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May 31, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

         जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / जिस दिन तामांग विधवा हुईं, उस दिन उन्होंने सिर्फ अपना पति नहीं खोया, बल्कि सब कुछ गंवा दिया। ससुराल वालों का रवैया दिन-ब-दिन खराब होता गया। बात-बेबात उनके साथ मार-पीट की जाने लगी। उनका घर, बचत, सब कुछ हथिया लिया गया।नेपाल के एक रूढ़िवादी हिंदू परिवार में जन्मी राम देवी तामांग 20 साल की थीं, जब उनका विवाह प्रेम लामा के साथ हुआ। प्रेम एक गैर-सरकारी संगठन में काम करते थे और तामांग टेलरिंग का छोटा-मोटा कारोबार चलाती थीं। नेपाल जैसे देश में, जहां औरतों के लिए काम-काज के मौके बहुत सीमित हैं, तामांग के कारोबार की वजह से घर में खुशियों की भरपूर आमद थी। जिंदगी खुशगवार थी और पति-पत्नी, दोनों एक-दूसरे का दामन थामे बेहतर कल के सपने बुनने में जुटे थे।

शादी के एक साल बाद ही एक बेटी ने जन्म लेकर तामांग और प्रेम को मां-बाप के एहसास से आबाद कर दिया था। वे दोनों लगभग रोज इसके लिए अपने ईष्टदेव का धन्यवाद करते। जिंदगी रफ्ता-रफ्ता अपना सफर तय करती रही। इस बीच उन्हें एक और बेटी की खुशी नसीब हुई। मगर एक अनहोनी ने उनकी तमाम खुशियों को ग्रहण लगा दिया। प्रेम एक मोटरसाइकिल दुर्घटना में मारे गए। तामांग की पूरी दुनिया उजड़ गई। इस विपदा में जिन लोगों से उन्हें साथ और सहारे की सबसे अधिक उम्मीद थी, वहीं से उन्हें तोहमत और जिल्लत मिली। ससुराल वाले प्रेम की मौत के लिए उन्हें कमनसीब ठहराने लगे। तामांग कहती हैं, ‘उन्होंने मुझे अपने पति को खा जाने वाली कहा। वे यहीं तक नहीं रुके। मुझे लगातार कोसते रहे कि अगर मैं गांव में रही, तो सभी पुरुषों को खा जाऊंगी।’

जिस दिन तामांग विधवा हुईं, उस दिन उन्होंने सिर्फ अपना पति नहीं खोया, बल्कि अपना सब कुछ गंवा दिया। ससुराल वालों का रवैया दिन-ब-दिन खराब होता गया। सबसे पहले उन्होंने तामांग से उनका टेेलरिंग का कारोबार छीना। फिर बात-बेबात उनके साथ गाली-गलौज और मार-पीट की जाने लगी। उनका घर, बचत, सब कुछ हथिया लिया गया। सामाजिक रूढ़ि के कारण उनका अपना परिवार भी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ, क्योंकि यह रवायत भी थी कि विधवा होने के बाद कोई लड़की अपने पिता के घर नहीं लौट सकती थी।

नेपाल के पारंपरिक हिंदू समाज में आज भी एक विधवा स्त्री पर तरह-तरह की बंदिशें लागू हैं। मसलन, वे पुनर्विवाह नहीं कर सकतीं, लाल कपडे़ नहीं पहन सकतीं और न ही कोई आभूषण धारण कर सकती हैं। उन्हें शाकाहारी भोजन ही करना पड़ता है और वे किसी धार्मिक-मांगलिक कार्य में भी हिस्सा नहीं ले सकतीं। एक तरह से वे बहिष्कृत जीवन जीने को बाध्य हैं। तामांग को जल्द ही एहसास हो गया कि इस घुटन भरी जिंदगी से मुक्ति के लिए उन्हें अपने पति का गांव छोड़ कहीं और ठिकाना ढूंढ़ना होगा।

वे नेपाल के उथल-पुथल भरे दिन थे। देश आंतरिक संघर्ष के चक्रव्यूह में फंसा था। तामांग को अपनी दो बच्चियों के भविष्य की चिंता खाए जा रही थी। वह उन्हें पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाना चाहती थीं। अंतत: उन्होंने अपनी दोनों बच्चियों के साथ पति का गांव छोड़ दिया और काठमांडू से करीब 25 किलोमीटर पूरब स्थित बनेपा गांव में आ गईं। वह अपने साथ सिर्फ तीन सिलाई मशीन लेकर आईं। उनके लिए वे बेहद मुश्किल भरे दिन थे। दो छोटी बच्चियों की देखभाल के साथ उन्हें अपनी आजीविका का आधार तलाशना था। तामांग को अपने हुनर पर यकीन था। उन्होंने सिलाई का काम शुरू किया। साथ ही, वह घर में अचार बनाकर बेचने लगीं। आहिस्ता-आहिस्ता जिंदगी पटरी पर लौट आई। बेटियां स्कूल जाने लगीं।

लेकिन विधवा होने के बाद तामांग के भीतर कुछ दरक गया था। एक टीस थी, जो मुसलसल उन्हें बेधती रही। आखिर पति के रहते जिस परिवार और समाज से उन्हें मान-सम्मान मिलता रहा, वह एकाएक नफरत में क्यों बदला? वह भी तब, जब पति की मौत में उनकी कोई गलती न थी। उन्होंने बेवा औरतों को बदनसीब समझने वाली सोच से टकराने का फैसला किया। पूरे नेपाल में लाखों की संख्या में विधवाएं अभिशप्त जिंदगी जीने को मजबूर थीं।

तामांग अब विधवाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाने लगीं, उनके सशक्तीकरण के लिए उन्हें दस्तकारी और दूसरे तमाम तरह के हुनर सीखने को प्रेरित करने लगीं। वह कहती हैं, ‘औरतों ने ही बुरे वक्त में मेरा साथ दिया। मैं जिस तकलीफ से गुजर चुकी हूं, उससे उन्हें उबारना चाहती हूं। इसलिए मैं उन्हें प्रोत्साहित करती हूं कि वे हुनरमंद बनें। पैसे तो आते-जाते रहते हैं, मगर हुनर हमेशा आपके साथ रहता है।’

सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए तामांग ने लाल लिबास और आभूषण पहनने शुरू कर दिए। समुदाय के लोग उनसे बार-बार कहते रहते थे कि वह सियासत में उतरें, क्योंकि उनकी बातों का असर लोगों पर होता है। तामांग को भी एहसास हुआ कि शायद इस तरह वह विधवाओं की बेहतर खिदमत कर सकेंगी। साल 2017 में नामोबुद्धा म्युनिसिपैलिटी के डिप्टी मेयर का चुनाव उन्होंने सीपीएन (यूएमएल) के टिकट पर लड़ा और चुनाव में फतह हासिल की। जिस महिला को कभी उनके समाज ने अभागिन कहकर अपमानित किया था, आज वह उनकी किस्मत से रश्क करता है।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह राम देवी तामांग, नेपाली सामाजिक कार्यकर्ता

 

        नजरिया / शौर्यपथ /कोरोना के इस संक्रमण काल में कई महान कलाकार हमसे विदा हो गए। इरफान खान और ऋषि कपूर के बाद गीतकार योगेश भी इस दुनिया को छोड़ गए। पिछली सदी के साठ और सत्तर के दशक में यागेश जी ने कई बेहतरीन गीत लिखे, जिनमें से कुछ तो कालजयी सिद्ध हुए। कोई भी संगीत-प्रेमी आनंद का मशहूर गीत जिंदगी कैसी है पहेली हाय... भला कैसे भूल पाएगा? उनके लिखे दर्जनों गीत ऐसे हैं, जिन्हें रसिक श्रोताओं से लेकर आम आदमी तक गुनगुनाता रहा है।
लखनऊ के गणेश गंज मुहल्ले में 1943 में जन्मे योगेश की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा एक साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल में हुई थी, क्योंकि उनके पिता इंजीनियर होते हुए भी साहित्यिक अभिरुचि से संपन्न व्यक्ति थे। मगर पिता की असामयिक मृत्यु हो गई और घर में अभाव का यह हाल था कि पिता के अंतिम कर्म के लिए योगेश को चंदा एकत्रित करना पड़ा था। गरीबी सामने मुंह खोले खड़ी थी, और जिंदगी का लंबा सफर बाकी था। योगेश को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। जीवन-यापन के लिए उन्होंने टाइपिंग सीखी। और काम तलाशने के सिलसिले में 1961 में वह मुंबई आ गए। मुंबई इसलिए, क्योंकि यहां उनके चचेरे भाई पहले से फिल्मों में लेखन का काम कर रहे थे। एक भरोसा था कि मुंबई में कोई तो जानने वाला होगा। मुंबई आने पर योगेश को दुनिया की कटु हकीकतों से दो-चार होना पड़ा। जिस उम्मीद के सहारे वह आए थे, वहां से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल सका। फिर उन्होंने एक ‘चाल’ किराए पर ली। खुद खाना बनाते और जिंदगी को एक राह मिले, इसकी तलाश करते। इसी दौरान गुलशन बावरा से उनका संपर्क हुआ। उन्होंने ही योगेश को गीत लिखने की सलाह दी। शुरुआत तो योगेश ने कहानी लेखन से की, बाद में उन्होंने पटकथा व संवाद लिखने का भी काम किया। लंबे संघर्ष के बाद उन्हें एक गीतकार के रूप में काम मिला।
बतौर गीतकार सखी रौबिन से उनका पदार्पण हुआ। इस फिल्म में योगेश जी ने छह गीत लिखे। मगर तुम जो आओ तो प्यार आ जाए, जिंदगी में बाहर आ जाए तराने ने लोगों का ध्यान खींचा। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों के लिए अनुबंध किया। 1968 में आई एक रात के गीत सौ बार बनाकर मालिक ने सौ बार मिटाया होगा, ये हुस्न मुजस्सिम तब तेरा इस रंग पे आया होगा को मोहम्मद रफी ने बडे़ ही दिलकश अंदाज में गाया है। इस गीत को सुनकर लोग चौंक उठे। इस गाने ने बतौर गीतकार योगेश जी की पहचान स्थापित कर दी।
गीतकार के रूप में उनकी मुख्तलिफ पहचान का आधार थीं- उनकी प्रवाहमय भाषा और बोलों की दार्शनिकता। योगेश जी ने फिल्मों के लिए गीत लिखते हुए अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को हमेशा जीवित रखा। आनंद, रजनीगंधा और मिली जैसी कामयाब फिल्मों के गीतों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है। इन फिल्मों के गीतों ने अपने समय में धूम मचा दी थी। योगेश ने ऐसे समय में अपने गीतों में शुद्ध हिंदी शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू किया, जब उर्दू लफ्जों से सराबोर गाने इंडस्ट्री में छाए हुए थे। फिल्म आनंद से उनकी सलिल चौधरी के साथ जोड़ी बन गई। इस जोड़ी ने कई फिल्मों में साथ काम किया। उस दौर के श्रेष्ठ संगीतकार एस डी बर्मन के साथ भी उन्होंने काम किया। योगेश जी ने आर डी बर्मन, बप्पी लाहिड़ी, राजेश रोशन के साथ भी काम किया और कई अविस्मरणीय गीत रचे। जिंदगी के तमाम थपेड़ों के बीच एक सकारात्मकता उनमें हमेशा बनी रही और यह उनके गीतों में भी दिखती रही।
योगेश को इस बात का बहुत मलाल रहा कि वह कपूर परिवार के लिए कोई गीत न लिख सके। एक साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकार किया था कि एक बार राज कपूर ने उनको बुलाया था और वह आरके स्टूडियो पहुंचे भी, लेकिन उनके गार्ड ने उन्हें गीतकार मानने से मना कर दिया। दो-तीन प्रयास के बाद भी वह राज कपूर से नहीं मिल सके। दूसरी तरफ, राज साहब को शायद यह महसूस हुआ कि योगेश उनसे मिलने आए ही नहीं।
योगेश जी के देहांत पर लता मंगेशकर का शोक संदेश ही उनके कद की ऊंचाई को उजागर कर देता है। मगर सच का एक पहलू संगीतकार निखिल का वह ट्वीट है, जिसमें उन्होंने लिखा है, हम योगेश जी को वह सम्मान न दे सके, जिसके वह वाकई हकदार थे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) पवन कुमार, प्रशासनिक अधिकारी

 

        सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / लॉकडाउन लगाना और चलाना जितना कठिन था, उससे कहीं अधिक कठिन है लॉकडाउन हटाना व सामान्य स्थिति में लौटना। लॉकडाउन खुलते समय जिस तरह का तनाव या विवाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में हुआ है, वह अभूतपूर्व ही नहीं, चिंताजनक भी है। दिल्ली से लोग नोएडा या गाजियाबाद में काम करने निकले, तो उन्हें सीमा पर ही उत्तर प्रदेश की पुलिस ने रोक लिया। ठीक ऐसा ही विवाद हरियाणा-दिल्ली सीमा पर एकाधिक बार देखने में आया है। गुरुग्राम की सीमा पर पिछले सप्ताह एक समय पथराव की स्थिति बन गई थी। स्वाभाविक है, अब दफ्तर खुल रहे हैं, तो किसी को दिल्ली जाना है, किसी को दिल्ली से बाहर जाना है। जहां दिल्ली लॉकडाउन 4 के समय से ही कमोबेश खुल चुकी है, वहीं गुरुग्राम, नोएडा और गाजियाबाद में स्थिति अभी सामान्य नहीं है। 1 जून को जब दिल्ली के लोगों को सीमाओं पर रोका गया, तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का रोष स्वाभाविक था, उन्होंने भी दिल्ली की सीमाओं को 8 जून तक बंद रखने का आदेश दे दिया।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? दिल्ली के पड़ोसी राज्यों की दुविधा को कोरोना संक्रमण के आंकड़ों से समझा जा सकता है। जहां दिल्ली में 18,550 लोग संक्रमित हो चुके हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में 7,750 और हरियाणा में महज 1,923 मामले हैं। जहां दिल्ली में 31 मई तक 416 मौतें हो चुकी हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में 201 और हरियाणा में 20 लोगों की जान गई है। आंकड़े गवाह हैं कि संक्रमण की स्थिति दिल्ली में गंभीर है। ऐसे में, दिल्ली से आ रहे लोग उत्तर प्रदेश व हरियाणा, दोनों के लिए चिंता की बात हों, तो कोई आश्चर्य नहीं। दिल्ली अपनी अर्थव्यवस्था से और समझौता करने की मुद्रा में नहीं है, तो इसे समझा जा सकता है, पर ध्यान रहे, यह समय रोष का नहीं, बल्कि होश से कदम आगे बढ़ाने का है।
पूरे एनसीआर क्षेत्र के तमाम प्रशासन को कुछ अलग ढंग से मिलकर सोचना होगा। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें लोगों का परस्पर जुड़ाव व्यापक है, लोगों के व्यावसायिक,सामाजिक, पारिवारिक हित जुडे़ हुए हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को एक इकाई मानकर चलने की जरूरत है। इस वृहद क्षेत्र की जब रूपरेखा तैयार की गई थी, तब पूरे क्षेत्र के सुख-दुख को एक माना गया था, हालांकि राज्य सरकारों की अपनी-अपनी गुणवत्ता के अनुसार ही ये क्षेत्र कुछ-कुछ बंटे रहे हैं। इसलिए यह क्षेत्र कल भी आदर्श नहीं था और आज भी नहीं है। उदाहरण के लिए, सोमवार को ही दिल्ली के मुख्यमंत्री ने एक एप की घोषणा की है, जिससे कोविड-19 के मामलों की निगरानी की जाएगी, लेकिन क्या राष्ट्रीय राजधानी के पूरे क्षेत्र के लोगों को इसमें शामिल किए बिना कोविड-19 की निगरानी में कामयाबी मिल सकेगी? इस एप के जरिए या किसी विशेष स्वास्थ्य जांच तंत्र के जरिए दिल्ली सरकार को आगे बढ़कर नई लकीर खींचनी चाहिए। साथ ही, जो क्षेत्र दिल्ली से जुड़े हुए हैं, उन्हें भी खास दिल्ली और उसके लोगों के रोजगार के बारे में सोचना चाहिए। यह क्षेत्र उत्तर भारत का व्यावसायिक इंजन है, इसके विभिन्न चालक-संचालक तभी कारगर व कामयाब होंगे, जब उनके बीच समन्वय होगा। काम पर निकले लोगों की जगह-जगह पुख्ता निगरानी हो, लेकिन किसी को काम पर जाने से रोका न जाए, तभी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र देश के सामने एक मिसाल पेश कर पाएगा।

 

       मेलबॉक्स / शौर्यपथ / कोरोना वायरस से जहां सभी देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा रही है, वहीं भारत के सामने नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं। अपनी कमियों को पहचानने के साथ-साथ यह हमें आत्मनिर्भर बनने का मौका भी दे रहा है। हालांकि, यह आत्मनिर्भरता केवल औद्योगिक क्षेत्रों से नहीं आ सकती, इसकी बुनियाद बेहतर शिक्षा में छिपी है। आज हमारे देश में युवा और शिक्षित लोगों की कमी नहीं है, फिर भी वे इतने योग्य नहीं कि देश को आत्मनिर्भर बना सकें। लिहाजा आत्मनिर्भर बनने के लिए सबसे पहले हमें गुणवत्तापूर्ण और व्यावहारिक शिक्षा की ओर बढ़ना होगा। शोध के क्षेत्र में प्रोत्साहन ज्यादा जरूरी है। देश के सभी शिक्षण संस्थानों में निरंतर प्रायोगिक कक्षाएं होनी चाहिए। आज हमारे देश में विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ज्यादा उत्साहित रहते हैं, वे शोध के क्षेत्र में जाने से कतराते हैं। इस सोच को बदलने की दिशा में सरकार को काम करना चाहिए। शोध-कार्यों को बढ़ावा देकर ही आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा जा सकता है।
प्रतीक राज, झांसी

और सजगता जरूरी
कोविड-19 से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन को सरकार ने चरणबद्ध तरीके से खोलने का एलान कर दिया है। लॉकडाउन की वास्तविक पाबंदियां अब सिर्फ कंटेनमेंट जोन में ही लगेंगी। मगर अब हम सबकी जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं। हमें ठीक ढंग से दो गज की दूरी का पालन करना होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से देश में संक्रमण और मौत के आंकडे़ जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, वे चिंताजनक हैं। चूंकि अर्थव्यवस्था को खोलना भी जरूरी है, इसलिए सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है कि लोग खुद पर अनुशासन रखें। खतरा अभी टला नहीं है।
काव्यांशी मिश्रा, मैनपुरी

साल एक, काम अनेक
मोदी सरकार 2.0 के एक साल पूरे हो चुके हैं। बीते एक वर्ष में सरकार कई मुद्दों पर विपक्ष के निशाने पर रही, लेकिन उसने कई ऐसे काम भी किए, जो आम जनता के हित में रहे। मोदी सरकार की सबसे खास बात यह है कि उसके मंत्री भ्रष्टाचार से दूर हैं। इसके अलावा, बरसों से चले आ रहे तीन तलाक को खत्म करके सरकार ने मुस्लिम वर्ग की महिलाओं को बड़ी राहत दी। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 रद्द करके अलगाववादियों द्वारा देश को विभाजित करने के प्रयासों को भी उसने एक झटके में नाकाम कर दिया। देश की अर्थव्यवस्था को प्रगति-पथ पर आगे बढ़ाना, सभी वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलना और उनके हित में काम करना, गरीबों के लिए अपने ही क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं तलाशना, देश में चल रहे आंतरिक विवादों को निष्पक्ष होकर सुलझाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सफल कूटनीति द्वारा ताकतवर राष्ट्रों के बीच अच्छे संबंध बनाना सरकार के ऐसे कार्य हैं, जो बहुत ही प्रशंसनीय हैं।
अभिषेक सिंह, जौनपुर

दुव्र्यवहार दुखद
महानगरों से लौटने वाले प्रवासियों के साथ कई गांवों में दुव्र्यवहार की खबरें आ रही हैं। ऐसा देखा जा रहा है कि ग्रामीणों के साथ-साथ जन-प्रतिनिधि भी उन्हें गांवों में प्रवेश से रोक रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की जांच के उपरांत, जिन्हें होम क्वारंटीन की सलाह दी गई है, उन्हें भी गांवों से बाहर रहने को कहा जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? घर लौटे प्रवासियों के साथ इस तरह की बदसुलूकी क्यों की जा रही है? जागरूकता के अभाव में वे ऐसा कर रहे हैं। सरकारी अधिकारी गण ऐसे ग्रामीणों और जन-प्रतिनिधियों को बताएं कि संदिग्ध मात्र से कोई कोरोना का मरीज नहीं हो जाता, और फिर, कोरोना के कई मरीज तो घर में भी ठीक हो सकते हैं। घर लौटे प्रवासियों के साथ ऐसा रूखा व्यवहार बंद होना चाहिए।
भूपेंद्र सिंह रंगा, हरियाणा

 

     ओपिनियन / शौर्यपथ / सन् 1972 की गरमियों की एक शाम। लू के थपेडे़ अभी नरम पड़े ही थे कि हम कुछ लड़के छात्रावास से निकले और पीछे बैंक रोड पर स्थित फिराक गोरखपुरी के बंगले की तरफ बढ़ चले। उस गरमी में यह हमारा रोज का कार्यक्रम था। उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय में गरमियों की छुट्टियों में सभी हॉस्टल खाली करा दिए जाते थे और केवल उन छात्रों को, जिन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं का फॉर्म भरा हो, समर हॉस्टल में रुककर अपनी तैयारी का मौका मिलता था। इस बार समर हॉस्टल गंगा नाथ झा छात्रावास था, जिसके ठीक पीछे फिराक का निवास था। अपने जीवन में ही किंवदंती बन चुके उनका बैठका साहित्य, संस्कृति, भाषा और समाज जैसे विषयों पर खुद को समृद्ध करने का सबसे बड़ा अड्डा था।
फिराक साहब की महफिल अभी सजी नहीं थी और हम छात्र वहां पहुंचने वाले पहले ही थे। उस दिन बात भारतीय गांवों पर छिड़ गई। जाहिर है, इन सत्रों में ज्यादातर बोलते फिराक ही थे और हमारी भूमिका श्रोता की अधिक होती थी, पर उस दिन कुछ ऐसा हुआ कि हम भड़क गए। अपने हाथ का जाम स्टूल पर रखते हुए, उंगलियों में फंसे सिगरेट की राख खास अंदाज में झाड़कर और कंचों-सी आंखें अंदर तक धंसे कोटरों में घुमाते हुए उन्होंने जो कहा, वह किसी बम विस्फोट से कम नहीं था। उनके अनुसार, भारत के गांवों को नष्ट कर देना चाहिए। इनके बने रहने तक देश जहालत, गंदगी और पिछडे़पन से मुक्त नहीं हो सकता। इनकी जगह पचास हजार से एक लाख की आबादी वाले छोटे नगर बसने चाहिए, जिनमें मुख्य गतिविधियां कृषि आधारित उद्योगों के इर्द-गिर्द घूमती हों। हम सभी शहरों में आ तो गए थे, पर हमारी जड़ें गांवों में थीं। हम उन पर टूट पडे़, पर फिराक तो फिराक ही थे।
उन्होंने हमें उन ऐतिहासिक बहसों के बारे में बताया, जो भारतीय गांवों को लेकर चली थीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण थी महात्मा गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज्य’ या ‘ग्राम स्वराज्य’ और गांव को लेकर उनके प्रेम पगे अव्यावहारिक आग्रहों पर डॉ आंबेडकर की तीखी और जमीनी यथार्थ से जुड़ी प्रतिक्रिया। गांधी के लिए गांव स्वर्ग थे और जो कुछ कुरूप तत्कालीन भारतीय समाज में था, वह सिर्फ आधुनिक तकनीक की वजह से था। उनका सपना था कि गांव आत्मनिर्भर हों। वे अपनी जरूरत की सारी चीजें खुद पैदा करें, उनका स्थापत्य व अदालती निजाम भी स्थानीय हो और खेती-किसानी में उन्हीं यंत्रों का प्रयोग हो, जिन्हें गांव के बढ़ई या लोहार बनाते हों। उनके अनुसार, रेलवे को इसलिए बंद कर देना चाहिए, क्योंकि उससे हैजा फैलता है।
अब इस पर बहस करने की जरूरत नहीं है कि यदि गांधी के आदर्श गांव की परिकल्पना मान ली गई होती, तो हमारी खाद्य सुरक्षा का क्या होता, पर हमारे लिए आंबेडकर की प्रतिक्रिया आज भी प्रासंगिक है। गांधी के स्वर्ग को सिरे से खारिज करते हुए आंबेडकर ने भारतीय गांवों को साक्षात नरक बताया। कलेजा चीर देने वाली तड़प के साथ उन्होंने लिखा कि गांधी अगर ‘अछूत’ परिवार में पैदा हुए होते, तब उन्हें इस स्वर्ग की असलियत पता चलती। जिनका गांवों से जीवित संबंध है, वे आज भी महसूस करते हैं कि आंबेडकर के समय का ‘अछूत’, ‘हरिजन’ की यात्रा करते हुए ‘दलित’ जरूर हो गया है, पर गांव अभी भी उसके लिए नरक ही है।
फिराक गोरखपुरी के साथ बिताई वह शाम आज एक खास वजह से याद आ रही है। हमारी समकालीन स्मृति में कोरोना के मारे महानगरों से अपने गांव क्षत-विक्षत लौटते लाखों मजदूरों के विजुअल्स हमेशा के लिए टंक गए हैं। उनकी यातना और पीड़ा पर मैं पहले ही लिख चुका हूं, यहां मकसद उस विमर्श को रेखांकित करना है, जो उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी घोषणा से शुरू हुआ है। ज्यादातर लौटने वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं और जिन राज्यों के विकास के लिए उन्होंने अपना खून-पसीना बहाया था, विदाई के समय उनका व्यवहार काफी हद तक अमानवीय था, इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि यूपी सरकार ऐसी स्थिति से दुखी और नाराज होती, पर ऐसे में उसकी योजना को देखना जरूरी होगा।
पहले तो यह समझना होगा कि शहरों की ओर पलायन सिर्फ आर्थिक कारणों से नहीं होता। शहर और बाजार दलितों व पिछड़ों को मनुष्य की पहचान देते हैं। गांवों में अभी भी दक्षिण टोला मौजूद है। आज भी किसी दलित को उसकी जाति के तोडे़-मरोड़े नाम से ही पुकारा जाता है, मां-बाप का दिया नाम तो उसे शहर में आकर याद आता है। दक्षिण टोला से निकलकर वे शहरों में किसी गंदे नाले या रेल लाइन के किनारे झुग्गी-झोपड़ी के नरक में सिर्फ इसलिए नहीं रहते कि वहां उन्हें आर्थिक सुरक्षा मिलती है, बल्कि इससे अधिक उन्हें मनुष्य जैसी पहचान भी मिलती है। कोरोना शुरुआत में तो हवाई जहाजों से उतरा, पर संक्रमण की आदर्श स्थितियों के कारण जल्द ही महानगरों के स्लम उसके प्रसार स्थल बन गए। अनियोजित और अमानवीय शहरी विकास के कारण हमारे नगरों में गगनचुंबी इमारतें, साफ-सुथरी सड़कें और हरे-भरे पार्क हैं, और उनके ठीक बगल में बजबजाते नालों पर किसी तरह से सिर छिपाने भर की जगह वाली कच्ची बस्तियां। आजादी के बाद कभी नहीं हुआ कि मनुष्यों के रहने लायक शहर बसाने के प्रयास किए जाएं। स्लमों को हटाकर वहां साफ-सुथरी रिहाइशें बसाने की कोशिशें नहीं की गईं। इसकी जगह स्लम में बिजली, पानी जैसी सुविधाएं देने की बातें राजनीतिक-आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद थीं, इसलिए उसी की बातें होती रहीं।
ऐसे में, किसी सरकार का यह सोचना कि वह चालीस लाख से अधिक श्रमिकों को गांवों में ही रोक लेगी और उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार दे देगी, यह देखने वाली बात होगी। पूरी दुनिया में शहरीकरण बढ़ रहा है और भारत में भी अब लगभग आधी आबादी शहरों में रहती है। भविष्य अंतत: शहरों का ही है। गांव में रोककर इन लाखों लोगों को रोजगार देने की जगह उन्हें फिराक गोरखपुरी की सलाह पर गौर करना चाहिए और गांवों का मोह त्यागकर छोटे-छोटे नगर बसाने की सोचना चाहिए। ये नगर साफ-सुथरे मकानों, सड़कों, सीवर, ड्रेनेज, पेयजल और हरियाली वाले रिहाइशी इलाके होंगे, जो वर्ण-व्यवस्था की गलाजत से मुक्ति दिलाकर उन्हें मानवीय बनाएंगे। इनमें छोटे-छोटे उद्योग-धंधे होने चाहिए, जो रोजगार भी दें व पर्यावरण भी बचाएं। पूर्वांचल एक्सप्रेस वे पर ही कई मिनी नोएडा बसाए जा सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी

 

कोरोना महामारी संकट में जनजागरूकता लाने में अहंभूमिका निभाने वाले श्रमजीवी पत्रकार एवं प्रेसकर्मी के साथ मोदी सरकार कर रही है गलत व्यवहार
कोरोना महामारी संकट से श्रमजीवी पत्रकार एवं प्रेसकर्मी भी प्रभावित
पत्रकारों को भी भूली मोदी सरकार, ना मुद्रा योजना का मिला लाभ, ना 20 लाख करोड़ पैकेज से कोई राहत
कोरोना महामारी संकट में लोकतंत्र को चौंथा स्तम्भ भी प्रभावित, 20 लाख करोड़ के पैकेज में मीडिया जगत के लिये भी प्रावधान नहीं

   रायपुर / शौर्यपथ / प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि मोदी सरकार के द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज में लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ के सिपाहियों के लिए कोई इंतजाम नहीं होना दुर्भाग्य जनक एवं निंदनीय है। कोरोना महामारी संकट काल में आमजनता को जागरूक करने जन-जन तक खबरों को पहुंचाने में अपने जान को जोखिम में डालने परिवार की चिंता किए बगैर महती भूमिका निभाने वाले मीडिया संस्थान, श्रमजीवी पत्रकार और प्रेस कर्मियों का उपयोग कर मोदी सरकार उनको भूल गई।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि मोदी सरकार के द्वारा शुरू की गई मुद्रा योजना का लाभ भी श्रमजीवी पत्रकार और प्रेस कर्मियों को नहीं मिला था। ठीक वैसे ही कोरोना संकट काल में 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज में मीडिया संस्थान, श्रमजीवी पत्रकार, प्रेस कर्मियों के लिए कोई आर्थिक मद्द नहीं है, जो मोदी सरकार के श्रमजीवी पत्रकारों और प्रेस कर्मियों के वर्तमान एवं भविष्य को लेकर गैर जिम्मेदार होने को दर्शाती है। कोरोना महामारी संकटकाल में देशभर के लगभग एक करोड़ श्रमजीवी पत्रकार और प्रेसकर्मी एवं उनके परिवार के चार करोड़ सदस्यों के सामने भी जीवनयापन का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। मीडिया संस्थानों की माली हालत खराब होने का प्रभाव श्रमजीवी पत्रकार और प्रेस कर्मियों की नौकरी पर भी पड़ा है और पड़ेगा। दुर्भाग्य है कि पत्रकारों के साथ-साथ मीडिया संस्थाओं को भी मोदी सरकार भूल गयी है।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि दुर्भाग्य जनक है। लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ के सहारे राजनीति करने वाले मोदी सरकार को उसी चतुर्थ स्तंभ के सिपाहियों के न तो वर्तमान को लेकर कोई चिंता है ना ही इनके आने वाले भविष्य को लेकर कोई चिंतन 20 लाख करोड़ के पैकेज में किया गया।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने मोदी सरकार से मांग करते हुए कहा कि कठिन समय में श्रमजीवी पत्रकार एवं प्रेस कर्मियों और उनके परिवारों के लिए कोरेना महामारी संकटकाल में सीधी आर्थिक मदद के लिए न्याय योजना शुरू कर श्रमजीवी पत्रकार एवं प्रेस कर्मियों को भी उस दायरे में लाए और सम्मानजनक राहत राशि प्रतिमाह उनको प्रदान करें। लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ सरकार और जनता के बीच संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण और सशक्त माध्यम है। आज लोकतंत्र के सिपाही ही आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं ऐसे कठिन समय में सरकार और जनता के बीच के संवाद को प्रचारित प्रसारित करने वाले के बारे में चिंता करने की आवश्यकता है।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि मोदी सरकार को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सरकार के द्वारा श्रमजीवी पत्रकार के हित में लिए अनेक निर्णयों से सीख लेनी चाहिए। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार ने पत्रकार कल्याण कोष से गंभीर बीमारी आदि की दशा में दी जानी वाली आर्थिक सहायता राशि को 50 हजार रुपया से बढ़ाकर 2 लाख रुपया किया है। बीते साल 57 पत्रकारों को लगभग 19.50 लाख रूपए की आर्थिक सहायता दी गई थी। वरिष्ठ सेवानिवृत्त पत्रकारों के लिए वरिष्ठ मीडिया कर्मी सम्मान निधि योजना संचालित की है। इस योजना में आयु सीमा 62 वर्ष से घटाकर 60 वर्ष एवं सम्मान राशि रूपए 5 हजार से बढ़ाकर रूपए 10 हजार और सम्मान निधि देने की अवधि 5 वर्ष से बढ़ाकर आजीवन कर दी है।

    दुर्ग / शौर्यपथ / अमृत मिशन योजना के नाम पर वार्ड 53 पोटिया कला वार्ड में तीन व्यक्तियों के द्वारा कुछ घरों में जाकर पैसे की मांग मिले । इसकी जानकारी वार्ड के पार्षद नेता प्रतिपक्ष अजय वर्मा को होने के उपरांत उन्होंने उन तीनों व्यक्तियों को वार्ड निवासियों के साथ घेराबंदी कर पकड़ा। और उनसे पूछताछ की उन्होंने इसकी जानकारी निगम आयुक्त इंद्रजीत बर्मन को दिए । आयुक्त के निर्देश पर अमृत मिशन योजना के अधिकारियों ने तत्काल उन व्यक्तियों की पतासाजी की है पता चला की वे तीनों पुलगांव में अमृत मिशन योजना के तहत कार्य कर रहे हैं ऐसा बता रहे थे । और इस वार्ड में भी बहुत जल्द कार्य चालू हो रहा है अत: हम लोगों को भोजन आदि के लिए पैसे देवें ।
अमृत मिशन के अधिकारियों ने बताया मिशन में काम करने वाले ऐसे किसी भी व्यक्ति को कहीं से भी जाकर पैसा लेने के निर्देश नहीं दिए गए हैं जिनके द्वारा भी अमृत मिशन के नाम से पैसे की मांग की जा रही है वह बिल्कुल गलत है । उन्होंने शहर के समस्त आम जनता से अनुरोध कर कहा है कि पूरे शहर के वार्डो में अमृत मिशन योजना के तहत पाइप लाइन विस्तार और नया पाइप लाइन में कनेक्शन का काम निरंतर किया जा रहा है योजना में काम करने वाले श्रमिकों के लिए लाक डाउन के दौरान फंसे लोगों के लिए हमारी ओर से व्यवस्था की गई है यदि अमृत मिशन का कोई भी कर्मचारी, श्रमिक खाना या भोजन के नाम से पैसे की मांग करते हैं तो बिल्कुल भी ना दें।
अमृत मिशन कार्य के नाम से पैसा मांगने वाले तीनों व्यक्तियों को पार्षद नेता प्रतिपक्ष अजय वर्मा के नेतृत्व में पकड़ा गया तथा आयुक्त के निर्देश पर उन्हें पदमनाभपुर स्थित थाना को सौंप दिया गया जहां से उन तीनों को जेल भेज दिया गया । बताया गया कि तीनों व्यक्ति शराब के नशे में धुत थे ।

   दुर्ग / शौर्यपथ / एमजीएम सीनियर सेकंडरी स्कूल भिलाई संकट काल के दौरान उत्तपन्न होने वाली पर्कृतिक आपदाओं और महामारी के विरुद्ध लड़ने में हमेशा से ही एक उत्साही सेनानी की तरह कार्य करता रहा है . यह उल्लेखनीय है कि एमजीएम स्कूल भिलाई इस कठिन समय में अपना योगदान देकर महामारी व प्रक्रितक आपदाओ के दौरान जरुरतमंदो के लिए आवश्यक मदद पहुचाने में हमेशा संवेदनशील रहा है .
परम्परानुसार एमजीएम बिरादरी ने covid - 19 के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लेते हुए मुख्यमंत्री सहायता कोष में योगदान दिया है और इसे जिला कलेक्टर दुर्ग को सौप दिया गया . स्कूल से सीधे योगदान के अलावा एमजीएमस्टाफ ने भी स्वेक्षा से इस विपरीत परिस्थिति में अपना एक दिन का वेतन दान किया . प्रबंधक bishop of the school his Grace josheph Mar Dionysius ,एमजीएम स्कूल के उपाध्यक्ष Very Rev. Thomas Ramban, एमजीएम चर्च के सहायक विकार Father Shinu Cherian , Mr. Prince MA Hon..Correspondent of the school ,Mr.Viji Candy , Mr. K.P. Santosh ,Mr. Shabu Jhon माननीय कमिटी मेम्बर्स व एमजीएम स्कूल के प्राचार्य Prof. Dr. B.D Thakaran , Mr. Shaji Chacko फेकल्टी मेम्बर्स की उपस्थिति में जिला कलेक्टर को चेक सौपा .
यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि एमजीएम सीनियर सेकेंडरी स्कूल समाज में हो रही प्राकृतिक आपदाओ के प्रति हमेशा संवेदनशील रहा है और समय समय पर स्थितियों की मांग के अनुसार उचित योगदान दिया है .

नई दिल्ली / शौर्यपथ / गैर-सब्सिडी LPG सिलिंडरों के दामों में सोमवार को जबरदस्त वृद्धि की गई है, जिसके बाद मेट्रो शहरों में लोगों को कुकिंग गैस पर अब पहले से कहीं ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे. कुछ मेट्रो शहरों में तो लोगों को प्रति सिलिंडर पर पहले के मुकाबले 37 रुपए तक ज्यादा खर्च करने पड़ेंगे. गैस के दामों में यह बड़ी बढ़ोत्तरी तीन महीनों से लगातार घटते दामों के बाद आई है.
अगर मेट्रो शहरों की बात करें तो इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के आंकड़ों के मुताबिक, 1 जून यानी सोमवार से दिल्ली में गैर-सब्सिडी पर खरीदे जाने वाले प्रति कुकिंग गैस सिलिंडर (14.2 किलोग्राम) के रेट में 11.50 रुपए की बढ़ोत्तरी हुई है, वहीं कोलकाता में 31.50 रुपए प्रति सिलिंडर, मुंबई में 11.50 रुपए प्रति सिलिंडर और चेन्नई में 37 रुपए प्रति सिलिंडर बढ़े हैं.

1 जून से दिल्ली में फिलहाल 581.50 रुपए की दर से मिल रहे गैर-सब्सिडी पर मिलने वाले सिलिंडर की एक रिफिलिंग पर अब 593 रुपए खर्च करना होगा. मुंबई में 579 रुपए का सिलिंडर 590.50 रुपए, कोलकाता में 584.50 रुपए की दर से बिक रहा सिलिंडर अब 616 रुपए में बिकेगा. वहीं चेन्नई में 569.50 रुपए की दर से बिक रहे सिलिंडर के लिए 606.50 रुपए खर्च करना पड़ेगा.

बता दें कि फिलहाल सरकार एक घर के लिए सालाना 14.2 किलोग्राम के 12 सिलिंडर सब्सिडी पर देती है. इसके बाद कोई उपभोक्ता अलग से सिलिंडर खरीदता है तो उसे बाजार में चल रहे दामों के हिसाब से पैसे खर्चने होते हैं. ये भी ध्यान रखने की बात है कि सरकार की सब्सिडी अंतरराष्ट्रीय बाजार में चल रहे क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल के दामों और फॉरेन एक्सचेंज पर निर्भर करती है.

 

नई दिल्ली / शौर्यपथ / राजीव गांधी हेल्थ साइंसेज यूनिवर्सिटी के सिल्वर जुबली कार्यक्रम में शामिल हुए पीएम मोदी ने छात्रों को संबोधित किया. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि देश की स्वास्थ्य सेवाएं तेजी से बदल रही हैं. उन्होंने कहा कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में कोरोना वॉरियर्स की भूमिका अहम है, दुनिया देख रही है कि भारत किस प्रकार इस खतरनाक वायरस से युद्ध कर रहा है. उन्होंने कहा कि वायरस अदृश्य हो सकता है लेकिन हमारे कोरोना योद्धा अजेय हैं. डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी बिना वर्दी वाले सैनिक हैं.
पीएम मोदी ने कोरोना वॉरियर्स के खिलाफ हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि मैं स्पष्ट कह देना चाहता हूं कि फ्रंटलाइन वर्कर्स के साथ बुरा व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. पीएम मोदी ने कहा कि हमें मानवता से जुड़े विकास की ओर देखना होगा. इस मौके पर उन्होंने आयुष्मान योजना का भी जिक्र किया, उन्होंने कहा कि आयुष्मान भारत दुनिया की सबसे बड़ी हेल्थ स्कीम है. दो साल से कम में ही इसका फायदा 1 करोड़ लोग उठा चुके हैं. महिलाएं और गांव के लोग सबसे ज्यादा लाभार्थी हैं.

पीएम मोदी ने कहा कि 22 और AIIMS खुल चुके हैं और भारत इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है. उन्होंने कहा कि पिछले पांच साल में देश में एमबीबीएस की 30 हजार सीटें बढ़ गई हैं और पोस्ट ग्रैजुएशन की सीटों में 15 हजार की बढ़ोतरी हुई है.

 

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