August 07, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

            मनोरंजन / शौर्यपथ / इस वक्त पूरा देश कोरोना वायरस से परेशान है। अदनान सामी इस वक्त अपनी बेटी को लेकर चिंता में हैं। अदनान ने कहा, 'हमें इस वक्त अपने बच्चों को पूरा ध्यान रखना चाहिए। हमें उनका मेंटली और फिजिकली पूरा ध्यान रखना चाहिए।'

    अदनान ने कहा, 'हम बच्चों के बारे में ज्यादा बात नही करते हैं। बच्चे ऑनलाइन वीडियोज देखते हैं जिसमें बच्चे बाहर खेल रहे होते हैं तो वो सोचते हैं कि हम बाहर क्यों नहीं बाहर जा सकते। इस उम्र में उनके अंदर बहुत एनर्जी होती है जो उन्हें बाहर निकालनी होती है।'

    अदनान ने आगे कहा, 'ये जो वक्त चल रहा है वो गुजर जाएगा। लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चों की जिंदगी में कड़वी यादें रहे। हम इसलिए इस वक्त अपनी बेटी को पूरा समय दे रहे हैं। उसका पूरा ध्यान रख रहे हैं।'

    अदनान ने बताया कि बेटी का ध्यान रखने के अलावा वह अपने म्यूजिक पर भी फोकस कर रहे हैं। इन दिनों वह गाने कम्पोज कर रहे हैं और लिरिक्स लिख रहे हैं।हालांकि लॉकडाउन के शुरुआत में वह काफी परेशान हुए थे। उन्होंने कहा, 'मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करना है। इसके बाद धीरे-धीरे मैंने इस सिचुएशन को हैंडल किया।'

     

    जब अदनान से पूछा गया क्या भारत में सुरक्षित महसूस करते हो...

    कुछ दिनों पहले एक इवेंट में अदनान से पूछा गया कि आमिर खान कहते हैं कि वह भारत में सुरक्षित महसूस नहीं करते, क्या आप करते हैं और सीएए को लेकर आपकी क्या राय है? तो इस पर अदनान ने कहा, 'मुस्लिम होने के नाते मैं भारत में सुरक्षित महसूस करता हूं।'

     

           मनोरंजन / शौर्यपथ / संजय दत्त लॉकडाउन की वजह से अपने परिवार से दूर हैं। संजय की पत्नी मान्यता दत्त अपने दोनों बच्चों के साथ दुबई में फंसी हैं और संजय मुंबई में अकेले रह रहे हैं। संजय से दूर होने पर मान्यता ने कहा, लॉकडाउन में अगर हम साथ होते तो चीजें ज्यादा आसान होती।

    संजय से दूर होने पर मान्यता ने कहा, 'मैं चाहती थी कि काश मेरा पूरा परिवार लॉकडाउन में साथ होता। हम 2 अलग-अलग देशों में ना होते तो चीजें ज्यादा आसान होती हमारे लिए। संजू अपने बच्चों के साथ बहुत ही शानदार समय बिता पाते।'

    मान्यता ने आगे कहा, 'मुझे इस बात का दुख है कि मैं घर नहीं हूं। ये एकदम अचानक हुआ। मुझे थोड़ा बुरा लग रहा है, लेकिन क्या करें हम कुछ नहीं कर सकते।'

     

    संजय ने कुछ दिनों पहले आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के साथ बात की। संजय ने उनसे बात करते हुए बताया कि जब वह जेल में थे तब भगवान शिव की पूजा करते थे। संजय ने कहा था, 'मुझे लगता था कि शायद कोई चमत्कार हो जाएगा, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। मैं तभी जेल से बाहर आया जब मुझे आना था।'


    इसके बाद संजय ने रविशंकर से सवाल किया था कि ऐसे में प्रार्थना का क्या महत्व है?

    रविशंकर ने संजय को जवाब देते हुए कहा था कि प्रार्थना और प्रयत्न दोनों अलग चीज हैं। दोनों का साथ में चलना जरूरी है। उन्होंने कहा था, 'प्रार्थना लोग तब करते हैं जब उन्हें लगता है कि उनके पास कोई रास्ता नहीं है। अगर प्रार्थना और प्रयत्न दोनों साथ चले तो हमें उसका फल जरूर मिलता है।'

    संजय ने यह भी बताया कि वह अपने माता-पिता को बहुत याद करते हैं। संजय ने रविशंकर को बताया कि हाल ही में उनकी मां नरगिस दत्त की 39वीं डेथ एनिवर्सरी थी और वह अपनी मां को बहुत याद करते हैं।

     

               जीना इस्सी का नाम है / शौर्यपथ / वह काफी सेहतमंद पैदा हुई थीं, और इस बात को लेकर घर में सब काफी खुश थे। खुश होने की बात ही थी। मीठी मुस्कान लिए नन्ही बच्ची घर में इधर-उधर ठुमकती, तो कोई भी उसे गोद में उठाकर दुलारने का लोभ नहीं छोड़ पाता था। मगर अम्मा-अप्पा को तब क्या पता था कि उनकी लाडली का वजन उसके बचपन को तकलीफदेह ख्यालों से भर देगा।
    दीपा जब स्कूल पहुंचीं, तो वहां उन्हें एक बिल्कुल अलग दुनिया मिली। इस नए संसार में खूब सारे बच्चे थे, कई मैडम और खेलने की काफी सारी जगहें थीं। तमाम बच्चों की तरह दीपा को भी हमउम्र दोस्तों के बीच खेलना-कूदना खूब रास आता। मगर एक दिन कुछ ऐसा घटा, जिससे उनके कोमल मन को कुछ अच्छा नहीं लगा और वह सुबक पड़ीं। किसी ने उन्हें ‘बेबी एलिफैंट’ कहा था। फिर तो यह जैसे उन्हें चिढ़ाने का मुहावरा-सा बन गया।
    दीपा के भीतर एक ग्रंथि बनने लगी थी। सहपाठियों के अलावा भी कई लोग थे, जो मौका पाकर उनके मोटापे पर अपना निशाना साध बैठते और इन सबका असर दीपा की पढ़ाई पर पड़ने लगा था। वह अब ज्यादातर खामोश रहने लगी थीं। अक्सर दोस्तों से कतराकर जल्द घर पहुंचने के रास्ते तलाशती रहतीं। वह क्लास में फेल हो गईं। दीपा के लिए स्कूल का माहौल अब और तकलीफदेह हो उठा था। लेकिन एक टीचर ने उनकी मनोदशा को पढ़ लिया।
    तब दीपा कक्षा आठ में थीं। टीचर जानती थीं कि यदि इस बच्ची को निराशा के गड्ढे से अभी न निकाला गया, तो यह गहरी खाई में गिर सकती है। उन्होंने दीपा का हौसला बढ़ाना शुरू किया। यह एक टीचर का फर्ज था, मगर दीपा की जिंदगी में किसी फरिश्ते की आमद थी। टीचर ने उन्हें उनके गुणों का एहसास कराना शुरू किया और हताशा की ओर मुडे़ कदम जिंदगी की जानिब लौट लाए। बल्कि कुछ यूं लौटे कि दीपा पुरानी दीपा न रहीं। और स्कूली जिंदगी में ही एक मोड़ वह भी आया, जब दोस्तों से कन्नी काटकर घर भागने वाली इस लड़की ने उनकी नुमाइंदगी करने का दावा पेश कर दिया। दीपा ने स्कूली चुनाव लड़ा और उसमें जीत भी हासिल की। उसके बाद तो जैसे उनका कायांतरण ही हो गया। खुद उनके शब्द हैं, ‘उस जीत ने मुझे जिम्मेदार बना दिया, और मैं आत्मविश्वास से भरी एक लड़की के रूप में खिलने के लिए अपने खोल से बाहर आ गई।’
    चेन्नई के ‘प्रिंस मैट्रिकुलेशन हायर सेकेंडरी स्कूल’से निकलकर दीपा शहर के ही ‘एथिराज कॉलेज फॉर वीमेन’ पहुंच गईं, जहां से उन्होंने ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। और इसके बाद एमबीए। आरपीजी रिटेल ग्रुप में प्रशिक्षण के दौरान दीपा और अरविंद ने विवाह करने का फैसला किया था। लेकिन न तो दीपा का परिवार इस शादी के पक्ष में था, और न ही अरविंद का। इसके बावजूद दोनों विवाह-बंधन में बंध गए। शादी के नौवें महीने ही दीपा एक बेटे की मां बन गईं और उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। अब सारा आर्थिक बोझ अरविंद के कंधे पर आ गया। दीपा को काफी बुरा लगता था कि वह पति की कोई मदद नहीं कर पा रही हैं। उसी समय उनके पुराने बॉस का फोन आया कि दीपा उनके बेटे की बर्थडे पार्टी का आयोजन देख लें।
    यह 2002 के आसपास की बात है। दीपा ने ‘गो ग्रीन’नाम से थीम पार्टी का आयोजन किया, और रिटर्न गिफ्ट में सबको पौधे दिए गए। इस पार्टी में शरीक होने वाले लोगों को आइडिया काफी पसंद आया, और फिर दीपा का बिजनेस चल पड़ा। उसके बाद वह बच्चों के लिए समर कैंप का आयोजन करने लगीं। ‘लीडरशिप फॉर किड्स’कार्यक्रम के जरिए वह बच्चों को अपना जीवन बदलने के लिए प्रेरित करती थीं। उनका यह काम भी अच्छा चल निकला।
    लेकिन जिंदगी इंसान का इम्तिहान लेना कब छोड़ती है? कारोबार में साझेदार की नीयत बदल गई और दीपा का सब कुछ लुट गया। कर्ज चुकाने के लिए उन्हें अपना घर, कार, सब कुछ बेचना पड़ा। यहां तक कि बेटे को उसके स्कूल से निकालना पड़ा, क्योंकि वह उसकी फीस नहीं चुका सकती थीं। लगभग उसी वक्त वह एक बेटी की भी मां बन गई थीं।
    किसी तरह जीना था। मगर कैसे? दीपा ने बसंत नगर समुद्र तट पर बच्चों को बैलून बेचना शुरू किया। ‘बीच’ पर आने वाले बच्चों से पैसे लेकर वह उन्हें कहानियां सुनातीं और फिर बैलून बेचतीं। बच्चे उनकी कहानियों के मुरीद होकर खूब आने लगे। इस आइडिया पर स्थानीय मीडिया की नजर पड़ी, उन्होंने दीपा को खूब छापा। अखबार में पढ़कर मदुरई के एक स्कूल ने उन्हें अपने यहां दास्तानगोई के लिए बुलाया। उसी समय दीपा ने ‘स्कूल ऑफ सक्सेस’ की नींव रखी। आज उनका समूह 2,500 से ज्यादा स्कूलों में छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए कहानी सुनाने से लेकर प्रशिक्षण देने तक का कार्यक्रम आयोजित करता है। दीपा स्कूलों से कोई निश्चित फीस नहीं लेतीं, बल्कि उन्हें ही यह अख्तियार सौंप देती हैं। अब तक तीन लाख से अधिक बच्चे-बच्चियां स्कूल ऑफ सक्सेस से लाभ उठा चुके हैं।
    प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह

     

              मेरी कहानी / शौर्यपथ / विदेश जाने की खुशी ऐसी थी कि पंख लग गए थे। मन सुने-सुनाए लंदन में पहुंचकर टहलने लगा था और तन को वहां पहुंचाने के लिए जल-जहाज का टिकट भी खरीद लिया गया था। बडे़ भाई साहब लंदन में ही रहते थे, तो उन्होंने छोटे को बुला भेजा कि आ जाओ, यहीं से इंजीनिर्यंरग पढ़ लो, जिंदगी संवर जाएगी। पिता भी फूले नहीं समा रहे थे। बड़ा बेटा पहले ही विलायत जा जमा था और अब दूसरा भी उसी नक्शेकदम पर चले, तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है? पिता ने अंग्रेज शिक्षकों के स्कूल में बेटे को पढ़ाया भी यही सोचकर कि बेटा पठानों के इलाकाई खून-खराबे से अलग रहकर दुनिया के लायक बनेगा। एक तरह से पिता का सोचा हुआ ही साकार हो रहा था।
    बेटे को इस बात की भी खुशी थी कि एक ठंडे देश में जाकर रहना-पढ़ना होगा। उन दिनों गरमी की छुट्टियां चल रही थीं। उस अलीगढ़ में कॉलेज बंद हो गया था, जहां बहुत गरमी थी। पेशावरी इलाके से अलग माहौल उसे बेचैन कर देता था। यह खुशी थी कि अब मंजिल अलीगढ़ नहीं, इंग्लैंड है। स्कूल में पढ़ाने वाले अंग्रेज शिक्षक रेवेरेंड विगरैम के भी आनंद का ठिकाना न था। आर्थिक रूप से सक्षम पिता बहराम खान कितनी खुशी से बेटे को लंदन भेज रहे थे, इसका पता इसी से चलता है कि जिस जमाने में दस ग्राम सोना 20 रुपये का भी नहीं था, तब पिता ने बेटे को 3,000 रुपये थमा दिए थे। अब न धन की कमी थी और न लंदन पहुंचकर ठौर-कौर की चिंता। देखते-देखते वह दिन भी आ गया, जब लंदन के लिए निकलना था। पूरा बिस्तर-सामान बंध चुका था। चंद मिनटों में घर से रवानगी थी। छह फुट से भी लंबा हो चला नौजवान बेटा लंबे-लंबे डग भरता मां के पास पहुंचा कि चलते-चलते आशीर्वाद ले लिया जाए।
    झुककर अभिवादन करते हुए बेटे ने कहा, ‘मां, अब मैं चलूं’।
    मां कुछ नहीं बोली। बेटे ने हाथ बढ़ाया और मां ने बेटे के हाथ को अपनी हथेलियों से घेर लिया। बेटा मां के पास बैठ गया। मां की हथेलियां बेटे की हथेलियों पर कसती गईं। बेटे की हथेलियां इतनी निर्मोही नहीं थीं कि मां की हथेलियों से खुद को छुड़ा लें। वैसे भी ऐसा नाजुक वक्त जब गुजरता है, तब थामने वाली हथेलियां सीधे दिल थामने लगती हैं। मां ने पूरे दिल से थाम लिया था। बेटे के दिल में भी नमी उमड़ने लगी थी, लेकिन वह बही पहले मां की आंखों से। मां के कांपते होंठों से गुहार फूटी, ‘नहीं, तुम नहीं।...मेरी आखिरी औलाद’।
    फिर तो आंसू रोके न रुके। वह मां अड़ गई, जो बडे़ बेटे को पहले ही विलायत के हाथों गंवा चुकी थी। वह वहीं निकाह कर घर-बार बसा चुका था। परदेश को लोग इतना अपना क्यों मान लेते हैं कि अपना सगा घर-गांव पराया हो जाता है? बड़ा गया, अब छोटा भी चला जाएगा, तो फिर पीछे साथ कौन रह जाएगा? क्या यही इल्म है, जिसे हासिल करने जाने वाले लौटते नहीं हैं? कोई मां क्या इसलिए अपनी औलाद को अपने साये में पोसती है कि वह बच्चा जब सायादार हो जाए, तो किसी परदेश को फल-छांव दे और देश में बूढ़े मां-बाप सिर पर साये को मोहताज हो जाएं? एक पल को बेटे ने सोचा, क्या वह मां के बिना रह सकता है, और वह भी ऐसी मां, जो हथेलियां थामे जार-जार रो रही है? और ऐसी मां को यूं गंवाकर कौन-सी कमाई करने वह परदेश जा रहा है? यह वही मां है, जिसने खूंखार पठानी लड़ाइयों-झंझावातों से बचाकर सीने से लगाए पाला है।
    फिर क्या था, फैसला हो गया। जो मन लंदन जा चुका था, वह मां की गोद में सिमट आया। तय हो गया, कहीं नहीं जाना, यहीं मां की निगहबानी में रहना है। मां की ही सेवा करनी है। अपनी मां, अपनी जमीन, अपना मुल्क, इनका भला क्या विकल्प है? मां ने रोक लिया। 3,000 रुपये पिता को वापस हो गए। भाई को खत चला गया कि अपना देश प्यारा है। फिर अलीगढ़ भी लौटना न हुआ। पढ़ाई छूट गई। वहीं अपने खेतों में पसीना लहलहाने लगा। तब तक जो इल्म हासिल हो चुका था, वह भी कम न था। महज 20 की उम्र में मां के उस दुलारे ने स्कूल खोलकर जननी जन्मभूमि की सेवा शुरू कर दी। पठानों के तमाम इलाकों में एक सेकुलर, सेवाभावी, एकजुट भारत के निर्माण के लिए उन्होंने स्वयंसेवकों का एक संगठन बनाया- खुदाई खिदमतगार। मातृभूमि की इतनी सेवा हुई कि अंग्रेजों को चुभने लगी। गिरफ्तारी के वारंट जारी होने लगे। अंग्रेज खोजने लगे कि कहां हैं वह अब्दुल गफ्फार खान, उर्फ बादशाह खान, उर्फ बच्चा खान? वही, जिन्हें दुनिया आज ‘सरहदी गांधी’ के नाम से जानती है। महात्मा गांधी के परमप्रिय, सत्य-अहिंसा के झंडाबरदार। विभाजन के दुर्भाग्य से पाकिस्तान के हिस्से में चले गए ऐसे पहले स्वजन-विदेशी, जो भारत रत्न हैं।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

     

               शौर्यपथ / भारतीय रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था को बल देने के लिए जो ताजा घोषणाएं की हैं, वे कुछ और कदम भर हैं। कोरोना के लॉकडाउन दौर में यह तीसरी बार है, जब भारतीय केंद्रीय बैंक ने अपनी ओर से सुधार के कदम उठाए हैं। विशेष रूप से दो बड़ी घोषणाएं हैं, जिन पर गौर किया जा सकता है। पहली घोषणा यह कि रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में कमी की गई है, ताकि बाजार में नकदी का प्रवाह बने। नकदी का प्रवाह बनने से न केवल ऋण सस्ते या आसान होंगे, बल्कि इससे अर्थव्यवस्था में भी तेजी आएगी। रेपो रेट घटकर अब चार प्रतिशत पर आ गया है, ताकि बैंकों के पास खर्च या निवेश के लिए ज्यादा नकदी उपलब्ध हो। इसके साथ ही रिजर्व बैंक यह भी चाहता है कि बैंकों के पास ज्यादा धन रहे और वे रिजर्व बैंक के पास ब्याज के लिए धन रखने की बजाय उसे बाजार में लगाएं। अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक की यह मंशा स्वागतयोग्य है।
    दूसरी घोषणा उन लोगों के लिए खुशखबरी है, जो अभी ऋण वापस करने की स्थिति में नहीं हैं। टर्म लोन पर पहले ही तीन महीने की छूट मिली हुई थी और अब इस छूट को तीन महीने और बढ़ाकर एक बड़ी आबादी को राहत देने की कोशिश हुई है। ज्यादातर तरह के ऋण लेने वालों को अब अगस्त महीने तक कोई भी ऋण चुकाने से राहत मिलेगी। यदि किसी ने गृह ऋण, वाहन ऋण, कॉरपोरेट, कारोबारी, क्रेडिट कार्ड ऋण ले रखा है और ईएमआई नहीं चुका पा रहा, तो बैंक अपने आप आपके ऋण को मोरेटोरियम में भेज देंगे। हालांकि बेहतर सलाह यह है कि आप बैंक को स्वयं मोरेटोरियम के लिए आवेदन कर दें, ताकि आपको अगस्त के महीने तक ईएमआई का दबाव न झेलना पडे़। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि लॉकडाउन के कारण ज्यादातर कामकाज बंद हैं, और बड़ी संख्या में लोगों की आय प्रभावित हुई है। मोरेटोरियम से उन्हें यह तो फायदा है कि कर्जदाता बैंक उन्हें अभी परेशान नहीं करेंगे, अलग से कोई पेनाल्टी नहीं लगाएंगे, लेकिन इस अवधि का ब्याज तो बैंक जरूर जोड़ेंगे। अब आशंका यह है कि ऋण चुकाने की अवधि भी बढे़गी और र्ईएमआई भी। ऐसे में, लोग मोरेटोरियम को किसी बड़ी राहत के रूप में नहीं देख रहे हैं। यह तात्कालिक राहत है और इससे दूरगामी परेशानियां बढ़ सकती हैं।
    आज के हालात में लोगों को बैंकों पर बहुत भरोसा नहीं है और बैंक भी लोगों के प्रति यथोचित उदार नहीं हैं। इस अविश्वास के कारण ही ऋण के लेन-देन का बाजार लगातार मंदा चल रहा है। रिजर्व बैंक जो प्रयास कर रहा है, वह आम दिनों के लिए तो ठीक है, लेकिन जिस तरह की आपातकालीन स्थिति से देश गुजर रहा है, उसमें लोगों को रिजर्व बैंक से बड़ी राहत की उम्मीद है। ऋण के बोझ से दबे लोगों के मन में यह सवाल हैै कि सरकार या रिजर्व बैंक ने हमारे लिए क्या किया है? लॉकडाउन के दौर में अर्थव्यवस्था को बल देने की दिशा में रिजर्व बैंक की यह तीसरी घोषणा अच्छी तो है, लेकिन जरूरतमंद लोगों की उम्मीद से कम है। इसीलिए रिजर्व बैंक की घोषणा के बावजूद शुक्रवार को शेयर बाजार गिरकर बंद हुए। यहां तक कि विभिन्न बैंकों के शेयरों ने भी अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। जाहिर है, आने वाले दिनों में सभी को और बेहतर राहत की उम्मीद है।

     

             शौर्यपथ / केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का विश्व स्वास्थ्य संगठन का कार्यकारी बोर्ड का अध्यक्ष चुना जाना भारत के लिए गौरव की बात है। हम उनके पोलियो उन्मूलन अभियान के साक्षी हैं कि किस प्रकार सीमित संसाधनों के साथ हम इस बीमारी पर काबू पाने में सफल रहे। कोविड-19 पर भी हम विजय पाएंगे, ऐसा हमें विश्वास है, क्योंकि स्वास्थ्य मंत्री के एक आह्वान पर देश पर्सनल प्रोटेक्शन किट व मास्क बनाने में मात्र दो माह में आत्मनिर्भर बन चुका है। इन कार्यों में हम इसलिए सफल रहे, क्योंकि प्रभावशाली नेतृत्व और आम जनमानस को आपस में जोड़ा गया। अब पूरे विश्व को हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और हर्षवर्धन के अनुभव का फायदा मिलेगा।
    लोकल के लिए वोकल
    कोरोना संकट के कारण देश में आई आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए हमें लोकल के लिए वोकल होना ही पड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषण में स्थानीय उत्पादों के प्रति देश को प्रोत्साहित किया था। आज देश में तमाम विदेशी कंपनियों का राज है, और यदि हम विदेशी पर निर्भर न होकर स्वदेशी अपनाएंगे, तो यह आत्मनिर्भरता की ओर एक अहम कदम होगा। हम लोकल पर गर्व करेंगे, तो वे देश ही नहीं, बल्कि विदेश में एक ग्लोबल प्रोडक्ट बनकर भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी लाएंगे, हालांकि उनका निर्माण गुणवत्तापूर्ण होना चाहिए। सरकार ने आत्मनिर्भर भारत के तहत दिए गए राहत पैकेज में इसके लिए अहम फैसले लिए हैं।
    अमीर बनाम गरीब
    आजादी के इतने वर्षों के बाद भी जो अब तक नहीं बदला, वह है हमारी हुकूमत का रवैया। वह आम आदमी की खैरख्वाह होने का दम तो भरती है, परंतु जब मजदूरों-किसानों पर कोरोना की वजह से मुसीबत आई, तो सरकार ने उनके अनुसार फैसले लिए, जो अपने घर में सुरक्षित बैठे थे। जब लॉकडाउन के कारण ये गरीब दो जून की रोटी के लिए भी दूसरों पर आश्रित हो गए, तब लोगों ने उन्हें खाना तो दिया, लेकिन उनकी तस्वीर भी दुनिया को दिखाई, मानो वे भिखारी हों। सबने सोचा कि सिर्फ दो वक्त की रोटी ही उनकी जिंदगी है। कब तक सरकार यह नहीं मानेगी कि उनका भी स्वाभिमान है, घर है, बच्चे हैं। आज हजारों मजदूर घर जाने की जद्दोजहद में पैदल ही हजारों किलोमीटर की यात्रा कर रहे हैं, पुलिस की मार खा रहे हैं, लेकिन सरकार को यह सब दिखाई नहीं देता। साफ है, जनता की होने का दावा करने वाली सरकार सिर्फ अमीरों की है। आमजन तो उसके लिए वोट बैंक हैं, जिनकी याद उसे सिर्फ चुनाव में आती है। सरकार तब तक यह सब करती रहेगी, जब तक गरीब खुद नहीं जाग जाएगा।
    अमेरिका की दादागिरी
    अंगे्रजी में एक कहावत है ‘माई वे ऑर द हाईवे’। इसका अर्थ है, तुम मेरी तरफ हो या कहीं के नहीं हो। इस समय अमेरिका और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यही कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन पर दबाव बनाकर उसे कोरोना वायरस के जन्मदाता का नाम उजागर करने संबंधी जांच कराने के लिए बाध्य किया जा रहा है, जबकि इस समय महामारी उफान पर है। अभी सबको मिलकर कोरोना से लड़ना चाहिए, पर कुछ देश आपस में लड़ रहे हैं। ट्रंप डब्ल्यूएचओ को पैसा देने से मना कर रहे हैं और संस्था छोड़ने की भी धमकी दे रहे हैं। पूर्व में भी राष्ट्रपति ट्रंप जलवायु परिवर्तन संबंधी समझौते से बाहर निकल चुके हैं। विज्ञान की खोज शायद उनके लिए मायने नहीं रखती। ऐसे में, अगर अगला चुनाव वह जीतते हैं, तो संयुक्त राष्ट्र को अपना मुख्यालय भी संभवत: न्यूयॉर्क से बाहर ले जाना पड़ेगा।
    जंग बहादुर सिंह

            ओपिनियन / शौर्यपथ / कुरान में जिन दो त्योहारों का जिक्र है, उनमें ईद-उल-फितर एक है। दूसरा त्योहार करीब दो महीने के बाद मनाया जाने वाला ईद-अल-अजहा है। ईद एक महीने के रोजे के बाद मनाई जाने वाली खुशी है। रोजे सिर्फ रमजान के फर्ज हैं। इस एक महीने में अल्लाह के संदेशों को जीवन में उतारने का अभ्यास किया जाता है। इससे हमें गरीबों की भूख का अंदाजा होता है। इसमें ईबादत की रवायत है, जिससे हमें सारे जहां के मालिक के अस्तित्व का एहसास होता है और जीवन को लेकर अनुशासन पैदा होता है। रोजे में ऐसा कोई काम नहीं किया जाता, जो अल्लाह को पसंद न हो। वैसे, अन्य धर्मों में भी रोजे का जिक्र है।
    हालांकि, ईद की खुशी मनाने का यह मतलब नहीं है कि गरीबों को हम भूल जाएं। इस दिन बडे़-बुजुर्गों को याद रखें। अपने पड़ोसियों को घर बुलाएं। जरूरी नहीं है कि वे पड़ोसी अपने मजहब के ही हों। पड़ोसी का अर्थ हर उस व्यक्ति से है, जो रोजेदार के आसपास रहता है। फितरा (दान) इसी की अगली कड़ी है, जो रोजे के लिए ईद की नमाज से पहले दी जाती है। यह वह रकम है, जो संपन्न घरों के लोग आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को देते हैं। मुसलमान जकात के रूप में साल भर की बचत का ढाई फिसदी हिस्सा दान तो करते ही हैं, लेकिन ईद में फितरा का विशेष आग्रह रहता है। इससे उन गरीबों को खासतौर से मदद मिल जाती है, जिनके हालात ऐसे नहीं होते कि वे ईद की खुशियां मना सकें।
    जिस तरह रोजे में अल्लाह की मरजी के मुताबिक काम किया जाता है, वही रवायत ईद में आगे बढ़ाई जाती है। ईद की नमाज पढ़कर अल्लाह का शुक्रिया अदा किया जाता है और उसके बाद सामूहिक तौर पर जश्न मनाया जाता है। मसलन, अच्छा खाना बनाया जाता है और उसमें आसपास के लोगों को शरीक किया जाता है। नए कपड़े पहने जाते हैं, तो जरूरतमंदों में नए कपडे़ बांटने की अपेक्षा की जाती है। अगर आर्थिक बदहाली की वजह से कोई ऐसा नहीं कर पाता है, तो दूसरों से यह उम्मीद की जाती है कि वे नए कपडे़ पहनकर उन घरों के बच्चों के सामने न जाएं, जो पैसों की तंगी की वजह से ईद का जश्न नहीं मना पा रहे हैं। इससे उनके अभिभावकों के भीतर मायूसी और कोफ्त पैदा हो सकती है।
    इस्लाम के साथ खास बात यह है कि इसकी पैदाइश चौदह-पंद्रह सौ साल पहले हुई है। इसका अर्थ है कि यह नया मजहब है। इसलिए इस पर अमल करने की बात जोर देकर की जाती है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि दूसरे धर्म को सम्मान न दिया जाए। इसे इस रूप में समझा जा सकता है कि जब किसी किताब का नया संस्करण आता है, तो हम उसे खरीदना पसंद तो करते हैं, मगर नए संस्करण का आधार किताब का पुराना संस्करण ही होता है। कहा जाता है कि अल्लाह ने एक लाख से अधिक पैगंबर धरती पर भेजे। लिहाजा यह मान्यता भी है कि हिंदू धर्म भी आसमानी धर्म हो सकता है और इसमें भी कोई पैगंबर आए होंगे। लिहाजा मुसलमानों को कहा जाता है कि वे किसी भी मजहब के नेतृत्व को बुरा न कहें। मुमकिन है कि हजारों साल पहले ये भी ईश्वर के दूत के रूप में आए हों, लेकिन उनके मानने वालों ने अपने मकसद के लिए उनकी सोच में अपनी मरजी से बदलाव कर दिए हों। मुसलमानों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सभी मजहब की इज्जत करें, लेकिन अमल अंतिम किताब पर करें। अल्लाह ने इंसान को सोचने की सलाहियत दी है। उसे नहीं भूलना चाहिए कि पैगंबरों के जरिए ईश्वर सिर्फ यही बताना चाहते हैं कि यदि उनके संदेशों पर अमल किया गया, तो इंसान सुख से रहेगा, और यदि इंसान खुश रहेगा, तो समाज और दुनिया में खुशियां फैलेंगी। ऐसे लोगों को जन्नत नसीब होगी।
    आज जब कोरोना के रूप में हम एक अभूतपूर्व संकट से गुजर रहे हैं, तब ईद हमें विशेष सावधानी से मनानी होगी। हमें इस दिन अल्लाह के दूसरे बंदों का भी ख्याल रखना होगा। हमें याद रखना चाहिए कि अभी लाखों लोग ऐसे हैं, जिन्हें दो वक्त का खाना भी नहीं मिल पा रहा है। वे सड़कों पर हैं या राहत शिविरों में हैं, और अपने परिजनों के पास नहीं हैं। हमें उनके लिए, या यूं कहें कि दुनिया के तमाम मजलूमों की बेहतरी के लिए अल्लाह से दुआ मांगनी चाहिए। मजहब का फर्क किए बिना अपनी हैसियत के मुताबिक उनकी मदद करनी चाहिए। इस मर्तबा ईद के दिन नए कपडे़ पहनने से बेहतर यह होगा कि किसी बेबस, मजलूम की मदद की जाए, किसी भूखे को खाना खिलाया जाए। ईद की ईबादत हम जरूर करें, लेकिन फिजूल के खर्चों से बचें।
    ईद यह भी संदेश देती है कि हम सब एक ही आदम और हव्वा की औलादें हैं। यह सोच हम जितनी जल्दी अपने जीवन में उतार लेंगे, उतना ही बेहतर होगा। यकीन मानिए, जिस दिन हमने ऐसा कर लिया, दुनिया के अधिकतर मसले खत्म हो जाएंगे। लिहाजा, इस बार ईदगाह जाने से बचें। अपने-अपने घर में नमाज पढे़। शासन-प्रशासन की मुश्किलें न बढ़ाएं। यह न भूलें कि हिन्दुस्तान हमारा मादरे-वतन है। रही बात ईद के नमाज की, तो दो महीने के बाद यह मौका हमें अल्लाह ताला फिर अता फरमाएगा। इस वक्त अल्लाह हमारा सख्त इम्तिहान ले रहा है। हमें इसमें खरा उतरना है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)

     

        भिलाई / शौर्यपथ / वर्तमान समय में कोविड.19 खतरे को देखते हुए यात्राओं पर प्रतिबंध के साथसाथ सोशल डिस्टेंसिंग के दिशानिर्देशोंका अनुपालन आवश्यक है । आज क्लास रूम प्रशिक्षण का सुचारू संचालन संभव नहीं है, ऐसे परिस्थितियों में सेल स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है ।इस चुनौती को स्वीकार करते हुएए भिलाई इस्पात संयंत्र के मानव संसाधन विकास एचआरडीद्धविभाग द्वारा ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्रों की श्रृंखला प्रारम्भ की गई द्यइन ऑनलाइनप्रशिक्षण कार्यक्रमोँ में सेल के विभिन्न संयंत्रों और इकाइयों के प्रतिभागियों ने बढ़.चढ़ कर हिस्सा लिया।
    आईडी एक्ट.1947के ऑनलाइन सत्र की सर्वत्र प्रशंसा
    आज औद्योगिक संस्थानों सुचारू संचालन के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम.1947 का ज्ञान व जानकारी आवश्यक हो चुका है द्य इस जरुरत को ध्यान में रखते हुएहाल ही मेंऔद्योगिक विवाद अधिनियम.1947परऑनलाइन प्रशिक्षण का आयोजन किया गया द्य सेल वेबेक्स प्लेटफार्म के माध्यम से आयोजित ऑनलाइन सत्र में सेल.बीएसपी के मानव संसाधन विकास विभागकेउप.महाप्रबंधकएश्री अमूल्य प्रियदर्शीद्वारा औद्योगिक विवाद अधिनियम.1947 पर बेहतरीन प्रशिक्षण प्रदान किया गया द्य सेल के प्रबंधन प्रशिक्षण संस्थान ;एमटीआईद्ध द्वारा आयोजित इस सत्र में सेल के विभिन्न संयंत्रों और इकाइयों से 55 प्रतिभागियों ने शिरकत की। सेल.बीएसपी के मानव संसाधन विभाग द्वारा इस तरह का यह पांचवा ऑनलाइन कार्यक्रम था।श्री अमूल्य प्रियदर्शीद्वारा लिए गए इस सत्र की सभी प्रतिभागियों ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
    डिजिटल प्लेटफार्म से सिखाए लीडरशिपके गुर
    इसी क्रम में सातवें ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्र का जिसका शीर्षक था ष्लीडरशिप . एट्रीब्युट्स ऑफ एन इमोशनली इंटेलीजेंट लीडरशिप इस सत्र का आयोजन प्लांट के एचआरडीविभाग द्वाराष्गो.टू मीटिंगष्डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से किया गया। इस ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्र में सेल.बीएसपीसहित सेल के अन्य प्लांट्स और यूनिट्स के 23 प्रतिभागियों ने भाग लिया जिसमे आरएमडी और सीएमओ भी शामिल है द्यइस सत्र में बीएसपी के जीएम ;एचआरडीद्धए श्री सौरभ सिन्हाए द्वारा लेक्चर प्रदान किए गया ।

    भिलाई / शौर्यपथ / नगर पालिक निगम भिलाई क्षेत्र अंतर्गत आने वाले जोन क्रमांक 3 के वार्ड क्रमांक 22 श्याम नगर में आज एक होटल व्यवसायी पर कार्रवाई की गई! निगम भिलाई की टीम ने आज संपूर्ण लॉक डाउन के दौरान विभिन्न क्षेत्रों का निरीक्षण किए और ऐसे दुकान जो समय सीमा के बाद भी खुले पाए गए उनसे जुर्माना वसूल किया गया तथा सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करने वाले एवं प्रतिबंध के बावजूद खुला रखने पर होटल संचालकों पर भी कार्यवाही की गई! निगम की टीम ने आज एप्रोच रोड, लिंक रोड, गौरव पथ, सर्कुलर मार्केट, सुभाष सब्जी एवं फल मार्केट, जवाहर मार्केट, 18 नंबर रोड आदि का निरीक्षण किया! टीम जब श्याम नगर पहुंची तो पाया गया कि एक होटल व्यवसायी द्वारा बहुत सारे कर्मचारियों से संपूर्ण लॉक डाउन के दौरान मिठाई बनाने का कार्य कराया जा रहा है, जहां पर महिलाएं एवं पुरुष बिना मास्क के कार्य कर रहे थे, न हीं सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जा रहा था, 20 मजदूर मिठाई बनाने के कार्य में लगे हुए थे!
    होटल संचालक संतोष कुमार से निगम के सहायक राजस्व अधिकारी परमेश्वर चंद्राकर ने 25000 रुपए अर्थदंड लगाया और तत्काल काम को रुकवाया गया! इसी प्रकार समय सीमा के बाद भी सब्जी का व्यवसाय करने वाले लिंक रोड व्यवसायी से 1000 अर्थदंड वसूला गया, जोन क्रमांक 4 के सहायक राजस्व अधिकारी बालकृष्ण नायडू द्वारा गौतम नगर सुभाष मार्केट, छावनी चौक, नंदनी रोड एवं खुर्सीपार गेट का निरीक्षण किया गया इस दौरान तय समय के बाद भी सब्जी का व्यवसाय करने वाले 17 सब्जी व्यवसायियों से जुर्माना वसूल किया गया, निरीक्षण के दौरान समय सीमा के बाद भी सब्जी व्यवसाय करते हुए रोहित जयसवाल से 100 रुपए, मुस्तफा से 200 रुपए, रामा से 100 रुपए, रामधन से 200 रुपए, ओमप्रकाश से 200 रुपए, राहुल से 100 रुपए, मुकेश जायसवाल से 200 रुपए, जितेंद्र से 200 रुपए, कुमारी देवांगन से 200 रुपए, चेतराम से 200 रुपए, मोहनलाल लहरें से 100 रुपए, भैयालाल से 100 रुपए, मुन्ना से 100 रुपए, राधिका से 100 रुपए, ललिता यादव से 200 रुपए, अनीस अहमद से 200 रुपए, सुमन पटेल से 200 रुपए जुर्माना वसूल किया गया!
    नियमों का उल्लंघन करके दुकान खोलने वाले दुकानदारों पर जोन 02 के टीम ने भी अर्थदंड की कार्यवाही की। इस दौरान बिना मास्क लगाए बाहर निकलने वालों पर भी जुर्माना लगाया गया। लाकडाउन के नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ निगम प्रशासन सख्त कार्यवाही कर रहा है। जोन 02 के राजस्व विभाग की टीम ने नियमों का उल्लंघन करने वाले 5 व्यापारियों से 3600 अर्थदंड वसूलने की की कार्यवाही किए। निगम के सभी जोनों के राजस्व विभाग की टीम, निर्धारित समय सीमा के बाद दुकान न खोले इसका निरीक्षण किए। निगम की टीम बाजार क्षेत्र, दुकानों व ग्राहकों की निरंतर निरीक्षण कर रही है। जोन 02 के राजस्व विभाग की टीम ने क्षेत्र का निरीक्षण किए जहां निर्धारित समय के बाद दुकान खुला हुए पाए जाने पर कार्यवाही किए। जोन 02 के एआरओ संजय वर्मा ने निरीक्षण के दौरान फौजीनगर में एक मिष्ठान दुकान खुला पाया गया जिससे 2000 रूपए अर्थदंड वसूला गया, घासीदास नगर में 2 किराना स्टोर्स से 500-500 रूपए, एकता नगर चौक मे 2 बजे टेबल लगाकर मिक्सचर बेचने वाले से 500 रूपए तथा दो फल ठेले वालों से 50-50 रूपए अर्थदंड वसूलने की कार्यवाही की गई।

    ईदगाह या मस्जिद में सिर्फ 5 लोग पढेंगे ईद की नमाज, बाकी घरों से करेंगे दुआएं
    कोरोना संक्रमण को देखते हुए ईद पर पहली बार की गई व्यवस्था
    कोरोना और लॉकडाउन के कारण मस्जिदों में नही हुई अलविदा जुमा की नमाज
    ईद के तीन दिन बाद कब्रस्तान में होने वाला उर्सपाक भी हुआ कैंसल

    भिलाई / शौर्यपथ  / कोरोना संक्रमण के दौर में माहे रमजान में मस्जिदें सूनी रहीं और अब जबकि रमजान अपने आखिरी मकाम पर पहुंच गया है तब लोगों को चांद नजर आने का इंतजार है। अगर 29 रमजान का चांद 23 मई को नजर आ गया तो ईदुलफित्र 24 मई को होगी नहीं तो 30 रोजे पूरे होने के बाद 25 मई को ईदुलफित्र मनाई जाएगी। कोरोना संक्रमण को देखते हुए पहली बार नमाजे ईदुल फित्र का बिल्कुल अलग ढंग से इंतजाम किया गया है। मस्जिद कमेटियों की तरफ से भी व्हाट्सएप-फेसबुक के जरिए अपीलें जारी की गई हैं।
    इस बार 29 वां रोजा 23 मई को रहेगा। अक्सर 29 का चांद नजर आने की संभावनाएं रहती हैं, इसलिए मुस्लिम समुदाय की नजरें 23 मई की शाम को आसमान पर टिकी रहेंगी। मस्जिद कमेटियों की तरफ से भी चांद नजर आने पर सूचना जारी करने तैयारी कर ली गई है। जामा मस्जिद सेक्टर-6 के इमाम हाफिज इकबाल हैदर अंजुम ने बताया कि कमेटी की तरफ से भी चांद देखे जाने की तस्दीक करने इंतजाम किए गए हैं। इसके अलावा उन्होंने सभी लोगों से अपील की है कि अगर कहीं भी 29 रमजान का चांद नजर आए तो उनके मोबाइल नंबर 8720051418 पर तुरंत कॉल या व्हाट्सएप कर खबर करें, जिससे आगे की जरूरी तैयारियों के बारे में ऐलान किया जा सके। अगर किसी भी सूरत में 23 मई को चांद नजर नहीं आता है तो फिर 30 रोजे पूरे होने के बाद 25 मई को ईदुल फित्र मनाई जाएगी। हाफिज इकबाल हैदर अंजुम ने नमाजे ईदुल फित्र को लेकर एक वीडियो भी जारी किया है। जिसमें उन्होंने कोरोना संक्रमण के दौर में ईद की नमाज को लेकर किए गए इंतजाम की जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में हमारी सबसे ब?ी ईद यह है कि हम गरीबों और मिस्किनों का खयाल रखें। मोहताजों और जरूरतमंद को खाना खिलाएं। बेवाओं व यतीमों को मरहूमिन के नाम से पैसे दें। हो सके तो अपनी ओर से मुसाफिर को खाने का पैकेट तकसीम करें।
    ईदगाह के बाद घरों में अकेले ही प?नी होगी नमाज
    नमाजे ईदुल फित्र को लेकर मस्जिद कमेटियों की तरफ से कोरोना संक्रमण को देखते हुए तैयारियां की गई है। जामा मस्जिद सेक्टर-6 के ईमाम-खतीब हाफिज इकबाल हैदर अंजुम ने बताया कि लाक डाउन को देखते हुए ईद की नमाज 5 लोगों के साथ मस्जिद या ईदगाह में अदा की जाएगी। इसके ठीक बाद बाकी लोग अपने-अपने घरों में 2 रकअत या 4 रकअत नफ्ल नमाज शुक्रराने या चाश्त की नीयत से अकेले-अकेले अदा करेंगे। इसके लिए लोग अपने घरों में सुबह 7:15 बजे के बाद से सुबह 11:20 से पहले तक नवाफिल नमाज अदा करें।
    कब्रिस्तान में इस बार नहीं होगा उर्स, अपील की हाफिज हैदर ने
    ईद के तीसरे दिन कब्रिस्तान हैदरगंज कैम्प-1 में हाफिज अफजलुद्दीन हैदर का उर्स मुबारक बीते 4 दशक से लगातार हो रहा है। लेकिन इस बार कोरोना संकट को देखते हुए उर्स का आयोजन टाल दिया गया है। जामा मस्जिद सेक्टर-6 के साबिक इमाम और मुख्य आयोजनकर्ता हाफिज अजमलुद्दीन हैदर ने भी इस पूरे मसले को लेकर अपना वीडियो जारी किया है। उन्होंने बताया कि आज के हालात के पेशेनजर लाक डाउन का सिलसिला जारी है ऐसे मौके पर कहीं भी ज्यादा लोगों का इक_ा होना कानूनन जुर्म है। उन्होंने हजरत अफजलुद्दीन हैदर के तमाम चाहने वालेअकीदतमंदों से गुजारिश की है कि घरों में रहकर ही दुआएं करें और पूरे रमजान उन्होंने खत्मे कुरआन या जो कुछ भी प?ा है, उसे उनके मोबाइल नंबर 9926743263-8770328276 पर कॉल या व्हाट्सएप कर नोट करा दें। उन्होंने कहा कि यह उर्स सिर्फ उनके वालिद का नहीं बल्कि तमाम मरहूमीन के इसाले सवाल के लिए है।
    हाफिज हैदर ने कहा कि कोरोना संक्रमण के इस दौर में जब पूरे रमजान भर मस्जिदों में बा-जमाअत नमाज नहीं हुई, अलविदा जुमा नहीं हुआ और ईदगाह भी वीरान रहेंगे। ऐसे में हर साल ब?े पैमाने पर होने वाले उर्स मुबारक को टाल दिया गया है और घर पर ही फातिहा ख्वानी रखी गई है, जिसमें अकीदतमंद जो भी प? कर नोट कराएंगे उसे ईसाले सवाल में शामिल करा लिया जाएगा।

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