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June 01, 2026
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जांजगीर-चांपा / शौर्यपथ / जांजगीर-चांपा जिले के विकासखंड सक्ती के ग्राम पतेरापाली निवारी श्री डोलप्रसाद को उनके द्वारा वर्षो से काबिज वन भूमि का मालिकाना हक मिल गया। अब वह पूरे परिवार के साथ बेफिक्र होकर खेती बाड़ी कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। भूमि से बेदखली का डर खत्म हो गया है। राज्य सरकार ने वनवासियों को उनका हक दिला दिया। सरकार की योजना के तहत जीवन यापन के लिए वन भूमि पर वर्षों से काबिज क्षेत्र का वन अधिकार पट्टा वनवासियों को दिया जा रहा है। वर्षों से काबिज 0.182 हेक्टेयर भूमि का अब मालिकाना हक मिलने से डोलप्रसाद के परिवार में खुशी का माहौल है।
श्री डोलप्रसाद ने बताया कि विगत 30 वर्ष से जिस भूमि पर खेती बाड़ी व मकान बनाकर कर रह रहे थे। राज्य सरकार ने उस भूमि का मालिक बना दिया है। जिस जंगल को हमने खेती, बाड़ी और रहने लायक बनाया उस पर हम वनवासियों का हक है। सरकार ने हमारा हक दिला दिया। श्री डोलप्रसाद ने राज्य सरकार को धन्यवाद देते हुए कहा कि जमीन का पट्टा मिलने से समाज में उनका सम्मान बढ़ा है। अब जमीन से बेदखली का डर नहीं है। भूमिहीन किसानों की गिनती में भी नही हैं। उन्होंने बताया कि वर्षों से काबिज भूमि सरकार के रिकार्ड में वन विभाग के नाम से दर्ज होने के कारण उन्हें बेदखली का भय रहता था। राज्य सरकार ने उन्हें वन अधिकार पट्टा देकर चिंता से मुक्त कर दिया है।

    शौर्यपथ / भारतीय शास्त्रीय परंपरा की विधाओं पर आधारित 47वां खजुराहो नृत्य समारोह  इस बार मध्यप्रदेश के खजुराहो के कंदरिया महादेव मंदिर के स्थान पर पश्चिमी मंदिर समूह के अंदर 2० से 26 फरवरी तक आयोजित किया गया है।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार 47वां खजुराहो नृत्य समारोह 2० से 26 फरवरी तक पश्चिमी मंदिर समूह के अंदर होगा, जिसमें कलाकारों द्वारा प्रतिदिन शाम 7 बजे से प्रस्तुतियां दी जाएंगी। इससे दर्शकों को मंदिर की आभा के बीच कलाकारों के नृत्य प्रदर्शन को देखने का मौका मिलेगा।

ऩृत्य समारोह में प्रवेश नि:शुल्क रहेगा। समारोह के दौरान प्रत्येक दिन म.प्र. पर्यटन की साहसिक गतिविधियां भी होंगी। इसके अलावा कार्यक्रम स्थल पर नेपथ्य, कलावातार्, आर्ट मार्ट, ललित कला प्रदर्शनी, चल चित्र और लोकोत्सव भी दर्शकों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहेंगे। यहां कला परंपरा का मेला “हुनर“, टेराकोटा प्रदर्शनी “समष्टि“ और बुंदेली व्यंजनों का मेला “स्वाद“ भी लगाया जाएगा।

इस समारोह में पहले दिन 2० फरवरी को गीता चन्द्रन एवं साथी भरतनाट्यम समूह और दीपक महाराज कथक की प्रस्तुति देंगे जबकि 21 फरवरी को ऐश्वयार् वारियर द्वारा मोहिनीअट्टम, मीरनन्दा बारठाकुर, उत्पला हुकइ, अलिगुंजन कलिता मुदियार और चंद्रानी कलिता ओझा द्वारा सत्रिया-कथक युगल और अरूणा मोहंती एवं साथी कलाकार ओडिसी समूह नृत्य प्रस्तुत करेंगे।

समारोह के अंतिम दिन 26 फरवरी को जवाहरलाल नेहरू मणिपुर डांस अकादमी द्वारा मणिपुरी समूह, आयार् नंदे ओडिसी और पूर्णिमा अशोक एवं साथी कलाकार भरतनाट्यम समूह नृत्य प्रस्तुत करेंगे।

 

लाइफस्टाइल /शौर्यपथ /'धरती के सबसे बड़े लिटरेरी शो' और 'साहित्य का कुंभ' कहे जाने वाले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2०21 के 14वें संस्करण का शुभारम्भ शुक्रवार, को नए वचुर्अल प्लेटफॉर्म पर होगा। फेस्टिवल के शुभारम्भ साइंस म्यूजियम ग्रुप के डायरेक्टर एवं चीफ एग्जीक्यूटिव सर इआन ब्लेचफोर्ड और साइंस म्यूजियम लंदन के हेड ऑफ कलेक्शन एवं प्रिंसिपल क्यूरेटर डॉ. टिली ब्लीथ द्वारा द आर्ट ऑफ इनोवेशन विषय पर उद्घाटन संभाषण से होगा।
फेस्टिवल में इस साल 3०० लेखक एवं कलाकार शिरकत करेंगे। ये लगभग 25 भारतीय और 18 अंतरार्ष्ट्रीय भाषाओँ के साथ 23 से ज्यादा देशों का प्रतिनिधित्व करेंगे। इनमें नोबेल पुरस्कार, मैन बुकर, पुलित्जर, साहित्य अकादेमी, डीएससी प्राइज और जेसीबी प्राइज विजेता शामिल हैं।
सूत्रों ने बताया कि भारत की संपन्न, वैविध्यपूर्ण और रंगीन साहित्यिक विरासत जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के 14वें संस्करण का केंद्र है, इसलिए फेस्टिवल में देश के विविध भाषाओँ के वक्ता शामिल होंगे। इस साल फेस्टिवल में हिंदी, उदूर्, मलयालम, असमी, संस्कृत, ब्रज, बंगाली, तमिल, तेलुगु, ओड़िया, भोजपुरी, खासी, कश्मीरी, राजस्थानी, पंजाबी, संथाली, बोडो, मणिपुरी, सिन्धी, नेपाली, मराठी, कोंकणी, गुजराती, डोगरी और कन्नड़ बोलने वाले वक्ता शामिल होंगे।
फेस्टिवल में बड़ी संख्या में विदेशी भाषाओँ के वक्ता भी अपनी बात रखेंगे जिनमें प्रमुख रूप से अंग्रेजी, इतालवी, आयरिश, नेपाली, डच, एस्तोनियन, भूटानी, सिंहला, अफ्रीकी, पोलिश, रूसी, हीब्रू, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश, स्वीडिश, वेल्श, कुर्दिश इत्यादि शामिल है।

टिप्स ट्रिक्स /शौर्यपथ /बालों का झड़ना आज के समय में एक आम समस्या है। फिर चाहे वह पुरूष हो या महिला, बालों के कमजोर होने और झड़ने के कारण अधिकतर लोगों को समय से पहले ही गंजापन या फिर पतले बालों की समस्या का सामना करना पड़ता है। हो सकता है कि आप भी इसी तरह की समस्या से ग्रस्त हों, लेकिन आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। आज हम आपको कुछ ऐसे कैफीन हेयर मास्क के बारे में बता रहे हैं, जो आपके बालों को शाइनी बनाने के साथ−साथ मजबूती प्रदान करते हैं और बालों के झड़ने की समस्या को कम करते हैं−
कॉफी पाउडर और नारियल का तेल मास्क
हेयर केयर एक्सपर्ट बताते हैं कि कॉफी हेयर मास्क आपके बालों की जड़ों को उत्तेजित करने और उनकी बनावट में सुधार करने में मदद करता है। जिसके कारण बालों के झड़ने को रोकने के साथ−साथ उसके विकास को बढ़ावा देने में मदद मिलती है। आप इसे नारियल के तेल के साथ मिक्स करके हेयर पैक बना सकते हैं। इस मास्क को तैयार करने के लिए, कम तापमान पर एक चौथाई कप नारियल के तेल को गर्म करें और इसमें 1 बड़ा चम्मच भुना हुआ कॉफी बीन्स मिलाएं। इसके बाद बालों को वॉश करने के बाद इसे बालों में लगाएं।
कॉफी, शहद और ऑलिव ऑयल मास्क
हेयर केयर एक्सपर्ट के अनुसार, यह मास्क ऑलिव और शहद दोनों को मॉइस्चराइजिंग गुण के कारण बालों को हाइड्रेटेड करता है। अगर आपके बाल रूखे और बेजान हैं तो ऐसे में आप इस मास्क को अप्लाई करके उन्हें नमी प्रदान करता है। साथ ही हेयर फॉल की समस्या को भी कम करता है। इसके लिए आप एक चम्मच कॉफी पाउडर में एक बड़ा चम्मच शहद और जैतून का तेल लें। सामग्री को अच्छी तरह से मिलाएं और एक चिकना पेस्ट बनाएं। अब इस मास्क को बालों पर जड़ से सिरे तक लगाएं और इसे कम से कम आधे घंटे के लिए बैठने दें। आखिरी में एक हल्के शैम्पू के साथ बालों को वॉश करें।
कॉफी व एग यॉक मास्क
अंडे की जर्दी विटामिन, आयरन, सोडियम और लेक्टिन से भरपूर होती है। जिसके कारण यह डैमेज्ड हेयर को रिपेयर करने में मददगार है। यह ऑयली स्कैल्प को रेग्युलेट करके डल हेयर को एक बार फिर से शाइनी बनाता है। इस हेयर मास्क को बनाने के लिए, एक अंडे की जर्दी के साथ एक चम्मच कॉफी पाउडर मिलाएं और पेस्ट बनाएं। पेस्ट को अपने स्कैल्प और बालों पर लगाएं, पांच मिनट तक मसाज करें। इसे एक घंटे के लिए बैठने दें और गुनगुने पानी और एक हल्के शैम्पू से धो लें।

खाना खजाना /शौर्यपथ / पालक को सेहत के लिए बेहद अच्छा माना जाता है। यह आपको सिर्फ आयरन ही नहीं देता, बल्कि इस हरी पत्तेदार सब्जी से आपको अन्य भी कई पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। आमतौर पर पालक को घरों एक−दो तरह से ही बनाया जाता है। लेकिन अगर आप एक ही तरह से पालक खा−खाकर बोर हो गई हैं और अब उसे एक टि्वस्ट के साथ खाना चाहती हैं तो ऐसे में आप लंच टाइम में हरियाली गोभी बना सकती हैं। पालक और गोभी की मदद से बनने वाली यह सब्जी जितनी हेल्दी होती है, इसका स्वाद भी उतना ही लाजवाब होता है। तो चलिए जानते हैं हरियाली गोभी बनाने का तरीका−
सामग्री−
2 कप फूलगोभी कटी हुई
500 ग्राम पालक, धोया और कटा हुआ
हल्दी पाउडर
गरम मसाला पाउडर
नमक
एक टमाटर कटा हुआ या प्यूरी
लहसुन
अदरक
हरी मिर्च
जीरा
दालचीनी पाउडर
जीरा पाउडर
2 बड़े चम्मच ताजा क्रीम
1 बड़ा चम्मच मक्खन
बनाने की विधि−
हरियाली गोभी बनाने के लिए सबसे पहले हम हरियाली मसाला तैयार करेंगे। इसके लिए एक प्रेशर कुकर में मक्खन गरम करें। अब इसमें कुछ सेकंड के लिए जीरा, लहसुन डालकर सॉटे करें। दालचीनी, हरी मिर्च, पलाक, टमाटर, जीरा पाउडर, गरम मसाला पाउडर, हल्दी पाउडर और जीरा पाउडर डालें। कुछ सेकंड के लिए सॉटे करें। अब इसमें एक चम्मच पानी डालकर कुकर को कवर करें और एक सीटी आने तक पकाएं। जब पालक पूरी तरह से पक जाए तो इसे पूरा ठंडा होने दें और फिर ब्लेंडर की मदद से इसे पीस लें। अब एक कड़ाही में ऑयल लेकर उसमें फूलगोभी डालें। साथ ही हल्दी व नमक डालकर सॉटे करें। कुछ सेकंड के बाद कुछ पानी छिड़कें और इसे कवर करें और लगभग 5 मिनट तक पकाएं। एक बार गोबी पकने के बाद इसमें गरम मसाला में डालें और कुछ मिनटों तक भूनें और आँच बंद कर दें। अब क्रीम को पालक करी में डालें और एक सर्विंग बाउल में स्थानांतरित करें। रोस्टेड गोभी को पालक करी में रखें और हरियाली गोभी को गर्मागर्म सर्व करें।
आप इसे रोटी या परांठे आदि के साथ बेहद आसानी से खा सकती हैं।

धर्म संसार /शौर्यपथ /शनिवार की व्रत कथा ;- एक समय स्वर्गलोक में 'सबसे बड़ा कौन?' के प्रश्न पर नौ ग्रहों में वाद-विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ा कि परस्पर भयंकर युद्ध की स्थिति बन गई। निर्णय के लिए सभी देवता देवराज इंद्र के पास पहुँचे और बोले- 'हे देवराज! आपको निर्णय करना होगा कि हममें से सबसे बड़ा कौन है?' देवताओं का प्रश्न सुनकर देवराज इंद्र उलझन में पड़ गए।
इंद्र बोले- 'मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूँ। हम सभी पृथ्वीलोक में उज्जयिनी नगरी में राजा विक्रमादित्य के पास चलते हैं।
देवराज इंद्र सहित सभी ग्रह (देवता) उज्जयिनी नगरी पहुँचे। महल में पहुँचकर जब देवताओं ने उनसे अपना प्रश्न पूछा तो राजा विक्रमादित्य भी कुछ देर के लिए परेशान हो उठे क्योंकि सभी देवता अपनी-अपनी शक्तियों के कारण महान थे। किसी को भी छोटा या बड़ा कह देने से उनके क्रोध के प्रकोप से भयंकर हानि पहुँच सकती थी।
अचानक राजा विक्रमादित्य को एक उपाय सूझा और उन्होंने विभिन्न धातुओं- स्वर्ण, रजत (चाँदी), कांसा, ताम्र (तांबा), सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे के नौ आसन बनवाए। धातुओं के गुणों के अनुसार सभी आसनों को एक-दूसरे के पीछे रखवाकर उन्होंने देवताओं को अपने-अपने सिंहासन पर बैठने को कहा।
देवताओं के बैठने के बाद राजा विक्रमादित्य ने कहा- 'आपका निर्णय तो स्वयं हो गया। जो सबसे पहले सिंहासन पर विराजमान है, वहीं सबसे बड़ा है।'
राजा विक्रमादित्य के निर्णय को सुनकर शनि देवता ने सबसे पीछे आसन पर बैठने के कारण अपने को छोटा जानकर क्रोधित होकर कहा- 'राजा विक्रमादित्य! तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा अपमान किया है। तुम मेरी शक्तियों से परिचित नहीं हो। मैं तुम्हारा सर्वनाश कर दूँगा।'
शनि ने कहा- 'सूर्य एक राशि पर एक महीने, चंद्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक महीने, वृहस्पति तेरह महीने रहते हैं, लेकिन मैं किसी राशि पर साढ़े सात वर्ष (साढ़े साती) तक रहता हूँ। बड़े-बड़े देवताओं को मैंने अपने प्रकोप से पीड़ित किया है।
राम को साढ़े साती के कारण ही वन में जाकर रहना पड़ा और रावण को साढ़े साती के कारण ही युद्ध में मृत्यु का शिकार बनना पड़ा। राजा! अब तू भी मेरे प्रकोप से नहीं बच सकेगा।'
इसके बाद अन्य ग्रहों के देवता तो प्रसन्नता के साथ चले गए, परंतु शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहाँ से विदा हुए।
राजा विक्रमादित्य पहले की तरह ही न्याय करते रहे। उनके राज्य में सभी स्त्री-पुरुष बहुत आनंद से जीवन-यापन कर रहे थे। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। उधर शनि देवता अपने अपमान को भूले नहीं थे।
विक्रमादित्य से बदला लेने के लिए एक दिन शनिदेव ने घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और बहुत से घोड़ों के साथ उज्जयिनी नगरी पहुँचे। राजा विक्रमादित्य ने राज्य में किसी घोड़े के व्यापारी के आने का समाचार सुना तो अपने अश्वपाल को कुछ घोड़े खरीदने के लिए भेजा।.
घोड़े बहुत कीमती थे। अश्वपाल ने जब वापस लौटकर इस संबंध में बताया तो राजा विक्रमादित्य ने स्वयं आकर एक सुंदर व शक्तिशाली घोड़े को पसंद किया।
घोड़े की चाल देखने के लिए राजा उस घोड़े पर सवार हुए तो वह घोड़ा बिजली की गति से दौड़ पड़ा।
तेजी से दौड़ता घोड़ा राजा को दूर एक जंगल में ले गया और फिर राजा को वहाँ गिराकर जंगल में कहीं गायब हो गया। राजा अपने नगर को लौटने के लिए जंगल में भटकने लगा। लेकिन उन्हें लौटने का कोई रास्ता नहीं मिला। राजा को भूख-प्यास लग आई। बहुत घूमने पर उसे एक चरवाहा मिला।
राजा ने उससे पानी माँगा। पानी पीकर राजा ने उस चरवाहे को अपनी अँगूठी दे दी। फिर उससे रास्ता पूछकर वह जंगल से निकलकर पास के नगर में पहुँचा।
राजा ने एक सेठ की दुकान पर बैठकर कुछ देर आराम किया। उस सेठ ने राजा से बातचीत की तो राजा ने उसे बताया कि मैं उज्जयिनी नगरी से आया हूँ। राजा के कुछ देर दुकान पर बैठने से सेठजी की बहुत बिक्री हुई।
सेठ ने राजा को बहुत भाग्यवान समझा और खुश होकर उसे अपने घर भोजन के लिए ले गया। सेठ के घर में सोने का एक हार खूँटी पर लटका हुआ था। राजा को उस कमरे में छोड़कर सेठ कुछ देर के लिए बाहर गया।
तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। राजा के देखते-देखते सोने के उस हार को खूँटी निगल गई।
सेठ ने कमरे में लौटकर हार को गायब देखा तो चोरी का संदेह राजा पर ही किया क्योंकि उस कमरे में राजा ही अकेला बैठा था। सेठ ने अपने नौकरों से कहा कि इस परदेसी को रस्सियों से बाँधकर नगर के राजा के पास ले चलो।
राजा ने विक्रमादित्य से हार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके देखते ही देखते खूँटी ने हार को निगल लिया था। इस पर राजा ने क्रोधित होकर चोरी करने के अपराध में विक्रमादित्य के हाथ-पाँव काटने का आदेश दे दिया। राजा विक्रमादित्य के हाथ-पाँव काटकर उसे नगर की सड़क पर छोड़ दिया गया।
कुछ दिन बाद एक तेली उसे उठाकर अपने घर ले गया और उसे अपने कोल्हू पर बैठा दिया। राजा आवाज देकर बैलों को हाँकता रहता। इस तरह तेली का बैल चलता रहा और राजा को भोजन मिलता रहा। शनि के प्रकोप की साढ़े साती पूरी होने पर वर्षा ऋतु प्रारंभ हुई।
राजा विक्रमादित्य एक रात मेघ मल्हार गा रहा था कि तभी नगर के राजा की लड़की राजकुमारी मोहिनी रथ पर सवार उस तेली के घर के पास से गुजरी। उसने मेघ मल्हार सुना तो उसे बहुत अच्छा लगा और दासी को भेजकर गाने वाले को बुला लाने को कहा।
दासी ने लौटकर राजकुमारी को अपंग राजा के बारे में सब कुछ बता दिया। राजकुमारी उसके मेघ मल्हार से बहुत मोहित हुई। अतः उसने सब कुछ जानकर भी अपंग राजा से विवाह करने का निश्चय कर लिया।
राजकुमारी ने अपने माता-पिता से जब यह बात कही तो वे हैरान रह गए। रानी ने मोहिनी को समझाया- 'बेटी! तेरे भाग्य में तो किसी राजा की रानी होना लिखा है। फिर तू उस अपंग से विवाह
करके अपने पाँव पर कुल्हाड़ी क्यों मार रही है?'
राजकुमारी ने अपनी जिद नहीं छोड़ी। अपनी जिद पूरी कराने के लिए उसने भोजन करना छोड़ दिया और प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया।
आखिर राजा-रानी को विवश होकर अपंग विक्रमादित्य से राजकुमारी का विवाह करना पड़ा। विवाह के बाद राजा विक्रमादित्य और राजकुमारी तेली के घर में रहने लगे। उसी रात स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा- 'राजा तुमने मेरा प्रकोप देख लिया।
मैंने तुम्हें अपने अपमान का दंड दिया है।' राजा ने शनिदेव से क्षमा करने को कहा और प्रार्थना की-
'हे शनिदेव! आपने जितना दुःख मुझे दिया है, अन्य किसी को न देना।'
शनिदेव ने कुछ सोचकर कहा- 'राजा! मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। जो कोई स्त्री-पुरुष मेरी पूजा करेगा, शनिवार को व्रत करके मेरी व्रतकथा सुनेगा, उस पर मेरी अनुकम्पा बनी रहेगी।
प्रातःकाल राजा विक्रमादित्य की नींद खुली तो अपने हाथ-पाँव देखकर राजा को बहुत खुशी हुई। उसने मन ही मन शनिदेव को प्रणाम किया। राजकुमारी भी राजा के हाथ-पाँव सही-सलामत देखकर आश्चर्य में डूब गई।
तब राजा विक्रमादित्य ने अपना परिचय देते हुए शनिदेव के प्रकोप की सारी कहानी सुनाई।
सेठ को जब इस बात का पता चला तो दौड़ता हुआ तेली के घर पहुँचा और राजा के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा। राजा ने उसे क्षमा कर दिया क्योंकि यह सब तो शनिदेव के प्रकोप के कारण हुआ था।
सेठ राजा को अपने घर ले गया और उसे भोजन कराया। भोजन करते समय वहाँ एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सबके देखते-देखते उस खूँटी ने हार उगल दिया। सेठजी ने अपनी बेटी का विवाह भी राजा के साथ कर दिया और बहुत से स्वर्ण-आभूषण, धन आदि देकर राजा को विदा किया।
राजा विक्रमादित्य राजकुमारी मोहिनी और सेठ की बेटी के साथ उज्जयिनी पहुँचे तो नगरवासियों ने हर्ष से उनका स्वागत किया। अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि शनिदेव
सब देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं। प्रत्येक स्त्री-पुरुष शनिवार को उनका व्रत करें और व्रतकथा अवश्य सुनें।
राजा विक्रमादित्य की घोषणा से शनिदेव बहुत प्रसन्न हुए। शनिवार का व्रत करने और व्रत कथा सुनने के कारण सभी लोगों की मनोकामनाएँ शनिदेव की अनुकम्पा से पूरी होने लगीं। सभी लोग आनंदपूर्वक रहने लगे।
किस तरह शनिदेव की पूजा अर्चना कर उन्हें खुश किया जाए. यह तो हम सभी जानते हैं कि शनि न्याय के देवता है. हमारे कर्मों का फल देने का पूरा कार्यभार शनि देव पर ही है लेकिन कई लोग शनिदेव को एक बुरे देवता के रूप में देखते हैं जो गलत है. शनि देव अगर किसी को उसके बुरे कार्यों की सजा देते हैं तो उसके अच्छे कार्यों के लिए उसका अच्छा फल भी देते हैं. शनि महान हैं उनकी छत्रछाया में आए हर इंसान का कल्याण होता है. तो चलिए पढ़ते हैं शनि व्रत कथा
यह पूजा और व्रत शनिदेव को प्रसन्न करने हेतु होता है.
काला तिल, तेल, काला वस्त्र, काली उड़द शनि देव को अत्यंत प्रिय है. इनसे ही पूजा होती है.
शनि देव का स्त्रोत पाठ करें. शनिस्त्रोत
शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के दिन शुरू कर सकते हैं परंतु श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारम्भ करना अति मंगलकारी है । इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए। शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवन्ती का फूल, तिल, तेल, गुड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए।
शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए। इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए।
शनि व्रत कथा
एक समय सभी नवग्रहओं : सूर्य, चंद्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु में विवाद छिड़ गया, कि इनमें सबसे बड़ा कौन है? सभीआपसं ऎंल ड़ने लगे, और कोई निर्णय ना होने पर देवराज इंद्र के पास निर्णय कराने पहुंचे. इंद्र इससे घबरा गये, और इस निर्णय को देने में अपनी असमर्थता जतायी. परन्तु उन्होंने कहा, कि इस समय पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य हैं, जो कि अति न्यायप्रिय हैं. वे ही इसका निर्णय कर सकते हैं. सभी ग्रह एक साथ राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे, और अपना विवाद बताया। साथ ही निर्णय के लिये कहा। राजा इस समस्या से अति चिंतित हो उठे, क्योंकि वे जानते थे, कि जिस किसी को भी छोटा बताया, वही कुपित हो उठेगा. तब राजा को एक उपाय सूझा. उन्होंने सुवर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लौह से नौ सिंहासन बनवाये, और उन्हें इसी क्रम से रख दिय. फ़िर उन सबसे निवेदन किया, कि आप सभी अपने अपने सिंहासन पर स्थान ग्रहण करें. जो अंतिम सिंहासन पर बठेगा, वही सबसे छोटा होगा. इस अनुसार लौह सिंहासन सबसे बाद में होने के कारण, शनिदेव सबसे बाद में बैठे. तो वही सबसे छोटे कहलाये. उन्होंने सोच, कि राजा ने यह जान बूझ कर किया है. उन्होंने कुपित हो कर राजा से कहा “राजा! तू मुझे नहीं जानता. सूर्य एक राशि में एक महीना, चंद्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेड़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, व बुद्ध और शुक्र एक एक महीने विचरण करते हैं. परन्तु मैं ढाई से साढ़े-सात साल तक रहता हुं. बड़े बड़ों का मैंने विनाश किया है. श्री राम की साढ़े साती आने पर उन्हें वनवास हो गया, रावण की आने पर उसकी लंका को बंदरों की सेना से परास्त होना पढ़ा.अब तुम सावधान रहना. ” ऐसा कहकर कुपित होते हुए शनिदेव वहां से चले. अन्य देवता खुशी खुशी चले गये. कुछ समय बाद राजा की साढ़े साती आयी. तब शनि देव घोड़ों के सौदागर बनकर वहां आये. उनके साथ कई बढ़िया घड़े थे. राजा ने यह समाचार सुन अपने अश्वपाल को अच्छे घोड़े खरीदने की अज्ञा दी. उसने कई अच्छे घोड़े खरीदे व एक सर्वोत्तम घोड़े को राजा को सवारी हेतु दिया. राजा ज्यों ही उसपर बैठा, वह घोड़ा सरपट वन की ओर भागा. भषण वन में पहुंच वह अंतर्धान हो गया, और राजा भूखा प्यासा भटकता रहा. तब एक ग्वाले ने उसे पानी पिलाया. राजा ने प्रसन्न हो कर उसे अपनी अंगूठी दी. वह अंगूठी देकर राजा नगर को चल दिया, और वहां अपना नाम उज्जैन निवासी वीका बताया. वहां एक सेठ की दूकान उसने जल इत्यादि पिया. और कुछ विश्राम भी किया. भाग्यवश उस दिन सेठ की बड़ी बिक्री हुई. सेठ उसे खाना इत्यादि कराने खुश होकर अपने साथ घर ले गया. वहां उसने एक खूंटी पर देखा, कि एक हार टंगा है, जिसे खूंटी निगल रही है. थोड्क्षी देर में पूरा हार गायब था। तब सेठ ने आने पर देखा कि हार गायब जहै। उसने समझा कि वीका ने ही उसे चुराया है। उसने वीका को कोतवाल के पास पकड्क्षवा दिया। फिर राजा ने भी उसे चोर समझ कर हाथ पैर कटवा दिये। वह चैरंगिया बन गया।और नगर के बहर फिंकवा दिया गया। वहां से एक तेली निकल रहा था, जिसे दया आयी, और उसने एवीका को अपनी गाडी़ में बिठा लिया। वह अपनी जीभ से बैलों को हांकने लगा। उस काल राजा की शनि दशा समाप्त हो गयी। वर्षा काल आने पर वह मल्हार गाने लगा। तब वह जिस नगर में था, वहां की राजकुमारी मनभावनी को वह इतना भाया, कि उसने मन ही मन प्रण कर लिया, कि वह उस राग गाने वाले से ही विवाह करेगी। उसने दासी को ढूंढने भेजा। दासी ने बताया कि वह एक चौरंगिया है। परन्तु राजकुमारी ना मानी। अगले ही दिन से उठते ही वह अनशन पर बैठ गयी, कि बिवाह करेगी तोइ उसी से। उसे बहुतेरा समझाने पर भी जब वह ना मानी, तो राजा ने उस तेली को बुला भेजा, और विवाह की तैयारी करने को कहा।फिर उसका विवाह राजकुमारी से हो गया। तब एक दिन सोते हुए स्वप्न में शनिदेव ने रानजा से कहा: राजन्, देखा तुमने मुझे छोटा बता कर कितना दुःख झेला है। तब राजा नेउससे क्षमा मांगी, और प्रार्थना की , कि हे शनिदेव जैसा दुःख मुझे दिया है, किसी और को ना दें। शनिदेव मान गये, और कहा: जो मेरी कथा और व्रत कहेगा, उसे मेरी दशा में कोई दुःख ना होगा। जो नित्य मेरा ध्यान करेगा, और चींटियों को आटा डालेगा, उसके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे। साथ ही राजा को हाथ पैर भी वापस दिये। प्रातः आंख खुलने पर राजकुमारी ने देखा, तो वह आश्चर्यचकित रह गयी। वीका ने उसे बताया, कि वह उज्जैन का राजा विक्रमादित्य है। सभी अत्यंत प्रसन्न हुए। सेतठ ने जब सुना, तो वह पैरों पर गिर्कर क्षमा मांगने लगा। राजा ने कहा, कि वह तो शनिदेव का कोप था। इसमें किसी का कोई दोष नहीं। सेठ ने फिर भी निवेदन किया, कि मुझे शांति तब ही मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर भोजन करेंगे। सेठ ने अपने घर नाना प्रकार के व्यंजनों ने राजा का सत्कार किया। साथ ही सबने देखा, कि जो खूंटी हार निगल गयी थी, वही अब उसे उगल रही थी। सेठ ने अनेक मोहरें देकर राजा का धन्यवाद किया, और अपनी कन्या श्रीकंवरी से पाणिग्रहण का निवदन किया। राजा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुछ समय पश्चात राजा अपनी दोनों रानियों मनभावनी और श्रीकंवरी को साभी दहेज सहित लेकर उज्जैन नगरी को चले। वहां पुरवासियों ने सीमा पर ही उनका स्वागत किया। सारे नगर में दीपमाला हुई, व सबने खुशी मनायी। राजा ने घोषणा की , कि मैंने शनि देव को सबसे छोटा बताया थ, जबकि असल में वही सर्वोपरि हैं। तबसे सारे राज्य में शनिदेव की पूजा और कथा नियमित होने लगी। सारी प्रजा ने बहुत समय खुशी और आनंद के साथ बीताया। जो कोई शनि देव की इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं। व्रत के दिन इस कथा को अवश्य पढ़ना चाहिये।
शनि की साढ़े सात वर्ष तक चलने वाली ग्रह दशा को साढ़े साती कहते हैं। साढ़े साती जीवन का वह चरण है जो हर व्यक्ति की पूरी जिंदगी में कम से कम एक या अधिक बार जरुर आती है। शनि ग्रह एक राशि से दूसरी राशि तक जाने में ढाई वर्ष का समय लेता है। एक राशि से दूसरी राशि तक जाते हुए शनि ग्रह किसी व्यक्ति की जन्म राशि या नाम की राशि में स्थित होता है, वह राशि, उससे अगली राशि और बारहवीं स्थान वाली राशि पर साढ़े साती का प्रभाव होता है। तीन राशियों से होकर गुजरने में इसे पूरे सात वर्ष और छः महीने मतलब साढ़े सात वर्ष का समय लगता है इसलिए भारतीय ज्योतिष के अनुसार इसे शनि की साढ़े साती कहते हैं।
पुराणों की बात करें तो शनि को सूर्य का पुत्र और यमराज का भाई माना जाता है। ऐसा कहा जाता है की यदि यमलोक के अधिपति यमराज हैं, तो शनि वहां के दंडाधिकारी।
हम लोग ऐसा सोचते हैं कि शनि केवल व्यक्ति को अशुभ फल ही देते हैं और जब तक इंसान पर शनि का प्रभाव होता है तब तक वह इन्सान हमेशा दुखी होता है। लेकिन सच में ऐसा नहीं है, शनिदेव हमेशा हर इन्सान को उसके कर्म के हिसाब से ही शुभ-अशुभ फल देते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर किसी इन्सान के कर्म अच्छे हैं तो शनि की अच्छी दृष्टि उस इन्सान पर जरुर पड़ती है जिससे उसके जीवन के सभी कष्ट खत्म हो जाते हैं और शनिदेव उसे आसमान की बुलंदियों तक पहुंचा देते हैं। जी हाँ ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को न्यायप्रिय देवता कहा जाता है और सभी देवताओं में उनकी एक अहम भूमिका भी होती है।
आज हम शनि की साढ़े साती के बारे में विस्तार से जानेंगे, सबसे पहले जानते हैं उसके साढ़े साती के विभिन्न चरणों के बारे में-
शास्त्रों के अनुसार साढ़े साती को तीन चरण में बाँटा गया है। साढ़े साती का पहला चरण धनु, वृषभ, सिंह राशि वाले लोगों के लिए कष्टकारी रहता है। दूसरा या मध्य चरण सिंह, मकर, मेष, कर्क, वृश्चिक राशियों के लिए अच्छा नहीं समझा जाता है और तीसरा चरण मिथुन, कुंभ, तुला, वृश्चिक, मीन राशि के लिए कष्टकारी होता है।
शनि की साढ़े साती या शनि दोष के प्रभाव को कम करने के उपाय-
- तांबे के दीपक में तिल या सरसों का तेल भरकर ज्योति जलानी चाहिए।
- शनि को ठीक करने के लिए सबसे पहले अपने आचरण में सुधार करना चाहिए।
- प्रत्येक शनिवार को उड़द की दाल को भोजन में शामिल कीजिए और एक समय उपवास करिये।
- शनि का शुभ परिणाम पाने के लिए अपने माता-पिता को हमेशा सम्मान दें।
- एक लोहे की कटोरी में सरसों का तेल भरें और दान कर दें।
- शनि के मंत्र ॐ शं शनिश्चरायै नमः का जाप 3 माला रोज शाम को करें।
- शनिवार की शाम को सरसों के तेल का दिया पीपल के पेड़ के नीचे जलाएं और पीपल के पेड़ की सात परिक्रमा लगातार 40 शनिवार करें।
- साढ़े साती के दौरान ग्रह शनि को खुश करने के लिए प्रत्येक शनिवार को भगवान शनि की पूजा करना सबसे अच्छा उपाय है।
- प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़नी चाहिए।
साढ़े साती की अवधि के दौरान इन कामों से बचना चाहिए-
- कोई भी जोखिम भरा काम नहीं करना चाहिए।
- साढ़े साती के दौरान किसी से भी बहस करने से बचना चाहिए।
- ड्राइविंग करते समय सतर्क रहना चाहिए।
- रात में अकेले यात्रा करने से बचना चाहिए।
- शनिवार और मंगलवार को शराब के सेवन से बचें।
- हमें शनिवार और मंगलवार को काले रंग का सामान नहीं खरीदना चाहिए।

नई दिल्ली /शौर्यपथ / जयपुर प्रतिभा किसी सहारे की मोहताज नहीं होती. दुर्लभ और जानलेवा बीमारी से पीड़ित जयपुर के दिव्यांग युवक ने यही साबित कर दिखाया. उसने शतरंज के क्षेत्र में 7 आविष्कार और तीन पेटेंट अपने नाम किए और इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड और इंडिया रिकॉर्ड में नाम दर्ज करवाया है.
‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल शक्ति' पुरस्कार से सम्मानित 18 साल के हृदयेश्वर सिंह भाटी को पिछले वर्ष सरकार ने उत्कृष्ट रचनात्मक बाल श्रेणी के तहत राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था. इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकार्ड और इंडिया बुक आफ रिकार्ड ने हृदयेश्वर की उपलब्धियों को जगह दी गई है.
व्हील चेयर से चलने वाले भाटी ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग से प्रेरित रहे हैं. उन्हें दो से अधिक लोगों के लिए शतरंज का वर्जन तैयार करने का ख्याल आया. हृदयेश्वर का कहना है कि जब वह अपने दोस्तों के साथ शतरंज खेल रहे थे, तभी उनके पिता भी साथ खेलना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने शतरंज का ऐसा फार्मेट तैयार करने की ठानी. जिससे कई लोग एक साथ चेस खेल सकें. हृदयेश्वर ने 2013 में छह खिलाड़ियों के एक साथ खेल सकने वाले शतरंज के फार्मेट का आविष्कार किया और इसका पेटेंट हासिल किया.
बाद में उन्होंने 12 और 60 खिलाड़ियो के शतरंज का फार्मेट (प्रारूप) भी विकसित कर उनके लिए पेटेंट प्राप्त किया. भाटी ने दो वाहनों और 16 बाई 16 सुडोकू में पावर वहिकल की पहुंच के लिये रैंप संशोधन में भी योगदान दिया है. भाटी ऐसे ही अन्य आविष्कारों के विकास में जुटे हैं, ताकि अक्षम लोग भी सभी तरह की सुविधाओं का आनंद उठा पाएं.

खाना खजाना /शौर्यपथ /आपने चिली पोटैटो तो कई बार खाया होगा लेकिन क्या आपने शेजवान पोटैटो ट्राई किए हैं? अगर नहीं, तो देर किस बात की है आइए, जानते हैं शेजवान पोटैटो की रेसिपी
सामग्री :
बेबी पोटैटो- 16
अदरक-लहसुन पेस्ट- 2 चम्मच
बारीक कटी मिर्च- 2
कटा प्याज- 1/2 कप
शेजवान सॉस- 3 चम्मच
चीनी- 1 चम्मच
कॉर्नफ्लोर- 2 चम्मच
नमक- स्वादानुसार
तेल- आवश्यकतानुसार
बारीक कटा हरा प्याज
गार्निशिंग के लिए

विधि :
आलू को उबाल लें। छिलका छीलकर उसमें जगह-जगह छेद कर दें। पैन में तेल गर्म करें और आलू को सुनहरा होने तक तल लें। उसी पैन में थोड़ा-सा तेल और गर्म करें। उसमें अदरक-लहसुन पेस्ट और हरी मिर्च डालें। कुछ मिनट तक भूनें। पैन में कटा प्याज डालें और पारदर्शी होने तक भूनें। शेजवान सॉस और चीनी पैन में डालकर एक मिनट तक मिलाएं। अब आधे कप पानी में कॉर्नफ्लोर डालकर अच्छी तरह से मिला लें। अब इस मिश्रण को पैन में डालें। अच्छी तरह से मिलाएं और ग्रेवी के गाढ़े होने तक पकाएं। सबसे अंत में आलू को पैन में डालकर मिलाएं। धीमी आंच पर चार से पांच मिनट तक पकाएं, ताकि मसाले आलू के भीतर चले जाएं। बारीक कटे हरे प्याज से गार्निश कर नूडल्स या फ्राइड राइस के साथ सर्व करें।

सेहत /शौर्यपथ कुछ ड्रिंक्स ऐसी हैं, जो ज्यादातर गर्मियों में ही पी जाती है क्योंकि ये गर्मियों में होने वाली समस्याओं को खत्म करने में मदद करती हैं। जैसे, गर्मी के मौसम में एसिडिटी, जी मितलाना या खाना न पचने की समस्याएं होती हैं, ऐसे में ये ड्रिंक्स कारगर मानी जाती हैं। शिकंजी भी ऐसी ही ड्रिंक है, जिसका इस्तेमाल गर्मियों में स्वाद के लिए किया जाता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वाद के अलावा शिकंजी कई मायनों में शरीर के लिए फायदेमंद है। आइए, जानते हैं-
शिकंजी पीने के फायदे
-शिकंजी पीने से शरीर का इम्युन सिस्टम दुरुस्त करता है लेकिन इसे बनाने में यह सावधानी बरतनी चाहिए कि में चीनी की जगह गुड़ का इस्तेमाल करें। ज्यादा चीनी डालने से यह पेट में एसिडिटी पैदा करती है।
-गर्मियों में पसीना चलने से शरीर के कई तत्व बाहर आ जाते हैं। इसमें जरूरी इलेक्ट्रॉलाइट्स भी बाहर निकल जाते हैं। रोज एक गिलास से शिकंजी पीने से शरीर में इन तत्वों की मात्रा बनी रहती है।
-विटामिन सी से भरपूर शिकंजी त्वचा में निखार लाती है। हफ्ते में एक बार पीने से स्किन प्रॉब्लम्स भी दूर होती हैं।
-इसमें मौजूद पोटेशियम से हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल किया जा सकता है। जब भी हाई ब्लड प्रेशर की प्रॉब्लम महसूस हो, तो एक गिलास शिकंजी का सेवन करना चाहिए।
-इस पीने से डिप्रेशन और तनाव से आराम मिलता है। कई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि शरीर के हाइड्रेड रहने से तनाव से दूर रहने में मदद मिलती है। वहीं, शिकंजी में नींबू का इस्तेमाल होता है, जो आपको रिलेक्स रखने में कारगर है।
-शिकंजी पीने से मुंह से आने वाली दुर्गंध भी दूर होती है। शिंकजी दिन में दो से तीन बार पीने दांतों और मसूड़ों की समस्या में आराम मिलता है।
-शिकंजी पीने से हाजमा भी दुरुस्त रहता है। इसमें नींबू और नमक की मात्रा रहती है यह पेट को गर्म नहीं होने देता है।

सेहत /शौर्यपथ /क्या आपकी बार-बार सांस फूलती है? या फिर आपको थोड़ा-सा काम करने के बाद ही शरीर में दर्द और सीने में जकड़न की समस्या होने लगती है? अगर आपको ऐसी ही समस्याएं होती हैं, तो सावधान होने का वक्त है क्योंकि ये लक्षण आम नहीं बल्कि अस्थमा के भी हो सकते हैं इसलिए अगर आपको ज्यादा परेशानी हो रही है, तो आपको तुंरत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। आइए, जानते हैं अस्थमा के कुछ शुरुआती लक्षण क्या है-
हमेशा सूखी खांसी का होना
ज्यादातर लोगों को सर्दी-जुकाम या फिर ब्रोंकाइटिस में कफ या सूखी खांसी आती है लेकिन ये अस्थमा का भी संकेत हो सकता है। हंसने या लेटने के बाद आपकी खांसी और बढ़ जाती है और ये खांसी आपके गले से नहीं बल्कि छाती से आती है। इस तरह के अस्थमा को कफ वेरिएंट अस्थमा कहते हैं।
हमेशा उबासी, सांस फूलना
लगातार उबासी, सांस फूलना या गहरी सांस की वजह हमेशा ऐंगजाइटी या थकान होती है। बासी या गहरी सांस लेने से शरीर को ज्यादा ऑक्सीजन मिलती है और कार्बन डाइऑक्साइड भी ज्यादा बाहर निकलती है। ये तीनों चीजों वायुमार्ग में आए असंतुलन की वजह हो सकती हैं।
रात में इन समस्याओं का बढ़ना
आप कफ और सांस की घरघराहट की वजह से सो नहीं पाते हैं तो ये एक गंभीर समस्या हो सकती है। ठीक से ना सो पाने की वजह से एनर्जी कम हो जाती है और इसका असर मानसिक रूप से भी पड़ता है। क्रोनिक स्लीपलेसनेस को दिल की बीमारी या फिर डायबिटीज के संकेतों से भी जोड़ कर देखा जाता है।

सीने में जकड़न का होना
सीने में जकड़न या दर्द हमेशा दिल की बीमारी की वजह से नहीं होता है। ये भी अस्थमा का एक मुख्य लक्षण हो सकता है। सीने में जकड़न की वजह से अस्थमा अटैक आ सकता है। हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि अस्थमा अटैक की वजह से सीने में जकड़न, सांस लेने में तकलीफ और कफ का अनुभव होता है।
तेज-तेज सांसे लेना
कुछ लोगों में तेज-तेज सांस लेना भी अस्थमा का लक्षण माना जाता है। अमेरिका की क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, वयस्कों के सांस लेने की सामान्य दर 12 से 20 सांस प्रति मिनट होती है। अगर आप इससे अधिक तेजी से सांस ले रहे हैं तो आपको हाइपरवेंटिलेशन भी हो सकता है।
नोट : आलेख में लिखे ये अस्थमा के शुरुआती लक्षण हैं, जो पाठकों की सामान्य जानकारी के लिए लिखे गए हैं। इस आलेख के आधार पर कोई भी निर्णय लेने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

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