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खेल / शौर्यपथ / कोरोना वायरस काल या इसके बाद क्रिकेट में कोई हाई फाइव्स, हग्स, हेड का एक-दूसरे रब करना नहीं होगा। अब केवल कोहनी और स्माइल से ही एक-दूसरे से संपर्क करना होगा और सेलिब्रेशन मनाना होगा। हाल ही में इंग्लैंड के अभ्यास सत्र में टीम स्टोक्स और टीम बटलर के बीच हुए मैच में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। न्यूजीलैंड में चोटिल होने के बाद पहली बार मैदान में लौटे तेज गेंदबाज जेम्स एंडरसन ने विकेट सेलिब्रेशन टीममेट से कोहनी से कोहनी टकराकर किया।
कोरोना वायरस महामारी के दो माह बाद शुरू हुए फुटबॉल में भी कोहनी से कोहनी टकराकर खुशी मनाने की नई अभिव्यक्ति शुरू हुई। क्रिकेट में सेलिब्रेशन अब कैसे होंगे यदि इसमें कोई संदेह है तो बुधवार के इंग्लैंड के अभ्यास सत्र को देख सकते हैं। इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के बीच तीन टेस्ट मैचों की सीरीज तीन माह के बाद शुरू होने वाली है। यह सीरीज 8 जुलाई से खेली जाएगी। इससे पहले इंग्लैंड और वेस्टइंडीज की टीमों ने अलग-अलग प्रैक्टिस मैच खेला।
इंग्लैंड क्रिकेट ने अपने ऑफिशियल टि्वटर हैंडल पर एक वीडियो शेयर किया है। इसमें जेम्स एंडरसन जो डेनले का विकेट लेने के बाद कोहनी से कोहनी टकराकर विकेट सेलिब्रेट कर रहे हैं। विकेटकीपर बेन फोक्स हाईफाइव के लिए स्वभावतः अपना हाथ ऊपर उठा रहे हैं। यह मैच इंग्लैंड के ट्रेनिंग दल को दो टीमों में बांटकर कराया जा रहा है।
टीम स्टोक्स ने टॉस जीतकर पहले फील्डिंग करने का फैसला किया था। टीम स्टोक्स के लिए खेलते हुए एंडरसन ने 18 ओवर में 49 रन देकर 2 विकेट लिए। एंडरसन को बार-बार सैनेटाइजर का प्रयोग करते भी देखा जा सकता है।
टीम बटलर ने तीन दिवसीय अभ्यास मैच में टीम बटलर ने अपनी पहली पारी 90 ओवर में पांच विकेट पर 287 रन बनाकर घोषित कर दी थी। जेम्स ब्रासी और डेन लारेंस ने अर्द्धशतक बनाए। बेन स्टोक्स के नेतृत्व में इंग्लैंड की टीम पहले टेस्ट में साउथम्पटन में वेस्टइंडीज का सामना 8 जुलाई को करेगी। नए नियमों के साथ यह पहला इंटरनेशनल टेस्ट मैच होगा। इसमें गेंद को चमकाने के लिए मुंह की लार का प्रयोग नहीं किया जाएगा।
टीम बटलर की तरफ से ओपनर रोरी बर्न्स ने 21, ओपनर जेम्स ब्रेसी ने 85, जो डेनले ने 48, डैन लॉरेंस ने 58, ओली पोप ने 25 और कप्तान जोस बटलर ने नाबाद 24 रन बनाए। टीम स्टोक्स की तरफ से जेम्स एंडरसन और क्रेग ओवर्टन ने दो-दो विकेट लिए।
शौर्यपथ / बॉलीवुड इंडस्ट्री की मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान के निधन से मजोरंजन जगत को तगड़ा झटका लगा है। उन्हें सांस लेने की तकलीफ के चलते 20 जून को मुंबई के बांद्रा में स्थित गुरु नानक हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, लेकिन डॉक्टर्स की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें नहीं बचाया जा सका। सरोज को शुक्रवार सुबह मलाड के कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। इस दौरान उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए उनके परिवारवाले और कुछ रिश्तेदार ही मौजूद थे। सरोज खान के प्रति शोक प्रकट करने के लिए प्रार्थना सभा तीन दिन बाद होगी।
सरोज खान डायबिटीज और इससे संबंधित बीमारियों से जूझ रही थीं। इसके चलते उन्होंने बीच में अपने काम से एक लंबा ब्रेक लिया था। साल 2019 में सरोज ने 'कलंक' और 'मणिकर्णिकाः द क्वीन ऑफ झांसी' में एक-एक गाने को कोरियॉग्राफ किया था। 'कलंक' में उन्होंने 'तबाह हो गए' गाने को कोरियोग्राफ किया था, जिसमें माधुरी दीक्षित ने बेहतरीन डांस कर सभी का दिल जीत लिया था।
गौरतलब है कि सरोज खान पिछले 40 साल में दो हजार से भी ज्यादा गानों को कोरियोग्राफ किया था। उन्होंने फिल्म देवदास के गाने 'डोला रे डोला', 'श्रृंगारम' के सारे गाने, 'जब वी मेट' के 'ये इश्क हाये' के लिए नैशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। फिल्म 'गुरु', 'देवदास', 'खलनायक', 'हम दिल दे चुके सनम', 'बेटा', 'सैलाब', 'चालबाज' और 'तेजाब' के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है।
सरोज के निजी जीवन की बात करें उन्होंने 13 साल की उम्र में इस्लाम धर्म कबूल कर 43 साल के बी. सोहनलाल से शादी कर ली थी। दोनों की उम्र में 30 साल का फासला था। सरोज ने हालांकि सोहनलाल की ये दूसरी शादी थी। पहली शादी से उनके चार बच्चे थे। एक इंटरव्यू में सरोज ने बताया था कि मैंने अपनी मर्जी से इस्लाम धर्म कबूल किया था। उस वक्त मुझसे कई लोगों ने पूछा कि मुझ पर कोई दबाव तो नहीं है लेकिन ऐसा नहीं था। मुझे इस्लाम धर्म से प्रेरणा मिलती है।
निधन से भावुक हुईं माधुरी दीक्षित, ट्वीट कर कहा- मैं बिखर गई हूं
साल 2020 में बॉलीवुड के कई सितारे दुनिया को अलविदा कहकर चले गए। शुक्रवार को कोरियोग्राफर सरोज खान का निधन हो गया है। वह काफी समय से बीमारी चल रही थीं। हाल ही में उन्हें बांद्रा स्थित हॉस्पिटल में ए़डमिट कराया गया था, जहां पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से बॉलीवुड को गहरा सदमा लगा है। 2000 गानों को कोरियोग्राफ कर चुकी सरोज को बॉलीवुड सेलेब्स श्रद्धांजलि दे रहे हैं। अब एक्ट्रेस माधुरी दीक्षित ने अपना दुख बयां किया है।
माधुरी ने ट्विटर अकाउंट पर एक पोस्ट शेयर किया है। उन्होंने लिखा, ''मैं दोस्त और गुरु सरोज खान के निधन से बिखर गई हूं। डांस में अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने में मेरी मदद करने के लिए मैं हमेशा उनकी आभारी रहूंगी। दुनिया ने आज एक अद्भुत प्रतिभाशाली इंसान को खो दिया। मैं आपको बहुत मिस करूंगी। परिवार के प्रति संवेदना प्रकट करती हूं।''
इसके अलावा जेनेलिया डिसूजा, रितेश देशमुख, मनोज बाजपेयी, सुनील ग्रोवर, निमरत कौर ने सरोज खान को याद करते हुए इमोशनल ट्वीट किया है। मशहूर कोरियोग्राफर रेमो डिसूजा ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सरोज खान के साथ अपनी कुछ तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा, ''मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मुझे आपके साथ डांस करने का मौका मिला। मुझे इतना सबकुछ सिखाने के लिए आपको दिल से शुक्रिया। आपको हमेशा याद किया जाएगा। आप हमेशा हमारे दिल में रहेंगी।
रितेश देशमुख ने ट्वीट किया कि रेस्ट इन पीस सरोज खान जी। यह नुकसान बॉलीवुड और फिल्म प्रेमियों के लिए अकल्पनीय है। मुझे फिल्म अलादीन में आपने द्वारा कोरियोग्राफ किए जाने का सुख मिला। जेनेलिया डिसूजा ने लिखा, आरआईपी सरोज जी। मैं भगवान की शुक्रगुजार हूं कि मुझे आपके द्वारा कोरियोग्राफ किए जाने का मौका मिला। भगवान इस दुख की घड़ी में आपके परिवार को ताकत दें। वहीं, एक्टर सुनील ग्रोवर ने ट्वीट करते हुए लिखा, ''सरोज खान जी की निधन की खबर से शॉक्ड हूं। उनके जाने से एक युग का अंत हो गया। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।
नजरिया / शौर्यपथ / हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और बीमा नियामक ‘आईआरडीएआई’ से पूछा है कि मानसिक रूप से बीमार लोगों को स्वास्थ्य बीमा के दायरे में क्यों नहीं लाया गया? कोर्ट में याचिका दायर करके कहा गया है कि मानसिक स्वास्थ्य को ‘स्वास्थ्य बीमा’ के दायरे में न रखा जाना संविधान के समता मूलक व भेदभाव न करने संबंधी कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन है। गौरतलब है कि मानसिक स्वास्थ्य कानून 2017 की धारा 21(4) में बीमा पॉलिसी में मानसिक रोगों को भी शामिल किए जाने का प्रावधान है।
जिस तरह से पिछले दो-तीन दशकों में मानसिक बीमारियों में वृद्धि हुई है, उसे देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि इनसे जूझ रहे लोगों को आर्थिक संरक्षण मिले, ताकि वे बेहतर तरीके से अपना इलाज करा सकें। दरअसल, इस समस्या के मूल में वह मिथक है, जिसे शायद बीमा कंपनियां भी अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करती हैं कि मानसिक बीमारियां लाइलाज होती हैं। इसी से ये उपेक्षा का शिकार रही हैं। अभी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने विश्व-समुदाय से आग्रह किया है कि ‘बढ़ते दबावों का सामना कर रहे लोगों की रक्षा करने के लिए और ज्यादा प्रयास करने होंगे। उनके मुताबिक, तथाकथित सामाजिक कलंक और भेदभाव का शिकार होने से अक्सर यह पीड़ा और ज्यादा गहरी हो जाती है।’
यह एक कटु सत्य है कि मानसिक रोगों को सामाजिक कलंक के रूप में देखे जाने के कारण ज्यादातर लोग अपनी मानसिक परेशानियों में पेशेवर मदद हासिल करने से परहेज करते हैं। मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ने के पीछे यह एक बड़ी वजह है। दिसंबर 2019 में लांसेट द्वारा जारी एक रिपोर्ट में भारत में 1990 से 2017 तक मानसिक स्वास्थ्य को लेकर क्या स्थिति रही, उसका विश्लेषण किया गया है। लांसेट के आंकड़ों के अनुसार, 2017 तक भारत में हर सात में से एक व्यक्ति किसी न किसी तरह के मानसिक रोग से पीड़ित है।
भारत में मानसिक रोगों में सबसे ज्यादा भागीदारी अवसाद की हैै। यूं तो विश्व भर में मानसिक रोगियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, लेकिन पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों के उलट हमारे यहां मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता और चेतावनी की व्यवस्थाओं का अभाव है। वैसे इस बीमारी के कारणों को लेकर कई अध्ययन हुए हैं। फ्रांस की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्सेल्स सेंट क्वेंटिन एन वैलेंस के शोधकर्ताओं ने इंग्लैंड में 16 से 69 साल के 25,000 लोगों पर किए गए अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि वहां आम तौर पर होने वाली दिमागी परेशानी का संबंध अकेलेपन से है। विश्व भर में दिमागी बीमारियों को लेकर किए गए अमूमन सभी शोध इसी निष्कर्ष के इर्द-गिर्द घूमते हैं। भारत की भी यही स्थिति है। ऐसे में, विचार का विषय यह है कि उन रास्तों को ढूंढ़ा जाए, जिनसे इस समस्या का हल मिल सके।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 7.5 प्रतिशत आबादी मानसिक रोगों से जूझ रही है। बावजूद इसके यहां मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए धन का आवंटन बहुत कम है। भारत में हर दस लाख आबादी पर सिर्फ तीन मनोचिकित्सक हैं। मनोवैज्ञानिक सलाहकारों का अनुपात तो इससे भी कम है। आज जब तरह-तरह का दबाव हमारे ऊपर बढ़ रहा है, हम इस रोग की उपेक्षा नहीं कर सकते।
इस संबंध में हम जिम्बाब्वे का मॉडल अपना सकते हैं। जिम्बाब्वे के मनोवैज्ञानिक डिक्सन चिबांदा ने अवसादग्रस्त लोगों की मदद के लिए नायाब तरीका निकाला। मनोचिकित्सकों की कमी का तोड़ निकालने के लिए उन्होंने साल 2006 से आज तक 400 बुजुर्ग महिलाओं को प्रशिक्षण देकर एक ‘ग्रैंड मदर्स क्लब’ का गठन किया है। जब डिक्सन ने पाया कि अस्पतालों में जगह कम है, तो उन्होंने इसका हल ‘फ्रेंडशिप बेंच’ के रूप में निकाला। सार्वजनिक पार्कों में ऐसी बेंचें लगाई गईं, जहां ये बुजुर्ग महिलाएं लोगों से उनकी भाषा में बात करती हैं। डिक्सन का यह प्रयास असरदार साबित हुआ। आज दादियों-नानियों की मदद से अवसाद के इलाज के कार्यक्रम कई देशों में चलाए जा रहे हैं। मानसिक बीमारी हमारे लिए भी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इसे लेकर गहन चिंतन व प्रयासों की जरूरत है। इस प्रयास में ‘फे्रंडशिप बेंच’ एक बेहतर विकल्प हो सकती है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्री
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / विश्व मंच पर चीन की भारत विरोधी हरकतें जितनी पुरानी हैं, उतनी ही दुखद और निंदनीय भी। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर चीन फिर एक बार इस साजिश में लगा था कि पाकिस्तान के पक्ष में और परोक्ष रूप से भारत के खिलाफ एक निंदा प्रस्ताव पारित हो जाए। पाकिस्तान की ओर से चीन द्वारा पेश प्रस्ताव में विगत दिनों कराची में हुए आतंकी हमले के लिए भारत को इशारों में ही घेरने की साजिश थी। यह प्रस्ताव खुद चीन ने तैयार किया था। वैसे तो किसी भी आतंकी हमले की संयुक्त राष्ट्र के मंच से निंदा सही है, लेकिन इस मंच का नाजायज फायदा किसी को उठाने नहीं देना चाहिए। खुशी की बात है, भारत के समर्थक देश सजग थे और पहले जर्मनी ने इस प्रस्ताव को रोका और फिर अमेरिका भी आगे आया, इससे चुपचाप इस प्रस्ताव को पारित करा ले जाने की चीनी-पाकिस्तानी साजिश नाकाम हो गई। भारत के लिए चिंता की बात यह थी कि पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री और उसके बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी कराची आतंकी हमले के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। इसलिए ऐसे आतंकी हमले की निंदा का चुपचाप प्रस्ताव करना और उसके लिए किसी निर्दोष देश की ओर इशारा करना चीन जैसे कथित वीटो पावर प्राप्त देश को कतई शोभा नहीं देता।
बहरहाल, चीन की ऐसी हरकतों के प्रति केवल भारत ही नहीं, अब दुनिया के अन्य महत्वपूर्ण देश भी सजग हो गए हैं। दुनिया में कहीं भी आतंकी हमला हैवानियत से कम नहीं, लेकिन ऐसे किसी हमले के जरिए कूटनीति और राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश भी हैवानियत से कम नहीं है। अपने यहां जायज आवाज उठाने वालों को भी आजीवन करावास देने वाला चीन न जाने कैसे पाकिस्तानी आतंकियों का खुलकर बचाव करता रहा है? जमीनी रूप से आतंकवाद के पोषण में पाकिस्तान की हरसंभव मदद करने से लेकर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पक्षधरता तक चीन का कोई भी पहलू दुनिया से छिपा नहीं है। अब खबर आई है कि म्यांमार में अरकान नामक हथियारबंद संगठन को चीन धन और हथियार दे रहा है, ताकि वे भारतीय इलाकों में अशांति फैला सकें।
यह बात भी छिपी नहीं है कि हम चुपचाप उसकी साजिशें झेलते रहे हैं। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है, जब भारत ने मजबूर होकर अपनी नीतियों में परिवर्तन शुरू किया है। लंबे अरसे बाद भारत की खामोशी टूटी है और उसने जेनेवा में मानवाधिकार संबंधी परिषद की बैठक में हांगकांग का मुद्दा उठाया है। हांगकांग में भारतीय मूल की आबादी भी बड़ी संख्या में रहती है, अत: भारत ने कहा है कि वह इस मामले पर नजर रखे हुए है। भारत का इतना कहना भी पर्याप्त है। चीन को समझ लेना चाहिए कि आम तौर पर तिब्बत से ताइवान और यहां तक कि भारतीय इलाकों में चीनी दावों के प्रति भी अपेक्षाकृत शालीनता बरतने वाला भारत अब नई दिशा में बढ़ चला है। भारत के खिलाफ लगातार साजिशें करने की चीनी नीति को अब जवाब मिलने लगा है। दुनिया का सबसे विशाल लोकतांत्रिक देश भारत अपनी कूटनीति के प्रति सजग है। चीन के प्रति केवल भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन में भी बड़ी नाराजगी है। कोई भी देश चीन की अतार्किक मनमानी या हस्तक्षेप को झेलना नहीं चाहेगा। विश्व मंच पर चीन को वह फसल अब काटनी पडे़गी, जो वह भारत और अन्य देशों में बोता रहा है।
ओपिनियन / शौर्यपथ / इस हफ्ते की शुरुआत में, जब भारत सरकार ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर टिक टॉक सहित 59 चीनी एप पर पाबंदी लगाई, तब देश भर में हर्ष और विलाप, दोनों तरह के स्वर सुनाई दिए। कुछ के लिए सरकार की यह पहल चीन के साथ हुए सीमा-संघर्ष के खिलाफ एक वाजिब प्रतिक्रिया थी, तो अन्य लोगों ने पेटीएम, जोमैटो जैसी भारतीय कंपनियों में शामिल चीन के शेयरधारकों के खिलाफ भी दंडात्मक प्रतिबंध लगाने का आह्वान किया। मगर एक सच यह भी है कि सरकार के इस फैसले से भारतीय डिजिटल उद्यमियों की पूरी पीढ़ी राहत महसूस कर रही है, बावजूद इसके कि उपरोक्त किसी भी तर्क से वह बेशक इत्तिफाक न रखती हो।
देशों का द्विपक्षीय रिश्ता एक जटिल मसला है, विशेष रूप से कटुता के लंबे इतिहास वाले पड़ोसियों के बीच। इसमें आपसी व्यापार, विदेशी संबंध और अंतरराष्ट्रीय संचार को प्रभावित करने के लिए मुद्दों का मूल-बिंदु से विस्तार किया जा सकता है। भारत में चीनी एप पर प्रतिबंध ठीक ऐसा ही मामला है। यह सामने वाले को महज तकलीफ पहुंचाने वाला कदम है, जो भविष्य की वार्ताओं में मोलभाव का हमारा हथियार बन सकता है। इससे दोनों देशों के बीच लद्दाख में जारी तनातनी का कतई हल नहीं निकलेगा। इसे चीन के पूर्ण बहिष्कार का संकेत समझने की गलती भी नहीं की जानी चाहिए। फिर भी, इस प्रतिबंध का भारत के घरेलू डिजिटल सेवा उद्योग के लिए गहरा निहितार्थ है।
दरअसल, पिछले कुछ दशकों से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की तरफ ही हमारी आर्थिक नीतियों का जोर रहा है। भारत की विशाल, नौजवान और आकांक्षी आबादी स्वाभाविक तौर पर सभी प्रकार की विदेशी वस्तुओं और सेवाओं के लिए एक आकर्षक बाजार है। अपने दरवाजे विदेशी कारोबारियों के लिए कुछ-कुछ खोलकर सरकारों ने वर्षों से इस अवसर को भुनाया भी है। हालांकि, इस रुख की वजह से भारतीय कंपनियों को भी विदेशी प्रतियोगियों के खिलाफ मैदान में उतरने में मदद मिली है। मगर, भारत कोई अकेला देश नहीं है, जो अपने बाजार पर नियंत्रण रखता है। औद्योगिकीकरण की अपनी यात्रा में यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया व अधिकांश विकसित देशों ने भी ऐसा किया है। बाजार-पहुंच और विदेशी स्वामित्व की बाधाएं दुनिया भर में हैं और तमाम तरह के चलन, व देशों के बीच व्यापार को व्यवहार-कुशल बनाने के एकमात्र उद्देश्य के साथ विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) भी अस्तित्व में है।
हालांकि, भारत में दूरसंचार लाइसेंस, फ्रीक्वेंसी के आवंटन और नीलामी के इर्द-गिर्द ही बहसें सिमटती गई हैं, आधुनिक दूरसंचार की सहायता से होने वाले कारोबार की तरफ बहुत कम ध्यान दिया गया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि नई पीढ़ी की डिजिटल सेवाओं के कामकाज के बारे में बहुत से लोगों को पता नहीं है। भारत के उपभोक्ता बाजार में विदेशी कंपनियों का कितना दखल हो, यह व्यापार और राजनीति में तीखी बहस का विषय रहा है। नागरिक उड्डयन, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, बीमा, बैंकिंग, खुदरा, रेलवे, यहां तक कि आउटसोर्सिंग भी ऐसे उद्योग हैं, जिनके लिए विदेशी निवेश और बाजार में पहुंच को मंजूरी बारीक जांच-पड़ताल के बाद ही मिली है। मगर अब तक इस पर शायद ही गंभीर चर्चा हुई है कि एक अरब से अधिक डिजिटल उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने के लिए विदेशी कंपनियों को कितना अधिकार देना चाहिए। स्थिति को और बेहतर समझने के लिए विमानन उद्योग से इसकी तुलना कर सकते हैं।
साल 2014 में हवाई यात्रा करने वाले भारतीयों की संख्या 17 करोड़ थी, जो 2019 में दोगुनी हो गई। इस क्षेत्र में वर्तमान और पिछली सरकारों ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश बढ़ाने की तरफ पर्याप्त ध्यान दिया और हर वर्ष यहां विदेशी कंपनियों को अनुमति दी गई। मगर भारतीय डिजिटल दुनिया को कीमती नहीं माना गया, जबकि अपने यहां टिक टॉक के अनुमानित 12 करोड़ उपभोक्ता हैं और वाट्सएप के 40 करोड़। यह हर साल हवाई यात्रा करने वाले भारतीयों की संख्या से कहीं अधिक है।
अब इसकी तुलना जरा चीन से करें। चीन का चर्चित ‘ग्रेट फायरवाल’ नियमों और तकनीक का ऐसा मजबूत संयोजन है कि चीन में सूचना, सामग्री और डाटा का स्वतंत्र आवागमन संभव ही नहीं है। इसी वजह से चिनगारी (टिक टॉक का भारतीय संस्करण) जैसे एप के लिए अपना मालिकाना हक चीनी हाथों में सौंपे बिना चीन की आभासी दुनिया में काम करना असंभव होगा। वाट्सएप पर तो वर्षों से वहां पाबंदी लगी हुई है। वहां स्थानीय एप वीचैट के एक अरब से अधिक उपयोगकर्ता हैं और इसमें वाट्सएप को आसानी से टक्कर दे सकने की संभावना है। यही नहीं, चीन फेसबुक, यू-ट्यूब, गूगल, इंस्टाग्राम, स्पॉटिफाई, विकिपीडिया, गूगल मैप्स जैसी अन्य सेवाओं का भी उपयोग नहीं करता, जबकि इन पर हमारी रोजाना की निर्भरता है। इन जैसी सेवाओं के लिए वहां स्थानीय एप हैं, जिनमें से कई तो अपेक्षाकृत बडे़ उपभोक्ता-आधार वाले और बेहतर हैं। यहां तक कि कनाडा, फ्रांस और यूरोपीय संघ के देशों में भी कुछ सख्त नियम-कानून हैं, जिससे उन्होंने बड़ी डिजिटल कंपनियों को भी खास रियायत देने के लिए मजबूर किया है। लिहाजा, भारत सरकार द्वारा लगाए गए इस प्रतिबंध को दुनिया व्यापक तौर पर समझेगी।
आधुनिक दुनिया में क्लाउड पर सूचनाओं को जमा करके रखने का चलन बढ़ा है, इसलिए भौगोलिक सीमाएं अब काफी हद तक बेमानी हो गई हैं। बेहतर व विकसित अर्थव्यवस्थाओं से आने वाली बड़ी कंपनियों को मुफ्त और पूरे भूगोल तक पहुंच से पर्याप्त लाभ मिलती रही है, जबकि छोटी कंपनियों के लिए मुकाबला समान नहीं रह पाता है। स्थानीय कंपनियों का समर्थन करना देशों के लिए सामान्य बात है। बड़ी डिजिटल कंपनियों को पता है कि इसी कारण स्थानीय निवेश के नियम जटिल हो सकते हैं। भारतीय स्टार्टअप्स में भी तभी तक चीनी निवेश की अनुमति होनी चाहिए, जब तक कि उस पर नियमबद्ध प्रभावी नियंत्रण बना रहे। मुफ्त बाजार का हिमायती होने के नाते मेरा यह भी मानना है कि इस तरह के नियम लंबे समय में प्रभावहीन हो जाएंगे। लिहाजा, हालिया प्रतिबंध भारतीय उद्यमियों के लिए एक अच्छा मौका है कि वे बाजार में बन आए खालीपन को तेजी से भरें। उन्हें जल्द ही यह करना होगा, क्योंकि वक्त बीत रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)ज्योतिर्मय साहा, संस्थापक सीईओ, ऑगस्ट मीडिया
शौर्यपथ लेख / शरद पंसारी / पिछले दिनों सीमा पर 20 जवानो की शहादत के बाद भारतीयों का खुल खौल उठा हर तरफ से बदला लेने की आवाज़ उठने लगी . पेट्रोल डीजल के बढ़ते दामो पर कई ज्ञानियों ने तथ्य पेश किये कि युद्ध हो सकता है असला बारूद की जरुरत पड़ेगी , कई महाज्ञानियो ने तर्क दिया कि पहले के पाप है अब धो रहे है , कई महा पंडितो ने तो भारत के कुछ राजनितिक पार्टी के नेताओ को दलाल भी बता दिया . ऐसा माहौल बन गया कि कोरोना से बाद में निपटेंगे पहले चीन से निपट ले चीन को मजा चखाएंगे . कुछ अत्यधिक प्रेमी देश भक्तो ने तो चाइना कम्पनी के साइन बोर्ड भी तोड़ दिए ये अलग बात है कि जेब में रखे चाइना कम्पनी के मोबाइल में मोबाइल गार्ड लगा लिए ताकि चाइना कम्पनी के मोबाइल की लाइफ दुगनी हो जाए और लगाए भी क्यों नहीं देशभक्ति एक तरफ खुद की संपत्ति एक तरफ . क्योकि ऐसे देशभक्तों की देशभक्ति चाइना सामान के ईस्तमाल करने वाले दुसरो पर पाबंदी लगाने की है नुक्सान करने की है . खुद ईस्तमाल करे तो उनका दुधभात है ....
ये सत्य है कि भारत एक बड़ा बाज़ार है किन्तु साथ ये भी सत्य है कि अधुरा बहिष्कार पतन का कारण भी बन सकता है . चाइना सामन का बहिष्कार करने वाले सोशल मिडिया पर एक्टिव है और पुरे देशभक्ति के साथ चाइना मोबाइल के बहिष्कार की बात चाइना मोबाइल से ही फारवर्ड कर रहे है देश में लगभग ६०-७० प्रतिशत स्मार्ट फोन चाइना के है और रोज बिक्री हो रहे है . पर पता नहीं ये देशभक्त चाइना मोबाइल की सार्वजनिक होली क्यों नहीं जला रहे है क्या सिर्फ दिखावा कर आम जनता को गुमराह करने की सोंचे है .
ऐसे महाज्ञानी लोग कहा थे जब सरहद पर २० जवान शहीद हुए २०१४ के पहले ये लोग १ के बदले १० सर लाने की बात करते थे अब क्यों मौन है . महंगाई पर सड़क पर नाचते थे और चिल्लाते थे अब क्यों मौन है . स्थिति अलग अलग समय में अलग कारणों के कारण जानी जाती है . ये हकीकत है कि वर्तमान समय में स्थिति बेहद विकत है ऐसे समय में आम जनता पेट की चिंता करे कि देशभक्ति कि परिवार की चिंता करे कि देश कि . क्या कोई ऐसा बाप होगा जो सामने परिवार मुसीबत में है और प्रदर्शन करने वो चौक पर है .ऐसा करना किसी भी परिवार के मुखिया के लिए असंभव है और यही जीवन है . इंसान पहले , परिवार फिर देश की सोंचता है . एक फौजी भी देश की सेवा करता है तो परिवार की सुरक्षा के लिए ही क्या कोई बड़े से बड़ा अधिकारी सुनने में आया है कि देश सेवा बिना मेहनताना के सेलेरी के कर रहा हो क्या कोई ऐसा जनप्रतिनिधि नजर आया जो सिर्फ सेवा कर रहा हो और सरकारी सुविधा का त्याग किया हो ऐसा कोई नहीं मिलता जो मिलते है वो इतिहास में दर्ज हो जाते है . ऐसा नहीं है कि देश में पुरानी सरकारों ने सीमा की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया ऐसा नहीं है कि पूर्व की सरकारों को देश की चिंता नहीं थी .
सोशल मिडिया में खूब देशभक्त मिलेंगे जो पुरानी सरकारों के काम काज का उल्लेख घोटालो से करते नजर आ जाते है लाखो करोडो के घोटालो को पेश करते है अगर ये देशभक्त सही है तो वर्तमान सरकार ६ साल में ऐसे लोगो को अभी तक जेल में क्यों नहीं डाल पा रही है क्यों सोशल मिडिया के देशभक्तों के पोस्ट को संज्ञान में नहीं ले रही है . कुछ मामलो को छोड़ कर सारी बाते सिर्फ हवा हवाई है आरोप लगाना बहुत आसान है तथ्य भी पेश करते है फलां नेता जमानत पर है , फला नेता पर केस दर्ज है . क्या वो विश्वास से बोल सकते है कि fir दर्ज करने के लिए प्रमाण की जरुरत होती है शासन की शक्ति की नहीं सभी जानते है कि शासन की शक्ति के आगे fir दर्ज करना कोई बड़ी बात नहीं थी . अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ में ३ दिनों तक सरकारी एजेंसी राजधानी में डेरा डाले रही क्या हुआ एक fir तक नहीं हुई मामले का अभी तक कुछ पता नहीं चला जबकि सोशल मीडिया में करोडो रूपये जब्ती के पोस्ट फोटो सहित आ गए थे कहा है अब वो ...
साहब शहीदों की शहादत का बदला कोई एप्प नहीं , कोई सामान नहीं कोई बहिष्कार नहीं . शहीदों का बदला एक के बदले दस सर है जिसका आम जनता को इंतज़ार है .....
शौर्यपथ लेख / डॉ. सिद्धार्थ शर्मा की कलम से ../ सनातन धर्म या वैदिक धर्म का आधार ही ये छोटा सा निशान ? है, जिसने महाकाव्यों की रचना करवा दी। जब भगवान कृष्ण से अर्जुन ने सवाल पूछा तो विश्व को गीता मिली। जब माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा तो शिवपुराण का प्रादुर्भाव हुआ। एक अंधविश्वास को विश्वास से अलग ये सवाल ही तो करता है। सिर्फ ये सवाल ही तो है जो न्यूटन के सर पर सेब ने पूछा था। इसी सवाल के जवाब ने तो हमें गति के सिद्धांत तक पहुचा दिया। गुरुत्वाकर्षण की खोज हुई। हम उनमें से तो नही जिनपर सवाल उठाया जाए तो तलवारें निकल आती है? भारत का लोकतंत्र चाइना की डेमोक्रेसी से अलग कैसे है? इस सवाल पूछने के अधिकार पर हम आज लोकतांत्रिक हैं।
पर आज कुछ धर्म के ठेकेदार हमसे हमारा लोकतांत्रिक अधिकार ही छीन लेना चाहते हैं। रियलिटी शो में अपनी अंधी माँ और विधवा बहन पर रोता प्रतिभागी संगीत को पीछे छोड़ते हुए अपनी दुखद स्थिति पर संगीत का सिरमौर बन जाता है। जनता भावुक है और कमजोर का साथ देने एकजुटता भी दिखती है पर किस कीमत पर? आज समय अलग है। कभी कहा जाता था जात न पूछो साधु की पूछ लीजिये ज्ञान। पर अब के साधु ज्ञान पूछने पर जात बताने लगे हैं। जब ईश्वर सवालों से परे नही तो व्यक्ति कैसे? पतंजलि के दावे पर सवाल उठना पतंजलि पर उंगली उठाना और पतंजलि पर उंगली उठाना आयुर्वेद पर उंगली उठाना? क्या ये सवाल पूछने के उस मौलिक अधिकार का हनन नही? बाबा ने सवाल पूछने वाले बुद्धिजीवियों को आयुर्वेद,भगवा,सनातन का विरोधी बता दिया साथ ही अपनी जाति का भी। बाबाजी आयुर्वेद आपके पहले भी था और आपके बाद भी होगा। हम सब आयुर्वेद के लाभार्थी हैं इसके ठेकेदार नही। आज भी हाथ कट जाए तो हमारी माताजी हल्दी ढूंढने लगती है। चाहे आपकी महत्वकांशा हो पर राजनीति को आयुर्वेद से दूर रखिये।
बाबा रामदेव का इंटरव्यू विरोधियों को घेरता हुआ जाती,आयुर्वेद, सनातन के आसपास घूमता रहा पर मजे की बात थी कि उन्होंने एक बार भी कोरोनिल के कोरोना की दवा होने का दावा इस घंटे भर चले इंटरव्यू में नही किया। साथ ही शब्दों की जादूगरी दिखाते हुए आयुष मंत्रालय की तारीफ के कसीदे पढ़े और कोरोना के इलाज की ओर बढ़ता कदम बताया। ध्यान दीजिए कदम। शुरुवात। हालांकि 23 तारीख को ये कदम चांद की धरती पर था।।
बालकृष्ण जी के इंटरव्यू ने साफ किया कि उन्होंने कोरोना इलाज का न कभी दावा किया न प्रचार, हालांकि दिव्य कोरोना किट की क्लोजप फ़ोटो और बाबाजी के 100% सफलता के दावे को दरकिनार करते हुए उन्होंने सिर्फ ट्रायल में कोरोना रोगियों के ठीक होने की बात को माना पर कोरोनिल को इसका कारण बताने से इनकार कर दिया। अब इस फजीहत के बाद आखरी हथियार बचा था जो बाबाजी ने आज निकाल लिया। आयुर्वेद का नाम और सनातन की साख।।
बाबाजी ने जिस युग और आनंद हॉस्पिटल में ट्रायल का दावा किया उसका सच भी सामने आ गया कि 2 कोरोना मरीजों के पाये जाने के बाद 65 मरीजों को quaranteen किया गया उनमें से कोई भी कोरोना पॉजिटिव कभी था ही नही। आयुष मंत्रालय ने भी बताया कि सिर्फ असिम्प्टोमैटिक मरीजों पर ट्रायल हुआ था जो वैसे भी बिना दवा 3 दिन में ठीक हो रहे थे। आयुष मंत्रालय से सर्दी का लायसेंस लेकर ये दवा कोरोना की कब और कैसे बनी इसपर विश्व आश्चर्यचकित है और अब तो बाबा भी।
रातों रात गिरता शेयर मार्केट के बीच supporters ने सोशल मीडिया ने कभी नकली लायसेंस दिखाया कभी फर्जी Dr मुजाहिद हुसैन को बाहर का रास्ता दिखाया। लेकिन सच छुपता नही। दर्ज होते fir और प्रदेशों में लगते बैन ने सच को फिर सबके सामने ला दिया।
सच ही तो है कि
#बिना विचारै जो करे सो पाछे पछताए, काम बिगड़ौ आपनो जग मा होत हँसाये
अब तक 15 हजार से अधिक प्रवासी श्रमिक कोरबा लौटे, चार हजार 829 अभी भी प्रवासी क्वारेंटाइन में
सेंटरों में आवास एवं भोजन सहित सभी बुनियादी सुविधाएं, स्वास्थ्य की भी नियमित जांच , साढ़े आठ हजार से अधिक प्रवासियों की हुई कोरोना जांच ,लगभग आठ हजार दो सौ की रिपोेर्ट निगेटिव, 282 संक्रमित मिले
कोरबा / शौर्यपथ / कोरोना संकट के कारण हुए लाॅक डाउन से कामकाज की तलाश में कोरबा जिले से देश के विभिन्न हिस्सों में गये लगभग 15 हजार से अधिक प्रवासी श्रमिक वापस लौट आये हैं। जिले में लौटे प्रवासी श्रमिकों से कोरोना संक्रमण का जिले में फैलाव रोकने के लिए सभी श्रमिकों को 14 दिनों के लिए 260 क्वारेंटाइन सेंटर्स में अवलोकन में रखा गया हैं। इन क्वारेंटाइन सेंटरों से अब तक दस हजार 686 प्रवासी श्रमिक क्वारेंटाइन अवधि पूरी होने के बाद अपने घर पहुंच गये है। जिले के क्वारेंटाइन सेंटरों में अभी चार हजार 829 लोग रह रहे हैं। अलग-अलग राज्यों से वापस आए इन सभी प्रवासियों को कोविड प्रोटोकाॅल का पालन करते हुए उनके परिजनों और स्वयं के साथ-साथ अन्य लोगों में कोरोना संक्रमण को रोकने और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए 14 दिनों तक क्वारेंटाइन में रहने के निर्देश दिए गए हैं। जिले में 211 क्वारेंटाइन सेंटर ग्रामीण क्षेत्रों में बनाये गये हैं। इन सभी क्वारेंटाइन सेंटर्स का संचालन एवं नियंत्रण संबंधित जिला प्रशासन द्वारा किया जा रहा है। इनके संचालन में ग्राम पंचायतें, जनपद पंचायतें और जिला पंचायतें सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं।
कोविड प्रोटोकाॅल और समय-समय पर शासन द्वारा जारी दिशा निर्देशों के अनुसार इन क्वारेंटाइन सेंटरों में आकर रूके प्रवासी श्रमिकों में से अब तक आठ हजार 627 श्रमिकों की कोरोना जांच कराई जा चुकी है, जिनमें से आठ हजार 176 श्रमिकों की जांच रिपोर्ट निगेटिव आई है। दो सोै ब्यासी प्रवासियों को जांच में कोरोना संक्रमित पाया गया है। जिन्हे ईलाज के लिए कोरबा, रायपुर, बिलासपुर के कोविड अस्पतालों और एम्स रायपुर भेजा गया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित क्वारेंटाइन सेंटर्स में रह रहे प्रवासी मजदूरों को आवास और भोजन सहित सभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। स्थायी-अस्थायी शौचालयों, पुरूषों एवं महिलाओं के लिए अलग-अलग स्नानगृहों, स्वच्छ पेयजल, लाइट एवं पंखों की व्यवस्था की गई है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के निर्देश पर कई सेंटर्स में प्रवासी श्रमिकों के लिए मनोरंजन के साधनों की भी व्यवस्था की गई है। क्वारेंटाइन सेंटर्स में रह रहे लोगों के स्वास्थ्य पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। अस्वस्थ लोगों को ईलाज और दवाईयां मुहैया कराई जा रही है। संक्रमण की संभावना और लक्षण वाले व्यक्तियों के तत्काल सैंपल लेकर जांच के लिए भेजा जा रहा है। वृद्ध, गर्भवती महिलाओं और डायबिटीज, ब्लड पे्रशर जैसी बिमारियों से पहले से ही ग्रसित व्यक्तियों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। कोरबा जिले में ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक 77 क्वारेंटाइन सेंटर पाली विकासखंड में बनाये गये हैं। करतला विकासखंड में 40, कटघोरा विकासखंड में 36, कोरबा विकासखंड में 34 और पोंड़ीउपरोड़ा विकासखंड में 24 क्वारेंटाइन सेंटर हैं। इन सभी क्वारेंटाइन सेंटरों में अब तक लगभग 12 हजार प्रवासी श्रमिकों को ठहराया जा चुका है। इनमें से सात हजार 790 श्रमिक क्वारेंटाइन अवधि पूरी कर अपने घर जा चुके हैं। वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्र के क्वारेंटाइन सेंटरों में चार हजार 161 श्रमिक रूके हैं।
कलेक्टर श्रीमती किरण कौशल गांवों में क्वारेंटाइन सेंटर्स के सुचारू संचालन के लिए लगातार व्यवस्था की समीक्षा कर रही हैं। क्वारेंटाइन सेंटरों के लगातार निरीक्षण के लिए जोनल अधिकारियों सहित सभी एसडीएम, तहसीलदार और अन्य जिला स्तरीय अधिकारियों को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। कलेक्टर के निर्देष पर सेंटर्स की कमियों-खामियों को तत्परता से दूर किया गया है। उन्होंने क्वारेंटाइन सेंटर्स में रह रहे लोगों की सेहत की लगातार निगरानी और संक्रमण के लक्षण वाले लोगों के तत्काल सैंपल जांच के निर्देष स्वास्थ्य विभाग को दिए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के 211 क्वारेंटाइन सेंटरों में रूके लगभग 12 हजार प्रवासी श्रमिकों में से कोविड प्रोटोकाॅल और समय-समय पर स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार छह हजार 247 का कोरोना टेस्ट कराया गया है, जिसमें से छह हजार की रिपोर्ट निगेटिव आई है। 189 प्रवासी मजदूर ग्रामीण क्षेत्रों के क्वारेंटाइन सेंटरों में कोरोना संक्रमित मिले हैं। जिनका ईलाज कोविड अस्पतालों में कराया गया है और इनमें से भी कई स्वस्थ्य होकर वापस लौट आये हैं। क्वारेंटाइन अवधि पूरी कर अपने घर वापस लौट चुके प्रवासी श्रमिकों के लिए जिला स्तर पर मनरेगा के तहत जष्ब-कार्ड बनाकर रोजगार दिया जा रहा है। अन्य योजनाओं के माध्यम से भी उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने त्वरित कदम उठाए जा रहे हैं। मजदूरों की स्किल-मैपिंग कर जिले के सार्वजनिक उपक्रमों, निजी औद्योगिक संस्थानों, भवन निर्माण और अन्य क्षेत्रों में उन्हें काम दिलाने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।
कोरबा के शहरी क्षेत्रों में 49 क्वारेंटाइन सेंटर बनाये गये हैं। शहरी क्षेत्रों में लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों के लिए दस, छात्रों, व्यापारियों, पर्यअकों और अन्य लोगों के लौटने पर क्वारेंटाइन के लिए 21 सेंटर स्ािापित है। जिले में स्थित सार्वजनिक उपक्रमों ने भी अपने-अपने कामगारों और उनके परिजनों के बाहर से कोरबा लौटने पर क्वारेंटाइन के लिए 18 सेंटर बनाये हैं। इन क्वारेंटाइन सेंटरों में अभी तक साढ़े तीन हजार से अधिक लोग बाहर से कोरबा लौटकर ठहर चुके हैं। इनमें से दो हजार 900 लोग अपनी 14 दिन की क्वारेंटाइन अवधि पूरी कर वापस अपने घर जा चुके हैं। शहरी क्षेत्रों के क्वारेंटाइन सेंटरों में अभी साढ़े छह सौ से अधिक लोगों को क्वारेटाइन में रखा गया है। शहरी क्षेत्रों के क्वारेंटाइन सेंटरों में रूके प्रवासी श्रमिकों में से कोविड प्रोटोकाॅल और समय-समय पर स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार दो हजार 374 का कोरोना टेस्ट कराया गया है, जिसमें से दो हजार 216 की रिपोर्ट निगेटिव आई है। 87 प्रवासी शहरी क्षेत्रों के क्वारेंटाइन सेंटरों में कोरोना संक्रमित मिले हैं।
क्वारेंटाइन सेंटर्स में खाने-पीने के लिए प्र्याप्त संख्या में दोना-पत्तल, डिस्पोजेबल थाली- गिलासों के इंतजाम किए गए हैं। बार-बार हाथ धोने के लिए साबुन और पानी के साथ ही हैंड-सेनिटाइजर भी उपलब्ध कराया जा रहा है। मुंह ढंकने के लिए मास्क एवं गमछा भी दिया गया है। कई क्वारेंटाइन सेंटर्स में भोजन बनाने के सभी इंतजामों के साथ सोने के लिए गद्दा, दरी और चादर उपलब्ध कराया जा रहा है। इन सेंटर्स में साफ-सफाई की भी अच्छी व्यवस्था की गई है। इसके लिए सभी सेंटरों को प्र्याप्त मात्रा में डस्ट-बिन, झाड़ू, फिनाइल एवं बाल्टियां दी गई हैं। लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए कई क्वारेंटाइन सेंटर्स में योग और प्राणायाम कराए जा रहे हैं। महिलाओं को माहवारी स्वच्छता के लिए सेनेटरी पैड भी वितरित किए जा रहे हैं। कचरे और बायो-मेडिकल वेस्ट के सुरक्षित निपटान के लिए सभी सेंटरों में समुचित व्यवस्था की गई है। क्वारेंटाइन सेंटर्स की व्यवस्था राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा जारी आपदा राहत निधि तथा ग्राम पंचायतों को उपलब्ध कराए गए चैदहवें वित्त आयोग व मूलभूत की राषि से की जा रही है।
रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ में अतिरिक्त चावल से एथेनॉल उत्पादन करने की अनुमति देने के संबंध में केन्द्र सराकर से आग्रह किया था। मुख्यमंत्री के आग्रह पर राष्ट्रीय जैव ईंधन समन्वय समिति की 24 अप्रैल 2020 की बैठक में भारतीय खाद्य निगम में उपलब्ध सरप्लस चावल से एथेनॉल उत्पादन करने की अनुमति प्रदान की गई है। इसी परिप्रेक्ष में प्रदेश के खाद्य सचिव ने भारत सरकार के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के सचिव को पत्र लिख कर छत्तीसगढ़ में अतिशेष 4 लाख मिट्रिक टन चावल से एथेनॉल बनाने की अनुमति देने का अनुरोध किया है।
केन्द्रीय सचिव को भेजे गए पत्र में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ में खरीफ विपणन वर्ष 2019-20 में प्रदेश के किसानों से समर्थन मूल्य पर 83 लाख 94 हजार मिट्रिक टन धान की खरीदी की गई है। इसमें से बनाए गए कुल चावल से केन्द्रीय पूल एवं राज्य पूल में राज्य की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आवश्यक मात्रा तथा 28.1 लाख मिट्रिक चावल केंद्रीय पूल में भारतीय खाद्य निगम को देने के बाद राज्य में लगभग 4 लाख मिट्रिक टन चावल अधिशेष रहेगा। इस अधिशेष चावल के लम्बे समय तक भण्डारित रहने के कारण खाद्यान्न की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है। ऐसी स्थिति में कोरोना वायरस महामारी की नियंत्रण के लिए डिस्टलरी से एथेनॉल आधारित सैनिटाइजर एवं ईबीपी कार्यक्रम के तहत अतिरिक्त 4 लाख मिट्रिक टन चावल को एथेनॉल बनाने वाले प्लांट को आपूर्ति की जा सकती है। खाद्यान्न से एथेनॉल बनाने वाले प्लांटों की स्थापना के संबंध में राज्य की औद्योगिक नीति 2019-24 से इस संबंध में आवश्यक प्रावधान किए गए हैं। खाद्य सचिव ने छत्तीसगढ़ राज्य को लगभग 4 लाख मिट्रिक टन चावल से एथेनॉल बनाने की शीघ्र अनुमति देने का अनुरोध किया है।
रायपुर / शौर्यपथ / महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को रोजगार प्रदान करने में छत्तीसगढ़ पूरे देश में अव्वल रहा है। कबीरधाम जिला वित्तीय वर्ष 2020-21 में अब-तक सर्वाधिक परिवारों को 100 दिनों का रोजगार देने में राज्य में प्रथम स्थान पर है, वहीं बिलासपुर और राजनांदगांव जिले क्रमशः दूसरे व तीसरे स्थान पर है। पूरे राज्य में जून माह तक 55 हजार 981 परिवारों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया गया है, जिसमें से कबीरधाम जिला में सर्वाधिक 6 हजार 139 परिवारों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराए गए है, जो कि पूरे प्रदेश का 11 प्रतिशत है।
मनरेगा अंतर्गत जिले में बड़ी संख्या पर रोजगार मूलक कार्य कराए जा रहे है। लॉकडाउन के समय कार्य के दौरान सभी सुरक्षा मानकों का पूरा पालन किया गया। कबीरधाम जिले में इस वित्तीय वर्ष में 1 लाख 47 हजार 862 परिवारों को रोजगार देते हुए अब तक 63.49 लाख से अधिक मानव दिवस रोजगार का सृजन किया जा चुका है।
जिले के अधिकारियों ने बताया कि इस वर्ष लगभग 77 लाख मानव दिवस का लक्ष्य रखा गया था, उसके विरूद्ध इस वित्तीय वर्ष के तीन माह में ही 63 लाख से अधिक के मानव दिवस रोजगार का सृजन कर लिया गया है। जो कि लक्ष्य का 82 प्रतिशत है। इस तरह आने वाले समय में मनरेगा के तहत लक्ष्य से और अधिक ग्रामीणों को रोजगार प्राप्त हो जाएगा।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
