July 31, 2026
Hindi Hindi

Login to your account

Username *
Password *
Remember Me
    Uncategorised

    Uncategorised (35076)

    अन्य ख़बर

    अन्य ख़बर (5876)

    धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
    क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

    ब्यूरो चीफ: प्रवीण गुप्ता

    कवर्धा। जिले के सुदूर वनांचल और पहाड़ी क्षेत्रों में बसे गांव, जो कभी विकास की मुख्यधारा से कटे हुए थे, आज तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। कठिन परिस्थितियों के कारण यहां के ग्रामीणों को आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब प्रधानमंत्री जनमन योजना से इन गांवों की तस्वीर बदल रही है।

     मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय एवं उप मुख्यमंत्री व कवर्धा विधायक विजय शर्मा के सतत प्रयासों से पहाड़ों की घाट कटिंग कर सुदूर वनांचल क्षेत्रों तक पक्की सड़कों का निर्माण किया गया है। कवर्धा विधानसभा अंतर्गत संभूपीपर से बरहापानी तक लगभग 5 किलोमीटर लंबी पक्की सड़क का निर्माण किया गया है, जिसकी कुल लागत 3.89 करोड़ रुपए है। बारहपानी गांव, जिसकी कुल जनसंख्या 231 है, इस सड़क निर्माण के बाद अब विकास की गति प्राप्त कर रहा है। यह सड़क न केवल आवागमन का माध्यम बनी है, बल्कि गांव के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास की आधारशिला भी साबित हो रही है। 

    किसानों को भी मिलेगा भारी लाभ 

    संभूपीपर से बरहापानी तक सड़क निर्माण होने से क्षेत्र के लोगों के जीवन में बदलाव आया है। पहले जहां ग्रामीणों को बरसात के दिनों में पहाड़ी पगडंडियों से गुजरना पड़ता था, वहीं अब वे आसानी से वाहनों के माध्यम से अपने गंतव्य तक पहुंच पा रहे हैं। सड़क निर्माण से न केवल आवागमन सुगम हुआ है, बल्कि स्थानीय स्तर पर व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला है। अब किसान अपनी उपज को बाजार तक आसानी से पहुंचा पा रहे हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो रही है। साथ ही, क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। बरहापानी के निवासी गौतर बताते हैं कि पहले उनके गांव तक पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं थी।

    प्रमुख स्थानों में जाना अब बेहद आसान 

     संभूपीपर से बरहापानी तक सड़ बन जाने से वाहन पहुंचने लगे हैं और चिल्फी व कवर्धा जैसे प्रमुख स्थानों तक जाना बेहद आसान हो गया है। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय एवं उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सड़क उनके जीवन में एक नई उम्मीद लेकर आई है। अब वे भी विकास की मुख्यधारा से जुड़कर बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर हो रहे हैं। इससे ग्रामीणों के जीवन स्तर में सुधार आया है। पीएमजीएसवाई विभाग के कार्यपालन अभियंता एस.के. ठाकुर ने बताया कि इस प्रकार के कार्यों का उद्देश्य सुदूर और दुर्गम क्षेत्रों को मुख्य मार्गों से जोड़ना है, ताकि वहां के निवासियों को सुविधाएं मिल सकें। प्रधानमंत्री जनमन योजना और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों से आज कबीरधाम के वनांचल क्षेत्रों में विकास की नई राह खुल रही है।

      धमतरी / शौर्यपथ / जिले में मादक पदार्थों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत धमतरी पुलिस को एक और बड़ी सफलता मिली है। सांकरा चेक पोस्ट पर सघन वाहन जांच के दौरान पुलिस ने लगभग 55 किलो गांजा के साथ तीन अंतरराज्यीय तस्करों को गिरफ्तार किया है। जब्त सामग्री में गांजा, एक रेनॉल्ट डस्टर कार और चार मोबाइल फोन शामिल हैं, जिनकी कुल कीमत 33 लाख 53 हजार 500 रुपये आंकी गई है।
    पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, यह कार्रवाई 4 मई 2026 को की गई। मैनपुर की ओर से आ रही रेनॉल्ट डस्टर (MH 45 AD 9001) को रोककर जांच की गई। वाहन की डिक्की से 38 पैकेटों में भरा 54.970 किलोग्राम गांजा बरामद हुआ, जिसकी अनुमानित कीमत 27.50 लाख रुपये है। पूछताछ में आरोपियों ने स्वीकार किया कि वे यह गांजा ओडिशा के बलांगीर से खरीदकर महाराष्ट्र के नासिक ले जा रहे थे।

    गिरफ्तार आरोपी:
    अमोल अरुण ओढेंकर (33 वर्ष), निवासी नासिक, महाराष्ट्र
    तनिष गायकवाड (19 वर्ष), निवासी अहमदनगर, महाराष्ट्र
    ऋषिकेश सिरसाट (23 वर्ष), निवासी अहमदनगर, महाराष्ट्र
    तीनों के खिलाफ थाना सिहावा में अपराध क्रमांक 38/26, धारा 20(बी) NDPS एक्ट के तहत मामला दर्ज कर उन्हें न्यायिक रिमांड पर जेल भेजा जा रहा है।
    जब्त सामग्री:
    गांजा: 54.970 किलोग्राम (₹27,50,000)
    रेनॉल्ट डस्टर वाहन: ₹5,00,000
    4 मोबाइल फोन: ₹1,03,500
    कुल जब्ती: ₹33,53,500
    पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में जिले में अवैध मादक पदार्थों के खिलाफ लगातार निगरानी और कार्रवाई की जा रही है। खासतौर पर ओडिशा-छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र ट्राई-जंक्शन (बोरई, कुन्दई, विश्रामपुरी) क्षेत्र में सख्ती बढ़ाई गई है, जिससे अंतरराज्यीय तस्करी नेटवर्क पर दबाव बना है।
    उल्लेखनीय है कि 15 दिन पहले ही सांकरा चेक पोस्ट पर 127 किलो गांजा की बड़ी खेप पकड़ी गई थी, जिसकी कुल कीमत करीब 72.71 लाख रुपये आंकी गई थी। लगातार हो रही इन कार्रवाइयों से स्पष्ट है कि धमतरी पुलिस तस्करी के नेटवर्क को तोड़ने के लिए रणनीतिक और सख्त कदम उठा रही है।

     रायपुर / शौर्यपथ / ​कहते हैं कि अगर मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो शारीरिक बाधाएं केवल एक पड़ाव मात्र रह जाती हैं, मंजिल नहीं। राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव ब्लॉक के ग्राम 'हरदी' के रहने वाले भीमा मारकंडे की कहानी आज संघर्ष कर रहे हजारों युवाओं के लिए एक मिशाल बन गई है।

    जब वक्त ने ली कठिन परीक्षा
    ​भीमा की जिंदगी तब बदल गई जब हैदराबाद में निर्माण कार्य (मजदूरी) के दौरान वे ऊंचाई से गिर गए। कमर में आई गंभीर चोट ने उनके चलने-फिरने की शक्ति छीन ली। 80 प्रतिशत दिव्यांगता के साथ 9 वर्ष और 4 वर्ष दो छोटी बेटियों की जिम्मेदारी उठाना पहाड़ तोड़ने जैसा था। बैसाखी ही उनका एकमात्र सहारा थी, लेकिन मंजिल अभी दूर थी।

    उम्मीद की नई किरण:समाज कल्याण विभाग की पहल
    ​भीमा ने हार मानने के बजाय स्वावलंबन का रास्ता चुना। उन्होंने समाज कल्याण विभाग के माध्यम से 'बैटरी चलित मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल' के लिए आवेदन किया। राजनांदगांव के मोतीपुर में 4 मई 2026 को आयोजित सुशासन तिहार मे मिला यह आधुनिक उपकरण उनके लिए केवल एक वाहन नहीं, बल्कि उनकी आजादी साबित हुआ।

    मजबूरी बनी मजबूती: भीमा की कहानी, आत्मनिर्भरता की जुबानी
    अब बाधाएं नहीं रोकेंगी रास्ता
    विभाग द्वारा प्रदान की गई बैटरी चलित ट्राइसाइकिल और बैसाखी से भीमा के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव का रास्ता मजबूत होगा। भीमा अब रोजगार की तलाश में दूर-दराज के क्षेत्रों तक बिना किसी मदद के जा सकेंगे। दूसरों पर निर्भरता खत्म होने से भीमा अब समाज की मुख्यधारा में एक सक्रिय नागरिक की भूमिका निभा सकेगा। अपनी बेटियों के भविष्य को संवारने के लिए अब वे शारीरिक बाधाओं को पीछे छोड़ चुके हैं। भीमा शासन द्वारा दिए गए मदद की प्रशंसा करते हुए कहते है कि राज्य के संवेदनशील मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय अपने आमजनों की समस्याओं का निराकरण सुशासन तिहार के माध्यम से कर रहे है। मैं मुख्यमंत्री का दिल से धन्यवाद करता हूँ।

    ​भीमा की कहानी के साथ-साथ जिले के अन्य दिव्यांगों के लिए भी अच्छी खबर है
    ​ समाज कल्याण विभाग की उपसंचालक सुश्री वैशाली मरड़वार ने बताया कि जिला प्रशासन एवं समाज कल्याण विभाग की विशेष योजना के तहत नवाचार करते हुए 40 से 79% तक के दिव्यांगता वाले व्यक्ति भी मोटराइज्ड साइकिल के पात्र होंगे। इसके लिए ​ ऑलिम्को (ALIMCO) CSR मद से जिले के 109 पात्र दिव्यांगों को यह सुविधा प्रदान की जाएगी।
    ​भीमा मारकंडे के हस्ताक्षर आज उनके अटूट संकल्प की गवाही देते हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सरकारी योजनाओं का सही लाभ और मन का दृढ़ निश्चय मिलकर किसी भी अंधेरी राह को रोशन कर सकता है। भीमा अब रुकने वाले नहीं हैं, वे उड़ान भरने के लिए तैयार हैं।

    भिलाई: शिक्षा ही समाज की तरक्की की चाबी है, और जब किसी जरूरतमंद बच्चे के सपनों को संसाधनों की कमी से टूटने का डर सताता है, तो समाज के जागरूक संगठनों का आगे आना एक नई उम्मीद जगाता है। ऐसा ही एक प्रेरक उदाहरण भिलाई में सर्व समाज कल्याण समिति द्वारा पेश किया गया है, जिसने सेक्टर-7 की बेटी ईशा साहू की संपूर्ण शिक्षा का बीड़ा उठाया है।

    इस ऐतिहासिक निर्णय की घोषणा समिति के अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह छोटू ने की, जिन्होंने स्पष्ट किया कि समाज के हर जरूरतमंद बच्चे को शिक्षा से जोड़ना ही समिति का परम ध्येय है।

    भिलाई टाइम्स की खबर बनी उम्मीद की किरण

    इस नेक पहल की शुरुआत तब हुई जब 'भिलाई टाइम्स' में प्रकाशित एक समाचार के माध्यम से ईशा साहू की संघर्षपूर्ण स्थिति और उनकी पढ़ाई में आ रही बाधाओं की जानकारी सामने आई। अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह छोटू के निर्देश पर समिति की टीम ने तत्काल मामले का संज्ञान लिया और ईशा के परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का विस्तृत सर्वे किया।

    निर्णय: ईशा की शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी समिति की

    सर्वे रिपोर्ट और परिवार की वास्तविक स्थिति को समझने के बाद, सर्व समाज कल्याण समिति ने एक बड़ा और प्रशंसनीय निर्णय लिया। समिति के पदाधिकारियों ने आज ईशा के परिवार से मुलाकात की और उन्हें यह सुखद संदेश दिया कि "अब ईशा की आगे की संपूर्ण शिक्षा की जिम्मेदारी सर्व समाज कल्याण समिति भिलाई द्वारा उठाई जाएगी।"

    इस जिम्मेदारी के अंतर्गत ईशा को किसी भी मोड़ पर पढ़ाई के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। समिति द्वारा ईशा को निम्नलिखित सहायता उपलब्ध कराई जाएगी:

    स्कूल की पूरी पढ़ाई का खर्च।

    स्कूल ड्रेस।

    कॉपी-किताबें।

    शिक्षा से संबंधित अन्य सभी आवश्यक सामग्री।

    अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह छोटू का विजन

    इस नेक पहल पर अपना वक्तव्य देते हुए सर्व समाज कल्याण समिति के अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह छोटू ने कहा:

    "हमारा प्रयास समाज के हर उस जरूरतमंद बच्चे को शिक्षा से जोड़ना है, जो किसी भी कारण से पीछे रह रहा है। ईशा साहू की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाकर हम न केवल उसके सपनों को सच करने में मदद कर रहे हैं, बल्कि उसके उज्ज्वल भविष्य की दिशा में एक मजबूत नींव भी रख रहे हैं। सर्व समाज कल्याण समिति समाज के प्रति अपने दायित्वों को पूरी निष्ठा से निभाने के लिए सदैव प्रतिबद्ध है।"

    यह पहल भिलाई में एक सकारात्मक संदेश दे रही है कि यदि समाज और उसके संगठन एकजुट हों, तो कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा।

    दुर्ग। खेल और खिलाड़ियों के लिए काम करने वाले संगठन क्रीड़ा भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री प्रसाद महानकर के दुर्ग प्रवास के दौरान दुर्ग जिला ईकाई के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के पं. रत्नाकर झा सभागार में हुई। इस बैठक में क्रीड़ा भारती के प्रदेश मंत्री और राष्ट्रीय युवा आयाम प्रमुख सुमित उपाध्याय भी विशेष रुप से शामिल हुए। 

    राष्ट्रीय संगठन मंत्री प्रसाद महानकर ने कहा कि खेल भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है। खेलों के माध्यम से बालक-बालिकाओं में संस्कार, अनुशासन और टीम वर्क की भावना जागृत करके श्रेष्ठ नागरिक तैयार करने की दिशा में सार्थक कार्य को गति प्रदान करने में सबका सक्रिय योगदान आवश्यक है। खेल खिलाना और खिलाड़ी तैयार करना केवल सरकार का काम नहीं है क्योंकि भारतीय परिवेश में खेलों पर समाज का ही प्रथम अधिकार है, समाज ही खेलों का प्रथम संरक्षक भी है। गांवों में अभाव के बीच भी उत्कृष्ठ खिलाड़ी तैयार होते रहे हैं। हर घर में खेल के लिए वातावरण होना चाहिए। खेल केवल मेडल और रिकार्ड के लिए नही बल्कि शरीर व मन को स्वस्थ रखने का ध्येय के साथ हो। 

     प्रदेश मंत्री और राष्ट्रीय युवा आयाम प्रमुख सुमित उपाध्याय ने कहा कि आगामी वर्ष 2036 के ओलंपिक में कबड्डी के खेल को शामिल कराना क्रीड़ा भारती का संकल्प है। इसके लिए कबड्डी के प्रति छात्र-छात्राओं, बच्चों, युवाओं, महिलाओं में भाव जागृत कराने की आवश्यकता है। उन्होने कहा कि अलग अलग स्तर जैसे विद्यालयों, कालेजों, हास्टलों, युवा क्लबों, महिला स्वसहायता समूहों के स्तर पर आयु वर्ग के साथ महिला-पुरुष की टीमों के बीच कबड्डी की छोटी छोटी प्रतियोगिताओं के माध्यम से जनमानस में कबड्डी के प्रति रुचि बढ़ाना आवश्यक है। कबड्डी का खेल हमारी जड़ों से जुड़ा खेल है। क्रीड़ा भारती के प्लेटफार्म पर आनलाइन पंजीयन के माध्यम से टीमों को जोड़कर ऐसे आयोजन देश भर में शुरु हुए हैं। 

     बैठक में प्रदेश के कबड्डी आयोजन प्रमुख डा. सुनील साहू ने कबड्डी के आयोजन को लेकर किये जा रहे कार्यों पर जानकारी दी और आगामी कार्ययोजना से अवगत कराया। दुर्ग विभाग प्रमुख विनोद नायर ने क्रीड़ा भारती के कार्यों से प्रभावित खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों को क्रीड़ा भारती का सदस्य बनाये जाने पर अपने विचार रखे।

     बैठक का संचालन प्रान्त दिव्यांग प्रमुख राजेन्द्र कुमार ने किया। बैठक में प्रमुख रुप से महिला आयाम प्रदेश प्रमुख पूनम मिश्रा, जिला उपाध्यक्ष किशन, जिला मंत्री संध्या दुबे, बालक दास डहरे, योग प्रमुख हितेश साहू, मीडिया प्रभारी प्रमोद वाघ, कल्पना स्वामी, युवा प्रमुख महावीर, कार्यकारिणी सदस्य रमेश दुबे, हिना साहू, नीतेश सिंह, मृदुला शरण, ओम झा सहित खिलाड़ीगण और खेल प्रेमी उपस्थित रहे।

      शौर्यपथ राजनीतिक लेख। भारतीय राजनीति के इतिहास में दिल्ली की सत्ता का मोह बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए 'मृगतृष्णा' साबित हुआ है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रम इस बात का गवाह है कि जब-जब क्षेत्रीय क्षत्रपों ने देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस को दरकिनार कर खुद को 'विकल्प' के रूप में पेश करने की कोशिश की, तब-तब वक्त ने उन्हें कड़ा सबक सिखाया।

    अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी—ये तीन ऐसे नाम थे, जिनके पास अपनी-अपनी सल्तनत थी, लेकिन दिल्ली की लालसा ने उनके सियासी भूगोल को ही बदल कर रख दिया।

    1. अरविंद केजरीवाल: 'सुपर सीएम' से 'जेल' और फिर कुर्सी गँवाने तक का सफर

    आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीति की शुरुआत ही कांग्रेस के विरोध से की थी। पंजाब में जीत के बाद उनका सपना प्रधानमंत्री बनने का था। उन्होंने खुद को कांग्रेस का एकमात्र विकल्प घोषित किया, लेकिन दिल्ली की सत्ता और संगठन पर पकड़ ढीली होती गई। अंततः, भ्रष्टाचार के आरोपों और कानूनी पेचीदगियों के बीच उन्हें अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। कांग्रेस को 'अप्रासंगिक' बताने के चक्कर में वे खुद अपनी ही जमीन पर संघर्ष करते नजर आए।

    2. नीतीश कुमार: 'पलटूराम' की छवि और पीएम बनने की अधूरी हसरत

    बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में एक लंबी पारी खेलने वाले नीतीश कुमार ने जब 'इंडिया' (I.N.D.I.A.) गठबंधन की नींव रखी, तो उनके मन में दिल्ली के सिंहासन की छवि स्पष्ट थी। वे खुद को विपक्ष का चेहरा बनाना चाहते थे। लेकिन जब उन्हें लगा कि कांग्रेस उन्हें वह तवज्जो नहीं दे रही, तो उन्होंने फिर पाला बदला। आज स्थिति यह है कि वे सत्ता में तो हैं, लेकिन उस 'मुख्यमंत्री' की हैसियत और स्वायत्तता को खो चुके हैं, जिसके लिए वे जाने जाते थे। दिल्ली की दौड़ ने उन्हें उनके ही गढ़ में कमजोर कर दिया।

    3. ममता बनर्जी: 'दीदी' का दिल्ली मिशन और थर्ड फ्रंट की नाकामी

    बंगाल फतह करने के बाद ममता बनर्जी का अगला लक्ष्य 'थर्ड फ्रंट' के जरिए दिल्ली की कुर्सी थी। उन्होंने 'एकला चलो' की नीति अपनाई और कांग्रेस को बंगाल सहित पूरे देश में चुनौती दी। उनका दावा था कि कांग्रेस अब लड़ नहीं सकती। लेकिन ममता की इस जिद ने न केवल विपक्षी एकता में दरार डाली, बल्कि बंगाल के भीतर भी उनके वर्चस्व को हिलाकर रख दिया।

    सियासत का कड़वा सच: कांग्रेस को नजरअंदाज करना भारी पड़ा

    इन तीनों नेताओं के राजनीतिक हश्र से कुछ बड़े सबक सामने आते हैं:

    अहंकार बनाम दूरदृष्टि: राजनीति में लोकप्रियता होना एक बात है, लेकिन देश की सबसे बड़ी पुरानी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और ऐतिहासिक उपस्थिति को नजरअंदाज करना एक रणनीतिक चूक है।

    वोटों का बिखराव: कांग्रेस का विरोध करके इन नेताओं ने विपक्षी वोटों को ही बांटा, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला।

    आईना दिखा गया वक्त: आज ये तीनों चेहरे अपनी पुरानी चमक खोते दिख रहे हैं। जो कांग्रेस को कमजोर मान रहे थे, आज वे खुद अपने राज्यों में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।

    निष्कर्ष

    सत्ता का सपना देखना गलत नहीं है, लेकिन राजनीति में 'दूरदृष्टि' का होना अनिवार्य है। जो देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को मिट्टी में मिलाने की कोशिश करते हैं, वक्त अक्सर उन्हें ही आईना दिखा देता है। 2026 के मुहाने पर खड़ी राजनीति चीख-चीख कर कह रही है— "कांग्रेस को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।"

    #सियासत #कांग्रेस #राजनीति_की_सच्चाई #विपक्ष_का_भविष्य

    क्या आपको लगता है कि क्षेत्रीय दलों के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर चलना ही एकमात्र विकल्प बचा है?

    कोंडागांव- बस स्टैंड के स्थानंतरण के बाद कोंडागांव बस स्टैंड में टूरिज्म को मिलने लगा पैकिंग की सुविधाएं होटलों में होने लगी भीड़ ।

    कोंडागांव कलेक्टर नूपुर राशि पन्ना का आदेश कामगार दिखाई देने लगा है नया बस स्टैंड चालू कराने व पुराना बस स्टैंड में बस प्रतिबंधित करने से अब पुराने बस स्टैंड में सुबह से ही रौनक देखने को मिल रही वाली अगर पूर्व की बात की जाए तो आए दिन बस हैकरों के द्वारा कार पार्किंग को लेकर गालीगलौज किया जाता था ।

    आप को बतादे की नक्सलवाद खात्मे के बाद लोग बस्तर की संस्कृति व मन मोहन दृश्य से रूबरू होना चाहते है और कोंडागांव ही सबसे पहले का दरवाजा माना गया है ।

    *क्या क्या है बस्तर में देखने के लिए*

    केशकाल, छत्तीसगढ़ (कोंडागांव जिला) अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक घाटियों और जलप्रपातों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के मुख्य आकर्षण टाटामारी इको पर्यटन केंद्र (बादलों का नज़ारा), प्रसिद्ध केशकाल घाटी (12 सर्पाकार मोड़), लिमदरहा जलप्रपात, और तेलीन सती माता मंदिर हैं। यह स्थान मानसून में और भी सुंदर हो जाता है।

    जिसके बाद यहाँ से चित्रकूट जलप्रपात जो कोंडागांव से बहुत ही कम किलोमीटर में पहुँचा जा सकता है और वही से दंतेवाड़ा मंदिर माता दन्तेश्वरी के दर्शन के लिए पहुँचा जा सकता है औऱ इसलिए कोंडागांव को बस्तर के दरवाजा कहा जा सकता है ।

    भिलाई: नगर पालिक निगम भिलाई के चुनाव की आहट जैसे-जैसे करीब आ रही है, वैसे-वैसे सत्ताधारी दल पर हमलावर होने के बजाय भाजपा के भीतर की 'अंदरूनी खींचतान' सड़कों पर नुमाया होने लगी है। सोमवार, 4 मई को निगम के सामने हुए जंगी प्रदर्शन में जो कुछ भी हुआ, उसने भिलाई भाजपा के भीतर पनप रही गुटबाजी और 'वर्चस्व की जंग' को सार्वजनिक कर दिया है।

    कमिश्नर का नाम लेते ही 'खामोश' हुआ माइक

    प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य महापौर नीरज पाल और कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार को घेरना था, लेकिन सारा फोकस तब बदल गया जब भाजपा पार्षद संतोष मौर्या ने निगम कमिश्नर राजीव कुमार पांडेय पर निशाना साधा। हैरानी की बात यह रही कि किसी विरोधी दल ने नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के एक विशेष नेता के निर्देश पर मौर्या का माइक बंद कर दिया गया।

    यह घटना केवल एक माइक बंद होने की नहीं, बल्कि उस 'अदृश्य अंकुश' की ओर इशारा करती है, जो भाजपा के कुछ नेताओं का अधिकारियों के प्रति नरम रुख और अपने ही पार्षदों के प्रति कठोर नियंत्रण को दर्शाता है।

    मीडिया को देख डैमेज कंट्रोल की कोशिश

    जब जिलाध्यक्ष को इस बात का अहसास हुआ कि मीडिया के कैमरे इस पूरे घटनाक्रम को रिकॉर्ड कर रहे हैं और पार्टी की किरकिरी हो रही है, तब आनन-फानन में संतोष मौर्या को वापस बुलाया गया। हालांकि, तब तक तीर कमान से निकल चुका था। मंच पर ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच का विरोधाभास और गुटबाजी का आलम साफ नजर आ रहा था।

    पीयूष मिश्रा का कड़ा रुख और अंदरूनी अंतर्विरोध

    एक तरफ संतोष मौर्या का माइक बंद किया गया, तो दूसरी तरफ भाजपा पार्षद पीयूष मिश्रा ने भी कमिश्नर पर सीधा हमला बोला। एक ही मंच पर एक ही अधिकारी के खिलाफ दो पार्षदों के लिए अलग-अलग पैमाना होना यह बताता है कि भिलाई भाजपा में 'पावर सेंटर' बंटे हुए हैं।

    संगठन में 'वर्चस्व' की पुरानी बीमारी

    यह पहली बार नहीं है जब भिलाई में भाजपा के भीतर गुटबाजी दिखी हो। हाल ही में:

    BJYM नियुक्तियां: BJYM के ब्लॉक अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर जिलाध्यक्ष और मंडल अध्यक्ष के बीच का टकराव अभी ठंडा भी नहीं हुआ था।

    निकाय चुनाव का खतरा: आने वाले कुछ महीनों में भिलाई निगम के चुनाव होने वाले हैं। यदि गुटबाजी इसी तरह हावी रही, तो टिकट वितरण के समय 'गहमागहमी' और 'भितरघात' की संभावनाएं प्रबल हो जाएंगी।

    निष्कर्ष: कांग्रेस से पहले अपनों से लड़ना होगा!

    भिलाई में भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का समय है। एक तरफ पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जंगी प्रदर्शन' का दावा कर रही है, तो दूसरी तरफ मंच पर ही अपनों की आवाज दबाई जा रही है। अगर नेतृत्व ने समय रहते इन 'गुटों' को एक सूत्र में नहीं पिरोया, तो निकाय चुनाव में कांग्रेस के भ्रष्टाचार से ज्यादा भाजपा की यह अंदरूनी 'जंग' उस पर भारी पड़ सकती है।

    राजनीतिक गलियारों का बड़ा सवाल: > "क्या भिलाई भाजपा के कुछ नेता पर्दे के पीछे से अधिकारियों को बचा रहे हैं, या फिर यह केवल अपनी ही पार्टी के भीतर एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल है?"

    चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति के इतिहास में साल 2026 एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज किया गया है, जिसने दशकों पुराने द्रविड़ियन किलों की दीवारों को हिलाकर रख दिया। अभिनेता से राजनेता बने विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) की इस अभूतपूर्व सफलता के पीछे पर्दे के पीछे खड़े जिस शख्स की सबसे ज्यादा चर्चा है, वह हैं— प्रशांत किशोर (PK)।

    प्रशांत किशोर, जिन्होंने खुद को कभी औपचारिक रणनीतिकार नहीं बल्कि एक "शुभचिंतक" कहा, उन्होंने विजय की लोकप्रियता को एक ऐसी चुनावी मशीनरी में तब्दील कर दिया, जिसने DMK और AIADMK के पारंपरिक प्रभुत्व को ध्वस्त कर दिया।

    1. अकेले लड़ने का साहसिक जुआ (The Solo Warrior Ethos)

    पीके की सबसे महत्वपूर्ण सलाह थी— "गठबंधन के जाल से बाहर निकलना।" जहाँ नए दल अक्सर किसी बड़े खेमे का सहारा ढूंढते हैं, वहीं किशोर ने विजय को सभी 234 सीटों पर अकेले लड़ने का आत्मविश्वास दिया। उनका तर्क स्पष्ट था: यदि आप विकल्प बनना चाहते हैं, तो आपको पुराने विकल्पों से अलग दिखना होगा। इस रणनीति ने TVK को एक स्वतंत्र और स्वच्छ छवि प्रदान की।

    2. फैन क्लब से कैडर तक का सफर

    विजय के पास लाखों प्रशंसकों की फौज थी, लेकिन चुनाव रैलियों की भीड़ को वोटों में बदलना एक चुनौती थी। प्रशांत किशोर ने 'विजय मक्कल इयक्कम' (VMI) के उत्साही प्रशंसकों को अनुशासित बूथ-स्तरीय कैडर में बदल दिया। उन्होंने 'बूथ मैपिंग' और 'वोटर सेगमेंटेशन' जैसे आधुनिक औजारों का इस्तेमाल कर स्टारडम को एक जमीन पर काम करने वाली 'पॉलिटिकल मशीन' बना दिया।

    3. 'द्रविड़ियन थकान' को भांपना और 'नया विकल्प' पेश करना

    तमिलनाडु की जनता दशकों से दो दलों के बीच बारी-बारी से सत्ता का खेल देख रही थी। पीके ने इस "राजनीतिक थकान" को सही समय पर पहचाना। उन्होंने विजय को महज एक अभिनेता नहीं, बल्कि "तमिलनाडु की नई उम्मीद" के रूप में ब्रांड किया। रोजगार, शिक्षा और नशामुक्त तमिलनाडु जैसे ठोस मुद्दों पर आधारित रोडमैप ने युवाओं और तटस्थ मतदाताओं को टीवीके की ओर आकर्षित किया।

    4. भविष्यवाणी जो हकीकत बनी

    फरवरी 2025 में प्रशांत किशोर ने एक साहसी दावा किया था कि यदि विजय अकेले लड़ते हैं, तो वह तमिलनाडु जीत सकते हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा था कि— "विजय को जिताने के बाद मैं तमिलनाडु में महेंद्र सिंह धोनी से भी ज्यादा लोकप्रिय बिहारी बन जाऊंगा।" आज, मई 2026 के चुनावी नतीजों ने इस भविष्यवाणी पर मुहर लगा दी है। भले ही पीके बिहार में अपनी पार्टी 'जन सुराज' में व्यस्त रहे, लेकिन उनके द्वारा खींची गई शुरुआती लकीर ही जीत का मार्ग बनी।

    निष्कर्ष: एक नए युग का सूत्रपात

    प्रशांत किशोर के रणनीतिक मार्गदर्शन और विजय के करिश्माई नेतृत्व के मेल ने यह साबित कर दिया कि सही माइक्रो-मोबिलाइजेशन और स्पष्ट नैरेटिव के साथ किसी भी राजनीतिक दुर्ग को जीता जा सकता है। 2026 की यह जीत केवल एक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में एक नए 'कल्ट' के उदय की कहानी है।

    मुख्य बिंदु (Quick Highlights):

    रणनीति: सभी 234 सीटों पर बिना गठबंधन के चुनाव लड़ना।

    बदलाव: फैन क्लब को बूथ-स्तर की चुनावी मशीनरी में तब्दील करना।

    एजेंडा: शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार मुक्त शासन पर ध्यान।

    परिणाम: तमिलनाडु की राजनीति में दशकों बाद एक तीसरे ध्रुव का पूर्ण उदय।

    चेन्नई /
    तमिलनाडु की सियासत में आज एक ऐसा सूर्योदय हुआ है जिसने पिछले पांच दशकों से चले आ रहे 'द्रविड़ियन' समीकरणों को जड़ से हिला दिया है। सिल्वर स्क्रीन पर अपनी एक मुस्कान से करोड़ों दिलों को धड़कने वाले जोसेफ विजय चंद्रशेखर, जिन्हें दुनिया 'थलपति' के नाम से जानती है, अब रील लाइफ के 'कमांडर' से रियल लाइफ के 'किंग' बन चुके हैं। उनकी नवनिर्मित पार्टी तमिलगा वेट्री कज़गम (TVK) ने 2026 के विधानसभा चुनावों में वह कर दिखाया है जिसे कल तक राजनीतिक पंडित 'असंभव' मान रहे थे।
    चुनावी आँकड़े: 'विजयरथ' की अविश्वसनीय रफ्तार
    234 सीटों वाली तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत का जादुई आंकड़ा 118 है। ताजा परिणामों ने राज्य को चौंका दिया है:
    TVK की सुनामी: विजय की पार्टी 108 (107-109) सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है।
    दिग्गजों का पतन: सबसे बड़ा उलटफेर कोलथुर सीट पर हुआ, जहाँ TVK के नवागंतुक वी.एस. बाबू ने मौजूदा मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को हराकर द्रविड़ राजनीति के सबसे बड़े स्तंभ को हिला दिया।
    पेरम्बूर से विजय की हुंकार: स्वयं विजय ने पेरम्बूर सीट से DMK के कद्दावर नेता आर.डी. शेखर को भारी मतों के अंतर से शिकस्त देकर अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता पर मुहर लगा दी है।
    एक सितारे का 'राजनेता' में रूपांतरण
    विजय का उदय कोई संयोग नहीं, बल्कि 15 वर्षों की सोची-समझी रणनीति का परिणाम है:
    जमीनी नींव (2009-2021): विजय ने अपने प्रशंसक क्लबों (VMI) को केवल फिल्म प्रचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें जनकल्याण के औजार में बदला। 2021 के स्थानीय चुनावों में मिली जीत ने ही संकेत दे दिया था कि 'थलपति' की सेना तैयार है।
    सिनेमा का त्याग: फरवरी 2024 में TVK की घोषणा के साथ विजय ने अपने करियर के चरम पर फिल्मों से संन्यास लेने का साहसी फैसला किया, जिसने जनता को संदेश दिया कि वे राजनीति में 'पार्ट-टाइम' नहीं बल्कि पूर्णतः समर्पित सेवक के रूप में आए हैं।
    वैचारिक त्रिकोण: विजय ने अपनी राजनीति को अम्बेडकर, पेरियार और कामराज के सिद्धांतों पर टिकाया है। सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के वादे ने युवाओं और महिलाओं को सबसे ज्यादा आकर्षित किया।
    भविष्य की राह: क्या 'किंगमेकर' बनेंगे 'किंग'?
    यद्यपि TVK बहुमत के आंकड़े (118) से मात्र 10 सीटें दूर है, लेकिन सबसे बड़ा दल होने के नाते सत्ता की चाबी विजय के हाथ में ही है।
    विश्लेषकों का मानना है: "विजय अब राज्य के निर्विवाद केंद्र बिंदु हैं। कांग्रेस और अन्य छोटे दलों के साथ गठबंधन की संभावनाओं के बीच, यह लगभग तय है कि तमिलनाडु के अगले मुख्यमंत्री के रूप में जोसेफ विजय चंद्रशेखर शपथ लेंगे।"


    निष्कर्ष:
    एम.जी. रामचंद्रन (MGR) और जयललिता के बाद, विजय तीसरे ऐसे अभिनेता बने हैं जिन्होंने तमिलनाडु की जनता के सर पर अपनी लोकप्रियता का जादू इस कदर चलाया है। यह जीत केवल एक पार्टी की जीत नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में एक नए 'तीसरे ध्रुव' का उदय है।
    तमिलनाडु अब एक नए नेतृत्व की ओर देख रहा है। क्या थलपति अपनी फिल्मों की तरह राज्य की समस्याओं का 'क्लाइमेक्स' बदल पाएंगे? पूरी दुनिया की नजरें अब चेन्नई के 'विजय निवास' पर टिकी हैं।

    हमारा शौर्य

    हमारे बारे मे

    whatsapp-image-2020-06-03-at-11.08.16-pm.jpeg
     
    CHIEF EDITOR -  SHARAD PANSARI
    CONTECT NO.  -  8962936808
    EMAIL ID         -  shouryapath12@gmail.com
    Address           -  SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
    LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
    © 2015 Shouryapath. All Rights Reserved. Designed By Global Vision