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June 02, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

ओपिनियन / शौर्यपथ /अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण के शुभारंभ को समूचे भारत और विश्व भर में फैले भारतीय मूल के लोगों और भारत प्रेमियों ने जी भरकर देखा। अगणित लोगों को यह दृश्य एक स्वप्नपूर्ति का अनुभव और आनंद दे गया। लंबे संघर्ष के बाद यह महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त हुई है। असंख्य भारतीयों के चेहरों पर समाधान का तेज और आंखों में हर्ष के आंसू भी देखने को मिले। कई लोगों के लिए यह कार्य-पूर्ति का क्षण था, परंतु वास्तव में यह कार्यारंभ का क्षण है।
भारत में धर्म और सामाजिक जीवन एक-दूसरे से भिन्न नहीं देखे गए हैं। सभी समान हैं। ऐसी भारतीय मान्यता है, और इसे भारत जीता भी आया है। ‘युबांतु’ एक अफ्रीकी संकल्पना है। उसका अर्थ है, ‘मैं हूं, क्योंकि हम हैं’। मैं, मेरा परिवार, ग्राम, राज्य, राष्ट्र, मानवता, मानवेतर जीव सृष्टि, निसर्ग, ये सभी परस्पर जुड़ी हुई क्रमश: विस्तारित होने वाली विभिन्न इकाइयां हैं, यही एकात्म है। इनमें परस्पर संघर्ष नहीं, समन्वय है; स्पद्र्धा नहीं, संवाद है। इन सभी इकाइयों का समुच्चय हमारा जीवन है। ये सब हैं, इसीलिए हम सब हैं। इनके बीच का संतुलन धर्म है और यह संतुलन बनाए रखना ही धर्म स्थापना है। सैकड़ों वर्षों तक भारत सर्वाधिक समृद्ध देश था। सामथ्र्य संपन्न होने पर भी भारत ने अन्य देशों पर युद्ध नहीं लादे। व्यापार के लिए दुनिया के सुदूर कोनों तक जाने के बावजूद भारत ने न उपनिवेश बनाए, न उनका शोषण किया; न उन्हें लूटा, न ही उनका धर्म-परिवर्तन किया और न उन्हें गुलाम बनाकर उनका सौदा किया। भारत में मंदिर आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ श्रेष्ठ लोकाचार और आर्थिक समृद्धि के कारण रहे हैं और केंद्र भी।
1951 मे सोमनाथ मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा करते समय भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के भाषण में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वह कहते हैं, ‘इस पुनीत अवसर पर हम सबके लिए यही उचित है कि हम आज इस बात का व्रत लें कि जिस प्रकार हमने आज अपनी ऐतिहासिक श्रद्धा के इस प्रतीक में फिर से प्राण-प्रतिष्ठा की है, उसी प्रकार हम अपने देश के जन-साधारण के उस समृद्धि मंदिर में भी प्राण-प्रतिष्ठा पूरी लगन से करेंगे, जिस समृद्धि मंदिर का एक चिन्ह सोमनाथ का पुराना मंदिर था।... साथ ही सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण तब तक मेरी समझ में पूरा नहीं होगा, जब तक कि इस देश की संस्कृति का स्तर इतना ऊंचा न हो जाए कि यदि कोई आज का अलबरूनी हमारी वर्तमान स्थिति को देखे, तो हमारी संस्कृति के बारे मे दुनिया को वही बताए, जो भाव उसने उस समय प्रकट किए थे’। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर स्वदेशी समाज में लिखते हैं, ‘हम वास्तव में जो हैं, वही बनें। ज्ञानपूर्वक, सरल और सचल भाव से, संपूर्ण रूप से हम अपने आपको प्राप्त करें।’
वर्ष 1987 में राम-जानकी रथ यात्रा चल रही थी, तब सरसंघचालक बालासाहब देवरस से एक कार्यकर्ता ने पूछा- गौ हत्या प्रतिबंध का आंदोलन, कश्मीर के 370 में सुधार आदि विषय, मांग करके हमने छोड़ दिए, ऐसा लगता है। क्या राम मंदिर के विषय में भी वैसा ही होगा? तब बालासाहब देवरस का उत्तर था, ‘हम इसी निमित्त राष्ट्रीय जागरण करते हैं। यह जागरण सतत किसी न किसी निमित्त से करते रहना चाहिए। आज हिंदू समाज की राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर बहुत नीचा है। इसी कारण ये सारी समस्याएं हैं। जिस दिन संपूर्ण समाज की राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर पर्याप्त उन्नत होगा, तब हो सकता है, इन सभी विषयों के समाधान एक साथ हो जाएं’।
मैल्कॉम ग्लेडवेल की पुस्तक टिपिंग प्वॉइंट : हाउ लिटिल थिंग कैन मेक अ बिग डिफरेंस की व्याख्या वह यूं करते हैं, ‘टिपिंग प्वॉइंट वह बिंदु है, जिस पर छोटे परिवर्तन या घटनाओं की एक शृंखला पर्याप्त महत्वपूर्ण हो जाती है, जिससे बडे़, अधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं’। आज बालासाहब के शब्दों का स्मरण करते हुए लगता है कि उस भाव को व्यक्त करते समय क्या उनका संकेत टिपिंग प्वॉइंट की ओर था?
संघ के ज्येष्ठ प्रचारक और चिंतक दत्तोपंत ठेंगड़ी एक बात हमेशा कहा करते थे, ‘समाज में कुछ लोगों का राष्ट्रीय दृष्टि से जागृत और खूब सक्रिय होना शाश्वत परिवर्तन नहीं लाता है। जब सामान्य व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना का स्तर थोड़ा भी ऊंचा उठता है, तब बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं। इसलिए समय-समय पर कुछ मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय जागरण के प्रयास सतत करते रहने से ही धीरे-धीरे सामान्य व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना का स्तर ऊंचा उठेगा। इन सबके सम्मिलित प्रभाव से राष्ट्रहित के अनेक छोटे-बड़े महत्व के अन्य आवश्यक कार्य सहज होते जाएंगे’।
लगता है, बालासाहब देवरस और ठेंगड़ी जी द्वारा वर्णित वह ‘टिपिंग प्वॉइंट’ निकट आ रहा है, रवींद्रनाथ ठाकुर का वह स्वदेशी समाज सक्रिय हो रहा है। राष्ट्र जीवन के अनेक क्षेत्रों में, अनेक वर्षों से लंबित राष्ट्रहित के मूलभूत परिवर्तन एक के बाद एक हो रहे हैं। देश की रक्षा नीति और विदेश नीति में मूलभूत परिवर्तन विश्व अनुभव कर रहा है। विकेंद्रित और कृषि आधारित अर्थ नीति के आधार पर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का संकल्प प्रकट हो रहा है। भारत की जड़ों से जुड़कर विश्व के आकाश को आगोश में लेने के लिए ऊंची उड़ान भरने वाले पंख देने वाली नई शिक्षा नीति की घोषणा हुई है। समाज के स्वयं के उद्यम और नवाचारों को प्रोत्साहन मिलने का वातावरण बन रहा है। यह सारा एक साथ होता नजर आ रहा है। इस परिवर्तन को 2014 से हुए केंद्रीय सत्ता परिवर्तन के साथ जोड़कर देखना स्वाभाविक है। 16 मई, 2014 के दिन चुनाव परिणामों की घोषणा होने का बाद 18 मई रविवार के संडे गार्जियन के महत्वपूर्ण संपादकीय में एक मूलभूत और गहरी बात कही गई थी, ‘यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारतीय समाज में अंतर्निहित परिवर्तनों की वजह से ही नरेंद्र मोदी आए हैं, किसी दूसरे तरीके से नहीं’। राष्ट्रीय चेतना के सामान्य स्तर के ऊंचा उठने के कारण ही सभी प्रकार के इष्ट परिवर्तन शुरू हुए हैं और सत्ता परिवर्तन भी उसी का भाग है।
अपना दायित्व निभाने के लिए भारत वर्ष अपनी चिर-परिचित शक्ति के साथ खड़ा हो रहा है। अब तक रुके हुए या रोके गए सभी आवश्यक कार्य होना शुरू हो गए हैं। संपूर्ण समाज को सजग रहकर सक्रिय होना होगा। यह वही आत्म-आभास है, जिससे जरूरी आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता अवश्यंभावी है। एक संघ गीत में कहा गया है, अरुणोदय हो चुका वीर, अब कर्मक्षेत्र में जुट जाएं, अपने खून-पसीने द्वारा नवयुग धरती पर लाएं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) मनमोहन वैद्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर कार्यवाह

 

राजनांदगांव / शौर्यपथ / गांवों में स्वच्छता को बढ़ावा देने राज्य स्तर से स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) योजना अंतर्गत चार करोड़ 34 लाख रूपए के पुरस्कार दिए जाएंगे। ग्राम पंचायतों और प्रतिभागियों को गांधी जयंती पर 2 अक्टूबर को पुरस्कृत करेंगे। राज्य स्वच्छता पुरस्कार-2020 के तहत स्वच्छ सुंदर शौचालय पुरस्कार के प्रत्येक विजेता हितग्राही को 5001 रूपए का पुरस्कार दिया जाएगा। इसके लिए जिला स्तर पर दस-दस हितग्राहियों का चयन किया जाएगा। स्वच्छ सुंदर सामुदायिक शौचालय पुरस्कार जिला एवं राज्य स्तर पर दिए जाएंगे। जिला स्तर की विजेता ग्राम पंचायत को 21 हजार रूपए और राज्य स्तरीय विजेता पंचायत को एक लाख रूपए की पुरस्कार राशि दी जाएगी। राज्य स्तर पर उत्कृष्ट सेग्रिगेशन शेड के लिए चयनित ग्राम पंचायत को एक लाख रूपए दिए जाएंगे। माहवारी स्वच्छता प्रबंधन के लिए दो श्रेणियों में विजेताओं का चयन किया जाएगा। जिला स्तर की विजेता पंचायत को 21 हजार रूपए और राज्य स्तरीय विजेता को 51 हजार रूपए के पुरस्कार से नवाजा जाएगा।
विद्यार्थियों में भी स्वच्छता के प्रति जागरूकता लाने स्कूलों के माध्यम से उत्कृष्ट निबंध सृजन प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। जिला स्तर पर पूर्व माध्यमिक और हाईस्कूल दो अलग-अलग वर्गों में आयोजित इस प्रतियोगिता के दोनों वर्गों के विजेताओं को 21 हजार रूपए प्रथम पुरस्कार, 11 हजार रूपए द्वितीय पुरस्कार और पांच हजार रूपए तृतीय पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। जिला स्तर पर आयोजित उत्कृष्ट नारा लेखन प्रतियोगिता के तीन विजेताओं को 21 हजार रूपएए 11 हजार रूपए और पांच हजार रूपए की पुरस्कार राशि दी जाएगी। दीवार लेखन प्रतियोगिता के तहत जिला स्तर पर स्वच्छाग्रही या स्वसहायता समूह के प्रतिभागियों द्वारा दस सर्वश्रेष्ठ लेखन को प्रत्येक को पांच हजार रूपए का पुरस्कार दिया जाएगा।
प्लास्टिक मुक्त ग्राम पंचायतों को जिला एवं राज्य स्तर पर पुरस्कृत किया जाएगा। जिला स्तरीय विजेता को 21 हजार रूपए और राज्य स्तरीय विजेता को एक लाख रूपए का पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत काम कर रहे स्वसहायता समूहों में से उत्कृष्ट स्वच्छाग्रही समूह पुरस्कार के जिला स्तरीय विजेता को 21 हजार रूपए एवं राज्य स्तरीय विजेता को 51 हजार रूपए की पुरस्कार राशि दी जाएगी। राज्य स्तर पर उत्कृष्ट बायोगैस संयंत्र पुरस्कार की विजेता ग्राम पंचायत को 51 हजार रूपए दिए जाएंगे। एस.ई.सी.एल. की सहायता से संचालित दिव्यांगों के लिए सामुदायिक शौचालय निर्माण की पायलट परियोजना के अंतर्गत तीन सर्वश्रेष्ठ ग्राम पंचायतों को ढाई लाख रूपए, डेढ़ लाख रूपए और एक लाख रूपए के पुरस्कार से नवाजा जाएगा।
सामुदायिक शौचालय के उत्कृष्ट ड्राइंग-डिजायन प्रतियोगिता के तहत तीन वर्गों में पुरस्कार दिए जाएंगे। राज्य स्तरीय इस प्रतियोगिता में साढ़े तीन लाख रूपए, साढ़े चार लाख रूपए और साढ़े पांच लाख रूपए लागत के सामुदायिक शौचालय का उत्कृष्ट ड्राइंग-डिजाइन प्रस्तुत करने वाले एक-एक आर्किटेक्ट या इंजीनियर को 51 हजार रूपए का पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। सेग्रिगेशन शेड का उत्कृष्ट ड्राइंग-डिजाइन बनाने वाले तीन विजेताओं को राज्य स्तर पर 21 हजार रूपए, 11 हजार रूपए और पांच हजार रूपए के पुरस्कार दिए जाएंगे। गांव को स्वच्छ बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ कार्ययोजना (Best working plan) सुझाने वाले तीन व्यक्तियों को 21 हजार रूपए, 11 हजार रूपए और पांच हजार रूपए के पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इसी तरह से ग्रामीण स्वच्छता के संबंध में सर्वश्रेष्ठ नवाचार का सुझाव देने वाले तीन प्रतिभागियों को 21 हजार रूपए, 11 हजार रूपए और पांच हजार रूपए के पुरस्कार दिए जाएंगे।
इन प्रतिस्पर्धात्मक पुरस्कारों के साथ ही प्रदेश के एक जिले को एक करोड़ रूपए का स्वच्छता स्थायित्व पुरस्कार, तीन विकासखंडों को 50-50 लाख रूपए और पांच ग्राम पंचायतों को 20-20 लाख रूपए के पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इन पुरस्कारों के लिए आवेदन 30 जुलाई से लिए जाएंगे। प्रविष्टि जमा करने की अंतिम तिथि 15 अगस्त रखी गई है। प्रविष्टि निर्धारित प्रारूप में आवेदन और फोटो के साथ संबंधित जनपद पंचायत के माध्यम से भेजी जा सकती हैं।
सामुदायिक शौचालय के उत्कृष्ट ड्राइंग-डिजायन प्रतियोगिता, सेग्रिगेशन शेड के उत्कृष्ट ड्राइंग-डिजाइन प्रतियोगिता, गांव को स्वच्छ रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ कार्ययोजना Best working plan और ग्रामीण स्वच्छता के संबंध में सर्वश्रेष्ठ नवाचार के सुझाव के लिए प्रविष्टि स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के राज्य कार्यालय को भेजना होगा। अलग-अलग पुरस्कारों के लिए प्राप्त प्रविष्टियों के अंतर्विकासखंड दल, अंतर्जिला दल और राज्य स्तरीय दल या एजेंसी द्वारा भौतिक सत्यापन के बाद विकासखंड स्तरीय, जिला स्तरीय एवं राज्य स्तरीय पुरस्कार चयन समिति द्वारा विजेताओं का चयन किया जाएगा।

राजनांदगांव / शौर्यपथ / कलेक्टर टोपेश्वर वर्मा ने आगामी त्यौहार को देखते हुए कोविड-19 की रोकथाम एवं जीवन की सुरक्षा के लिए सभी नागरिकों को सजगता और सतर्कता रखने कहा है। उन्होंने कहा है कि कोरोना प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने के कारण जिले में दो सब्जी विक्रेताओं की मृत्यु हो गई है।
उन्होंने नागरिकों से अपील करते हुए कहा है कि भीड़ वाली जगहों में जाने से बचें। मास्क का प्रयोग करें एवं सोशल डिस्टेसिंग में रहे। सेनेटाईजर का उपयोग करें एवं हाथ को बार-बार साबुन से धोते रहे तथा स्वच्छता बनाए रखे। कोविड-19 के प्रोटोकॉल का पालन कर जिम्मेदार नागरिक का फर्ज निभाएं।

राजनांदगांव / शौर्यपथ / भारत निर्वाचन आयोग द्वारा फोटोयुक्त निर्वाचक नामावलियों का विशेष संक्षिप्त पुर्नरीक्षण अर्हता 1 जनवरी 2021 का पुर्नरीक्षण संशोधित कार्यक्रम जारी किया गया है। जिसके अनुसार 16 नवम्बर 2020 को मतदाता सूची का प्रारंभिक प्रकाशन किया जाएगा। 16 नवम्बर 2020 से 15 दिसम्बर 2020 तक दावा-आपत्ति लिए जाएंगे। 5 जनवरी 2021 को निर्वाचक रजिस्टीकरण अधिकारी द्वारा प्राप्त दावा-आपत्ति का निराकरण किया जाएगा एवं 15 जनवरी 2021 को मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन किया जाएगा।
जिन नागरिकों की उम्र अर्हता तिथि 1 जनवरी 2021 को 18 वर्ष पूर्ण हो जाएगी, वे अपना नाम मतदाता सूची में जोडऩे हेतु प्रारूप-6 के माध्यम से अपने समीप के मतदान केन्द्र में आवेदन पत्र प्रस्तुत कर सकते हैं। जिन मतदाताओं की मृत्यु हो गई है या अपने मतदान केन्द्र से बाहर निवास कर रहे हैं, शादी होकर ससुराल चले गए हैं, ऐसे मतदाता का नाम प्रारूप-7 के माध्यम से विलोपित किया जाएगा। मुद्रण त्रुटियों के लिए प्रारूप-8 के माध्यम से मुद्रण त्रुटियों के संशोधन हेतु आवेदन पत्र प्रस्तुत कर सकते हैं।

सेहत / शौर्यपथ / अदरक एक ऐसी जड़ीबूटी है, जिसका आयुर्वेद की दुनिया में कई हजारों सालों से इस्तेमाल किया जा रहा है. हां, ये केवल एक ऐसी ही जड़ीबूटी नहीं है, जो आपके खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाती है. ये एक स्वास्थ्यवर्धक जड़ीबूटी है, जो आपको स्वस्थ रखने में मदद करती है. हालांकि, क्या आप जानते हैं कि आपके बालों के लिए अदरक बहुत ही लाभकारी होती है.

अदरक की ही तरह इसका रस भी बेहद लाभकारी होता है और इसमें बहुत से जरूरी न्यूट्रीएंट्स होते हैं, जो आपके बालों को बढ़ाते हैं. तो चलिए आपको बताते हैं कि अदरक का रस बालों को कैसे बढ़ाता है और किस तरह से बालों के लिए फायदेमंद होता है.

बालों को बढ़ाने के लिए फायदेमंद क्यों होता है अदरक का रस
अदरक में जरूरी विटामिन्स और मिनरल्स होते हैं. जैसे मैगनीशियम, पोटैशियम और फॉसफोरस, जो आपकी स्कैल्प को जरूरी पोषण देते हैं और बालों को बढ़ने में मदद करते हैं. इस वजह से पारंपरिक तौर पर बहुत से लोग पहले से ही अदरक का इस्तेमाल बालों को बढ़ाने के लिए करते आ रहे हैं.

अदरक के रस में एंटी इंफ्लामेटरी और एंटीमाइक्रोबायल प्रोपर्टीज होती हैं जो स्कैल्प में खून का सर्कुलेशन बढ़ाते हैं और हेयर फॉलिसेल्स को स्टिम्यूलेट करते हैं, ताकि आपके बाल बढ़ सकें. कई बार बालों के झड़ने का मुख्य कारण डैंडरफ होता है. जब आपका स्कैल्प अस्वस्थ होता है तो उससे आपके सिर में डैंडरफ हो जाता है. अदरक के रस में मौजूद एंटीफंगल प्रोपर्टीज आपकी स्कैल्प को साफ रखती हैं.

इस वजह से अदरक का रस बालों को बढ़ने में मदद करता है और आपको भी इन 4 तरीकों से अदरक के रस का इस्तेमाल करना चाहिए.

1. अदरक का रस
आप चाहें तो अदरक के रस को सीधे अपनी स्कैल्प पर लगा सकते हैं और उन्हें मजबूत और स्वस्थ बना सकते हैं.

आपको चाहिए
- एक ताजी अदरक,
- एक कॉटन पैड

ऐसे करें इस्तेमाल
- एक कटोरी में अदरक का रस निकाल लें.
- अब इस रस को अपने बालों की स्कैल्प पर कॉटन बॉल की मदद से लगाएं. इस रस को अपनी स्कैल्प पर लगाएं. ध्यान रहे कि आप इसे अपने बालों में न लगाएं.
- अब कम से कम आधे घंटे तक इसे बालों में लगे रहने दें.
- शैंपू से अपने बाल धो लें.
- इसके बाद कंडिशनर लगाएं.
- बेहतर नतीजों के लिए हफ्ते में कम से कम तीन बार इसका इस्तेमाल करें.

2. अदरक का रस, ऑलिव ऑयल, नींबू का रस
बालों को शाइनी और स्मूथ बनाने के लिए ऑलिव ऑयल बेहद ही लाभकारी होता है. ये आपकी स्कैल्प को मोइश्चराइज रखता है और बालों को ड्राय होने से बचाता है. वहीं नींबू का रस विटामिन सी का अच्छा स्त्रोत है. इसमें एंटीऑक्सिडेंट्स ब हैं, जो स्कैल्प पर कोलॉजेन के प्रोडक्शन को बूस्ट करता है.

आपको चाहिए
- 2 टेबलस्पून अदरक का रस
- 3 टेबलस्पून ऑलिव ऑयल
- आधा टीस्पून नींबू का रस

ऐसे करें इस्तेमाल
- एक कटोरी में तीनों चीजों को मिला लें.
- अब इस मिक्स्चर को अपने स्कैल्प पर लगाएं.
- इसे 30 मिनट के लिए स्कैल्प पर लगा छोड़ दें और फिर अपने बाल धो लें.
- हफ्ते में एक से दो बार इस नुस्खे का इस्तेमाल करें.

3. अदरक का रस, नारियल का तेल और लहसून
नारियल के तेल का इस्तेमाल बहुत सी महिलाएं अपने बालों को स्वस्थ रखने के लिए करती होंगी. इसमें अधिक मात्रा में लॉरिक एसिड, होता है, जो बालों को डैमेज होने से बचाता है और बालों को बढ़ाता है. वहीं लहसून भी बालों के लिए काफी अच्छा होता है. नारियल के तेल में विटामिन बी, सी और लॉरिक एसिड होता है, जो स्कैल्प को नरिश करता है.

आपको चाहिए
- 1 टीस्पून अदरक का जूस
- 4 टीस्पून नारियल का तेल
- 3 लहसून की तुरी
- 6 टीस्पून नारियल का दूध
- 2 टीस्पून शहद

ऐसे करें इस्तेमाल
- एक कटोरी में सब चीजों को मिला लें.
- अब इसे अपनी स्कैल्प पर लगाएं.
- कम से कम 30 मिनट के लिए इसे लगा छोड़ दें.
- अब अपने बालों को अच्छे से धो लें.
- बेहतर नतीजों के लिए इस नुस्खें का हफ्ते में एक बार इस्तेमाल करें.

4. अदरक का रस और तिल का तेल
विटामिन ई और बी, प्रोटीन और मिनरल से भरपूर तिल ता तेल बालों को अंदर तक नरिश करता है और बालों को बढ़ने में मदद करता है.

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किसानों को 6 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि तीन किस्तों में देने वाले भाजपा नेता एकमुश्त भुगतान का ज्ञान न दें दुर्ग । शौर्यपथ । किसान न्याय योजना की राशि एक साथ देने से संबंधित प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु देव साय के बयान को कांग्रेस ने हास्यास्पद करार दिया है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री राजेंद्र साहू ने कहा कि मोदी सरकार किसानों को 6 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि और कोरोना संकट काल में गरीब जनधन खाताधारकों को महज 15 सौ रुपए की राशि 3 किस्तों में दे रही है। साय में हिम्मत है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से किसानों और गरीबों को एकमुश्त भुगतान कराएं। राशि भुगतान को लेकर साय समेत भाजपा नेताओं को ज्ञान देने की जरूरत नहीं है। राजेंद्र ने कहा कि विष्णु देव साय केंद्रीय इस्पात मंत्री रह चुके हैं। केंद्र में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए वे मोदी सरकार से धान के समर्थन मूल्य में मात्र 53 रुपए की बढ़ाकर 1868 रुपए करने की बजाय सीधे 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल करने की मांग करें। साय को मोदी सरकार से श्रमिक कल्याण रोजगार योजना को छत्तीसगढ़ में लागू करने की मांग भी करना चाहिए। राजेंद्र ने साय पर हमला बोलते हुए कहा कि उन्हें प्रदेश की कांग्रेस सरकार से 18 माह का हिसाब मांगने की बजाय 15 साल के रमन सरकार और 6 साल के मोदी सरकार के कार्यों का हिसाब मांगना चाहिए। मोदी और रमन सिंह ने कितने वादे पूरे किए? इसका हिसाब साय को मांगना चाहिए। किसानों के धान का बोनस हजम करने वाले, रतनजोत से डीजल बनाने के नाम पर घोटाला, मोबाइल बांटकर घोटालेबाजी करने वाले भाजपा नेताओं को भूपेश सरकार से हिसाब मांगने से पहले अपने काले कारनामों का हिसाब देना चाहिए। राजेंद्र ने कहा कि भूपेश बघेल सरकार ने किसानों का कर्जा माफ किया है। धान की खरीदी 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से की गई है। गोधन न्याय योजना के माध्यम से पशुधन की रक्षा करने के साथ ही पशुपालकों की आय बढ़ाने के साथ पशुधन का संरक्षण कर रही है। भाजपा के 15 साल के शासनकाल के दौरान हर योजना में सिर्फ भ्रष्टाचार हुआ है। दूसरी ओर, भूपेश सरकार ने सरकार की योजनाओं का पैसा सीधे किसानों, गरीबों और आदिवासियों के बैंक खाते में डाला है। साय को हिसाब पूछना है तो 15 साल तक रमन सरकार के भ्रष्टाचार का हिसाब मांगे। कांग्रेस सरकार को नसीहत देने की जरूरत नहीं है।

मनोरंजन / शौर्यपथ / बॉलीवुड की मशहूर अदाकारा श्रीदेवी का आज 57वां जन्मदिन है. उनके जन्मदिन के इस खास मौके पर फैंस उन्हें खूब याद कर रहे हैं. दिवंगत एक्ट्रेस श्रीदेवी ने अपने अंदाज और अपनी फिल्मों के जरिए बॉलीवुड की दुनिया में जबरदस्त पहचान बनाई थी. जन्मदिन के इस खास अवसर पर श्रीदेवी का एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है, जिसमें वह हाथ पर सिर रखकर बैठी नजर आ रही हैं. दरअसल, श्रीदेवी का यह वीडियो कौन बनेगा करोड़पति से जुड़ा है, जहां उनसे उन्हीं के गाने के म्यूजिक डायरेक्टर के बारे में पूछा जाता है.उनसे यह सवाल बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन करते हैं.
श्रीदेवीका यह वीडियो उनके फैनपेज ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट से शेयर किया है, जिसे अब तक 14 हजार से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है. वीडियो में श्रीदेवी को एक गाना सुनाया जाता है और पूछा जाता है कि इसके म्यूजिक डायरेक्टर कौन थे. श्रीदेवी को म्यूजिक डायरेक्टर का नाम नहीं याद आता है. इसपर अमिताभ बच्चन कहते हैं कि गाना बहुत सुंदर गाया है आपने. इसपर श्रीदेवी ने कहा, "यह चांदनी फिल्म का गाना है. यश जी ने मुझे कहा कि ये गाना आप गाओगी, तो मैंने इस बात को गंभीरता से ले लिया. लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने क्या कहा."

13 अगस्त 1963 को जन्मी श्रीदेवी ने न केवल बॉलीवुड बल्कि तेलुगु, तमिल, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों में भी अपनी जबरदस्त पहचान बनाई थी. एक्ट्रेस को फर्स्ट फीमेल सुपरस्टार के नाम से भी जाना जाता था. श्रीदेवी ने अपनी फिल्मों और अपने काम के लिए कई अवॉर्ड भी अपने नाम किये थे. एक्ट्रेस ने 24 फरवरी 2018 में दुनिया को अलविदा कह दिया था. उनके निधन के बाद बॉलीवुड इंडस्ट्री के साथ-साथ फैंस को भी काफी झटका लगा था. श्रीदेवी ने चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर 1967 में एक्टिंग करियर की शुरुआत की थी.

 

नजरिया / शौर्यपथ / लैंगिक समानता के क्षेत्र में 11 अगस्त, 2020 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में न केवल बेटियों को बेटों के बराबर के अधिकार पर अपनी मुहर लगाई, अपितु इस विषय से जुड़ी कानूनी अनिश्चितता को भी दूर कर दिया है।
सन 1956 के हिंदू उत्तराधिकार कानून में हिंदू परिवार की संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार नहीं था। यह संविधान के उन आदर्शों के उलट था, जिसमें पुरुषों और महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिलना था। साल 2005 में इस कमी को दूर करने का प्रयास किया गया। हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन करके बेटियों को भी पिता की संपत्ति और दायित्व में बेटों के बराबर अधिकार दे दिया गया था। निश्चित रूप से यह बहुत बड़ा कदम था, इसे 9 सितंबर, 2005 से लागू कर दिया गया। बेटियों के अधिकार को लेकर किसी को कोई भ्रम न था, लेकिन उसके लागू होने की तिथि को लेकर देश भर में विवाद था और आम लोगों के बीच ही नहीं, बल्कि अदालतों के निर्णयों में भी विरोधाभास रहा।
चूंकि 2005 के संशोधन को उसी साल 9 सितंबर से लागू किया गया, इसलिए कुछ लोगों का तर्क था कि यह उन मामलों में लागू नहीं होगा, जिनमें संपत्ति के स्वामी की मृत्यु इसके पहले हो गई हो। अदालतों के फैसले भी अलग-अलग आ रहे थे। परस्पर विरोधी फैसलों के कारण इस विषय पर कानूनी असमंजस की स्थिति बनी हुई थी और इस अस्पष्टता को दूर करना जरूरी था। सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा के मामले में सभी भ्रांतियों को दूर करते हुए न्यायिक रुख स्पष्ट कर दिया है। इसके माध्यम से यह साफ हो गया है कि हिंदू अविभक्त परिवार की संपत्ति में बेटियों को भी बेटों की तरह जन्मना और समांशी अधिकार हासिल है। उनके इस अधिकार पर इस बात का कोई असर नहीं पडे़गा कि उनका जन्म 2005 के संशोधन के पहले हुआ था। यदि पिता की मृत्यु 9 सितंबर, 2005 के पहले हुई हो, तब भी बेटियों के अधिकारों पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि इस निर्णय के माध्यम से बेटियों के अधिकार को विस्तार दिया गया है। इसका किसी रिश्तेदार के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता।
पारंपरिक हिंदू विधि में बेटियों को समांशी नहीं माना जाता था, इसलिए उन्हें परिवार की संपत्ति में जन्मना अधिकार नहीं था। अपने संविधान के माध्यम से हमने ऐसे समाज की कल्पना ही नहीं, अपितु वादा भी किया, जिसमें पुरुष और महिला के बीच कोई भेदभाव नहीं हो। हिंदू विवाह, दत्तक ग्रहण तथा उत्तराधिकार के क्षेत्र में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिया गया। पारंपरिक मिताक्षरा कानून में बेटी को पिंडदान करने का अधिकार नहीं था, इसलिए उसे न तो गोद लिया जा सकता था और न ही संपत्ति में अधिकार था। इन कानूनों ने नए युग का सूत्रपात किया। बेटियों को केवल अधिकार ही नहीं, अपितु उनके दायित्व को भी सुनिश्चित किया। इसका एक उदाहरण दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 है। इसके तहत अन्य बातों के अलावा बच्चों पर अपने माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दी गई है। इसका अर्थ यह लगाया जाता रहा कि यह जिम्मेदारी केवल बेटों तक ही सीमित है। बेटियों को लोग इससे इसलिए मुक्त मानते थे, क्योंकि उन्हें दूसरे घर जाना होता है, पर सुप्रीम कोर्ट ने डॉ विजय मनोहर बनाम काशीराम राजाराम के निर्णय में 1987 में ही स्पष्ट कर दिया था कि केवल बेटे ही नहीं, अपितु बेटी भी और यहां तक कि शादीशुदा बेटी भी अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने को बाध्य है।
लैंगिक समानता के आदर्शों को पूरा करने के लिए हर स्तर पर कार्य हुआ है, जिससे बेटियां मजबूत हुई हैं। ऐसे में, उत्तराधिकार के मामले में बेटियों को कमतर रखना संविधान की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप नहीं था। इसी कमी को दूर करने के लिए 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन किया गया। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के अनुसार, यह देर से लिया गया सही निर्णय था, मगर इस कानून के लागू होने की तिथि के बारे में अस्पष्टता बनी हुई थी। ताजा निर्णय के माध्यम से भ्रम का वातावरण समाप्त हुआ है और लैंगिक समानता से जुड़ी भ्रांतियों का भी निवारण हुआ है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) हरबंश दीक्षित, विधि विशेषज्ञ व सदस्य, उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग

 

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारत का एक प्रमुख आईटी हब माने जाने वाले बेमिसाल शहर बेंगलुरु में सद्भाव का प्रभावित होना न केवल चिंताजनक, बल्कि शर्मनाक भी है। सोशल मीडिया पर महज एक पोस्ट की वजह से भीड़ ऐसे भड़की कि तीन लोगों को अपनी जान देकर और 100 से ज्यादा लोगों को घायल होकर कीमत चुकानी पड़ी। इसके अलावा 110 से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए हैं। हिंसक भीड़ को संभालने में 60 से अधिक पुलिस वाले घायल हुए हैं। सद्भावना से खिलवाड़ के कारण 200 से ज्यादा परिवारों पर सीधे असर पड़ा है और अपेक्षाकृत शांत रहने वाले बेंगलुरु के दामन पर एक दाग आ लगा है। पढ़े-लिखे समझे जाने वाले शहरों में भी अगर एक पोस्ट मात्र से अमन-चैन का माहौल खराब हो सकता है, तो इससे पता चलता है कि भारत में सतर्कता कितनी जरूरी है।
पोस्ट करने वाला शख्स कांग्रेस विधायक का भतीजा बताया जा रहा है, हालांकि उसका कहना है कि उसने पोस्ट नहीं डाली, इसके बावजूद एहतियात बरतते हुए पुलिस ने उसे गिरफ्तार करके ठीक किया है। पूरे मामले की जांच होनी चाहिए कि आखिर पोस्ट किसने लिखी? इसके पीछे कोई साजिश तो नहीं है? सभ्य समाज के लोगों के साथ-साथ सरकार को भी सजग रहना चाहिए, नाना प्रकार के अनर्गल और गैर-कानूनी पोस्ट सोशल मीडिया पर चलती रहती हैं, जिनसे लोगों की भावनाएं आहत होती रहती हैं। कई बार लोग पोस्ट की आक्रामकता या हिंसा झेल लेते हैं, पर कई बार भावना भड़क उठती है। अत: अव्वल तो यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी अवैध-हिंसक-दुर्भावनाओं से भरी पोस्ट को चलने ही न दिया जाए। अगर कोई ऐसी पोस्ट को आगे बढ़ाता है, तो उसे ऐसे दंडित करना चाहिए कि समाज के सामने एक नजीर बन जाए।
दूसरी ओर, किसी भी तरह की हिंसा के लिए भीड़ जुटाने की बढ़ती गैर-कानूनी प्रवृत्ति की पड़ताल भी जरूरी है। एक लोकतांत्रिक देश में ऐसे भीड़-तंत्र को बढ़ाने के अपने खतरे हैं। पुलिस का खुफिया तंत्र मजबूत होना चाहिए, ताकि किसी भी तरह के आपराधिक मकसद या कानून हाथ में लेने के इरादे से कोई साजिश मुमकिन न हो। लोकतंत्र में भीड़ की इस भ्रांति पर अंकुश भी जरूरी है कि वह कुछ भी कर सकती है। दिल्ली में जो दंगे हुए थे, उसमें भी कदम-कदम पर दोनों समुदायों की ओर भीड़ की गलत भूमिका दिखी थी। बेंगलुरु में भी यही हुआ, भीड़ ने विधायक के घर, पुलिस वालों और थाने को निशाना बनाया। उपद्रवियों ने सुबह तक का इंतजार नहीं किया, रात ही ऐसे निकल चले कि गोलीबारी की नौबत आ गई। खुफिया एजेंसियों को यह देखना होगा कि बेंगलुरु में हुई इस हिंसा के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं थी। कर्नाटक के गृह मंत्री ने बिल्कुल सही कहा है, ‘तोड़फोड़ से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता’। बेंगलुरु के डीजे हल्ली व केजी हल्ली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले इलाकों में कफ्र्यू लगा दिया गया है। किसी भी भीड़ को सड़क पर उतरने का मौका नहीं मिलना चाहिए। संयम बरतने के साथ ही, पुलिस साइबर सेल और आईटी कंपनियों को भी पूरी सावधानी बरतनी चाहिए कि सोशल मीडिया के किस भी मंच पर द्वेष-रोष भरे घात-प्रतिघात का नया सिलसिला न चले। साइबर वल्र्ड की गंदगी को वहीं पूरी चौकसी व कड़ाई से साफ करने की जरूरत है, ताकि वह किसी शहर में सड़क पर न नजर आए।

 

मेलबॉक्स / शौर्यपथ / बुलंदशहर की छात्रा सुदीक्षा के साथ जो कुछ हुआ, वह शर्मनाक है। यह घटना बताती है कि देश में अब भी छेड़खानी और बलात्कार मानो सामान्य बात है। लेकिन दुख की बात यह है कि हम अब भी अपने जन-प्रतिनिधियों से कानून-व्यवस्था में सुधार लाने या लड़कियों की सुरक्षा आदि की मांग नहीं करते, बल्कि हमारे लिए जरूरी कुछ अन्य मुद्दे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि कानूनी धाराओं के बेहतर क्रियान्वयन न हो पाने की वजह से ऐसे अपराध दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। अगर पुलिस राह चलते छेड़खानी करने वाले शोहदों को सख्त धाराओं के तहत गिरफ्तार करे और सजा दिलाए, तो संभव है कि उनकी लड़कियों को छेड़ने की फिर कभी हिम्मत नहीं हो। मगर ऐसा हो, तब तो? कुछ दायित्व समाज को भी निभाने होंगे। हरेक माता-पिता को यह बात बचपन में ही अपनी संतान के मन में डालनी होगी कि उन्हें लड़कियों का सम्मान करना चाहिए, अपमान नहीं। अगर हम सब ऐसा कुछ कर सके, तो यकीनन किसी और प्रतिभाशाली सुदीक्षा को यूं अपनी जान नहीं गंवानी पड़ेगी।
शिवानी गांधी
बहराइच, उत्तर प्रदेश

सबक हम लेते नहीं
लगता है कि लोगों ने निर्भया कांड से सबक नहीं लिया है। तभी तो महिलाओं और बच्चियों के साथ दरिंदगी अनवरत जारी है। आए दिन अखबारों में प्रमुखता से छपने वाली ऐसी खबरें पीड़ा पहुंचाती हैं। सरकार ने कठोर कानून जरूर बनाए हैं, अपराधियों को सजा भी मिल रही है, लेकिन शैतान की हैवानियत जारी है। निर्भया के दरिंदों को जब फांसी दी गई थी, तब यह अनुमान लगाया गया था कि अब इस तरह की घटनाएं कम होंगी। मगर लगता है कि इससे कोई सबक नहीं लिया गया। सुदीक्षा के साथ हुई छेड़खानी इसका ताजा उदाहरण है। इन घटनाओं के अपराधी पकड़े भी जाते हैं, तो उन्हें सजा मिलने में इतना अधिक वक्त लग जाता है कि इंसाफ काफी पीछे छूट जाता है। ऐसे मामलों में तुरंत कार्रवाई और दोषियों को त्वरित सजा वक्त का तकाजा है।
अमृतलाल मारू
धार, मध्य प्रदेश

सराहनीय काम
बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में अच्छी इंटरनेट-सेवा मुहैया कराने के लिए ‘ऑप्टिकल फाइबर केबल’ की शुरुआत की। यह निश्चय ही लाभदायक और सराहनीय काम है। इससे अंडमान-निकोबार द्वीप की सुरक्षा में भी मदद मिलेगी और पर्यटन को भी खासा बढ़ावा मिलेगा। अब तक यहां आने वाले पर्यटक अच्छी इंटरनेट-सेवा की कमी महसूस करते रहे हैं। अब ऐसा नहीं हो सकेगा। यहां इंटरनेट की अच्छी सुविधा मिलने से ज्ञान-विज्ञान की शाखाएं भी खुल सकेंगी। इन सबसे डिजिटल इंडिया अभियान को विशेष गति मिलेगी।
सोनू कुमार गोस्वामी, अररिया, बिहार

डॉक्टरों से भेदभाव
कोरोना मरीजों, डॉक्टरों, नर्सों आदि के साथ हमारे समाज में जैसा बर्ताव किया जा रहा है, उसका कारण मानव का स्वार्थी और असंवेदनशील होना है। सच तो यह है कि हमें निरंतर असंवेदनशीलता सिखाई जाती है। जन्म लेते ही बच्चा परिवार में स्व-केंद्रित होना सीखता है, इसलिए भविष्य में यह भूल जाता है कि समाज के प्रति भी उसके कुछ दायित्व हैं। इसका खामियाजा बच्चे के मां-बाप को भी भुगतना पड़ता है। कोरोना के संक्रमण-काल में लोगों का यह भेदभाव इसी का संकेत है। हालांकि, इसमें कुछ लोग अपवाद भी हैं, जिनसे ही यह धरती बेहतर ढंग से चल रही है। इन्हीं अपवादों में कोरोना वॉरियर्स हैं, जो अपनी जान की परवाह किए बिना संक्रमित लोगों का जीवन बचा रहे हैं। इसलिए उनके साथ किसी भी तरह का भेदभाव मानवता के खिलाफ है। हमें इससे बचना चाहिए।
अभिषेक सिंह, जौनपुर

 

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