप दो। जो तुम्हें पा लेगा उसे फिर अमृत की क्या आवश्यकता।

यह सुनकर मोहिनी कहती हैं कि सत्य कहा, प्राणी यदि ऐसा ही समर्पण भगवान के समक्ष कर दे तो तक्षण मुक्ति पा ले। परंतु शायद भगवान नारी के ही रूप में अधिक शक्तिशाली होते हैं। यह सुनकर दैत्य समझ नहीं पाते हैं कि यह मोहिनी क्या कहना चाहती है तभी मोहिनी कहती हैं, अच्‍छी बात है अब मैं ही न्याय करूंगी। फिर मोहिनी अपनी माया से नृत्यसभा का निर्माण करके सभी देवता और दानवों को अलग-अलग लाइन से बैठा देती हैं। फिर वह कहती हैं कि जैसा कि आपने स्वयं ही कहा है कि मैं जिसे जिस योग्य समझूंगी, उसे उसी रस का पान कराऊंगी। स्वीकार है? सभी देवता और दानव एक साथ कहते हैं स्वीकार है, स्वीकार है परंतु नृत्य के साथ। मोहिनी कहती हैं अच्छा। फिर वह अमृत कलश को एक निश्चित जगह पर रखकर नृत्य करने लगती हैं।

एक ओर देवताओं के राजा इंद्र और दूसरी ओर दैत्यों के राजा महाबली बैठकर नृत्य का आनंद उठाते हैं। फिर मोहिनी नृत्य गान करते हुए ही कलश उठाकर पहले इंद्र को अमृत पान कराती हैं और पुन: कलश को ले जाकर रख देती है। फिर अपनी माया से कलश को बदलकर उस कलश को उठाकर लाती हैं और बली को उस कलश का जल पिलाती हैं और पास ही बैठे दूसरे असुर को भी जल पिलाती हैं। सभी समझते हैं कि ये अमृत है। तभी एक असुर मदमस्त होकर उठता है और मोहिनी के साथ ही नृत्य करने लगता है। यह देखकर दो असुर और उठकर नृत्य करने लगते हैं।

कलश बदल-बदल कर वह देव और असुरों को जल पिलाती रहती हैं। फिर कुछ देव भी अमृत पीने के बाद नृत्य करने लगते हैं। तभी एक असुर मोहिनी के इस छल को देख लेता है। तब वह चुपचाप वेश देवता का धारण करके देवताओं की पंक्ति में बैठ जाता है। उस असुर का यह छल चंद्रदेव देख लेते हैं।

मोहिनी उसे अमृत पिलाने लगती है तभी वह देवता कहते हैं मोहिनी ये तो दानव है। तभी मोहिनी बने भगवान विष्णु अपने असली रूप में प्रकट होकर अपने सुदर्शन चक्र से उस दानव की गर्दन काट देते हैं और फिर वे वहां से अदृश्य हो जाते हैं। यह देखकर बाली कहता है धोका, हमारे साथ धोका हुआ है। यह सुनकर इंद्रदेव कहते हैं आक्रमण और वहां युद्ध प्रारंभ हो जाता है।

सांदीपनि ऋषि कहते हैं तब देवता और असुरों में भयानक युद्ध छिड़ गया जिसे पुराणों में देवासुर संग्राम कहा गया है। अमृत पिकर देवता बलवान हो चुके थे। इसलिए इंद्र के हाथों स्वयं महाराज बली भी मारे गए। लेकिन दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य संजीविनी विद्या जानते थे। इसलिए युद्ध के पश्चात उन्होंने उन सभी दैत्यों को जिनके सिर धड़ से अलग नहीं हुए थे उनको जीवित कर दिया। सबसे पहले उन्होंने राजा बली को जीवित किया।

राजा बली परम भक्त प्रहलाद के पौत्र थे और परमवीर भी थे। इंद्र से उस हार का बदला लेने के लिए शुक्राचार्य ने राजा बली से सौ यज्ञ कराने का अनुष्ठान कराया। 99वें यज्ञ के दौरान शुक्राचार्य ने उनको आशीर्वाद देकर कहा कि अब केवल एक यज्ञ रह गया है और यदि वह भी निर्विघ्न पूरा हो जाए तो आपके 100 यज्ञ पूरे हो जाएंगे और उसी समय इंद्रपद सर्वदा के लिए आपका हो जाएगा। स्वर्ग पर देवताओं का वर्चस्व सदैव के लिए समाप्त हो जाएगा। यह यज्ञ तुम्हारे तप की ही नहीं, हमारे बल और विद्या की भी परीक्षा है। अब देवगुरु बृहस्पति भी देख लेंगे कि समस्त देवताओं को तेजहिन करके यह शुक्राचार्य असुर जाति को त्रिलोकी का राज्य दिला सकता है। यह सुनकर महाबली कहता है कि और विष्णु भी देख लेंगे कि उनकी माया और छल से असुर शक्ति को आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता है।

उधर, सभी देवता गुरु बृहस्पति के साथ भगवान विष्णु के पास जाकर कहते हैं प्रभु यदि उसका सौंवा यज्ञपूर्ण हो जाएगा तो वह तीनों लोकों का अधिपति हो जाएगा। विष्णु कहते हैं कि जो तपस्या करेगा और कर्म करेगा वो तो उसका फल पाएगा ही, ये तो प्रकृति का विधान है। इस पर बृहस्पति कहते हैं कि परंतु जो प्रकृति का विधान विनाश की ओर जाने लगे और अधर्म की स्थापना हो तो उसे रोका जाना चाहिए प्रभु। आपको प्रकृति के विधान के ऊपर जाकर दैवीय विधान के माध्यम से इस विनाश को रोकना चाहिए। यह सुनकर विष्णु कहते हैं आपका वचन सत्य है। हम अपने उत्तरदायित्व का अवश्य निर्वाह करेंगे।

फिर सांदीपनि ऋषि बताते हैं कि भगवान विष्णु वामनरूप में अवतार लेकर महाबली की यज्ञशाल के द्वार पर उस समय पहुंचे जब उसका सौवां यज्ञ आरंभ होने वाला था। एक सेवक आकर महाबली को बताता है यज्ञशाला के द्वार पर एक याचक आया है और वह आपसे मिलने की याचना कर रहा है। यह सुनकर शुक्राचार्य कहते हैं कि महाराज यज्ञ का संकल्प करने जा रहे हैं वो जो भी मंगता है, वहीं से देकर भेज दो। तब सेवक कहता है कि मैंने उसे मुंहमांगी भिक्षा लेने की बात कही थी परंतु वह महाराज के हाथों भिक्षा लेने की हठ कर रहा है। जय श्रीकृष्ण।

 

धर्म संसार / शौर्यपथ / कुण्डली में राहु-केतु परस्पर 6 राशि और 180 अंश की दूरी पर दृष्टिगोचर होते हैं जो सामान्यतः आमने-सामने की राशियों में स्थित प्रतीत होते हैं। कुण्डली में राहु यदि कन्या राशि में है तो राहु अपनी स्वराशि का माना जाता है। यदि राहु कर्क राशि में है तब वह अपनी मूलत्रिकोण राशि में माना जाता है। कुण्डली में राहु यदि वृष राशि मे स्थित है तब यह राहु की उच्च स्थिति होगी। मतान्तर से राहु को मिथुन राशि में भी उच्च का माना जाता है। कुण्डली में राहु वृश्चिक राशि में स्थित है तब वह अपनी नीच राशि में कहलाएगा। मतान्तर से राहु को धनु राशि में नीच का माना जाता है। लेकिन यहां राहु के पहले घर में होने या मंदा होने पर क्या सावधानी रखी जानिए।

कैसा होगा जातक : दौलतमंद तो होगा पर खर्चा बहुत होगा। यहां व्यक्ति की बुद्धि ही उसका साथ देगी बशर्ते वह अति कल्पनावादी न हो। 1 से 6 तक जैसी बुध की हालत वैसी राहु की मानी जाएगी। 7 से 12 तक जैसी‍ केतु की हालत वैसी राहु होगी। पहला घर मंगल और सूर्य से प्रभावित होता है, यह घर किसी सिंहासन की तरह होता है। पहले घर में बैठा ग्रह सभी ग्रहों का राजा माना जाता है। जातक अपनी योग्यता से बड़ा पद प्राप्त करेगा। इस घर में राहु उच्च के सूर्य के समान परिणाम देगा, लेकिन सूर्य को ग्रहण माना जाएगा अर्थात सूर्य जिस भाव में बैठा है उस भाव के फल प्रभावित होंगे। यदि मंगल, शनि और केतु कमजोर हैं तो राहु बुरे परिणाम देगा अन्यथा यह पहले भाव में अच्छे परिणाम देगा।


5 सावधानियां :
1. व्यर्थ के बोलते रहने से बचें और वाणी पर नियंत्रण रखें।
2. सोच-समझकर बुद्धि से काम लें और अति कल्पना से बचें।
3. व्यर्थ के तंत्र, मंत्र या यंत्र आदि के चक्कर में न पढ़ें।
4. पिता, गुरु और अपने से बड़ों का सम्मान करें।
5. ससुराल पक्ष से संबंध अच्छे रखें। ससुराल वालों से बिजली के उपकरण या नीले कपड़े नहीं लेने चाहिए।


क्या करें :
1. गले में चांदी पहनें।
2. बहते पानी में नारियल भी बहाएं।
3. बहते पानी में 400 ग्राम सुरमा बहाएं।
4. गुरु का उपाय करें।
5. 1:4 के अनुपात में जौ में दूध मिलाएं और बहते पानी में बहाएं।

 

नजरिया / शौर्यपथ / एक अनुमान है कि भारत में लगभग एक करोड़ 60 लाख ऐसे कामगार हैं, जो सिलाई-कढ़ाई-बुनाई जैसे कामों से जुडे़ हुए हैं। ये कामगार मुख्यत: ग्रामीण भारत में रहते हैं, और हमारे कपड़ा उद्योग की उस जटिल प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिस पर शायद ही कभी दुनिया की नजर जाती है। न सिर्फ संख्या बल के लिहाज से यह एक बड़ी तादाद है, बल्कि ये कामगार हमारे कुशल श्रमबल का हिस्सा हैं। पेशेवर गहन जानकारियों के लिहाज से ये लोग काफी हुनरमंद हैं और इन्होंने यह ज्ञान बेहद काबिल मास्टरों से सीखा है, जो सदियों से हमारे समाज का हिस्सा रहे हैं।
1960 के दशक में पहली बार मैंने पश्चिम बंगाल के गांवों में कपड़े पर सोने की बारीक कढ़ाई का काम होते देखा। वहां पर यह काम सदियों से चलन में रहा है। कहा जाता है कि सोने की कढ़ाई की शुरुआत ईरान में हुई और भारत में यह सल्तनत काल में आई। इन गांवों की कशीदाकारी को बंगाल के नवाबों का संरक्षण हासिल था। वास्तव में, हमारा देश ऐसी ग्रामीण-कार्यशालाओं से भरा पड़ा है, उन्हें आर्थिक मदद और बेहतर बुनियादी ढांचे की जरूरत है, क्योंकि इसके बिना अब ये जीवित नहीं रह सकेंगी। महामारी के बाद देश के हथकरघा व दस्तकारी क्षेत्र को जीवित रहने के लिए रास्ता चाहिए। सरकारी एंपोरियमों की अब कोई प्रासंगिकता नहीं है।
दरअसल, इस संदर्भ में हमारा नजरिया ही गलत है। एक बेहतर हैंडलूम उत्पाद को, जो न सिर्फ मनमोहक, बल्कि पारिस्थितिकी के अनुकूल भी होता है, सहानुभूति के साथ नहीं बेचा जा सकता। उसे मार्केटिंग व रिटेलिंग की आधुनिक तकनीक की जरूरत है। उसे दुनिया में श्रेष्ठतम रूप में पेश किए जाने की आवश्यकता है। प्रतिस्पद्र्धी बाजार में बने रहने का यही एक रास्ता है। यह हम सब जानते हैं कि देश में सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया कराने वाले क्षेत्रों में कृषि के बाद कपड़ा क्षेत्र दूसरे नंबर पर आता है। 200 साल पहले तक दुनिया को कपडे़ का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता हमारा देश था। मगर आजादी के मिलने तक यह अपने ही कपड़ों की कॉपी इंग्लैंड के औद्योगिक क्षेत्रों से लेकर इस्तेमाल करने वाला देश बन गया। जाहिर है, कारीगरी की हमारी समृद्ध आर्थिकी के तहस-नहस हो जाने के कारण भारत के ग्रामीण बाजार बुरी तरह प्रभावित हुए।
लेकिन आजादी के बाद सरकार ने अपनी हस्तशिल्प विरासत को फिर से जिंदा करने की कोशिश की और चमत्कारिक रूप से भारत ने कई बिसरा दिए गए कौशल को पुनर्जीवित भी कर लिया। यह एक दूरदर्शिता भरा लक्ष्य अवश्य था, मगर इसे आसानी से हासिल नहीं किया जा सका। भारतीय दस्तकारी की विरासत को सहेजने के लिए निरंतरता से भरा एक प्रगतिशील पुनरोद्धार आंदोलन चलाया गया। इन कपड़ों को ‘विश्वकर्मा’ प्रदर्शनियों की एक शृंखला के रूप में देश-दुनिया में लॉन्च किया गया।
पिछले दो दशकों से भी अधिक वक्त में भारतीय फैशन उद्योग ने काफी प्रगति की है। और बाकी दुनिया के उलट इसके पास डिजाइनरों की एक देशज टीम है। इस टीम में सिर्फ वही नहीं हैं, जो रैंप पर दिखते हैं, बल्कि इसका हिस्सा वे कामगार भी हैं, जो गांवों में बसते हैं। इनमें बुनकर, कशीदाकारी करने वाले, और साज-सज्जा की डिजाइन तैयार करने वाले कारीगर शामिल हैं। ज्यादातर भारतीय वस्त्रों और उनके ग्लैमराइजेशन का श्रेय इन्हें दिया जा सकता है। महामारी के कारण इस क्षेत्र की हालत को देखते हुए बहुत जरूरी है कि सरकार अपनी तरफ से कोई पहल करे, जैसा उसने 1950 के दशक में किया था, ताकि देश की दस्तकारी को बचाया जा सके। दुनिया आज कपड़ों के उत्पादन में काफी उन्नत मशीनरी का इस्तेमाल करती है और इसका असर क्या होता है, यह हम बनारसी साड़ी के मामले में देख सकते हैं। चीनी उत्पादों ने बनारस के हैंडलूम बाजार को बरबाद कर दिया है। महामारी बाद इस क्षेत्र के कामगारों के लिए आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। वस्त्र के क्षेत्र में एक बौद्धिक संपदा के आगे संकट का सवाल तो खैर है ही।
सरकार को इस क्षेत्र में स्टार्ट-अप को प्रोत्साहित करने के लिए आगे आना चाहिए। ग्रामीण कृषि पृष्ठभूमि में दस्तकारी वाले कपड़ों का बेहतर उत्पादन हो सकता है। इसके लिए बुनियादी ढांचे या कौशल विकास में ज्यादा निवेश की जरूरत भी नहीं। यह दुनिया में हमारा इकलौता ‘मेड इन इंडिया बाइ हैंड’ ब्रांड होगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) रितु कुमार, फैशन डिजाइनर

 

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / जिस देश की सीमा पर तनाव हो, उसका एकजुट होना समय की सबसे बड़ी मांग है। यह एकजुटता देश के जवानों की शहादत का भी सबसे सच्चा सम्मान है। आज जब देश के लोग और तमाम नेता शहीदों का सम्मान कर रहे हैं, उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं, तब यह हमारे लिए देश के पक्ष में विचार करने का सही समय है। ध्यान रहे, चीन के भी जवान शहीद हुए हैं, लेकिन उनके सम्मान के लिए उसके नेताओं के पास दो शब्द भी नहीं हैं। चीन ने कितने जवान खोए हैं, वह शायद ही बताए, लेकिन भारत में एक-एक जवान की जान कीमती है। वाजिब सम्मान के साथ अपने जवानों की शहादत को सदियों तक याद करना हमारी परंपरा रही है। इस परंपरा के सच्चे सम्मान का ही एक बुनियादी व्यवहार हमारी एकजुटता है।
आज ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों ने अपने आपसी मतभेदों को भुला दिया है और वे सरकार व सेना के साथ खड़ी हैं। सीमा पर होने वाला कोई भी संघर्ष किसी एक नेता या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, देश की जिम्मेदारी है। सैनिक देश की रक्षा की शपथ लेते हैं, देश के लिए जान गंवाते हैं। ऐसे में, हमारे रक्षा मंत्री और अन्य नेताओं ने बिल्कुल सही कहा है, शहादत बेकार नहीं जाएगी। यदि हम वाकई चाहते हैं कि शहादत सार्थक हो, तो हमें सबसे पहले एकजुट होने की जरूरत को महसूस करना होगा। राजनीतिक एकजुटता सबसे जरूरी है और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आगामी बैठकों का खास महत्व है। ध्यान रहे, चीन के प्रति हमारा सांस्कृतिक-ऐतिहासिक-आर्थिक-राजनीतिक जुड़ाव हमें किसी निर्णय लेने की प्रक्रिया में संकोची बना देता है। हम एक कदम आगे बढ़ाकर दो कदम पीछे खींच लेते हैं, लेकिन हम मिल-जुलकर यह नहीं देखते कि चीन कदम-दर-कदम कहां से कहां पहुंच गया है। हमें एकजुट होकर इस सच को सामने लाना चाहिए। ध्यान रहे, चीन अपने लोगों को यह नहीं बता रहा कि उसने भारत की जमीन पर कहां-कहां, किस-किस आधार पर दावा कर रखा है। वह गलवान घाटी को चीनी क्षेत्र बता रहा है, तो यह जरूरी है कि हम दुनिया को सच बताएं।
सख्त शासन की वजह से चीन अपने इतिहास, विरासत व पूर्वजों के विरुद्ध चल रहा है, वरना उसे याद रहता कि चीनी धर्मगुरु कन्फ्यूसियस ने कहा था, ‘एकता, वास्तव में, लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने की अनुमति देती है, और फिर खुशी हासिल करती है’। चीन एक समय बुद्धमय भी हो गया था, आज भी वहां बुद्ध का बहुत प्रभाव है। उसे सोचना चाहिए कि जिस देश की जमीन पर वह निगाह गड़ाए बैठा है, वह देश उसी बुद्ध का है, जिनके शांति और अहिंसा के संदेश के सामने संसार झुक जाता है। चीन सब भूल गया, पर हमें नहीं भूलना है। सीमा पर तनाव भी हमारे लिए चौतरफा प्रेरणा का समय है। कूटनीतिक, राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक, सामाजिक और साथ ही कोरोना के मोर्चे पर भी हमें और एकजुट होकर मुकाबला करना है। 45 साल बाद जो शहादत हुई है, वह चेतावनी है कि हमें अपना रास्ता ठीक कर लेना चाहिए। देशसेवा के प्रति समर्पण के अभाव और एकजुटता की कमी की वजह से ही भारतीय लोकतंत्र की शोभा कम होती है और चीन हमारी खामियों के बहाने ही लोकतंत्र और हमारी ताकत का मखौल उड़ाता है। बेशक, हम एकजुट हुए, तो सबको सही जवाब मिल जाएगा।

 

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