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June 19, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ


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सेहत / शौर्यपथ / आम गर्मियों में लोगों की पहली पसंद है, क्योंकि इसका स्वाद बेहिसाब है। कई लोग गर्मियों में लगभग रोज ही अपने भोजन के साथ आम खाना काफी पसंद करते हैं। आम न सिर्फ खाने में अच्छा लगता है, बल्कि यह स्वास्थ के लिए भी गुणकारी है। डॉ. लक्ष्मीदत्त शुक्ला के अनुसार, आम में भरपूर मात्रा में विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी, पोटैशियम और आयरन होता है। इसके अलावा आम में शर्करा भी प्रचुर मात्रा में होती है, जो शरीर में ऊर्जा को बढ़ाने का काम करती है।

विटामिन की मौजूदगी के कारण आम आंखों के लिए अच्छा होता है। साथ ही आम में फाइबर की मात्रा भरपूर होती है, जिससे पाचनशक्ति मजबूत होती है। आम के सेवन से हृदय की बीमारियां भी नहीं होती हैं। आम खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है। आम में एंटी-ऑक्सीडेंट भी काफी मात्रा में होते हैं, इसलिए आम के नियमित सेवन से कैंसर जैसी घातक बीमारियों से भी बचा जा सकता है। लेकिन आम के नियमित सेवन से वजन भी बढ़ सकता है आइए जानते हैं कैसे -

एक सामान्य आम में होती हैं 150 कैलोरी
बहुत कम लोगों को यह भी पता होगा कि आम भी वजन बढ़ाने के लिए जिम्मेदार होता है। दरअसल इसका मुख्य कारण यह है कि आम में कैलोरी बहुत ज्यादा मात्रा में पाई जाती है। एक सामान्य आकार के आम में 150 कैलोरी होती है, जो वजन आसानी से बढ़ा सकती है।

डाइटिंग करते समय आम से करें परहेज
यदि आप डाइटिंग कर रहे हैं और फलों का सेवन कर रहे हैं तो आम को बिल्कुल ही कम मात्रा में लें। क्योंकि आम में काफी मात्रा में शर्करा होने के कारण इससे आपका वजन कम नहीं होगा। वजन कम करने के लिए लो-कैलोरी वाले फल ही खाएं जैसे गर्मी के समय में तरबूज, संतरा, एवोकेडो और सेब आदि फलों के जूस का सेवन करके अपना वजन कम कर सकते हैं।

आम को ऐसे खाएंगे तो नहीं बढ़ेगा वजन
यदि बिल्कुल ही कम मात्रा में आम खाया जाए तो इससे वजन नहीं बढ़ेगा। लेकिन ज्यादा आम खाने से वजन बढ़ने के साथ-साथ इससे सेहत को भी नुकसान हो सकता है। कई लोगों को गर्मी में भोजन के तुरंत बाद आम खाने की आदत होती है, जो कि गलत है। इसके अलावा आम रस शक्कर मिलाकर पीने से बचना चाहिए। चूसने वाले आम को ज्यादा खाना चाहिए क्योंकि इनका टेस्ट खट्टा मीठा होता है और शुगर भी ज्यादा नहीं होती है।

इन बातों की भी रखें सावधानी
आम खाते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जो आम आप खा रहे हैं वे किस तरह से पकाए गए हैं। इन दिनों बाजार में कार्बेट द्वारा पकाए गए फल ज्यादा मिलते हैं। कार्बेट एक तरह का रसायन होता है, जिसमें फल पकाने पर इसका दुष्प्रभाव शरीर पर भी हो सकता है। अन्य फल खरीदते समय इस बात का जरूर ध्यान रखें कि वे फल रसायनों के जरिए न पकाए गए हों। डॉ. लक्ष्मीदत्ता शुक्ला के अनुसार, आम के साथ ही इसके पत्ते भी बहुत फायदेमंद हैं। पत्तों से डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल, खांसी, किडनी स्टोन जैसी बीमारियों का इलाज किया जाता है।

खाना खजाना / शौर्यपथ / आलू मेथी हो या आलू बैंगन की सब्जी, भारत में खाना बनाते समय अधिकतर सब्जियों में आलू का इस्तेमाल किया जाता है। सब्जी में आलू डालते ही उसका स्वाद दोगुना बढ़ जाता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को आलू खाना बेहद पसंद होता है। तो देर किस बात की इस लॉकडाउन घर बैठे सीखिए ये कश्मीर डिश, कश्मीरी दम आलू । आइए जानते हैं क्या है कश्मीरी दम आलू बनाने का सही तरीका।

कश्मीरी दम आलू के लिए सामग्री-
-8-10 बेबी आलू
-2 टेबलस्पून सरसों का तेल
-1 चम्मच कश्मीरी लाल मिर्च
-1/2 टीस्पून अदरक पाउडर
-1 टी स्पून गरम मसाला
-3-4 करी पत्ता
-2 दालचीनी
-1 चम्मच जीरा पाउडर
-1 काली इलायची
-1 चम्मच सौंफ पाउडर
-1 टी स्पून मेथी पत्तियां
-कप पानी
नमक स्वादानुसार

बनाने की विधि-
कश्मीरी दम आलू बनाने के लिए सबसे पहले बेबी पोटैटो में चाकू या काटे की मदद से छोटे-छोटे छेद करके उबाल लें। अब एक पैन में तेल गर्म करके उसमें उबले हुए आलू को 10-15 मिनट के लिए बाहर से कुरकुरा होने तक फ्राई कर लें। अब एक दूसरा पैन लेकर उसमें सरसों का तेल डालें। तेल में काली इलायची, दालचीनी और तेज पत्ता डालें। अब पैन में कश्मीरी मिर्च पाउडर और थोड़ा सा पानी डाल दें। इस ग्रेवी में नमक मिलाते हुए तले हुए आलू डालकर उन्हें अच्छे से मिला लें। स्वाद के लिए इस ग्रेवी में अदरक पाउडर, गरम मसाला, जीरा पाउडर, सौंफ पाउडर और मेथी के पत्ते भी डालें। अब इस ग्रेवी को गाढ़ा होने तक पकाएं। कश्मीरी दम आलू बनकर तैयार हैं। इन्हें रोटी या परांठों किसी के भी साथ सर्व किया जा सकता है।

 

शौर्यपथ / सामुद्रिक शास्त्र में व्‍यक्‍ति के कानों के प्रकार के बारे में विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके अनुसार मनुष्य के कान अनेक प्रकार के होते हैं। इनमें छोटे कान, अत्यधिक छोटे कान, लंबे कान, चौड़े कान, गजकर्ण कान यानी हाथी जैसे कान, बंदर जैसे कान, मोटे कान, पतले कान, अव्यवस्थित कान आदि।

छोटे कान: सामुद्रिक शास्त्र में छोटे कान के व्यक्तियों को कंजूस की श्रेणी में रखा गया है। ऐसे व्यक्ति धन पकड़कर रखना जानते हैं। स्वयं की जरुरतों पर भी खर्च करने से तब तक बचते हैं जब तक कि अत्यंत जरुरी ही ना हो जाए। ऐसे व्यक्तियों का सामाजिक जीवन कमजोर होता है। इनकी कोई पूछ-परख भी नहीं करता है और ये हर व्यक्ति, हर काम को एक प्रकार की संदेहभरी दृष्टि से देखते हैं। हालांकि कई मामलों में ये भरोसेमंद होते हैं।

अत्यधिक छोटे कान : अत्यधिक छोटे कान के व्यक्ति धार्मिक प्रवृत्ति के माने जाते हैं। धार्मिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, लेकिन इसके विपरीत ये लोग धार्मिक कार्यों से ही मोटी रकम बनाते हैं। ये लालची किस्म के होते हैं और किसी को धोखा बड़ी चतुराई से दे सकते हैं। इनका चंचल स्वभाव इन्हें कई बार बड़ी मुसीबतों में डाल देता है।

लंबे कान : लंबे कान परिश्रम के सूचक हैं। जिन व्यक्तियों के कान लंबे होते हैं वे परिश्रमी तथा कर्मठ होते हैं। ये कभी किसी काम में पीछे नहीं हटते और जो काम हाथ में लेते हैं, उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं, चाहे उसमें कितनी ही कठिनाइयां आएं। लंबे कान बुद्धिमान व्यक्तियों के होते हैं। ऐसे व्यक्ति किसी भी बात का गहराई से अध्ययन करने के बाद ही अपनी प्रतिक्रिया देते हैं।

चौड़े कान: जिन व्यक्तियों के कान की चौड़ाई उनकी लंबाई की अपेक्षा ज्यादा होती है, वे चौड़े कान कहलाते हैं। ऐसे व्यक्ति भाग्यशाली कहे गए हैं। ये अपनी मेहनत और लगन से जीवन में सभी प्रकार की सुख-सुविधाएं प्राप्त करते हैं। ये लोग हाथ आए किसी भी ऐसे मौके को जाने नहीं देते, जो इनके लिए लाभदायक होता हो। चौड़े कान सफलता के सूचक हैं।

मोटे कान : मोटे कान के व्यक्ति साहसी और सफल नेतृत्वकर्ता होते हैं। ऐसे व्यक्ति मोटिवेशनल स्पीकर, राजनेता या लेखक होते हैं। हालांकि इनका स्वभाव थोड़ा चिड़चिड़ा किस्म का होता है। अगर इन्हें कान के कच्चे होते हैं। ये किसी भी काम को उत्साह के साथ शुरू करते हैं।

गज कर्ण: हाथी के समान बड़े कान शुभता का प्रतीक हैं। हाथी के समान बड़े कान शुभता का सूचक हैं। ऐसे व्यक्ति अपने कार्य में सफल और दीर्घायु होते हैं। ऐसे व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा हासिल करते हैं। ये अच्छे वक्ता के साथ अच्छे श्रोता भी होते हैं। पूरी बात को अच्छे से सुनने के बाद ही अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। बड़े अधिकारियों के ऐसे कान होते हैं।

बंदर जैसे कान : बंदर जैसे कान वाले व्यक्ति लालची किस्म के होते हैं। इनकी निगाह हमेशा दूसरों के धन और वस्तुओं पर लगी रहती है। ये अत्यंत कामी और क्रोधी भी होते हैं। इनकी बात पूरी नहीं होती है तो ये क्रोधित हो जाते हैं और मारपीट पर उतारु हो जाते हैं।

खेल / शौर्यपथ / खेल के मैदान में अपने आक्रामक व्यवहार के लिए कई बार मुसीबत का सामना करने वाले दक्षिण अफ्रीका के तेज गेंदबाज कगिसो रबाडा ने कहा कि वह जल्दी गुस्से में नहीं आते, लेकिन गेंदबाज के तौर पर जुनून के कारण वह इस तरह से पेश आते है। इस साल इंग्लैंड के खिलाफ घरेलू टेस्ट सीरीज के आखिरी मैच से 25 साल के इस गेंदबाज को निलंबित (पिछले 24 महीने में चार डिमैरिट अंक होने पर) कर दिया गया था। वह सीरीज के तीसरे मैच में जो रूट का विकेट चटकाने के बाद जश्न मनाते हुए इंग्लैंड के इस कप्तान के काफी करीब पहुंच गए थे।

रबाडा ने इंडियन प्रीमियर लीग की अपनी टीम दिल्ली कैपिटल्स के साथ इंस्टाग्राम चैट में कहा, ''बहुत से लोगों को लगता है कि मैं जल्दी आपा खो देता हूं। मुझे हालांकि ऐसा नहीं लगता, यह सिर्फ जुनून के कारण होता है। इसके अलावा अगर आप छींटाकशी को देखते हैं तो यह खेल का हिस्सा है। हर तेज गेंदबाज ऐसा करता है।''


उन्होंने कहा, ''कोई भी तेज गेंदबाज बल्लेबाज से (खेल के दौरान) अच्छा व्यवहार नहीं करेगा। इसका मतलब यह नहीं है कि आप निजी या परिवार को लेकर टिप्पणी करे।'' रबाडा के निलंबन के बाद दक्षिण अफ्रीका ने उस मैच को गंवा दिया था और इंग्लैंड ने 3-1 से सीरीज अपने नाम की।

इस तेज गेंदबाज को दो डिमैरिट अंक ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 2018 टेस्ट में मिले थे । इसके बाद उन्होंने भारत के सलामी बल्लेबाज शिखर धवन को आउट करने के बाद अपशब्द कहे थे। रबाडा ने कहा, ''आप विकेट का जश्न मनाते हैं, लेकिन मैच के बाद उस खिलाड़ी से हाथ भी मिलाते है और उसके कौशल का सम्मान करते है। ज्यादातर मौके पर मैं उस आक्रामक नहीं होता हूं लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट हर खिलाड़ी अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहता है।''

दक्षिण अफ्रीका के इस मुख्य गेंदबाज ने कहा, ''कभी-कभी आपकी भावना आपको इसके लिए उकसाती है। मुझे लगता है ऐसे समय में मैं काफी खतरनाक रहता हूं, क्योंकि मैं सोचना छोड़ देता हूं और सब कुछ खुद ब खुद होने लगता है।''

 

मनोरानाजं / शौर्यपथ / भाभी जी घर पर हैं कि अंगूरी भाभी यानी कि शुभांगी अत्रे को लेकर पिछले कुछ दिनों से खबरें आ रही हैं कि वह बिग बॉस में आने वाली हैं। हालांकि अब शुभांगी ने इन खबरों पर अपना रिएक्शन दिया है। दरअसल, शुभांगी ने आज तक से बात करते हुए कहा, 'हां यह बात सच है कि मुझे बिग बॉस 14 के लिए कॉल आया था, लेकिन मैं अभी भाभीजी घर पर हैं कर रही हूं और मेरे लिए अभी यह शो बहुत ही महत्वपूर्ण है। तो इस वजह से मैं बिग बॉस तो बिल्कुल नहीं जा सकती'।

शो को लेकर शुभांगी ने कहा, 'बिग बॉस वैसे भी मेरे लिए नहीं है क्योंकि लोगों को शो का जैसा कंटेस्टेंट पसंद है, वैसे मैं उन्हें नहीं दे पाऊंगी। हां, हो सकता है कि फ्यूचर में अगर मेरा मन बदल जाए तो मैं शो का हिस्सा नहीं बनूं'।

बता दें कि हाल ही में अंगूरी ने अपना टिकटॉक अकाउंट डिलीट किया है। इस ऐप को डिलीट करते हुए शुभांगी ने कहा था कि कि मैंने टिकटॉक इसलिए छोड़ा क्योंकि मैं लोकल बिजनेस को सपोर्ट करना चाहती हूं। मैं नहीं चाहती कि बाहर के ऐप्स हमारे देश की अर्थ व्यवस्था पर बुरा प्रभाव डालें।


शुभांगी आगे कहती हैं कि यह सच है कि टिकटॉक एक पॉपुलर मीडियम है और इसका इस्तेमाल आगे भविष्य में प्रमोशनल एक्टिविटी के लिए किया जा सकता है। लेकिन मैं अपने निर्णय पर अटल रहूंगी और इस ऐप का इस्तेमाल नहीं करूंगी। कई मीडियम हैं जो लोकल हैं, मैं अब उन्हें इस्तेमाल करूंगी। उम्मीद करती हूं कि बाकी लोग भी इसे डिलीट कर लोकल प्लैटफॉर्म्स का ज्यादा इस्तेमाल करेंगे।

मनोरंजन / शौर्यपथ / टीवी शो 'नागिन 5' की अनाउंसमेंट हुई है तभी से शो के लीड एक्टर्स को लेकर काफी खबरें आ रही हैं। अब तक इस शो के लिए कई एक्टर्स के नाम सामने आ चुके हैं। अभी हाल ही में खबर आई थी कि शो में लीड एक्टर के तौर पर आसिम रियाज को लिया जा रहा है। लेकिन हाल ही में जब आसिम से इन खबरों के बारे में पूछा तो उन्होंने इन बातों को सिर्फ अफवाह बताया।

आज तक से बात करते हुए आसिम ने कहा, 'इन खबरों में कोई सच्चाई नहीं है। ये सब सिर्फ अफवाह है। मैंने इस शो को अभी तक साइन नहीं किया है'।

बता दें कि इससे पहले नागिन के लिए दीपिका कक्कड़ और महक चहल का नाम भी सामने आ चुका है।

एकता ने की थी नागिन 5 की अनाउंसमेंट

एकता ने हाल ही में अपना वीडियो शेयर कर कहा था, 'मुझसे बार-बार पूछा जा रहा है कि क्या नागिन 4 खत्म हो रहा है या नागिन 5 शुरू हो रहा है। तो मैं आपको बता दूं कि हम नागिन 4 को खत्म कर रहे हैं और तुरंत नागिन 5 की शूटिंग शुरू कर देंगे। नागिन के चौथे सीजन पर मै फोकस नहीं कर पाई थी, लेकिन अब अगले सीजन में हम अच्छा करेंगे और वो सभी को पसंद आएगा।'

एकता ने कहा था, 'एक्टर्स की बात करें तो आपको बता दूं कि निया शर्मा, अनीता, विजेंद्र जैसे सभी स्टार्स ने अच्छा काम किया है। आप लोगों ने बहुत अच्छा काम किया। मैं इन एक्टर्स के साथ कुछ नया लेकर आने वाली हूं।'

एकता ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा था, 'क्या तुम मेरे नागिनटाइन बनोगे? रही बात रश्मि देसाई की तो उनका स्पेशल अपीयरेंस था। उन्होंने 2 एपिसोड में शानदार काम किया था।'

 

मेरी कहानी /शौर्यपथ /चूंकि गंदगी करना दुनिया का सबसे खराब काम है, इसलिए सफाई करना श्रेष्ठतम। फिर भी दुनियादारी का ऐसा उल्टा विधान है कि गंदगी करने वाला अमीर होता है और सफाई करने वाला गरीब। वह लड़का भी गरीब था और बर्तन धोने का काम करता था। मन भले बहुत न जमा हो, पर धोने में हाथ जम गया था। ढूंढ़ता रहता था, कहीं और धोने की कोई अच्छी नौकरी मिल जाए, तो जेब में दो डॉलर और डलें। एकाध पीढ़ी पहले गुलाम रहे परिवार के इस लड़के की पढ़ाई-लिखाई तो लगभग शुरू होते ही छूट गई थी। संसाधनों से वंचित और आकार में विशाल उसके परिवार में न तो पढऩे का माहौल था और न शिक्षा पर भरोसा। किशोर होते ही लड़के मजदूरी के लिए निकल लेते थे। उस लड़के के साथ भी यही हुआ। एक-एक अक्षर छू-छूकर बमुश्किल पढ़ पाता था, लेकिन अखबार में बर्तन धोने वालों के लिए निकली नौकरियों वाले कॉलम को जरूर देखता था। उस दिन भी उसने कॉलम देखा और निराश हो गया, कुछ भी रुचिकर नहीं था। उसने अखबार को हवा में उछाला और अचानक उसकी नजर एक विज्ञापन पर जा लगी, वहां लिखा था - एक्टर्स वांटेड। उसने अखबार को सुलझाकर थामा, किसी नाटक मंडली को अभिनेताओं की जरूरत है। ऑडिशन चल रहा है। लड़के ने गौर किया, ऑडिशन वाली जगह दूर नहीं थी, तो चलो परख लें किस्मत। एक बार कोशिश करने में क्या बुरा है? और वह ऑडिशन के लिए सही समय पर पहुंच गया। नीग्रो नाटक मंडली थी। ऑडिशन की बारी आई, तो निर्देशक ने उस लड़के के हाथों में एक किताब देकर कहा, 'लो, यह पढ़कर सुना दोÓ।
हाथ में किताब क्या आई, मुसीबत ले आई। एक तो टो-टो कर पढऩा और ऊपर से अंग्रेजी शब्दों का बहामियन उच्चारण। बार-बार कोशिश करते हुए भी बंटाधार हो गया। हाथों से किताब छिन गई, मानो खुशकिस्मती लुट गई। निर्देशक ऐसा भड़का कि उस दुबले-पतले 16-17 साल के लड़के को दरवाजे की ओर धकिया दिया। दुखी लड़के ने पलटकर देखा और फिर सरेआम फटकार का सिलसिला चला, 'दफा हो जाओ यहां से, दूसरों का समय बरबाद करने आए हो? बाहर निकलो, जाओ कुछ और करो, बर्तन धोना या वैसा ही कोई काम पकड़ लो। तुम पढ़ नहीं सकते, तुम बोल नहीं सकते, तुम एक्टर नहीं बन सकते।Ó
लड़के ने अभी पीठ भी नहीं दिखाई थी कि दरवाजा बंद हो गया। अपमान का कोई एक घूंट हो, तो पचा लिया जाए, लेकिन यहां तो सामने जहर का जखीरा ही उलट दिया गया। निर्देशक की बातें दिल पर जा लगीं। गरीब थे, गुलामों का खानदान था, लेकिन कभी किसी ने इतनी बुरी तरह दुत्कारा नहीं था। कला की दुनिया में ऐसी बेरहमी? मैं पढ़-बोल नहीं सकता, मैं एक्टर नहीं बन सकता, यहां तक तो फिर भी ठीक है, लेकिन उस निर्देशक ने यह कैसे कह दिया कि मुझे बर्तन धोने का काम करना चाहिए? मैंने तो वहां बताया भी नहीं था कि मैं यही काम करता हूं। क्या मेरा चेहरा बोल रहा है कि मैं बर्तन धोने वाला हूं? सच है, मैं बर्तन धोता हूं, तो क्या एक्टर नहीं बन सकता?
ऐसा लगा कि यह सवाल आसपास की हवा, पौधे, पेड़, सड़क, घर, भवन, सब पूछने लगे हैं। यह सवाल लड़के के अंदर भी गूंजने लगा और तभी दुनिया में एक महान अभिनेता सिडनी पोइटियर (जन्म 1927) का विकास शुरू हुआ। उस दिन ऑडिशन देकर सिडनी वापस बर्तन धोने पहुंच गए थे। अब जब-जब बर्तन चमकाते, उनका संकल्प भी निखर-उभर आता, एक्टर बनके दिखाना है। सिडनी ने तय कर लिया कि पहले अपनी कमियों को दूर करना है।
फिर स्कूल जाने का सवाल ही नहीं उठता था और न कहीं विधिवत अभिनय सीखना मुमकिन था। जो करना था, खुद करना था। न पैसा, न मौका, न सुविधा। वह जहां बर्तन धोते थे, वहीं एक उम्रदराज वेटर से पढऩा सीखने लगे। काम खत्म करके रोज अखबार पढऩे का अभ्यास तेज हुआ। अपने बहामियन उच्चारण से अलग शुद्ध अमेरिकी उच्चारण की कोशिशें रंग लाने लगीं। सही से पढऩा और अच्छे से बोलना सीखने में बस पांच महीने लगे। छठे महीने में उसी नाटक मंडली में न सिर्फ ऑडिशन कामयाब रहा, बल्कि अगले नाटक में मुख्य भूमिका भी नसीब हुई। नाटक करते-करते फिल्में मिलने लगीं, दुनिया एक्टर के रूप में पहचानने लगी। फिर वह समय भी आया, जब अभिनय की दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान ऑस्कर उनकी झोली में आया। 1963 में लिलिज ऑफ द फिल्ड के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर हासिल हुआ। वह यह सम्मान पाने वाले दुनिया के पहले अश्वेत अभिनेता हैं। सिडनी अक्सर अपमान के उस लम्हे को याद करते हैं और यह भी मानते हैं कि वह न होता, तो यह मुकाम भी न होता।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय सिडनी पोइटियर प्रसिद्ध अभिनेता, फिल्मकार

 

     जीना इसी का नाम है /शौर्यपथ / वह जिस देश और समाज से आती हैं, वहां बेटे और बेटियों में भले कभी फर्क रहा हो, मगर आज वह दुनिया के सबसे तरक्कीपसंद समाजों में से एक है। अमेरिका की न्यू जर्सी प्रांत में पैदा मैरी रॉबिन्सन की परवरिश एक खुले माहौल में हुई। अपने पापा की बेहद दुलारी रहीं मैरी। उनका परिवार एक अच्छी और खुशहाल जिंदगी जी रहा था। मगर जिंदगी तो सबका इम्तिहान लेती है, सो मैरी के लिए भी उसने कुछ आजमाइशें तय कर रखी थीं।
आज से करीब 46 साल पहले की बात है। तब मैरी की उम्र सिर्फ 14 साल थी। एक रोज उन्हें पता चला कि पिता कैंसर के आखिरी स्टेज पर हैं। और मैरी कुछ समझ पातीं, इसके पहले ही पिता चल बसे। उनके जनाजे में पूरे रास्ते मैरी अपने भाई को पकडे़ खामोश चलती रहीं। उन्हें यह यकीन ही नहीं हो पा रहा था कि डैड अब कभी उनसे बातें नहीं कर सकेंगे। मैरी को गहरा मानसिक आघात लगा था, लेकिन कोई भी उनकी और उनके भाई की जहनी कैफीयत को समझने वाला नहीं था।
मैरी खुद में सिमटती चली गईं। उन्होंने दोस्तों के साथ बाहर खेलने जाना बंद कर दिया, पढ़ाई से भी मन उचट गया, जाहिर है, उनके ग्रेड गिरने लगे थे, वह बात-बात पर झल्ला उठती थीं। मैरी के भाई के व्यवहार में भी काफी बदलाव आ गया था। उन दोनों को उस वक्त किसी ऐसे परिजन या बडे़ स्नेही की जरूरत थी, जो उनके मर्म को छू पाता।इसके उलट उन्हें बिगडे़ बच्चे के रूप में देखा जाने लगा। मैरी कहती हैं, ‘मैं बुरी नहीं, उदास बच्ची थी।’
करीब छह वर्षों तक अपनी पीड़़ा और उदासी से मैरी रॉबिन्सन अकेले ही जूझती रहीं। फिर वह दुखी और अनाथ बच्चों की सहायता करने वाले एक समूह से बतौर वॉलंटियर जुड़ गईं। वहां बच्चों की मदद करके मैरी को काफी सुकून मिलता। फिर उन्होंने एक बड़ा फैसला किया और करीब दो दशक पहले अपनी नौकरी छोड़ दी, ताकि वह गमगीन बच्चों को अपना पूरा वक्त दे सकें। मैरी यह अच्छी तरह जान चुकी थीं कि जब किसी मासूम के मां-बाप, भाई-बहन में से किसी की मौत हो जाती है, तो उसे कितना गहरा सदमा पहुंचता है, इसलिए वह नहीं चाहती थीं कि कोई बच्चा या किशोर-किशोरी वर्षों तक शोक की हालत में रहे।
एक अध्ययन के मुताबिक, अमेरिका में लगभग पचास लाख बच्चे 18 साल से पहले अपने माता-पिता, भाई-बहन में से किसी न किसी प्रियजन को खो देते हैं। और ऐसे बच्चों के अवसाद-ग्रस्त होने, अपना आत्म-विश्वास खो देने या पढ़ाई में पिछड़ जाने का जोखिम सबसे ज्यादा होता है। इन्हीं सबको देखते हुए साल 2011 में मैरी ने एक गैर-लाभकारी संगठन ‘इमैजिंग, अ सेंटर फॉर कोपिंग विद लॉस’ की नींव रखी। इसके जरिए वह किसी अजीज परिजन की मौत के गम से डूबे बच्चों की सहायता करने में जुट गईं।
बच्चों की मदद करने का मैरी का तरीका काफी अनूठा है। इसकी शुरुआत वह एक पिज्जा पार्टी से करती हैं। इससे सबको आपस में घुलने-मिलने का मौका मिलता है और फिर बच्चों के परिवार के सदस्य और संस्था के वॉलंटियर एक घेरा बनाते हैं और एक ‘टॉकिंग स्टिक’ आपस में पास करते हैं। फिर जिसकी बारी आती है, वह अपनी दास्तान सुनाता है कि उसने अपने किस अजीज परिवारी-जन को खोया है। मैरी का मानना है कि शोक से बाहर निकालने में उस व्यक्ति का जिक्र बहुत अहम रोल निभाता है, जो हमसे हमेशा के लिए बिछड़ा है।
बच्चों को लगता है कि हरेक व्यक्ति ने अपने किसी न किसी प्रिय जन को खोया है और यही एहसास असरकारी दवा का काम करता है। मैरी के मुताबिक, हरेक बच्चा, बल्कि किशोर भी, अपने दिवंगत प्रिय के किसी चुटीले वाकये या उनकी जिंदगी की किसी यादगार घटना के बारे में बार-बार सुनना चाहता है। कभी उसकी आंखों से, तो कभी गहरी सांसों के साथ भीतर की पीड़ा पिघलकर बाहर आ जाती है। उम्र के हिसाब से शोकाकुल बच्चों को अलग-अलग समूहों में बांटा जाता है। संगठन के स्वयंसेवी उन्हें मेमोरी बॉक्स जैसी गतिविधियों के जरिए अपनी भावनाएं साझा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। बच्चे मानो ज्वालामुखी की तरह अपने भीतर के सारे दुख, आक्रोश को बाहर फेंककर शांत हो जाते हैं। मैरी कहती हैं, ‘शोक तो जिंदगी का अटूट हिस्सा है, मगर हमारे बच्चों को कोई नहीं बताता कि वे इससे कैसे उबरें?
इमैजिंग में आने वाले बच्चे जब अपनी मानसिक वेदना से मुक्त होकर अपने दिवंगत परिजन को याद करते हैं, तो मैरी को लगता है कि उनके पिता जहां भी होंगे, जरूर खुश होंगे कि उनकी बेटी ने कुछ अच्छा किया है। उन्होंने अब तक सैकड़ों मासूमों को गहरे शोक से उबारा है। इतना ही नहीं, मैरी अब घूम-घूमकर देश-दुनिया के स्कूलों में शिक्षकों को प्रशिक्षण देती हैं कि शोकाकुल बच्चों के प्रति उनका आचरण कैसा होना चाहिए। इस नेक काम के लिए सीएनएन ने मैरी रॉबिन्सन को पिछले साल ‘हीरो ऑफ द ईयर’ के लिए नामित किया था।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह मैरी रॉबिन्सन अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता

 

नजरिया /शौर्यपथ / सभ्य समाज में सार्वजनिक स्थानों पर थूकने को कभी अच्छा नहीं माना गया है, लेकिन खेलों में खिलाड़ियों का थूकना आम बात है। फुटबॉल और बेसबॉल खिलाड़ियों को थूकते देखना बहुत आम है, लेकिन कोरोना संक्रमण थूक के छींटे के माध्यम से भी होता है, तो खेल जगत खिलाड़ियों की इस आदत से दहला हुआ है। फुटबॉल और क्रिकेट में खिलाड़ियों के मैदान में थूकने पर एकदम से रोक लगाने पर आजकल बहस चल रही है।
पिछले दिनों रोमानिया फुटबॉल फेडरेशन ने सुझाव दिया कि कोई भी खिलाड़ी मैदान में थूकता पाया जाए, तो उस पर छह से 12 मैचों का प्रतिबंध लगा दिया जाए। इसके अलावा कुछ लोग मैदान में थूकने वाले खिलाड़ी को येलो कार्ड दिखाकर बुक करने का सुझाव दे रहे हैं। इनका मानना है कि बिना सजा इस समस्या से निजात पाना संभव नहीं है। लेकिन विश्व फुटबॉल की संचालक संस्था फीफा को लगता है कि मैच का संचालन करने वाले अधिकारियों के लिए यह पता लगाना संभव नहीं होगा कि कौन खिलाड़ी कब थूक रहा है। इसलिए फीफा रेफरी कमेटी के चेयरमैन कोलिना का कहना है कि लीग या टूर्नामेंट के आयोजक मसविदा बनाएं और थूकने वाले खिलाड़ियों पर मैच के बाद हिसाब से कार्रवाई की जाए। कोलिना कहते हैं कि मैदान में थूकने वाले खिलाड़ी को येलो कार्ड दिखाना थोड़ा अव्यावहारिक भी होगा, क्योंकि एक तो मैच के संचालक के लिए हर घटना पर निगाह रखना संभव नहीं होगा और कुछ पर कार्रवाई करना उनके साथ अन्याय हो जाएगा। फुटबॉल में किसी खिलाड़ी का दूसरे खिलाड़ी पर थूकना रेड कार्ड वाला अपराध है और सामान्य तौर पर थूकने वाले के प्रति इतनी कठोर कार्रवाई उचित नहीं लगती।
क्रिकेट में तेज गेंदबाज गेंद चमकाने के लिए लार का प्रयोग करते हैं। लार से संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है। तेज गेंदबाज गेंद के एक हिस्से को चमकाकर गेंद का संतुलन बिगाड़ देते हैं, जिससे गेंद स्विंग होने लगती है। आईसीसी की क्रिकेट समिति ने फिलहाल गेंद पर लार के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है, लेकिन उसने तेज गेंदबाजों के मैदान पर थूकने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है। आने वाले दिनों में मैदान पर थूकने पर भी पाबंदी की मांग उठ सकती है। समिति के प्रमुख अनिल कुंबले का कहना है कि गेंद पर लार का इस्तेमाल नहीं करना अंतरिम व्यवस्था है, कोरोना की समस्या खत्म होने पर यह प्रतिबंध खत्म हो सकता है।
अब सवाल यह है कि खिलाड़ी मैदान में थूकते क्यों हैं? तमाम अध्ययनों के अनुसार, ज्यादा कसरत या मेहनत करने पर लार में प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है। खासतौर से म्यूकस की मात्रा बढ़ने से थूक गाढ़ा हो जाता है, जिसे निगलना मुश्किल होता है। ऐसे में, सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और थूकने से ही स्थिति सामान्य होती है। क्रिकेट में खिलाड़ियों को लगातार नहीं दौड़ना पड़ता, इसलिए थूकने की समस्या कम होती है। इसमें आमतौर पर तेज गेंदबाज लंबे रनअप की वजह से थूकते मिल जाते हैं। टेनिस खिलाड़ी ब्रेक के समय ड्रिंक के कारण थूकने की समस्या से बचे रहते हैं। थूकने की मजबूरी फुटबॉल में ज्यादा है।
क्या फुटबॉलरों के थूकने पर रोक लगने से उनके खेल पर गलत प्रभाव तो नहीं पड़ेगा? शायद मैच के दौरान खिलाड़ियों का गला तर रखने की व्यवस्था करनी पडे़गी। इसके अलावा खिलाड़ियों को मैदान पर मिलकर जश्न मनाने से बचने की सलाह दी गई है। अक्सर खिलाड़ी खुशी में एक-दूसरे पर कूद पड़ते हैं। मैचों में आमतौर पर दोनों टीमों के कप्तान सद्भाव के तौर पर एक-दूसरे से जर्सी बदलते हैं, इस पर भी रोक लगा दी गई है।
ऐसी समस्याएं अनेक खेलों में आएंगी। खिलाड़ियों द्वारा मिलकर घेरा बनाना बंद हो जाएगा। टेनिस में तो अपनी गेंदें और तौलिया लाने की शुरुआत की जा रही है। सवाल यह है कि इतना सब होने के बाद भी क्या खेलों में पहले जैसा लुत्फ बना रहेगा? पिछले दिनों शुरू हुई जर्मन फुटबॉल लीग के मैच बिना दर्शक खेले जा रहे हैं। इसी तरह इंग्लिश प्रीमियर लीग की भी शुरुआत होने जा रही है। जुलाई में इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज के बीच क्रिकेट सीरीज भी बिना दर्शक खेली जानी है। इन हालात में दर्शकों का खेलों के प्रति कितना लगाव बना रहता है, यह भी शायद कोरोना से ही तय होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) मनोज चतुर्वेदी, वरिष्ठ खेल पत्रकार

 

 

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / केरल में एक हथिनी की जिस तरह दर्दनाक मौत हुई है, उससे न केवल कानून-व्यवस्था, बल्कि मानवीयता पर भी सवाल खडे़ हो गए हैं। अब जब भारी विरोध और आलोचना के बाद इस मौत या हत्या के दोषियों की गिरफ्तारी शुरू हो गई है, तब हमें पशु क्रूरता निवारण की दिशा में हर पहल का स्वागत करना चाहिए। गांधीजी ने स्पष्ट इशारा किया था कि आपकी सभ्यता की परख इस बात से होगी कि आप अपने पशुओं के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। लेकिन पता यह लगा है कि फल में छिपाकर पशुओं को बारूद या पटाखे खिला देना नई बात नहीं है। चुपचाप न जाने कितने पशु मार दिए गए होंगे। वह गर्भवती हथिनी भी बारूद वाला अनानास खाकर वहीं मारी जाती, तो यह खबर देश-दुनिया में सुर्खियां नहीं बनती, शायद अब तक ऐसा ही होता आया होगा। पर वर्षों से चल रहे इस अत्याचार का घड़ा शायद भर गया था। निर्दोष बेजुबानों की पीड़ा तब दूर तलक गई, जब उस बुरी तरह घायल हथिनी ने तीन दिन पानी में खड़े होकर लगभग सत्याग्रह या विलाप किया। हथिनी अकेली नहीं थी, उसके पेट में शिशु था। यह एक ऐसा घटनाक्रम है, जो दशकों तक याद रखा जाएगा और संवेदनशील लोगों को रुलाता रहेगा। आम तौर पर घायल होने के बाद जानवर आक्रामक हो जाते हैं, लेकिन वह हथिनी आक्रामक नहीं हुई, असह्य वेदना से बचने के लिए और शायद अपने गर्भ की चिंता में वह पानी की गोद में जा खड़ी हुई। काश! उसे तुरंत पानी से बाहर निकाल लिया जाता और उसका हरसंभव इलाज हो पाता, तो मानवता यूं शर्मसार नहीं हो रही होती।
दोषियों को कतई माफ न किया जाए, साथ ही, अपनी फसलों को बचाने के इस बारूदी तरीके पर भी पूरी कड़ाई से रोक लगनी चाहिए। अभी पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता को रोकने के लिए जो कानून हैं, वे शायद अपर्याप्त हैं और उन्हें लागू करने में सरकारी एजेंसियों की कोई खास रुचि नहीं है। ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए केरल सरकार को अपने स्तर पर पूरे इंतजाम करने होंगे। केरल की व्यापक छवि में हाथियों की अपनी गरिमामय उपस्थिति है। इसी प्रेम भाव के विकास के लिए पूरे राज्य में काम होने चाहिए। केरल या उसके किसी जिले या किसी समुदाय के खिलाफ नफरत की राजनीति समस्या का निदान नहीं है, लेकिन यह विवाद जिस तरह से बढ़ रहा है, उससे लगता है, यह सड़क, कोर्ट से विधानसभा तक गरमाएगा। अत: पशुओं के अधिकारों के लिए सक्रिय लोगों को पूरी सावधानी और संयम से स्थाई समाधान की ओर बढ़ना होगा, तभी वे लक्ष्य तक पहुंचेंगे।
वैसे हाथियों के प्रति क्रूरता केवल केरल की समस्या नहीं है। छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा, पूर्वोत्तर से भी शिकायतें आती रहती हैं। इन हाथियों को जंगल से बाहर न आना पडे़, इसके प्रबंध बार-बार चर्चा व सिफारिश के बावजूद नहीं हो रहे हैं। कई बार चर्चा हुई है कि हाथियों के लिए जंगलों में फलदार पेड़ों के गलियारे होने चाहिए, ताकि उनकी जरूरत वहीं पूरी हो जाए। अब समय आ गया है, जब हाथी ही नहीं, तमाम वन्य जीवों-पशुओं को तरह-तरह से मारने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगना चाहिए। तभी अपार पीड़ा से लाचार उस हथिनी का जल-सत्याग्रह सफल होगा और हम अपने हृदय में मानव होने का तार्किक गर्व सहेज सकेंगे।

 


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