September 20, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी कार्रवाई का रास्ता साफ; भारत समेत शीर्ष खरीदार निशाने पर, लेकिन शुल्क अभी लागू नहीं

    वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 सितंबर 2026 को ‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026’ पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया है। व्हाइट हाउस के अनुसार यह कानून रूस के खिलाफ वैधानिक प्रतिबंधों, टैरिफ और अन्य पाबंदियों का दायरा बढ़ाता है तथा ईरान पर मौजूदा प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाता है। 

    इस कानून का सबसे महत्वपूर्ण और भारत के लिए संवेदनशील पहलू यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के अमेरिकी आयात पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है। भारत और चीन जैसे देश इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं। 

    सबसे पहले समझिए—क्या भारत पर 100% टैरिफ लग चुका है?

    नहीं।

    यह इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण तथ्यात्मक बात है। कानून ने 100% शुल्क को स्वतः लागू नहीं किया है। बल्कि ट्रंप प्रशासन को यह अधिकार दिया गया है कि वह रूसी ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले संबंधित देशों के खिलाफ टैरिफ कार्रवाई करे। कब, किस देश पर और कितनी दर से कार्रवाई होगी, यह आगे अमेरिकी प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करेगा। 

    यानी फिलहाल स्थिति को “भारत पर 100% टैरिफ लागू” कहना सही नहीं होगा; अधिक सटीक बात है—“भारत पर 100% तक अमेरिकी टैरिफ लगाए जाने का रास्ता कानून ने खोल दिया है।”

    भारत क्यों आया अमेरिकी निशाने पर?

    भारत लंबे समय से रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता रहा है। अमेरिका की नई नीति का मूल उद्देश्य उन देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है जो रूसी ऊर्जा खरीदकर रूस की ऊर्जा आय को बनाए रखने में योगदान दे रहे हैं।

    नए कानून में रूस के ऊर्जा क्षेत्र के साथ-साथ उसके ‘शैडो फ्लीट’ यानी प्रतिबंधों से बचकर रूसी तेल पहुंचाने वाले टैंकर नेटवर्क को भी निशाना बनाया गया है। इसके अलावा रूसी अधिकारियों, बैंकों और अन्य संस्थाओं पर प्रतिबंधों का प्रावधान है। 

    कानून को भारी बहुमत से मिली मंजूरी

    यह कानून अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ। सीनेट में इसे 86-11 वोट से मंजूरी मिली, जबकि प्रतिनिधि सभा में 262-159 वोट से पारित हुआ। इसके बाद 18 सितंबर को राष्ट्रपति ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर किए। 

    कानून का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है। ग्राहम इस रूस-विरोधी प्रतिबंध पैकेज के प्रमुख समर्थकों में रहे थे। 

    भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां

    पहली—ऊर्जा सुरक्षा।

    यदि रूसी तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव बढ़ता है तो भारत को अपने ऊर्जा आयात के विकल्पों और कीमतों पर फिर से रणनीतिक विचार करना पड़ सकता है।

    दूसरी—अमेरिकी बाजार।

    यदि भविष्य में भारत पर ऊंचा अमेरिकी टैरिफ लगाया जाता है तो अमेरिका को निर्यात करने वाले भारतीय उद्योगों पर इसका असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन किस दर, किन उत्पादों और किस समयावधि के लिए शुल्क लागू करता है। 

    तीसरी—भारत-अमेरिका संबंध।

    रूस के साथ भारत के ऊर्जा संबंध और अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक एवं रणनीतिक संबंध—दोनों को संतुलित रखना नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौती बन सकता है।

    एक और महत्वपूर्ण तथ्य—यह सिर्फ भारत की कहानी नहीं

    कानून का निशाना केवल भारत नहीं है। चीन भी प्रमुख संभावित प्रभावित देशों में है, क्योंकि वह भी रूसी ऊर्जा का बड़ा खरीदार है। कानून का प्रभाव अन्य प्रमुख खरीदारों पर भी परिस्थितियों के अनुसार पड़ सकता है। 

    इसके अलावा कानून रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव को केवल तेल खरीद तक सीमित नहीं रखता। रूसी ऊर्जा एवं रक्षा क्षेत्र, वित्तीय संस्थानों तथा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले नेटवर्कों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। 

    ईरान के लिए भी कड़ा संदेश

    कानून के शीर्षक में रूस के साथ ईरान भी शामिल है। इसके तहत मौजूदा ईरान प्रतिबंध व्यवस्था को पांच वर्ष के लिए आगे बढ़ाया गया है। इस तरह यह कानून केवल रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़ा आर्थिक दबाव नहीं, बल्कि अमेरिका की व्यापक रूस-ईरान प्रतिबंध नीति का हिस्सा बन गया है। 

    भारत के लिए असली सवाल अब शुरू होता है

    ट्रंप के हस्ताक्षर के साथ कानूनी अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथ में आ गया है, लेकिन भारत पर 100% शुल्क लगने का अंतिम निर्णय अभी अलग चरण है। इसलिए आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण नजर इस बात पर रहेगी कि अमेरिकी प्रशासन इस अधिकार का इस्तेमाल करता है या नहीं, भारत को किस श्रेणी में रखता है और यदि कार्रवाई होती है तो किन भारतीय वस्तुओं पर कितनी दर लागू की जाती है।

    23 सितंबर को सुबह से दोपहर तक बंद रहेंगे प्रतिष्ठान, चंदा वसूली में दबाव और मारपीट के आरोप; व्यापारियों का दो टूक—चंदा देंगे तो स्वेच्छा से

    बिलासपुर। शहर में कथित जबरिया चंदा वसूली को लेकर व्यापारियों का आक्रोश अब सामूहिक विरोध के रूप में सामने आने जा रहा है। चंदा वसूली के नाम पर दबाव, धमकी और मारपीट किए जाने के आरोपों के विरोध में व्यापारिक संगठनों ने 23 सितंबर को सुबह से दोपहर तक बाजार बंद रखने का निर्णय लिया है। इस दौरान शहर के व्यापारी अपने-अपने प्रतिष्ठान बंद रखकर जबरिया चंदाखोरी के खिलाफ एकजुटता का संदेश देंगे।

    कैट के राष्ट्रीय सचिव राजू सलूजा और छत्तीसगढ़ चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. नवदीप सिंह अरोरा ने बिलासपुर प्रेस क्लब में पत्रकारों से चर्चा के दौरान बंद की घोषणा की। व्यापारिक संगठनों के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि शहर में चंदा वसूली के नाम पर कुछ लोगों द्वारा व्यापारियों पर कथित रूप से दबाव बनाया जा रहा है। विरोध करने पर विवाद और मारपीट की स्थिति बनने की बात भी व्यापारियों ने कही।

    व्यापारियों के अनुसार, कुछ मामलों में विवाद इतना बढ़ा कि कथित चंदा वसूली करने वालों के खिलाफ पुलिस में एफआईआर तक दर्ज कराने की स्थिति बनी। व्यापारिक संगठनों का कहना है कि यदि किसी सामाजिक, धार्मिक अथवा अन्य आयोजन के लिए व्यापारी सहयोग करना चाहता है तो वह उसकी इच्छा और सामर्थ्य पर निर्भर होना चाहिए।

    चंदा देना है तो स्वेच्छा से, दबाव में नहीं

    व्यापारियों ने स्पष्ट किया कि सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में स्वेच्छा से सहयोग करने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। उनका विरोध दुकान-दुकान पहुंचकर कथित दबाव बनाकर चंदा वसूलने की प्रवृत्ति से है।

    व्यापारियों का कहना है कि सहयोग मांगना अलग बात है, लेकिन किसी व्यापारी की इच्छा के विरुद्ध दबाव बनाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। कैट और चेंबर की स्थानीय इकाई ने इस मुद्दे को संगठित रूप से उठाने का निर्णय लिया है।

    व्यापारिक संगठनों का कहना है कि मामले की जानकारी प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को भी दी जाएगी, ताकि चंदा वसूली को लेकर उत्पन्न हो रहे विवादों और कथित दबाव की स्थिति पर प्रभावी कार्रवाई हो सके।

    बंद के जरिए देंगे एकजुटता का संदेश

    23 सितंबर का प्रस्तावित बाजार बंद केवल प्रतिष्ठान बंद रखने तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापारियों की सामूहिक एकजुटता का संदेश देने के उद्देश्य से किया जा रहा है। संगठनों का कहना है कि लंबे समय से व्यापारी अलग-अलग स्तर पर इस समस्या का सामना कर रहे हैं, लेकिन अब सामूहिक रूप से आवाज उठाने का निर्णय लिया गया है।

    व्यापारियों ने दो टूक कहा कि सहयोग करना है तो अपनी इच्छा से करेंगे, लेकिन दबाव या कथित जबरिया वसूली के आधार पर चंदा स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    शौर्यपथ विशेष 

    दुर्ग। नगर निगम क्षेत्र में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर महापौर श्रीमती अलका बाघमार द्वारा समय-समय पर औचक निरीक्षण किया जाना निश्चित रूप से जनहित से जुड़ा कदम है। पेवर ब्लॉक से लेकर नाली निर्माण तक मौके पर पहुंचकर बेस और निर्माण गुणवत्ता की जांच करना स्वागत योग्य पहल है। लेकिन इसी के साथ अब शहर में एक दूसरा सवाल भी उठने लगा है—क्या औचक निरीक्षण की कसौटी सभी ठेकेदारों के लिए समान है?

    हाल के दिनों में महापौर द्वारा कुछ निर्माण कार्यों का मौके पर निरीक्षण किए जाने के बीच आरबीएस कंस्ट्रक्शन के कार्यों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। निगम में आरबीएस कंस्ट्रक्शन को वर्तमान समय के प्रमुख ठेकेदारों में गिना जाने लगा है और शहर के अलग-अलग हिस्सों में उसके निर्माण कार्य बताए जा रहे हैं। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि जब गुणवत्ता की जांच को लेकर महापौर स्वयं सक्रिय हैं, तो आरबीएस कंस्ट्रक्शन के निर्माण कार्य भी उसी पैमाने पर औचक निरीक्षण के दायरे में क्यों नहीं दिखाई दे रहे?

    जन्मदिन के बधाई पोस्ट से लेकर निर्माण कार्यों तक उठे सवाल

    महापौर श्रीमती अलका बाघमार के जन्मदिन के अवसर पर शहर में लगाए गए बधाई संदेशों और पोस्टरों में आरबीएस कंस्ट्रक्शन से जुड़े ठेकेदार की भूमिका की चर्चा भी सामने आई थी। यह अपने आप में कोई अनियमितता साबित नहीं करता, लेकिन इसी सार्वजनिक संदर्भ के कारण अब निगम के निर्माण कार्यों को लेकर पारदर्शिता और समान जांच का सवाल उठाया जा रहा है।

    सवाल यह है कि यदि किसी ठेकेदार के कार्यों की गुणवत्ता की जांच की जा रही है तो क्या उसी तरह अन्य बड़े ठेकेदारों के कार्यों की भी नियमित और औचक जांच की जा रही है? यदि हां, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं होती?

    खंडेलवाल कॉलोनी में सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल

    दो दिन पहले खंडेलवाल कॉलोनी में निर्माणाधीन नाले में सुरक्षा संसाधनों की कमी के बीच एक युवक के गिरने और गंभीर रूप से घायल होने की घटना सामने आई। गनीमत रही कि कोई जनहानि नहीं हुई। निर्माण स्थल पर बैरिकेडिंग, सुरक्षा संकेतक और अन्य आवश्यक सुरक्षा उपायों की जिम्मेदारी संबंधित एजेंसी और ठेकेदार की होती है।

    ऐसी घटना के बाद यह भी जरूरी हो जाता है कि निगम केवल निर्माण की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि निर्माण स्थल की सुरक्षा व्यवस्था की भी जांच करे।

    वार्ड 17-18 की नाली और पेवर ब्लॉक जांच के बाद बढ़ा सवाल

    वार्ड क्रमांक 17-18 में नाली निर्माण में लगे सरियों की गुणवत्ता और निर्माण मानकों को लेकर पहले भी सवाल उठाए जा चुके हैं। वहीं हाल में वार्ड क्रमांक 17 में लगाए जा रहे पेवर ब्लॉक को महापौर द्वारा तुड़वाकर बेस की जांच किए जाने की बात सामने आई।

    यह कार्रवाई बताती है कि निगम निर्माण गुणवत्ता को लेकर गंभीरता दिखा सकता है। लेकिन इसी दौरान समीपस्थ वार्ड क्रमांक 21 में चल रहे सड़क निर्माण कार्य का निरीक्षण नहीं किए जाने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। जब दोनों क्षेत्र बहुत अधिक दूरी पर नहीं हैं, तो जनता का सवाल स्वाभाविक है कि औचक निरीक्षण की सीमा तय कैसे होती है?

    ठेकेदारों में चर्चा—बधाई पोस्ट लगाओ, जांच से बच जाओ?

    शहर में अब एक तरह की चर्चा और हंसी-मजाक का विषय भी बनने लगा है कि यदि अगले साल महापौर के जन्मदिन पर किसी ठेकेदार के समर्थन में बधाई संदेशों की भरमार कर दी जाए तो शायद उसके निर्माण कार्य जांच के दायरे से बाहर रहेंगे।

    बेशक यह केवल चर्चा और व्यंग्य हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी चर्चाओं का जन्म लेना भी निगम प्रशासन के लिए पारदर्शिता की कसौटी पर स्वयं को साबित करने का अवसर है।

    जनता का सीधा सवाल

    महापौर अलका बाघमार द्वारा निर्माण कार्यों की गुणवत्ता जांच का अभियान यदि वास्तव में शहरहित में है, तो फिर सवाल किसी एक ठेकेदार तक सीमित नहीं होना चाहिए। हर निर्माण कार्य, हर ठेकेदार और हर वार्ड के लिए एक समान जांच व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जाती?

    जनता यह जानना चाहती है—

    क्या औचक निरीक्षण केवल चिन्हित ठेकेदारों के कार्यों तक सीमित रहेगा, या आरबीएस कंस्ट्रक्शन सहित निगम के सभी बड़े और छोटे ठेकेदारों के निर्माण कार्यों की भी समान रूप से जांच होगी?

    अब निगाह इस बात पर है कि निगम की यह जांच व्यवस्था चयनात्मक दिखाई देती है या वास्तव में निष्पक्षता के समान पैमाने पर आगे बढ़ती है।

    मछली पकड़ने गए दो युवकों का दावा—पहले गांजा पीने को कहा, मना किया तो लौटकर कनपटी पर बंदूक टिकाई और चाकू से किया हमला; नकदी, मोबाइल और बाइक की चाबी ले जाने का भी आरोप

    दुर्ग। अंजोरा चौकी क्षेत्र में रात करीब 3 बजे महमरा तालाब के पास दो युवकों के साथ हुई कथित चाकूबाजी और लूट की घटना ने क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना को लेकर पीड़ित युवकों और पुलिस की ओर से सामने आया घटनाक्रम अलग-अलग है। यही अंतर अब पूरे मामले को और गंभीर बना रहा है।

    पीड़ितों के अनुसार कमल निषाद (28) और लोकेश निषाद (23) महमरा तालाब के पास मछली पकड़ने गए थे। इसी दौरान बाइक सवार दो अज्ञात युवक वहां पहुंचे और उनसे चिलम में गांजा पीने की बात कही। दोनों युवकों द्वारा इनकार किए जाने के बाद वे वहां से चले गए। आरोप है कि कुछ देर बाद दोनों युवक दोबारा लौटे और बंदूक दिखाकर दोनों की कनपटी पर दबाव बनाया तथा चाकू से हमला कर दिया।

    हमले में कमल निषाद के कूल्हे और लोकेश निषाद की जांघ में गंभीर चोट आने की बात पीड़ितों ने बताई है। दोनों का कहना है कि किसी तरह अपनी जान बचाकर वे घटनास्थल से भागे और अंजोरा चौकी पहुंचे, जहां से उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।

    सिर्फ चाकू नहीं, नकदी-मोबाइल और बाइक की चाबी ले जाने का भी आरोप

    पीड़ितों ने आरोप लगाया है कि हमलावर उनके पास मौजूद करीब 1,000 से 1,200 रुपये नकद, मोबाइल फोन और बाइक की चाबी भी ले गए। घटना के बाद से दोनों अज्ञात युवकों की पहचान और तलाश पुलिस के लिए चुनौती बनी हुई है।

    अब सवाल—बंदूक थी या सिर्फ उंगली की नोक?

    मामले में सबसे दिलचस्प और गंभीर सवाल पुलिस के घटनाक्रम के कथन को लेकर सामने आया है। पीड़ित युवकों का दावा है कि उनकी कनपटी पर बंदूक टिकाकर चाकूबाजी की गई। वहीं अंजोरा चौकी प्रभारी से जानकारी लेने पर कथित तौर पर यह बात सामने आई कि युवकों को उंगली की नोक पर चाकू मारा गया।

    यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं कि घटनास्थल पर बंदूक थी या उंगली। असली सवाल यह है कि यदि दो युवकों पर रात के अंधेरे में चाकू से हमला हुआ, तो आखिर इतनी आसानी से अपराधियों का हौसला कैसे बढ़ रहा है?

    छोटी बात पर चाकू, क्या अपराधियों के मन से कानून का डर खत्म हो रहा?

    गांजा पीने से इनकार जैसी मामूली बात के बाद कथित तौर पर चाकू से हमला और फिर नकदी-मोबाइल लेकर फरार होने की बात सामने आना कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल है। ग्रामीण क्षेत्र हो या हाईवे से लगे इलाके—कहीं चाकूबाजी तो कहीं बलवा जैसी घटनाओं की चर्चा अब आम लोगों के बीच चिंता बढ़ा रही है।

    घटना के बाद पुलिस पेट्रोलिंग व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। रात के करीब 3 बजे सुनसान इलाके में दो युवकों के साथ कथित हमला होता है और आरोपी वारदात के बाद फरार हो जाते हैं—ऐसे में पेट्रोलिंग की मौजूदगी और उसकी प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

    कहानी का असली सच जांच से सामने आएगा

    फिलहाल बंदूक के इस्तेमाल, चाकूबाजी, कथित लूट और आरोपियों की पहचान से जुड़े तमाम पहलुओं की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगी। लेकिन घटना ने एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ दिया है—मामला उंगली की नोक का था या बंदूक की नोक का, यह जांच बताएगी; मगर चाकू की नोक पर कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वालों पर पुलिस की नोक कब कसेगी?

    गुंडरदेही*शौर्यपथ 

    ग्राम सरेखा की एक महिला सिकोसा उपस्वास्थ केंद्र स्वास्थ्य कार्यकर्ता पर लापरवाही का गंभीर आरोप लगाया है। महिला का कहना है कि बिना सहमति के दवा देने से गर्भ में ही उसके बच्चे की मौत हो गई।

    पीड़िता निशा ने बताया कि उसे पिछले 10-15 दिनों से प्रसव पीड़ा जैसा दर्द हो रहा था। 11 सितंबर शुक्रवार को परिजनों ने जांच के लिए उपस्वास्थ केंद्र सिकोसा लेकर गयी l

    निशा का आरोप है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ता नाम सरस्वती साहू साहू बताया जारहा है जिसने परिजनों से बिना पूछे ही उसे दवा दे दी और कहा कि 15 मिनट में डिलीवरी हो जाएगी, और गुंडरदेही लेकर जाओगे तो गाड़ी में ही बच्चा आ जाएगा। जिससे परिवार घबरा गया और अस्पताल नहीं जा पाया। करीब 3 घंटे तक तेज दर्द होता रहा। इसके बाद जब परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे तो जांच में डॉक्टरों ने बताया कि अभी प्रसव का समय नहीं है। तीन बार जांच के बाद जब अंतिम बार हार्टबीट चेक किया गया तो पता चला कि बच्चे की गर्भ में ही मृत्यु हो चुकी है।

    पीड़िता ने मीडिया के सामने रोते हुए कहा कि गांव में इस तरह के 7 से 10 मामले पहले भी हो चुके हैं। उसने प्रशासन से जांच और कार्रवाई की मांग की है ताकि भविष्य में किसी अन्य महिला के साथ ऐसी घटना न हो। इस सम्बन्ध मे खंड चिकित्सा अधिकारी सत्येंद्र कुमार मारकंडे ने बताया कि जांच चल रहा है जाँच प्रतिवेदन उच्चअधिकारी को भेज दिया है कार्यवाही की जाएगी

    दल्ली राजहरा में श्रमदान के साथ स्वच्छता अभियान, नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति किया जागरूक

    दल्ली राजहरा। विश्व ओजोन दिवस के अवसर पर दल्ली राजहरा के वार्ड क्रमांक 13 में पर्यावरण संरक्षण एवं स्वच्छता के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से विशेष स्वच्छता एवं जन-जागरूकता अभियान आयोजित किया गया। पर्यावरण प्रेमी प्रदीप साहू के मार्गदर्शन में आयोजित इस अभियान में पर्यावरण प्रेमियों ने श्रमदान कर क्षेत्र की साफ-सफाई की तथा नागरिकों को स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।

    अभियान के दौरान स्थानीय नागरिकों को ओजोन परत के महत्व, उसके संरक्षण तथा पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता के संबंध में जागरूक किया गया। पर्यावरण प्रेमियों ने लोगों से पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने और प्रकृति के संरक्षण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का आह्वान किया।

    छोटे प्रयासों से बढ़ेगी बड़ी पर्यावरणीय जागरूकता

    इस अवसर पर पर्यावरण प्रेमी प्रदीप साहू ने कहा कि आज आवश्यकता केवल बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित करने की नहीं, बल्कि ऐसे छोटे-छोटे जन-जागरूकता अभियानों की है, जिनके माध्यम से लोगों से सीधे संपर्क कर उन्हें पर्यावरण और ओजोन परत के महत्व की जानकारी दी जा सके।

    उन्होंने कहा कि स्वच्छ वातावरण, जिम्मेदार उपभोग और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक को अपनाना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। अनावश्यक ऊर्जा खपत को कम करना, पुराने एसी एवं रेफ्रिजरेटर का जिम्मेदारीपूर्वक निपटान करना, पर्यावरण-अनुकूल उपकरणों को प्राथमिकता देना, पेड़-पौधों की रक्षा करना और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना सामूहिक जिम्मेदारी है।

    उन्होंने कहा कि ओजोन संरक्षण को केवल वैज्ञानिकों या सरकार की जिम्मेदारी मानने के बजाय प्रत्येक नागरिक को इसमें अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

    ‘ओजोन की रक्षा, सुरक्षित भविष्य’ का संकल्प

    अभियान में ओजोन परत को पृथ्वी की प्राकृतिक सुरक्षा ढाल बताते हुए इसके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया गया। पर्यावरण प्रेमियों ने कहा कि ओजोन परत की रक्षा मानव जीवन, प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। उन्होंने लोगों से केवल विश्व ओजोन दिवस के अवसर पर ही नहीं, बल्कि वर्षभर पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयास करने का आह्वान किया।

    इन पर्यावरण प्रेमियों ने किया श्रमदान

    अभियान में प्रदीप साहू, टिकेश्वर साहू, राजकुमार साहू, ताराचन्द रावटे, चेलाराम निर्मलकर, कौशल साहू, लोकेंद्र देवांगन, हेमशंकर, त्रिलोचन यादव एवं झंकार भारद्वाज ने श्रमदान किया।

    हमारा संकल्प

    “ओजोन की रक्षा करेंगे,

    पर्यावरण को स्वच्छ रखेंगे,

    प्रदूषण कम करेंगे,

    पेड़-पौधों की रक्षा करेंगे

    और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित एवं स्वस्थ पृथ्वी छोड़ेंगे।”

    करोड़ों के कामों में बार-बार एक ही समूह की हिस्सेदारी पर उठे सवाल, दूसरे ठेकेदारों की कड़ी जांच तो आरबीएस के कामों पर निगम की खामोशी क्यों?

    दुर्ग। नगर निगम में निर्माण कार्यों को लेकर महापौर अलका बाघमार लगातार सक्रिय नजर आ रही हैं। कहीं सड़क और पेवर ब्लॉक के निर्माण में बेस की जांच हो रही है तो कहीं निर्माण की गुणवत्ता को लेकर ठेकेदारों को डांट-फटकार लगाई जा रही है। लेकिन इसी बीच निगम में काम पाने वाले आरबीएस ग्रुप को लेकर ठेकेदारों और निगम से जुड़े लोगों के बीच कई सवाल चर्चा में हैं।

    चर्चा का मुख्य विषय यह है कि महापौर अलका बाघमार के कार्यकाल में आरबीएस ग्रुप को नगर निगम के निर्माण कार्यों में लगातार काम मिलने की स्थिति क्यों बनी? निगम की निविदा प्रक्रिया ऑनलाइन होने के बावजूद यदि अन्य ठेकेदार दस्तावेजी जांच में अपात्र होते हैं और किसी विशेष समूह को लगातार काम मिलता है, तो इसकी पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक जांच के दायरे में क्यों नहीं लाई जानी चाहिए?

    तीन-चार करोड़ के काम में आधे काम का दावा—क्या है वास्तविकता?

    निगम से जुड़े सूत्रों के हवाले से यह चर्चा सामने आ रही है कि यदि किसी अवधि में लगभग तीन से चार करोड़ रुपये के निर्माण कार्य निकलते हैं तो उनमें बड़ी हिस्सेदारी आरबीएस ग्रुप को मिल रही है। हालांकि इस दावे की वास्तविकता निगम के टेंडर रिकॉर्ड, वर्क ऑर्डर और भुगतान विवरण से ही स्पष्ट हो सकती है।

    यदि आंकड़े इस दावे की पुष्टि करते हैं तो सवाल केवल आरबीएस ग्रुप को काम मिलने का नहीं, बल्कि यह भी होगा कि अन्य वर्षों से निगम में काम कर रहे अनुभवी ठेकेदारों को समान अवसर मिल रहा है या नहीं।

    पोस्टरबाजी और ठेकेदारी का संयोग बना चर्चा का विषय

    महापौर अलका बाघमार के जन्मदिन के दौरान शहर में ठेकेदारों द्वारा लगाए गए बधाई पोस्टरों ने भी निगम की ठेकेदारी व्यवस्था को लेकर चर्चाओं को जन्म दिया। जनप्रतिनिधि को जन्मदिन की शुभकामना देना अपने आप में कोई गलत बात नहीं है, लेकिन यदि उसी अवधि में संबंधित ठेकेदारों को बड़ी संख्या में निगम के काम मिलते हैं तो क्या दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध है?

    इसका जवाब आरोपों या चर्चाओं से नहीं, बल्कि निगम के निविदा रिकॉर्ड और ठेकेदारवार कार्य आवंटन के आंकड़ों से मिल सकता है।

    वार्ड 17-18 की नाली ने खड़ा किया गुणवत्ता का बड़ा सवाल

    सबसे गंभीर सवाल वार्ड क्रमांक 17-18 में हुए नाली निर्माण को लेकर सामने आ रहा है। आरोप है कि निर्माण में सरिया निर्धारित मानक के अनुरूप लगभग 8 इंच की दूरी पर लगाए जाने के बजाय करीब एक फीट की दूरी पर लगाया गया।

    यदि निर्माण स्वीकृत तकनीकी मापदंडों के विपरीत हुआ है तो इसकी तकनीकी जांच होना आवश्यक है। खासकर तब, जब महापौर स्वयं निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की जांच को लेकर सक्रिय दिखाई देती हैं।

    अब सवाल यह है कि क्या इस नाली के निर्माण की तकनीकी जांच, माप पुस्तिका (MB), स्वीकृत ड्राइंग, एस्टीमेट और भुगतान रिकॉर्ड की जांच कराई जाएगी? क्या आवश्यकता पड़ने पर निर्माण को खोलकर वास्तविक स्थिति की जांच होगी?

    दूसरों के काम में सख्ती, आरबीएस के काम में भी वही पैमाना लागू होगा?

    महापौर द्वारा पेवर ब्लॉक के नीचे बेस की जांच करना और निर्माण गुणवत्ता को लेकर ठेकेदारों को जवाबदेह बनाना स्वागत योग्य प्रशासनिक कदम हो सकता है। लेकिन इसी कसौटी को निगम के प्रत्येक ठेकेदार और प्रत्येक निर्माण पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।

    यही वह बिंदु है जहां आरबीएस ग्रुप से जुड़े निर्माण कार्यों को लेकर सवाल खड़ा होता है—क्या निगम प्रशासन आरबीएस के कार्यों की भी उसी कठोरता से जांच करेगा, जिस तरह अन्य ठेकेदारों के कार्यों की जांच की जा रही है?

    कसारीडीह नाला और सुराना कॉलेज का पाथवे भी सवालों में

    दुर्ग शहर में निर्माण कार्यों की संख्या भले ही बढ़ती दिखाई दे रही हो, लेकिन कई पुराने काम अब भी अधूरे हैं। कसारीडीह का नाला लंबे समय से पूर्णता की प्रतीक्षा में है। वहीं वर्ष 2024 में सुराना कॉलेज के सामने पाथवे पार्क का निर्माण जोर-शोर से शुरू हुआ था, लेकिन उसके पूर्ण होने को लेकर भी सवाल बने हुए हैं।

    दूसरी ओर शहर की कई सड़कों पर गड्ढे अब भी नागरिकों के लिए परेशानी का कारण हैं। ऐसे में केवल नए निर्माणों की संख्या नहीं, बल्कि निर्माण की गुणवत्ता, समयसीमा और पूर्णता भी निगम की कार्यप्रणाली का महत्वपूर्ण पैमाना होना चाहिए।

    अब सवाल महापौर से नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता से है

    नगर निगम में ठेकेदारी व्यवस्था पारदर्शी है तो फिर ठेकेदारवार कितने काम मिले, कितनी राशि के मिले, कितने काम पूरे हुए और कितने कार्यों में गुणवत्ता संबंधी शिकायतें आईं—इनका पूरा विवरण सार्वजनिक करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

    यदि आरबीएस ग्रुप को लगातार काम मिलना पूरी तरह निविदा नियमों और तकनीकी पात्रता के आधार पर हुआ है तो दस्तावेज स्वयं सारी चर्चाओं का जवाब दे सकते हैं।

    और यदि किसी निर्माण में वास्तव में तकनीकी मानकों का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित अधिकारी, इंजीनियर और ठेकेदार की जिम्मेदारी तय होना चाहिए।

    जनता का सवाल सीधा है—निगम की जांच व्यवस्था क्या सभी ठेकेदारों के लिए समान है?

    क्या पोस्टर लगाने वाला ठेकेदार हो या पोस्टर से दूरी रखने वाला—दोनों के निर्माण कार्यों की जांच एक ही पैमाने से होगी?

    अब वार्ड 17-18 की नाली से लेकर आरबीएस ग्रुप को मिले कार्यों तक, निष्पक्ष तकनीकी जांच ही तय करेगी कि चर्चाओं में कितना तथ्य है और कितना भ्रम।

    पसरा लगाने वालों पर कार्रवाई, लेकिन अनमोल ज्वेलर्स के कथित अतिक्रमण पर मौन क्यों? — बाजार व्यवस्था को लेकर निगम प्रशासन से जवाब की मांग

      दुर्ग। शहर के सबसे व्यस्त व्यापारिक क्षेत्रों में शामिल इंदिरा मार्केट के एक प्रमुख चौक पर सड़क और आम लोगों के आवागमन के लिए बने बरामदे तक कथित कब्जे ने नगर निगम की बाजार व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर सामने आई तस्वीरों और स्थिति के अनुसार अनमोल ज्वेलर्स द्वारा दुकान के सामने बरामदे के हिस्से में व्यापारिक गतिविधियां संचालित किए जाने के साथ सड़क की ओर बैरियर और वाहन लगाए जाने की बात सामने आई है। यदि आवंटित क्षेत्र से अधिक हिस्से का उपयोग किया जा रहा है, तो इसकी जांच और नियमानुसार कार्रवाई की जिम्मेदारी नगर निगम की है।

    सबसे बड़ा सवाल बाजार विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर है। बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा के कार्यकाल में छोटे व्यापारियों और पसरा लगाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर निगम की सक्रियता दिखाई देती है, लेकिन बड़े और स्थापित व्यापारिक प्रतिष्ठानों द्वारा किए जा रहे कथित अतिक्रमण पर समान कार्रवाई क्यों दिखाई नहीं देती? क्या बाजार विभाग ने इस स्थान का निरीक्षण किया है? क्या संबंधित व्यापारी को नोटिस दिया गया? और यदि दिया गया है तो उसके बाद क्या कार्रवाई हुई?

    ट्रिपल इंजन की सरकार के सुशासन का इम्तिहान

    नगरीय निकाय चुनाव के दौरान प्रदेश में ट्रिपल इंजन की सरकार के माध्यम से सुशासन और बेहतर नगरीय व्यवस्था का दावा किया गया था। ऐसे में इंदिरा मार्केट जैसे प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्र में सड़क और बरामदे के उपयोग को लेकर पैदा हुई स्थिति इन दावों की जमीनी कसौटी बन जाती है।

    जनता का सवाल सीधा है—यदि बरामदा पैदल चलने वालों के लिए है और सड़क सार्वजनिक आवागमन के लिए, तो किसी भी प्रतिष्ठान को इन स्थानों के व्यावसायिक उपयोग की अनुमति किस आधार पर मिल रही है? यदि अनुमति नहीं है, तो कार्रवाई में देरी क्यों?

    अभ्युदय मिश्रा की भूमिका पर भी जवाब जरूरी

    बाजार अधिकारी के रूप में अभ्युदय मिश्रा पर बाजार क्षेत्र की व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि क्या उन्होंने स्वयं मौके का निरीक्षण किया है और क्या इस कथित अतिक्रमण के संबंध में कोई कार्रवाई प्रस्तावित की गई है।

    यदि निगम के रिकॉर्ड में आवंटित क्षेत्र अपेक्षाकृत कम है और मौके पर उससे अधिक क्षेत्र का उपयोग पाया जाता है, तो माप-जांच, दस्तावेजों का सत्यापन और नियमानुसार कार्रवाई ही इस विवाद का तथ्यात्मक समाधान हो सकता है।

    महापौर अलका बाघमार से भी जनहित में सवाल

    दुर्ग नगर निगम की महापौर श्रीमती अलका बाघमार के सामने भी यह मामला व्यवस्था और समान कार्रवाई से जुड़ा प्रश्न है। यदि सड़क और बरामदे पर अतिक्रमण की शिकायत या प्रमाण निगम के संज्ञान में हैं, तो क्या महापौर प्रशासन को बाजार क्षेत्र का विशेष निरीक्षण कराकर सभी अतिक्रमणों पर समान कार्रवाई के निर्देश देंगी?

    साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि क्या इस मामले में महापौर कार्यालय को कोई शिकायत प्राप्त हुई है और यदि हुई है तो उस पर क्या कार्रवाई की गई।

    लेन-देन के आरोप नहीं, जांच से सामने आएगा सच

    अतिक्रमण बने रहने को लेकर स्थानीय स्तर पर तरह-तरह के सवाल और चर्चाएं हो सकती हैं, लेकिन किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि पर लेन-देन अथवा संरक्षण का आरोप बिना प्रमाण तथ्य के रूप में लगाना उचित नहीं होगा। यदि ऐसी कोई शिकायत या प्रमाण है तो उसकी स्वतंत्र जांच ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकती है।

    फिलहाल तस्वीर यह सवाल जरूर खड़ा करती है कि नियम छोटे-बड़े सभी व्यापारियों के लिए समान हैं या नहीं। इंदिरा मार्केट में यदि सार्वजनिक रास्ते और बरामदे का व्यावसायिक उपयोग नियम विरुद्ध पाया जाता है, तो निगम प्रशासन को कार्रवाई का आधार, आवंटन की सीमा और मौके की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।

    अब निगाहें बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा और महापौर अलका बाघमार पर हैं—क्या इंदिरा मार्केट की इस व्यवस्था पर निगम प्रशासन मौके पर जाकर जांच करेगा और नियमों के अनुसार कार्रवाई करेगा?

    ‘डीपी वर्ल्ड नवा रायपुर ओपन-2026’ की ट्रॉफी का अनावरण, 132 प्रोफेशनल गोल्फर ले रहे हिस्सा

    रायपुर । मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ तेजी से देश के प्रमुख स्पोर्ट्स डेस्टिनेशन के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। नवा रायपुर में आयोजित ‘डीपी वर्ल्ड नवा रायपुर ओपन-2026’ आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की नई पहचान बनेगा और प्रदेश को देश-दुनिया के प्रमुख गोल्फ डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    मुख्यमंत्री ने नवा रायपुर स्थित फेयरवे गोल्फ एंड कंट्री क्लब रिजॉर्ट में प्रतियोगिता की ट्रॉफी का अनावरण किया। इस अवसर पर 1983 विश्वकप विजेता भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान एवं पीजीटीआई अध्यक्ष कपिल देव विशेष रूप से उपस्थित रहे। मुख्यमंत्री ने स्वयं गोल्फ खेलकर खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाया।

    प्रतियोगिता में देश-विदेश के 132 प्रोफेशनल गोल्फर, जिनमें 18 विदेशी खिलाड़ी शामिल हैं, हिस्सा ले रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि इतने बड़े स्तर के आयोजन से प्रदेश की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान मजबूत होगी, खेल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय युवाओं को अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से प्रेरणा लेने का अवसर मिलेगा। उन्होंने गोल्फ के विकास के लिए राज्य सरकार की ओर से हरसंभव सहयोग का भरोसा दिलाया।

    खेल अधोसंरचना का हो रहा विस्तार

    मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार खेल प्रतिभाओं को बेहतर प्रशिक्षण, संसाधन और अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। मुख्यमंत्री खेल उत्कर्ष मिशन के माध्यम से प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। ‘खेलो इंडिया’ और ‘फिट इंडिया’ की भावना के अनुरूप प्रदेश में विभिन्न खेलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। बस्तर ओलंपिक, सरगुजा ओलंपिक और नेशनल ट्राइबल गेम्स जैसे आयोजनों ने ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों की प्रतिभाओं को मंच दिया है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर में शांति और विकास के साथ युवाओं को खेलों के माध्यम से आगे बढ़ने के नए अवसर मिल रहे हैं। क्रिकेट, हॉकी, तीरंदाजी और एथलेटिक्स के साथ अब गोल्फ के बड़े आयोजन प्रदेश की खेल यात्रा को नया आयाम दे रहे हैं।

    खिलाड़ियों को बस्तर-सरगुजा आने का न्योता

    मुख्यमंत्री ने देश-विदेश से आए गोल्फ खिलाड़ियों का स्वागत करते हुए उन्हें प्रतियोगिता के साथ बस्तर और सरगुजा की प्राकृतिक सुंदरता एवं जनजातीय संस्कृति देखने का न्योता दिया। उन्होंने कहा कि खिलाड़ी छत्तीसगढ़ से टूर्नामेंट की यादों के साथ यहां के आतिथ्य और प्राकृतिक सौंदर्य की स्मृतियां भी लेकर लौटें।

    हर साल हो गोल्फ टूर्नामेंट : कपिल देव

    पीजीटीआई अध्यक्ष कपिल देव ने आयोजन के लिए मुख्यमंत्री और छत्तीसगढ़ सरकार का आभार जताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन खेल संस्कृति और नई प्रतिभाओं को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने इच्छा जताई कि छत्तीसगढ़ में यह प्रतियोगिता हर वर्ष आयोजित हो और इसकी तारीखें पहले से तय की जाएं, ताकि देश-विदेश के खिलाड़ी अपने कैलेंडर के अनुसार यहां आने की योजना बना सकें।

    उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ का वातावरण गोल्फ के लिए अनुकूल है और आने वाले समय में दिल्ली, बेंगलुरु और कोलकाता की तरह छत्तीसगढ़ भी देश के प्रमुख गोल्फ डेस्टिनेशन के रूप में पहचान बना सकता है।

    पीजीटीआई के सीईओ अमनदीप चहल ने भी छत्तीसगढ़ की व्यवस्थाओं और आतिथ्य की सराहना करते हुए कहा कि यहां आने वाले खिलाड़ी दोबारा खेलने की इच्छा व्यक्त करते हैं। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ अब पर्यटन और अन्य खेलों के साथ उभरते गोल्फ डेस्टिनेशन के रूप में भी पहचान बना रहा है।

    नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने टीम के साथ राज्य की ओर से की भागीदारी

      रायपुर / शौर्यपथ / गुजरात के गांधीनगर में आयोजित 10वें वर्ल्ड सर्कुलर इकोनॉमी फोरम (WCEF 2026) में छत्तीसगढ़ ने अपनी सक्रिय सहभागिता दर्ज कराई। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा के नेतृत्व में राज्य से गई टीम ने फोरम में शामिल होकर सर्कुलर इकोनॉमी, संसाधन दक्षता और कचरे को संसाधन में बदलने के आधुनिक समाधानों पर वैश्विक विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श किया। राज्य शहरी विकास अभिकरण के सीईओ सुमीत अग्रवाल भी प्रतिनिधि मंडल में शामिल हैं।
    राज्य की टीम के प्रमुख श्री बोरा ने कहा कि छत्तीसगढ़ शासन शहरी क्षेत्रों में टिकाऊ अपशिष्ट प्रबंधन, संसाधनों के अधिकतम उपयोग और सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। राज्य का प्रयास है कि नवाचार और आधुनिक तकनीकों के माध्यम से कचरे का बेहतर प्रबंधन करते हुए उसे उपयोगी संसाधन में परिवर्तित किया जाए। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ स्वच्छ, मजबूत और टिकाऊ शहरों के निर्माण को गति मिलेगी तथा विकसित छत्तीसगढ़ की दिशा में राज्य की पहल और मजबूत होगी।
    फोरम में दुनिया के विभिन्न देशों के नीति-निर्माता, उद्योग जगत के विशेषज्ञ, नवाचारी तकनीक विकसित करने वाले संस्थान और क्षेत्र में काम कर रहे विशेषज्ञ एवं प्रतिनिधि शामिल हुए। इसमें सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने, संसाधनों के बेहतर उपयोग, टिकाऊ उत्पादन एवं उपभोग तथा वेस्ट-टू-रिसोर्स जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा हुई।

    राज्य की टीम ने प्रदर्शनी केंद्रों का किया अवलोकन
    छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधिमंडल ने फोरम के दौरान प्रदर्शनी केंद्रों का भी अवलोकन किया। यहां रिसाइक्लिंग, संसाधनों की रिकवरी, कचरे से उपयोगी उत्पाद तैयार करने, टिकाऊ सामग्री तथा सर्कुलर बिजनेस मॉडल से जुड़ी नवीन तकनीकों और समाधानों को प्रदर्शित किया गया था। टीम ने इन तकनीकों और मॉडलों के जरिए कचरे को बोझ के बजाय उपयोगी संसाधन में बदलने की संभावनाओं को समझा।

    छत्तीसगढ़ के शहरी विकास के लिए उपयोगी समाधानों की तलाश
    विश्व सर्कुलर इकोनॉमी फोरम में सहभागिता के दौरान राज्य की टीम को वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जा रही श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों को समझने तथा छत्तीसगढ़ के शहरी विकास और अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र के लिए उपयोगी नवाचारों की संभावनाएं तलाशने का अवसर मिला। इनमें विशेष रूप से संसाधन दक्षता, अपशिष्ट प्रबंधन और वेस्ट-टू-वैल्यू से जुड़े समाधानों पर फोकस रहा।

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