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June 01, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

नजरिया / शौर्यपथ / भारत और चीन के बीच 15 जून की झड़प ने आखिरकार हिमालयी सीमा पर शांति के चार दशक के रिकॉर्ड को तोड़ दिया। चीन द्वारा हड़पी गई जमीन को खाली कराने से लेकर शीत युद्ध के आह्वान तक प्रतिक्रियाएं तीखी रही हैं। साल 1950 से न सही, इधर दो दशकों से चीन की बढ़त की चर्चा चल रही है। भारत-चीन संबंधों ने बहुत कुछ देखा है, जुड़ाव से लेकर वर्ष 1959 के नाटकीय अलगाव तक। 1962 में एक छोटा, पर घातक युद्ध हुआ और उसके बाद के दशकों में न युद्ध-न शांति की स्थिति रही। आखिरकार 1988 में दोनों देशों को कूटनीतिक सफलता मिली और संबंधों में एक सलीका बना, जिसके तहत सीमा विवादों को सुलझाए बिना आगे बढ़ने की राह बनी। मूल आधार यह था कि शांतिपूर्ण दायरे में संबंधों में विकास की रफ्तार रहेगी, मगर 15 जून की झड़प से दोनों देशों के बीच रही सहमति पर चोट पड़ी है।
स्पष्ट है, रिश्ते का अगला चरण एक शांतिपूर्ण सीमा पर निर्भर है, मगर इसका अर्थ सिर्फ यथास्थिति की बहाली नहीं होनी चाहिए। यदि यथास्थिति से हमारा आशय दो परमाणु संपन्न बड़े देशों से है, जो फिर से आक्रामक कवायद शुरू कर रहे हैं, तो यह स्थिति ज्यादा नहीं टिकने वाली। अब समीक्षा और एक नए संघर्ष-प्रबंधन ढांचे को लागू करने का समय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस विवाद को क्यों नहीं सुलझा सकते? चीनी विद्वान यूं सन ने समाधान में बाधा डालने वाली प्रमुख समस्या का एक सारांश पेश किया, ‘चीन के साथ सीमा समाधान में भारत जो रियायतें चाहता है, वे कठोर प्रतिबद्धताएं हैं, जिन्हें बाद में पलटा नहीं जा सकता। इसके विपरीत, चीन अमेरिका-चीनी रणनीतिक प्रतिस्पद्र्धा में भारत की तटस्थता चाहता है, जो अल्पकालिक और आसानी से समायोज्य है।’
रणनीतिक इरादों में अनिश्चितता की इस समस्या का निकट भविष्य में कोई कारगर समाधान नहीं है। हालांकि नए मानदंडों के जरिए सीमा स्थिर करना दोनों देशों के हित में संभव है। सबसे विवादास्पद है सीमा पर अनेक स्थानों पर बफर जोन में रचनात्मक दृष्टि रखना और हिंसक झड़पों से बचने के लिए समन्वय के साथ गश्ती की व्यवस्था करना। नई व्यवस्था बनाने के लिए यह जरूरी है। उत्साह या बड़बोलेपन में कई लोगों ने भारत-चीन संबंधों के टूटने की घोषणा तक कर दी। हमें ऐसे अतिरेक या आक्रामकता से बचना है। दोनों देशों के बीच रिश्ते कोई अचानक मुश्किल में नहीं पड़े हैं, इसके संकेत कुछ समय से स्पष्ट मिल रहे थे।
वास्तव में, हमारी चीन नीति असम्मत रही है। बेल्ट रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) से नौसेना सुरक्षा और 5-जी की उच्च तकनीक तक, दिल्ली अपनी बयानबाजी व कार्यों में मुखर रही है। यहां तक कि भू-राजनीतिक क्षेत्र में अमेरिका को जोड़ने में भी भारत नाकाम ही हुआ है। एशिया में भी दिल्ली चीन के पड़ोसियों को भविष्य की बाधा के रूप में आंकती रही है। पारंपरिक सहयोगी रूस के साथ भी हाल के वर्षों में सरकार की नीति पुरानी भू-रणनीति की याद दिलाती है। हमारे नीति-निर्माताओं की इस बात के लिए आलोचना की जा सकती है कि वे विश्वसनीय रणनीति के बिना ही चीन के संदर्भ में प्रतिस्पद्र्धात्मक कदम उठाते रहे। नई दिल्ली की असली नाकामी यह है कि व्यापक विदेश नीति के ढांचे में उसकी नीतिगत कथनी और करनी मेल नहीं खा रही हैं। चीन के साथ निरंतर जुड़ाव बहुध्रुवीय दुनिया में अग्रणी शक्ति के रूप में उभरने की एक भव्य रणनीति का हिस्सा था। इसकी बजाय, दिल्ली ने खुद को खाली खजाने व अप्रत्याशित साझीदारों के साथ चीन के खिलाफ कर लिया है। इतिहास बताता है, जब बड़ी ताकतों के साथ भारत के सकारात्मक व सशक्त संबंध थे, तब उसे चीन गंभीरता से लेता था। इतिहास यह भी दर्शाता है कि भारत के लिए शक्ति का संतुलन किस हद तक फायदेमंद हो सकता है।
भारत-अमेरिका और भारत-सोवियत (रूस) संबंधों ने भारत-चीन संबंधों को स्थिर रखने का काम किया और तभी भारत अपने हितों को पहचानने व आगे बढ़ाने में मजबूती से बना रहा। ऐसा तभी हुआ, जब स्थितियां भारत के अनुकूल थीं और वह चीन के साथ परस्पर लाभप्रद संबंधों को आकार देने में सक्षम था। तभी अंतरराष्ट्रीय माहौल का चतुराई से लाभ उठाने और एक परिष्कृत चीन नीति बनाए रखने में भी भारत ज्यादा सक्षम था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) जोरावर दौलत सिंह, फेलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, दिल्ली

 

सम्पादकीय / शौर्यपथ / देश के जिस चमकदार हिस्से को आदर्श बनकर चमकना था, वहां कोरोना संक्रमण का सबसे ज्यादा फैल जाना दुखद और चिंताजनक है। किसी भी देश की राजधानी में आबादी ज्यादा होती है, लेकिन इसके बावजूद उसे खुद को तमाम कमियों से बचना-बचाना पड़ता है, ताकि उस पर विश्वास कायम रहे। राजनीति से परे भी राजधानी का अपना महत्व है और यह महत्व वहां मौजूद सुविधाओं-संसाधनों की वजह से ही आकार लेता है। यह दुखद तथ्य है कि दिल्ली ने कोरोना के मामलों में उस मुंबई को पछाड़ दिया है, जो विगत लगभग दो महीने से सबसे आगे चल रही थी। मुंबई में जहां रोज आ रहे मामलों की संख्या में भारी कमी आई है, वहीं दिल्ली में एक दिन में 3,788 मामलों का सामने आना चिंता को बहुत बढ़ा देता है। यह दिल्ली के लिए पहले से कहीं ज्यादा ईमानदारी और मुस्तैदी से सोचने-करने का वक्त है। आने वाले दिनों में कई देशों से हवाई उड़ानें शुरू हो जाएंगी और एक राजधानी के रूप में दिल्ली की जो व्यापक जिम्मेदारियां हैं, उनसे बचना नामुमकिन है। कोरोना की चेन तोड़ने के लिए सरकार को युद्ध स्तर पर प्रयास करने चाहिए। अर्थव्यवस्था के लिए लॉकडाउन खुलना जरूरी है, पर ऐसा न हो कि संक्रमण इतनी तेजी से फैले कि अनलॉक होने का नुकसान ज्यादा और फायदे कम हो जाएं। उधर, लॉकडाउन खोलने के बाद महानगर चेन्नई की भी हालत खराब हो गई थी, तो वहां फिर 12 दिन का संपूर्ण लॉकडाउन लगाना पड़ा है। कोलकाता में भी राहत नहीं है, पश्चिम बंगाल सरकार ने लॉकडाउन को 31 जुलाई तक के लिए बढ़ा दिया है। दिल्ली में अभी लॉकडाउन का इरादा किसी नेता ने नहीं जताया है, पर संक्रमण को नहीं संभाला गया, तो कोरोना व लॉकडाउन की राजनीति शुरू करने का इंतजार करने वाले भी कम नहीं होंगे। राजनीति का अपना मिजाज है, जिसमें एक दोषी या आरोपी खोजा जाता है, लेकिन कोरोना के समय ऐसा कोई प्रयास करने की बजाय सकारात्मक ढंग से सोचना चाहिए।
अव्वल तो दिल्ली में परस्पर समन्वय बढ़ाना सबसे जरूरी है। निर्णायक नेताओं को रोष, राजनीति छोड़कर फैसले लेने होंगे। जनता देख रही है कि कौन क्या कर रहा है। अत: नेताओं को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी का एहसास गहराई से होना चाहिए। मरीज घर में रहे या अस्पताल आए, जैसे विषय पर विवाद का समय नहीं है। बहुत से लोग होंगे, जिनके घर में जगह या सुविधाएं नहीं होंगी, तो उनका अस्पताल आना विवशता है। अत: दोनों ही तरह कर सुविधाओं के साथ सरकार को चलना होगा। यह मरीजों के अनुकूल राह निकालने का समय है।
बहरहाल, दिल्ली सरकार ने घर-घर जांच का जो बीड़ा उठाया है, वह सराहनीय है। 15,000 से ज्यादा टीमें बन रही हैं, जिनमें 55 हजार से ज्यादा चिकित्सा सेवक शामिल होंगे, जो 34 लाख से अधिक घरों में जाकर लोगों की जांच करेंगे। ऐसे बड़े अभियान के समय लोगों की भी जिम्मेदारी है कि वे स्वयं आगे बढ़कर जांच कराएं। संभव है, घर-घर जांच से कोरोना के मामलों की संख्या बढ़ जाए, पर तब भी 6 जुलाई तक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और उसके बाद की रणनीतियों के साथ भी दिल्ली को तैयार रहना चाहिए। इस तैयारी की बुनियाद निर्णायकों के परस्पर समन्वय पर निर्भर है और जो थोड़े-बहुत मतभेद रह भी जाएं, तो उनका असर जांच या चिकित्सा टीमों पर नहीं पड़ना चाहिए।

 

मेलबॉक्स /शौर्यपथ / स्वामी रामदेव द्वारा पेश कोरोना की दवा पर हंगामा मचा है। संभव है, योग गुरु ने इस प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन किया हो, लेकिन नियमों की शर्तें पूरी भी कराई जा सकती थीं। बहरहाल, सरकार ने दवाई के प्रचार-प्रसार पर रोक लगा दी है, लेकिन यदि यह दवा कारगर मिलती है, तो इसे स्वीकृति दी जानी चाहिए, अन्यथा इस पर प्रतिबंध लगा देना ही उचित होगा। निस्संदेह, आयुर्वेद भारत की पुरानी चिकित्सा पद्धति है। आज भी दूरदराज के गांवों में देसी हकीम और वैद्य ही ग्रामीणों का इलाज करते हैं। इतिहास भी साक्षी है कि हमारे वैद्य हर बीमारी का इलाज करने में सक्षम थे। मगर एलोपैथी के सामने यह पुरातन विद्या नेपथ्य में चली गई। देखा जाए, तो कोई भी पैथी अपने आप में संपूर्ण नहीं है। कोरोना के मामले में भी एलोपैथी अब तक विफल साबित हुई है। ऐसे में, यदि आयुर्वेद में आशा की किरण जगी है, तो उस पर मंथन जरूरी है, ताकि मानव समाज को कोरोना से राहत मिल सके।
रणजीत वर्मा, फरीदाबाद

फैसले पर आपत्ति
अमेरिकी राष्ट्रपति के पास कुछ विशेष अधिकार होते हैं। इस अधिकार का प्रयोग करके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरे देश के कामगारों को रोजगार के नाम पर मिलने वाली खास वीजा दिसंबर तक निलंबित कर दी है। राष्ट्रपति का कहना है कि इससे अमेरिका में रह रहे लोगों को रोजगार मिलने में सुविधा होगी। यह बात सच है कि वहां के लोगों को इसका फायदा मिलेगा, लेकिन ट्रंप कहीं न कहीं इस बात को नजरंदाज कर रहे हैं कि अमेरिका को यदि आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र माना जाता है, तो इसमें दक्षिण-पूर्व एशिया (खासकर भारत) से आने वाले लोगों का बड़ा योगदान है। इसी वजह से कई लोग इस फैसले पर आपत्ति जता रहे हैं।
जीवन वर्मा, परसाबाद, कोडरमा

थमती खेल गतिविधियां
कोविड-19 महामारी का प्रकोप थमता नहीं दिख रहा है। दुनिया भर में संक्रमित मरीजों की संख्या एक करोड़ तक पहुंचने वाली है। इसकी चपेट में राजनेता और फिल्म जगत के लोगों के साथ-साथ खिलाड़ी भी आने लगे हैं। पाकिस्तान के कई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खिलाड़ियों के साथ ही टेनिस दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी नोवाक जोकोविच भी कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं। समूचा विश्व इस महामारी से पिछले तीन महीनों से जूझ रहा है। खेल गतिविधियों को फिर से शुरू करने की उम्मीद जगी ही थी कि कुछ खिलाड़ियों के संक्रमित होने की खबर आ गई। इससे हाल-फिलहाल में खेल गतिविधियां थमी हुई ही नजर आ रही हैं।
शिवम सिंह, बिंदकी, उत्तर प्रदेश

बढ़े दाम से हलकान
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम घटने के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इसका खामियाजा सिर्फ गरीब और निम्न मध्यमवर्ग को भुगतना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि पहली बार डीजल की कीमत पेट्रोल से ज्यादा हो गई। डीजल की कीमत के बढ़ने का मतलब है, सब कुछ महंगा हो जाना। एक तरफ कोरोना का कहर लगातार जारी है, बेरोजगारी चरम पर है, लोगों से आय के साधन छिन रहे हैं और दूसरी तरफ पेट्रो पदार्थों के दाम बढ़ाकर महंगाई बढ़ाई जा रही है। इससे तो यही जाहिर होता है कि सरकारें अपना खजाना भरने के लिए आम आदमी की जेब काट रही हैं। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों पर रोक लगाकर लोगों को राहत दी जाए। इसके साथ ही, जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के मूल्य में वृद्धि नहीं होती, अपने राजस्व बढ़ाने के लिए सरकार इस रास्ते का इस्तेमाल न करे। पेट्रोल-डीजल के दामों में जल्द ही कमी लानी चाहिए, ताकि गरीब तबके के लोगों को राहत मिल सके।
संजय कुमार सिंह
धनबाद, झारखंड

 

ओपिनियन / शौर्यपथ / देश में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या पांच लाख के करीब पहुंच गई है। सुर्खियों में दिल्ली है, जहां 70 हजार से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और 2,365 मौत की खबर है। इस तरह, अब राष्ट्रीय राजधानी संक्रमण के मामले में मुंबई से आगे निकल चुकी है, जहां 68 हजार से ज्यादा मरीज हैं और मौत का आंकड़ा 3,900 को छू रहा है। दिल्ली में हुई यह बढ़ोतरी चिंता की बात है, और इसीलिए यहां सुधारात्मक उपायों की दरकार है। इसकी जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि केंद्र ने कहा है कि देश में प्रति लाख आबादी में एक मरीज की मौत हो रही है और राष्ट्रीय मृत्यु-दर वैश्विक औसत 6.04 के मुकाबले बहुत कम है, लेकिन मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली जैसे शहरों में मृत्यु-दर परेशानी की वजह बनी हुई है।
इस महामारी को लेकर भारत का अनुभव यह भी है कि बडे़ शहर इसकी चपेट में ज्यादा आए हैं। विशेषकर पुरानी बसाहट के शहरों और झुग्गी-झोपड़ियों की घनी आबादी में संक्रमण अपेक्षाकृत अधिक फैल रहा है। जाहिर है, इसने शहरी स्वास्थ्य तंत्र, और खासतौर से नगरपालिका सेवाओं को बेपरदा कर दिया है, जबकि बड़े शहरों में ऐसी सेवाएं अमूमन मजबूत मानी जाती हैं। इससे दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों की चुनौतियां समझी जा सकती हैं। उनको संक्रमण का विस्तार होने पर कहीं अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने काफी संजीदगी से काम किया है, जिसका प्रमाण ‘धारावी मॉडल’ की सफलता है। बीएमसी ने ‘केरल मॉडल’ के दो प्रमुख उपायों पर खासा ध्यान दिया- तकनीकी क्षमता और विश्वास। यहां तक कि जब मरीजों की संख्या में कमी आने लगी, तब भी संक्रमित इलाकों में फीवर क्लीनिक और संस्थागत क्वारंटीन जैसी सुविधाएं बढ़ाई जाती रहीं। इसके अलावा, निजी चिकित्सकों को भी जिम्मेदारी दी गई, घर-घर सर्वे किए गए, ऑक्सीमीटर व मोबाइल वैन समय पर उपलब्ध कराए गए। इन सबके साथ-साथ उसने लोगों का दिल जीतने के लिए असाधारण और अभिनव तरीकों का भी इस्तेमाल किया।
सवाल यह है कि दिल्ली में आखिर गलती कहां हुई, जबकि मुख्यमंत्री खुद इसमें नेतृत्व करते दिख रहे थे? निस्संदेह, दिल्ली सरकार ने सक्रिय शुरुआत की थी और ऐसा लग रहा था कि स्थिति संभाल ली जाएगी। देश के अन्य राज्यों की तुलना में यहां सबसे अधिक टेस्ट किए जा रहे थे, मगर पिछले चार हफ्तों से इसमें तेजी से कमी आने लगी। दिल्ली में निजी जांच केंद्रों को काफी पहले लाइसेंस दे दिया गया था और ऐसा महसूस हुआ कि अस्पताल की सेवाएं भी मजबूत हो गई हैं। कंटेनमेंट जोन की व्यवस्था भी बेहतर काम कर रही थी, पर अब लगता है कि दिन बीतने के साथ-साथ सरकार संक्रमित मरीजों के संपर्क में आने वालों को खोजने में शिथिल पड़ती गई।
इसी तरह, अस्पतालों में बेड की उपलब्धता को लेकर विरोधाभासी रिपोर्टें आती रहीं। निजी क्षेत्र के अस्पतालों का प्रबंधन, खासकर उनके कीमती इलाज को घटाने के प्रयास काफी आलोचना के बाद किए गए। टेस्टिंग की राज्य सरकार की अपनी नई गाइडलाइन सुर्खियों में रही, जिसमें केवल लक्षण वाले संदिग्धों की जांच के निर्देश दिए गए थे। दिल्ली सरकार पर कोविड-19 से मरने वाले लोगों की संख्या छिपाने के भी आरोप लगे, और अस्पताल में लाश के करीब ही संक्रमित मरीजों के इलाज के दहलाने वाले दृश्य भी सामने आए। सुप्रीम कोर्ट तक ने दिल्ली सरकार के बारे में प्रतिकूल टिप्पणियां कीं और राष्ट्रीय राजधानी में स्थिति को ‘भयावह और दयनीय’ बताया। हालांकि, अब दिल्ली 10,000 बेड के अस्थाई अस्पताल बनाने, घर-घर सर्वे करने और बहुतायत में स्क्रिनिंग के लिए कमर कसती हुई दिख रही है।
सवाल है कि आखिर हालात को पटरी पर कैसे लाया जाए? निश्चित ही कोविड-19 एक अभूतपूर्व महामारी है और इसे संभालना कोई सरल बात नहीं है। मगर हमारे देश में ही कई मॉडल सफल भी हुए हैं। हालांकि, सवाल मॉडल का नहीं, बल्कि पूरी संजीदगी के साथ नियमों के पालन का है, क्योंकि वही मॉडल सफल होते हैं, जिन्हें गंभीरता से जमीन पर उतारा जाता है।
इस काम में ‘इन्सिडेंट मैनेजमेंट’ यानी घटना प्रबंधन कारगर है, जो पिछली घटनाओं में हुई गलतियों से सबक लेकर तैयार किया जाता है। कोविड-19 के संदर्भ में, महामारी विज्ञानियों की योग्यता और उनके कौशल का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। रोकथाम के उपायों को अमली जामा पहनाने के ये उपाय तब भी किए जा सकते हैं, जब विषाणुजनित महामारी के बारे में बहुत जानकारी उपलब्ध न हो और उससे लड़ने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण, बचाव व नियंत्रण के उपायों को सुधारने, संसाधनों में इजाफा करने, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने, बाह्य-संपर्क तेज करने जैसे अतिरिक्त कदम उठाने की दरकार हो। इस तंत्र में कमांड सरंचना काफी मायने रखती है, और इसके लिए महामारी विज्ञानियों को खासतौर से प्रशिक्षित किया जाता है। मगर मुश्किल यह है कि अपने देश में इस काम के लिए अमूमन नौकरशाहों पर भरोसा किया जाता है।
एक बात और। दिल्ली में केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों की तमाम एजेंसियां सक्रिय हैं। उनमें कई तरह के सियासी और अन्य मतभेद कायम हैं। मगर इस शहर ने हैजा, प्लेग, डेंगू, सार्स जैसी पिछली महामारियों का बखूबी सामना किया है। इसने काफी अरसे पहले एक सफल पोलियो उन्मूलन अभियान भी शुरू किया था, जबकि उस समय देश में इसका कोई ठोस मॉडल नहीं था। यह स्थिति तब थी, जब यहां की विभिन्न एजेंसियों में राजनीतिक व अन्य तरह के मतभेद होते रहते थे और केंद्र व दिल्ली के संबंध इतने ही जटिल थे।
स्वास्थ्य-देखभाल और सूचना-संचार प्रणाली में आज काफी सुधार हुआ है, इसलिए कोविड-19 के मोर्चे पर दिल्ली की विफलता त्रासद है। यहां पूर्व में सफलता इसलिए मिलती रही, क्योंकि तब केंद्र, राज्य व स्थानीय निकायों के बीच तालमेल बन जाता था और स्थानीय निकायों द्वारा पोषित मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य-तंत्र का फायदा तब की सरकारों को मिला करता था। आज स्थानीय निकायों की ढांचागत कमजोरी और ‘इन्सिडेंट मैनेजमेंट सिस्टम’ की विफलता का नतीजा साफ-साफ दिख रहा है। तो क्या हम फिसल रहे हैं? इसका जवाब तो वक्त के पास है, लेकिन यदि हम समन्वय की बुनियादी सोच पर नहीं लौटे, तो हमें शायद ही कोई बचा सकेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) राजीव दासगुप्ता, प्रोफेसर (कम्युनिटी हेल्थ) जेएनयू

 

दुर्ग / शौर्यपथ / शहर विधायक अरुण वोरा एवं महापौर धीरज बाकलीवाल ने आज शहर में पेयजल व्यवस्था के तहत् अमृत मिशन योजना अंतर्गत 202 लाख रु0 की लागत से नई पानी टंकी निर्माण कार्य के लिए वार्ड पार्षद मदन जैन के साथ भूमि पूजन किया गया। इस अवसर पर निगम आयुक्त इंद्रजीत बर्मन, के अलावा सभापति राजेश यादव सहित एमआईसी प्रभारी संजय कोहले, दीपक साहू, श्रीमती सत्यवती वर्मा व अन्य प्रभारी मौजूद थे .
उल्लेखनीय है कि नगर निगम दुर्ग की चार पानी टंकियों की जर्जर हो गई है इसके स्थान पर अमृत मिशन योजना के तहत् चार स्थानों पर नई टंकियों का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है । जिसमें 859.86 लाख रु0 की लागत से बनाया जाएगा । इसके अंतर्गत आज शनीचरी बाजार में निगम के पुराने लोक कर्म विभाग रिक्त भूमि मंें पानी टंकी का निर्माण किया जावेगा। इस संबंध में विधायक वोरा ने कहा शहर का निरंतर विस्तार हो रहा है नये-नये कालोनी और आवास बन रहे हैं नगर निगम का दायित्व कि उन सभी क्षेत्रों में पानी की व्यवस्था करें । इस दृष्टि से आज पुराने जर्जर पानी टंकी के स्थान पर नवीन पानी टंकी निर्माण का भूमिपूजन किया गया है ।
इस संबंध में महापौर बाकलीवाल ने बताया कि दुर्ग शहर में स्थित पुरानी जर्जर टंकियों के स्थाना पर अमृत मिशन योजना के तहत् नवीन पानी टंकियों का निर्माण किया जाना है। उन्होनें बताया शनीचरी बाजार वार्ड 31, पदमनाभपुर वार्ड 45, शक्ति नगर वार्ड 17 और 24 एमएलडी फिल्टर प्लांट वार्ड 47 की पानी टंकियाॅ जर्जर हो गई है। उन्होनें बताया शनीचरी बाजार में 1700 लीटर क्षमता की पानी टंकी का निर्माण 202 लाख रु0 की लागत से बनाया जाएगा। शनीचरी बाजार में नई पानी टंकी निर्माण होने से आपापुरा वार्ड, चंडी मंदिर वार्ड, शिवपारा वार्ड, और गंजपारा वार्ड 36 के निवासियों के साथ महापौर श्री बाकलीवाल के ब्राम्हण पारा वार्ड के निवासियों को लाभ मिलेगा। उन्होनें बताया अमृत मिशन अंतर्गत शनीचरी बाजार में निर्माण होने वाले पानी टंकी से लगभग 15 किमी. की पाइप लाईन में पेयजल प्रदाय कियाजा सकेगा। जिसमें लगभग 07 हजार नल कनेक्शन प्रदान किया जावेगा। जिससे लगभग 24 हजार लोगों को शुद्ध पेयजल प्राप्त होगा ।

मुंगेली / शौर्यपथ / रामकृष्ण सांस्कृतिक व शिक्षण समिति द्वारा संचालित विवेकानंद विद्यापीठ हाईस्कूल,मुंगेली का हाईस्कूल परीक्षा परिणाम 2020 शत प्रतिशत रहा।विद्यालय से माध्यमिक शिक्षा मंडल छत्तीसगढ़ द्वारा आयोजित हाईस्कूल परीक्षा 2019-20 में कुल 41विद्यार्थियों ने परीक्षा दी जिनमें से सभी उत्तीर्ण हुए।कुल 41 विद्यार्थियों में से 36 प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए जबकि 5 द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण हुए।प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण 36 विद्यार्थियों में से 14 विद्यार्थियों ने 80 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त कर अपने परिवार के साथ विद्यालय को भी गौरवान्वित किया। छात्र आसीन दिवाकर 94.5% अंक प्राप्त कर शीर्ष पर रहे।काजल सोनकर 89%अंक प्राप्त कर दूसरे स्थान पर रहीं और शुभम वर्मा 88.3% अंको के साथ तीसरे स्थान पर रहे।इनके अलावा 80%से अधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी वेदिका देवांगन 87.6%,आर्यन दिवाकर 86%,मानस यादव 85.8%,आराधना वर्मा 84.6%,छाया शर्मा 84.5%,फुलेश्वरी देवांगन 82%,सुमन शर्मा 81.7%,भावना वेंताल 81.5% , देव आशीष वैष्णव 81.3%,निकिता पटेल 81% और खुशबू कुम्भकार 80.5% रहे। विद्यालय के प्राचार्य श्री पारथ लाल कुलमित्र द्वारा विद्यार्थियों की इस उपलब्धि पर उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए बधाइयां और शुभकामनाएं विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को फोन के माध्यम से दी गईं।इसके अलावा विद्यालय के अन्य शिक्षकों जितेश चंद्राकर,संजय पांडेय, महेश ध्रुव, अमन सोनकर और देवदत्त मिश्रा द्वारा भी विद्यार्थियों को बधाइयां और शुभकामनाएं दी गईं।साथ ही श्रीमती संतोषी कुलमित्र और स्वारथ कुलमित्र ने भी विद्यालय के 100% परिणाम पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उनके अच्छे भविष्य के लिए बधाइयां दीं।

किसान मूल्य आश्वासन अध्यादेश भाजपा के किसान विरोधी चरित्र की ऊपज
 
रायपुर / शौर्यपथ /  पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह द्वारा किसानों के लिए केंद्र के द्वारा लाये गए किसान मूल्य अध्यादेश को राज्य में लागू किये जाने की मांग का कांग्रेस ने विरोध किया है। प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि मोदी को खुश करने रमन किसान विरोधी अध्यादेश लागू करने की मांग कर रहे हैं। इस अध्यादेश को लागू करने की मांग की अकुलाहट से एक बार फिर से भाजपा और रमन सिंह का किसान विरोधी चेहरा सामने आया है। केंद्र सरकार द्वारा लाये अध्यादेश किसान मूल्य आश्वासन और खेत पर समझौता सेवाएं अध्यादेश मूलतः किसान विरोधी है। यह अध्यादेश बिचौलियों और मुनाफाखोरों को प्रोत्साहन देने वाला है।
     इस अध्यादेश से मंडी व्यवस्था नष्ट हो जाएगी। मंडी में किसानों को उनके उपज की न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने को सुनिश्चित करने का प्रावधान है। मंडी में पंजीकृत व्यापारी ही किसानों से उनकी उपज खरीद सकते है। नए अध्यादेश में कोई भी पेनकार्डधारी व्यक्ति किसान से खरीदी कर सकता है। इस  अध्यादेश के बाद किसान को उसके उपज की न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी के लिए कोई भी प्रावधान नही है, इस परिस्थिति में किसान शोषण का शिकार होंगे। यह किसानों को बाजार के जोखिम के अधीन सौपने की साजिश है।
     कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि इस अध्यादेश को लाकर मोदी सरकार किसानों के प्रति केंद्र सरकार के परम्परा गत कर्तव्य से भागने के प्रयास में है। आजादी के बाद से ही केंद्र सरकार किसानों को उनके ऊपज की सही कीमत दिलाने हर साल सभी प्रकार के जिंसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है और किसानों को यह मूल्य मिले यह भी सुनिश्चित किया जाता है राज्य सरकारों के माध्यम से समर्थन मूल्य पर कृषि उत्पादों की खरीदी की प्रक्रिया इसीलिए अपनाई जाती है यह काम राज्य और केंद्र सरकारे मुनाफा कमाने नही बल्कि किसानों की मदद के उद्देश्य से करती रही है। इस अध्यादेश के माध्यम से समर्थन मूल्य पर खरीदी प्रक्रिया भी बंद होने का खतरा है।
  कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य जो अपने राज्य के किसानों को समर्थन मूल्य से डेढ़ गुनी कीमत पर धान खरीदते है उनके लिए तो बड़ी परेशानी खड़ी होने वाली है। यहाँ किसान 2500 कीमत छोड़ कर बाहर अपना धान बेचने जाएगा नही लेकिन पड़ोसी राज्य के धान व्यापारी जरूर इस कानून की आड़ में छत्तीसगढ़ अपना धान बेचने आने को स्वतंत्र होंगे। यह राज्य की व्यवस्था बिगाड़ने वाला कानून साबित होगा।
कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि इस अध्यादेश के साथ ही लाया गया दूसरा अध्यादेश तो छोटे मंझोले किसानों को बर्बाद कर बड़े कारपेट सेक्टर को खेत ठेके में सौपने का षड्यंत्र है। नए कानून में कम्पनिया किसानों से उनके खेत ठेके पर लेकर खेती कर सकेंगी। किसानों से ठेके पर खेत लेने वाली कम्पनिया किसानों को बराबर का पार्टनर रखेगी तथा उनको मुनाफे का बराबर हिस्सा देगी इस भागीदारी पर अध्यादेश मौन है। इस कानून के माध्यम से किसानों को उनकी ही जमीनों पर मजदूर बनाने की तैयारी की जा रही है। भाजपा और मोदी ने वायदा तो 2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने का किया था लेकिन हकीकत में किसानों को उनके खेती किसानी से बेदखल करने के लिए कानून बना रहे है।

राजनांदगांव / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ स्टेट पाॅवर डिस्ट्रीब्यूषन कंपनी द्वारा उपभोक्ताओं की सेवा सुविधा में लगातार वृद्धि की जा रही है। विद्युत विषयक कार्यों के त्वरित निपटारा हेतु प्रदेष में पहली बार अनेक विविध सुविधायें आरंभ की गई है। जिसमें ‘‘मोर बिजली ऐप’’की निःषुल्क सुविधा, चैबीस घण्टे षिकायतों को दर्ज करने केन्द्रीकृत काॅल सेंटर, विद्युत देयकों के सहज भुगतान हेतु  आॅन लाईन पेमेंट, एटीपी मषीन, सहित बड़ी संख्या में काॅमन सर्विस सेंटर को जोड़ा गया है। 
राजनांदगांव जिले में 1433 काॅमन सर्विस सेंटर (सी.एस.सी.) कार्यरत हैं जिनके माध्यम से दूरस्थ ग्रामीण अंचलों के निम्नदाब विद्युत उपभोक्ता देयकों का भुगतान कर सकते हैं। सार्वजानिक सुविधा केन्द्र के माध्यम से विद्युत देयकों का संग्रहण उपभोक्ताओं सहित कंपनी के लिये भी फायदेमंद है। इसे दृष्टिगत रखते हुये पाॅवर कंपनी के मुख्य अभियंता (राजस्व) श्री मधुकर जामुलकर द्वारा समस्त मैदानी अधिकारियों को पत्र प्रेषित कर काॅमन सर्विस सेंटर के अधिकाधिक उपयोग पर जोर दिया गया है। इन सेंटरों के माध्यम से विद्युत देयकों का भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं को सी.एस.सी. एजेंट द्वारा ‘‘सिस्टम द्वारा बनाई गई रिसिप्ट’’ प्रदान की जाती है। मैनुअल अथवा हाथ से लिखी गई विद्युत देयक भुगतान की रिसिप्ट उपभोक्ताओं को स्वीकार नहीं करने की समझाईष दी गई है। राजनांदगांव जिले में संचालित काॅमन सर्विस सेंटर राजनांदगंाव, खैरागढ़, डोंगरगढ़ एवं डोेंगरगांव संभाग के अन्तर्गत सभी ब्लाक एवं ग्राम पंचायत पर 1610 (व्हीएलई) विलेज लेवल एंटरप्रेन्योर कार्यरत हैं। इस तरह कबीरधाम जिले में संचालित काॅमन सर्विस सेंटर कवर्धा एवं पंडरिया संभाग के अन्तर्गत सभी ब्लाक एवं ग्राम पंचायत पर 650 (व्हीएलई) विलेज लेवल एंटरप्रेन्योर कार्यरत हैं।

दुर्ग / शौर्यपथ / प्रदेश नेतृत्व के आह्वान पर दुर्ग जिले में विधानसभा स्तरीय वर्चुअल रैलीया आयोजित की गई जिसमें जिले के अंतर्गत आने वाले दुर्ग शहर विधानसभा, दुर्ग ग्रामीण विधानसभा, पाटन विधानसभा का वर्चुअल रैली का आयोजन किया गया जिसमें भारतीय जनता पार्टी की दुर्ग शहर स्तरीय विधानसभा वर्चुअल रैली का आयोजन दुर्ग जिला भाजपा कार्यालय में किया गया आयोजित रैली में दुर्ग शहर विधानसभा के प्रदेश जिला एवं मंडल स्तर के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म के माध्यम से जुड़े आयोजित कार्यक्रम में प्रमुख रूप से दुर्ग जिला भाजपा अध्यक्ष उषा टावरी ,मुख्य वक्ता एवं पूर्व महापौर चंद्रिका चंद्राकर, जिला महामंत्री डोमार सिंह वर्मा, दुर्ग जिला सह प्रभारी कांतिलाल बोथरा, वरिष्ठ भाजपा नेता शिव चंद्राकर, मंडल अध्यक्ष लुकेश बघेल, चंद्रशेखर चंद्राकर , दीपक चोपड़ा, जिला भाजयुमो अध्यक्ष दिनेश देवांगन, किसान मोर्चा जिला अध्यक्ष रत्नेश चंद्राकर, शहर विधानसभा प्रभारी राकेश साहू, नेता प्रतिपक्ष अजय वर्मा उपस्थित रहे* *आयोजित वर्चुअल रैली में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के दूसरे कार्यकाल के सफलतम 1 वर्ष पूर्ण होने पर सरकार की उपलब्धियों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया सरकार की कार्यकाल के विफलताओं का क्रमबद्ध गिनाया गया*
*वैश्विक महामारी कोरोना के दौर में भारतीय जनता पार्टी के द्वारा आम सभा एवं रैलियों को नए स्वरूप प्रदान करते हुए सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म के माध्यम से कर रही है .रैलियां राष्ट्रीय स्तर , प्रदेश स्तर लोकसभा स्तर, जिला स्तर से लेकर विधानसभा स्तर तक आयोजित की जा रही है इसी कड़ी में दुर्ग शहर विधानसभा की वर्चुअल रैली का आयोजन किया गया आयोजित रैली में दुर्ग शहर विधानसभा की मुख्य वक्ता चंद्रिका चंद्राकर ने विधानसभा के भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता एवं आम जनमानस को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने देश की जनता के तमाम कसौटी पर खरे उतरे ना सिर्फ ट्रिपल तलाक कश्मीर से अनुच्छेद 370, बरसों से बहुप्रतीक्षित देश की सबसे बड़ी मांग राम मंदिर के मुद्दे पर फैसला करवाया तथा मंदिर बनवाने का मार्ग प्रशस्त कराया,उनकी कुशल नेतृत्व की क्षमता के बदौलत आज में विश्व के शीर्ष नेताओं में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं उनके कुशल नेतृत्व में हमारा देश आज कोरोनावायरस से बेहतर ढंग से लड़ रहा है पूर्व महापौर चंद्रिका चंद्राकर ने प्रदेश सरकार की विफलता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हर मोर्चे पर प्रदेश सरकार विफल होती नजर आ रही है चाहे मैं बात करूं किसानों से धान खरीदी की, या शराबबंदी की, महिला स्व सहायता समूह का कर्ज माफी की या तो कहूं बेरोजगारी भत्ते की और इस वैश्विक महामारी कोरोना के दौर में प्रदेश सरकार की अकुशल प्रबंधन के चलते हमारे पूरे देश में क्वार्टाइन सेंटर में मौतों का आंकड़ा सबसे ज्यादा है उन्होंने शहर विधानसभा के समस्त कार्यकर्ताओं से अपील की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की पत्रक घर-घर जाकर बांटे*

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