July 25, 2026
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    शिक्षा /शौर्यपथ /आचार्य चाणक्य ने नीति शास्त्र में स्त्री व पुरुष से जुड़ी कई नीतियों का वर्णन किया है। वैवाहिक जीवन को आसान व सरल बनाने वाली इन नीतियों का आज भी लोग पालन करते हैं। चाणक्य ने एक नीति में बताया है कि किन गुणों वाली स्त्री के साथ कभी नहीं रहना चाहिए। जानिए चाणक्य के अनुसार, कैसी पत्नी होती है अच्छी।
    1. कौन होती है अच्छी पत्नी- चाणक्य कहते हैं कि वह पत्नी अच्छी है जो मन से पवित्र होती है। जो पति से ही प्यार करे और पतिव्रता का पालन करती है। चाणक्य कहते हैं कि जिस पति को प्यार करने वाली पत्नी मिलती है, उसका जीवन सफल हो जाता है।
    2. कब होती है पत्नी की परीक्षा- चाणक्य कहते हैं कि जब आप किसी भरोसेमंद व्यक्ति को किसी खास काम के लिए भेजते हैं तो इस दौरान उसकी नियत का पता चलता है। जिस तरह से सुख-दुख में दोस्तों की पहचान होती है, ठीक उसी तरह से जब आपके पास धन, यश ना हो तो पत्नी की परीक्षा होती है।
    3. पत्नी का बलिदान करना चाहिए- चाणक्य के अनुसार, भारी संकट के लिए धन को बचाना चाहिए। इसके साथ ही पत्नी को भी बचाएं। लेकिन जब बात आत्मसम्मान की आए तो धन और पत्नी दोनों का बलिदान करने से हिचकना नहीं चाहिए।
    4. नहीं रहना चाहिए ऐसी स्त्री के साथ- चाणक्य के अनुसार, अगर आप किसी मूर्ख बालक को पढ़ा रहे हैं तो आप खुद मूर्ख बनरहे हैं। इसी तरह से अगर आप दुष्ट स्त्री के साथ रह रहे हैं तो आपका जीवन दुखों से भरता है और साथ ही आपके परिवार के लोगों का भी।
    5. नहीं रखती ऐसी स्त्री घर को सुखी- चाणक्य कहते हैं कि एक गलत राजा अपनी प्रजा को सुख नहीं दे सकता। ठीक उसी तरह से एक दुष्ट पत्नी कभी सुख और शांति घर को नहीं दे सकती है। इसलिए ऐसे घर में सुख का वास नहीं होता है।
    6. घर की रक्षा करती है ऐसी स्त्री- चाणक्य के अनुसार, अगर आपके जीवन में गुणवती महिला है तो आपके घर की रक्षा हमेशा होगी। जैसे धन कीर रक्षा धर्म करता है, ठीक उसी तरह से घर की रक्षा एक गुणवान स्त्री ही कर सकती है।

    औद्योगिक परियोजनाओं की त्वरित स्थापना हेतु वाणिज्य एवं उद्योग विभाग द्वारा विकसित कराया गया है यह मोबाइल एप, मोबाइल एप द्वारा उद्योगपति सीधे उद्योग विभाग से साझा कर सकेंगे जानकारी, प्रदेश में कुल 104 औद्योगिक इकाईयों द्वारा राज्य शासन के साथ किए गये हैं एम.ओ.यू., लगभग 42 हजार 500 करोड़ रूपये का पूँजी निवेश किया जाना प्रस्तावित : लगभग 65000 व्यक्तियों को उपलब्ध होगा रोजगार

    रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आज विधानसभा परिसर स्थित अपने कार्यालय कक्ष में प्रदेश में प्रस्तावित बड़ी औद्योगिक इकाईयों की मॉनिटरिंग हेतु मोबाइल एप लांच किया। प्रदेश में हजारों करोड़ की लागत से स्थापित किये जाने वाली औद्योगिक परियोजनाओं की त्वरित स्थापना हेतु वाणिज्य एवं उद्योग विभाग द्वारा यह मोबाइल एप विकसित कराया गया है। उद्योग मंत्री श्री कवासी लखमा भी इस अवसर पर उपस्थित थे।
    मोबाईल एप द्वारा उद्योगपति सीधे अपनी इकाई स्थापना के विभिन्न चरणों में विभिन्न विभागों एवं संस्थाओं से आवश्यक सम्मति, सहमति, पंजीयन, अनापत्ति हेतु लंबित आवेदनों की जानकारी उद्योग विभाग से साझा कर सकेंगे। उद्योग विभाग द्वारा एम.ओ.यू. करने वाली प्रत्येक इकाई हेतु वरिष्ठ अधिकारियों को रिलेशनशिप मैनेजर के रूप में नामांकित किया गया है | इन रिलेशनशिप अधिकारियों के माध्यम से इकाईयों के आवेदनों पर विभिन्न विभागों में त्वरित निष्पादन में मदद मिलेगी। यह मोबाईल एप एंड्रॉयड एवं एप्पल प्ले स्टोर पर भी उपलब्ध है।
    यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रदेश में कुल 104 औद्योगिक इकाईयों द्वारा राज्य शासन के साथ एम.ओ.यू.निष्पादित किया गया है जिसमें लगभग 42 हजार 500 करोड़ रूपये का पूँजी निवेश किया जाना प्रस्तावित है तथा लगभग 65000 व्यक्तियों को रोजगार उपलब्ध होगा। इन एम.ओ.यू. में प्रदेश के अति पिछड़े क्षेत्र बस्तर संभाग में 16 इकाईयाँ प्रस्तावित है जिनमें से 09 इकाईयों द्वारा उद्योग स्थापना हेतु कार्यवाही प्रारंभ कर दी गयी है। संपादित 104 एम.ओ.यू. में से 40 इकाईयों द्वारा उद्योग स्थापना की कार्यवाही प्रारंभ कर दी गई है एवं 01 इकाई में उत्पादन भी प्रारंभ कर उनके द्वारा अपने उत्पादों का अन्य देशों को निर्यात भी प्रारंभ कर दिया गया है। सम्पादित 104 एम.ओ.यू. में स्टील क्षेत्र में 76, फार्मास्युटिकल क्षेत्र में 04, साईकल निर्माण में 01, रक्षा क्षेत्र में 03 एवं इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र की 02 इकाईयां सम्मिलित हैं।
    उल्लेखनीय है कि प्रदेश के सरगुजा क्षेत्र में स्टील एवं एल्युमीनियम क्षेत्र में बड़े उद्योगों की स्थापना हेतु विभिन्न औद्योगिक निवेशकों द्वारा अभिरूचि प्रदर्शित की गई है । जिससे स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में प्रदेश के अति पिछड़े सरगुजा एवं बस्तर क्षेत्र में भी औद्योगिक गतिविधियों में तेजी आएगी एवं स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध होगा। इसके अतिरिक्त प्रदेश में वनोपज पर आधारित 15 इकाईयों द्वारा एम.ओ.यू. सम्पादित किया जाना प्रस्तावित है जिनमें 75 करोड़ रूपये का पूँजी निवेश एवं 1000 से अधिक व्यक्तियों को प्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध होगा।
    प्रदेश का त्वरित एवं समग्र औद्योगिक विकास मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल है। राज्य सरकार की इस नीति की पूरे देश के उद्योग जगत में तारीफ हो रही है। जिसके अनुसरण में उद्योग विभाग एवं उद्योगों से संबंधित विभागों द्वारा सूचना तकनीकी क्षेत्र का उपयोग करते हुए कार्यवाही की जा रही है। इस हेतु प्रदेश के सिंगल विण्डो सिस्टम को और अधिक प्रभावी बनाया गया है एवं वरिष्ठअधिकारियों द्वारा परियोजनाओं के क्रियान्वयन की सतत् निगरानी की जा रही है। उद्योग स्थापना की प्रक्रिया को सुगम एवं सरल बनाने हेतु संबंधित विभागों द्वारा विभिन्न उद्योग संघों, व्यापारिक संगठनों एवं अन्य संबंधित संघों से लगातार संपर्क करते हुए प्रक्रियाओं को सरलीकृत करने का प्रयास किया जा रहा है।
    इस अवसर पर सीएसआईडीसी के प्रबंध निदेशक अरूण प्रसाद, वाणिज्य एवं उद्योग विभाग के संयुक्त सचिव अनुराग पाण्डेय एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारीगण के साथ टेकमेंट टेक्नालॉजी प्राईवेट लिमिटेड, भिलाई के डायरेक्टर मनीष अग्रवाल, रूपेश शर्मा, मनोज अग्रवाल, सुमीत अग्रवाल एवं रामभगत अग्रवाल उपस्थित थे।

    शौर्यपथ विशेष / सनातन धर्म में हर स्त्री को देवी और मां लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है पर इसके साथ ही शास्त्रों में कुछ विशेष लक्षणों वाली सुकन्या के बारे में बताया गया है। ऐसी कन्या बड़ी भाग्यशाली होती है। इनके भाग्य से ना सिर्फ पत‌ि के जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है बल्कि पूरा घर पर‌िवार खुशहाल और धनवान बना रहता है। वैसे तो हर बेटी अपने माता-पिता के लिये लकी ही होती है लेकिन सामुद्रिक शास्त्र में सौभाग्यशाली महिलाओं की कुछ विशेषताएं बतायी गयी हैं। आज हम आपको ऐसी भाग्यशाली सुकन्या की पहचान बता रहे हैं।
    1 हिरणी के जैसी आंखों वाली
    आंखो से व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ पता चला सकता है। शास्त्रों और ज्योतिष में नेत्र के स्वरूप के आधार पर गुण और भाग्य के बारे में बताया गया है जैसे कि ज‌‌िन स्‍त्र‌ियों की आंखें ह‌िरणी के समान और सफेद भाग के अंत में लाल‌िमा ल‌िए होती है वह बड़ी भाग्‍यशाली और सुख भोग पाने वाली होती है।
    2 जिह्वा से होती है सुकन्या की पहचान
    नारी के होंठ और जिह्वा का उसके जीवन में बड़ा महत्व है। जिस स्त्री के होंठ गुलाबी हो, जीभ लाल हो और वाणी में मधुरता हो। वह स्त्री स्वंय के साथ-साथ अपने परिवार के सुख का कारण होती है।नाभि 3 3 नाभि बताती है स्त्री की पहचान समुद्रशास्त्र के अनुसार जिस स्त्री की नाभि गोल होती है वह गुणवान होती है। आमतौर पर इनका स्वास्थ्य अच्छा रहता है और यह बुद्घिमान भी होती हैं। इनके हृदय में दया की भावना रहती है और दयालु होती है। इसलिए यह जहां भी और जिस परिवार में होती है सम्मान पाती है। जिनकी पत्नी ऐसी होती है उनका वैवाहिक जीवन आमतौर पर सुखमय रहता है। नाभ‌ि के नीचे त‌िल या मस्सा होना भी स्‍त्री के भाग्‍यशाली और सुखी जीवन का संकेत माना जाता है।
    3 नाक के अग्र भाग में तिल हो
    जिस नारी की नाक के अग्र भाग में तिल हो, नाक की बनावट सुन्दर हो और सूंघने की क्षमता अधिक हो। वह महिलायें अपने गुणों के कारण पूजी जाती हैं। उनका जीवन ऐशो-आराम में व्यतीत होता है।
    4 ऐसे होते है सुकन्या के पैर
    महिलाओं के पैरों में कमल, चक्र व शंख का चिन्ह उन्हे परम भाग्यशाली बनाता है। ऐसे स्त्रियां या तो स्वयं उच्चाधिकारी होती है या फिर किसी उच्चाधिकारी, व्यापारी या राजनेता की पत्नी होकर सुख भोगती है। साथ ही जिन स्त्रियों के पैर का अंगूठा उठा हुआ, गोल, मॉसल और लालिमा लिये हो तो वे महिलायें काफी भाग्याशाली होती है। ऐसी स्त्रियों हमेशा भौतिक सुखों का भोग करके एक बेहतरीन जीवन जीती है।
    5 गालों पर पड़ते हैं गढ्ढे
    गालों पर पडऩे वाले गढ्ढ़े ना सिर्फ चेहरे का आकर्षण बढ़ाते हैं बल्कि ये शुभ भी मान जाते हैं। जिस महिला के हंसते समय गालों में गडढे या डिम्पल पड़ते हो, वह स्त्री तेज-तर्रार, विवेकवान होती है। वह अपनी बुद्धि व क्रिया-कलापों से सबके दिल में जल्द ही अपना स्थान बना लेती है।
    6 दाहिने गाल पर काला तिल हो
    समुद्रशास्त्र के अनुसार जिस नारी के दाहिने गाल पर काला तिल हो, वह स्त्री धनवान, वैभवशाली, एंव चरित्रवान होती है। ऐसी स्त्रियॉ अपनी आवश्यकताओं को नियन्त्रण में रखने वाली होती है। इन्हे भौतिक जगत की तमाम वस्तुओं का सुख भी प्राप्त होता है।

    रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की विशेष पहल पर छत्तीसगढ़ राज्य में भू-जल संरक्षण और संवर्धन के लिए संचालित नरवा (नाला) विकास योजना के जरिए राज्य के नदी-नालों और जल स्त्रोतों को पुनर्जीवित किया जा रहा है। राज्य में संचालित नरवा विकास योजना दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार की महत्वाकांक्षी सुराजी गांव योजना के नरवा, गुरवा, घुरवा, बाड़ी का एक घटक है। नरवा विकास के माध्यम से वर्षा जल को सहेजने के लिए तेजी से नालों का उपचार कराया जा रहा है।
    प्रथम चरण में छत्तीसगढ़ राज्य में 1385 नरवा (नाला) उपचार के लिए चिन्हित किए गए हैं। जिसमें से 1372 नालों में वर्षा जल की रोकथाम के लिए बोल्डर चेक, गली प्लग, ब्रश हुड, परकोलेशन टैंक जैसी संरचनाओं का निर्माण एवं उपचार कर पानी को रोकने और भू-जल स्तर बेहतर बनाने प्लान तैयार कर काम कराया जा रहा है।
    छत्तीसगढ़ राज्य में सुराजी गांव योजना के प्रमुख घटक नरवा (नाला) के तहत अब तक 1310 नालों में वर्षा जल को रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के 71 हजार 831 स्ट्रक्चर बनाए जाने की मंजूरी दी गई है, जिसमें से 51 हजार 742 स्ट्रक्चर का निर्माण हो चुका है। अभी 9 हजार 685 स्ट्रक्चर निर्माणाधीन है। लगभग दो सालों से छत्तीसगढ़ राज्य में भू-जल संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में किए जा रहे कार्याें का सकारात्मक परिणाम भी अब दिखाई देने लगा है।
    छत्तीसगढ़ राज्य में पानी को रोकने की इस मुहिम को केन्द्र सरकार ने न सिर्फ सराहा है, बल्कि सूरजपुर और बिलासपुर जिले को नेशनल वाटर अवार्ड से सम्मानित भी किया है। यह नेशनल वाटर अवार्ड बिलासपुर जिले को नदी-नालों के पुनरूद्धार के लिए और सूरजपुर जिले को जल संरक्षण के उल्लेखनीय कार्याें के लिए भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय की ओर से दिया गया।
    छत्तीसगढ़ राज्य के जिन-जिन क्षेत्रों में नरवा उपचार के काम हुए हैं, वहां भू-जल स्तर में आशातीत वृद्धि हुई है। नालों में जल भराव होने से किसान अब बेहतर तरीके से फसलोत्पादन के साथ-साथ साग-सब्जी की भी खेती करने लगे हैं। नालों के पानी को लिफ्ट करने से किसानों को सिंचाई की भी सुविधा मिली है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार की सुराजी गांव योजना के माध्यम से गांवों को विकसित और आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने की पहल की जा रही है । दरअसल यह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों का गांव गढ़ने की दिशा में बढ़ते कदम है। इसके माध्यम से नदी-नालों एवं पशुधन के संरक्षण और संवर्धन के साथ ही जैविक खेती को बढ़ावा देकर पौष्टिक खाद्यान्न, फल तथा सब्जी-भाजी के उत्पादन को बेहतर बनाना है, ताकि गांव आर्थिक रूप से समृद्ध हो सके। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने वर्धा के सेवा आश्रम में प्रार्थना सभा में कहा था कि हमारी दृष्टि दिल्ली के बजाय देहात की ओर होनी चाहिए। देहात हमारा कल्पवृक्ष है। कल्पवृक्ष हर इच्छाओं को पूरा करता है। छत्तीसगढ़ सरकार सुराजी गांव योजना के माध्यम से ग्रामीण संस्कृति, परंपरा और प्राकृतिक संसाधनों को सहेज कर सशक्त, खुशहाल और समृद्ध गांव गढ़ रही है।

    जांजगीर-चांपा / शौर्यपथ / जांजगीर-चांपा जिले के विकासखंड सक्ती के ग्राम पतेरापाली निवारी श्री डोलप्रसाद को उनके द्वारा वर्षो से काबिज वन भूमि का मालिकाना हक मिल गया। अब वह पूरे परिवार के साथ बेफिक्र होकर खेती बाड़ी कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। भूमि से बेदखली का डर खत्म हो गया है। राज्य सरकार ने वनवासियों को उनका हक दिला दिया। सरकार की योजना के तहत जीवन यापन के लिए वन भूमि पर वर्षों से काबिज क्षेत्र का वन अधिकार पट्टा वनवासियों को दिया जा रहा है। वर्षों से काबिज 0.182 हेक्टेयर भूमि का अब मालिकाना हक मिलने से डोलप्रसाद के परिवार में खुशी का माहौल है।
    श्री डोलप्रसाद ने बताया कि विगत 30 वर्ष से जिस भूमि पर खेती बाड़ी व मकान बनाकर कर रह रहे थे। राज्य सरकार ने उस भूमि का मालिक बना दिया है। जिस जंगल को हमने खेती, बाड़ी और रहने लायक बनाया उस पर हम वनवासियों का हक है। सरकार ने हमारा हक दिला दिया। श्री डोलप्रसाद ने राज्य सरकार को धन्यवाद देते हुए कहा कि जमीन का पट्टा मिलने से समाज में उनका सम्मान बढ़ा है। अब जमीन से बेदखली का डर नहीं है। भूमिहीन किसानों की गिनती में भी नही हैं। उन्होंने बताया कि वर्षों से काबिज भूमि सरकार के रिकार्ड में वन विभाग के नाम से दर्ज होने के कारण उन्हें बेदखली का भय रहता था। राज्य सरकार ने उन्हें वन अधिकार पट्टा देकर चिंता से मुक्त कर दिया है।

        शौर्यपथ / भारतीय शास्त्रीय परंपरा की विधाओं पर आधारित 47वां खजुराहो नृत्य समारोह  इस बार मध्यप्रदेश के खजुराहो के कंदरिया महादेव मंदिर के स्थान पर पश्चिमी मंदिर समूह के अंदर 2० से 26 फरवरी तक आयोजित किया गया है।

    आधिकारिक जानकारी के अनुसार 47वां खजुराहो नृत्य समारोह 2० से 26 फरवरी तक पश्चिमी मंदिर समूह के अंदर होगा, जिसमें कलाकारों द्वारा प्रतिदिन शाम 7 बजे से प्रस्तुतियां दी जाएंगी। इससे दर्शकों को मंदिर की आभा के बीच कलाकारों के नृत्य प्रदर्शन को देखने का मौका मिलेगा।

    ऩृत्य समारोह में प्रवेश नि:शुल्क रहेगा। समारोह के दौरान प्रत्येक दिन म.प्र. पर्यटन की साहसिक गतिविधियां भी होंगी। इसके अलावा कार्यक्रम स्थल पर नेपथ्य, कलावातार्, आर्ट मार्ट, ललित कला प्रदर्शनी, चल चित्र और लोकोत्सव भी दर्शकों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहेंगे। यहां कला परंपरा का मेला “हुनर“, टेराकोटा प्रदर्शनी “समष्टि“ और बुंदेली व्यंजनों का मेला “स्वाद“ भी लगाया जाएगा।

    इस समारोह में पहले दिन 2० फरवरी को गीता चन्द्रन एवं साथी भरतनाट्यम समूह और दीपक महाराज कथक की प्रस्तुति देंगे जबकि 21 फरवरी को ऐश्वयार् वारियर द्वारा मोहिनीअट्टम, मीरनन्दा बारठाकुर, उत्पला हुकइ, अलिगुंजन कलिता मुदियार और चंद्रानी कलिता ओझा द्वारा सत्रिया-कथक युगल और अरूणा मोहंती एवं साथी कलाकार ओडिसी समूह नृत्य प्रस्तुत करेंगे।

    समारोह के अंतिम दिन 26 फरवरी को जवाहरलाल नेहरू मणिपुर डांस अकादमी द्वारा मणिपुरी समूह, आयार् नंदे ओडिसी और पूर्णिमा अशोक एवं साथी कलाकार भरतनाट्यम समूह नृत्य प्रस्तुत करेंगे।

     

    लाइफस्टाइल /शौर्यपथ /'धरती के सबसे बड़े लिटरेरी शो' और 'साहित्य का कुंभ' कहे जाने वाले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2०21 के 14वें संस्करण का शुभारम्भ शुक्रवार, को नए वचुर्अल प्लेटफॉर्म पर होगा। फेस्टिवल के शुभारम्भ साइंस म्यूजियम ग्रुप के डायरेक्टर एवं चीफ एग्जीक्यूटिव सर इआन ब्लेचफोर्ड और साइंस म्यूजियम लंदन के हेड ऑफ कलेक्शन एवं प्रिंसिपल क्यूरेटर डॉ. टिली ब्लीथ द्वारा द आर्ट ऑफ इनोवेशन विषय पर उद्घाटन संभाषण से होगा।
    फेस्टिवल में इस साल 3०० लेखक एवं कलाकार शिरकत करेंगे। ये लगभग 25 भारतीय और 18 अंतरार्ष्ट्रीय भाषाओँ के साथ 23 से ज्यादा देशों का प्रतिनिधित्व करेंगे। इनमें नोबेल पुरस्कार, मैन बुकर, पुलित्जर, साहित्य अकादेमी, डीएससी प्राइज और जेसीबी प्राइज विजेता शामिल हैं।
    सूत्रों ने बताया कि भारत की संपन्न, वैविध्यपूर्ण और रंगीन साहित्यिक विरासत जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के 14वें संस्करण का केंद्र है, इसलिए फेस्टिवल में देश के विविध भाषाओँ के वक्ता शामिल होंगे। इस साल फेस्टिवल में हिंदी, उदूर्, मलयालम, असमी, संस्कृत, ब्रज, बंगाली, तमिल, तेलुगु, ओड़िया, भोजपुरी, खासी, कश्मीरी, राजस्थानी, पंजाबी, संथाली, बोडो, मणिपुरी, सिन्धी, नेपाली, मराठी, कोंकणी, गुजराती, डोगरी और कन्नड़ बोलने वाले वक्ता शामिल होंगे।
    फेस्टिवल में बड़ी संख्या में विदेशी भाषाओँ के वक्ता भी अपनी बात रखेंगे जिनमें प्रमुख रूप से अंग्रेजी, इतालवी, आयरिश, नेपाली, डच, एस्तोनियन, भूटानी, सिंहला, अफ्रीकी, पोलिश, रूसी, हीब्रू, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश, स्वीडिश, वेल्श, कुर्दिश इत्यादि शामिल है।

    टिप्स ट्रिक्स /शौर्यपथ /बालों का झड़ना आज के समय में एक आम समस्या है। फिर चाहे वह पुरूष हो या महिला, बालों के कमजोर होने और झड़ने के कारण अधिकतर लोगों को समय से पहले ही गंजापन या फिर पतले बालों की समस्या का सामना करना पड़ता है। हो सकता है कि आप भी इसी तरह की समस्या से ग्रस्त हों, लेकिन आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। आज हम आपको कुछ ऐसे कैफीन हेयर मास्क के बारे में बता रहे हैं, जो आपके बालों को शाइनी बनाने के साथ−साथ मजबूती प्रदान करते हैं और बालों के झड़ने की समस्या को कम करते हैं−
    कॉफी पाउडर और नारियल का तेल मास्क
    हेयर केयर एक्सपर्ट बताते हैं कि कॉफी हेयर मास्क आपके बालों की जड़ों को उत्तेजित करने और उनकी बनावट में सुधार करने में मदद करता है। जिसके कारण बालों के झड़ने को रोकने के साथ−साथ उसके विकास को बढ़ावा देने में मदद मिलती है। आप इसे नारियल के तेल के साथ मिक्स करके हेयर पैक बना सकते हैं। इस मास्क को तैयार करने के लिए, कम तापमान पर एक चौथाई कप नारियल के तेल को गर्म करें और इसमें 1 बड़ा चम्मच भुना हुआ कॉफी बीन्स मिलाएं। इसके बाद बालों को वॉश करने के बाद इसे बालों में लगाएं।
    कॉफी, शहद और ऑलिव ऑयल मास्क
    हेयर केयर एक्सपर्ट के अनुसार, यह मास्क ऑलिव और शहद दोनों को मॉइस्चराइजिंग गुण के कारण बालों को हाइड्रेटेड करता है। अगर आपके बाल रूखे और बेजान हैं तो ऐसे में आप इस मास्क को अप्लाई करके उन्हें नमी प्रदान करता है। साथ ही हेयर फॉल की समस्या को भी कम करता है। इसके लिए आप एक चम्मच कॉफी पाउडर में एक बड़ा चम्मच शहद और जैतून का तेल लें। सामग्री को अच्छी तरह से मिलाएं और एक चिकना पेस्ट बनाएं। अब इस मास्क को बालों पर जड़ से सिरे तक लगाएं और इसे कम से कम आधे घंटे के लिए बैठने दें। आखिरी में एक हल्के शैम्पू के साथ बालों को वॉश करें।
    कॉफी व एग यॉक मास्क
    अंडे की जर्दी विटामिन, आयरन, सोडियम और लेक्टिन से भरपूर होती है। जिसके कारण यह डैमेज्ड हेयर को रिपेयर करने में मददगार है। यह ऑयली स्कैल्प को रेग्युलेट करके डल हेयर को एक बार फिर से शाइनी बनाता है। इस हेयर मास्क को बनाने के लिए, एक अंडे की जर्दी के साथ एक चम्मच कॉफी पाउडर मिलाएं और पेस्ट बनाएं। पेस्ट को अपने स्कैल्प और बालों पर लगाएं, पांच मिनट तक मसाज करें। इसे एक घंटे के लिए बैठने दें और गुनगुने पानी और एक हल्के शैम्पू से धो लें।

    खाना खजाना /शौर्यपथ / पालक को सेहत के लिए बेहद अच्छा माना जाता है। यह आपको सिर्फ आयरन ही नहीं देता, बल्कि इस हरी पत्तेदार सब्जी से आपको अन्य भी कई पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। आमतौर पर पालक को घरों एक−दो तरह से ही बनाया जाता है। लेकिन अगर आप एक ही तरह से पालक खा−खाकर बोर हो गई हैं और अब उसे एक टि्वस्ट के साथ खाना चाहती हैं तो ऐसे में आप लंच टाइम में हरियाली गोभी बना सकती हैं। पालक और गोभी की मदद से बनने वाली यह सब्जी जितनी हेल्दी होती है, इसका स्वाद भी उतना ही लाजवाब होता है। तो चलिए जानते हैं हरियाली गोभी बनाने का तरीका−
    सामग्री−
    2 कप फूलगोभी कटी हुई
    500 ग्राम पालक, धोया और कटा हुआ
    हल्दी पाउडर
    गरम मसाला पाउडर
    नमक
    एक टमाटर कटा हुआ या प्यूरी
    लहसुन
    अदरक
    हरी मिर्च
    जीरा
    दालचीनी पाउडर
    जीरा पाउडर
    2 बड़े चम्मच ताजा क्रीम
    1 बड़ा चम्मच मक्खन
    बनाने की विधि−
    हरियाली गोभी बनाने के लिए सबसे पहले हम हरियाली मसाला तैयार करेंगे। इसके लिए एक प्रेशर कुकर में मक्खन गरम करें। अब इसमें कुछ सेकंड के लिए जीरा, लहसुन डालकर सॉटे करें। दालचीनी, हरी मिर्च, पलाक, टमाटर, जीरा पाउडर, गरम मसाला पाउडर, हल्दी पाउडर और जीरा पाउडर डालें। कुछ सेकंड के लिए सॉटे करें। अब इसमें एक चम्मच पानी डालकर कुकर को कवर करें और एक सीटी आने तक पकाएं। जब पालक पूरी तरह से पक जाए तो इसे पूरा ठंडा होने दें और फिर ब्लेंडर की मदद से इसे पीस लें। अब एक कड़ाही में ऑयल लेकर उसमें फूलगोभी डालें। साथ ही हल्दी व नमक डालकर सॉटे करें। कुछ सेकंड के बाद कुछ पानी छिड़कें और इसे कवर करें और लगभग 5 मिनट तक पकाएं। एक बार गोबी पकने के बाद इसमें गरम मसाला में डालें और कुछ मिनटों तक भूनें और आँच बंद कर दें। अब क्रीम को पालक करी में डालें और एक सर्विंग बाउल में स्थानांतरित करें। रोस्टेड गोभी को पालक करी में रखें और हरियाली गोभी को गर्मागर्म सर्व करें।
    आप इसे रोटी या परांठे आदि के साथ बेहद आसानी से खा सकती हैं।

    धर्म संसार /शौर्यपथ /शनिवार की व्रत कथा ;- एक समय स्वर्गलोक में 'सबसे बड़ा कौन?' के प्रश्न पर नौ ग्रहों में वाद-विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ा कि परस्पर भयंकर युद्ध की स्थिति बन गई। निर्णय के लिए सभी देवता देवराज इंद्र के पास पहुँचे और बोले- 'हे देवराज! आपको निर्णय करना होगा कि हममें से सबसे बड़ा कौन है?' देवताओं का प्रश्न सुनकर देवराज इंद्र उलझन में पड़ गए।
    इंद्र बोले- 'मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूँ। हम सभी पृथ्वीलोक में उज्जयिनी नगरी में राजा विक्रमादित्य के पास चलते हैं।
    देवराज इंद्र सहित सभी ग्रह (देवता) उज्जयिनी नगरी पहुँचे। महल में पहुँचकर जब देवताओं ने उनसे अपना प्रश्न पूछा तो राजा विक्रमादित्य भी कुछ देर के लिए परेशान हो उठे क्योंकि सभी देवता अपनी-अपनी शक्तियों के कारण महान थे। किसी को भी छोटा या बड़ा कह देने से उनके क्रोध के प्रकोप से भयंकर हानि पहुँच सकती थी।
    अचानक राजा विक्रमादित्य को एक उपाय सूझा और उन्होंने विभिन्न धातुओं- स्वर्ण, रजत (चाँदी), कांसा, ताम्र (तांबा), सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे के नौ आसन बनवाए। धातुओं के गुणों के अनुसार सभी आसनों को एक-दूसरे के पीछे रखवाकर उन्होंने देवताओं को अपने-अपने सिंहासन पर बैठने को कहा।
    देवताओं के बैठने के बाद राजा विक्रमादित्य ने कहा- 'आपका निर्णय तो स्वयं हो गया। जो सबसे पहले सिंहासन पर विराजमान है, वहीं सबसे बड़ा है।'
    राजा विक्रमादित्य के निर्णय को सुनकर शनि देवता ने सबसे पीछे आसन पर बैठने के कारण अपने को छोटा जानकर क्रोधित होकर कहा- 'राजा विक्रमादित्य! तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा अपमान किया है। तुम मेरी शक्तियों से परिचित नहीं हो। मैं तुम्हारा सर्वनाश कर दूँगा।'
    शनि ने कहा- 'सूर्य एक राशि पर एक महीने, चंद्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक महीने, वृहस्पति तेरह महीने रहते हैं, लेकिन मैं किसी राशि पर साढ़े सात वर्ष (साढ़े साती) तक रहता हूँ। बड़े-बड़े देवताओं को मैंने अपने प्रकोप से पीड़ित किया है।
    राम को साढ़े साती के कारण ही वन में जाकर रहना पड़ा और रावण को साढ़े साती के कारण ही युद्ध में मृत्यु का शिकार बनना पड़ा। राजा! अब तू भी मेरे प्रकोप से नहीं बच सकेगा।'
    इसके बाद अन्य ग्रहों के देवता तो प्रसन्नता के साथ चले गए, परंतु शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहाँ से विदा हुए।
    राजा विक्रमादित्य पहले की तरह ही न्याय करते रहे। उनके राज्य में सभी स्त्री-पुरुष बहुत आनंद से जीवन-यापन कर रहे थे। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। उधर शनि देवता अपने अपमान को भूले नहीं थे।
    विक्रमादित्य से बदला लेने के लिए एक दिन शनिदेव ने घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और बहुत से घोड़ों के साथ उज्जयिनी नगरी पहुँचे। राजा विक्रमादित्य ने राज्य में किसी घोड़े के व्यापारी के आने का समाचार सुना तो अपने अश्वपाल को कुछ घोड़े खरीदने के लिए भेजा।.
    घोड़े बहुत कीमती थे। अश्वपाल ने जब वापस लौटकर इस संबंध में बताया तो राजा विक्रमादित्य ने स्वयं आकर एक सुंदर व शक्तिशाली घोड़े को पसंद किया।
    घोड़े की चाल देखने के लिए राजा उस घोड़े पर सवार हुए तो वह घोड़ा बिजली की गति से दौड़ पड़ा।
    तेजी से दौड़ता घोड़ा राजा को दूर एक जंगल में ले गया और फिर राजा को वहाँ गिराकर जंगल में कहीं गायब हो गया। राजा अपने नगर को लौटने के लिए जंगल में भटकने लगा। लेकिन उन्हें लौटने का कोई रास्ता नहीं मिला। राजा को भूख-प्यास लग आई। बहुत घूमने पर उसे एक चरवाहा मिला।
    राजा ने उससे पानी माँगा। पानी पीकर राजा ने उस चरवाहे को अपनी अँगूठी दे दी। फिर उससे रास्ता पूछकर वह जंगल से निकलकर पास के नगर में पहुँचा।
    राजा ने एक सेठ की दुकान पर बैठकर कुछ देर आराम किया। उस सेठ ने राजा से बातचीत की तो राजा ने उसे बताया कि मैं उज्जयिनी नगरी से आया हूँ। राजा के कुछ देर दुकान पर बैठने से सेठजी की बहुत बिक्री हुई।
    सेठ ने राजा को बहुत भाग्यवान समझा और खुश होकर उसे अपने घर भोजन के लिए ले गया। सेठ के घर में सोने का एक हार खूँटी पर लटका हुआ था। राजा को उस कमरे में छोड़कर सेठ कुछ देर के लिए बाहर गया।
    तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। राजा के देखते-देखते सोने के उस हार को खूँटी निगल गई।
    सेठ ने कमरे में लौटकर हार को गायब देखा तो चोरी का संदेह राजा पर ही किया क्योंकि उस कमरे में राजा ही अकेला बैठा था। सेठ ने अपने नौकरों से कहा कि इस परदेसी को रस्सियों से बाँधकर नगर के राजा के पास ले चलो।
    राजा ने विक्रमादित्य से हार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके देखते ही देखते खूँटी ने हार को निगल लिया था। इस पर राजा ने क्रोधित होकर चोरी करने के अपराध में विक्रमादित्य के हाथ-पाँव काटने का आदेश दे दिया। राजा विक्रमादित्य के हाथ-पाँव काटकर उसे नगर की सड़क पर छोड़ दिया गया।
    कुछ दिन बाद एक तेली उसे उठाकर अपने घर ले गया और उसे अपने कोल्हू पर बैठा दिया। राजा आवाज देकर बैलों को हाँकता रहता। इस तरह तेली का बैल चलता रहा और राजा को भोजन मिलता रहा। शनि के प्रकोप की साढ़े साती पूरी होने पर वर्षा ऋतु प्रारंभ हुई।
    राजा विक्रमादित्य एक रात मेघ मल्हार गा रहा था कि तभी नगर के राजा की लड़की राजकुमारी मोहिनी रथ पर सवार उस तेली के घर के पास से गुजरी। उसने मेघ मल्हार सुना तो उसे बहुत अच्छा लगा और दासी को भेजकर गाने वाले को बुला लाने को कहा।
    दासी ने लौटकर राजकुमारी को अपंग राजा के बारे में सब कुछ बता दिया। राजकुमारी उसके मेघ मल्हार से बहुत मोहित हुई। अतः उसने सब कुछ जानकर भी अपंग राजा से विवाह करने का निश्चय कर लिया।
    राजकुमारी ने अपने माता-पिता से जब यह बात कही तो वे हैरान रह गए। रानी ने मोहिनी को समझाया- 'बेटी! तेरे भाग्य में तो किसी राजा की रानी होना लिखा है। फिर तू उस अपंग से विवाह
    करके अपने पाँव पर कुल्हाड़ी क्यों मार रही है?'
    राजकुमारी ने अपनी जिद नहीं छोड़ी। अपनी जिद पूरी कराने के लिए उसने भोजन करना छोड़ दिया और प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया।
    आखिर राजा-रानी को विवश होकर अपंग विक्रमादित्य से राजकुमारी का विवाह करना पड़ा। विवाह के बाद राजा विक्रमादित्य और राजकुमारी तेली के घर में रहने लगे। उसी रात स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा- 'राजा तुमने मेरा प्रकोप देख लिया।
    मैंने तुम्हें अपने अपमान का दंड दिया है।' राजा ने शनिदेव से क्षमा करने को कहा और प्रार्थना की-
    'हे शनिदेव! आपने जितना दुःख मुझे दिया है, अन्य किसी को न देना।'
    शनिदेव ने कुछ सोचकर कहा- 'राजा! मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। जो कोई स्त्री-पुरुष मेरी पूजा करेगा, शनिवार को व्रत करके मेरी व्रतकथा सुनेगा, उस पर मेरी अनुकम्पा बनी रहेगी।
    प्रातःकाल राजा विक्रमादित्य की नींद खुली तो अपने हाथ-पाँव देखकर राजा को बहुत खुशी हुई। उसने मन ही मन शनिदेव को प्रणाम किया। राजकुमारी भी राजा के हाथ-पाँव सही-सलामत देखकर आश्चर्य में डूब गई।
    तब राजा विक्रमादित्य ने अपना परिचय देते हुए शनिदेव के प्रकोप की सारी कहानी सुनाई।
    सेठ को जब इस बात का पता चला तो दौड़ता हुआ तेली के घर पहुँचा और राजा के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा। राजा ने उसे क्षमा कर दिया क्योंकि यह सब तो शनिदेव के प्रकोप के कारण हुआ था।
    सेठ राजा को अपने घर ले गया और उसे भोजन कराया। भोजन करते समय वहाँ एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सबके देखते-देखते उस खूँटी ने हार उगल दिया। सेठजी ने अपनी बेटी का विवाह भी राजा के साथ कर दिया और बहुत से स्वर्ण-आभूषण, धन आदि देकर राजा को विदा किया।
    राजा विक्रमादित्य राजकुमारी मोहिनी और सेठ की बेटी के साथ उज्जयिनी पहुँचे तो नगरवासियों ने हर्ष से उनका स्वागत किया। अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि शनिदेव
    सब देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं। प्रत्येक स्त्री-पुरुष शनिवार को उनका व्रत करें और व्रतकथा अवश्य सुनें।
    राजा विक्रमादित्य की घोषणा से शनिदेव बहुत प्रसन्न हुए। शनिवार का व्रत करने और व्रत कथा सुनने के कारण सभी लोगों की मनोकामनाएँ शनिदेव की अनुकम्पा से पूरी होने लगीं। सभी लोग आनंदपूर्वक रहने लगे।
    किस तरह शनिदेव की पूजा अर्चना कर उन्हें खुश किया जाए. यह तो हम सभी जानते हैं कि शनि न्याय के देवता है. हमारे कर्मों का फल देने का पूरा कार्यभार शनि देव पर ही है लेकिन कई लोग शनिदेव को एक बुरे देवता के रूप में देखते हैं जो गलत है. शनि देव अगर किसी को उसके बुरे कार्यों की सजा देते हैं तो उसके अच्छे कार्यों के लिए उसका अच्छा फल भी देते हैं. शनि महान हैं उनकी छत्रछाया में आए हर इंसान का कल्याण होता है. तो चलिए पढ़ते हैं शनि व्रत कथा
    यह पूजा और व्रत शनिदेव को प्रसन्न करने हेतु होता है.
    काला तिल, तेल, काला वस्त्र, काली उड़द शनि देव को अत्यंत प्रिय है. इनसे ही पूजा होती है.
    शनि देव का स्त्रोत पाठ करें. शनिस्त्रोत
    शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के दिन शुरू कर सकते हैं परंतु श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारम्भ करना अति मंगलकारी है । इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए। शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवन्ती का फूल, तिल, तेल, गुड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए।
    शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए। इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए।
    शनि व्रत कथा
    एक समय सभी नवग्रहओं : सूर्य, चंद्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु में विवाद छिड़ गया, कि इनमें सबसे बड़ा कौन है? सभीआपसं ऎंल ड़ने लगे, और कोई निर्णय ना होने पर देवराज इंद्र के पास निर्णय कराने पहुंचे. इंद्र इससे घबरा गये, और इस निर्णय को देने में अपनी असमर्थता जतायी. परन्तु उन्होंने कहा, कि इस समय पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य हैं, जो कि अति न्यायप्रिय हैं. वे ही इसका निर्णय कर सकते हैं. सभी ग्रह एक साथ राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे, और अपना विवाद बताया। साथ ही निर्णय के लिये कहा। राजा इस समस्या से अति चिंतित हो उठे, क्योंकि वे जानते थे, कि जिस किसी को भी छोटा बताया, वही कुपित हो उठेगा. तब राजा को एक उपाय सूझा. उन्होंने सुवर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लौह से नौ सिंहासन बनवाये, और उन्हें इसी क्रम से रख दिय. फ़िर उन सबसे निवेदन किया, कि आप सभी अपने अपने सिंहासन पर स्थान ग्रहण करें. जो अंतिम सिंहासन पर बठेगा, वही सबसे छोटा होगा. इस अनुसार लौह सिंहासन सबसे बाद में होने के कारण, शनिदेव सबसे बाद में बैठे. तो वही सबसे छोटे कहलाये. उन्होंने सोच, कि राजा ने यह जान बूझ कर किया है. उन्होंने कुपित हो कर राजा से कहा “राजा! तू मुझे नहीं जानता. सूर्य एक राशि में एक महीना, चंद्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेड़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, व बुद्ध और शुक्र एक एक महीने विचरण करते हैं. परन्तु मैं ढाई से साढ़े-सात साल तक रहता हुं. बड़े बड़ों का मैंने विनाश किया है. श्री राम की साढ़े साती आने पर उन्हें वनवास हो गया, रावण की आने पर उसकी लंका को बंदरों की सेना से परास्त होना पढ़ा.अब तुम सावधान रहना. ” ऐसा कहकर कुपित होते हुए शनिदेव वहां से चले. अन्य देवता खुशी खुशी चले गये. कुछ समय बाद राजा की साढ़े साती आयी. तब शनि देव घोड़ों के सौदागर बनकर वहां आये. उनके साथ कई बढ़िया घड़े थे. राजा ने यह समाचार सुन अपने अश्वपाल को अच्छे घोड़े खरीदने की अज्ञा दी. उसने कई अच्छे घोड़े खरीदे व एक सर्वोत्तम घोड़े को राजा को सवारी हेतु दिया. राजा ज्यों ही उसपर बैठा, वह घोड़ा सरपट वन की ओर भागा. भषण वन में पहुंच वह अंतर्धान हो गया, और राजा भूखा प्यासा भटकता रहा. तब एक ग्वाले ने उसे पानी पिलाया. राजा ने प्रसन्न हो कर उसे अपनी अंगूठी दी. वह अंगूठी देकर राजा नगर को चल दिया, और वहां अपना नाम उज्जैन निवासी वीका बताया. वहां एक सेठ की दूकान उसने जल इत्यादि पिया. और कुछ विश्राम भी किया. भाग्यवश उस दिन सेठ की बड़ी बिक्री हुई. सेठ उसे खाना इत्यादि कराने खुश होकर अपने साथ घर ले गया. वहां उसने एक खूंटी पर देखा, कि एक हार टंगा है, जिसे खूंटी निगल रही है. थोड्क्षी देर में पूरा हार गायब था। तब सेठ ने आने पर देखा कि हार गायब जहै। उसने समझा कि वीका ने ही उसे चुराया है। उसने वीका को कोतवाल के पास पकड्क्षवा दिया। फिर राजा ने भी उसे चोर समझ कर हाथ पैर कटवा दिये। वह चैरंगिया बन गया।और नगर के बहर फिंकवा दिया गया। वहां से एक तेली निकल रहा था, जिसे दया आयी, और उसने एवीका को अपनी गाडी़ में बिठा लिया। वह अपनी जीभ से बैलों को हांकने लगा। उस काल राजा की शनि दशा समाप्त हो गयी। वर्षा काल आने पर वह मल्हार गाने लगा। तब वह जिस नगर में था, वहां की राजकुमारी मनभावनी को वह इतना भाया, कि उसने मन ही मन प्रण कर लिया, कि वह उस राग गाने वाले से ही विवाह करेगी। उसने दासी को ढूंढने भेजा। दासी ने बताया कि वह एक चौरंगिया है। परन्तु राजकुमारी ना मानी। अगले ही दिन से उठते ही वह अनशन पर बैठ गयी, कि बिवाह करेगी तोइ उसी से। उसे बहुतेरा समझाने पर भी जब वह ना मानी, तो राजा ने उस तेली को बुला भेजा, और विवाह की तैयारी करने को कहा।फिर उसका विवाह राजकुमारी से हो गया। तब एक दिन सोते हुए स्वप्न में शनिदेव ने रानजा से कहा: राजन्, देखा तुमने मुझे छोटा बता कर कितना दुःख झेला है। तब राजा नेउससे क्षमा मांगी, और प्रार्थना की , कि हे शनिदेव जैसा दुःख मुझे दिया है, किसी और को ना दें। शनिदेव मान गये, और कहा: जो मेरी कथा और व्रत कहेगा, उसे मेरी दशा में कोई दुःख ना होगा। जो नित्य मेरा ध्यान करेगा, और चींटियों को आटा डालेगा, उसके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे। साथ ही राजा को हाथ पैर भी वापस दिये। प्रातः आंख खुलने पर राजकुमारी ने देखा, तो वह आश्चर्यचकित रह गयी। वीका ने उसे बताया, कि वह उज्जैन का राजा विक्रमादित्य है। सभी अत्यंत प्रसन्न हुए। सेतठ ने जब सुना, तो वह पैरों पर गिर्कर क्षमा मांगने लगा। राजा ने कहा, कि वह तो शनिदेव का कोप था। इसमें किसी का कोई दोष नहीं। सेठ ने फिर भी निवेदन किया, कि मुझे शांति तब ही मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर भोजन करेंगे। सेठ ने अपने घर नाना प्रकार के व्यंजनों ने राजा का सत्कार किया। साथ ही सबने देखा, कि जो खूंटी हार निगल गयी थी, वही अब उसे उगल रही थी। सेठ ने अनेक मोहरें देकर राजा का धन्यवाद किया, और अपनी कन्या श्रीकंवरी से पाणिग्रहण का निवदन किया। राजा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुछ समय पश्चात राजा अपनी दोनों रानियों मनभावनी और श्रीकंवरी को साभी दहेज सहित लेकर उज्जैन नगरी को चले। वहां पुरवासियों ने सीमा पर ही उनका स्वागत किया। सारे नगर में दीपमाला हुई, व सबने खुशी मनायी। राजा ने घोषणा की , कि मैंने शनि देव को सबसे छोटा बताया थ, जबकि असल में वही सर्वोपरि हैं। तबसे सारे राज्य में शनिदेव की पूजा और कथा नियमित होने लगी। सारी प्रजा ने बहुत समय खुशी और आनंद के साथ बीताया। जो कोई शनि देव की इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं। व्रत के दिन इस कथा को अवश्य पढ़ना चाहिये।
    शनि की साढ़े सात वर्ष तक चलने वाली ग्रह दशा को साढ़े साती कहते हैं। साढ़े साती जीवन का वह चरण है जो हर व्यक्ति की पूरी जिंदगी में कम से कम एक या अधिक बार जरुर आती है। शनि ग्रह एक राशि से दूसरी राशि तक जाने में ढाई वर्ष का समय लेता है। एक राशि से दूसरी राशि तक जाते हुए शनि ग्रह किसी व्यक्ति की जन्म राशि या नाम की राशि में स्थित होता है, वह राशि, उससे अगली राशि और बारहवीं स्थान वाली राशि पर साढ़े साती का प्रभाव होता है। तीन राशियों से होकर गुजरने में इसे पूरे सात वर्ष और छः महीने मतलब साढ़े सात वर्ष का समय लगता है इसलिए भारतीय ज्योतिष के अनुसार इसे शनि की साढ़े साती कहते हैं।
    पुराणों की बात करें तो शनि को सूर्य का पुत्र और यमराज का भाई माना जाता है। ऐसा कहा जाता है की यदि यमलोक के अधिपति यमराज हैं, तो शनि वहां के दंडाधिकारी।
    हम लोग ऐसा सोचते हैं कि शनि केवल व्यक्ति को अशुभ फल ही देते हैं और जब तक इंसान पर शनि का प्रभाव होता है तब तक वह इन्सान हमेशा दुखी होता है। लेकिन सच में ऐसा नहीं है, शनिदेव हमेशा हर इन्सान को उसके कर्म के हिसाब से ही शुभ-अशुभ फल देते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर किसी इन्सान के कर्म अच्छे हैं तो शनि की अच्छी दृष्टि उस इन्सान पर जरुर पड़ती है जिससे उसके जीवन के सभी कष्ट खत्म हो जाते हैं और शनिदेव उसे आसमान की बुलंदियों तक पहुंचा देते हैं। जी हाँ ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को न्यायप्रिय देवता कहा जाता है और सभी देवताओं में उनकी एक अहम भूमिका भी होती है।
    आज हम शनि की साढ़े साती के बारे में विस्तार से जानेंगे, सबसे पहले जानते हैं उसके साढ़े साती के विभिन्न चरणों के बारे में-
    शास्त्रों के अनुसार साढ़े साती को तीन चरण में बाँटा गया है। साढ़े साती का पहला चरण धनु, वृषभ, सिंह राशि वाले लोगों के लिए कष्टकारी रहता है। दूसरा या मध्य चरण सिंह, मकर, मेष, कर्क, वृश्चिक राशियों के लिए अच्छा नहीं समझा जाता है और तीसरा चरण मिथुन, कुंभ, तुला, वृश्चिक, मीन राशि के लिए कष्टकारी होता है।
    शनि की साढ़े साती या शनि दोष के प्रभाव को कम करने के उपाय-
    - तांबे के दीपक में तिल या सरसों का तेल भरकर ज्योति जलानी चाहिए।
    - शनि को ठीक करने के लिए सबसे पहले अपने आचरण में सुधार करना चाहिए।
    - प्रत्येक शनिवार को उड़द की दाल को भोजन में शामिल कीजिए और एक समय उपवास करिये।
    - शनि का शुभ परिणाम पाने के लिए अपने माता-पिता को हमेशा सम्मान दें।
    - एक लोहे की कटोरी में सरसों का तेल भरें और दान कर दें।
    - शनि के मंत्र ॐ शं शनिश्चरायै नमः का जाप 3 माला रोज शाम को करें।
    - शनिवार की शाम को सरसों के तेल का दिया पीपल के पेड़ के नीचे जलाएं और पीपल के पेड़ की सात परिक्रमा लगातार 40 शनिवार करें।
    - साढ़े साती के दौरान ग्रह शनि को खुश करने के लिए प्रत्येक शनिवार को भगवान शनि की पूजा करना सबसे अच्छा उपाय है।
    - प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़नी चाहिए।
    साढ़े साती की अवधि के दौरान इन कामों से बचना चाहिए-
    - कोई भी जोखिम भरा काम नहीं करना चाहिए।
    - साढ़े साती के दौरान किसी से भी बहस करने से बचना चाहिए।
    - ड्राइविंग करते समय सतर्क रहना चाहिए।
    - रात में अकेले यात्रा करने से बचना चाहिए।
    - शनिवार और मंगलवार को शराब के सेवन से बचें।
    - हमें शनिवार और मंगलवार को काले रंग का सामान नहीं खरीदना चाहिए।

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