
CONTECT NO. - 8962936808
EMAIL ID - shouryapath12@gmail.com
Address - SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
Google Analytics —— Meta Pixel
मनोरंजन / शौर्यपथ / कोरोना वायरस की वजह से कई महीनों से थिएटर्स बंद हैं जिस वजह से अब कई फिल्में ओटीटी पर रिलीज हो रही हैं। इस बीच नसीरुद्दीन शाह ने समान की फिल्मों को लेकर एक ऐसा बयान दिया है जो काफी सुर्खियों में है। नसीरुद्दीन का कहना है कि उन्हें संदेह है कि जब सलमान की फिल्में ओटीटी पर रिलीज होगी तो क्या उन्हें वैसा ही रिएक्शन मिलेगा जैसा थिएटर्स में मिलता था।
नसीरुद्दीन ने राजीव मसंद के इंटरव्यू के दौरान कहा, 'यह देखना दिलचस्प होगा कि सलमान खान की फिल्में जब ओटीटी पर रिलीज होगी तो क्या तब भी फैन्स उसी तरह सीटी या ताली बजाएंगे, गलियों में नाचेंगे जैसे कि वह थिएटर्स पर फिल्म के रिलीज पर करते थे। मुझे इस बात पर शक है'।
बता दें कि सुशांत के निधन के बाद नेपोटिज्म को लेकर बहस छिड़ी हुई है। कुछ दिनों पहले नसीरुद्दीन से एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि क्या उन्हें लगता है कि इस बहस से कुछ बदलाव आएंगे? तो उन्होंने कहा था, इसकी सिर्फ उम्मीद की जा सकती है, लेकिन इस बहस का स्तर बहुत बचकाना हो रहा है। हम अपने गंदे लंगोट सबके सामने क्यों धो रहे हैं।
उन्होंने कहा था कि सुशांत के निधन के बाद लोग बॉलीवुड में नेपोटिज्म और आउसाइडर्स को लेकर बहस कर रहे हैं। वहीं कंगना रनौत को लेकर उन्होंने कहा कि वह कुछ फिल्ममेकर्स और स्टारकिड्स को निशाना बना रही हैं, यहां तक की तापसी पन्नू और स्वरा भास्कर जैसे एक्टर्स को वह बी ग्रेड बता रही हैं।
नसीरुद्दीन ने आगे कहा, 'अगर हम सभी ने सिकायत करना शुरू कर दिया तो ये इंडसट्री पृथ्वी की सबसे खराब जगह के रूप में जानी जाएगी'।
खाना खजाना / शौर्यपथ / अगर आप नॉन वेजिटेरियन हैं और शाम की पार्टी में मेहमानों के स्नैक्स को लेकर थोड़ी कंफ्यूज हो रही हैं तो टेंशन छोड़ इस रेसिपी को ट्राई करें। नॉन वेजिटेरियन लोगों को स्नैक्स में चिकन विंग्स बेहद पसंद आते हैं। खास बात यह है कि इन्हें बनाने के लिए आपको अपने फेवरेट केएफसी भी नहीं जाना पड़ेगा। आप घर बैठे ही केएफसी जैसे लजीज चिकन विंग्स बना सकती हैं। तो देर किस बात की आइए जानते हैं चिकन विंग्स बनाने की क्या है रेसिपी।
केएफसी स्टाइल चिकन विंग्स बनाने के लिए सामग्री-
मैरिनेट करने के लिए
-साफ किए हुए चिकन विंग्स
-हल्दी पाउडर
-दही
-लाल मिर्च पाउडर
-अदरक-लहसुन का पेस्ट
-काली मिर्च
-चिकन मसाला
-नींबू
कोटिंग के लिए-
-मसाला चिप्स
-तेल
केएफसी स्टाइल चिकन विंग्स बनाने का तरीका-
चिकन विंग्स बनाने के लिए सबसे पहले एक बाउल में चिकन विंग्स लेकर सभी सामग्री को मैरिनेट करने के लिए मिलाकर फ्रिज में 30 मिनट के लिए रख दें। अब मसाला चिप्स का पैकेट लेकर इसे थोड़ा भूरा होने तक भूने। अब इन चिप्स का पाउडर बना लें। अब मैरिनेट किया हुआ चिकन लेकर क्रश चिप्स के साथ इसे कोट करें।एक कड़ाही में तेल गर्म करके चिकन विंग्स को कुरकुरा होने तक भूनें। अब तले हुए चिकन विंग्स में नींबू का रस ऊपर से डालकर मेहमानों को गर्मा- गर्म सर्व करें।
धर्म संसार / शौर्यपथ / यह माना जाता है की इस मंदिर का निर्माण करीबन 700 साल पहले पंडित श्रीधर द्वारा हुआ था, जो एक ब्राह्मण पुजारी थे जिन्हें
मां के प्रति सच्ची श्रद्धा भक्ति थी जबकि वह गरीब थे। उनका सपना था कि वह एक दिन भंडारा (व्यक्तियों के समूह के लिए भोजन की आपूर्ति) करें, मां वैष्णो देवी को समर्पित भंडारे के लिए एक शुभ दिन तय किया गया और श्रीधर ने आस पास के सभी गांव वालो को प्रसाद ग्रहण करने का न्योता दिया।
भंडारे वाले दिन पुन: श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बना कर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सके।
जितने लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं थी क्योंकि मेहमान बहुत ज्यादा थे। जैसे-जैसे भंडार का दिन नजदीक आता जा रहा था, पंडित श्रीधर की मुसीबतें भी बढ़ती जा रही थी। वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर की वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे,इतनी कम सामग्री और इतनी कम जगह.. दोनों ही समस्या थी।
वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी मां से ही आस थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए,दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी से कुटिया में आसानी से बैठ गए और अभी भी काफी जगह बाकी थी।
श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा की इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उसने एक छोटी लड़की को झोपडी से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था। वह भगवान की कृपा से आई थी, वह सभी को स्वादिष्ट भोजन परोस रही थी, भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था।
भंडारे के बाद, श्रीधर उस छोटी लड़ी वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, पर वैष्णवी गायब हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया उसमें स्पष्ट हुआ कि वह मां वैष्णो देवी थी। माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे सनसनी गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया।
श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े, जब उन्हें वह गुफा मिली तो उसने तय किया की वह अपना सारा जीवन मां की सेवा करेंगे। जल्द ही पवित्र गुफा प्रसिद्ध हो गई और भक्त झुंड में मां के प्रति आस्था प्रकट करने आने लगे।
आज इस वैष्णो देवी के मंदिर में पुरे भारत वर्ष से भक्त आते हैं। माता रानी का यह असीम ऊर्जावान केंद्र है।
वैष्णो देवी गुफा मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथा
वैष्णो देवी का विश्व प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में कटरा नगर के समीप की पहाडिय़ों पर स्थित है। इन पहाडिय़ों को त्रिकुटा पहाड़ी कहते हैं। यहीं पर लगभग 5,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है मातारानी का मंदिर। यह भारत में तिरूमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थ स्थल है।
भवन वह स्थान है जहां माता ने भैरवनाथ का वध किया था। प्राचीन गुफा के समक्ष भैरो का शरीर मौजूद है और उसका सिर उड़कर तीन किलोमीटर दूर भैरो घाटी में चला गया और शरीर यहां रह गया। जिस स्थान पर सिर गिरा, आज उस स्थान को 'भैरोनाथ के मंदिरÓ के नाम से जाना जाता है। कटरा से ही वैष्णो देवी की पैदल चढ़ाई शुरू होती है जो भवन तक करीब 13 किलोमीटर और भैरो मंदिर तक 14.5 किलोमीटर है।
मंदिर की पौराणिक कथा :मंदिर के संबंध में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। एक बार त्रिकुटा की पहाड़ी पर एक सुंदर कन्या को देखकर भैरवनाथ उससे पकडऩे के लिए दौड़े। तब वह कन्या वायु रूप में बदलकर त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ चलीं। भैरवनाथ भी उनके पीछे भागे। माना जाता है कि तभी मां की रक्षा के लिए वहां पवनपुत्र हनुमान पहुंच गए। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए। फिर वहीं एक गुफा में गुफा में प्रवेश कर माता ने नौ माह तक तपस्या की। हनुमानजी ने पहरा दिया।
फिर भैरव नाथ वहां आ धमके। उस दौरान एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है, इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अद्र्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अद्र्धकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था।
अंत में गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया और भैरवनाथ वापस जाने का कह कर फिर से गुफा में चली गईं, लेकिन भैरवनाथ नहीं माना और गुफा में प्रवेश करने लगा। यह देखकर माता की गुफा कर पहरा दे रहे हनुमानजी ने उसे युद्ध के लिए ललकार और दोनों का युद्ध हुआ। युद्ध का कोई अंत नहीं देखकर माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का वध कर दिया।
मंदिर की कथा : उपरोक्त कथा को वैष्णो देवी के भक्त श्रीधर से जोड़कर भी देखा जाता है। 700 वर्ष से भी अधिक समय पहले कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वे नि:संतान और गरीब थे। लेकिन वे सोचा करते थे कि एक दिन वे माता का भंडारा रखेंगे। एक दिन श्रीधर ने आस-पास के सभी गांव वालों को प्रसाद ग्रहण करने का न्योता दिया और भंडारे वाले दिन श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बनाकर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सके। जितने लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं थी क्योंकि मेहमान बहुत ज्यादा थे।
वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर की वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे। वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी मां से ही आस थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए, दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे, श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी-सी कुटिया में आसानी से बैठ गए।
श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा की इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उसने एक छोटी लड़की को झोपडी से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था। वह भगवान की कृपा से आई थी, वह सभी को स्वादिष्ट भोजन परोस रही थी, भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था। भंडारे के बाद, श्रीधर उस छोटी लड़ी वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, पर वैष्णवी गायब हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया उसमें स्पष्ट हुआ कि वह मां वैष्णोदेवी थी। माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया। श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े और कुछ दिनों बाद उन्हें वह गुफा मिल गई। तभी से वहां पर माता के दर्शन के लिए श्रद्धालु जाने लगे।
मंदिर की कथा : उपरोक्त कथा को वैष्णो देवी के भक्त श्रीधर से जोड़कर भी देखा जाता है। 700 वर्ष से भी अधिक समय पहले कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वे नि:संतान और गरीब थे। लेकिन वे सोचा करते थे कि एक दिन वे माता का भंडारा रखेंगे। एक दिन श्रीधर ने आस-पास के सभी गांव वालों को प्रसाद ग्रहण करने का न्योता दिया और भंडारे वाले दिन श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बनाकर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सके। जितने लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं थी क्योंकि मेहमान बहुत ज्यादा थे।
वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर की वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे। वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी मां से ही आस थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए, दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे, श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी-सी कुटिया में आसानी से बैठ गए।
श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा की इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उसने एक छोटी लड़की को झोपडी से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था।
वह भगवान की कृपा से आई थी, वह सभी को स्वादिष्ट भोजन परोस रही थी, भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था। भंडारे के बाद, श्रीधर उस छोटी लड़ी वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, पर वैष्णवी गायब हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया उसमें स्पष्ट हुआ कि वह मां वैष्णोदेवी थी। माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया। श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े और कुछ दिनों बाद उन्हें वह गुफा मिल गई। तभी से वहां पर माता के दर्शन के लिए श्रद्धालु जाने लगे।
मेरी कहानी / शौर्यपथ /हर पल ऐसा लगता था कि सामने एक विशाल पहाड़ है। उसे हटाने के लिए धक्का मारो, तो वह और आगे बढ़ आता है। क्या इस पहाड़ में कहीं कोई गलियारा या खिड़की है, जहां से पार हो जाएं? पहाड़ के सामने रोने का कोई अर्थ नहीं था, लगता था कि वह भी जवाबी रुलाई से चिढ़ा रहा है। उस लड़के को उस शाम उम्मीद थी कि सामने खडे़ पहाड़ में एक खिड़की खुलेगी। वैसे यह उम्मीद तो दिन-रात साथ रहती थी, लेकिन उस दिन कुछ ज्यादा ही दिल से आ लगी थी। लगता था कि अब टीचर आने ही वाली हैं। टीचर के आते ही इस निष्ठुर पहाड़ में एक खिड़की खुलेगी, जहां से जिंदगी का एक नया आसमान नजर आएगा। टीचर ने कहा था कि ‘तैयार रहना, आज शाम आऊंगी, नाटक दिखाने ले जाऊंगी। तुम्हारा असली नाटक देखना जरूरी है’।
क्या ऐसे लोग होते हैं, जो अनजान से लड़के को भी नाटक दिखाने ले जाएं? जो अनजान से किसी लड़के के भले की सोचें? ऐसी भी टीचर होती हैं क्या, जो अपने पैसे और समय खर्च करके अपने एक अदने से छात्र को नाटक दिखाने ले जाएं? टीचर ने आने का तो कहा है, लेकिन अगर नहीं आईं, तो क्या होगा? फिर तो सामने पहाड़ ज्यों का त्यों रह जाएगा और उसके साथ एक इंतजार भी।
पिता डेविड अक्सर कहते रहते हैं कि किसी से उम्मीद मत रखना? तुम जैसे दुनिया के सबसे बदसूरत लड़के को कोई उम्मीद रखनी भी नहीं चाहिए। पिता सौतेले थे, अपने सौतेले बेटे को नीचा दिखाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। कोई छोटी कमी भी दिख जाती, तो सौतेले पिता नीचा दिखाने की बड़ी गुंजाइश निकाल लेते थे। टीचर आने वाली थीं, कायदे से पिता और मां को बता देना चाहिए था, लेकिन भय के मारे हिम्मत ही नहीं पड़ी। वैसे भी जवाब तय था, तो वह लड़का पूछकर क्यों मुसीबत मोल लेता? चर्च से जुड़े उसके परिवार में नाटक देखने को बुरा माना जाता था। चुपचाप वह समय से पहले तैयार होकर घर में ही दुबक गया। टीचर किसी भी समय आ सकती थीं, उनकी राह पर लड़के की पलकें बिछी हुई थीं। डरा हुआ गमगीन मन पुकार रहा था, ‘टीचर, आ जाओ। मुझे बाहर ले चलो। मैं कब से तैयार हूं’।
पल-पल भारी पड़ते इंतजार के बाद टीचर दिखाई पड़ने लगीं। खुशी से मन उछल पड़ा, ‘थैंक्यू टीचर’। टीचर कुछ ही पल में पिता-मां के सामने आ खड़ी हुईं, यथोचित अभिवादन के बाद कहा,‘जेम्स कहां है? मैं उसे साथ ले जाने आई हूं।’
पिता स्तब्ध थे कि एक संभ्रांत महिला उनके सबसे बदसूरत बेटे के लिए आई है? टीचर ने बताया, ‘आपको पता है? आपका बेटा कमाल का लिखता है। पिछले दिनों एक नाटक लिखा, जो स्कूल में खेला गया, सबने पसंद किया। मुझे लगता है, उसे सही दिशा दी जाए, मैं उसे नाटक दिखाने ले जाऊंगी। वहां जाएगा, तो सीखेगा कि रंगमंच की दुनिया में क्या चल रहा है?’
उस लड़के जेम्स ने गौर किया, पिता का चेहरा सूख गया था। वह भौचक्क थे कि नामुराद लड़के ने नाटक लिखा है और खुश होकर टीचर खुद आई हैं। अब इसके साथ नाटक देखने जाएंगी? मां भी अचंभित थीं, लेकिन थोड़ी खुश भी थीं। आखिर क्या गलत है? टीचर ही तो हैं, ले जा रही हैं अपने साथ, नाटक दिखाकर छोड़ जाएंगी। लेकिन पिता का मन नहीं मान रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। पिता इनकार की कोशिश करना चाहते थे। मचल रहे थे। उन्हें पहले से ही आशंका थी कि शिक्षा लड़के को बिगाड़ देगी, जमाने की हवा लग जाएगी और कहीं उनकी नजर में नाकारा लड़का सफल हो गया, तो उनके अपशब्दों व बुरी भविष्यवाणियों का क्या होगा? और कोई होता, तो तत्काल मना कर देते, पर सामने गोरी चमड़ी वाली टीचर थीं, तो हिम्मत पस्त हो गई। मन मारकर झल्लाते हुए पिता ने मुंह फेर लिया और मां ने कहा, ‘आप जेम्स को ले जाइए?’
और तब जेम्स बाल्डविन (1924-1987) अपनी टीचर के साथ चल पड़े, यह एक लेखक के रूप में उनकी जीवन यात्रा की नई शुरुआत थी। मन में बैठी यह धारणा ढेर हो चुकी थी कि कोई श्वेत कभी किसी अश्वेत का भला नहीं चाह सकता। उस दिन पाबंदियों और भ्रांतियों के ढहने की शुरुआत हुई थी। उसी दिन उस पहाड़ का टूटना शुरू हुआ, जिसे जेम्स के जैविक पिता उसके सामने उगा गए थे और जिसे उनके सौतेले पिता ने बड़ा व भयावह बना दिया था। किताबें उन्होंने बहुत लिखीं, लेकिन एक किताब गो टेल इट ऑन द माउंटेन में उन्होंने अपने दोनों पिता पर प्रकाश डाला। एक पिता, जो कभी दिखे नहीं और एक पिता, जो हमेशा रूठे रहे, लेकिन जिंदगी में वह टीचर और ऐसे बहुत लोग मिले, जिन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखा दिया।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय जेम्स बाल्डविन, प्रसिद्ध अमेरिकी साहित्यकार
जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / साल 2005 की बात है। जबर्दस्त बारिश ने करोड़ों भारतीयों के ख्वाबों के शहर को जैसे अचानक बेपरदा कर दिया था। कहां तो रंग-बिरंगी रोशनी में डूबी उसकी मादक रातें दुनिया भर के लोगों को ललचाया करती थीं, और कहां वह बजबजाती हुई सुबह! मुंबइकर उस रोज अपने शहर पर किसी सूरत नाज नहीं कर पा रहे थे। मीठी नदी समेत तमाम नालियों ने जैसे सारी गंदगी सागर से उधार मांग ली थी। शहर की हर सड़क पर इंसानी खुदगर्जी सड़ांध मार रही थी।
अफरोज शाह की उम्र तब 22 साल थी, और हर संजीदा शहरी की तरह उन्हें भी अपने शहर से भरपूर इश्क था। मगर जिस हालत में मुंबई उस रोज फंसी थी, उसकी बेचैनी अफरोज के भीतर उतर आई। उन दिनों वह कानून की पढ़ाई कर रहे थे। एक तरफ करियर था, दुनियादारी थी और दूसरी तरफ, जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने का नजरिया। लॉ की पढ़ाई मुकम्मल हुई और वह वकालत भी करने लगे। वकालत कुछ चली, तो यह ख्याल आया कि अपना भी एक आशियाना होना चाहिए, और उनकी तलाश वर्सोवा इलाके में पूरी हुई। अपने घर की खिड़की से समुद्री लहरों की अठखेलियां देखना कितनों को नसीब होता है? अफरोज की यह मुराद पूरी हो गई थी। मगर एक रोज उन्होंने गौर किया कि अरब सागर के इस तट पर भारी मात्रा में कचरे का ढेर जमा है। समुद्र के नीले सौंदर्य को ग्रहण लगाता हुआ। साल 2005 की पुरानी पीड़ा जैसे एक नई टीस के साथ उभर आई।
इस दौरान पूरे एक दशक का वक्फा गुजर चुका था। अफरोज को लगा, जैसे उनका शहर उनसे अपना कर्ज मांग रहा है। भीतर के पेशेवर वकील ने सलाह दी कि अदालत का दरवाजा खटखटाया जाए, मगर प्रेमी मुंबइकर मन ने कहा, मोहब्बत की है, तो म्युनिसिपैलिटी और कोर्ट का मुंह किसलिए देख रहे हो, अपना किरदार निभाओ। और फिर हाथों में ग्लब्स पहन अफरोज चल पड़े वर्सोवा तट पर!
कचरे के बीच पहुंचकर उन्हें बचपन के वे दिन याद आए, जब छुट्टियों के दिन घर वालों के साथ वह समुद्र तट पर आते थे। तब ऐसी गंदगी कहां थी? दरअसल, आर्थिक उदारीकरण के वे शुरुआती साल थे। उन दिनों लोग सौदे-सुलफ के लिए घर से झोले वगैरह लेकर चला करते थे। देखते-देखते प्लास्टिक की सस्ती थैलियों ने पहले महानगरों की, और फिर छोटे-छोटे शहरों तक की आदत बदल डाली।
वह अक्तूबर, 2015 की एक सुबह थी। पहले दिन अफरोज ने कचरे से भरे पांच बैग उठाए। फिर तो हर सप्ताहांत में वह तट पर पहुंचने लगे। उनकी इस कोशिश को कोई और भी गौर से देख रहा था। अफरोज की ही बिल्डिंग में रहने वाले हरबंश माथुर ने सबसे पहले उनके साथ अपना कदम मिलाया और फिर तो देखते ही देखते आस-पड़ोस के कई लोग आ गए। कचरा काफी था। मगर अफरोज ने 109 हफ्ते की एक अवधि तय की कि इसके भीतर हमें वर्सोवा बीच की सूरत बदलनी है।
उनकी ईमानदार पहल ने अनगिनत स्वच्छता प्रेमियों को आकर्षित किया। अगस्त 2016 में तो बॉलीवुड की कई नामचीन हस्तियों और वैश्विक संगठनों के अधिकारियों ने कूड़ा-कचरा उठाकर अफरोज शाह के साथ अपनी एकजुटता दिखाई। अफरोज और उनके साथी काफी संजीदगी से अपने उद्यम में जुटे हुए थे, मगर कोई भी अच्छा कार्य बिना विघ्न-बाधा के कभी संपन्न हुआ है, जो अफरोज और उनके लोग पूरा कर लेते! जो लोग वर्सोवा तट को कूडे़दान के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे, उन्होंने वॉलंटीयर्स को मुहिम बंद करने की धमकियां देनी शुरू कर दीं। अफरोज साथियों की जान जोखिम में नहीं डाल सकते थे, लिहाजा उन्होंने कुछ वक्त के लिए काम बंद कर दिया।
लेकिन यह मुहिम अब तक एक जन-आंदोलन का रूप ले चुकी थी। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तक बात पहुंची, उन्होंने अफरोज को बुलाया और सुरक्षा मुहैया कराते हुए अभियान जारी रखने को कहा। शिवसेना के बडे़ नेताओं ने भी अफरोज को अपना समर्थन दिया। फिर तो तेजी से सब जुट गए। 28 मई, 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने मन की बात कार्यक्रम में अफरोज व उनके साथियों के प्रयासों का जिक्र करते हुए उनकी खूब सराहना की। अमिताभ बच्चन ने तो न केवल कौन बनेगा करोड़पति में उन्हें बुलाया, बल्कि अफरोज की मुहिम को उन्होंने एक ट्रैक्टर व एक एक्स्क्वेटर भी भेंट की। शुरुआत में हरेक शनिवार-रविवार को अफरोज तकरीबन 50 वॉलंटीयर्स का खाना अपने घर से लेकर आते थे। बाद में दाऊदी बोहरा समुदाय ने यह जिम्मेदारी ले ली।
आज वर्सोवा तट की काया बदल चुकी है, यहां से 20 हजार टन से भी अधिक प्लास्टिक और कचरा हटा चुके अफरोज को संयुक्त राष्ट्र ‘चैंपियन्स ऑफ अर्थ’ सम्मान से नवाज चुका है। पिछले साल सीएनएन ने उन्हें दुनिया के शीर्ष 10 नायकों में शुमार किया। कुदरत से बेपनाह मोहब्बत करने वाले इस 37 वर्षीय आशिक का कहना है- ‘हर नदी, हर सागर तट के पास अपना एक अफसाना है, आप सुनिए तो सही।’
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह अफरोज शाह, वकील, प्रकृतिप्रेमी
नजरिया / शौर्यपथ / डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से उप-राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार कमला हैरिस आंशिक तौर पर भारतीय मूल की हैं, पूरी तरह से नहीं। फिर भारतीयों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वह अमेरिका में चुनाव लड़ रही हैं, भारत में नहीं। यह एक बड़ा अंतर है, और यह बात हमें अपने मन में बैठा लेनी चाहिए कि जब चुनावी आरोपों-प्रत्यारोपों के दौर शुरू होंगे, तब यही कहा जाएगा कि वह अपनी भारतीयता को बहुत ज्यादा स्वीकार नहीं करती हैं। यह बात मैं बखूबी जानता हूं, क्योंकि मैंने एक बार लिखा भी था कि हैरिस को अपनी भारतीय विरासत को कहीं ज्यादा अपनाने की जरूरत है। मैं तो अब भी अपनी विरासत जी रहा हूं। पर मैं वह उम्मीदवार नहीं, जो अब उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुनावी मैदान में है।
हैरिस एक अश्वेत महिला के तौर पर चुनाव लड़ेंगी। यही वह मूल वजह है, जिसके लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार जो बिडेन ने उनका चयन किया है। अमेरिकी सीनेटर, अमेरिका के सबसे बडे़ राज्य की पूर्व अटॉर्नी-जनरल, अपेक्षाकृत अधिक नौजवान उम्मीदवार (जो बिडेन की उम्र 77 वर्ष है, जबकि कमला हैरिस 55 वर्ष की हैं) और उप-राष्ट्रपति पद की दावेदारी के लिए आक्रामक व्यवहार का प्रदर्शन जैसी उनकी अन्य तमाम मौलिक योग्यताओं को इसके बाद तरजीह दी गई है। अमेरिका के एक पूर्व वरिष्ठ डेमोक्रेट सीनेटर हैरी रीड ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा भी है, ‘मैं समझता हूं, वह इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि उन्हें इस पद के लिए एक अश्वेत महिला को चुनना चाहिए। अश्वेत हमारे सबसे वफादार मतदाता हैं और मुझे लगता है, अमेरिका की अश्वेत महिलाएं इसकी हकदार हैं कि उप-राष्ट्रपति पद के लिए उनमें से उम्मीदवार चुना जाए’। साफ है, कमला हैरिस का चयन एक चुनावी मजबूरी है। इसीलिए, उनसे और अधिक भारतीय होने की उम्मीदों से भारतीयों, खासतौर से भारतीय मूल के अमेरिकियों को अब बचना चाहिए। हैरिस के लिए ऐसा करना आसान भी नहीं होगा, क्योंकि जैसे-जैसे चुनाव के दिन करीब आते जाएंगे, वह पूरी तरह से अश्वेत होती जाएंगी। दरअसल, बिडेन के चुनावी अभियान में उन्हें अफ्रीकी-अमेरिकी वोटरों की करीबी के तौर पर पेश किया जाएगा, जो अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा मतदाता-वर्ग है। वे फ्लोरिडा, एरिजोना, पेंसिल्वेनिया, ओहियो, विस्कॉन्सिन, मिशिगन, वर्जीनिया व उन राज्यों में महत्वपूर्ण साबित होंगे, जहां रिपब्लिकन की अपेक्षाकृत कमजोर सरकारें हैं।
हालांकि, इन सबमें भी हैरिस अपनी भारतीयता का संकेत देने का वक्त और अवसर निकाल लेंगी। वह उन लोगों से अपील करेंगी, जो उन्हें वर्षों से जानते हैं। और यह वर्ष 2009 में दिवंगत हो चुकी अपनी मां श्यामला गोपालन का जिक्र करते हुए वह करेंगी, जो स्तन कैंसर के रिसर्च से जुड़ी थीं। हैरिस अपने जीवन के खास मौकों पर और अपनी उपलब्धियां बताते समय अमूमन मां की तस्वीर ट्वीट करती हैं, अपने जमैकाई पिता की कभी नहीं, जिनका नाम डोनाल्ड जैस्पर हैरिस है। वह स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। उप-राष्ट्रपति पद की दावेदार के रूप में नाम घोषित होने के बाद जो बिडेन के साथ पहली बार सार्वजनिक मंच साझा करते समय हैरिस ने बेशक अपनी मिश्रित विरासत के बारे में बताया, मगर भावुक होकर वह अपनी मां के बारे में ही ज्यादा बातें करती रहीं कि कैसे सार्वजनिक जीवन में आने के लिए उन्होंने उन्हें प्रेरित किया था, और अब यही प्रेरणा उन्हें राष्ट्रपति पद का टिकट पाने वाली पहली अश्वेत महिला के रूप में इतिहास में जगह दिलाएगी।
बहरहाल, 3 नवंबर को, या जब भी चुनाव नतीजों की घोषणा होगी, वह अमेरिका की पहली महिला उप-राष्ट्रपति बन सकती हैं। हम इस बार अब तक के सबसे अप्रत्याशित चुनाव का गवाह बन सकते हैं। उनकी मां श्यामला गोपालन भविष्य में भी वह कड़ी बनेंगी, जो हैरिस को भारत से जोडे़गी।
चेन्नई में पली-बढ़ी श्यामला गोपालन अमेरिका की अपनी यात्रा शुरू करने से पहले दिल्ली में लेडी इरविन कॉलेज में पढ़ती थीं। हालांकि, कमला हैरिस आज भी डोसा बनाना नहीं जानती हैं, क्योंकि महीनों पहले शूट किए गए वीडियो में उन्होंने मेंडी कलिंग के सामने यह बात खुद मानी है। मगर उनके बारे में कोई भी राय बनाने से पहले हमें उनको कुछ और वक्त देना चाहिए। और इसकी वह हकदार हैं।
यशवंत राज, अमेरिका में हिन्दुस्तान टाइम्स संवाददाता
सम्पादकीय / शौर्यपथ / कोरोना का समय पूरी दुनिया के लिए जितना अभूतपूर्व है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। हम अपने चारों ओर सेहत की अत्यधिक चिंता, तनाव, काम में व्यवधान और साथ ही अपने स्वजनों, दोस्तों से दूरी का दुखद एहसास कर रहे हैं। जिंदगी को खुशनुमा ढंग से जीने के बहाने कम हो गए हैं। लोगों की मानसिक स्थिति पर गहरा असर पड़ा है। नई पीढ़ी का मन खास रूप से आहत हुआ है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ द्वारा किए गए वैश्विक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया में हर दूसरा युवा चिंता व अवसाद से ग्रस्त हो गया है। कोविड-19 के प्रभाव में 17 प्रतिशत से अधिक युवा ज्यादा पीड़ित हुए हैं। सर्वेक्षण रिपोर्ट के निष्कर्षों को ‘यूथ ऐंड कोविड-19 : नौकरियों, शिक्षा, अधिकारों और मानसिक हित पर प्रभाव’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है। इस सर्वेक्षण के लिए दुनिया के 112 देशों से 12,000 से अधिक प्रतिक्रियाएं ली गईं, जिनमें एक बड़ा हिस्सा शिक्षित युवाओं व इंटरनेट का उपयोग करने वालों का है।
सर्वेक्षण में 18 से 29 वर्ष की आयु के नौजवान शामिल थे, जिन्हें रोजगार, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण जैसे मुद्दों पर बात करने के लिए कहा गया था। सर्वेक्षण के अनुसार, युवाओं ने मानसिक सेहत संबंधी समस्याओं में बढ़ोतरी के लिए एक से अधिक कारण गिनाए। शिक्षा के साधनों में बदलाव और जीवन को लेकर अनिश्चितता ने उन्हें चिंता की ओर धकेला है। कक्षाओं और परीक्षाओं के न होने का असर भी समाज पर पड़ा है। ऑनलाइन कक्षाओं से भी एक अलग ही तरह की जिंदगी शुरू हुई है, उससे तनाव कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ गया है। उम्र के तीसरे व चौथे दशक में चल रहे युवाओं को रोजगार के अभाव और वर्तमान रोजगार के छूटने की चिंता ने घेर लिया है। घर से काम करने के साथ ही काम के घंटे भी बढ़ गए हैं। लोगों की जिम्मेदारियां बढ़ी हैं, थकावट व कुछ गंवा देने के भाव का असर मानसिक सेहत पर पड़ा है। सर्वेक्षण से पता चला है कि युवा छात्रों पर ज्यादा असर हुआ है। नया हुनर सीखने, सुधारने और आगे शिक्षा के लिए तरसते युवाओं के लिए यह समय बोझिल बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा में परिवर्तन व ऑनलाइन कक्षा के कारण 65 प्रतिशत युवाओं ने जरूरत से कम सीखा है। करीब 50 प्रतिशत युवाओं को आशंका है कि उनकी शिक्षा देर से पूरी होगी। कम से कम नौ प्रतिशत को अपनी परीक्षा में फेल होने की आशंका है, जिससे उन्हें मानसिक तनाव का अनुभव हो रहा है। एक और बात महत्वपूर्ण है कि महिलाओं की मानसिक खुशहाली ज्यादा प्रभावित हुई है, उसमें भी 18 से 24 वर्ष की महिलाओं पर ज्यादा असर हुआ है।
आईएलओ के अध्ययन में बताया गया है कि इन मानसिक चुनौतियों का जवाब हमें अभी ही खोजना होगा, वरना महामारी के खत्म होने के बाद दुनिया को स्वास्थ्य के और बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है। जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सभी सरकारों को तनाव बढ़ाने वाले उपक्रमों या हरकतों से बचना होगा। सकारात्मक सोच वाले लोगों को आगे आकर मानसिक रूप से कमजोर हुए लोगों को सहारा देना होगा। आज सरकारों, डॉक्टरों, शिक्षकों व अभिभावकों की चुनौती बहुत बढ़ गई है। हमें समझना होगा कि एक-एक युवा हमारे लिए मूल्यवान है, तभी हम उन्हें अवसाद से बचाने में कामयाब होंगे।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / अमेरिकी चुनाव में भारतीय मूल की कमला हैरिस का डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाना भारतीयों के लिए गौरव की बात है। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय प्रतिभा का दुनिया के सभी देशों में सम्मान होता है। इसकी वजह हमारी योग्यता तो है ही, हमारी मजबूत सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भी है। कमला हैरिस के भी पारिवारिक रिश्ते काफी गहरे हैं, जिसका उन्होंने बार-बार प्रदर्शन भी किया है। अपने भाषणों में तो वह मां को हमेशा याद करती रहती हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बिडेन और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा उनकी खुलकर तारीफ करते हैं। हैरिस की यही खासियत संभवत: उन्हें उप-राष्ट्रपति पद तक पहुंचा सकती है।
हरिकृष्ण बड़ोदिया
रतलाम, मध्य प्रदेश
बेहतर होती सड़कें
यह अच्छी खबर है कि केंद्र सरकार ने देश के ग्रामीण इलाकों में डेढ़ लाख किलोमीटर लंबी नई सड़कें 130 लाख करोड़ रुपये के निवेश से बनाया है। इसकी जरूरत भी थी, क्योंकि सड़कें देश की प्रगति और विकास का प्रमुख आधार हैं। जब भारत गांवों में बसता है, तो उनके सुधार और विकास के लिए सड़कों का निर्माण बहुत जरूरी है। तभी देश सही से आगे भी बढ़ सकता है। अच्छी सड़कों, पुलों, चौराहों, फुटपाथों आदि के अभाव के कारण ही आज देश के महानगर जाम और हादसों से जूझते रहते हैं। इन सबसे प्रतिवर्ष न जाने कितनी पूंजी और ऊर्जा की बर्बादी होती है। सरकार इस समस्या के समाधान को लेकर अब गंभीर हुई है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
वेद मामूरपुर, नरेला
नेपोटिज्म के खिलाफ
सुशांत सिंह राजपूत की मौत से देश भर में जिस तरह से नेपोटिज्म के खिलाफ एक उबाल पैदा हुआ है, वह शायद ही कभी दिखा है। साफ है,जनता इस मामले को जल्द से जल्द सुलझता हुआ देखना चाहती है। जिस तरह से सीबीआई, आईडी जैसी एजेंसियां सक्रिय हुई हैं, उससे यह उम्मीद भी है कि जल्द ही इस मौत पर खुलासा होगा और दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। मगर तब तक लोगों का गुस्सा बना हुआ है। ‘सड़क-2’ फिल्म का ट्रेलर उनके निशाने पर है, जिसको नापसंद करके लोगों ने महेश भट्ट को साफ संदेश दे दिया है। जनता के न्यायालय में देर नहीं होती। नेपोटिज्म को बढ़ावा देने वाले कलाकारों और फिल्मकारों को इससे सबक मिला होगा। ऐसे तमाम कलाकारों और फिल्मकारों के बहिष्कार से ही सुशांत सिंह राजपूत को न्याय मिल सकेगा।
कृष्ण गोपालन कुमार
कोंच डीह, गया
वायरस से लड़ती राजनीति
जहां हमारा देश कोरोना से ग्रस्त है, वहीं हमारे देश की राजनीति तीन खतरनाक वायरसों से जूझ रही है। ये वायरस हैं- परिवारवाद, सत्ता के लिए मोल-भाव व वीवीआईपी संस्कृति। इन सबके अंत का समय आ गया है। आज नहीं, तो कल कोरोना की वैक्सीन वैज्ञानिक बना ही लेंगे, पर राजनीति को संक्रमित कर रहे इन वायरसों का समाधान जनता को ही निकालना होगा। इस विषय पर सकारात्मक व संवेदनशील संवाद की आवश्यकता है। मगर दुख की बात यह है कि जमात से चला विमर्श जाति, परिवार पर आकर रुक जाता है। इसी तरह, राजनीति को पेशा, यानी कारोबार नहीं, बल्कि त्यागपूर्ण जीवन के रूप में देखना चाहिए। एक समय था, जब लाल बहादुर शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर ,दीन दयाल उपाध्याय जैसे लोगों के लिए सादगी ही शृंगार थी। मगर आज यह नहीं दिखता, जबकि समाज के अंतिम छोर पर खडे़ व्यक्ति की आंखों की भाषा समझने के लिए जिस संवेदना की आवश्यकता होती है, उसकी पूर्ति तभी संभव है, जब हमारे नेतागण सादगीपूर्ण जीवन बिताएं। पर क्या ऐसा हो सकेगा?
सत्य प्रकाश, लखीमपुर खीरी
ओपिनियन / शौर्यपथ / भारतीय क्रिकेट में कप्तान तो एक से एक हुए, लेकिन महेंद्र सिंह धौनी सबसे सफलतम और सबसे अलग रूप-स्वरूप में याद किए जाएंगे। भारतीय क्रिकेट में जितना आकर्षक उनका पदार्पण था, उनका अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहना भी उतना ही यादगार रहेगा। पहले हम अनेक दिग्गज खिलाड़ियों को बहुत मुश्किल से क्रिकेट छोड़ते देखते रहे हैं, लेकिन धौनी जिस सहजता से डटे हुए थे, लगभग उतनी ही सहजता से वह अपने आप विदा हुए हैं। उन्होंने अपने संन्यास की घोषणा इंस्टाग्राम पर पोस्ट करते हुए की है, उनकी वीडियो की पृष्ठभूमि में...मैं पल दो पल का शायर हूं गीत चल रहा था। यह गीत चलाकर उन्होंने अपने प्रशंसकों को भाव-विभोर कर दिया। उनके विदा कहने के इस अंदाज में एक ऐसा इंसान साफ तौर पर नुमाया हो गया, जिस पर भारतीयों ने बेहिसाब प्यार लुटाया है।
धौनी के संन्यास पर वर्तमान भारतीय कप्तान विराट कोहली ने ट्वीट किया, ‘हर क्रिकेटर को एक दिन अपना सफर खत्म करना पड़ता है, लेकिन फिर भी जब कोई ऐसा संन्यास की घोषणा करता है, जिसे आप करीब से जानते हैं, तो आप भावना को और अधिक महसूस करते हैं। आपने देश के लिए जो किया है, वह हमेशा सभी के दिल में रहेगा, लेकिन जो सम्मान और गर्मजोशी मुझे मिली है, वह हमेशा मेरी रहेगी। दुनिया ने उपलब्धियां देखी हैं, मैंने इंसान को देखा है।’
धौनी को देश में सचिन तेंदुलकर जैसी लोकप्रियता मिलने से भी उनके महत्व को समझा जा सकता है। यह कोई भूलने वाली बात नहीं है कि सचिन का विश्व कप जीतने का सपना धौनी के नेतृत्व में ही साकार हुआ था। विश्वविजयी होने के उन भावुक विरल क्षणों को कौन भुला सकता है? धौनी ने अपनी कप्तानी में अपनाई जाने वाली रणनीतियों की छाप ही नहीं छोड़ी, बल्कि वह भारतीय क्रिकेट की दिशा बदलने वाले क्रिकेटर रहे।
महेंद्र सिंह धौनी ने दिखाया कि रांची जैसे छोटे शहर का क्रिकेटर भी क्रिकेट की इस ऊंचाई तक पहुंच सकता है। बिहार-झारखंड के युवाओं के लिए वह एक ऐसे आदर्श रहेंगे, जिनसे हमेशा प्रेरणा मिलेगी। पहले भारतीय क्रिकेट चार-पांच बड़े शहरों तक सीमित था। मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद और कर्नाटक के खिलाड़ी ही राष्ट्रीय टीम तक पहुंच पाते थे, पर धौनी ने छोटे शहरों के बच्चों को क्रिकेट अपनाने के लिए प्रेरित ही नहीं किया, बल्कि उनमें यह विश्वास बनाया कि वे भी राष्ट्रीय टीम में स्थान पा सकते हैं। सही मायनों में वह छोटे शहरों के क्रिकेटरों के लिए रोल मॉडल साबित हुए। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय क्रिकेट मेट्रो शहरों से गांवों तक पहुंच गया। इसे धौनी इफेक्ट ही कहेंगे कि अब भारतीय टीम में बड़े शहरों के मुकाबले छोटे शहरों के खिलाड़ी ज्यादा नजर आते हैं।
भारतीय क्रिकेट को विजय मर्चेंट, सुनील गावस्कर, कपिल देव और सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गज मिले हैं, पर हम धौनी की बात करें, तो वह इन सबसे हटकर हैं। धौनी के आने से न केवल दिशा बदली, बल्कि भारतीय क्रिकेट की चमक और धमक भी बढ़ी। यह इतिहास में दर्ज है कि धौनी के नेतृत्व में जब टी-20 क्रिकेट में जीत हासिल हुई, तब भारत में आईपीएल क्रिकेट संभव हुआ, जिससे दुनिया के सैंकड़ों नए-पुराने खिलाड़ियों को पहले से बहुत बेहतर जिंदगी नसीब हुई।
धौनी के संन्यास लेने के कुछ ही समय के अंदर सुरेश रैना ने भी संन्यास की घोषणा करके सभी को हतप्रभ कर दिया। चेन्नई सुपरकिंग्स के शिविर में शामिल होने से पहले तक यह कहा जा रहा था कि रैना रंगत पा लें, तो उनके अभी भी टीम इंडिया में आने की संभावना है। रैना को खुद भी ऐसा लगता था, लेकिन धौनी और रैना की जोड़ी को जय-वीरू की जोड़ी कहा जाता है। इसलिए लगता है कि दोस्त के फैसले के पीछे उन्होंने भी चलने का फैसला कर लिया। रैना आक्रामक बल्लेबाज होने के साथ जबर्दस्त फील्डर भी हैं। रैना ने भारत को जिताने वाली तमाम पारियां खेली हैं, पर अब उनके करियर पर भी विराम लग गया है। वह भी अब धौनी की तरह आईपीएल में ही नजर आएंगे।
धौनी का आगमन ‘फेब फोर’ यानी सचिन, द्रविड़, सौरव और कुंबले के जमाने में हुआ था। यह वह दौर था, जब भारतीय क्रिकेट में इस चौकड़ी की तूती बोला करती थी। इनके बीच अपनी जगह बना पाना किसी भी खिलाड़ी के लिए आसान नहीं था। ये चारों प्रदर्शन के मामले में तो धुरंधर थे ही, टीम योजनाओं में भी इनकी ही चला करती थी। बाकी खिलाड़ी टीम मामलों में बोलने की हिम्मत नहीं रखते थे, पर धौनी बेखौफ रहने वाले खिलाड़ी हैं। शुरुआती करियर में उन्होंने पहले टीम में अपनी जगह पक्की की और फिर खुलकर अपनी बात रखने का चलन भी शुरू कर दिया। धौनी ने पहला दौरा बांग्लादेश का किया था। सचिन कहते हैं कि इस दौरे पर धौनी के लगाए कुछ शॉटों ने यह साबित कर दिया था कि वह प्रतिभाशाली तो हैं। धौनी 2005 में विशाखापत्तनम में पाकिस्तान के खिलाफ नाबाद 148 रन बनाने में कामयाब हुए और टीम में उनकी जगह पक्की हो गई।
सही मायनों में धौनी के करियर को 2007 के टी-20 विश्व कप में कप्तानी का मौका मिलने से पंख लगे। इस समय तक टी-20 क्रिकेट में भारत की कोई खास पहचान नहीं थी, लेकिन विश्व कप जीतकर धौनी ने सभी को हैरत में ही नहीं डाला, बल्कि अपनी कप्तानी का सिक्का भी जमा दिया। बाद में टीम इंडिया की नियमित कप्तानी मिलने पर उन्होंने टीम की सोच को ही एकदम से बदल दिया। वह सही मायनों में टीम में जुझारूपन लाने वाले कप्तान रहे। उन्होंने खुद टीम के मुश्किल स्थिति में फंसने पर ठंडे दिमाग से खेलते हुए कई बार टीम की नैया पार लगाकर एक अच्छे फिनिशर की अपनी छवि बनाई। इसे देखकर टीम के अन्य सदस्यों ने भी मुश्किल स्थिति में होने पर भी संघर्ष करने का जज्बा विकसित कर लिया। अपनी इसी खूबी की वजह से ही टीम इंडिया दुनिया की नंबर वन टीम बन सकी।
आज विराट कोहली ने भले ही टेस्ट जीत के मामले में धौनी को पीछे छोड़ दिया है, फिर भी धौनी देश के सफलतम कप्तान हैं। वह आईसीसी की तीनों चैंपियनशिप जीतने वाले दुनिया के इकलौते कप्तान हैं। मैदान पर लोग उन्हें खोजेंगे। आगे कौन लेगा उनकी जगह? और वह विकेट के पीछे जो जगह छोड़ गए हैं, वहां उनकी नामौजूदगी न जाने कितने वर्षों तक खलेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) मनोज चतुर्वेदी, वरिष्ठ खेल पत्रकार
दुर्ग / शौर्यपथ / आम जन के सबसे बड़ी ज़रूरत अन्न और जल होती है . यु तो दुर्ग शहर में सालो से निगम प्रशासन द्वारा जल आपूर्ति की जा रही है किन्तु सालो पुराने पाइप लाइन के बदलाव और शुद्ध जल के लिए केंद्र सरकार ने अमृत मिशन योजना का आरम्भ 3 साल पहले ही कर दिया था इस योजना के तहत निकाय क्षेत्र की पुरानी पाइप लाइन बदलने और आवश्यकता अनुसार नए विस्तृत क्षेत्रो में नए पाइप लाइन लगाने की योजना को केंद्र सरकार ने जमीन पर उतारी . दुर्ग निगम में भी यह कार्य पिछले ढाई सालो से जारी है लेकिन अमृत मिशन के कार्य में लापरवाही आये दिन देखने को मिलती ही रहती है जिस पर निगम प्रशासन का मौन रहना और जिम्मेदार अधिकारियों पर किसी तरह की सख्त कार्यवाही का ना करना कई सवालों को जन्म देता है .
अमृत मिशन के कार्यो में लापरवाही के लिये कई बार क्षेत्र के विधायक द्वारा भी प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों को कार्य सुधारने का निर्देश भी दिया गया किन्तु दुर्ग निगम के जिम्मेदार अधिकारी मानो ये तय करके बैठे है कि करोडो के इस कार्य पर ना तो जनप्रतिनिधि की बात सुनेगे और ना ही घोटाले पर कोई कार्यवाही करेंगे और ना ही जिम्मेदार अधिकारियों पर किसी तरह आंच आने देंगे . करोडो के इस महती योजना से पूरा दुर्ग शहर बेहाल है आये दिन शिकायतों के बाद भी निगम आयुक्त बर्मन का मौन रहना क्षेत्र के विधायक वोरा को भी नागवार लग रहा है शायद यही कारण है कि दुर्ग विधायक वोरा द्वारा अमृत मिशन से सम्बंधित कार्यो में हो रही लापरवाही के लिये विधान सभा में भी प्रश्न लगा दिया गया है .

वर्तमान में दुर्ग निगम में अमृत मिशन के कार्य की जिम्मेदारी सब इंजिनियर भीम राव के हांथो में है . दुर्ग निगम में भीम राव सब इंजिनियर को निगम आयुक्त बर्मन द्वारा कुछ दिनों पहले अमृत मिशन के कार्यो में प्राप्त शिकायत की जाँच के लिए निर्देशित भी किया गया किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यह निर्देश भी हवा हवाई हो गयी और हो भी क्यों न जिस सब इंजिनियर ने द्वारा लाखो का कार्य फर्जी स्थान में कर दिया और निगम प्रशासन मौन रहा उस इंजिनियर के हौसले बुलंद होंगे ही . शौर्यपथ समाचार पत्र के पास ऐसे कुछ दस्तावेज है जो ये प्रमाणित करते है कि सब इंजिनियर भीम राव द्वारा कार्य मे किस तरह फर्जी वाडा किया गया है हो सकता है सयुक्त कलेक्टर स्तर के अधिकारी दुर्ग निगम आयुक्त मामले को संज्ञान में लेकर कोई ठोस कार्यवाही करेंगे ...
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
