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मनोरजन / शौर्यपथ / बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के निधन को आज एक सप्ताह बीत चुका है हालांकि उनके चाहने वालों के साथ फैमली-फ्रेंड और बॉलीवुड सितारे उन्हें मिस करना नहीं छोड़ हैं। क्योंकि उनकी मौत को कोई भी नहीं भूला पा रहा है। हर शख्स उनकी मौत से दुखी और सदमें है। सुशांत के फैमली और फ्रेंड उन्हें याद करते हुए उनकी थ्रोबैक फोटो और वीडियो शेयर कर श्रध्दाजंलि दे रहे हैं। इसी बीच सुशांत का एक और थ्रोबैक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें सुशांत गांव की लड़की से शादी करने वाले एक सवाल पर एकदम देसी अंदाज में रिएक्शन दे रहे हैं। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब देखा जा रहा है।
इस वायरल वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि उनका यह विडियो उनके पैतृक निवास का है। जब सुशांत आखिरी बार वहां अपना मुंडन संस्कार करने के लिए वहां गए थे। विडियो में सुशांत अपने पिता के साथ घर के आँगन में बैठे दिख रहे हैं। वीडियो में सुशांत के अवाला कुछ महिलाएं और परिवार के बाकी सदस्य भी नजर आ रहे हैं जो सुशांत से शादी को लेकर चर्चा कर रहे हैं।
इस वायरल विडियो में सुशांत के परिवार की एक महिला सुशांत से सवाल करती है कि – ‘शादी में सबको ले जाओगे न…?’ इस पर सुशांत बोलते हैं – ‘पहले लड़की ढूंढ लें…? आप लोग भी बताएं कोई हो तो… ‘ फिर महिला कहती है – ‘देहाती लड़की से कर लोगे?’ तो इस पर सुशांत बोलते हैं – ‘काहे नहीं…’
विडियो में सुशांत बड़े ही देसी अंदाज में बातचीत करते नजर आ रहे हैं। उनके बैठने के तरीके और बातचीत के ढंग से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे कितने जमीन से जुड़े शख्स थे। इतना ही नहीं वीडियो में सुशांत हाथ में नीम का दातुन लिए हुए नजर आ रहे हैं। वीडियो देखकर लग रहा है कि यह सुबह-सुबह का वीडियो है। वे महिला के सवालों का बड़े अच्छे से जवाब दे रहे हैं। लोगों को सुशांत का ये देसी अंदाज बड़ा ही पसंद आया।
बता दें कि सुशांत सिंह राजपूत ने बड़े पर्दे पर अपनी शुरुआत फिल्म साल 2013 में रिलीज हुई फिल्म कोई पो चे से की थी। इसी साल वह फिल्म शुद्ध देसी रोमांस में भी नजर आए थे। साल 2014 में सुशांत आमिर खान स्टारर फिल्म पीके में अनुष्का के लवर की भूमिका में दिखे थे। साल 2015 में सुशांत की फिल्म डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी रिलीज हुई थी। सुशांत सिंह राजपूत को सबसे ज्यादा लोकप्रियता मिली साल 2016 में रिलीज हुई बायोपिक फिल्म एम.एस.धोनी द अनटोल्ड स्टोरी से। इसके बाद सुशांत ने राब्ता, वेलकम टु न्यूयॉर्क, केदारनाथ, सोनचिड़िया और छिछोरे जैसी फिल्मों में नजर आए।
जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / करीब छह दशक पहले ब्रिटेन की गुलामी से आजाद हुआ नाइजीरिया बुरी खबरों के लिए ही सुर्खियों में अधिक रहा है। भुखमरी, गरीबी, नस्लवादी हिंसा और स्त्री उत्पीड़न के दाग तो जैसे इसके दामन से ही चिपक गए थे। हालांकि आज यह तेजी से आर्थिक तरक्की करने वाला एक अफ्रीकी देश है। साल 2014 में नाइजीरिया की एक अलग तरह की घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान इसकी ओर मोड़ा। उस वाकये की मुख्य किरदार थीं अडाओरा ओकोली। नाइजीरिया की एक युवा डॉक्टर।
जुलाई 2014 की बात है। ओकोली लागोस स्थित अपने हॉस्पिटल में तब कार्यरत थीं। एक दिन लाइबेरिया के 40 साल के पैट्रिक सोयर अपने इलाज के लिए उनके पास आए। वह काफी बीमार लग रहे थे। पैट्रिक को अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दी गई। अगले दिन जब वह उन्हें देखने गईं, तो पैट्रिक के बेड पर रखे ‘इंट्रावेनस फ्लूड बैग’ को भी हाथ में उठा लिया। यह असावधानी बरतते समय उन्हें जरा भी इलहाम नहीं था कि यह मरीज अतिसंक्रामक वायरस का शिकार भी हो सकता है, क्योंकि तब तक नाइजीरिया में इबोला का एक भी मामला पुष्ट नहीं हुआ था।
उन्हीं दिनों मानवाधिकार समूह ‘डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ ने एक अपील जारी की थी कि पश्चिम अफ्रीकी देशों को इबोला से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद की दरकार है। इस बयान के सामने आने के चंद रोज बाद ही पैट्रिक की मौत हो गई। पैट्रिक इबोला वायरस के संक्रमण का शिकार हुए थे। पैट्रिक की मौत के कुछ ही दिनों बाद ओकोली को उल्टियां आने लगीं, पेशाब का रंग बदलने लगा और उनमें डायरिया के लक्षण दिखने लगे। उन्हें समझते देर न लगी कि वह संक्रमित हो चुकी हैं। अगस्त में उनके खून की जांच की गई, जो पॉजिटिव निकली। उन्होंने फौरन अपनी मां को फोन किया कि उनके कमरे को बाहर से बंद कर दें और उसके आसपास किसी को न जाने दें। ओकोली ने मां को कहा, ‘घबराना नहीं, मैं जिंदा लौटूंगी।’
ओकोली को तुरंत ‘आइसोलेशन रूम’ में पहुंचा दिया गया। जब तक इस वायरस को लेकर लागोस में सतर्कता बरती जाती, तब तक इसने कई लोगों को अपना शिकार बना लिया था। ओकोली खुद एक डॉक्टर थीं, इसलिए हालात की गंभीरता को वह अच्छी तरह जान रही थीं। उनके साथ कई मरीज आइसोलेशन में थे, लेकिन उन सबकी देखभाल करने के लिए तब संक्रामक रोगों का एक ही विशेषज्ञ था। ओकोली कहती हैं, ‘हम प्रामाणिक थिरेपी पाने की स्थिति में नहीं थे। इस बीमारी को परास्त करने वाले किसी व्यक्ति का प्लाज्मा उपलब्ध नहीं था। मैं उन लम्हों में सिर्फ अपने ईश्वर से बातें कर सकती थी और मैंने पल-पल उससे यही गुहार लगाई कि मुझे तुम्हारी जरूरत है।’
ओकोली को मालूम था कि उन्हें तरल पदार्थ लेते रहना होगा, ताकि उनकी त्वचा में तरलता बनी रहे। अपनी नब्ज भी लगातार टटोलती रहीं। करीब एक हफ्ते के बाद उनकी सेहत में कुछ सुधार नजर आया। और फिर एक सुबह डॉक्टर उनके लिए वही पैगाम लेकर आया, जो किसी डॉक्टर को फरिश्ते के बराबर खड़ा कर देता है। डॉक्टर ने कहा, ‘ओकोली पिछले कई दिनों की जांच में तुम्हारी रिपोर्ट पॉजिटिव नहीं पाई गई है।’ वह एक नए जन्म की तरह था। एक पखवाडे़ के बाद जब ओकोली को वार्ड से छुट्टी मिली, तो वह एक लाल रिबन काटकर आगे बढ़ीं। यह प्रतीक था कि वह इंसानी दुनिया में फिर से लौट रही हैं।
नवंबर 2014 में अमेरिकन सोसायटी फॉर ट्रॉपिकल मेडिसिन ऐंड पब्लिक हेल्थ ने एक कॉन्फ्रेंस में अपने अनुभव साझा करने के लिए ओकोली को न्यू ऑरलेन्स आमंत्रित किया। बिल गेट्स इस कॉन्फ्रेंस के मुख्य वक्ता थे। ओकोली को लगा कि बिल गेट्स एक पीड़िता का नजरिया जानना चाहते हैं। कॉन्फ्रेंस के बाद वह नाइजीरिया लौटने वाली थीं, लेकिन टुलेन यूनिवर्सिटी की पब्लिक हेल्थ ऐंड ट्रॉपिकल मेडिसिन विभाग ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वह उनके यहां दाखिले के लिए आवेदन करें। बिल गेट्स ने उनके अनुभवों को अपनी वेबसाइट पर साझा किया है।
ओकोली ने इनफेक्शियस डिजीज एपिडेमियोलॉजी में मास्टर की पढ़ाई करने का मन बनाया, ताकि वह किसी भी महामारी से निपटने के विभिन्न पहलुओं को अच्छी तरह जान सकें। एक भुक्तभोगी के तौर पर वह जान चुकी थीं कि एक मरीज आखिर उन पलों में क्या सोचता है। वह कहती हैं कि ‘इस एहसास ने मेरी आंखें खोलीं कि संक्रामक रोग दरअसल गरीबी और ऐसे पिछड़े देशों की बीमारी है, जिनके पास इतने संसाधन नहीं कि इसे पसरने से रोक सकें।’
नाइजीरिया जैसे देशों में ऐसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है, जो जानते हों कि जब जानलेवा संक्रामक रोग का प्रसार हो, तो क्या करना चाहिए। अब एक बच्ची की मां ओकोली अपने मुल्क लौट संक्रामक रोगों से ग्रस्त लोगों की सेवा करना चाहती हैं। उनके शब्द हैं, ‘अंतत: यह ईश्वर की भक्ति और मानवता की सेवा है।’
(प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह) अडाओरा ओकोली, इबोला को मात दे चुकी डॉक्टर
नजरिया /शौर्यपथ / भारत भावुक इंसानों से भरा हुआ है। किसी का दुख-दर्द मन को जरा-सा छू जाए, तो नमी अंदर से उमड़ती है और आंखों से छलक आती है। कोई अचरज नहीं कि चीर-फाड़ और कड़वी दवाओं की पढ़ाई करके नया-नया निकला वह डॉक्टर अंदर से सिसक रहा था। हाथों में कुछ कागज थे, जिन पर ऐसे शब्द नुमाया थे, जो एक समाजसेवी के बलिदान की कहानी बखान रहे थे। कुछ देर ही कागज पर निगाह टिकती और फिर भावुकता कागजों से परे बहा ले जाती। कुछ संभलकर कागज पर लौटना होता और फिर शब्द भावनाओं का ज्वार उठा देते थे। मन सवाल करता कि ऐसे भी कोई करता है क्या? अपना देश यहां है और कहां दूर जाकर सेवा में लगे हैं? सेवा भी ऐसी कि दिन-रात रोम-रोम रमा हुआ है। विधि का विधान देखिए, करीब 600 कुष्ठ रोगियों की सेवा करते-करते खुद में भी रोग लग गया है। अरे पगले सेवक, अब तो छुट्टी ले, बहुत हुई सेवा। अब तो तुझे खुद रोग लग आया है, अब तू खुद बचे, न बचे? लौट जा अपने देश बेल्जियम, हवाई में कौन तेरा है? पर डेमियन नाम का वह सेवक सेवा का मोर्चा नहीं छोड़ता। सेवा से ऐसी श्रद्धा है कि हिम्मत कभी जवाब नहीं देती। तकलीफ बढ़ती है, तो सेवा की हिम्मत भी अगले पायदान चढ़ जाती है। वह बेमिसाल सेवक रोग से गलने-गलने तक दूसरों की सेवा करता है और फिर एक दिन थककर बिस्तर पर जा लेटता है हमेशा के लिए। उस दिन इंसानियत मुल्कों की सरहदों को ढहाकर जमीं से आसमां तक गूंज उठती है कि सब देख लो, ऐसा होता है इंसान।
ऐसी अनुपम सेवा कथा से गुजरते हुए ही डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस ने यह निश्चय किया था कि दुनिया में उन्हें भी कहीं मिले सेवा का मौका, तो कुछ कर गुजरें। वाकई, खूब चाहने से ही राह निकलती है। उन्हीं दिनों चीनी क्रांतिकारियों के कॉमरेड सैन्य जनरल झो दे की चिट्ठी आई थी, पंडित नेहरू के पास कांग्रेस और भारत के नाम। जापानी हमले का जवाब देते चीनी क्रांतिकारियों ने मदद की गुहार लगाई थी। तब अपना देश आजाद नहीं हुआ था। उस चिट्ठी में गुहार के चंद लफ्ज चीन के भावी पितामह माओ ने भी जोडे़ थे। उन्होंने लिखा था, ‘हमारी मुक्ति, भारतीयों और चीनियों की मुक्ति, सभी दलितों और उत्पीड़ितों की मुक्ति का संकेत होगी’। गुहार थी कि भेज सको, तो डॉक्टर भेजो, बड़ी संख्या में हम मारे जा रहे हैं। पंडित नेहरू से लेकर नेताजी बोस तक सभी कांग्रेसी नेता भावुक हो उठे थे। जगह-जगह अपील प्रसारित की गई। कौन डॉक्टर चीन सेवा के लिए जाना चाहता है?
अच्छा मौका डॉक्टर कोटनिस के हाथ लग गया। बहुत खुश हुए कि इंसानियत और अपनी योग्यता साबित करने का सुनहरा मौका आया है। भारत और भारतीयों की सेवा भावना को परदेशी जमीन पर साकार करना है। यही देश की परंपरा है, इंसान से इंसान का भाईचारा बढ़ाना है। पिता शांताराम कोटनिस तो बेटे के लिए दवाखाना खोलने की तैयारी में थे, लेकिन बेटे ने पत्र लिख भेजा कि चीन जाऊंगा, मंजूरी दीजिए। पिता कुछ निराश हुए, पर खुश भी थे कि बेटा देश की पुकार पर जा रहा है। उसके चर्चे होंगे, जय-जयकार होगी और फिर वह कोई हमेशा के लिए थोड़ी न जा रहा है, एक-दो साल में लौट आएगा। सेवा का स्वप्न लिए कोटनिस 2 सितंबर, 1938 को भारत से चीन के लिए जहाज से रवाना हुए। उनके साथ अन्य चार डॉक्टर भी थे- एम अटल, एम चोलकर, डी मुखर्जी और बी के बासु। डॉक्टरों में सबसे युवा 28 वर्ष के कोटनिस ही थे। चीन पहुंचने पर दिग्गज नेताओं, माओ और एन लाई ने भी बहुत सम्मान से इस्तकबाल किया। कोटनिस वहां सेवा में ठीक वैसे ही डूब गए, जैसे हवाई में डेमियन डूबे थे। वह चीनी जवानों की ऐसी ममता के साथ सेवा करते थे कि चीनी उन्हें लाड़ में ‘ब्लैक मदर’ कहते थे।
चीन की मुक्ति और नए वाम राष्ट्र के निर्माण के लिए भयानक लड़ाई चल रही थी। किसी दिन तो 800 के करीब घायल इलाज के लिए आ जाते थे। दो-दो, तीन-तीन दिन तक जगते हुए लगातार ऑपरेशन करने पड़ते थे। असह्य दबाव पड़ा, पर सेवा जारी रही। मिरगी के दौरे पड़ने लगे और 9 दिसंबर, 1942 को कोटनिस दुनिया से चले गए। महज 32 के थे। साथ आए डॉक्टर एक-एक कर स्वदेश लौटे, लेकिन कोटनिस न लौट सके, जैसे डेमियन भी नहीं लौट सके थे।
अपने पीछे चीनी पत्नी और पुत्र यिनहुआ (अर्थात भारत-चाइना) के साथ ही वह सेवा की ऐसी विरासत छोड़ गए कि चीन चाहकर भी उन्हें अर्थात अपने के दिहुआ को नहीं भुला सकता। डॉक्टर कोटनिस को विदा करते हुए चीन के पितामह माओ ने कहा था, ‘सेना ने एक मददगार हाथ खो दिया है; राष्ट्र ने एक दोस्त खो दिया है। आइए, हम हमेशा उनकी अंतरराष्ट्रीय भावना को ध्यान में रखें’।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय द्वारकानाथ शांताराम कोटनिस विश्व प्रसिद्ध चिकित्सक
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारत में कोरोना संक्रमण के खिलाफ एक दवा को दी गई मंजूरी किसी खुशखबरी से कम नहीं है। हल्के और मध्यम प्रकार के कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए इस एंटीवायरल दवा ‘फेविपिराविर’ को ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने अपनी इजाजत दे दी है। न केवल भारत में दवा आधिकारिक रूप से बनेगी, बल्कि यहां दवा बेचने की भी इजाजत मिल गई है। यह दवा जापान में फ्लू के खिलाफ प्रयोग में रही है और कोविड-19 के इलाज में भी इससे काम में लिया जा रहा है। भारतीय कंपनी भी इसके जेनेरिक संस्करण का निर्माण करती है और कोरोना के दिनों में भी कुछ देशों में इसकी आपूर्ति कर रही है। अब यह दवा भारत में भी कोरोना के खिलाफ काम आएगी, लेकिन इसे केवल डॉक्टर की आधिकारिक सलाह या देखरेख में ही लेने की मंजूरी दी गई है। दवा बनाने वाली कंपनी को अपने परीक्षण में बहुत उत्साहजनक नतीजे मिले हैं और अब इस दवा के सामूहिक प्रयोग से इसकी असली ताकत का बेहतर अंदाजा हो सकेगा। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह दवा ‘गेम चेंजर’ हो सकती है। यह दवा कोरोना के प्रारंभिक चरण में कारगर हो सकती है और कोरोना मामलों को गंभीर अवस्था में जाने से बचा सकती है। आगामी दो महीने में इस दवा के कारगर होने के संबंध में पुख्ता आंकड़े उपलब्ध हो जाएंगे। चूंकि यह दवा बहुत सस्ती है, इसका प्रयोग आसान है, इसलिए भी इसका कारगर होना भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश और पूरी दुनिया के लिए बड़ी बात होगी।
जब भारत में कोरोना संक्रमण के कुल मामले 4.12 लाख से ज्यादा हो गए हैं, जब 13 हजार से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, तब ऐसी किसी उम्मीद बंधाती दवा को मंजूरी देना और भी जरूरी हो गया था। भारत की बात करें, तो अभी 1.70 लाख से ज्यादा सक्रिय मामले हैं, जिनमें से गंभीर मामले पांच प्रतिशत के करीब पहुंच गए हैं। 95 प्रतिशत से ज्यादा मामले हल्के या मध्यम प्रकार के हैं और इनमें भी जिन मामलों में लक्षण स्पष्ट हैं, वहां यह दवा यदि रामबाण सिद्ध हो जाए, तो यह भारत के लिए बड़ी सफलता होगी।
खास बात यह है कि यह दवा एंटीवायरल है और इन दिनों दुनिया के वैज्ञानिक कोरोना की सीधी दवा या वैक्सीन की बजाय एंटीवायरल दवा बनाने में जुटने लगे हैं। कोरोना से लड़ने में ऐसी और भी दवाओं की जरूरत पड़ेगी। संभव है, विभिन्न चरणों और विभिन्न लक्षणों के लिए अलग-अलग एंटीवायरल दवाएं बनें। लेकिन यह तो मानना ही होगा कि यह कोरोना की सोलह आना पुख्ता दवा नहीं है, अभी भी फिजिकल डिस्टेंसिंग ही सबसे मुकम्मल उपाय है। भारत में लॉकडाउन खुलने के बाद संक्रमण में आई तेजी यह साफ कर देती है कि लोगों ने शारीरिक दूरी बनाए रखने में कोताही बरती है। लोगों को और मुस्तैदी से बताना होगा कि आज कोरोना से बचने के लिए भीड़ से बचना और अनजान लोगों से शारीरिक दूरी बनाना स्वस्थ रहने की बुनियादी शर्त है। ऐसे शोध सामने आ चुके हैं कि मास्क न पहनने पर संक्रमित होने का खतरा 70 प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ जाता है और मास्क पहनने पर खतरा 40 प्रतिशत घट जाता है। जिन देशों ने मास्क का यथोचित प्रयोग किया है, वहां संक्रमण काबू में आ रहा है। बेशक, पुख्ता दवा के मिलने तक कोरोना के खिलाफ जारी युद्ध में मास्क ही असली कवच है।
मेल बॉक्स / शौर्यपथ / भारत की सख्त आपत्ति के बावजूद नेपाल ने अपने नए नक्शे पर राष्ट्रपति की मंजूरी ले ली। अब यह नेपाल के संविधान का दस्तावेजी हिस्सा बन गया है। इससे भारत के तीन बड़े हिस्से कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा नेपाल के मानचित्र में जुड़ गए हैं। सवाल यह है कि नेपाल जैसा पड़ोसी देश आखिर क्यों भारत के लिए चुनौतियां खड़ी कर रहा है? रणनीतिकारों की मानें, तो अब नेपाल से भी हमारा सीमा-विवाद शुरू हो गया है। इसका अर्थ है कि वह भी पाकिस्तान और चीन की तरह हमारे लिए खतरा बन सकता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि नेपाल ने चीन के उकसावे में यह सब किया है, लेकिन भारत को नेपाल के इस दुस्साहस का गंभीरता से जवाब देना चाहिए। अगर आज कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया, तो बाद में उन हिस्सों पर हम अपना दावा कमजोर कर लेंगे। हमारी सरकार को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा। देश हर कदम पर उसके साथ खड़ा है।
मोहम्मद आसिफ
जामिया नगर, दिल्ली
लंबी लड़ाई की तैयारी
इस सदी की सबसे भयावह बीमारी कोविड-19 ने भारत ही नहीं, पूरे विश्व को अव्यवस्थित कर दिया है। विश्व की बड़ी से बड़ी आर्थिक ताकतें भी इसके सामने घुटने टेक चुकी हैं। अनिश्चितता के इस माहौल में जब सभी के मन में खौफ है और भविष्य के प्रति चिंता, तो हमें छोटी-छोटी खुशियों में ही जिंदगी को समेटना चाहिए। जिंदगी क्या है और कैसी है, यह इसी पर निर्भर करता है कि हम इसे जीते कैसे हैं? इसीलिए इस सदी का यह अनुभव जरूर त्रासद है, लेकिन ऐतिहासिक और मूल्यवान भी है। सरकारों द्वारा आधिकारिक और प्रशासनिक स्तर पर सामान्य जीवन में संतुलन बनाने के साथ-साथ देश और समाज को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं, वे न केवल सबक हैं, बल्कि आने वाले कल के लिए संजीवनी बूटी का काम करेंगे। साफ है कि हम एक मैराथन में दौड़ रहे हैं। हमें आने वाले दिनों, महीनों और संभवत: सालों के लिए भी तैयार रहना होगा।
सत्या नारायण पोद्दार
गंभीर विमर्श जरूरी
मशहूर अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का विचलित कर देने वाला आत्मघाती कदम सुर्खियों में है। निस्संदेह असफलताओं के चौराहे पर खड़े इंसान के लिए मौत का रास्ता आसान लगता है। मगर सफलता-असफलता छोटी हो या बड़ी, उसे आत्महत्या की वजह मान लेना सही नहीं। आत्महत्या पर होने वाली सार्वजनिक बहसों से अलग हमें उन कारणों को टटोलना होगा कि आत्महत्या जैसे कठोर कदम से लोग बच सकें। आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 15 प्रतिशत लोग हर वर्ष आत्महत्या करते हैं, जिसमें सभी लिंग, उम्र व आय के लोग शामिल हैं। निस्संदेह, मनोवैज्ञानिकों को ऐसे लोगों के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी उठानी होगी। देश में एक ऐसा माहौल तैयार किया जाना चाहिए कि लोग अपनी छोटी-बड़ी, सभी समस्याओं पर बेझिझक विमर्श कर सकें।
एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड
बढ़ता रुतबा
192 देशों में से 184 का समर्थन पाकर भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का फिर से अस्थाई सदस्य बन गया है। यह उपलब्धि भारत को यूं ही नहीं मिली है। जिस तरीके से हमने पूरे विश्व को अपना मानकर सभी के साथ भाईचारे की मिसाल पेश की है, उसी के कारण हमारा इतना रुतबा बढ़ा है। भारत हमेशा से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ में भरोसा रखता है और सभी देशों को एक परिवार मानता है। इसीलिए कोरोना-संक्रमण काल में भी हमने सभी जरूरतमंद देशों को दवा भेजी। इन्हीं सब कारणों से आज हम इस हैसियत में हैं कि सभी देश हमारी ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। यह हमारे लिए सुखद स्थिति है।
नीरज कुमार पाठक, नोएडा
राजनांदगांव / शौर्यपथ / डोंगरगढ़ विधायक भुनेश्वर बघेल ने अपने विधानसभा क्षेत्र ग्राम घुमका में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सांसद राहुल गांधी के जन्म दिवस के अवसर पर विधायक बघेल ग्राम पंचायत घुमका के गौठान मे वृक्षारोपण किये और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र घुमका में मरीजों को फल और बिस्किट वितरण किये
विशेष कर बघेल ने कोरोना संक्रमण के समय सबसे पहले इस संक्रमण से लड़ाई लड़ने वाले हमारे सभी स्वास्थ्य कर्मियों का फुल और कुछ उपहारों से सभी स्टाफ कर्मियों का स्वागत एवं सम्मान किया। इस कार्यक्रम में घुमका सरपंच श्रीमती फुलमती वर्मा ने अपने उद्बोधन में स्वास्थ्य केंद्र के सभी कर्मियों का पुलिस प्रशासन का ग्राम घुमका के सभी नागरिकों के तरफ से इनके साहस भरे कार्य के लिए उनको धन्यवाद कर उनका हौसला बढ़ाया।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष दुर्गेश द्विवेदी, ग्राम पंचायत घुमका सरपंच फुलमती वर्मा, कमल कुमार दुबे, जय कुमार वर्मा, जयनारायण साहू, चंद्रेश वर्मा, रतन यदु, महेश वर्मा, प्रहलाद यादव, सौरभ वैष्णव, नवनीत सिंह, दिनेश पुरानिक, कपिल वर्मा, राज वर्मा, विक्की ठाकुर, डेरहा राम वर्मा, टुम लाल वर्मा, कमल बंजारे सभी क्षेत्रीय कांग्रेस कार्यकर्ता और घुमका पंचायत के उप सरपंच, पंचगण, सचिव उपस्थित रहे।
राजनांदगांव / शौर्यपथ / मोहारा जल संयंत्रगृह में अमृत मिशन योजनांतर्गत निर्मित नये 17 एमएलडी परिशोधन गृह का महापौर श्रीमती हेमा सुदेश देशमुख द्वारा निरीक्षण किया गया। निरीक्षण की कड़ी में उनके द्वारा नवागांव में निर्मित 19.5 लाख लीटर की पानी टंकी एवं संजारी बालोद में निर्मित सम्पवेल का भी निरीक्षण कर कार्य की प्रगति के संबंध में जानकारी ली गयी।
मोहारा जल संयंत्र गृह में निर्मित 17 एमएलडी परिशोधन गृह के निरीक्षण के दौरान महापौर ने कहा कि परिशोधन के शेष कार्य को अतिशीघ्र पूर्ण करें, उनके द्वारा ट्रंासफार्मर लगने एवं टेस्टिंग के संबंध में जानकारी ली गयी। साथ ही नवागांव में निर्मित पानी टंकी के चल रहे टेस्टिंग को अतिशीघ्र पूर्ण करने के निर्देश दिये, और कहा कि पाईप लाईन का भी टेस्टिंग किया जाये ताकि उक्त क्षेत्र के लोगों को शुद्ध पेयजल मिल सके।
निरीक्षण की कडी में महापौर श्रीमती देशमुख द्वारा खरखरा से मोहरा एनीकट तक रॉ वाटर प्राप्त करने हेतु 1321 एमएम एवं 900 एमएम व्यास के पाईप लाईन का कार्य पूर्ण किया जाने का निरीक्षण किया गया एवं संजारी गांव में जहॉ जीरो पॉईट है वहां निर्मित सम्पवेल का निरीक्षण किया गया और एवं हैड रेगुलेटर व क्रास रेगुलेटर निर्माण कार्य में हो रहे विलंब के लिये जल संसाधन विभाग के अधिकारियों को शीघ्र से शीघ्र पूर्ण कराने हेतु आवश्यक कार्यवाही करने निर्देशित किये, ताकि शहरवासियों तक शीघ्र से शीघ्र शुद्ध पेयजल पहुॅचाया जा सके। उन्होंने कहा कि जल परिशोधन गृह सहित नवागांव एवं कंचन बाग के पानी टंकी के टेस्टिंग का कार्य अतिशीघ्र पूर्ण किया जाये, ताकि उक्त श्रमिक बाहुल्य क्षेत्रवासियों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने इसका लोकार्पण कराया जा सके, जिससे उक्त वार्डो में टेंकर सप्लाई से निजात मिल सके।
निरीक्षण के दौरान जल विभाग के प्रभारी सदस्य सतीश मसीह, मोहारा वार्ड पार्षद श्रीमती सरिता अवधेश प्रजापति, कार्यपालन अभियंता दीपक जोशी, सहायक अभियंता अतुल चोपडा एवं पीडीएमसी के धृगराज कुमार एवं ठेकेदार के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
दुर्ग / शौर्यपथ / शहर में वर्षों से नजूल भूमि पर अपना आशियाना बनाए बैठे गरीब व मजदूर वर्ग के 950 से अधिक स्लम बस्ती वासियों को शासन की योजना के अंतर्गत कलेक्टर दर से डेढ़ गुना कीमत पर रजिस्ट्री करवा के मालिकाना हक प्राप्त करने का नोटिस जारी किया गया जिसे समझ पाने के आभाव में बस्तियों में भय का माहौल बन गया। अपना आशियाना बचाने सैकड़ों लोगों ने विधायक अरुण वोरा से गुहार लगाई जिसके बाद उन्होंने राजस्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल से राजधानी पहुंचकर मामले का निराकरण करवाया। उन्होंने बताया कि शासन ने जनता को राहत देने के उद्देश्य से योजना बनाई है जिसकी सूचना देने हेतु नोटिस दिया गया है ताकि अपने सामथ्र्य के अनुसार लोग काबिज भूमि की रजिस्ट्री करवा सकें व बेदखली के खतरे से हमेशा के लिए निजात पा सकें।
विधायक वोरा ने कहा कि मुख्यमंत्री भपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार उजाडऩे में नहीं बसाने में विश्वास रखती है किसी का भी आशियाना उजाड़ कर उसे बेघर नहीं किया जाएगा शासन की योजना लोगों के लिए अनिवार्य नहीं है अपितु इच्छुक परिवार इसका लाभ प्राप्त कर सकते हैं। मामले का पटाक्षेप होने के पश्चात लोगों ने राहत की सांस ली।
दुर्ग / शौर्यपथ / राहुल गाँधी जी के जन्मदिन उत्सव न कर के प्रत्येक जिले में रक्तदान शिविर का आयोजन भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन छःग के प्रदेश NSUI अध्यक्ष आकाश शर्मा के निर्देशानुसार आज रक्तदान के कार्यक्रम का आयोजन कर रक्तदान किए कोरोना के इस संकट काल में रक्त की अतिआवश्यकता हैं। ज्यादातर ब्लड बैंक रक्त के अभाव के कारण आवश्यक आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में दुर्ग जिला NSUI द्वारा जिला,विधानसभा पदाधिकारियों के संयुक्त नेतृत्व में चंदूलाल चंद्राकर हॉस्पिटल नेहरू नगर में 10 यूनिट ब्लड डोनेट किया गया NSUI कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस नेता गांधी के जन्मदिन के अवसर पर रक्तदान करके कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के पचासवें जन्मदिन के रक्तदान किया राहुल गांधी जी पार्टी के भीतर सबसे लोकप्रिय युवा नेता हैं और एनएसयूआई का सबसे अधिक जुड़ाव राहुल गांधी जी के साथ है, समय-समय पर राहुल जी युवा कार्यकर्ताओं को पार्टी के भीतर कई बड़े अवसर देते रहते हैं, जिसका उदाहरण छत्तीसगढ़ में भी है।
सोनू साहू ने कहा कि हमारा साथ हमारे नेता राहुल गांधी के साथ हैं वो एन एस यु आई से बहुत प्यार करते हैं और उनके कारण ही आज आम युवा भी पार्टी के भीतर बड़े बड़े पदों पर है जिसका उदाहरण भिलाई के युवा महापौर/विधायक देवेंद्र यादव जी है जो एनएसयूआई से छात्र राजनीति से दुर्ग जिला अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय सचिव जैसे विभिन्न पदों में रहकर वर्तमान समय मे आज विधायक,महापौर हैं आज हम उनके जन्मदिन पर रक्तदान करके उनकी ओर अपने कदम बढ़ा रहे हैं। प्रेम और निष्ठा को जाहिर कर रहे हैं हम सभी अंतिम सांस तक उनके साथ रहेंगे। राहुल गांधी जी जन्मदिन पर रक्तदान शिविर लगाने का मुख्य उद्देश्य देश में किसी की भी जान रक्त के अभाव में न जाएं इस अवसर पर प्रमुख रूप से दुर्ग जिला कार्यकारिणी अध्यक्ष गुरलीन सिंग,सोनू साहू, आकश यादव,शुभम झा,संदीप साव ,पलाश,गुरमुख,,प्रणय,अजय,अमन दुबे,हरीश देवांगन,सूर्या,गोल्डी कोसरे प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
कांग्रेस के सवाल: छत्तीसगढ़ के साथ अन्याय
छत्तीसगढ़ के भाजपा के 9 लोकसभा सदस्य इस पर खामोश क्यों है?
छत्तीसगढ़ के गरीब मजदूर किसानों से नहीं है भाजपा सांसदों को कोई सरोकार
रायपुर / शौर्यपथ / प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा है कि अगर ऐसा नहीं होता तो विधानसभा चुनाव वाले प्रदेश बिहार और 20 से अधिक विधानसभा उपचुनाव वाले प्रदेश मध्यप्रदेश को शामिल कर छत्तीसगढ़ को नहीं छोड़ा जाता। 3 लाख से अधिक छत्तीसगढ़ के मजदूर कमाने वाले बाहर के प्रदेशों में गये थे। छत्तीसगढ़ के तीन लाख मजदूरों में से 60 दिन के मोदी करोना लाकडाउन में भूखे प्यासे रहकर वापस लौटे है। सैकड़ों मजदूर करोना संक्रमण का शिकार हुये। 60 दिन लाकडाउन में छत्तीसगढ़ के इन मजदूरों को हाटस्पाट जोन तक में भूखे-प्यासे रहने के लिये संक्रमण का शिकार तक होने को मजबूर हुये। दरअसल मोदी जी भाजपा और भाजपा के लोकसभा सदस्यों को छत्तीसगढ़ की गरीबों की मजदूर किसानों की परवाह ही नहीं है।
मनरेगा में काम देने में अव्वल नंबर पर है छत्तीसगढ़ सरकार...
मोदी सरकार ने छत्तीसगढ़ के प्रवासी मजदूरों को योजना का लाभ देना क्यों जरूरी नहीं समझा? 2500 रू. प्रतिक्विंटल धान खरीदी, कोरोना से लड़ने 30,000 करोड़ का पैकेज छत्तीसगढ़ हित के हर मामले में गरीब हित मजदूर हित किसान हित के हर मामले में भाजपा के सांसद और भाजपा छत्तीसगढ़ के खिलाफ क्यों खड़ी रहती है। मजदूर कल्याण योजना की कथित घोषणा और इसमें छत्तीसगढ़ को छोटे जाने से यही बात फिर से स्पष्ट हो गयी है। मोदी सरकार ने देश के मजदूर को मजबूर समझने की बड़ी भूल की है। दरअसल समाज के गरीब मजदूर किसान मध्यमवर्ग छोटे व्यापारियों और छोटे उद्योग धंधा करने वालों को मोदी सरकार हेय दृष्टि से देखती है। जबकि यही वर्ग देश की अर्थव्यवस्था और देश का संचालन करते हैं। मोदी सरकार ने यह जिम्मेदारी भी नहीं निभाई।
कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष ने कहा है कि सिर्फ 4 घंटे के नोटिस पर मोदी सरकार ने पूरे देश का लाक डाउन कर दिया। रेल, बस सब यातायात के साधन बंद कर दिये। लाखों मजदूर भाई और बहन सैकड़ों हजारों किलोमीटर का सफर तय कर थके हारे भूखे प्यासे बगैर राशन बगैर दवाई बच्चों को गोद में उठाए और थोड़ी बहुत जमा पूंजी सामान और लॉक डाउन के कारण हुआ कर्ज भी पीठ पर लादकर पांव में छाले लेकर जब अपने घर गांव वापस जा रहे हैं तो उनको घर पहुंचाने की जवाबदारी देश की सरकार की थी। 12 मई को मोदी जी ने बहुत बड़ी घोषणा की थी कि करोना से लड़ने 20 लाख करोड़ का पैकेज दिया जाएगा। पूरे देश को उम्मीद और आशा बंधी थी कि शायद अब मोदी जी को गरीबों का, लाचारों का दुख और दर्द समझ में आ गया है। शायद अब मोदी जी को समझ में आ गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। वो इससे निपटने ठोस कदम उठाने जा रहे हैं और। लेकिन जो पांच धारावाहिक वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने देश को दिखाए, उसके बाद ये बात साफ है कि मोदी सरकार गरीब का, कमजोर का और यहाँ तक कि मध्यम वर्ग का भी दर्द नहीं समझ रही है। करोना की भयावह मानवीय त्रासदी का विकराल रूप मोदी सरकार की गलत नीति विफल प्रबंधन और गलत नीयत के कारण सामने आया।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
