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मनोरंजन / शौर्यपथ / कोरोना वायरस के कारण देशभर में लॉकडाउन किया गया था। लेकिन अब अनलॉक चरण-1 शुरू हो गया है। जिसके बाद महिनों से बंद पड़ी टीवी और फिल्मों की शूटिंग सरकार द्वारा दिए गए उचित दिशानिर्देशों और सुरक्षा उपायों के साथ फिर से शुरू हो रही है।
बीते दिनों टीवी का सबसे लोकप्रिय कॉमेडी शो तारक मेहता का उल्टा चश्मा' का काम शुरू होने की खबरें आई थीं लेकिन अभी तक ये नहीं पता चला है कि इसकी शूटिंग कबसे होगी। हाल ही में शो में जेठालाल का किरदार निभाने वाले एक्टर दिलीप जोशी ने भी शो को लेकर कई बातें शेयर की हैं।
दिलीप जोशी ने कहा की वह गोकुलधाम सोसायटी को मिस कर रहे हैं। एक इंटरव्यू के दौरान दिलीप जोशी ने कहा, कोरोना वायरस महामारी के चलते लॉकडाउन के बीच सभी शूटिंग पिछले तीन महीनों से रुकी हुई है। ऐसे में न केवल मैं प्रशंसकों से दूर रहने हो गया था, बल्कि मैंने अपने गोकुलधाम परिवार को भी बहुत याद किया है।
अभी शूटिंग फिर से शुरू करने की एक निश्चित तारीख की घोषणा की जानी बाकी है। इस बारे में प्रोड्यूसर असित मोदी ने कंफर्म किया है कि जल्द ही फिर से टीम शो के लिए शूटिंग शुरू करेगी। जो संगठनों द्वारा किए गए सुरक्षा उपायों और एहतियाती दिशानिर्देशों का पालन करने के बाद ही की जा सकती हैं। शूटिंग के लिए मैं काफी एक्साइटेड हूं।
दिलीप जोशी के अनुसार, प्रोड्यूसर असित मोदी सही निर्णय लेंगे जो शो, कलाकारों और क्रू के लिए सबसे अच्छा है। मुझे उन पर पूरा भरोसा है कि वह टीम की अच्छी तरह से देखभाल करेंगे।
सेहत / शौर्यपथ / लहसुन अपने स्वाद, एंटी बायोटिक तत्वों और सेहत लाभ के लिए जाना जाता है, इसलिए आप इसे भोजन में या फिर कच्चा उपयोग करते हैं। लेकिन भुनी हुई लहसुन खाने के यह फायदे जानेंगे तो आप हैरान रह जाएंगे। जानें फायदे -
1 सुबह खालीपेट लहसुन को भूनकर खाने से कॉलेस्ट्रॉल कम होता है, और कॉलेस्ट्रॉल से जुड़ी सभी स्वास्थ्य समस्याओं जैसे हृदय की नलियों में कॉलेस्ट्रॉल का जमाव आदि के लिए यह बेहद फायदेमंद तरीका है।
2 वजन कम करना चाहते हैं तो भी यह फायदेमंद है, क्योंकि कॉलेस्ट्रॉल का स्तर कम होने के साथ-साथ आपका वजन घटने लगेगा और मोटापा गायब हो जाएगा।
3 सर्दी के दिनों में यह सर्दी, खांसी और जुकाम से बचाता है और शरीर में गर्माहट पैदा करने में मदद करता है। इतना ही नहीं यह रक्तप्रवाह को भी बेहतर बनाए रखता है।
4 प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ यह ब्लडप्रेशर नियंत्रित करता है और अपने एंटी इंफ्लेमटरी एवं एंटी फंगल गुणों के कारण शरीर की अंदरूनी सफाई कर कई बीमारियों से बचाए रखता है।
5 इसमें मौजूद भरपूर कार्बोहाइड्रेट शरीर की कमजोरी को दूर कर शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। यह ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में भी मददगार है और कब्ज से भी बचाता है।
सेहत / शौर्यपथ / शारीरिक स्वास्थ्य जितना अहम है, उतना ही मानसिक रूप से स्वस्थ रहना भी जरुरी है। अगर आप मानसिक रूप से स्वस्थ और सशक्त रहेंगे, तो कोई भी समस्या या तनाव आप पर हावी नहीं हो सकेगा।
यहां बताए जा रहे 5 हेल्दी फूड आपकी मानसिक सेहत के लिए बेहद फायदेमंद साबित होंगे- खास बात है कि से पांचों फूड आपको बहुत आसानी से अपने घर में ही मिल जाएंगे। जानते हैं कैसे बनाए अपने दिमाग को स्वस्थ।
1 दही - दही न केवल आपके पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है बल्कि मस्तिष्क की क्रियाविधि को भी प्रभावित करता है। डाइट में ज्यादा से ज्यादा दही का सेवन, आपकके तनाव और चिंता को कम करने में मदद करता है और अगर आपका स्वभाव चिड़चिड़ा हो चुका है, तो दही आपके मूड को बेहतर बनाने में भी मददगार है।
2 अंडा - अंडे में मौजूद कुछ पोषक तत्व आपकी मानसिक सेहत को बेहतर बनाने के साथ ही आपको सतर्क रखने में मदद करते हैं। फोलिक एसिड, बायोटीन, कोलाइन आदि आपके म स्तिष्क की कोशिकाओं के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
3 हरी सब्जियां - हरी सब्जियों को दिन में एक बार अपनी डाइट में शामिल करना डिमेंशिया को कोसों दूर रखता है। जो लोग ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जियों को अपनी डाइट में शामिल करते हैं, उनका दिमाग लंबे समय तक सक्रिय रहता है, जो मानसिक सेहत के लिए अच्छा है।
4 सूखे मेवे - सूखे मेवे, ड्रायफूट्स या नट्स कह लो... सभी में मैंगनीज़, सेलेनियम और तांबा प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो मस्तिष्क की क्रियाओं को इंप्रूव करने और मानसिक कमजोरी को दूर करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
5 डार्क चॉकलेट - डार्क चॉकलेट में मौजूद कोकोआ के कारण इसे दिमाग के बेहतरीन रक्तसंचार के लिए लाभप्रद माना जाता है। इसके अलावा इसमें मौजूद फ्लेवेनॉयड दिमाग को युवा रखने के साथ ही रेडिकल डैमेज से भी बचाता है।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / जब भी स्कीन केयर की बात आती है तो गुलाब जल का नाम इसमें सबसे पहले शामिल किया जाता है क्योंकि गुलाब जल के इस्तेमाल से आप अपनी त्वचा को तरोताजा रख सकती है इसका इस्तेमाल फेसमास्क के साथ, टोनर के रूप में, स्कीन क्लीन करने के लिए किया जाता है जो हमारी त्वचा को बहुत फायदा पहुंचाता हैं
वहीं गुलाब जल घर में तैयार किया जाएं तो बात ही कुछ और है यदि आप भी चाहते है घर में गुलाब जल बनाना तो इस लेख में जान सकते हैं कि कैसे कुछ आसान प्रक्रिया से आप घर में गुलाब जल तैयार कर सकते है तो आइए जानते है गुलाब जल बनाने की आसान विधि
सबसे पहले फ्रेश गुलाब के फूल लें अब इन्हें सबसे पहले इनकी पंखुड़ियों को अलग-अलग कर लें।
अब एक बर्तन में दो कप साफ (पानी पीने का पानी) लीजिए और इसे अच्छी तरह गर्म कर लीजिए। साथ ही गुलाब की पंखुड़ियों को भी साफ पानी से धो लीजिए
अब गर्म पानी में साफ गुलाब की पंखुड़ियों को डाल कर अच्छी तरह से उबलने दें।
आप देखेंगे की गुलाब की पखुड़ीयां कुछ समय बाद सफेद रंग की हो जाएंगी और धीरे- धीरे अपना रंग छोड़ने लगेंगी।
अब इसे छान लीजिए और एक साफ बौतल में भरकर रख लें इसे आप फ्रिज में भी रख सकते हैं
तो लीजिए तैयार है घर में बना गुलाब जल इसका इस्तेमाल आप अपनी ब्यूटी केयर में कर सकती है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / सांदीपनि ऋषि विष्णु के कच्छप और मोहिनी अवतार की कथा के बाद वामन अवतार की कथा सुनाते हैं। पिछले एपिसोड में वामन अवतार के कथा की शुरुआत हुई थी।
फिर सांदीपनि ऋषि बताते हैं कि भगवान विष्णु वामनरूप में अवतार लेकर महाबली की यज्ञशाल के द्वार पर उस समय पहुंचे जब उसका सौवां यज्ञ आरंभ होने वाला था। एक सेवक आकर महाबली को बताता है यज्ञशाला के द्वार पर एक याचक आया है और वह आपसे मिलने की याचना कर रहा है। यह सुनकर शुक्राचार्य कहते हैं कि महाराज यज्ञ का संकल्प करने जा रहे हैं वो जो भी मंगता है, वहीं से देकर भेज दो। तब सेवक कहता है कि मैंने उसे मुंहमांगी भिक्षा लेने की बात कही थी परंतु वह महाराज के हाथों भिक्षा लेने की हठ कर रहा है।
यह सुनकर दानवीर राजा महाबली यज्ञशाल छोड़कर उन्हें दान देने के लिए उठते हैं तो शुक्राचार्य रोककर कहते हैं कि यज्ञ का मुहूर्त निकला जा रहा है। राजा कहते हैं कि जब तक मेरे राज्य में एक भी याचक है तो मैं यज्ञ कैसे कर सकता हूं? यह कहकर वह ब्राह्मण वेशधारी वामन के पास पहुंचकर उनसे कहते हैं कि कहो क्या चाहिए तुम्हें? तब वामन भगवान कहते हैं, राजन! आप भक्त प्रहलाद के पौत्र और महान आत्मा विरोचन के पुत्र हैं और आप स्वयं महान दानवीर हैं अत: यह ब्राह्मण आपसे अपनी यज्ञशाला के लिए तीन पग भूमि दान में मांगने आया है। यह सुनकर राजा महाबली हंसते हुए कहते हैं बस तीन पगभूमि? अरे मांगना हो तो एक राज्य मांग लो।
तभी वहां शुक्राचार्य आकर कहते हैं कि हे राजन! आपका अंतिम यज्ञ पूर्ण होने पर आप त्रिलोकी के राजा बन जाएंगे और यह जो ब्राह्ण है यह और कोई नहीं विष्णु है जो छल से आपके पास आए हैं। यह तीन पग में ही संपूर्ण लोक को नाप देंगे। राजा महाबली यह सुनकर कहते हैं कि हे महर्षि! मेरे द्वार पर चाहे कोई भी आए, मैं अपने पूर्वजों की परंपरा के अनुसार उसे खाली हाथ वापस नहीं जाने दे सकता। इससे मेरी और मेरे पूर्वजों की कीर्ती प्रतिष्ठा गिर जाएगी। यदि ये सचमुच में ही विष्णु है तो यह मेरा सौभाग्य है कि स्वयं भगवान मेरे द्वार पर याचक बनकर खड़े हैं। यह सुनकर शुक्राचार्य क्रोधित होकर कहते हैं राजन यदि तुम इन्हें दान दोगे तो मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम श्रीहिन हो जाओ। ऐसा कहकर शुक्राचार्य वहां से चले जाते हैं।
फिर महाबली कहते हैं, हे ब्रह्मण श्रेष्ठ! मैं आपको दान दूंगा। ऐसा कहकर महाबली हाथ में जल लेकर दान का संकल्प लेकर दान का श्लोक पढ़ते हैं और कहते हैं कि भक्त प्रहलाद का पौत्र और विरोचन का पुत्र आपको तीन पग भूमि दान में देता है।
दान का संकल्प लेने के बाद वामन रूपी प्रभु विष्णु अपने वामन रूप में ही विराट होने लगते हैं। यह देखकर राजा और उसके सभी सेवक अचंभित होकर हाथ जोड़ लेते हैं। आसमान से देवता भी भगवान के इस रूप को देखते हैं। विराट से विराट होकर वामन भगवान अपने दो पग में ही त्रिलोक को नापकर कहते हैं, हे दैत्य राज बली! तुमने मुझे तीन पग भूमि देने का वचन दिया था। दो पग में तो मैंने सारी त्रिलोकी नाप दी। इस प्रकार तुम्हारा सबकुछ मेरा हो चुका है। परंतु अभी तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई है क्योंकि अब तुम्हारे पास कुछ नहीं रहा। इसलिए तीसरा पग रखने के लिए तुम मुझे कोई स्थान नहीं दे सकते। तुम्हारा वचन झूठा हो गया।
आसमान में देखते हुए आश्चर्य चकित और अचंभित दैत्यराज महाबली कहते हैं, नहीं भगवन मैं अपने वचन को सत्य करके दिखाता हूं। आप अपना तीसरा पैर मेरे सिर पर रखिये। यह कहकर राजा अपना सिर झुका देते हैं। यह सुनकर भगवान प्रसन्न होकर अपना तीसरा पैर दैत्यराज बली के सिर पर रखकर हटा लेते हैं।
फिर भगवान विष्णु रूप में प्रकट हो जाते हैं। यह देखकर बली अति प्रसन्न होकर भगवान के हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है। फिर भगवान कहते हैं, महात्मा बली तुम सचमुच दृढ़ प्रतिज्ञ हो। हम तुमसे अति प्रसन्न हैं। गुरु के श्राप और हमारी माया से भी भयभीत नहीं हुए। सबकुछ खोकर भी तुमने अपना वचन पूरा किया है। अत: हम तुम्हें वो स्थान देते हैं जो बड़े-बड़े देवताओं के लिए भी प्राप्त करना कठिन है। सावर्णि मनवंतर में तुम्हें मेरे परम भक्त इंद्र का पद प्राप्त होगा। तब तक तुम सुतल लोक में अपने दादा महाराज प्रहलाद के साथ आनंदपूर्वक निवास करोगे। तुम मुझे वहां सदा सर्वदा पास ही देखोगे। यह सुनकर बली अति प्रसन्न हो जाता है और तब भगवान वहां से अदृश्य हो जाते हैं।
सांदीपनि ऋषि से यह कथा सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि गुरुदेव भगवान तो सर्वशक्तिमान हैं। वे चाहे तो अपने संकल्प मात्र से ही दुष्टों का नाश कर सकते हैं। फिर उन्हें इस प्रकार धरती पर स्वयं आने की क्या आवश्यकता है? यह सुनकर ऋषि कहते हैं तुमने सत्य ही कहा, इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि उनकी लीलाओं को देखकर संसार के समस्त प्राणियों में यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि उसका कोई रखवाला है जो उसे हर संकट से बचा सकता है। यह विश्वास ही उसे धर्म पर दृढ़ रहने के लिए प्रेरणा देता हैं।
फिर ऋषि सांदीपनि कहते हैं कि अब तक मैंने तुम्हें भगवान के जिन अवतारों की कथा सुनाई है वे प्राय: आवेशावतार थे जो 10 और 11 कलाओं से सुशोभित थे। आज मैं तुम्हें भगवान के रामावतार की कथा सुनाऊंगा जो 12 कलाओं से सुशोभित थे। इस अवतार की विशेषता ये है कि भगवान ने अपने आदर्श रूप को स्थापित किया। जिस समय श्रीराम का अवतार हुआ उसी काल में श्री परशुरामजी भी इस धरती पर उपस्थित थे। दो अवतारों का एक साथ धरती पर होना भी उस काल की विशेषता थी। परंतु पुराणों के अनुसार जब श्री परशुरामजी का श्रीराम से सामना हुआ तो परशुरामजी का अवतार काल समाप्त हो गया। एक प्रकार से श्री परशुरामजी को भी आवेशावतार ही कहा जा सकता है।
फिर सांदीपनि ऋषि सीता के स्वयंवर में परशुरामजी के आगमन और उनके द्वारा श्रीराम को विष्णु का धनुष देने की घटना को सुनाते हैं और बताते हैं कि परशुरामजी को श्रीराम में विष्णु के दर्शन हुए तो वे समझ गए कि मेरा अवतार काल समाप्त हुआ और वे उसी क्षण तपस्या के लिए चले गए। फिर सांदीपनि ऋषि भगवान श्रीराम के जन्म, बचपन और उनके गुरुकुल जाने तक की कथा सुनाते हैं। जय श्रीकृष्ण।
नजरिया /शौर्यपथ /चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की टुकड़ियों के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हुई झड़पों में भारतीय सेना के एक कर्नल सहित 20 जवानों की मौत पर शोक व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोर दिया कि हमारे जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। हमारे लिए भारत की अखंडता और संप्रभुता सर्वोच्च है और इसकी रक्षा करने से हमें कोई रोक नहीं सकता। उन्होंने यह भी कहा कि ‘मतभेदों को विवाद नहीं बनने देना चाहिए’, लेकिन यही दिशा है, जिधर भारत-चीन संबंध अब बढ़ चले हैं। देश में रोष और पीड़ा की भावना के मद्देनजर यह विवाद आगे बढ़ सकता है।
सीमा पर संघर्ष में पीएलए के मारे गए सैनिकों की संख्या के बारे में खबरें अपुष्ट हैं। यह याद दिलाता है कि चीन अपने हताहत सैनिकों की कोई आधिकारिक संख्या जारी नहीं करता है। उदाहरण के लिए, भारत के साथ 1962 के युद्ध में चीनी हताहतों की संख्या भी पहले सामने नहीं आई थी। हताहतों की संख्या को पीएलए के आंतरिक सैन्य इतिहास के दस्तावेजों में 1990 के दशक के मध्य में ही साझा किया गया। यह ध्यान रखना अहम है कि भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र के पारदर्शी दृष्टिकोण और चीन जैसे सत्तावादी शासन की अलहदा दृष्टि के बीच एक स्पष्ट अंतर है। गलवान में पीएलए ने जिन बर्बर तरीकों को अपनाया है, उसके कई कारण बताए जा रहे हैं। पीएलए द्वारा पूर्वी लद्दाख में घुसपैठ और सीमा बढ़ाने के कारणों की गहराई में जाना होगा, शायद उसी तरीके से, जैसे कारगिल समीक्षा समिति बनाई गई थी और ऐसा करते हुए नीतिगत कमियों को दूर करना होगा। फिलहाल हमारा ध्यान ‘क्यों’ पर नहीं, ‘आगे क्या’ पर होना चाहिए।
भारत को अपने विकल्पों को सामने रख सावधानी से सोचना होगा और दृढ़ रहना होगा। एक कर्नल का नुकसान किसी भी सेना के लिए बड़ा झटका होता है और भारतीय सेना जैसा उचित समझेगी, जवाब देगी। नाथू ला और चो ला की 1967 की लड़ाई में भारत ने 100 जानें गंवाईं, लेकिन अक्तूबर 1962 के अपमान के दाग को मिटा दिया था, वह जवाब पीएलए की सामूहिक यादों का हिस्सा होगा। हां, भारत के विकल्प सैन्य क्षेत्र से आगे निकल जाएंगे, और यह वास्तव में उन उद्देश्यों से तय होगा, जो नई दिल्ली खुद के लिए तात्कालिक और दीर्घकालिक, दोनों तौर पर तय करेगी। चीन को पूर्वी लद्दाख से वापस पहले की स्थिति में भेजना प्राथमिकता व उद्देश्य होगा, लेकिन जैसा कि जाहिर है, इस उद्देश्य को हासिल करना ही भारत के लिए चुनौती है। चीन अभी गलवान घाटी और अन्य क्षेत्रों में अधिक लाभदायक स्थिति में है, जहां वह आगे बढ़ा है या जहां कब्जा कर चुका है। जहां तक चल रही वार्ता का संबंध है, भारत के लिए यह स्थिति बहुत अनुकूल नहीं है।
क्षेत्र संबंधी विवाद को जान-बूझकर आगे बढ़ाने की कला में चीन माहिर है। वह भलमनसाहत में पीछे हटता दिखते हुए भी अंतत: यह सुनिश्चित करता है कि उस भूभाग पर उसका कब्जा सच्चाई में बदल जाए। डोका ला के मामले में भी यही दिखा था। क्षेत्रीय और सामरिक भूगोल के प्रति चीन की अंतर्निहित योजना के बारे में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। पर भारत ने रणनीतिक भूगोल या सैन्य इतिहास से सीखने को लेकर कोई संकल्प या कौशल नहीं दर्शाया है। लोकतांत्रिक उद्देश्य असंतोष और बहस से पनपते हैं, पर संकट के समय हमें राष्ट्रीय सर्वसम्मति से काम लेना चाहिए। चीन से मिली चुनौती एक अपील भी है कि सियासी दल परस्पर जूझना बंद कर दें। इस दिशा में आयोजित सर्वदलीय बैठक उत्साहजनक है। पिछले 60 वर्षों के इतिहास से संकेत मिलता है कि भारत के भीतर राजनीतिक व वैचारिक विभाजन का फायदा उठाने में चीन सक्षम रहा है, ताकि वह अशांत द्विपक्षीय संबंधों की कहानी अपने हिसाब से लिख सके।
ध्यान रहे, चीन 21वीं सदी के आर्थिक व तकनीकी तंत्र का हिस्सा रहेगा और भारत के विकल्प भी इससे अलग नहीं होंगे। चाहे महामारी दुनिया को दो-धु्रवीय बना दे या लोकतांत्रिक देशों का एक विवादित समूह बन जाए, इससे भारत का रुख तय होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए गलवान की चुनौती पंडित नेहरू और 1962 के आघात के समान हो सकती है या 1982 के मार्गरेट थैचर व फॉकलैंड विजय के समान। अगले कुछ महीने भारत व एशिया के लिए अहम होंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) सी उदय भास्कर, निदेशक, सोसाइटी ऑफ पॉलिसी स्टडीज
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की दस साल बाद वापसी जितनी सुखद है, उससे कहीं अधिक जरूरी है। ऐसे समय में भारत का निर्विरोध चुना जाना भी महत्व रखता है। बुधवार को हुए चुनाव में 193 सदस्यीय महासभा में भारत ने 184 मत प्राप्त किए और सबसे बड़ी बात यह कि एशिया प्रशांत क्षेत्र से भारत की दावेदारी पर पिछले साल जून में ही मुहर लग गई थी। तात्कालिक रूप से हमें आश्चर्यजनक जरूर लगेगा, पर तब भारत की इस दावेदारी का चीन और पाकिस्तान ने भी समर्थन किया था। हमारे प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गैर-स्थाई सदस्य के रूप में भारत के चुने जाने पर उचित ही गहरी कृतज्ञता व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रहते हुए भारत वैश्विक शांति, सुरक्षा और समानता को बढ़ावा देने के लिए सभी सदस्य देशों के साथ मिलकर काम करेगा और यही समय की मांग है।
भारत को सुरक्षा परिषद में तत्काल कोई जगह नहीं मिलेगी और एक जनवरी अर्थात अगले साल ही वह नए रूप में अपनी सक्रियता बढ़ाएगा। बड़ा सवाल यह है कि इस सदस्यता के मायने क्या हैं और भारत इससे किस हद तक लाभ उठा सकता है? भारत पहले भी सात बार सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्य रह चुका है। गौर करने की बात है कि सुरक्षा परिषद में उसकी सबसे मजबूत स्थिति 1970 के दशक में थी, जब भारत की नीतियां ज्यादा स्पष्ट और मुखर थीं। बांग्लादेश के गठन से लेकर संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न अभियानों में भारत की भूमिका को देखते हुए ही उस दशक में हमें दो बार (1972-73 और 1977-78) सुरक्षा परिषद में यह सदस्यता नसीब हुई थी। इस लिहाज से देखें, तो 1993 से 2010 तक एक लंबा दौर रहा, जब हम सुरक्षा परिषद में नहीं थे और हमारी नीतियां तेजी से उदार हो रही थीं। संभव है, इस लंबे अंतराल में भी सुरक्षा परिषद में अगर हमारी भूमिका बड़ी होती, तो हम आज बेहतर स्थिति में होते। अब फिर मौका हमारे हाथ लगा है, तो इसे अधिकतम सीमा तक इस्तेमाल करना हमारी जिम्मेदारी है। ध्यान रहे, पिछले दिनों डब्ल्यूएचओ के कार्यकारी बोर्ड की अध्यक्षता भी भारत को मिली है। इस गाढ़े समय में ये बडे़ मौके हैं, जिनका पूरा फायदा हम उठा सकते हैं।
हमें ध्यान रखना होगा कि राजनय की दुनिया में हमारी आधिकारिक सक्रियता बढ़ना सबसे जरूरी है। राजनय में सक्रियता के बिना हम अपनी पूरी ताकत, क्षमता, योग्यता, कौशल और विशालता का लाभ नहीं ले पाएंगे। चीन जिस तरह से हमें सॉफ्ट टारगेट समझ रहा है, उसकी गलतफहमी सिर्फ भारत की सक्रियता से ही दूर हो सकती है। अभी सभी देश खामोश हैं, क्योंकि हमें हस्तक्षेप या मध्यस्थता मंजूर नहीं है। लेकिन जब भारत आगे आकर सक्रिय होगा, तो उसे मित्र, शत्रु और तटस्थ देशों का अंदाजा होगा। राजनय के मोर्चे पर अभी चीन हमसे असमान रूप से आगे है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में उसे वीटो पावर हासिल है। वह अपने खिलाफ होने वाली किसी भी कोशिश का पीछा कर सकता है। अत: भारत को विश्व स्तर पर किसी भी मंच पर शिथिलता से काम नहीं लेना चाहिए। एक-एक देश महत्वपूर्ण है। चीन के करीबी देशों को भी जमीनी हकीकत बताने में कोई हर्ज नहीं है। साथ ही, अपने अन्य निकटतम पड़ोसियों के साथ भी हमें तालमेल बढ़ाने की जरूरत है, तभी हम अपने विकास के लिए जरूरी सुकून जुटा पाएंगे।
मेलबॉक्स /शौर्यपथ / कोविड-19 महामारी के कारण शिक्षा और स्वास्थ्य के बीच संघर्ष जारी है। असल में, अगले महीने सीबीएसई 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं आयोजित करना चाह रहा है। मेडिकल और इंजीनिर्यंरग की कई प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन भी अगले माह होना है। मगर कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए कई अभिभावकों ने इन परीक्षाओं के आयोजन को लेकर चिंता जताई है, जो वाजिब भी है। इन परीक्षाओं में लाखों परीक्षार्थी शामिल होते हैं। ऐसे में, इनका आयोजन बच्चों व किशोरों के स्वास्थ्य के मद्देनजर होना चाहिए। किसी भी प्रकार की हड़बड़ी या लापरवाही लाखों प्रतियोगियों की सेहत को खतरे में डाल सकती है। लिहाजा स्वास्थ्य और शिक्षा के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है।
सत्यम कुमार, नालंदा, बिहार
तेल के बढ़ते दाम
कोरोना संकट और चीन-सीमा विवाद के बीच पेट्रोल-डीजल के दाम लगभग पांच रुपये प्रति लीटर बढ़ चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कम हुई कीमतों का कोई लाभ शायद ही भारतीयों को मिल पाया। कारण स्पष्ट है कि जन-हितकारी सरकार आम आदमी को होने वाले लाभ को अपनी कमाई में जोड़कर अपना गणित सुधारने में जुटी रही। आम आदमी के बिगड़े हुए गणित से जैसे उसे कोई सरोकार न हो। पेट्रोलियम पदार्थों पर मनमानी नीतियां लागू करके सरकार जनमानस को क्या संदेश देना चाहती है, यह तो वही जाने, पर आम आदमी के लिए ऐसी नीतियां कष्टकारी सिद्ध हो रही हैं, जिसका एहसास सरकार को होना ही चाहिए।
सुधाकर आशावादी, ब्रह्मपुरी, मेरठ
विश्वासघाती चीन
वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हमारे सैनिकों पर अचानक हमला करके चीन ने अक्षम्य अपराध किया है। इस विश्वासघाती हमले के बाद भारत और चीन के बीच रहा-सहा विश्वास भी दरक गया है। अब चीन को कड़ा सबक सिखाना ही चाहिए। इसके लिए सैन्य, कूटनीतिक, राजनीतिक उपायों के साथ-साथ जबर्दस्त आर्थिक नाकेबंदी भी हमें करनी होगी, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था को चोट लगे। वहां से होने वाले आयात में हरसंभव कटौती का प्रयास केंद्र सरकार को करना चाहिए। ऐसी खबरें आई हैं कि हमारे यहां कई प्रोजेक्ट में चीन की कंपनियों को ठेके दिए गए हैं। उन ठेकों को रद्द करते हुए नए टेंडर जारी किए जाने चाहिए और उसमें चीनी कंपनियों के शामिल होने पर रोक लगा देनी चाहिए। हमारे देश में ही करोड़ों प्रशिक्षित लोग बेरोजगार हैं। हम उनके श्रम का सही इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर हम ‘मेक इन इंडिया’ को बुलंद कर सके, तो आत्मनिर्भर आसानी से बन सकेंगे। चीन की हर तरह से आर्थिक कमर तोड़ने के अलावा भारत के पास कोई अन्य विकल्प नहीं है।
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद
योग शिक्षकों की अनदेखी
यह सच है कि सरकार ने योग को देश की प्राचीन पद्धति के रूप में अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। आज हम सभी स्वस्थ जीवन जीने के लिए योग-क्रिया करते हैं। यह बात भी साबित हो चुकी है कि नियमित योग करने से स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन जीने में काफी मदद मिलती है। परंतु यह भी एक दुखद सत्य है कि सरकार योग शिक्षकों को लगातार उपेक्षित कर रही है। नियमित योग शिक्षकों को बहाल करने की बजाय अनुबंध पर कुछ स्कूलों में शिक्षकों को बहाल करके उनके भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। राज्य सरकार योग दिवस पर आयोजन करके अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रही है। शारीरिक शिक्षा अनुदेशकों की बहाली निश्चय ही अच्छी बात है, लेकिन जिन विद्यार्थियों ने योग में पीजी डिप्लोमा और एमए किया है, उनके बारे में केंद्र या राज्य सरकारों का न सोचना काफी दुखद है। स्थाई रोजगार से ही हम विद्यार्थियों में विश्वास पैदा होगा, तभी स्वस्थ तन और मन का भी विकास हो सकेगा।
रीना कुमारी, पटना, बिहार
ओपिनियन / शौर्यपथ / गलवान घाटी की दुखद घटना के बाद अब देश में कई हिस्सों से चीनी उत्पादों के बहिष्कार की मांग उठने लगी है। ‘बायकॉट चीन’ की मजबूत होती जनभावना के बीच केंद्र सरकार ने भी बीएसएनएल और एमटीएनएल जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनियों से कहा है कि वे 4जी के लिए चीन की कंपनियों को टेंडर जारी न करें। मगर जिस तरह से नई दिल्ली और बीजिंग के बीच कारोबारी रिश्ते मजबूत हैं, क्या चीन को किनारे करना संभव है? वह भी तब, जब वैश्विक दुनिया में हर देश के हित दूसरे राष्ट्र से जुड़े हुए हैं?
चीन के साथ हमारा कारोबार कई रूपों में होता है। हम उससे पतंग का मांझा, चीनी मिट्टी की मूर्तियां, गुलाल, पिचकारी, दीपावली की झालरें जैसी गैर-जरूरी चीजें भी मंगवाते हैं, और मोबाइल फोन, इंजीनिर्यंरग व इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के जरूरी कल-पूर्जे भी। गैर-जरूरी उत्पादों के विकल्प हमारे पास मौजूद हैं, लेकिन जरूरी वस्तुओं का आयात तब तक नहीं रोका जा सकता, जब तक उसे हासिल करने का दूसरा रास्ता हमारे पास न हो।
इसके अलावा, चीन पर हमारी व्यापारिक निर्भरता बहुत ज्यादा है। दोनों देशों के बीच पिछले साल लगभग 92 अरब डॉलर का आपसी कारोबार हुआ है, जिसमें हमने चीन से आयात ज्यादा किया और निर्यात कम। सरकार के स्तर पर ‘बायकॉट चीन’ इसलिए भी संभव नहीं है, क्योंकि दोनों देश विश्व व्यापार संगठन के कायदे-कानूनों से बंधे हैं। इसलिए अधिकृत रूप से हम टैरिफ, यानी सीमा शुल्क नहीं लगा सकते। मगर हां, नॉन-टैरिफ बैरियर का लाभ जरूर उठाया जा सकता है। इसका अर्थ है कि सरकार प्रत्यक्ष तौर पर कोई बंदिश नहीं लगाएगी, लेकिन वह परोक्ष रूप से आपसी कारोबार प्रभावित कर सकती है।
सवाल है कि यह होगा कैसे? यह तो तभी संभव है, जब लोगों में राष्ट्रवाद की भावना काफी मजबूत हो जाए। आज कोई भी देश खुलकर किसी दूसरे राष्ट्र की मुखालफत नहीं कर सकता, क्योंकि उनमें कई तरह के कूटनीतिक रिश्ते होते हैं। इसीलिए सरकारें टकराव को हरसंभव टालने के उपाय करती हैं। मगर परदे के पीछे से गैर-राजनीतिक संगठनों के माध्यम से राष्ट्रवाद का माहौल बनाकर वे एक-दूसरे को चोट पहुंचाती रही हैं।
वैसे भी, मौजूदा हालात में सैन्य टकराव न तो चीन के हित में है, और न ही भारत के हित में। कोरोना-संक्रमण ने हर राष्ट्र को गंभीर आर्थिक मुश्किलों में झोंक दिया है। ऐसे में, नॉन-टैरिफ बैरियर ही हमारे लिए सही रास्ता है। गैर-जरूरी उत्पादों के बहिष्कार से चीन को चार-पांच बिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान नहीं होगा, लेकिन इसका संदेश दूर तक अवश्य जाएगा। उसे एहसास होगा कि यदि वह सीमा पर आक्रामक रुख अपनाता है, तो उसे आर्थिक तौर पर इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। उससे भारत जैसा बड़ा बाजार छिन सकता है।
अभी चीन की आर्थिक सेहत भी बहुत अच्छी नहीं है। उसने कोरोना के पहले चरण को भले ही संभाल लिया, लेकिन अब वहां संक्रमण के नए मामले तेजी से पसरने लगे हैं। कोविड-19 के बारे में सही जानकारी छिपाने को लेकर पश्चिमी देश भी उस पर हमलावर हैं। ऐसे में, वह शायद ही कोई नया तनाव बढ़ाना पसंद करेगा। हमारे लिए एक अच्छी बात यह भी है कि दुनिया के तमाम देश अब समझने लगे हैं कि किसी एक मुल्क पर निर्भरता ठीक नहीं है। इसी निर्भरता की वजह से चीन वैश्विक सप्लाई का केंद्र बन गया था। मगर कोरोना-काल में चीन की हालत बिगड़ते ही पूरी दुनिया भी प्रभावित हो गई। अब सभी देश स्थानीय आपूर्ति शृंखला पर अधिकाधिक ध्यान देने लगे हैं। चीन को इसका भी नुकसान होगा। उसके हाथों से अब कई बाजार निकलेंगे। अमेरिका, जापान जैसे कई देशों ने अपनी कंपनियों को वापस अपने देश में बुलाना शुरू भी कर दिया है। इससे आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पडे़गा।
जब से हमने विश्व व्यापार संगठन के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, यह एक धारणा बन गई थी कि जितना अधिक कारोबार हम करेंगे, उतनी ही अधिक खुशहाली आएगी। मगर असलियत में यह विकास तब होता है, जब व्यापार दो समान धरातल वाले देशों के बीच हो। भारत और चीन के कारोबारी रिश्ते का भी यही सच है। चीन कई मामलों में हमसे विकसित है। इसकी बड़ी वजह यही है कि उसने तकनीक और प्रौद्योगिकी की तरफ खासा ध्यान दिया। भूमंडलीकृत दुनिया में तकनीक और प्रौद्योगिकी संपन्न देश ही आगे बढ़ते हैं। हम इस मामले में पिछड़ गए, क्योंकि कहीं न कहीं हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर रही। कोठारी आयोग ने अरसे पहले सार्वजनिक शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का छह प्रतिशत खर्च करने की सिफारिश की थी, लेकिन आज तक हम ऐसा नहीं कर पाए हैं। आज भी बमुश्किल चार प्रतिशत ही सार्वजनिक शिक्षा पर खर्च होता है। यही हाल स्वास्थ्य और अनुसंधान व विकास (आरऐंडडी) का भी है। बेशक अपने यहां बड़ी संख्या में इंजीनियर और डॉक्टर डिग्री पाते हैं, लेकिन विश्व पटल पर जरूरी योग्यता का अभाव उनमें देखा जाता है।
जाहिर है, दीर्घकालिक योजना बनाए बिना हम चीन का मुकाबला नहीं कर सकते। मगर तात्कालिक नुकसान उसे तभी पहुंचाया जा सकता है, जब आम जनता में इसके लिए एकजुटता दिखे। हालांकि, इसमें भी एक बड़ी दिक्कत यह है कि सरकार की नीतियों में सभी लोगों का विश्वास नहीं है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि राजनेता खुद अपनी नीतियों के प्रति ईमानदार नहीं दिखते। अगर वाकई हम चीन का आर्थिक मुकाबला करना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमारी सरकारों को संवेदनशील होना होगा। उनको आम जनता के दुख-दर्द में शामिल होना होगा। क्या हमारे हुक्मरान इसके लिए तैयार हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं) अरुण कुमार,अर्थशास्त्री
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
