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June 01, 2026
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आस्था /शौर्यपथ / शिवजी को भांग चढ़ाना चाहिए या नहीं, जानिए शिवजी की पूजा से भांग किस तरह और क्यों जुड़ गई यह शोध का विषय है, परंतु यह प्रचरित करना की वे भांग या चिलम पीते थे यह सचमुच ही निंदनीय है। आओ जानते हैं कि शिवजी को भांग चढ़ाना चाहिए या नहीं।
पक्ष :कहते हैं कि हलाहल विष के सेवन के बाद शिवजी का शरीर नीला पड़कर तपने लगा परंतु फिर भी शिव पूर्णतः शांत थे लेकिन देवताओं और अश्विनी कुमारों ने सेवा भावना से भगवान शिव की तपन को शांत करने के लिए उन्हें जल चढ़ाया और विष का प्रभाव कम करने के लिए विजया (भांग का पौधा), बेलपत्र और धतूरे को दूध में मिलाकर भगवान शिव को औषधि रूप में पिलाया। तभी से लोग भगवान शिव को भांग भी चढ़ाने लगे।
कुछ विद्वान कहते हैं कि शिव को हलाहल के कुप्रभावों से संरक्षित करने के लिए ही शिवार्चन के समय बेलपत्र आदि को शिवलिंग पर चढ़ाने की परम्परा है। शिवलिंग पर जिन-जिन भी द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है उन सभी द्रव्यों से ब्रहमाण्डीय ऊर्जा के नकारात्मक प्रभावों का शमन होता है। यही रुद्राभिषेक का विज्ञान है। शिवजी पर बेलपत्र, धतूरा और कच्चा दूध चढ़ाया जाता है जो कि ठंडक प्रदान करने का कार्य करता है।
विपक्ष :कहते हैं कि समुद्र मंथन से निकले विष की बूंद गिरने से भांग और धतूरे नाम के पौधे उत्पन्न हो गए। कोई कहने लगा कि यह तो शंकरजी की प्रिय परम बूटी है। फिर लोगों ने कथा बना ली कि यह पौधा गंगा किनारे उगा था। इसलिए इसे गंगा की बहन के रूप में भी जाना गया। तभी भांग को शिव की जटा पर बसी गंगा के बगल में जगह मिली है। फिर क्या था सभी लोग भांग घोट-घोट के शंकरजी को चढ़ाने लगे। जबकि शिव महापुराण में कहीं भी नहीं लिखा है कि शंकरजी को भांग प्रिय है।
यह महाशिवरात्रि है बहुत खास, दुर्लभ बुधादित्य योग में होगा भोलेनाथ का विवाह
बुधादित्य योग में मनेगी महाशिवरात्रि
11 मार्च को महाशिवरात्रि का पर्व है। महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म का बहुत ही महत्त्वपूर्ण पर्व है, आज के दिन देशभर के मन्दिरों व घरों में भूतभावन चन्द्रमौलीश्वर भगवान शिव का अभिषेक कर उनकी आराधना की जाएगी। भगवान शिव के बारे में मान्यता है कि वे बड़े ही भोले व शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं।
शिव, शक्ति के भी प्रतिनिधि देव है प्रलयकाल में उनकी संहारक शक्ति से विश्व अपने नव कलेवर की ओर अग्रसर होता है। भगवान शिव से ही हमें शक्तियों के समुचित व सार्थक प्रयोग की शिक्षा मिलती है। 11 मार्च को बुध के राशि परिवर्तन के साथ ही गोचरवश बुधादित्य-योग का निर्माण होगा। ऐसा संयोग बड़ा ही दुर्लभ होता है जब “महाशिवरात्रि” के दिन गोचरवश बुधादित्य योग बना हो।
प्रतिमाह होती है शिवरात्रि-
शास्त्रानुसार सभी तिथियों के अधिपति अर्थात् स्वामी होते हैं जैसे प्रतिपदा तिथि के अग्निदेव आदि इसी प्रकार चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं। अत: उनकी रात्रि में किया जाने वाला व्रत शिवरात्रि-व्रत कहलाता है। यह शिवरात्रि प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को होती है।
फ़ाल्गुन में ही क्यों होती है महाशिवरात्रि-
जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है कि "शिवरात्रि" प्रत्येक माह में आती है फ़िर फ़ाल्गुन मास में आने वाली शिवरात्रि को "महाशिवरात्रि" के रूप में मान्यता क्यों दी जाती है? इस प्रश्न का समाधान हमें ईशानसंहिता में वर्णित "शिवलिंगतयोद्भूत" कोटिसूर्यसमप्रभ:" इस सूत्र में प्राप्त होता है जिसके अनुसार शिव के ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को हुई थी इसलिए फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आने वाली शिवरात्रि को "महाशिवरात्रि" की मान्यता प्रदान की गई है।
कैसे मनाएं महाशिवरात्रि-
आज के दिन साधक कुछ विशेष प्रयोग कर अपने जीवन में लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
1. शिव जी का नर्मदाजल व गंगाजल से अभिषेक करें-
-जो साधक अपने जीवन में सुख-समृद्धि की कामना रखते हैं वे महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का नर्मदाजल या गंगाजल से अभिषेक करें।
- जो साधक अपने जीवन में यश की कामना रखते हैं वे महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का फलों के रस से अभिषेक करें।
- जो साधक अपने जीवन में धन एवं वैभव की कामना रखते हैं वे महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का गौदुग्ध से अभिषेक करें।
2. दरिद्रता नाश के लिए "दारिद्रय दहन स्तोत्र" से शिव जी अभिषेक करें-
-जो साधक आर्थिक संकट से ग्रस्त हों और अपने जीवन में धनागम एवं आर्थिक उन्नति चाहते हों अथवा कर्ज मुक्ति चाहते हों वे "महाशिवरात्रि" के दिन दारिद्रय-दहन स्तोत्र का पाठ करते हुए शिवजी का अभिषेक करें।
3. अपने जन्मनक्षत्रानुसार रुद्राक्ष धारण करें-
-जो साधक अपने जीवन में शिव कृपा की प्राप्ति चाहते हों वे महाशिवरात्रि के दिन अपने जन्म नक्षत्रानुसार रुद्राक्ष को शिवलिंग पर अर्पित कर उसके अभिषेक पश्चात उस रुद्राक्ष को लाल धागे या स्वर्ण में धारण करें
जन्मनक्षत्र-रुद्राक्ष
1. अश्विनी, मूल, मघा जन्मनक्षत्र वाले जातक नौमुखी रुद्राक्ष धारण करें।
2. भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा जन्मनक्षत्र वाले जातक छ: मुखी रुद्राक्ष धारण करें।
3. कृत्तिका, उत्तराषाढ़ा, उत्तराफाल्गुनी जन्मनक्षत्र वाले जातक ग्यारह मुखी रुद्राक्ष धारण करें।
4. रोहिणी, हस्त, श्रवण जन्मनक्षत्र वाले जातक दोमुखी रुद्राक्ष धारण करें।
5. धनिष्ठा, चित्रा, मृगशिरा जन्मनक्षत्र वाले जातक तीनमुखी रुद्राक्ष धारण करें।
6. आर्द्रा, शतभिषा, स्वाति जन्मनक्षत्र वाले जातक आठ या पांच मुखी रुद्राक्ष धारण करें।
7. पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद जन्मनक्षत्र वाले जातक पांच मुखी रुद्राक्ष धारण करें।
8. पुष्य, अनुराधा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती जन्मनक्षत्र वाले जातक सातमुखी, पांचमुखी व दोमुखी रुद्राक्ष का लाकेट धारण करें।
महाशिवरात्रि पर उपवास और रात्रि जागरण का महत्व जानिए
शिवरात्रि का कृष्ण पक्ष में आना भी साभिप्राय है। शुक्ल पक्ष में चंद्रमा पूर्ण होता है और कृष्ण पक्ष में क्षीण। उसकी वृद्धि के साथ-साथ संसार के संपूर्ण रसवान पदार्थों में वृद्धि और क्षय के साथ-साथ उनमें क्षीणता स्वाभाविक है।
अन्न में भी मादकता होती है। भोजन करने के बाद शरीर में आलस्य और तंद्रा का अनुभव प्रत्येक व्यक्ति करता है। अन्न ग्रहण न करने से शरीर चैतन्य और जागृत रहता है। परिणामस्वरूप जिस आध्यात्मिक अनुभूति और उपलब्धि के लिए शिव उपासना की जा रही है, उसमें कोई बाधा नहीं उत्पन्न होती।
भूख प्राणीमात्र की प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है। इसलिए भूख को सहन करना, तितिक्षा की वृद्धि करना है। यदि भूख पर विजय पा ली गई तो ऐसी अन्य आदतों पर विजय प्राप्त करना भी आसान हो जाता है, जो भूख के समान गहरी नहीं होतीं। इसे तेज धारा के विपरीत तैरने का प्रयोग भी समझना चाहिए।
रात्रि जागरण के संदर्भ में श्रीकृष्ण के इन वाक्यों की ओर ध्यान देना चाहिए
'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।'
अर्थात जब संपूर्ण प्राणी अचेतन होकर नींद की गोद में सो जाते हैं तो संयमी, जिसने उपवासादि द्वारा इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया हो, जागकर अपनेकार्यों को पूर्ण करता है। कारण साधना सिद्धि के लिए जिस एकांत और शांत वातावरण की आवश्यकता होती है, वह रात्रि से ज्यादा बेहतर और क्या हो सकती है।
यह भगवान शंकर की आराधना का प्रमुख दिन है। अन्य देवों का पूजन-अर्चन दिन में होता है, लेकिन भगवान शंकर को रात्रि क्यों प्रिय हुई और वह भी फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को? यह बात विदित है कि भगवान शंकर संहार शक्ति और तमोगुण के अधिष्ठाता हैं, अतः तमोमयी रात्रि से उनका स्नेह स्वाभाविक है। रात्रि संहारकाल की प्रतिनिधि है। उसका आगमन होते ही सर्वप्रथम प्रकाश का संहार, जीवों की दैनिक कर्म-चेष्टाओं का संहार और अंत में निद्रा द्वारा चेतनता का संहार होकर संपूर्ण विश्व संहारिणी रात्रि की गोद में अचेत होकर गिर जाता है। ऐसी दशा में प्राकृतिक दृष्टि से शिव का रात्रि प्रिय होना सहज ही हृदयंगम हो जाता है। यही कारण है कि भगवान शंकर की आराधना न केवल इस रात्रि में अपितु सदैव प्रदोष (रात्रि प्रारंभ होने पर) समय में भी की जाती है।
शिवरात्रि का कृष्ण पक्ष में आना भी साभिप्राय है। शुक्ल पक्ष में चंद्रमा पूर्ण होता है और कृष्ण पक्ष में क्षीण। उसकी वृद्धि के साथ-साथ संसार के संपूर्ण रसवान पदार्थों में वृद्धि और क्षय के साथ-साथ उनमें क्षीणता स्वाभाविक है। इस तरह क्रमशः घटते-घटते वह चंद्र अमावस्या को बिलकुल क्षीण हो जाता है। चराचर के हृदय के अधिष्ठाता चंद्र के क्षीण हो जाने से उसका प्रभाव संपूर्ण भूमंडल के प्राणियों पर भी पड़ता है। परिणामस्वरूप उनके अंतःकरण में तामसी शक्तियाँ प्रबुद्ध हो जाती हैं, जिनसे अनेक प्रकार के नैतिक एवं सामाजिक अपराधों का उदय होता है। इन्हीं शक्तियों को भूत-प्रेत आदि कहा जाता है।
ये शिवगण हैं, जिनके नियामक भूतभावन शिव हैं। दिन में जगत आत्मा सूर्य की स्थिति तथा आत्मतत्व की जागरूकता के कारण ये तामसी शक्तियां विशेष प्रभाव नहीं दिखा पातीं किंतु चंद्रविहीन अंधकारमयी रात्रि के आगमन के साथ ही इनकाप्रभाव प्रारंभ हो जाता है। जिस प्रकार पानी आने से पहले पुल बांधा जाता है, उसी प्रकार चंद्रक्षय तिथि आने से पहले उन तामसी शक्तियों को शांत करने के लिए इनके एकमात्र अधिष्ठाता भगवान आशुतोष की आराधना करने का विधान शास्त्रकारों ने किया है। यही कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में शिव आराधना करने का रहस्य है, परंतु कृष्ण पक्ष चतुर्दशी प्रत्येक मास में आती है, वे शिवरात्रि क्यों नहीं कहलातीं? फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी में ही क्या विशेषता है, जो इसे शिवरात्रि कहा जाता है?
जहां तक प्रत्येक मास की चतुर्दशी के शिवरात्रि कहलाने का प्रश्न है तो निश्चय ही वे सभी शिवरात्रि ही हैं और पंचांगों में उनके इसी नाम का उल्लेख भी किया गया है। यहां
इस अंतर को अधिक स्पष्ट करने के लिए यह जानना भी आवश्यक है कि फाल्गुन की इस शिवरात्रि को 'महाशिवरात्रि' के नाम से पुकारा जाता है। जिस प्रकार क्षयपूर्ण तिथि (अमावस्या) के दुष्प्रभाव से बचने के लिए उससे ठीक एक दिन पूर्व चतुर्दशी को यह उपासना की जाती है, उसी प्रकार क्षय होते हुए वर्ष के अंतिम मास से ठीक एक मास पूर्व इसका विधान शास्त्रों में मिलता है, जो सर्वथा युक्तिसंगत है।
सीधे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह पर्व वर्ष के उपान्त्य मास और उस मास की भी उपान्त्य रात्रि में मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त हेमंत में ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई अज्ञात सत्ता प्रकृति का संहार करने में जुटी हो। ऐसे में चारों ओर उजाड़-सा वातावरण तैयार हो जाता है। यदि इसके साथ भगवान शिव के रौद्र रूप का सामंजस्य बैठाया जाए तो अनुपयुक्त नहीं होगा। रुद्रों के एकादश संख्यात्मक होने के कारण भी यह पर्व 11वें मास में ही संपन्ना होता है, जो शिव के रुद्र स्वरूपों का प्रतीकरूप है।

शौर्यपथ / अक्सर आपने देखा होगा जन्म के समय कई नवजात बच्चों के शरीर पर बहुत अधिक बाल होते हैं। जो बाद में उनके माता-पिता के लिए टेंशन की वजह बन जाते हैं। बच्‍चे के शरीर पर कम या ज्यादा बाल उनके जीन पर निर्भर करते हैं। अगर बाकी अभिभावकों की तरह आप अपने नवजात के शरीर पर बाल देखकर चिंतित हैं, तो टेंशन छोड़ अपनाएं ये घरेलू उपाय, जिनकी मदद से आप शिशु के अनचाहे बालों से जल्द ही मुक्ति पा सकते हैं।

आटा और बेसन-
शिशु के शरीर से बाल हटाने के लिए आटे और बेसन को एक साथ गूथ लें। अब इस आटे को बच्चे के शरीर पर हल्के हाथों से मलें। ऐसा करने से बालों की जड़ मुलायम होगी और बाल अपने आप निकल जाएंगे।
बेबी ऑयल से मसाज-
रोजाना दिन में 2 बार सुबह और शाम बच्चे की मालिश हल्के हाथों से बेबी ऑयल से करें। ऐसा करने से बच्चे के शरीर के बाल कम होते हैं।
उबटन-
चंदन पाउडर, दूध और हल्‍दी पाउडर का पेस्‍ट बनाएं। इस पेस्ट को अपने बच्चे के शरीर पर उस जगह पर लगाएं जहां बाल दिखाई दे रहे हैं। बाल हटाने के लिये पेस्‍ट को शरीर पर धीरे-धीरे लगाएं। इसे बच्‍चे को नहलाने से कुछ घंटे पहले लगाएं। ऐसा कुछ हफ्तों तक करें।
जैतून तेल से करें मालिश -
बच्‍चे की मालिश जैतून के तेल से करने के बाद उसके शरीर पर लाल मसूर की दाल और दूध से बने पेस्‍ट को लगा कर धीरे-धीरे उन हिस्सों पर मालिश करें जहां पर बाल दिखाई दे रहे हैं। कुछ ही दिनों में आपको महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलेगा।
इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी शौर्यपथ की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

सेहत /शौर्यपथ /आपकी सेहत पर भोजन बनाने का तरीका ही नहीं बल्कि आप किस धातु के बर्तन में खाना खा रहे हैं, इसका भी असर पड़ता है। जैसे, सेहत के अनुसार प्लास्टिक के बर्तनों खाना खाना सेहत के लिए हानिकारक माना जाता है। कहा जाता है कि भाप के संपर्क में आने से प्लास्टिक से कई हानिकारक केमिकल निकलते हैं जिससे हमारा शरीर कई रोगों का शिकार हो सकता है। ऐसे में आइए, जानते हैं कि किस धातु के बर्तन में खाना खाने और बनाने के क्या फायदे और नुकसान हैं।
चांदी
सोने से विपरीत, चांदी एक ठंडी धातु है। अगर इस धातु से बने पात्र में आप भोजन कर रहे हैं, तो यह आपके शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है। चांदी भी आंखों के लिए फायदेमंद है। इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित करता है चांदी के बर्तन में भोजन करना।
लोहा
लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से शरीर की शक्ति बढ़ती है। लौह तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ाता है। इसके अलावा लोहा कई रोगों को भी खत्म करता है। यह शरीर में सूजन और पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को भी दूर रखता है। लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।
स्टील
अब यह एक ऐसी धातु है, जो अमूमन सभी घरों में बर्तन के रूप में पाई जाती है। आजकल मार्केट में बर्तन के नाम पर सबसे अधिक स्टील ही पाया जाता है। स्टील के संदर्भ में सब यह कहते हैं कि इस तरह के पात्र में भोजन करना नुकसानदेह होता है, लेकिन यह सच नहीं है। स्टील के बर्तन नुकसान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते हैं और ना ही ठंडे इसलिए ये किसी भी रूप में हानि नहीं पहुंचाते। लेकिन यह भी सच है कि इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुंचता, किंतु कोई नुकसान भी नहीं पहुंचता।
एल्यूमिनियम
बर्तनों की श्रेणी में एल्युमिनियम भी काफी प्रसिद्ध है। आज भी कई घरों में इस धातु के बर्तन मिल जाते हैं। एल्यूमिनियम बॉक्साइट का बना होता है, इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुकसान होता है। आयुर्वेद के अनुसार यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है, इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। एल्यूमिनियम से बने पात्र में भोजन करने से इससे हड्डियां कमजोर होती हैं, मानसिक बीमारियां होती हैं, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं। एल्यूमिनियम के प्रेशर कुकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं। तो यह बात साफ है कि इस बर्तन का प्रयोग बंद कर देना चाहिए।
मिट्टी
मिट्टी का बर्तन एकमात्र ऐसा पात्र है जिसमें भोजन करने से 1 प्रतिशत भी नुकसान नहीं होता। केवल फायदे ही फायदे मिलते हैं। मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त है मिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे 100 प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।

सेहत /शौर्यपथ / बीयर पीने के फायदे और नुकसान को लेकर हमेशा खबरें आती रहती हैं। दुनिया में कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहां बीयर को हेल्थ के लिए सेफ माना जाता है। इसके फायदे और नुकसानों पर समय-समय पर शोध होते रहते हैं। कई एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बीयर मे ऐंटीऑक्सिडेंट्स होते हैं जो हमें स्वस्थ रहने में मदद करते हैं और लंबी उम्र देते हैं। हालांकि इसका मतलब ये भी नहीं कि आप जितनी चाहें उतनी बीयर पी सकते हैं। यहां हैं बीयर से जुड़े कुछ फायदे और नुकसान।
ब्लड प्रेशर के मरीज दें ध्यान
अगर आप ब्लड प्रेशर के मरीज हैं तो किसी भी तरह का एल्कोहॉल लेने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए। खासकर अगर आपका ब्लड प्रेशर हाई रहता है। बीयर कुछ दवाओं के साथ मिलकर सिचुएशन बिगाड़ सकती है।
हेल्थ के लिए फायदेमंद विटमिन्स
कई स्टडीज में यह बात सामने आई है कि अगर आप सीमित मात्रा में बीयर लेते हैं तो यह दिल की बीमारियों से बचाती है। बीयर में गुड कॉलेस्ट्रॉल होता है। इसमें विटमिन बी6, विटमिन बी, फॉलिक एसिड और घुलनशील फैट्स होते हैं। ये आपकी हेल्थ के लिए अच्छे होते हैं।
लिवर और पैंक्रियाज के लिए नुकसानदायक
अगर आपको पहले से ही किसी तरह की दिल की बीमारी है तो बीयर नुकसान कर सकती है। वहीं किसी भी तरह का एल्कोहॉल अगर ज्यादा मात्रा में लिया जाता है तो यह आपके लिवर पर बहुत खराब असर डालता है। वहीं बीयर से पैंक्रियाज पर भी बुरा असर पड़ता है। अगर नींद ना आने की समस्या है तो भी बीयर ना पिएं ये आपकी स्लीप साइकल गड़बड़ कर सकती है। नींद गड़बड़ होने से आपकी शरीर के सारे फंक्शंस डिस्टर्ब हो सकते हैं साथ ही दिमाग पर भी बुरा असर पड़ता है। अगर बीयर पीने के शौकीन हैं तो यहां दी गई बातों का ध्यान जरूर रखें साथ ही सीमित मात्रा में बीयर लें।

खाना खजाना /शौर्यपथ / आपने सादी कचौड़ी और पूड़ी तो कई बार खाई होगी लेकिन क्या आपने नारियल पूड़ी ट्राई की है? अगर नहीं? तो देर किस बात की! जान लें रेसिपी-
सामग्री :
2 कप आटा टेबलस्पून नारियल पाउडर
1/4 टीस्पून इलायची पाउडर
चीनी स्वादानुसार
2 टेबलस्पून घी
तेल जरुरत के अनुसार
विधि :
सबसे पहले एक बर्तन में आटा, इलायची पाउडर, नारियल और घी डालकर मिक्स करें।
एक बर्तन में चीनी और पानी डालकर घोल बना लें।
फिर इस घोल से सख्त आटा गूंद लें।
गूंदे हुए आटे पर हल्का सा तेल लगाकर लगभग 15 मिनट के लिए अलग रख दें।
इस बीच मीडियम आंच पर पैन में तेल डालकर गरम करने के लिए रख दें।
तय समय के बाद गूंदे हुए आटे की लोइयां तोड़ लें।
एक लोई पर हल्का-सा तेल लगाकर इन्हें पूरी जितना बेल लें।
इसी तरह से सारी पूड़ी बेलकर एक प्लेट पर रख लें।
तेल के गरम होते ही एक-एक करके सभी पूड़ी तल लें।
तैयार है नारियल पूरी। गरमागरम सर्व करें।

आस्था /शौर्यपथ / चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी।
शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा।
बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बिल्वपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची।
शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली- 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।'
शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया।
कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया- 'हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया।
दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई।
तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली- 'हे शिकारी! मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।'
शिकारी हंसा और बोला- 'सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे।'
उत्तर में हिरणी ने फिर कहा- जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करो, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।
हिरणी का दुखभरा स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला- ' हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।'
मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा- 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।'
शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया।
थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।
अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर शिकारी को मोक्ष और शिवलोक की प्राप्ति हुई।

आस्था /शौर्यपथ /माह में 2 एकादशियां होती हैं अर्थात आपको माह में बस 2 बार और वर्ष के 365 दिनों में मात्र 24 बार ही नियमपूर्वक एकादशी व्रत रखना है। हालांकि प्रत्येक तीसरे वर्ष अधिकमास होने से 2 एकादशियां जुड़कर ये कुल 26 होती हैं। माघ माह में जया एवं फाल्गुन में विजया एकादशी आती हैं। विजया एकादशी व्रत फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इस बार यह व्रत 9 मार्च 2021
मंगलवार को रखा जाएगा।
1. विजया एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति भयंकर से भी भयंकर परेशानी से छुटकारा पा जाता है।
2. इससे श‍त्रुओं का नाश होता है। अर्थात व्यक्ति को कभी भी शत्रु पीड़ा नहीं सताती है। यह अपने नाम के अनुरूप फल भी देती है। इस दिन व्रत धारण करने से व्यक्ति को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है व जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है।
3. एकादशी के व्रत रखने से चंद्र ग्रह शुभ होकर अच्‍छे फल देने लगता है, जिससे व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ बना रहता है।
4. एकादशी के व्रत से व्यक्ति अशुभ संस्कारों को भी नष्ट कर सकता हैं। इसे समस्त पापों का हरण करने वाली तिथि भी कहा जाता है।
5. पुराणों अनुसार जो व्यक्ति एकादशी करता रहता है वह जीवन में कभी भी संकटों से नहीं घिरता और उनके जीवन में धन और समृद्धि बनी रहती है। यह व्रत जीवन में सफलता पाने और मनोकामना को पूरा करने के लिए विशेष रूप से किया जाता है।
7. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन में व्रत करने से पूजा का तीन गुना फल मिलता है।
8. कहा जाता है कि लंका विजय के लिए भगवान श्रीराम ने भी इसी दिन समुद्र किनारे पूजा की थी।
9. विजया एकादशी का श्रीराम और उनकी सेना द्वारा व्रत रखने की कथा श्रीकृष्‍ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी।
10. पद्मपुराण अनुसार इस एकादशी पर व्रत रखने से व्यक्ति पर किसी भी प्रकार के संकट नहीं आते हैं और साभी कार्य आसानी से पूर्ण हो जाते हैं।
एकादशी तिथि आरंभ- 08 मार्च 2021 दिन सोमवार दोपहर 03 बजकर 44 मिनट से प्रारंभ।
एकादशी तिथि समाप्त- 09 मार्च 2021 दिन मंगलवार दोपहर 03 बजकर 02 मिनट पर समाप्त।
विजया एकादशी पारणा मुहूर्त- 10 मार्च को सुबह 06:37:14 से 08:59:03 तक।

टिप्स टिक्स /शौर्यपथ / त्वचा को खूबसूरत और चमकदार बनाने की जब भी बात आती है, तो चंदन पावडर का जिक्र जरूर होता है जिसका प्रयोग बहुत पुराने समय से कई उपचारों के लिए किया जाता है। चंदन के इस्तेमाल से आप खूबसूरत और ग्लोइंग स्कीन पा सकते हैं। यह न केवल आपकी त्वचा को सॉफ्ट और चमकदार बनाता है, बल्कि त्वचा पर मौजूद दाग-धब्बों को दूर करने में भी कारगर है।

तो आइए जानते हैं चंदन पावडर के बेहतरीन फेसमास्क, जो आपको दे मनचाहा निखार।

त्वचा पर मौजूद कील-मुंहासों से अगर आप परेशान हैं, तो आपकी परेशानी का हल है चंदन पावडर का लेप। चंदन पावडर और गुलाब जल को समान मात्रा में मिला लें। अब इसे अपने पूरे चेहरे पर लगाकर कम से कम 15 मिनट के लिए छोड़ दें। यह आपकी त्वचा को ठंडक तो देगा ही, साथ ही त्वचा में मौजूद कील-मुंहासे भी धीरे-धीरे गायब हो जाएंगे।
एंटीएजिंग के लिए चंदन बहुत फायदेमंद है। आपको एंटीएजिंग फेसपैक बनाने के लिए अंडे का पीला भाग लेना है और इसमें आधा चम्मच शहद मिलाएं। अब इसमें 1 चम्मच चंदन पावडर मिला लें और इसे अपने पूरे चेहरे पर लगाकर कुछ समय तक के लिए छोड़ दें। जब यह सूख जाए तब धो लें। इससे चेहरा टाइट बनेगा और उसमें झुर्रियां नहीं पड़ेंगी।

कच्चे दूध में आधा चम्मच चंदन पावडर मिला लें। इसे अपने पूरे चेहरे पर लगाएं और 15 मिनट तक लगाकर छोड़ दें। जब यह सूख जाए तो हल्के हाथों से मसाज करते हुए इसे छुड़ा लें। यह त्वचा पर मौजूद टैनिंग को कम करने के लिए बहुत फायदेमंद है।
अगर आप चेहरे पर बार-बार पसीना आने से परेशान हैं तो आपकी यह परेशानी चंदन के फेसपैक से दूर हो सकती है। चंदन चेहरे पर ठंडक का अहसास करवाता है। आपको करना सिर्फ इतना है कि चंदन का पावडर लें। इसमें गुलाब जल और कच्चा दूध मिला लें। इसे अच्छी तरह से मिक्स करके अपने पूरे फेस पर लगाएं और कुछ देर बाद चेहरा साफ पानी से धो लें।

सेहत /शौर्यपथ /गर्मी के मौसम में पसीना। गर्मी से अधिकतर लोग परेशान रहते हैं लेकिन एक हेल्दी त्वचा के लिए पसीना आना जरूरी होता है। कई लोग मानते हैं कि पसीना आपकी त्वचा को तैलीय बनाता है और सभी छिद्रों को अवरुद्ध करता है, लेकिन यह सच नहीं है। वास्तव में यदि आप पसीना नहीं बहाते हैं तो इसका मतलब है कि आपके छिद्र पहले से ही भरे हुए हैं और आपकी त्वचा मुंहासे-ब्रेकआउट के लिए लगभग तैयार है।
जब आपको गर्मी लगती है और पसीना आता है तो आपको प्यास भी लगती है जिससे आप ज्यादा पानी पीते हैं। इससे आपकी त्वचा को कई तरह के फायदे पहुंचते हैं। आइए जानते हैं पसीना आपकी त्वचा के लिए फायदेमंद क्यों है।
1. टॉक्सिन निकालने में मदद करता है।
2. पसीना आपके शरीर के सभी हानिकारक विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। ये टॉक्सिन जब पसीने के रूप में नहीं निकलते हैं, तो त्वचा को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप मुंहासे व दाने होते हैं।
3. जब आपको पसीना आता है तो आपके शरीर से minerals and natural salt निकलता है, जो एक प्राकृतिक एक्सफोलिएटर की तरह काम करता है। यह रोम छिद्रों को साफ करता है और त्वचा में जमी गंदगी और अशुद्धियों को साफ करता है, साथ ही रूखी त्वचा और एलर्जी की समस्या को भी कम करता है।
4. चेहरे पर जमी गंदगी और अशुद्धियों को दूर करता है।
5. पसीना हमारे शरीर से सभी गंदगी और बची हुई मृत त्वचा कोशिकाओं को बाहर निकालने में मदद करता है, साथ ही त्वचा को साफ करता है।
6. पसीना आपकी त्वचा को फ्रेश महसूस कराता है। यदि आप कभी भी वर्कआउट करके या तेज चलने के 1 घंटे के बाद आईने में देखते हैं, तो आपकी त्वचा में एक अलग ही चमक नजर आती है। यह आपके चेहरे पर आए स्वेटिंग के कारण होता है, जो आपकी त्वचा में जमी गंदगी को साफ करता है।

आस्था / शौर्यपथ /महाशिवरात्रि पवित्र पर्व है। इस दिन शिव-पार्वती का पूजन कर विशेष फल प्राप्त किया जा सकता है। इस दिन सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भक्त अपनी कामना के अनुरूप शिव को चढ़ाएं विशेष वस्तुएं और शीघ्र पाएं मनोवांछित फल-
* महाशिवरात्रि पर शिवलिंग व मंदिर में शिव को गाय के कच्चे दूध से स्नान कराने पर विद्या प्राप्त होती है।
* शिव को गन्ने के रस से स्नान कराने पर लक्ष्मी प्राप्त होती है।
* भोलेनाथ को शुद्ध जल से स्नान कराने पर सभी इच्छाएं पूरी होती है।
* भगवान शिवलिंग पर बेलपत्र, अक्षत, दूध, फूल औल फल चढ़ाना चाहिए।
शिवरात्रि पर शिव आराधना से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस दिन व्रत का महत्व बताया गया है। शिव पूजा में आंकड़े के फूल व बिल्व पत्र का विशेष महत्व है।
थाली में कुंकू, हल्दी, गुलाल, अक्षत, जनेऊ के साथ अष्ट गंध या चंदन रखें। शिवलिंग को ॐ नमः शिवाय के उच्चारण के साथ जल चढ़ाकर पंचामृत अभिषेक करें। जल अर्पण कर कुंकू आदि चढ़ाएं और आस्थानुसार भोग (बोर, मिठाई) अर्पण तथा आरती करें। हो सके तो पूजा-अर्चना के साथ भांग या मावे का श्रृंगार भी करें।
पूजा में आंकड़े का फूल, धतुरा, पुष्प, इत्यादि भी चढ़ाकर प्रार्थना करें। व्रतधारी श्रद्धालुओं को एक समय फलाहार करना चाहिए। शिवरात्रि पर रात्रि पूजा का खास महत्व है। श्रद्धालुओं को रूद्र, शिवाष्टक का भी पाठ करना चाहिए।
महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ शिव की पूजा आराधना की जाती है। सुख, शांति, धन, समृद्धि, सफलता, प्रगति, संतान, प्रमोशन, नौकरी, विवाह, प्रेम और बीमारी सभी के लिए महाशिवरात्रि में इन मंत्रों को अवश्य जपें।
महाशिवरात्रि से पहले हर सोमवार को जपें शिव के 15 मंत्र
शिव के 15 चमत्कारिक मंत्र-
1. ॐ शिवाय नम:
2. ॐ सर्वात्मने नम:
3. ॐ त्रिनेत्राय नम:
4. ॐ हराय नम:
5. ॐ इन्द्रमुखाय नम:
6. ॐ श्रीकंठाय नम:
7. ॐ वामदेवाय नम:
8. ॐ तत्पुरुषाय नम:
9. ॐ ईशानाय नम:
10. ॐ अनंतधर्माय नम:
11. ॐ ज्ञानभूताय नम:
12. ॐ अनंतवैराग्यसिंघाय नम:
13. ॐ प्रधानाय नम:
14. ॐ व्योमात्मने नम:
15. ॐ युक्तकेशात्मरूपाय नम:
इस शिव गायत्री मंत्र के साथ इन मंत्रों का जप अत्यंत शुभ फलदायक माना गया है।
शिव गायत्री मंत्र : ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्र प्रचोदयात्।।
आप किसी भी तरह के कर्ज में डूबे हुए हैं तो शिवजी को प्रणाम करते हुए 15 मंत्रों का जप करें। कर्ज निश्चित रूप से उतरेगा।
शिवरात्रि का अर्थ क्या है?
हिन्दू संस्कृति के आदिदेव भगवान शिव
भगवान शिव-महाकाल का महात्म्य
पुराणों में, वेदों में और शास्त्रों में भगवान शिव-महाकाल के महात्म्य को प्रतिपादित किया गया है। भगवान शिव हिन्दू संस्कृति के प्रणेता आदिदेव महादेव हैं। हमारी सांस्कृतिक मान्यता के अनुसार 33 करोड़ देवताओं में 'शिरोमणि' देव शिव ही हैं। सृष्टि के तीनों लोकों में भगवान शिव एक अलग, अलौकिक शक्ति वाले देव हैं।
भगवान शिव पृथ्वी पर अपने निराकार-साकार रूप में निवास कर रहे हैं। भगवान शिव सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान हैं। महाशिवरात्रि पर्व भगवान शिवशंकर के प्रदोष तांडव नृत्य का महापर्व है। शिव प्रलय के पालनहार हैं और प्रलय के गर्भ में ही प्राणी का अंतिम कल्याण सन्निहित है। शिव शब्द का अर्थ है 'कल्याण' और 'रा' दानार्थक धातु से रात्रि शब्द बना है, तात्पर्य यह कि जो सुख प्रदान करती है, वह रात्रि है।
'शिवस्य प्रिया रात्रियस्मिन व्रते अंगत्वेन विहिता तदव्रतं शिवरात्र्‌याख्याम्‌।'
इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है, वह रात्रि जो आनंद प्रदायिनी है और जिसका शिव के साथ विशेष संबंध है। शिवरात्रि, जो फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को है, उसमें शिव पूजा, उपवास और रात्रि जागरण का प्रावधान है। इस महारात्रि को शिव की पूजा करना सचमुच एक महाव्रत है।
ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि के व्रत पर भगवान शिव की भक्ति, दर्शन, पूजा, उपवास एवं व्रत नहीं रखता, वह सांसारिक माया, मोह एवं आवागमन के बंधन से हजारों वर्षों तक उलझा रहता है। यह भी कहा गया है कि जो शिवरात्रि पर जागरण करता है, उपवास रखता है और कहीं भी किसी भी शिवजी के मंदिर में जाकर भगवान शिवलिंग के दर्शन करता है, वह जन्म-मरण पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति पा जाता है।
शिवरात्रि के व्रत के बारे में पुराणों में कहा गया है कि इसका फल कभी किसी हालत में भी निरर्थक नहीं जाता है।
शिवरात्रि का व्रत सबसे अधिक बलवान है। भोग और मोक्ष का फलदाता शिवरात्रि का व्रत है। इस व्रत को छोड़कर दूसरा मनुष्यों के लिए हितकारक व्रत नहीं है। यह व्रत सबके लिए धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकाम भाव रखने वाले सांसारिक सभी मनुष्य, वर्णों, आश्रमों, स्त्रियों, पुरुषों, बालक-बालिकाओं तथा देवता आदि सभी देहधारियों के लिए शिवरात्रि का यह श्रेष्ठ व्रत हितकारक है।
शिवरात्रि के दिन प्रातः उठकर स्नानादि कर शिव मंदिर जाकर शिवलिंग का विधिवत पूजन कर नमन करें। रात्रि जागरण महाशिवरात्रि व्रत में विशेष फलदायी है।
गीता में इसे स्पष्ट किया गया है-
या निशा सर्वभूतानां तस्या जागर्ति संयमी।
यस्यां जागृति भूतानि सा निशा पश्चतो सुनेः॥
- तात्पर्य यह कि विषयासक्त सांसारिक लोगों की जो रात्रि है, उसमें संयमी लोग ही जागृत अवस्था में रहते हैं और जहां शिव पूजा का अर्थ पुष्प, चंदन एवं बिल्वपत्र, धतूरा, भांग आदि अर्पित कर भगवान शिव का जप व ध्यान करना और चित्त वृत्ति का निरोध कर जीवात्मा का परमात्मा शिव के साथ एकाकार होना ही वास्तविक पूजा है।
शिवरात्रि में चार प्रहरों में चार बार अलग-अलग विधि से पूजा का प्रावधान है। महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में भगवान शिव की ईशान मूर्ति को दुग्ध द्वारा स्नान कराएं, दूसरे प्रहर में उनकी अघोर मूर्ति को दही से स्नान करवाएं और तीसरे प्रहर में घी से स्नान कराएं व चौथे प्रहर में उनकी सद्योजात मूर्ति को मधु द्वारा स्नान करवाएं। इससे भगवान आशुतोष अतिप्रसन्न होते हैं।
प्रातःकाल विसर्जन और व्रत की महिमा का श्रवण कर अमावस्या को निम्न प्रार्थना कर पारण करें -
संसार क्लेश दग्धस्य व्रतेनानेन शंकर।
प्रसीद समुखोनाथ, ज्ञान दृष्टि प्रदोभव॥
- तात्पर्य यह कि भगवान शंकर! मैं हर रोज संसार की यातना से, दुखों से दग्ध हो रहा हूं। इस व्रत से आप मुझ पर प्रसन्न हों और प्रभु संतुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।
'ॐ नमः शिवाय' कहिए और देवादिदेव प्रसन्न होकर सब मनोरथ पूर्ण करेंगे। शिवरात्रि के दिन शिव को ताम्रफल (बादाम), कमल पुष्प, अफीम बीज और धतूरे का पुष्प चढ़ाना चाहिए एवं अभिषेक कर बिल्व पत्र चढ़ाना चाहिए।

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