
CONTECT NO. - 8962936808
EMAIL ID - shouryapath12@gmail.com
Address - SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
Google Analytics —— Meta Pixel
खाना खजाना / शौर्यपथ / सावन का महीना आते ही भोले बाबा के भक्त उनकी भक्ति में डूब जाते हैं। इस बार सावन इस सोमवार 6 जुलाई से शुरु हो रहे हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त पूरी श्रद्धा भाव से सावन के महीने में भगवान शिव की आराधना करता है उसकी सभी मनोकामना भगवान शंकर जरूर पूरी करते हैं। अगर आप भी इस सावन उपवास रखने की सोच रहे हैं तो फलाहार के लिए जानें कैसे बनाए जाते हैं क्रिस्पी आलू के टिप्स।
सामग्री-
-6 कच्चे केले
-आधा छोटा चम्मच काली मिर्च पिसी हुई
-सेंधा नमक एक छोटा चम्मच
-आधा चम्मच भूना जीरा पाउडर
-तलने के लिए तेल
विधि -
सबसे पहले कच्चे केले के छिलके उतार लीजिए। अब एक कड़ाही में घी या तेल गर्म कर लें। तेल गर्म होने के बाद कद्दूकस की मदद से तेल में चिप्स घिसती जाएं। चिप्स कुरकुरे होने पर तेल से बाहर निकाल लें। अब इन पर ऊपर से काली मिर्च, जीरा पाउडर और सेंधा नमक बुरकाएं। ठंडे होने पर चिप्स को एयर टाइट डिब्बे में भर कर रख दें। जरूरत पड़ने पर आप ये शुद्ध केले की चिप्स फलाहार करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।
खेल / शौर्यपथ / टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली अपनी फिटनेस को लेकर काफी सीरियस रहते हैं। विराट अपनी डाइट और वर्कआउट दोनों से किसी तरह का समझौता करना पसंद नहीं करते हैं। कोविड-19 महामारी (कोरोना वायरस संक्रमण) के चलते वो भले ही क्रिकेट के मैदान से दूर हैं, लेकिन अपनी फिटनेस कैसे बनाई रखनी है, यह उनको अच्छी तरह पता है। विराट ने वेटलिफ्टिंग का एक वीडियो शेयर किया, जिसके लिए इंग्लैंड के पूर्व कप्तान केविन पीटरसन ने उन्हें ट्रोल किया। विराट ने अपने जवाब से केपी की बोलती बंद कर दी।
विराट ने वेटलिफ्टिंग का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, 'अगर मुझे मौका मिले रोज एक एक्सरसाइज चुनने का तो ये ही होगी। Love the power snatch' इस वीडियो पर कमेंट करते हुए पीटरसन ने लिखा, 'बाइक पर चढ़िए।' जिस पर विराट ने जवाब में लिखा, 'रिटायरमेंट के बाद।' इस तरह से विराट ने अपने जवाब से केपी को शांत कर दिया। केपी के अलावा ऑस्ट्रेलिया के सलामी बल्लेबाज डेविड वॉर्नर ने भी विराट को ट्रोल किया।
वॉर्नर ने कमेंट में लिखा, 'यह भार उठाना काफी आसान दिख रहा है।' हालांकि वॉर्नर को विराट ने जवाब नहीं दिया। विराट इन दिनों मुंबई में अपनी पत्नी अनुष्का शर्मा के साथ हैं। मुंबई में कोविड-19 के बढ़ते हुए मामलों को देखते हुए अभी तक क्रिकेटरों ने पूरी तरह से आउटडोर ट्रेनिंग शुरू नहीं की है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने भी अभी क्रिकेटरों का ट्रेनिंग कैंप नहीं शुरू किया है।
मनोरंजन / शौर्यपथ / प्रियंका चोपड़ा बॉलीवुड की देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा बॉलीवुड से लेकर हॉलीवु़ड तक अपनी एक्टिंग का जलवा दिखा चुकीं हैं, उन्होंने भी अपना एक्टिंग करियर साउथ की फिल्मों से शुरू किया था। प्रियंका की पहली फिल्म का नाम Thamizhan था जिसमें उनके साथ साउथ एक्टर विजय की जोड़ी दिखाई दी थी। मिस वर्ल्ड जीतने के बाद प्रियंका चोपड़ा ने 2003 में राज कंवर की फिल्म अंदाज से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। इस फिल्म में उनके साथ एक्टर अक्षय कुमार और एक्ट्रेस लारा दत्ता भी थीं। इस फिल्म के बाद उन्होंने फिल्म हीरो, एतराज, कृष, दोस्ताना, फैशन, मैरी कॉम, बर्फी, गुंडे, मुझसे शादी करोगी, बाजीराव मस्तानी जैसी फिल्मों में काम किया। हालांकि इस सबसे पहले प्रियंका अपने करियर की शुरुआत के एक आउटसाइडर के तौर पर की थी। आज उनके बॉलीवुड में आउटसाइडर काम को 20 साल पूरे हो गए हैं। इस अवसर एक्ट्रेस ने एक वीडियो शेयर कर उन पूराने लम्हों को याद किया है।
प्रियंका के इस वीडियो को ऑजी प्रोडक्शन Ozzy Production ने बनाया है। 7.25 मिनट के वीडियो में प्रियंका के 20 साल के सफर को बहुत ही खूबसूरती से दिखाया गया है। प्रियंका चोपड़ा ने इस वीडियो शेयर करते हुए अपने आउटसाइडर टीम को धन्यवाद देते हुए हस्टलर और फेयरलेस बताया गया है। सोशल मीडिया पर फैंस प्रिय़ंका की वीडियो को पसंद करते हुए लगातार कमेंट कर रहे हैं।
आपको बता दें कि प्रियंका एक ग्लोबल स्टार हैं। वह ना सिर्फ बॉलीवुड बल्कि प्रियंका हॉलीवुड में भी कई प्रोजेक्ट्स से जुड़ी हैं और कई अवार्ड अपने नाम कर चुकी हैं। आने वाले समय में प्रियंका 'वी कैन बी हीरोज', 'मैक्ट्रिस 4' और वेब सीरिज 'द व्हाइट टाइगर' में नजर आने वाली हैं। इसके अवाला प्रियंका चोपड़ा एक सफर प्रोड्यूसर भी हैं। प्रियंका भोजपुरी, मराठी, असामी और पंजाबी फिल्में भी प्रोड्यूस करती हैं। प्रियंका ने फिल्मों में एक लंबा सफर तय किया है और कई पुरस्कार जीते हैं, जिसमें राष्ट्रीय पुरस्कार और कई फिल्मफेयर पुरस्कार शामिल हैं। उन्हें 2016 में भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया था।
नजरिया / शौर्यपथ / सब उन्हें मास्टर जी कहते थे और कुछ खास चाहने वाले माई। हिंदी फिल्मों में एक ऐसा दौर भी था, जब कोरियोग्राफर सरोज खान का ओहदा सितारों से कहीं ज्यादा था। उनके बारे में कई कहानियां सुनने को मिलती थीं। कैसे उन्होंने ठीक से स्टेप न करने पर नामी हीरोइन के पैर में डंडा मार दिया, कैसे लगातार चार दिन रिहर्सल करवाकर एक नवोदित हीरोइन को अस्पताल पहुंचा दिया वगैरह-वगैरह। मेरे मन में बनी एकदम कड़क डांस मास्टर की छवि उस दिन टूट गई, जब मैं पहली बार प्रेम फिल्म (1990) के डांस रिहर्सल पर उनसे मिलने जुहू (मुंबई) पहुंची।
सरोज खान अपनी टीम के साथ हंस रही थीं, चाय पी रही थीं और चुटकुले सुना रही थीं। मुझे देखते ही उन्होंने सवाल किया, ‘मेरे बारे में क्या सुनकर आई हो?’ एक ठहाके के साथ सुनी-सुनाई कहानियां हवा हो गईं। मेरे सामने थीं सालों के संघर्ष से तपकर निखरी एक कद्दावर डांस कोरियोग्राफर, जिसने कलाकारों को यह सबक दिया कि जब तक चेहरे पर नृत्य नहीं झलकेगा, दर्शकों के अंदर नहीं उतरेगा। उन दिनों मिस्टर इंडिया का हवा-हवाई और तेजाब का एक-दो-तीन गाना मशहूर हो चुका था। सरोज खान का जादू चल निकला था। पर वह अपनी सफलता से बहुत प्रभावित नहीं लग रही थीं। उन्होंने मुझे इसे यूं समझाया, ‘मैं तीन साल की उम्र से इंडस्ट्री में काम कर रही हूं। पर अब जाकर मुंबई में अपना घर खरीद पाई हूं। मेरे लिए यह सबसे बड़ी सफलता है।’
हिंदी फिल्मों में डांस कोरियोग्राफी का दूसरा दौर सरोज खान से शुरू होता है। पहले दौर में तमाम डांस कोरियोग्राफर पुरुष हुआ करते थे। सरोज खान के लिए इस पुरुष प्रधान क्षेत्र में अपने आपको साबित करना आसान नहीं था। पर बिना संकोच के वह कहती थीं, ‘मुझे इसलिए भी दूसरों से बेहतर काम करना था, क्योंकि सब मानकर चल रहे थे कि एक औरत सितारों को नचा नहीं पाएगी। मुझे टफ बनना पड़ा। मैं अंदर से बिल्कुल सख्त नहीं हूं। बात-बात पर हंसती हूं, रो पड़ती हूं। पर सबके सामने ऐसा करूं, तो मुझे काम कौन देगा?’
सरोज खान का पैदाइशी नाम था निर्मला नागपाल। बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान से मुंबई आ गया। गुजारे के लिए पिता ने तीन साल की बेटी को फिल्मों में बाल कलाकार बना दिया। फिल्मों में बैक ग्राउंड डांसर बनने के लिए निर्मला डांस मास्टर बी सोहनलाल से डांस सीखने लगीं। उन्होंने ही उनका नाम बदलकर सरोज रखा। जब वह तेरह साल की थीं, सोहनलाल ने एक दिन उनके गले में काले रंग की माला डालने के बाद कह दिया, आज से तुम मेरी पत्नी हुई। सोहनलाल की उम्र उस समय 41 साल थी। उनसे अलग होने के बाद सरोज ने सरदार रोशन खान से निकाह कर लिया था। सरोज खान को अपने अतीत को लेकर कोई शिकायत नहीं थी। वह कहती थीं, ‘मेरी जिंदगी का सफर कभी सीधा नहीं रहा। दो शादी, तीन बच्चे, यह संघर्ष, ये सब शायद पहले से लिखा था। अगर ऐसा न होता, तो पूरी जिंदगी बैक ग्राउंड डांसर बनकर काट देती। कभी एक सफल कोरियोग्राफर नहीं बन पाती।’
डांस मास्टर सोहनलाल ने ही सरोज खान को यह मंत्र दिया था, कोई भी काम आधे मन से मत करो। सरोज ने कभी अपने काम के साथ समझौता नहीं किया। हिंदी फिल्मों की दो बड़ी नायिकाओं को उन्होंने बेहतरीन डांस स्टेप्स दिए और एक तरह से वह उनकी गुरु मां बन गईं। श्रीदेवी से मिलने से पहले सरोज खान का कोई वजूद नहीं था। हिम्मतवाला में श्रीदेवी को देखने के बाद उनकी दिली तमन्ना थी श्रीदेवी के साथ काम करने की। उनकी यह इच्छा सुभाष घई की कर्मा में पूरी हुई। श्रीदेवी ने ही मिस्टर इंडिया में हवा-हवाई गाना उनसे करने को कहा। इस गाने ने श्रीदेवी के साथ-साथ सरोज खान को भी सितारा बना दिया। श्रीदेवी उन्हें माई कहती थीं, सरोज खान भी उन्हें बेटी मानती थीं। ऐसा ही रिश्ता उनका माधुरी दीक्षित के साथ था। ये दोनों नायिकाएं सरोज खान के हर स्टेप और मूवमेंट को भव्यता के साथ पेश करती थीं। इन दोनों की कामयाबी में सरोज खान के करामाती स्टेप्स का बहुत बड़ा हाथ रहा है।
नब्बे के दशक के लगभग हर बड़े सितारे के साथ सरोज खान ने काम किया। बाजीगर में शाहरुख खान का फेमस दोनों हाथ फैलाने वाला आइकॉनिक मूव भी सरोज खान ने ही दिया है।जयंती रंगनाथन,कार्यकारी संपादक,
सम्पादकीय / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लद्दाख यात्रा न केवल तात्कालिक, बल्कि एक ऐसे दीर्घकालिक संदेश की तरह है, जिसकी गूंज दुनिया में कुछ समय तक बनी रहेगी। विशेषज्ञ भी यह मान रहे हैं कि जो वह दिल्ली में बैठकर नहीं कर पा रहे थे, उसे उन्होंने लेह-लद्दाख पहुंचकर कर दिखाया। उन्होंने मोर्चे पर सैनिकों के बीच जाकर जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही है, उसकी प्रासंगिकता अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सबसे ज्यादा है। भले उन्होंने चीन का नाम न लिया, पर दो टूक कहा कि विस्तारवाद का दौर समाप्त हो चुका है, यह विकास का दौर है। वाकई उनका यह कहना चीन की नीतियों और दुस्साहस पर एक प्रतिकूल टिप्पणी है।
सीमा पर पहुंचकर श्रीकृष्ण को याद करने का भी अपना महत्व है। एक ओर, बांसुरी है, तो दूसरी ओर, सुदर्शन चक्र। भारतीय राजनय जहां एक ओर, बंधुत्व और सद्भाव में विश्वास करता आया है, वहीं भारत की बहुमूल्य जमीन पर कुछ साम्राज्यवादी शक्तियों की गिद्ध दृष्टि कभी-कभी उसे अशांत करती रही है। आज भारत को सीमा पर फिर ललकारा गया है, वीर भारतीय जवानों का खून बहा है, भावनाएं ज्वार पर हैं, लेकिन तब भी भारत अपनी सद्भावी नीतियों को भूला नहीं है। भारत के संयम और भावनाओं के पक्ष में दुनिया की शक्तियां खुलकर सामने आने लगी हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान इत्यादि अनेक सशक्त देश हैं, जो भारत के साथ खड़े हैं और चीन की निंदा का ग्राफ धीरे-धीरे बढ़ रहा है। चीनी एप पर लगाए गए प्रतिबंध इत्यादि को अगर हम सांकेतिक भी मानें, तब भी दुनिया के कोने-कोने तक भारत की नाराजगी पहुंची है। उम्मीद करनी चाहिए और बहुत हद तक संभव है कि भारतीय प्रधानमंत्री के लद्दाख पहुंचने से पड़ोसी देश भारत की नाराजगी को साफ तौर पर समझ सकेगा। बेशक, तनाव के दिनों में किसी प्रधानमंत्री का मोर्चे पर जाना और सेना के आला अधिकारियों के लगातार दौरे यह साबित करते हैं कि हम अपनी जमीन और जवानों के मनोबल के साथ हैं।
कोई आश्चर्य नहीं, प्रधानमंत्री का यह दौरा चीन को अच्छा नहीं लगा है और उसने चल रही बातचीत का हवाला दिया है। क्या जब सैन्य स्तर पर बातचीत चल रही थी, तब भारतीय प्रधानमंत्री को वहां नहीं जाना चाहिए था? इस सवाल के जवाब के लिए हमें बातचीत की गुणवत्ता पर एक बार जरूर नजर डाल लेनी चाहिए। लगभग पांच दौर की बातचीत सीमा पर हो चुकी है। वार्ताएं 12-12 घंटे तक चली हैं, पर नतीजा सिफर रहा है। वार्ता इसलिए नहीं होती कि कोई देश अपनी सीधी बात को बार-बार दोहराता रहे और सामने बैठा देश किसी भी जायज बात पर कान न दे। शायद चीन चाहता है कि भारत कुछ समय बाद शांत पड़ जाए और गलवान घाटी की भारतीय जमीन पर उसके शिविर स्थाई मान लिए जाएं। यह चीन का पुराना तरीका बताया जाता है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि यह तरीका चीन को उल्टा पड़ रहा है। उसकी हठधर्मिता से उसके प्रति न सिर्फ भारत, बल्कि अन्य देशों में भी नाराजगी बढ़ रही है। प्रधानमंत्री के दौरे का यह संदेश भी है कि बेनतीजा वार्ताओं से परे भी भारत सोच रहा है। भारत की सोच के प्रति चीन को समझदार बनना पडे़गा। वह समझदारी दिखाने में जितनी देरी करेगा, दुश्मनी की गांठ को अपने ही हाथों और बड़ी करता चला जाएगा। ध्यान रहे, इस बार उसकी विस्तारवादी तानाशाही पूरी दुनिया को चुभ रही है।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / भारत सरकार ने कुछ रेल मार्गों पर निजी क्षेत्रों को आमंत्रण देने का निर्णय लिया है। विपक्षी दलों ने बिना कुछ समझे सरकार के फैसले का विरोध शुरू कर दिया है। वे इस निर्णय को गरीब-विरोधी बताकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। कांग्रेस शायद यह भूल चुकी है कि निजीकरण को बढ़ावा देने वाले प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव उसी के पार्टी के थे। लेकिन आज की जनता जागरूक है, और उसे पता है कि यह निर्णय उसके हित में है। पूर्व में हवाई जहाज से यात्रा करना बड़े लोगों का एकाधिकार था, मगर जब अधिक से अधिक निजी कंपनियों को इसमें उतारा गया, तो हवाई जहाज की यात्रा मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों की पहुंच में आ गई। इसका दूरगामी परिणाम निकला और देश के विकास में पंख लगे। आज दुनिया के कई विकसित देशों में रेलवे का निजीकरण हो चुका है। वहां की रेल सुविधाएं हमसे काफी बेहतर हैं। अब समय आ गया है कि भारत में भी ऐसा प्रयास हो और रेल यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधा मिले।
हिमांशु शेखर, टिकारी, गया
किताबों का दान
साहित्य के प्रति अनुराग होना ही चाहिए। लेखन और उसके शब्दों के भावों को सही तरीके से समझा जाए, तो रचनाकार की रचना साकार होकर मन को छू लेती है। इसके साथ ही साहित्य हमें एक-दूसरे से भी जोड़ता है। ऐसे में, जरूरी है कि साहित्यिक किताबों को रद्दी में न बेचकर वाचनालयों, स्कूलों व महाविद्यालयों जैसे शिक्षण संस्थानों या साहित्यिक संस्थाओं को भेंट किया जाए, ताकि साहित्य के उपासकों के लिए वे लाभकारी हो सकें। हम सभी को किताबें दान करनी ही चाहिए।
संजय वर्मा, मनावर, धार
यह कैसी आत्मनिर्भरता
विकास के नाम पर विश्व के सबसे बड़े रेलवे का निजीकरण किया जा रहा है। एक ओर हम आत्मनिर्भर बनने की सोच रहे हैं, तो दूसरी ओर सरकार खुद आत्मनिर्भर रेल को दूसरों पर निर्भर बना रही है। पहले आम जन इसी मुद्दे पर वोट दिया करते थे कि रेलवे का किराया सस्ता होगा, बस में सुविधाएं मिलेंगी, मगर धीरे-धीरे राजनीति हावी होती गई। आज भी, तमाम खर्चों के बावजूद भारतीय रेल फायदा कमा रही है, फिर इसके निजीकरण की आखिर क्या आवश्यकता पड़ गई? सवाल यह भी है कि तेजस और वंदे भारत जैसी ट्रेनों में कितने लोग यात्रा करने में सक्षम हैं? भले ही जापान, ब्रिटेन, कनाडा जैसे देशों में रेलवे का निजीकरण हुआ, लेकिन उनकी जीडीपी हमसे ज्यादा है और वे विकसित भी हैं। ऐसे में, राजनेताओं को कोई भी कदम उठाने से पहले यह अवश्य विचार करना चाहिए कि आखिर जनता से जब वे वोट मांगने जाएंगे, तो किस नाम और काम पर? सरकार जन सेवा के लिए चुनी जाती है, जिससे गरीब को सहारा मिले। संभव है कि आने वाले समय में रेलवे में एकाधिकार होने से सरकार और निजी कंपनी को तो फायदा हो, मगर जनता को नहीं।
अमन जायसवाल
दिल्ली विश्वविद्यालय
सावधानी से हो प्रयोग
हम लोग बिना सोचे-समझे किसी भी शब्द का बहुत अधिक प्रयोग करने लगते हैं, जिसमें एक शब्द ‘शहीद’ भी है। यह हमारी जुबान पर ऐसा चढ़ गया है कि हम अपने वीरगति प्राप्त सैनिकों को भी शहीद कहते हैं। पर शहीद का शाब्दिक अर्थ है, धर्म की राह पर चलते हुए, खुदा का काम करते हुए अपनी जान अर्पित कर देना। क्या फौजियों के लिए यह शब्द इस्तेमाल होना चाहिए, जो राष्ट्र की सेवा करते हुए अपना बलिदान देते हैं? हमारी फौज, पुलिस या अद्र्धसैनिक बल एक पेशेवर सेना है, जो देश, समाज और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अपनी जान न्योछावर करती है, इसलिए उनके लिए सही शब्द बलिदानी है।
सरिता पांडेय
पावन चिंतन धारा आश्रम
ओपिनियन / शौर्यपथ / एक अन्य एशियाई ताकत के उद्भव से चीन असहज हो गया है। संयुक्त राष्ट्र और दूसरे वैश्विक मंचों पर भारत द्वारा पेश किए जाने वाले प्रस्तावों पर हीला हवाली करने के अलावा, वह उप-महाद्वीप में नई दिल्ली के प्रभाव को रोकने की कोशिशों में भी जुटा है। चारों तरफ से हमें घेरने के लिए वह हमारे पड़ोसी देशों पर फोकस कर रहा है। पाकिस्तान के साथ एक सामरिक साझेदारी उसने की है, जबकि अन्य देशों के साथ अपने कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य संबंध आगे बढ़ाए हैं। इस काम के लिए बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) का इस्तेमाल किया गया है। एक हाथ लो और दूसरे हाथ दो के साथ-साथ वह दादागिरी की नीति भी अपनाता है। इंडो-पैसिफिक (हिंद महासागर व प्रशांत क्षेत्र के बीच का भू-राजनीतिक इलाका), अफ्रीका और कुछ अन्य क्षेत्रों में चीन ने आंतरिक मामलों में निर्लज्जता से दखलंदाजी की है।
यह सही है कि उभरती हुई तमाम बड़ी ताकतें भू-राजनीतिक क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए आक्रामक हो जाती हैं। मगर इस मामले में चीन का व्यवहार अपरिपक्व दिखता है। बेशक अपनी समग्र राष्ट्रीय ताकत (सीएनपी) को उसने तेजी से बढ़ाया है, पर अब भी कई आंतरिक और बाहरी चुनौतियां हैं, जो राष्ट्रपति शी जिनपिंग की रातों की नींद हराम करती हैं। ये चुनौतियां अर्थव्यवस्था, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी, यानी पीएलए के नेतृत्व, राष्ट्रीय मनोबल और दुनिया भर में बढ़ती चीन-विरोधी भावना से जुड़ी हुई हैं।
दरअसल, चीन की सिकुड़ती अर्थव्यवस्था ने बडे़ पैमाने पर बेरोजगारी पैदा की है। सरकार के स्वामित्व वाले उद्यमों को सशक्त बनाने की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की नीति ने निजी क्षेत्र को खासा प्रभावित किया है, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब 65 प्रतिशत और नई नौकरियों के सृजन में लगभग 90 फीसदी का योगदान देता है। इसके अलावा, विनिर्माण क्षेत्र की समस्या, बढ़ते कर्ज और बुजुर्ग होती आबादी (जो भविष्य में श्रम-बल को कम करेगी) दीर्घावधि में चीन की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करेगी।
साल 2012 में शी जिनपिंग ने पीएलए को विश्व स्तरीय सेना बनाने की घोषणा की थी, जो 2049 तक ‘दुनिया के सर्वशक्तिमान मुल्क’ बनने की चीन की राह को आसान बनाएगी। तब से, सेना की जंगी ताकत बढ़ाने और सीपीसी के प्रति उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए तमाम सुधार कार्य किए गए हैं। हालांकि, सुधारों में निजी तौर पर रुचि ले रहे शी जिनपिंग पीएलए नेतृत्व के पेशेवर मानकों से खुश नहीं हैं, क्योंकि उसके पास युद्ध लड़ने का व्यावहारिक अनुभव नहीं है। कई थिंक-टैंकों ने बताया है कि पीएलए के पास अन्य सेनाओं को चुनौती देने लायक जरूरी क्षमताओं का अभाव है।
इसी तरह, समग्र राष्ट्रीय ताकत (सीएनपी) का एक महत्वपूर्ण घटक राष्ट्रीय मनोबल है। चीन के इस मनोबल को उसकी एकतरफा मीडिया रिपोर्टिंग व ‘वुल्फ वॉरियर्स’ के नाम से शुरू कूटनीतिक सक्रियता से नहीं आंकना चाहिए। इन दोनों का मकसद पश्चिमी और भारतीय मीडिया का मुकाबला करने के साथ-साथ शासन के चीनी मॉडल का प्रचार-प्रसार और शी जिनपिंग को एक वैश्विक नेता के रूप में पेश करना है। मगर बेरोजगारी में वृद्धि, नागरिक स्वतंत्रता पर पाबंदी और वंचितों व अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की वजह से अंदरखाने में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है। पार्टी के नियंत्रण का दायरा बढ़ाने संबंधी शी जिनपिंग के सख्त रुख से भी लोग नाराज दिखते हैं। सार्वजनिक सूचनाओं की मानें, तो 2013 से 2018 के बीच जिनपिंग ने 23 लाख से अधिक कर्मचारियों को बर्खास्त और कैद किया, जिनमें पीएलए के कई वरिष्ठ अधिकारी और नौकरशाह भी शामिल हैं।
इस सूरतेहाल में यह कहना अनुचित नहीं कि पूर्वी लद्दाख में पीएलए ने जो दुस्साहस दिखाया है, वह गलत आकलन के साथ उठाया गया उसका कदम है। संभवत: बीजिंग को भारत से दृढ़ राजनीतिक-सैन्य प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। हमारा सैन्य ढांचा और जवाबी रणनीति, उसकी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने की हमारी तरकीबें और अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने की हमारी क्षमता निश्चय ही बीजिंग की मुश्किलें बढ़ाएंगी।
भारत की फौरी रणनीति यही होनी चाहिए कि सैन्य और सियासी बातचीत के जरिए वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बहाल की जाए। सेना को तमाम संभव विकल्पों के बाद ही आजमाना चाहिए। इन विकल्पों के साथ-साथ हमें अपनी बढ़त बनाए रखने, साइबर डोमेन में व्यावहारिक कदम उठाने और पाकिस्तान के दुस्साहस को विफल करने के लिए भी तैयार रहना होगा।
रही बात दीर्घकालिक रणनीति की, तो यह व्यावहारिक और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनानी होगी। चीन से मिलने वाले धोखे का खतरा कम से कम रहे, इसके लिए हमें तमाम रास्तों और उपायों के साथ तोड़ निकालना होगा। यहां तोड़ असल में वे उद्देश्य हैं, जो हम चीन को लेकर हासिल करना चाहते हैं। उपाय का अर्थ राजनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक, सैन्य और सूचना तत्व के साथ-साथ सरकार के सामने उपलब्ध अन्य आंतरिक व बाह्य संसाधन हैं, जबकि रास्ते का मतलब कुशल व प्रभावी तरीकों से संसाधनों का इस्तेमाल करना है, ताकि हम अपने उद्देश्य में सफल हो सकें।
अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के दौरान, चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने वाली नीतियों का लाभ भारत को उठाना चाहिए, और अपनी सामरिक ताकत बढ़ाने व बुनियादी ढांचे के विस्तार की तरफ तेजी दिखानी चाहिए। पहाड़ों पर जवाब देने में सक्षम माउंटेन स्ट्राइक कॉप्र्स पर फिर से गौर करना संभवत: एक रणनीतिक अनिवार्यता है। इसका इस्तेमाल नव-निर्मित युद्ध समूहों में हो सकता है। मैं इस मुद्दे पर इसलिए बल दे रहा हूं, क्योंकि जुलाई, 2014 में चीन की आधिकारिक यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया था कि पीएलए नेतृत्व में इस पलटन को लेकर चिंता और बेचैनी है।
चूंकि जरूरी सामरिक ताकत के विकास में अभी वक्त लगेगा, इसलिए क्षेत्रीय सैन्य समीकरणों को संतुलित करने के लिए समान सोच वाले देशों को एकजुट करना समझदारी है। हालांकि, इसके लिए काफी मेहनत करनी होगी। चीन की कटुता का प्रभावी मुकाबला करने के लिए राष्ट्र को अपने थल सैनिकों, नौसैनिकों और वायु सैनिकों के पीछे मजबूती से एकजुट होना चाहिए। यह सेना के मनोबल को उच्चतम स्तर पर बनाए रखने में मदद करेगा, जो कि जीत हासिल करने की अनिवार्य शर्त होती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)जनरल बिक्रम सिंह, पूर्व थलसेना प्रमुख
दुर्ग / शौर्यपथ / प्रशासनिक ताकत क्या होती है इसका जीता जागता उदहारण है दुर्ग निगम . दुर्ग निगम में इन दिनों जुर्माना , कार्य में लापरवाही पर कर्मचारियों को नोटिस ,आम जनता की शिकायतों की अनसुनी , कार्यवाही में भेदभाव का जीता जागता उदहारण बनता जा रहा है दुर्ग निगम . आइये ऐसे कुछ मामले है जिन पर नजर डाले तो जिस पर कार्यवाही में भेदभाव किस तरह व्याप्त है .
१ एम्आईसी भावानौर निगम कार्यालय का रंगरोगन ...
निगम में कांग्रेस की सत्ता आने क बाद निगम कार्यालय और एमआईसी भवन में रंरोगन का कार्य हुआ स्पष्ट दीखता है कि एक ठेकेदार द्वारा एमआईसी भवन में स्तरहीन मटेरियल का ईस्तमाल किया गया और सिर्फ लीपापोती की गयी वही दूसरी ओर निगम कार्यालय के रंरोगन की स्थिति जुदा है दोनों को देखने से ही साफ़ अंतर पता चल जाता है किन्तु निगम प्रशासन और पीडब्ल्यूडी प्रभारी मौन है इस पर कोई अधिकारी या इंजिनियर क्यों संज्ञान नहीं ले रहा ...
२.नाले में कचरा डालने पर बड़ा बड़ा जुर्माना वसूलने वाले निगम प्रशासन को ऐसी कई शिकायते और सुचना दी गयी किन्तु प्रशासन मौन रहा क्योकि एक तरफ आम जनता से जुर्माना वसूला गया वही दूसरी तरफ रसूखदार थे तो माफ़ी मिल गयी .
३.शहर के सुनसान इलाके में नाली पर अतिक्रमण कर घेता करने वाले पर निगम की जेसीबी से कार्यवाही की गयी वही नाले पर अतिक्रमण करने वाले और २० फीट के नाले को ३ फीट बनाने वाले पर निगम प्रशासन मौन है और सुचना के बाद भी कार्यवाही नहीं की जा रही ये कैसा दोहरा मापदंड है ?
४.एक तरफ अवैध मुर्गी फ़ार्म की शिकायत करने वालो की शिकायत पर संज्ञान नहीं लिया जा रहा वही दूसरी ओर शिकायत करने वाले के निवास में निर्माण का मटेरियल सड़क पर होने और कच्ची नाली पर होने के कारण हजारो का जुर्माना लेने अधिकारी एक पैर पर दौड़ पड़ते है क्या अवैध मुर्गी फ़ार्म के मालिक से कोई ख़ास लगाव है निगम प्रशासन का ?
५. गुन्वात्त्ता हीं निर्माण पर ठेकेदारों पर कार्यवाही होती है ये एक अच्छे प्रशासक की निशानी तो है किन्तु उसी कार्य के लिए जिम्मेदार इंजिनियर पर कोई कार्यवाही का ना होना ये साफ़ संकेत करता है कि निगम प्रशासन सिर्फ ठेकेदारों पर ही प्रशासनिक बल दिखा रहा है क्योकि ठेकेदार शासन के आगे नतमस्तक है किन्तु वही कार्य के निर्ग्रानी करने वाले इंजिनियर पर मेहरबान है क्या इंजिनियर भी दोषी नहीं है गुन्वात्ताहीं कार्य पर मौन रह कर क्योकि निगम से प्राप्त जानकारी के अनुसार शिकायत आम जनता ने की थी तो इस आधार पर अकेले ठेकेदार ही नहीं जिम्मेदार वार्ड इंजिनियर भी दोषी होना चाहिए किन्तु निगम के मुखिया का प्रकोप्ठेकेदार पर ही पडा आखिर ऐसा क्यों ?इस एक तरफा कार्यवाही पर निगम के अनुभवी पार्षद और पीडब्ल्यूडी प्रभारी का मौन रहना भी सत्ता की नाकामी की तरफ संकेत करता है .
आखिर निगम प्रशासन क्यों इस तरह एक तरफ़ा कार्यवाही कर वाह वाही लुट रहा है आखिर निष्पक्ष कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है निगम के प्रशासनिक मुखिया द्वारा ?
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
