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June 02, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

दुर्ग / शौर्यपथ / कोविड संक्रमण को रोकने के लिए काम करते हुए इससे संक्रमित होकर एवं स्वस्थ होकर लौटे कोरोना वारियर्स का सम्मान स्वाधीनता दिवस के अवसर पर समारोह के मुख्य अतिथि कृषि एवं जल संसाधन मंत्री श्री रविन्द्र चौबे द्वारा किया जाएगा। इनमें शामिल हैं:-
स्वतंत्रता दिवस सम्मान समारोह श्रेणी स्वास्थ्य - रविचंद्र प्रकाश, कोल्डचैन हैडलर, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, मरोदा, अश्विनी साहू, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, छावनी, लक्ष्मी नारायण, क्र्लक, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, छावनी, राजकुमारी यादव, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, छावनी, अशोक वर्मा, लैब टेक्नीशियन, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, बैकुण्ठधाम, अशोक साहू, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, कोसानगर श्रीमती श्वेता जोसेफ, स्टॉफ नर्स, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, छावनी, श्रीमती तुलसी चतुर्वेदी, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, घासीदास वार्ड, कमलकांत साहू, लैब टेक्नीशियन, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, बघेरा, श्रीमती द्रोपती, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, एस.एस.के. आदर्श नगर, श्रीमती दिव्या, स्टॉफ नर्स, शहरी प्रथामिक स्वास्थ्य केन्द्र, पोटिया, पोषण लाल यादव, फार्मा. ग्रेड-2, सामूदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पाटन, दिव्या सनपाल, फार्मा. ग्रेड-2, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पाटन, टिमनमन लाल साहू, फार्मा. ग्रेड-2, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पाटन, मारुति वैष्णव, सफाई कर्मचारी (जे.डी.एस.), सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पाटन, धनंजय साहू, वाहन चालक (जे.डी.एस.), सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र झीट, श्रीमती सेती बाई, सफाई कर्मचारी (जे.डी.एस.),प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बटरेल, श्रीमती सीमा साहू, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र गाड़ाडीह, श्रीमती देवीला चंद्राकर, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, उपस्वास्थ्य केन्द्र पचपेड़ी पाटन] टेकेश्वर साहू, टी.बी.एच.बी., दुर्ग, श्रीमती इंद्र अमृत, एस.टी.एस., पाटन, डॉ दुर्गेश वर्मा, दंत चिकित्सा अधिकार, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र उतई, चंद्रशेखर पटेल, लैब टेक्नीशियन, डॉ. हरिओम चंद्राकर, चिकित्सा अधिकारी, प्राथ. स्वा. केन्द्र जुनवानी खम्हरिया, श्रीमती रेवती शिवारे, एम.टी. टेकापार बोरी, मंजू पांडे, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, उप स्वास्थ्य केन्द्र मातरा, श्रीमती उमा साहू, एम.टी., बरहापुर, श्रीमती गोमती साहू, मितानीन, करेली पुरदा, श्रीमती लता देती, मितानीन, करेली पुरदा होमिन देशमुख, मितानीन, पोटिया सेवति बोरी, टुपेन्द्र मढ़रिया, पुरूष स्वास्थ्य कार्यकर्ता, उप स्वास्थ्य केन्द्र, कपसदा, श्रीमती अन्नपूर्णा साहू, नेवई, श्रीमती नेहा मार्टिन, स्टॉफ नर्स, जिला अस्पताल दुर्ग, श्रीमती इंदू सिंग, स्टॉफ नर्स, जिला अस्पताल दुर्ग, तोरण लाल ठाकुर, औषधालय सेवक, आयुर्वेद चिकित्सा विभाग और प्रकाश सिंह ठाकुर, औषधालय सेवक, आयुर्वेद चिकित्सा विभाग का नाम शामिल है।

स्वंतंत्रता दिवस समारोह में कोरोना वारियर्स का सम्मान श्रेणी स्वछता
श्रीमती टिकेश्वरी निषाद, सफाई मित्र, नगर पालिक निगम दुर्ग, दयाराम विश्वकर्मा, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, सुरन्ना, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, नेत्रों बाग, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, गजरत पिता नारायण, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, श्रीमती रंजीता धुर्वे, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, श्रीमती नगमा धुर्वे, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, श्री दिलेश्वर सोनवानी, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम रिसाली का नाम शामिल है।

स्वतंत्रता दिवस समारोह में कोरोना वारियर्स का सम्मान श्रेणी (पुलिस विभाग)

ब्रम्हानंद देशलहरे, प्रधान आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, आर.के. तिवारी, प्रधान आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, उत्तम कुमार सोनी, प्रधान आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, पंकज चौबे, प्रधान आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, झग्गर सिंह टंडन, सहायक उप निरीक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, अर्जुन लाल पटेल, उप निरीक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, रमेन्द्र कुमार, उप निरीक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, संतोष वानखेड़े, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, तोरण सांडिल्य, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, ओमप्रकाश देशमुख, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, शकील खान, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, शशिकांत यादव, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, विकास सिंह, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, प्रिंस तिवारी, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, कौशल साहू, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, सत्येन्द्र मढ़रिया, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, श्रीमती धर्मिन साहू, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आंगनबाडी केन्द्र बोरिगारका 1, श्रीमती कमलेश्वरी गजपाल, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आंगनबाडी केन्द्र बोरिगारका 2, श्रीमती उत्तरा पाटिल, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आंगनबाडी केन्द्र मोतिमपुर 02, श्रीमती शिवकुवंर यादव, आंगनबाड़ी सहायिका, आंगनबाड़ी केन्द्र सिपकोन्हा 03, श्री अशोक पारकर, पंचायत सचिव, जनपद पंचायत धमधा, श्रीमती भूपेश्वरी राय सरपंच, ग्राम पंचायत दारगांव का नाम शामिल है।

दुर्ग / शौर्यपथ / लॉकडाउन के नियम व निर्देश अनुसार निर्धारित समय के बाद भी इंदिरा मार्केट स्थित जलाराम चाट भंडार के संचालक हितेश द्वारा दुकान का संचालन करते पाये जाने पर लोकेशन की फोटो खींच कर जिला प्रशासन एवं आयुक्त इंद्रजीत बर्मन के निर्देशानुसार जलाराम चाट भंडार को निगम ने सील कर दिया। कार्यवाही के दौरान बाजार अधिकारी थान सिंग, स्वास्थ्य अधिकारी दुर्गेश गुप्ता एवं उनकी टीम मौके पर उपस्थित थे । सभी दुकानदारों से अपील है कि निर्धारित समय के बाद कोई भी दुकानें संचालित न करें, अन्यथा कड़ी कार्यवाही की जाएगी ।
उल्लेखनीय है कि राज्य शासन के द्वारा प्रदेश में अनलॉकडाउन करने के बाद शहर में व्यवसायों की गतिविधियों को संचालित करने समय का निर्धारण किया गया है। इसके अंतर्गत खारा-मीठा आदि प्रकार के दुकानों का संचालन रात्रि 10 बजे तक संचालित करने कहा गया है। इंदिरा मार्केट में इंदिरा गांधी प्रतिमा के पास स्थित जलाराम चाट भंडार द्वारा रात्रि 10 बजे के बाद भी व्यवसाय किया जा रहा था। अधिक संख्या में आम नागरिक वहॉ उपस्थित थे । निगम बाजार विभाग और स्वास्थ्य विभाग के टीम द्वारा बाजार भ्रमण के दौरान जलाराम चाट भंडार खुला पाया गया। कार्यवाही के दौरान दुकान संचालक हितेश द्वारा हंगामा भी किया गया। जिसे दृष्टिगत रखते हुये मौके पर पुलिस प्रशासन का सहयोग लिया गया और दुकान को सील किया गया। आयुक्त बर्मन ने शहर के समस्त प्रकार के व्यवसायियों से अपील कर कहा है कि वे जिला प्रशासन के निर्देशों व नियमों का पालन करें, व्यवसाय के लिए समय निर्धारित किया गया है जिसके तहत् ही अपने-अपने व्यवसाय का संचालन कर जिला एवं निगम प्रशासन को सहयोग प्रदान करें ।

खाना खजाना / शौर्यपथ /आपको अगर अनोखी रेसिपीज बनाने का शौक है, तो आप मैक्रोनी कप रेसिपी ट्राई कर सकते हैं।

सामग्री :
नमकीन बिस्कुट- 20
चीज- 1/2 कप
दूध- 3 चम्मच
बटर- 3 चम्मच
मैक्रोनी- 8 चम्मच
तेल- 2 चम्मच
बारीक कटी प्याज, शिमला मिर्च और पत्ता गोभी- 5 चम्मच
नमक- स्वादानुसार
टोमैटो सॉस- 2 चम्मच


विधि :
मैक्रोनी को उबाल लें। पैन में तेल गर्म करें और उसमें प्याज और सभी सब्जियों को पांच मिनट तक पकाएं। नमक डालें। दो मिनट और पकाएं। उबली हुई मैक्रोनी डालें, सॉस डालें। अच्छी तरह से मिलाएं और गैस ऑफ कर दें। अब कप बनाने के लिए एक पॉलिथिन में बिस्कुट डालें और बेलन की मदद से बिस्कुट का बारीक पाउडर बना लें। ओवन को 350 डिग्री फॉरेनहाइट पर पहले से गर्म कर लें। एक बाउल में बिस्कुट का यह पाउडर डालें। बाउल में आधा कप चीज और दूध डालें। दूध धीरे-धीरे डालें। बिस्कुट को गूंद लें। मफिन पैन पर बटर लगाएं। थोड़ा-सा मिश्रण मफिन कप में डालें और उसे अच्छी तरह से फैलाकर छोटे से कप का आकार दें। चार मफिन कप ऐसे ही बनाएं और उसे 350 डिग्री फॉरेनहाइट पर तीन से चार मिनट तक बेक करें। किनारे से जब उसका रंग सुनहरा हो जाए तो फोर्क की मदद से मफिन कप को हल्का-सा ढीला कर दें, पर उसे बाहर न निकालें। अब तैयार मैक्रोनी को कप में डालें। ऊपर से कद्दूकस किया चीज डालें। मैक्रोनी कप को वापस ओवन में डालें और चीज के पिघलने तक बेक करें। दो-तीन मिनट के बाद मैक्रोनी कप को चम्मच की मदद से मफिन कप से बाहर निकाल लें। गर्मागर्म सर्व करें।

मनोरंजन / शौर्यपथ / बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं। वह अपने फैन्स से जुड़े रहने के लिए कुछ न कुछ पोस्ट शेयर करते रहते हैं। अब बिग बी ने इंस्टाग्राम पर अपनी कुछ फोटो शेयर करते हुए बताया है कि उन्होंने मां की पुण्यतिथि पर गुलमोहर का पेड़ लगाया है। इसके अलावा उन्होंने बताया कि 44 साल पहले उन्होंने अपने घर प्रतीक्षा में गुलमोहर का पेड़ लगाया था, जो तूफान के चलते गिर गया था।

फोटो में अमिताभ बच्चन गुलमोहर के पेड़ के साथ नजर आ रहे हैं। वह कुछ लोगों के साथ मिलकर घर में गुलमोहर का पेड़ लगा रहे हैं। इसके कैप्शन में उन्होंने लिखा, ''जो बसे हैं वे उजड़ते हैं, प्रकृति के जड़ नियम से, पर किसी उजड़े हुए को, फिर से बसाना कब मना है? है अंधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है?''

उन्होंने लिखा, ''इस बड़े गुलमोहर के पेड़ को मैंने एक पौधे के रूप में लगाया गया था, जब हमें 1976 में अपना पहला घर प्रतीक्षा मिला था। कल मेरी मां का जन्मदिन था। उनके नाम पर एक नया गुलमोहर का पेड़ उसी जगह पर लगाया है।''

गौरतलब है कि कुछ समय पहले ही अमिताभ बच्चन कोरोना को मातकर देकर अस्तपाल से घर वापस पहुंचे हैं। अमिताभ के अलावा बेटे अभिषेक, बहू ऐश्वर्या राय बच्चन और पोती आराध्या भी कोरोना पॉजिटिव पाई गई थीं लेकिन हाल ही में सभी सदस्य ठीक हो चुके हैं। सबसे आखिर में 8 अगस्त को अभिषेक बच्चन कोरोना से स्वस्थ होकर घर लौटे हैं।

 

खेल / शौर्यपथ / मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने इंटरनैशनल क्रिकेट में सेंचुरी की सेंचुरी लगाई है, ऐसा करने वाले वो दुनिया के इकलौते बल्लेबाज हैं। आज से ठीक 30 साल पहले सचिन ने करियर की पहली सेंचुरी ठोकी थी। 1989 में इंटरनैशनल डेब्यू करने वाले तेंदुलकर 1990 में इंग्लैंड दौरे पर टीम इंडिया का हिस्सा थे। तीन मैचों की टेस्ट सीरीज का दूसरा टेस्ट मैच 9 से 14 अगस्त के बीच मैनचेस्टर में खेला गया था। इस मैच के आखिरी दिन यानी कि 14 अगस्त को तेंदुलकर ने करियर की पहली सेंचुरी ठोकी थी।

इस सेंचुरी के साथ ही तेंदुलकर ने इंटरनैशनल क्रिकेट में 100 सेंचुरी के सफर का आगाज किया था। तेंदुलकर को उस टेस्ट में मैन ऑफ द मैच भी चुना गया था, उनकी सेंचुरी के दम पर ही भारत वो टेस्ट मैच ड्रॉ कराने में सफल रहा था। भारत को दूसरी पारी में इंग्लैंड ने 408 रनों का टारगेट दिया था। तेंदुलकर छठे नंबर पर बल्लेबाजी करने उतरे थे। टीम इंडिया ने 127 रनों पर पांच विकेट गंवा दिए थे और टीम पर हार का संकट मंडरा रहा था, तब तेंदुलकर क्रीज पर उतरे थे।

तेंदुलकर ने पहले कपिल देव के साथ और फिर मनोज प्रभाकर के साथ मिलकर टीम इंडिया को हार से बचाया था। तेंदुलकर उस मैच में 119 रन बनाकर नॉटआउट लौटे थे। पहली पारी में भी तेंदुलकर ने जबर्दस्त बल्लेबाजी करते हुए 68 रन बनाए थे। उस समय टीम इंडिया के कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन थे और उन्होंने पहली पारी में 179 रन बनाए थे।

टीम इंडिया सीरीज का पहला मैच 247 रनों से गंवा चुकी थी, ऐसे में दूसरा टेस्ट मैच हारने का मतलब था कि इंग्लैंड को सीरीज में अजेय बढ़त मिल जाती, लेकिन तेंदुलकर ने इंग्लैंड के इरादों को पूरा नहीं होने दिया था। सीरीज का आखिरी टेस्ट मैच भी ड्रॉ रहा था और इंग्लैंड ने सीरीज 1-0 से अपने नाम कर ली थी। तेंदुलकर ने भारत के लिए 200 टेस्ट मैचों में 51 सेंचुरी और 463 वनडे इंटरनैशनल मैचों में 49 सेंचुरी जड़ी हैं। तेंदुलकर ने 2013 में अपना आखिरी इंटरनैशनल मैच खेला था।

शौर्यपथ / ऋषि-मुनियों और अवतारों की भूमि 'भारतÓ एक रहस्यमय देश है। भारत में ऐसे कई स्थान हैं जिनका आज भी रहस्य बरकरार है। इन अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने का क्या कोई प्रयास कर रहा है? वैसे तो भारत में हजारों अनसुलझे रहस्य हैं लेकिन यहां प्रस्तुत हैं प्रमुख 10 अनसुलझे रहस्य।
1. रहस्यों से भरे मंदिर : श्रीपद्मनाभम मंदिर, वृंदावन निधिवन का रंगमहल, कन्याकुमारी मंदिर, करनी माता का मंदिर, शनि शिंगणापुर, सोमनाथ मंदिर, कामाख्या मंदिर, महाकाल मंदिर, काल भैरव उज्जैन मंदिर, अजंता-एलोरा के मंदिर, खजुराहो का मंदिर, ज्वालादेवी का मंदिर, लेपाक्षी का मंदिर और जगन्नाथ का मंदिर। ऐसे सैंकड़ों मंदिर है जो किसी न किसी रहस्य के कारण आज भी उनका रहस्य अनसुलझा है।
2. समुद्र के नीचे द्वारिका : गुजरात के तट पर भगवान श्रीकृष्ण की बसाई हुई नगरी यानी द्वारिका। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं। यह रहस्य अभी भी बरकरार है कि यह नगरी किसी तरह नष्ट हो गई थी और यह कितने हजार वर्ष प्राचीन है।
3. कैलाश पर्वत और मानसरोवर : यह दुनिया का सबसे रहस्यमयी और विचित्र स्थान है। इसे अप्राकृतिक शक्तियों का केंद्र माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह धरती का केंद्र है। यह एक ऐसा भी केंद्र है जिसे एक्सिस मुंडी कहा जाता है। एक्सिस मुंडी अर्थात दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र। यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है, जहां दसों दिशाएं मिल जाती हैं। इस स्थान से जुड़े अनगिनत रहस्य हैं।
4. सोन के भंडार : श्रीपद्मनाभम मंदिर के अलावा कहते हैं कि बिहार के राजगीर में छुपा है मौर्य शासक बिम्बिसार का अमूल्य स्वर्ण भंडार। बिहार का एक छोटा-सा शहर राजगीर, जो कि नालंदा जिले में स्?थित है, कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जाता है। यह शहर प्राचीन समय में मगध की राजधानी था। इसी राजगीर में है सोन भंडार गुफा। इस गुफा के बारे में कहा जाता है कि इसमें बेशकीमती खजाना छुपा है जिसे कि आज तक कोई नहीं खोज पाया है। यह खजाना मौर्य शासक बिम्बिसार का बताया जाता है, हालांकि कुछ लोग इसे पूर्व मगध सम्राट जरासंध का भी बताते हैं।
5. अलेया भूत लाइट : पश्चिम बंगाल के दलदली इलाकों में कई बार रहस्यमयी रोशनी देखे जाने की जानकारी मिली थी। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह उन मछुआरों की आत्माएं हैं, जो मछली पकड़ते वक्त किसी वजह से मर गए थे। लोग इन्हें भूतों की रोशनी भी कहते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि जिन मछुआरों को यह रोशनी दिखती है, वे या तो रास्ता भटक जाते हैं या ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह पाते। इन दलदली क्षेत्रों से कई मछुआरों की लाशें भी मिली हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन यह मानने को तैयार नहीं कि यह भूतों के चलते ऐसा हुआ। हालांकि अभी तक इस रहस्य से भरी गुत्थी सुलझ नहीं पाई है। वैज्ञानिकों को अंदेशा है कि दलदली क्षेत्रों में अक्सर मीथेन गैस बनती है और वे किसी तत्व के संपर्क में आने से रोशनी पैदा करती है।
6. रूपकुंड झील : मानसरोवर के अलावा भारत में ऐसी कई झीलें या ताल हैं जो कि बहुत ही रहस्यमयी है जैसे महाराष्ट्र में बुलढाना जिले में स्थित लोणार की झील। इसी तरह रूपकुंड झील या नदी हिमालय पर्वतों में स्थित है। इस तट पर मानव कंकाल पाए गए हैं। पिछले कई वर्षों से भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के विभिन्न समूहों ने इस रहस्य को सुलझाने के कई प्रयास किए, पर वे नाकाम रहे। भारत के उत्तरी क्षेत्र में खुदाई के समय नेशनल जिओग्राफिक (भारतीय प्रभाग) को 22 फुट का विशाल नरकंकाल मिला है। उत्तर के रेगिस्तानी इलाके में एम्प्टी क्षेत्र के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र सेना के नियंत्रण में है। यह वही इलाका है, जहां से कभी प्राचीनकाल में सरस्वती नदी बहती थी। माना जा रहा है कि इस तरह के विशालकाय मानव 5 लाख वर्ष पूर्व से 1 करोड़ 20 लाख वर्ष पूर्व के बीच में धरती पर रहा करते थे जिनका वजन लगभग 550 किलो हुआ करता था।
7. जतिंगा गांव : असम में स्थित यह गांव पक्षी आत्महत्या की घटनाओं के लिए सुर्खियों में बना हुआ है। कहा जाता है कि पक्षी यहां आकर आत्महत्या करते हैं। जापान के माउंट फूजी तलहटी में आवकिगोहारा के घने जंगल में जिस तरह से लोग आत्महत्या करने आते हैं, ठीक उसी तरह से मानसून की बोझिल रात में जतिंगा के आसमान पर मंडराने लगता है मौत का काला साया। रोशनी की ओर झुंड के झुंड पखेरू आते हैं और काल के गाल में समा जाते हैं। चिडिय़ों के इस प्रकार सामूहिक आत्महत्या के पीछे क्या कारण है इस बात का पता आज तक नहीं लगाया जा सका। इस बात का पता लगाने के लिए कई शोध हो चुके हैं, परंतु प्रकृति के इस गूढ़ रहस्य के बारे में अभी भी ठोस रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। असम के कछार स्थित इस घाटी के रहस्यों को जानना जरूरी है।
8. भारत की गुफाएं : भारत में बहुत सारी प्राचीन गुफाएं हैं, जैसे बाघ की गुफाएं, अजंता- एलोरा की गुफाएं, एलीफेंटा की गुफाएं और भीम बेटका की गुफाएं। ये सभी गुफाएं किसने और कब बनाईं? इसका रहस्य अभी सुलझा नहीं है। अखंड भारत की बात करें तो अफगानिस्तान के बामियान की गुफाओं को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। भीमबेटका में 750 गुफाएं हैं जिनमें 500 गुफाओं में शैलचित्र बने हैं। यहां की सबसे प्राचीन चित्रकारी को कुछ इतिहासकार 35 हजार वर्ष पुराना मानते हैं, तो कुछ 12,000 साल पुरानी। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित पुरापाषाणिक भीमबेटका की गुफाएं भोपाल से 46 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। ये विंध्य पर्वतमालाओं से घिरी हुई हैं। भीमबेटका मध्यभारत के पठार के दक्षिणी किनारे पर स्थित विंध्याचल की पहाडिय़ों के निचले हिस्से पर स्थित है। पूर्व पाषाणकाल से मध्य पाषाणकाल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र रहा।
9. तिब्बत का यमद्वार : प्राचीन काल में तिब्बत को त्रिविष्टप कहते थे। यह अखंड भारत का ही हिस्सा हुआ करता था। तिब्बत को चीन ने अपने कब्जे में ले रखा है। तिब्बत में दारचेन से 30 मिनट की दूरी पर है यह यम का द्वार। यम का द्वार पवित्र कैलाश पर्वत के रास्ते में पड़ता है। हिंदू मान्यता अनुसार, इसे मृत्यु के देवता यमराज के घर का प्रवेश द्वार माना जाता है। यह कैलाश पर्वत की परिक्रमा यात्रा के शुरुआती प्वाइंट पर है। तिब्बती लोग इसे चोरटेन कांग नग्यी के नाम से जानते हैं, जिसका मतलब होता है दो पैर वाले स्तूप। ऐसा कहा जाता है कि यहां रात में रुकने वाला जीवित नहीं रह पाता। ऐसी कई घटनाएं हो भी चुकी हैं, लेकिन इसके पीछे के कारणों का खुलासा आज तक नहीं हो पाया है। साथ ही यह मंदिरनुमा द्वार किसने और कब बनाया, इसका कोई प्रमाण नहीं है। ढेरों शोध हुए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका।
10. भारत के विचित्र मानव : ऐसे कई लोग हैं जिनके बारे में दावा किया जाता है कि वे हजारों वर्षों से जीवित हैं। अश्वत्थामा, हनुमानजी, जामवंत, विभीषण, पराशुराम, महर्षि व्यास, कृपाचार्य, राजा बली आदि।
भारत में देवहरा बाबा के बारे में दावा किया जाता है कि वे 750 वर्ष तक जिंदा रहे। उनकी मौत 1990 में हो गई थी। त्रैलंग स्वामी जिन्हें 'गणपति सरस्वतीÓ भी कहते हैं, उनकी उम्र 286 वर्ष की थी। त्रैलंग स्वामी का जन्म नृसिंह राव और विद्यावती के घर 1601 को हुआ था। वे वाराणसी में 1737-1887 तक रहे। इसी तरह शिवपुरी बाबा थे, जो 27 सितंबर 1826 में जन्मे और जनवरी 1963 में उन्होंने देह त्याग दी। बंगाल के संत लोकनाथजी का जन्म 31 अगस्त 1730 को हुआ और 3 जून 1890 को उन्होंने देह छोड़ दी।...इसी तरह महावतार बाबा के बारे में कहा जाता है कि वे पिछले 5000 वर्षों से जीवित हैं। सवाल लंबे काल तक जिंदा रहने का नहीं कई चमत्कारिक, सिद्ध, जादूगर और अजीब ही तरह के करतब बताने वाले लोग भी रहे हैं।

धर्म संसार / शौर्यपथ / इसके बाद नारदजी शिशुपाल को उसके तीन जन्मों के बारे में बताते हैं। नारदजी बताते हैं कि सनक और सनंदन के श्राप के चलते जय और विजय आकाश से धरती की ओर गिरने लगे और फिर वे ऋषि कश्यप की पत्नी दिति के गर्भ से जुड़वा भाइयों के रूप में हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में जन्में। दोनों ही महाशक्तिशाली दैत्य थे और उनके कारण धरती पर अत्याचार और अन्याय का शासन स्थापित हो चला था। हिरण्याक्ष का वध श्रीहरि ने वराह रूप धारण करके किया तो हिरण्यकश्यप का वध नृसिंह अवतार धारण करके किया।
इसके बाद नारदजी बताते हैं कि पुन: तुम दोनों का जन्म दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण के रूप में हुआ। तब श्रीहरि विष्णु ने राम बनकर पहले कुंभकर्ण और बाद में रावण का वध किया। रावण के रूप में तुम थे तो विजय कुंभकर्ण था। फिर नारदजी कहते हैं- अब यह तुम्हारा अंतिम जन्म था जिसमें तुम श्रीकृष्ण की बुआ के पुत्र शिशुपाल के रूप में जन्में और प्रभु ने अपने हाथों तुम्हें मानव शरीर से मुक्त करके तुम्हारा उद्धार किया। यह सुनकर जय अर्थात शिशुपाल पूछता है कि मुनिराज कृपया ये तो बताइये की इस जन्म में मेरा साथी विजय कहां है? इस पर नारदजी कहते हैं कि वह श्रीकृष्ण की बड़ी बुआ के पुत्र के रूप में दंतवक्र के रूप में तुम्हारे साथ ही इस धरती पर जन्मा था। शीघ्र ही वह भी भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मुक्ति पाएगा। यह सुनकर जय पूछता है- परंतु कब तक? तब नारदजी कहते हैं- जब पांडवों का राजसूय यज्ञ होने के पश्चात भगवान द्वारिका लौटेंगे जब वह द्वारिका पर आक्रमण करेगा तब परंतु अभी तो इंद्रप्रस्थ में ही भगवान उत्सव का आनंद ले रहे हैं। उनके साथ इंद्रप्रस्थ में पधारे हुए सभी अतिथिगण भी पांडवों का वैभव देखकर चकित हो रहे हैं।
फिर उधर बलराम, दुर्योधन, द्रुपद आदि सहित सभी लोग इंद्रप्रस्थ के वैभव का अवलोकन करते हैं। उनके चमत्कारिक और जगमगाते महल को देखकर सभी अचंभित हो रहे होते हैं। शकुनि और दुर्योधन को समझ में नहीं आता है कि ये कैसा मायाजाल है। दुर्योधन संकेतों से शकुनि को आगे बढ़ने का कहता है।
शकुनि एक महल के अंदर के एक कक्ष के द्वार
पर खड़ा होकर कहता है- आओ चलो, चलो अंदर। तब जैसी ही दुर्योधन द्वार के अंदर जाने लगता है तो उससे टकरा जाता है। उसकी नाक पर लग जाती है। शकुनि भी कहता है- अरे भांजे। तब दुर्योधन हाथ लगाकर देखता है तो पता चलता है कि द्वार की जगह तो दीवार है जो द्वार जैसी दिखाई दे रही है। शकुनि भी भीतर जाने का प्रयास करता है तो टकरा जाता है। दोनों अचरज में पड़ जाते हैं तब शकुनि कहता है- चलो भांजे चलो, ये कैसी माया है।
फिर वह दूसरे खुले दरवाजे के पास जाते हैं तो उन्हें लगता है कि यह भी भ्रम होगा जब वह उसमें जाने का प्रयास करते हैं तो गिरते गिरते बचते हैं क्योंकि असल में वह दरवाजा ही होता है दीवार नहीं। शकुनि कहता है- भांजे चलो। दोनों उसमें प्रवेश कर जाते हैं। वहां अदंर उन्हें भव्य महल नजर आता है जिसके ऊपर चारों ओर बालकनी रहती है और ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां भी होती है। उन्हें महल के बीचोबीच विशालकाय चमचमाता कालीन बिछा हुआ नजर आता है।

वह कालीन के पास जाते हैं तो शकुनि कहता है इतना सोना। फिर आगे बढ़ने लगते हैं तो उन्हें अजीबसा नजर आता है। शकुनि कहता है- भांजे ये क्या अचंभा है ये पानी कहां से आ गया? उस जगह को तरणताल समझकर तब दोनों अपने वस्त्र ऊपर करके आगे बढ़ते हैं लेकिन जैसे ही पैर रखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि पानी जैसा दिखाई दे रहा हैं किंतु पानी नहीं है। इस पर शकुनि कहता है भांजे ये पानी है या पानी नहीं है? फिर वो दोनों पैरों से भूमि को ठोककर देखते हैं तो पानी महसूस नहीं होता है। तभी उन्हें बालकनी से महिलाओं के हंसी-ठिठोली की आवाज सुनाई देती है। फिर वे दोनों अपने वस्त्र (धौती) को नीचे करके निश्चिंत होकर चलने लगते हैं तभी आगे थोड़ी दूर चलकर वे एक पट्टेदार जगह पर खड़े होकर पीछे देखते हैं तो पानी गायब हो जाता है और उन्हें भूमि ही नजर आती है लेकिन ज्योंहि वह आगे देखते हैं तो उन्हें पुन: पानी नजर आता है।

तब दुर्योधन असमंजस में पड़कर सकुचाकर कहता है- चुपचाप आगे चलिये मामाश्री। शकुनि कहता है- हां चलो भांजे चलो। दोनों आगे चलकर पुन: दूसरी पट्टेदार भूमि पर खड़े होकर पीछे देखते हैं तो उन्हें पानी नजर नहीं आता है और आगे देखते हैं तो पुन: तरणताल जैसा नजर आता है। फिर वह दोनों एक दूसरे की ओर देखकर हंसने लगते हैं और शकुनि कहता है- चलो भांजे चलो। तब जैसे ही दुर्योधन आगे कदम बढ़ाता है वैसे ही वह तरणताल में गिर जाता है और गिला हो जाता है। यह देखकर बालकनी में स्थित द्रौपदी अपनी सखियों के साथ यह दृश्य देखकर हंसने लगती है। शकुनि उसे हाथ पकड़कर बाहर निकालता है।
बाहर निकलकर वह ऊपर देखता है कि द्रौपदी जोर-जोर से हंस रही है। भिगा हुआ खड़ा दुर्योधन कहता है- मामाश्री चलो यहां से। तभी द्रौपदी कहती है- देवरजी! ओ देवरजी ये हस्तिनापुर नहीं है जहां देखे बिना भी चल सकते हैं। ये तो इंद्रप्रस्थ के महल है जहां आंखें खोल कर चलना पड़ता है। ऐसा कहकर वह व्यंगात्मक हंसी हंसने लगती है। यह सुनकर दुर्योधन क्रोधित होकर कहता है- आज की हंसी तुझे महंगी पड़ेगी रानी, बहुत महंगी पड़ेगी। चलो मामाश्री। ऐसा कहकर दुर्योधन वहां से चला जाता है।
उधर, श्रीकृष्ण और बलराम के साथ पांचों पांडवों को हंसते हुए बताया जाता है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं- अच्छा तो महाराज आज्ञा दें। मराजा युधिष्ठिर कहते हैं- अरे इतनी शीघ्रता भी क्या है? हम आपको अभी जाने नहीं देंगे कन्हैया। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- महाराज जाना तो होगा ही। कितने दिन हो गए हम दोनों द्वारिका से बाहर हैं, वहां की व्यवस्था भी तो संभालनी पड़ेगी। इस पर युधिष्ठिर कहते हैं कि परंतु मुझे आप दोनों को छोड़ने का जी नहीं करता। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि इसीलिए तो मैं दाऊ भैया को यहीं छोड़े जा रहा हूं और उनका भी मन है कि वे कुछ दिन यहीं ठहरें और उनके बदले में मैं अपने प्रिय सखा अर्जुन को ले जा रहा हूं।
इस पर बलरामजी कहते हैं जाने दीजिये महाराज युधिष्ठिर कन्हैया को। वहां रुक्मिणी भी तो अधीर हो रही होगी। यह सुनकर सभी हंसने लगते हैं। फिर अर्जुन और श्रीकृष्ण को ‍वहां से द्वारिका के लिए विदा किया जाता है।

इधर, शकुनि कहता है दुर्योधन से कि लो भांजे तुम्हारा काम तो बन गया। कृष्ण और अर्जुन दोनों द्वारिका चले गए हैं। अब तुम्हें बलराम मिल गए हैं और वह भी अकेले। वो यहीं पर रुके हुए हैं। तो बस अब पूरी तरह से बलराम की सेवा करो और उनकी खूब चापलूसी करो हां। चाहे जैसे भी हो तुम्हें उन्हें अपना गुरु बनाना ही होगा। भांजे यदि तुमने ऐसा कर लिया तो विजयश्री तुम्हारे भी भाल पर होगी हां। यह सुनकर दुर्योधन कहता है- ठीक है मामाश्री ठीक है।
फिर जब बलरामजी यमुना किनारे ध्यान और संध्यावंदन कर रहे होते हैं तब शकुनि और दुर्योधन वहां पहुंच जाते हैं। ध्यान करने के बाद वे सूर्य को अर्ध्य देते हैं और फिर जब वे पलटकर पुन: लौटने लगते हैं तो देखते हैं कि उनके मार्ग में फूल बिछे हुए हैं। वो ये देखकर आश्चर्य से प्रसन्न हो जाते हैं। फिर वह फूलों पर कुछ दूर चलने के बाद कहते हैं- कोई है, कोई है? मेरी राहों में फूल बिछाकर मेरा सम्मान किया है, उस पर मैं प्रसन्न हूं। जिस व्यक्ति ने मेरा स्वागत किया है उसे मैं देखना चाहता हूं।

कुछ देर बार दुर्योधन हाथ जोड़े उनके समक्ष उपस्थित होता है। यह देखकर बलरामजी कहते हैं- दुर्योधन तुम? तब दुर्योधन कहता है- हां बलराम भैया। तभी शकुनि भी पीछे से आकर कहता है- प्रणाम द्वारिकाधीश। स्वागत है आपका द्वारिकाधीश। तब बलराम कहते हैं कि परंतु ऐसा स्वागत करने की क्या जरूरत थी? तब शकुनि कहता है कि ऐसा स्वागत कुछ महान हस्तियों का ही किया जाता है द्वारिकाधीश। आप शायद जानते नहीं कि हस्तिनापुर का युवराज दुर्योधन आप ही की पूजा करता है। यह सुनकर दुर्योधन उनके चरणों में फूल अर्पित करके घुटने के बल बैठ जाता है। तब बलराम कहते हैं- अरे ये क्या कर रहे हो दुर्योधन? इस पर शकुनि कहता है ये तो अपने देवता की पूजा कर रहा है पूजा द्वारिकाधीश।
फिर शकुनि भीम और श्रीकृष्ण के संबंध में बलरामजी से उल्टी-सीधी बातें करके उनके मन में शंका उत्पन्न करता है। वह कहता है कि भीम कह रहा था कि गदा युद्ध में मैं बलराम भैया से भी ज्यादा निपुण हो गया हूं और श्रीकृष्ण कह रहे थे कि बलराम भैया तो मुझे नाहक ही हर बात पर डांटते रहते हैं। फिर शकुनि कहता है कि सच तो ये है बलराम भैया द्वारिका की रक्षा तो आपन ही करते हैं आप ही द्वारिकाधीश है।...इस तरह शकुनि श्रीकृष्ण और बलरामजी के बीच दरार पैदा करने का प्रयास करता है।
इस तरह दुर्योधन और शकुनि चापलूसी करके बलराम को गद्गद कर देते हैं और बलरामजी के मन में भीम के प्रति शंका भर देते हैं। तब अंत में बलरामजी दुर्योधन को गदा चलाना सिखाने के लिए तैयार हो जाते हैं। फिर दुर्योधन विधिवत रूप से बलरामजी को अपना गुरु बनाता है और फिर बलरामजी उसे गदा देकर कहते हैं कि तुम्हारा अध्ययन शीघ्र ही शुरु हो जाएगा शिष्य दुर्योधन।...जय श्रीकृष्णा।

नजरिया / शौर्यपथ /नब्बे वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त, 1947 को हमारे देश को आजादी मिली थी। अंगे्रजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए जो कीमत और कुर्बानी हमारे पुरखों ने चुकाई है, वह हमारे लिए पे्ररणा का स्रोत है। लेकिन इस मौके पर यह जानना भी जरूरी है कि जो देश धर्म, दर्शन, कला और विज्ञान के क्षेत्र में शताब्दियों तक विश्व के मानचित्र पर चमकता रहा, वह गुलाम कैसे हो गया? आपसी फूट, विशेषकर यहां के शासकों तथा राजवंशों में पारस्परिक ईष्र्या, ऊंच-नीच के भेद, जनसमूह में राजनीतिक ज्ञान के अभाव, अर्थ-संचय, वैज्ञानिक उन्नति के प्रति उदासीनता, और इन सबसे बढ़कर हर स्थिति में चुपचाप बैठे रहने की प्रवृत्ति ने हमें पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों का गुलाम बना दिया। इसलिए गुलामी के इन कारणों को समझना जरूरी है, ताकि भविष्य में कभी देश गुलाम न हो।
स्वाधीनता कभी-कभी भौतिक दुर्बलता के कारण हाथ से निकल जाती है, परंतु पराधीनता राष्ट्रीय चरित्र की दुर्बलता से उत्पन्न होती है। और जब पराधीन राष्ट्र में ठोकर खाते-खाते सोई हुई ऊंची भावनाएं जागती हैं, तब वह स्वतंत्रता का अधिकारी बनता है और उसकी प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। उसकी ऊंची भावनाएं त्याग और तपस्या के रूप में व्यक्त होती हैं। हमारा स्वाधीनता दिवस उन्हीं उदात्त भावनाओं, देशभक्तों के त्याग, तपस्या और बलिदान की वृत्ति का प्रतीक है। पर हमें नहीं भूलना चाहिए कि स्वाधीनता को प्राप्त करना कठिन होता है, उसको खो देना नहीं। इसलिए निरंतर सतर्कता स्वाधीनता का मूल्य है। अपनी स्वतंत्रता कायम रखने के लिए निरंतर सतर्क रहने की आवश्यकता है और स्वाधीनता का भार हरेक नागरिक पर है। चरित्र में कहीं भी दुर्बलता आना ‘स्वार्थ बुद्धि का बलवती होना, सत्य से डिग जाना’ यह सब व्यक्ति व राष्ट्र, दोनों के लिए घातक है।
यह सच है कि स्वतंत्रता मिलने पर अपनी कमियों का पता चलता है। आज हमारा देश इस बात का अनुभव कर रहा है। प्राय: उन सभी चीजों की कमी है, जिनके सहारे कोई देश सम्मान पाता है। चीजों को खरीदने और बनाने के लिए संसाधन नहीं, विशेषज्ञ नहीं। आज जो राष्ट्र संपन्न हैं, वे और उन्नत होते जाएंगे और यदि हम शीघ्र उनके बराबर नहीं आ जाते, तो फिर हमारी स्वंतत्रता दबाव में रहेगी। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति ऐसी है कि नहीं कहा जा सकता कि शांति कब तक बनी रहेगी। राष्ट्रों में लोभ और भय के कारण इतनी तनातनी है कि किसी भी दिन, किसी भी कोने में लड़ाई छिड़ सकती है और जिस प्रकार, 1914 में सर्बिया की एक घटना ने महायुद्ध शुरू करा दिया था, उसी प्रकार एक चिनगारी आज महायुद्ध को जन्म दे सकती है, और अब जो महायुद्ध होगा, वह पहले से कहीं भीषण होगा। तात्पर्य यह कि हमें थोडे़ समय में अपने घर को संभालना है। यह काम असाधारण धैर्य, साहस और त्याग बुद्धि से ही हो सकता है। यदि भविष्य में राष्ट्र को कष्ट से मुक्त रखना है, तो आज प्रत्येक भारतीय को कष्ट सहने के लिए तैयार रहना होगा।
हमारे यहां कई तरह की विचारधाराएं हैं, कई राजनीतिक दल हैं। लोगों को अपने विचारों के अनुसार समुदाय बनाने का पूरा अधिकार है। विचारों के विनिमय से सत्य का परिचय होता है। अपने विचारों से राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित करने का अधिकार भी सबको है। बिना ऐसी स्वतंत्रता के लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं चल सकती। परंतु हमें दो बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। एक, हममें सहिष्णुता होनी चाहिए। हमें यह मानना चाहिए कि जितना विचार स्वातंत्र्य हमको है, उतना ही दूसरों को है। दूसरी, विचार-विनिमय में विरोधी के व्यक्तित्व पर आक्षेप करना ऐसी कटुता उत्पन्न कर देता है, जो राष्ट्रीय जीवन को विषाक्त कर देता है।
हमारी निजी स्वतंत्रता वहीं तक है, जहां तक वह राष्ट्र की स्वतंत्रता को बाधा नहीं पहुंचाती। हमारे आपसी मतभेदों से राष्ट्र की उन्नति में किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़नी चाहिए। चाहे जो भी दल शासनारूढ़ हो, उसको अपने सिद्धांतों के अनुसार काम के संचालन में तभी सुविधा होगी, जब देश संपन्न और बलवान होगा। प्रत्येक नागरिक और दल को इस संक्रमण काल में संकीर्ण घेरों से ऊपर उठना होगा। इस स्वतंत्रता दिवस के दिन हम यह संकल्प करें कि अपने राष्ट्र को सुखी, संपन्न और शक्तिशाली बनाने में हम अपनी ओर से हर प्रयास करेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) निरंकार सिंह, पूर्व सहायक संपादक, हिंदी विश्वकोश

 

सम्पादकीयलेख / शौर्यपथ / कर सुधार की ओर भारत ने जो कदम उठाए हैं, वे जरूरी व स्वागतयोग्य हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में कराधान व्यवस्था को सुधारने के इरादे से जो घोषणाएं की हैं, उनसे टैक्स चुकाने वालों को निश्चित ही खुशी हो रही होगी। इन सुधारों का मुख्य लक्ष्य यदि ईमानदार करदाताओं को बढ़ावा देना है, तो इसकी जरूरत दशकों से महसूस की जा रही थी। अव्वल तो स्वयं प्रधानमंत्री ने बता दिया है कि 130 करोड़ लोगों के देश में केवल डेढ़ करोड़ कर चुकाते हैं। कर चुकाने की क्षमता इससे कहीं ज्यादा लोगों में होगी, लेकिन ज्यादातर लोग कमाई छिपाकर टैक्स चुकाने से बचते रहे हैं। कर वसूली की जो पुरानी या लगभग सामंती व्यवस्था रही है, उसमें कई बार कर चुकाने वाला भी कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। शहर या इलाके के आयकर अधिकारियों में बहुत ताकत होती है और वे अपना ‘टारगेट’ चुनने के लिए लगभग स्वतंत्र होते हैं। आयकर अधिकारियों की मनमानी और कई बार सरकारों की स्थानीय राजनीति के तहत भी आयकर चुकाने वाले नागरिक निशाने पर आ जाते हैं। अब नए दौर के हिसाब से हो रहे सुधारों से हम बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं।

सरकार करों के फेसलेस मूल्यांकन अर्थात सीधे संपर्क के बिना ही कर निर्धारण की ओर जो कदम उठा रही है, उसमें व्यावहारिक पहलुओं पर विशेष ध्यान देना होगा। ठीक इसी तरह से कर चुकाने में कोई शिकायत होने पर फेसलेस अपील की सुविधा दी जा रही है, तो जाहिर है, ऑनलाइन सिस्टम को बहुत आसान रखना होगा। इसके साथ ही टैक्स चार्टर का जमीनी लाभ दिखना जरूरी है, ताकि बाकी लोग भी कर देने के लिए प्रेरित हों। प्रधानमंत्री ने देश के लोगों से आगे बढ़कर ईमानदारी के साथ कर देने का आह्वान किया है, तो इस जरूरत को भी समझा जा सकता है। कोरोना और आर्थिक सुस्ती की वजह से सरकार के राजस्व पर असर पड़ा है। सरकार को यह भी लग रहा है कि बुरे दौर में कर वसूली पिछले वर्षों के मुकाबले घटेगी, यह स्वाभाविक भी है, इसलिए सरकार यह सुधार लेकर आई है। राजस्व बढ़ाने का एक उपाय कर दायरा बढ़ाना होता है, पर आज देश जिस दौर में है, लोगों पर नए टैक्स नहीं लादे जा सकते। अत: वर्तमान करदाताओं को ईमानदारी से और पारदर्शी कर भुगतान की सुविधा देकर सरकार ठीक ही कर रही है। प्रधानमंत्री ने यह भी इशारा किया है कि कर सुधार एक सतत प्रक्रिया है, समय-समय पर सुधार होते रहे हैं, इससे संकेत मिलता है कि अभी अन्य कर सुधार भी संभव हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि ईमानदार करदाता की राष्ट्र-निर्माण में बड़ी भूमिका होती है। ईमानदार करदाता के जीवन को आसान बनाने के लिए अमेरिका और कुछ अन्य देशों में बेहतर प्रावधान हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कर चुकाने वालों की वक्त आने पर मदद करने की परंपरा है, जिसके तहत कोरोना के समय भी कर चुकाने वालों के लिए विशेष राहत, रियायत के प्रबंध किए गए हैं। भारत में भी ऐसे करदाताओं के बारे में सोचना चाहिए, जो वर्षों से कर चुका रहे थे, लेकिन इस बार रोजगार-धंधे के प्रभावित होने से नहीं चुका पा रहे हैं। करदाताओं को कर चुकाने में सुविधा-सम्मान देने के साथ अन्य प्रकार से भी प्रोत्साहित करने पर विचार करना चाहिए। कर मानव सभ्यता की पुरानी परंपरा है, यह जितनी सहज और शालीन हो, उतना अच्छा है।

 

मेलबॉक्स / शौर्यपथ / शीर्ष अदालत ने अपने फैसले से एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि वह पिता की संपत्ति में बेटियों को भी बराबर का अधिकारी मानती है। इससे निश्चय ही बेटियों और बेटों में होने वाला भेदभाव कुछ हद तक कम हो सकेगा। सवाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नहीं, बल्कि यह है कि जब बेटियां सुरक्षित ही नहीं रहेंगी, तो संपत्ति का भला क्या लाभ? जिस तरह से आए दिन बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि वर्तमान परिवेश में बेटियों को संपत्ति से ज्यादा सुरक्षा की जरूरत है। छोटे शहर हों या महानगर, ग्रामीण इलाके हों या शहरी क्षेत्र, हर जगह बेटियों पर जुल्म बढ़े हैं। दिल्ली में 12 वर्षीया बच्ची के साथ दरिंदगी होती है, तो बुलंदशहर में राह चलते छेड़खानी, ये घटनाएं बताती हैं कि बेटियों को सुरक्षा देने में हमारी सरकार, समाज और कानून बुरी तरह विफल रहे हैं। विधायिका, न्यापालिका और कार्यपालिका को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए और बेटियों के अनुकूल समाज बनाना चाहिए।
प्रत्यूष आनंद, नवादा, बिहार

जिम्मेदार बनें हम
देश के दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मंगलवार की अपनी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अधिक से अधिक जांच पर जोर दिया। यह बताता है कि कोरोना महामारी से निपटने में यह कदम किस हद तक कारगर है। उन्होंने उन राज्यों को खासतौर से जांच की रफ्तार और दायरा बढ़ाने की अपील की, जहां संक्रमण-दर और मृत्यु-दर अधिक हैं। सरकार की गंभीरता जनहित में उचित है, लेकिन हम भारतीयों को जैसे ही छूट मिलती है, हमारा ‘इम्यून सिस्टम’ उछल-कूद मचाने लगता है और हम पाबंदियों की परवाह किए बिना अपने पुराने ढर्रे पर आकर आस-पड़ोस और मोहल्ले में कोरोना का ‘निमंत्रण-पत्र’ बांटने लगते हैं। इसीलिए सरकारों व प्रशासन को उन पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, जो दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हैं। ऐसा करने पर ही हम इस महामारी का मुकाबला कर सकेंगे।
सुभाष बुड़ावन वाला
रतलाम, मध्य प्रदेश

अलविदा इंदौरी साहब
‘सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है...’ इस तरह की वीरोचित और न्यायपरक पंक्तियां लिखने वाले राहत इंदौरी साहब अब हमारे बीच नहीं हैं। वह हमेशा के लिए रुखसत हो गए। उनका पूरा जीवन एक ऐसे आदमी की अत्यंत संघर्षमय कहानी है, जो अपने अदम्य साहस और जीवटता से शून्य से शिखर तक पहुंचता है। उन्होंने अपनी बेखौफ अभिव्यक्ति से देश के आमजन, मजदूर, किसान, गरीब आदि को आवाज दी। यही वजह है कि वह हर किसी के अजीज बन गए। उनका यूं जाना इसलिए ज्यादा खलता है, क्योंकि अभी देश पर भय और दहशत की एक विचित्र धुंध छाई हुई है। निश्चय ही, वह अपनी शायरी से हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे।
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

सख्त कार्रवाई हो
दुनिया कितनी आगे निकल गई है, किंतु हम अब भी छोटी-छोटी बातों पर सौहार्द बिगाड़ देते हैं और जनजीवन अस्त-व्यस्त कर देते हैं। समाज के समझदार लोगों को ऐसे वक्त में तुरंत आगे आना चाहिए और नासमझों को समझाने के प्रयास कर उद्वेलित भावनाएं शांत करनी चाहिए। सरकार तो कानून-व्यवस्था के जरिए अमन स्थापित करती ही है। सवाल यह है कि क्या मिला उन लोगों को, जिन्होंने कतिपय लोगों की भावनाएं उद्वेलित कर शांत बेंगलुरु को अशांत कर डाला? एक गलती करे और पूरा शहर उसे भुगते, यह किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं। भविष्य में ऐसी गलती न हो, इसका ख्याल समाज के जिम्मेदार लोगों और सरकार, दोनों को रखना होगा। देशहित व जनहित में यह जरूरी है।
महेश नेनावा, इंदौर, मध्य प्रदेश

 

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