
CONTECT NO. - 8962936808
EMAIL ID - shouryapath12@gmail.com
Address - SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
Google Analytics —— Meta Pixel
आस्था /शौर्यपथ / उज्जैन का प्राचीन नाम अवंतिका है। अवंतिका मालवा क्षेत्र का एक नगर है। मालवा वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य का हिस्सा है। अवंतिका की गणना सप्तपुरियों में की जाती है। यहां ज्योतिर्लिंग के साथ ही शक्तिपीठ भी स्थापित है। पुण्य पवित्र नदी क्षिप्रा के तट पर बसी इन नगरी में कई महान राजा हुए हैं उन्हीं में से एक हैं चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य। आओ जानते हैं उनके संबंध में 10 रोचक बातें।
1. विक्रम संवत अनुसार अवंतिका (उज्जैन) के महाराजाधिराज राजा विक्रमादित्य आज से (2021 से) 2292 वर्ष पूर्व हुए थे। कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया। -(गीता प्रेस, गोरखपुर भविष्यपुराण, पृष्ठ 245)। कल्हण की 'राजतरंगिणी' के अनुसार 14 ई. के आसपास कश्मीर में अंध्र युधिष्ठिर वंश के राजा हिरण्य के नि:संतान मर जाने पर अराजकता फैल गई थी। जिसको देखकर वहां के मंत्रियों की सलाह से उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को कश्मीर का राज्य संभालने के लिए भेजा था। नेपाली राजवंशावली अनुसार नेपाल के राजा अंशुवर्मन के समय (ईसापूर्व पहली शताब्दी) में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के नेपाल आने का उल्लेख मिलता है।
2. विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था। नाबोवाहन के पुत्र राजा गंधर्वसेन भी चक्रवर्ती सम्राट थे। गंधर्वसेन के पुत्र विक्रमादित्य और भर्तृहरी थे। उनके पिता को महेंद्रादित्य भी कहते थे। उनके और भी नाम थे जैसे गर्द भिल्ल, गदर्भवेष। विक्रम की माता का नाम सौम्यदर्शना था जिन्हें वीरमती और मदनरेखा भी कहते थे। उनकी एक बहन थी जिसे मैनावती कहते थे।
3. उनकी पांच पत्नियां थी, मलयावती, मदनलेखा, पद्मिनी, चेल्ल और चिल्लमहादेवी। उनकी दो पुत्र विक्रमचरित और विनयपाल और दो पुत्रियां प्रियंगुमंजरी (विद्योत्तमा) और वसुंधरा थीं। गोपीचंद नाम का उनका एक भानजा था। प्रमुख मित्रों में भट्टमात्र का नाम आता है। राज पुरोहित त्रिविक्रम और वसुमित्र थे। मंत्री भट्टि और बहसिंधु थे। सेनापति विक्रमशक्ति और चंद्र थे।
4. विक्रामादित्य के दरबार में नवरत्न रहते थे। कहना चाहिए कि नौ रत्न रखने की परंपरा का प्रारंभ उन्होंने ही किया था। उनके अनुसरण करते हुए कृष्णदेवराय और अकबर ने भी नौरत्न रखे थे। सम्राट अशोक के दरबार में भी नौरत्न थे। विक्रमादित्य के नौ रत्नों के नाम है- 1. धनवंतरी 2. क्षिपाका 3. अमरसिम्हा 4. शंकु 5. वेतालभट्ट 6. घटकारपारा 7. कालीदासा 8. वराहमिहिर 9. वररुचि।
5. कहते हैं कि उन्होंने तिब्बत, चीन, फारस, तुर्क और अरब के कई क्षेत्रों पर शासन किया था। उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में सिम्हल (श्रीलंका) तक उनका परचम लहराता था। विक्रमादित्य की अरब विजय का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक 'शायर उर ओकुल' में किया है। यही कारण है कि उन्हें चक्रवर्ती सम्राट महान विक्रमादित्य कहा जाता है।
6. उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने ही 57 ईसा पूर्व अपने नाम से विक्रम संवत चलाया था। उन्होंने शकों पर विजय की याद में यह संवत चलाया था। उनके ही नाम से वर्तमान में भारत में विक्रम संवत प्रचलित है। कहा जाता है कि मालवा में विक्रमादित्य के भाई भर्तृहरि का शासन था। भर्तृहरित के शासन काल में शको का आक्रमण बढ़ गया था। भर्तृहरि ने वैराग्य धारण कर जब राज्य त्याग दिया तो विक्रम सेना ने शासन संभाला और उन्होंने ईसा पूर्व 57-58 में सबसे पहले शको को अपने शासन क्षेत्र से बहार खदेड़ दिया। इसी की याद में उन्होंने विक्रम संवत की शुरुआत कर अपने राज्य के विस्तार का आरंभ किया। इस संवत के प्रवर्तन की पुष्टि ज्योतिर्विदाभरण ग्रंथ से होती है, जो कि 3068 कलि अर्थात 34 ईसा पूर्व में लिखा गया था। इसके अनुसार विक्रमादित्य ने 3044 कलि अर्थात 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत चलाया।
7. महाकवि कालिदास की पुस्तक ज्योतिर्विदभरण के अनुसार उनके पास 30 मिलियन सैनिकों, 100 मिलियन विभिन्न वाहनों, 25 हजार हाथी और 400 हजार समुद्री जहाजों की एक सेना थी। कहते हैं कि उन्होंने ही विश्व में सर्व प्रथम 1700 मील की विश्व की सबसे लंबी सड़क बनाई थी जिसके चलते विश्व व्यापार सुगम हो चला था।
8. बाद के राजाओं में विक्रमादित्य से बहुत कुछ सिखा और उन राजाओं को विक्रमादित्य की उपाधि से नावाजा जाता था जो उनके नक्षे-कदम पर चलते थे। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के बाद समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय हुए जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य कहा गया। विक्रमादित्य द्वितीय के बाद 15वीं सदी में सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य 'हेमू' हुए। सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के बाद 'विक्रमादित्य पंचम' सत्याश्रय के बाद कल्याणी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए। उन्होंने लगभग 1008 ई. में चालुक्य राज्य की गद्दी को संभाला। राजा भोज के काल में यही विक्रमादित्य थे।
9. सम्राट विक्रमादित्य अपने राज्य की जनता के कष्टों और उनके हालचाल जानने के लिए छद्मवेष धारण कर नगर भ्रमण करते थे। राजा विक्रमादित्य अपने राज्य में न्याय व्यवस्था कायम रखने के लिए हर संभव कार्य करते थे। इतिहास में वे सबसे लोकप्रिय और न्यायप्रीय राजाओं में से एक माने गए हैं। महाराजा विक्रमादित्य का सविस्तार वर्णन भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है।
10. सम्राट विक्रमादित्य के जीवन से ही सिंहासन बत्तीसी और विक्रम वेताल नामक कथाएं जुड़ी हुई है। कहते हैं कि अवंतिका नगरी की रक्षा नगर के चारों और स्थित देवियां करती थीं, जो आज भी करती हैं। विक्रमादित्य को माता हरसिद्धि और माता बगलामुखी ने साक्षात दर्शन देकर उन्हें आशीर्वाद दिया था। मान्यता अनुसार उज्जैन के राजा महाकाल है और उन्हीं के अधिन रहकर कोई राजा राज करता था। विक्रमादित्य के जाने के बाद यहां के एकमात्र राजा अब महाकाल ही है। कहते हैं कि अवंतिका क्षेत्र में वही राजा रात रुक सकता है जो कि विक्रमादित्य जैसा न्यायप्रिय हो, अन्यथा उस पर काल मंडराने लगता है।
11. तुर्की के इस्ताम्बुल शहर की प्रसिद्ध लायब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में एक ऐतिहासिक ग्रंथ है 'सायर-उल-ओकुल'। उसमें राजा विक्रमादित्य से संबंधित एक शिलालेख का उल्लेख है जिसमें कहा गया है कि '…वे लोग भाग्यशाली हैं, जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम के राज्य में जीवन व्यतीत किया। वह बहुत ही दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था, जो हरेक व्यक्ति के कल्याण के बारे में सोचता था। ...उसने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच फैलाया, अपने देश के सूर्य से भी तेज विद्वानों को इस देश में भेजा ताकि शिक्षा का उजाला फैल सके। इन विद्वानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर एक परोपकार किया है। ये तमाम विद्वान राजा विक्रमादित्य के निर्देश पर अपने धर्म की शिक्षा देने यहां आए…।'
सेहत /शौर्यपथ /प्रेगनेंसी में वजन बढ़ना आम बात हैं। वहीं, डिलीवरी के बाद भी खान-पान के कारण मां का वजन भी काफी बढ़ जाता है। वक्त के साथ अगर एक्सरसाइज और डाइट से वेट कंट्रोल न किया जाए, तो वजन बढ़ता ही जाता है। खासतौर पर डिलीवरी के बाद कुछ ऐसी चीजें खाने से परहेज करना चाहिए, जिनसे वजन बढ़ता है। आज हम आपको डिलीवरी स्पेशल डाइट बता रहे हैं।
ये चीजें खाएं
फल अपनी डिलीवरी के बाद की डाइट में ताजे फलों की एक प्लेट शामिल करना आपके और बच्चे की सेहत के लिए बहुत अच्छा है। शरीर में एनर्जी लेवल बढ़ाने के लिए विटामिन, खनिज और कार्बोहाइड्रेट जैसे आवश्यक पोषक तत्व बढ़ जाते हैं।
सब्जियां सिर्फ हरी पत्तेदार सब्जियां ही नहीं, सफेद, नारंगी और कई अन्य सब्जियां आपके और आपके बच्चे के लिए फायदेमंद हैं। सब्जियों में मौजूद विटामिन, कैल्शियम और आयरन जैसे पोषक तत्व आपके स्वास्थ्य में बहुत कुछ शामिल कर सकते हैं।
घी डिलीवरी के बाद रिकवरी भी नई मां बनने का एक हिस्सा है। घी आपके स्वास्थ्य को ठीक करने और वापस सामान्य होने में बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है। अगर आप सही मात्रा में घी का सेवन करते हैं, तो यह मांसपेशियों को मजबूत करने और मरम्मत करने में मदद कर सकता है। गोंद लड्डू और पंजिरी में भी घी का उपयोग किया जाता है, जो मां और बच्चे के लिए बहुत अच्छा होता है।
दलिया गर्भावस्था के हार्मोन के कारण, महिलाओं में कब्ज एक बहुत ही सामान्य दुष्प्रभाव है। वास्तव में, प्रसव के बाद भी कुछ कमजोरी हो सकती है। समस्याओं को दूर करने के लिए फाइबर का सेवन करना महत्वपूर्ण है। तो, दलिया शरीर में फाइबर बढ़ा सकता है और आपके स्वास्थ्य को बेहतर बना सकता है।
खजूर खजूर का सेवन नेचुरल शुगर का सेवन करने का एक तरीका है। चीनी आपके शरीर में ऊर्जा प्राप्त करने में मदद करती है। आप रोजाना लगभग 4-5 खजूर खा सकते हैं।
इन चीजों का सेवन न करें
कॉफी कॉफी और चाय में कैफीन अधिक मात्रा में होता है। यह आपके शिशु के लिए अच्छा नहीं है। यह आपके और बच्चे के लिए नींद के लिए भी ठीक नहीं है इसलिए जितना हो सके, डिलीवरी के बाद कॉफी से बचना चाहिए।
मछली मछली प्रोटीन और ओमेगा-3 फैटी एसिड का एक समृद्ध स्रोत हैं। हालांकि, स्तनपान के दौरान कम मात्रा में इसका सेवन करना चाहिए। कुछ प्रकार की मछलियों में हाई लेवल का पारा होता है जो आपके बच्चे को नुकसान पहुंचा सकता है।
ऑयली फूड्स पकौड़े और पुरी जैसे तैलीय फूड्स गैस्ट्रिक समस्याओं का कारण बन सकते हैं। ऑयली और गैस फूड से बचना चाहिए क्योंकि ये आपके शरीर के लिए बहुत भारी होते हैं। वास्तव में, इनमें हाई कैलोरी होती है और यह तेजी से वजन बढ़ा सकता है।
Disclaimer- इस आलेख में दी गई जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है। हालांकि, हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। यह लेख केवल आपकी जानकारी बढ़ाने के उद्देश्य से लिखा गया है।
खाना खजाना /शौर्यपथ / वेट लॉस करने के साथ शरीर को डिटॉक्स करने के लिए हफ्ते में एक बार हल्का खाना जरूर खाना चाहिए। खिचड़ी सबसे लाइट फूड मानी जाती है। आज हम आपको गुजराती खिचड़ी की क्लासिक रेसिपी बता रहे हैं-
सामग्री :
2/3 कप चावल
1/3 मूंग दाल
3 1/2 पानी
1/4 टीस्पून हल्दी
पाउडर
नमक स्वादानुसार
4-5 कली लहसुन
1/4 टीस्पून राई1/2 टीस्पून
जीरा 4-5 करी पत्ते
1/2 टीस्पून लाल मिर्च पाउडर
1 टेबलस्पून तेल
विधि : सबसे पहले दाल और चावल को कई बार पानी से धोकर साफ कर लें। मीडियम आंच पर प्रेशर कूकर में दाल, चावल, हल्दी पाउडर, नमक और पानी डालकर 4 सीटी आने तक पकाएं। इस बीच मीडियम आंच पर पैन में तेल गरम करने के लिए रख दें। कूकर का प्रेशर खत्म होने के बाद ढक्कन खोलकर खिचड़ी को बर्तन में निकाल लें। अब मीडियम आंच में एक तड़का पैन में तेल गरम कर राई और जीरा तड़काएं। फिर लहसुन डालकर हल्का भून लें। इसमें करी पत्ता और लाल मिर्च पाउडर डालकर हल्का भून लें। तड़के को खिचड़ी पर डालकर मिक्स करें। तैयार है गुजराती खिचड़ी। गरमागरम सर्व करें।
सेहत /शौर्यपथ/ अमेरिका में डेंगू-मलेरिया जैसी मच्छर जनित बीमारियों से अब मच्छर ही लोहा लेते नजर आएंगे। जी हां, ब्रिटेन की मशहूर बायोटेक्नोलॉजी फर्म ‘ऑक्सीटेक’ ने फ्लोरिडा में ऐसे जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) मच्छर छोड़े हैं, जो ‘एडीस एजिप्टी’ नस्ल के मच्छरों की आबादी पर लगाम लगाने में मददगार साबित होंगे। ये मच्छर डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, जीका और पीतज्वर जैसी बीमारियों का सबब बनते हैं।
‘ऑक्सीटेक’ ब्राजील, पनामा, केमैन द्वीप और मलेशिया जैसे देशों में पहले ही जीएम मच्छरों की आजमाइश कर चुकी है। हालांकि, फ्लोरिडा के आकाश में ऐसे मच्छर छोड़ने की सरकारी स्वीकृति और जनसहयोग हासिल करने के लिए उसे दस साल संघर्ष करना पड़ा। फ्लोरिडा कीज मॉस्किटो कंट्रोल डिस्ट्रिक्ट (एफकेएमसीडी) के मुताबिक दक्षिणी फ्लोरिडा में स्थित कीज द्वीप समूह में मच्छरों की कुल आबादी में ‘एडीस एजिप्टी’ की हिस्सेदारी चार फीसदी के करीब है। हालांकि, क्षेत्र में होने वाली हर मच्छर जनित बीमारियों के पीछे इसी नस्ल का हाथ है।
ऐसे करेंगे खात्मा
-‘ऑक्सीटेक’ कीज द्वीप समूह में ‘एडीस एजिप्टी’ नस्ल के ऐसे नर मच्छर छोड़ेगी, जो मादा कीट को अविकसित ‘लारवा’ चरण में ही खत्म करने वाले जीन से लैस होंगे।
-मादा मच्छर के साथ सहवास के दौरान जेनेटिकली मॉडिफाइड नर मच्छर इस प्रक्रिया से उत्पन्न अविकसित मादा लारवा में उसे नष्ट करने वाले जीन के वाहक बनेंगे।
-चूंकि, डेंगू-चिकनगुनिया आदि के लिए मादा ‘एडीस एजिप्टी’ जिम्मेदार है, इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी आबादी घटने से इन बीमारियों का प्रकोप भी कम होगा।
दो चरणों में प्रयोग
-अप्रैल के अंत में 06 इलाकों में जेनेटिकली मॉडिफाइड नर ‘एडीस एजिप्टी’ के अंडों से लैस बक्से रखे गए।
-मध्य मई से 12 हफ्तों तक हर सप्ताह बक्से से औसतन 12 हजार मच्छर निकलकर कीज में फैलने लगेंगे।
-‘ऑक्सीटेक’ की 16 हफ्ते तक साल के अंत में दूसरे चरण के तहत 02 करोड़ जीएम मच्छर छोड़ने की योजना है।
दो मायनों में फायदेमंद
1.नर ‘एडीस एजिप्टी’ किसी को काटते नहीं, मादा मच्छरों की उत्पत्ति रोककर धीरे-धीरे पूरी नस्ल को खत्म कर देंगे।
2.हानिकारक कीटनाशकों का सुरक्षित विकल्प साबित होंगे, अत्यधिक इस्तेमाल से मच्छरों में प्रतिरोधक क्षमता पैदा हुई।
पहचान बेहद आसान
-‘ऑक्सीटेक’ ने जीएम मच्छरों में एक खास जीन प्रतिरोपित किया है, जिससे वे पीली रोशनी में हरे रंग में जगमगाने लगते हैं। इससे शोधकर्ताओं के लिए यह जानना आसान होगा कि जीएम मच्छर बक्से से निकलकर कितनी दूरी तक उड़ते हैं? वे कितने दिनों तक जीवित रहते हैं? मादा मच्छरों को कितना आकर्षित कर पाते हैं? उनकी आबादी में कितनी कमी लाने में सक्षम हैं? जीएम मच्छर से उत्पन्न सभी मादा लारवा नष्ट होते हैं या नहीं? प्रयोग से मिले नतीजों के आधार पर जीएम मच्छरों को पूरे अमेरिका में छोड़ने का फैसला किया जाएगा।
लोकेशन गुप्त रखी
-जीएम मच्छरों के काटने और स्थानीय परिस्थितिकी को नुकसान पहुंचने की आशंका के चलते लोग ‘ऑक्सीटेक’ के प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने मच्छरों पर कीटनाशक छिड़ककर उन्हें मारने की धमकी भी दी है। ऐसे में कंपनी ने जीएम मच्छरों के अंडों से लैस बक्सों को ऐसे प्रतिष्ठानों में छोड़ा है, जो बेहद सुरक्षित हैं। उसने बक्सों की लोकेशन भी गुप्त रखी है।
सेहत /शौर्यपथ / गर्मी के मौसम में बाहरी तापमान के साथ-साथ शरीर के अंदर का तापमान भी अधिक होता है। ऐसे में शरीर को पानी एवं द्रव्य पदार्थों की आवश्यकता भी ज्यादा होती है, ताकि तापमान में संतुलन बना रहे। लेकिन जब बार-बार पानी पीने के बाद भी न बुझे प्यास, तो एक बार इन घरेलू उपायों को जरूर आजमाएं -
1 पानी में शहद मिलाकर कुल्ला करने या लौंग को मुंह में रखकर चूसने से बार-बार लगने वाली प्यास शांत होती है।
2 बार-बार प्यास लगने की इस समस्या को जायफल से भी दूर किया जा सकता है इसके लिए बस जायफल का एक टुकड़ा मुंह में रखकर चूसते रहें। आपको प्यास नहीं लगेगी।
3 गाय के दूध से बना दही 125 ग्राम, शकर 60 ग्राम, घी 5 ग्राम, शहद 3 ग्राम व काली मिर्च-इलायची चूर्ण 5-5 ग्राम लें। दही को अच्छी तरह मलकर उसमें अन्य पदार्थों को मिलाएं और किसी स्टील या कलई वाले बर्तन में रख दें। उसमें से थोड़ा-थोड़ा दही सेवन करने से बार-बार लगने वाली प्यास शांत होती है।
4जौ के भुने सत्तू को पानी में घोलकर, उसमें थोड़ा सा घी मिलाकर पतला-पतला पीने से भी प्यास शांत होती है।
5 चावल के मांड में शहद मिलाकर पीने से भी तृष्णा रोग यानि बार-बार प्यास लगना या प्यास न बुझने की समस्या में आराम मिलता है।
6 पीपल की छाल को जलाकर पानी में डाल दें और जब यह राख नीचे बैठ जाए, तो उस पानी को छानकर पिएं। ऐसा करने से प्यास शांत होगी। इसके अलावा पीपल का चूर्ण बनाकर फक्की लगाकर पानी पीने से भी प्यास लगना बंद होगी।
7 पान खाना भी प्यास से मुक्ति पाने का बेहद आसान और कारगर उपाय है। पान खाने से प्यास कम लगती है और मुंह और गला भी नहीं सूखता।
8 दही में गुड़ मिलाकर खाना भी प्यास बुझाने का एक कारगर घरेलु उपाय है। इससे खाना खाने के बाद लगने वाली तेज प्यास को कम किया जा सकता है।
9अनानास का ऊपरी छिलका और भीतरी कठोर भाग निकाल कर उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर, इन टुकड़ों को पानी में पकाकर नरम बनाएं और फिर चीनी की चाशनी बनकर उसमें डाल दें। इस मुरब्बे जैसे जूस का सेवन करने से प्यास बुझती है तथा शरीर की जलन शांत होती है, इससे हृदय को बल मिलता है।
10 इन सब के अलावा तरबूज तो है ही एक बेहतरीन और स्वादिष्ट विकल्प, जिससे प्यास तो बुझती ही है भूख भी मिट जाती है और पेट देर तक भरा-भरा रहेगा।
आस्था /शौर्यपथ /एक असुर था.. दम्बोद्भव।
उसने सूर्यदेव की बड़ी तपस्या की। सूर्य देव जब प्रसन्न हो कर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो उसने "अमरत्व" का वरदान माँगा।
सूर्यदेव ने कहा यह संभव नहीं है।तब उसने माँगा कि उसे एक हज़ार दिव्य कवचों की सुरक्षा मिले। इनमे से एक भी कवच सिर्फ वही तोड़ सके जिसने एक हज़ार वर्ष तपस्या की हो..और जैसे ही कोई एक भी कवच को तोड़े, वह तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो।सूर्यदेवता बड़े चिंतित हुए। वे इतना तो समझ ही पा रहे थे कि यह असुर इस वरदान का दुरुपयोग करेगा...किन्तु उसकी तपस्या के आगे वे मजबूर थे।उन्हे उसे यह वरदान देना ही पड़ा।
इन कवचों से सुरक्षित होने के बाद वही हुआ जिसका सूर्यदेव को डर था।दम्बोद्भव अपने सहस्र कवचों की शक्ति से अपने आप को अमर मान कर मनचाहे अत्याचार करने लगा।वह "सहस्र कवच" नाम से जाना जाने लगा।
उधर सती जी के पिता "दक्ष प्रजापति" ने अपनी पुत्री "मूर्ति" का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र "धर्म" से किया।मूर्ति ने सहस्र्कवच के बारे में सुना हुआ था.. और उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि इसे ख़त्म करने के लिए वे आयें।विष्णु जी ने उसे आश्वासन दिया कि वे ऐसा करेंगे।
समयक्रम में मूर्ति ने दो जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम हुए नर और नारायण।दोनों दो शरीरों में होते हुए भी एक थे - दो शरीरों में एक आत्मा। विष्णु जी ने एक साथ दो शरीरों में नर और नारायण के रूप में अवतरण किया था।
दोनों भाई बड़े हुए। एक बार दम्बोध्भव इस वन पर चढ़ आया। तब उसने एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा और भय का अनुभव किया।उस व्यक्ति ने कहा कि मैं "नर" हूँ, और तुम से युद्ध करने आया हूँ।
भय होते भी दम्बोद्भव ने हंस कर कहा.. तुम मेरे बारे में जानते ही क्या हो ?मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हज़ार वर्षों तक तप किया हो।नर ने हंस कर कहा कि मैं और मेरा भाई नारायण एक ही हैं - वह मेरे बदले तप कर रहे हैं, और मैं उनके बदले युद्ध कर रहा हूँ।
युद्ध शुरू हुआ, और सहस्र कवच को आश्चर्य होता रहा कि सच ही में नारायण के तप से नर की शक्ति बढती चली जा रही थी।जैसे ही हज़ार वर्ष का समय पूर्ण हुआ, नर ने सहस्र कवच का एक कवच तोड़ दिया।लेकिन सूर्य के वरदान के अनुसार जैसे ही कवच टूटा नर मृत हो कर गिर पड़े ।
सहस्र कवच ने सोचा, कि चलो एक कवच गया ही सही किन्तु यह तो मर गया।तभी उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है और वह चकित हो गया।अभी ही तो उसके सामने नर की मृत्यु हुई थी और अभी ही यही जीवित हो मेरी और कैसे दौड़ा आ रहा है ???
लेकिन फिर उसने देखा कि नर तो मृत पड़े हुए थे, यह तो हुबहु नर जैसे प्रतीत होते उनके भाई नारायण थे..जो दम्बोद्भव की तरफ नहीं, बल्कि अपने भाई नर की तरफ दौड़ रहे थे।
दम्बोद्भव ने अट्टहास करते हुए नारायण से कहा कि तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था.. इसने अपने प्राण व्यर्थ ही गँवा दिए।नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए। उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मंत्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे।
तब दम्बोद्भव की समझ में आया कि हज़ार वर्ष तक शिवजी की तपस्या करने से नारायण को मृत्युंजय मंत्र की सिद्धि हुई है..जिससे वे अपने भाई को पुनर्जीवित कर सकते हैं...अब इस बार नारायण ने दम्बोद्भव को ललकारा और नर तपस्या में बैठे।
हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी।फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र फिर फिर चलता रहा।इस तरह 999 बार युद्ध हुआ। एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या। हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता।
कवच टूट गए तो सहस्र्कवच समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जाएगी।तब वह युद्ध त्याग कर सूर्यलोक भाग कर सूर्यदेव के शरणागत हुआ।नर और नारायण उसका पीछा करते वहां आये और सूर्यदेव से उसे सौंपने को कहा।किन्तु अपने भक्त को सौंपने पर सूर्यदेव राजी न हुए।
तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्मफल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं..जिसके लिए आप भी इसके पापों के भागीदार हुए और आप भी इसके साथ जन्म लेंगे इसका कर्मफल भोगने के लिए।इसके साथ ही त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापर का प्रारम्भ हुआ।समय बाद कुंती जी ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया, और कर्ण का जन्म हुआ।
लेकिन यह आम तौर पर ज्ञात नहीं है, कि, कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं है, बल्कि उसके भीतर सूर्य और दम्बोद्भव दोनों हैं।जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास है.. सूर्य और सहस्रकवच।दूसरी ओर नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में आये ।कर्ण के भीतर जो सूर्य का अंश है, वही उसे तेजस्वी वीर बनाता है।
जबकि उसके भीतर दम्बोद्भव भी होने से उसके कर्मफल उसे अनेकानेक अन्याय और अपमान मिलते है और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है।यदि अर्जुन कर्ण का कवच तोड़ता, तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो जाती। इसीलिये इंद्र उससे उसका कवच पहले ही मांग ले गए थे।
आस्था /शौर्यपथ / अभी तक विज्ञान जिसे जान रहा है और जिसे नहीं जानता है वेदों और पुराणों में उसके बारे में विस्तार से मिलता है। हिन्दू धर्म में प्रकृति के हर रहस्य का खुलासा किया गया है। प्रकृति के इन प्रत्येक तत्वों का एक देवता नियुक्त किया गया है। तत्वों के कार्य को मिथकीय रूप देकर समझाया गया है जिसके चलते कहीं-कहीं यह भ्रम भी होता है कि क्या ये देवता हैं या कि प्राकृतिक तत्व? लेकिन इसमें भ्रम जैसा कुछ नहीं।
अच्छे से समझने पर यह भ्रम मिट जाता है। देवता अलग और प्राकृतिक तत्व अलग और परमपिता परमेश्वर अलग हैं, लेकिन ये सभी एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। जैसे आत्मा और शरीर अलग- अलग होने के बावजूद एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसी तरह शरीर को ही आत्मा समझने की भूल अक्सर सभी उसी तरह करते हैं, जैसे प्राकृतिक तत्वों को देवता समझने की भूल करना।
सात लोक हैं : पहले 3 भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक। इन तीनों को त्रैलोक्य कहते हैं। ये त्रैलोक्य नाशवान लोक हैं। दूसरे 3 जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक- ये तीनों अनश्वर या नित्य लोक हैं। नित्य और अनित्य लोकों के बीच में महर्लोक की स्थिति मानी गई है। उक्त 7 में त्रैलोक्य की वायु का वर्णन है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु लेकिन ऐसा नहीं है।
दरअसल, जल के भीतर जो वायु है उसका वेद-पुराणों में अलग मान दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है।
इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।
ये 7 प्रकार हैं- 1. प्रवह, 2. आवह, 3. उद्वह, 4. संवह, 5. विवह, 6. परिवह और 7. परावह।
1. प्रवह : पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं।
2. आवह : आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।
3. उद्वह : वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है।
4. संवह : वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।
5. विवह : पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।
6. परिवह : वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।
7. परावह : वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।
आस्था /शौर्यपथ / अभी तक विज्ञान जिसे जान रहा है और जिसे नहीं जानता है वेदों और पुराणों में उसके बारे में विस्तार से मिलता है। हिन्दू धर्म में प्रकृति के हर रहस्य का खुलासा किया गया है। प्रकृति के इन प्रत्येक तत्वों का एक देवता नियुक्त किया गया है। तत्वों के कार्य को मिथकीय रूप देकर समझाया गया है जिसके चलते कहीं-कहीं यह भ्रम भी होता है कि क्या ये देवता हैं या कि प्राकृतिक तत्व? लेकिन इसमें भ्रम जैसा कुछ नहीं।
अच्छे से समझने पर यह भ्रम मिट जाता है। देवता अलग और प्राकृतिक तत्व अलग और परमपिता परमेश्वर अलग हैं, लेकिन ये सभी एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। जैसे आत्मा और शरीर अलग- अलग होने के बावजूद एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसी तरह शरीर को ही आत्मा समझने की भूल अक्सर सभी उसी तरह करते हैं, जैसे प्राकृतिक तत्वों को देवता समझने की भूल करना।
सात लोक हैं : पहले 3 भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक। इन तीनों को त्रैलोक्य कहते हैं। ये त्रैलोक्य नाशवान लोक हैं। दूसरे 3 जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक- ये तीनों अनश्वर या नित्य लोक हैं। नित्य और अनित्य लोकों के बीच में महर्लोक की स्थिति मानी गई है। उक्त 7 में त्रैलोक्य की वायु का वर्णन है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु लेकिन ऐसा नहीं है।
दरअसल, जल के भीतर जो वायु है उसका वेद-पुराणों में अलग मान दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है।
इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।
ये 7 प्रकार हैं- 1. प्रवह, 2. आवह, 3. उद्वह, 4. संवह, 5. विवह, 6. परिवह और 7. परावह।
1. प्रवह : पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं।
2. आवह : आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।
3. उद्वह : वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है।
4. संवह : वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।
5. विवह : पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।
6. परिवह : वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।
7. परावह : वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।
सेहत /शौर्यपथ / कोरोना वायरस सचमुच घातक है, लेकिन इससे संक्रमित लोग ठीक भी हो गए हैं। यदि आपने लोगों से मिलना-जुलना और भीड़ वाले क्षेत्र में जाना छोड़ दिया है तो सबसे बड़ा बचाव यही है। इसके अलावा भारतीय संस्कृति मैं बताई गई जीवन शैली को अपनाकर आप कोरोना संक्रमण से खुद को बचाकर रख सकते हैं।
1. उपवास : एक दिन का पूर्ण उपवास या व्रत हमारे भीतर के रोगाणु और विषैले पदार्थ को बाहर निकालकर हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। यदि आप वृद्ध हैं तो आप एक समय भोजन करके दूसरे समय ज्यूस ले सकते हैं। इस दौरान नारियल पानी लें और एक बाल हरड़ का सेवन करें। बाल हरड़ को खाना नहीं बल्कि चूसना है। यह आपके शरीर के टॉक्सिन्स को बाहर कर देगी।
2. प्राणायाम : प्राणायाम से हमारे फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है। यदि आप घर में ही रहकर पूरक अर्थात श्वास अंदर लेने की क्रिया कुंभक अर्थात श्वास को अंदर रोकने की क्रिया और रेचक अर्थात श्वास धीरे-धीरे छोड़ने की क्रिया। पूरक, कुंभक और रेचक की आवृत्ति को अच्छे से समझकर प्रतिदिन यह प्राणायाम करने से रोग दूर हो जाते हैं। इसके बाद आप भ्रस्त्रिका, कपालभाती, शीतली, शीतकारी और भ्रामरी प्राणायाम को एड कर लें। यह आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएगा। आप चाहें तो आप प्रतिदिन घर में ही सूर्य नमस्कार की 12 स्टेप 12 बार करें इससे आप हर तरह से फीट होकर रोगों से लड़ने के लिए तैयार रहेंगे।
3. रस : अन्य से बढ़कर रस को ब्रह्म माना है। तुलसी, अदरक, नारियल, संतरा, नीम, धनिया, हल्दी, नींबू, शहतूत, शहद, बेल आदि का ज्यूस लेते रहने से सभी तरह के विटामिन और मिनरल मिलते रहते हैं। आप चाहे तो गिलोय, कड़वा चिरायता को मिलाकर काढ़ा भी बनाकर सप्ताह में 2 बार पी सकते हैं। प्राचीन भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल के लोग समय समय पर इसका सेवन करते रहते थे।
4. धूपम : प्राचीन भारत के लोग घर में समय समय पर घर में धूप देते रहते थे। धूप अर्थात पवित्र लकड़ियों नीम, कर्पूर, गुग्गल आदि को मिलाकर सभी को कंडे पर जलाकर घर में धुआं करना होता है।
5. अन्य-जल : पूर्ण रूप से शाकाहार जीवनशैली अपनाएं और सूर्यास्त के पूर्व की भोजन कर लें। मिताहार करें, मिताहार का अर्थ सीमित आहार। मिताहार के अंतर्गत भोजन ताजा, अच्छी प्रकार से घी आदि से चुपड़ा हुआ होना चाहिए। मसाले आदि का प्रयोग इतना हो कि भोजन की स्वाभाविक मधुरता बनी रहे। फल और हरी ताजा सब्जियों का प्रयोग करें। गेहूं की रोटी का कम ही प्रयोग करें। मक्का, जो और ज्वार के आटे की रोटी भी खाएं। उत्तम भोजन ही हमें रोगाणु से लड़ने की सुरक्षा और गारंटी देता है।
6. उषापान करें : उषा पान का आयुर्वेदिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। हमारे ऋषि-मुनि और प्राचीनकाल के लोग उषा पान करके सेहतमंद बने रहते थे।
प्राचीन भारत के लोग जल्दी सोते थे और जल्दी उठते थे। वे सभी सूर्योदय के पूर्व ही उठ जाते थे। आठ प्रहरों में से एक रात्रि के अंतिम प्रहर को उषा काल कहते हैं यह सूर्योदय के पूर्व का समय होता है। उस दौरान उठकर पानी पीने को ही उषा पान कहते हैं। इस काल में जानने पर जहां शुद्ध वायु मिलती है वहीं पानी पीने से शरीर में जमा मल तुरंत ही बाहर निकल जाता है। उषापान करने से कब्ज, अत्यधिक एसिडिटी और डाइस्पेसिया जैसे रोगों को खत्म करने में लाभ मिलता है।
7. तांबें में पीए पानी और पीतल या चांदी में खाएं खाना : तांबे के लोटे में पीए पानी। रात में तांबे के बरतन में रखा पानी सुबह पीएं तो अधिक लाभ होता है। वात, पित्त, कफ, हिचकी संबंधी कोई गंभीर रोग हो तो पानी ना पीएं। अल्सर जैसे कोई रोग हो तो भी पानी ना पीएं। पीतल के बर्तन में खाना खाने से खाने की गुणवत्ता बढ़ जाती है।
8. ध्यान करें : हालांकि प्राचीन भारत के लोग संध्यावंदन के साथ ध्यान करते थे और सूर्य को अर्घ्य देते थे। आप यदि यह नहीं कर सकते हैं तो कम से कम 5 मिनट के ध्यान को अपनी जीवन शैली का अंग बनाएं। यह भी नहीं कर सकते हैं तो अपने ईष्ट देव की प्रार्थना करें, पाठ करें या चालीसा पढ़ें।
9. प्रात: दौड़ना और रात में टहलना : प्रात: काल यदि दौड़ नहीं सकते तो तेज कदमों से चले, परंतु ध्यान रखें कि रात में किसी भी प्रकार से कसरत, व्यायाम ना करें बल्कि रात में टहलना सेहत के लिए फायदेमंद रहता है। खासकर भोजन करने के बाद थोड़ा टहल लें। कहते भी हैं कि सौ दवाई और एक घुमाई।
10. आत्मनिर्भर बनें : पुराने लोग कहते थे कि कोना, सोना, मौना और धोना जिसने भी अपनाया वह सुखी रहा। कोना अर्थात घर का एक कोना पकड़ लो वहीं रहो, ज्यादा इधर उधर मत घुमो, सोना अर्थात वहीं सोएं और नींद से समझौता ना करें। मौना अर्थात अधिक से अधिक मौन रहो, मौन रहने से मन की शक्ति बढ़ती और व्यक्ति विवादों से भी बचा रहता है। धोना अर्थात अपने कपड़े और शरीर को अच्छे से साफ सुधारा रखें। प्रतिदिन अच्छे से स्नान करें। पुराने लोग नाक, मुंह, घुटने, कोहनी, कान के पीछे, गर्दन के पीछे सहित सभी छिद्रों को अच्छे से साफ करते थे और अपना काम खुद ही करते थे।
धर्म संसार /शौर्यपथ /माह में 2 एकादशियां होती हैं और वर्ष में 365 दिनों में मात्र 24 एकादशियां होती हैं। प्रत्येक तीसरे वर्ष अधिकमास होने से 2 एकादशियां जुड़कर ये कुल 26 होती हैं। शास्त्र में प्रत्येक एकादशी व्रत का नाम और फल अलग-अलग बताया गया है। 7 मई 2021 को वरुथिनी एकादशी का व्रत है। आओ जानते हैं वरुथिनी एकादशी का फल और व्रत के नियम।
वरुथिनी एकादशी व्रत मुहूर्त :
- 7 मई 2021 दिन शुक्रवार।
- वरुथिनी एकादशी पारणा मुहूर्त :05:35:17 से 08:16:17 तक 8, मई को।
- अवधि : 2 घंटे 41 मिनट।
- एकादशी तिथि आरंभ - 06 मई 2021 को दोपहर 02 बजकर 10 मिनट से, एकादशी तिथि समाप्त- 07 मई 2021 को शाम 03 बजकर 32 मिनट तक। द्वादशी तिथि समाप्त- 08 मई को शाम 05 बजकर 35 मिनट पर।
- एकादशी व्रत पारण समय- 08 मई को प्रातः 05 बजकर 35 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 16 मिनट तक पारण की कुल अवधि - 2 घंटे 41 मिनट।
पूजन विधि :
1. दशमी तिथि की रात्रि में सात्विक भोजन करें।
2. एकादशी का व्रत दो प्रकार से किया जाता है। पहला निर्जला रहकर और दूसरा फलाहार करके।
3. एकादशी तिथि को सुबह सूर्योदय से पहले उठकर शौच आदि से निवृत्त होकर स्नान करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें।
4. उसके बाद भगवान विष्णु को अक्षत, दीपक, नैवेद्य, आदि सोलह सामग्री से उनकी विधिवत पूजा करें।
5. फिर यदि घर के पास ही पीपल का पेड़ हो तो उसकी पूजा भी करें और उसकी जड़ में कच्चा दूध चढ़ाकर घी का दीपक जलाएं।
6. घर से दूर है तो तुलसी का पूजन करें। पूजन के दौरान ॐ नमो भगवत वासुदेवाय नम: के मंत्र का जप करते रहें।
7. फिर रात में भी भगवान विष्णु और लक्ष्मी माता की पूजा-अर्चना करें।
8. पूरे दिन समय-समय पर भगवान विष्णु का स्मरण करें रात में पूजा स्थल के समीप जागरण करें।
9. एकादशी के अगले दिन द्वादशी को व्रत खोलें। यह व्रत पारण मुहुर्त में खोलें। व्रत खोलने के बाद ब्राह्मण या किसी गरीब को भोजन कराएं।
व्रत के नियम :
कांस्यं मांसं मसूरान्नं चणकं कोद्रवांस्तथा।
शाकं मधु परान्नं च पुनर्भोजनमैथुने।।- भविष्योत्तर पुराण
1. इस दिन कांसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए।
2. मांस और मसूर की दाल का सेवन नहीं करना चाहिए।
3. चने का और कोदों का शाक नहीं खाना चाहिए। साथ ही शहद का सेवन भी निषेध माना गया है।
4. एक ही वक्त भोजन कर सकते हैं दो वक्त नहीं।
5. इस दौरान स्त्री संग शयन करना पाप माना गया है।
6. इसके अलावा पान खाना, दातुन करना, नमक, तेल अथवा अन्न वर्जित है।
7. इस दिन जुआ खेलना, क्रोध करना, मिथ्या भाषण करना, दूसरे की निंदा करना एवं कुसंगत त्याग देना चाहिए।
व्रत का फल :
1. वरुथिनी एकादशी सौभाग्य देने, सब पापों को नष्ट करने तथा मोक्ष देने वाली है।
2. वरुथिनी एकादशी का फल दस हजार वर्ष तक तप करने के बराबर होता है।
3. कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय एक मन स्वर्णदान करने से जो फल प्राप्त होता है वही फल वरुथिनी एकादशी के व्रत करने से मिलता है।
4. वरूथिनी एकादशी के व्रत को करने से मनुष्य इस लोक में सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है।
5. शास्त्रों में अन्नदान और कन्यादान को सबसे बड़ा दान माना गया है। वरुथिनी एकादशी के व्रत से अन्नदान तथा कन्यादान दोनों के बराबर फल मिलता है।
6. इस व्रत के महात्म्य को पढ़ने से एक हजार गोदान का फल मिलता है। इसका फल गंगा स्नान के फल से भी अधिक है।
7. इस दिन खरबूजा का दान करना चाहिए।
वरुथिनी एकादशी व्रत की कथा :
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के निवेदन करने पर इस एकादशी व्रत की कथा और महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में रेवा नदी (नर्मदा नदी) के तट पर अत्यन्त दानशील और तपस्वी मान्धाता नामक राजा का राज्य था। दानवीर राजा जब जंगल में तपस्या कर रहा था। उसी समय जंगली भालू आकर उसका पैर चबाने लगा और साथ ही वह राजा को घसीट कर वन में ले गया। ऐसे में राजा घबराया और तपस्या धर्म का पालन करते हुए उसने क्रोधित होने के बजाय भगवान विष्णु से प्रार्थना की।
तपस्वी राजा की प्रार्थना सुनकर भगवान श्री हरि वहां प्रकट हुए़ और सुदर्शन चक्र से भालू का वध कर दिया, परंतु तब तक भालू राजा का एक पैर खा चुका था। इससे राजा मान्धाता बहुत दुखी थे। भगवान श्री हरि विष्णु ने राजा की पीड़ा और दु:ख को समझकर कहा कि पवित्र नगरी मथुरा जाकर तुम मेरी वाराह अवतार के विग्रह की पूजा और वरूथिनी एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से भालू ने तुम्हारा जो पैर काटा है, वह ठीक हो जाएगा। तुम्हारा इस पैर की यह दशा पूर्वजन्म के अपराध के कारण हुई है।
भगवान श्रीहरि विष्णु की आज्ञा मानकर राजा पवित्र पावन नगरी मथुरा पहुंच गए और पूरी श्रद्धा एवं भक्ति के साथ इस व्रत को किया जिसके चलते उनका खोया हुआ पैर उन्हें पुन: प्राप्त हो गया। और वह फिर से सुन्दर अंग वाला हो गया।
खाना खजाना /शौर्यपथ / गर्मियों में खाने के साथ परोसा गया रायता खाने का स्वाद बढ़ाने के साथ शरीर को ठंडक पहुंचाने का काम भी करता है। ऐसे ही एक पोषक तत्वों से भरपूर रायते का नाम है मूंगफली खीरे का रायता। इस रायते को आप पुलाव या रोटी-सब्जी के साथ साईड डिश के रूप में परोस सकते हैं। तो आइए जानते हैं कैसे बनाया जाता है यह टेस्टी रायता।
मूंगफली खीरे का रायता बनाने के लिए सामग्री-
-250 ग्राम दही
-जरूरत अनुसार नमक
-जरूरत अनुसार चीनी
-जरूरत अनुसार करी पत्ता
-1 छोटी चम्मच उड़द दाल
-जरूरत अनुसार भुनी हुई मूंगफली
-2 - खीरा
-2 छोटी चम्मच ऑलिव पमिस ऑयल
मूंगफली खीरे का रायता बनाने का तरीका-
मूंगफली खीरे का रायता बनाने के लिए सबसे पहले खीरे को धोकर उसका छिलका उतारकर बारिक कस लें।अब मूंगफली के दाने को हल्का भूरा होने तक भूनकर दरदरा पीस लें। इसके बाद एक बाउल में दही डालकर अच्छी तरह फेंट लें। अब इस दही में कसा हुआ खीरा डालकर अच्छी तरह मिला लें। इसमें ऊपर से नमक, शक्कर का पाउडर के साथ बाकी सारी सामग्री भी डालकर अच्छी तरह से मिला लें।
अब एक फ्राई पैन में थोड़ा सा तेल डालें। अब इसमें जीरा, उड़द दाल, करी पत्ते का तड़का लगाएं। इसे तेल में दाल का रंग हल्का भूरा होने तक भूनें। अब बाउल में तैयार किए गए दही और बाकी सारी चीजों के मिश्रण को, फ्राई पैन में तैयार किए गए दाल आदि के मिश्रण के साथ मिला दें। आपका खीरा मूंगफली का रायता सर्व करने के लिए तैयार है। इसे हरे धनिए से गार्निश करके सर्व करें।
टिप्स ट्रिक्स /शौर्यपथ / कोरोना के प्रकोप से बचे रहने के लिए आज हर कोई सावधानी बरतने के साथ अपनी इम्यूनिटी मजबूत बनाए रखने पर भी जोर दे रहा है। इम्यूनिटी को स्ट्रांग बनाए रखने के लिए खाए जाने वाले पौष्टिक भोजन की बात हो या काढ़े की, अदरक का इस्तेमाल दोनों ही चीजों में किया जाता है। अदरक न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाता है बल्कि इसका नियमित सेवन व्यक्ति को कई तरह के संक्रमण से भी दूर रखने में मदद करता है। लेकिन ऐसा तभी होता है जब बाजार से खरीदी जाने वाली अदरक असली होती है। जी हां आप बाजार से जो अदरक खरीदते हैं, जरूरी नहीं वो असली ही हो। नकली अदरक एक प्रकार की पहाड़ी जड़ होती है, जिसकी पहचान कर पाना मुश्किल होता है। आइए जानते हैं कैसे इन टिप्स की मदद से आप बड़ी आसानी से पहचान पाएंगे असली और नकली अदरक के बीच का फर्क।
पहाड़ी जड़ व अदरक के बीच का बड़ा अंतर-
अदरक और पहाड़ी जड़ दिखने में बिल्कुल एक जैसी लगती हैं। बावजूद इसके दोनों में एक बड़ा फर्क होता है। अगर आप अदरक को अपनी नाक के पास लाते हैं तो आपको उसकी बहुत तेज व तीखी खुशबू आती है, जो कि असली अदरक की पहचान होती है। वहीं नकली अदरक में खुशबू नहीं आती है। असली अदरक को आप थोड़ा सा चखकर भी देख सकते हैं। इसका स्वाद आपको बता देगा कि यह असली है या नकली।
अदरक के छिलके से करें पहचान-
अदरक खरीदने से पहले उसके छिलके उतारकर जरूर देखें। असली अदरक में नाखून चुभाने से उसका छिलका तुरंत उतर जाएगा और आपके हाथों में उसकी तीखी खुशबू रह जाएगी। लेकिन अगर अदरक का छिलका बहुत कठोर होता है तो आप उसे खरीदने से बचें क्योंकि वह अदरक नहीं है।
साफ अदरक से भी रहें दूर-
यदि आप मिट्टी लगी हुई अदरक की जगह साफ अदरक खरीदना ज्यादा पसंद करती हैं तो अपनी इस आदत को बदल डालें। यह आपकी सेहत को नुकसान पहुंचाने के लिए एक जाल भी हो सकता है। दरअसल, आजकल दुकानदार अदरक को साफ करने के लिए एक प्रकार के एसिड का प्रयोग करते हैं। ऐसी अदरक एसिड से धुली होने के कारण दिखने में अधिक साफ नजर आती है। लेकिन यह साफ अदरक आपकी सेहत को बड़ा नुकसान भी पहुंचा सकती हैं।
सेहत /शौर्यपथ / कोरोना वायरस की दूसरी लहर के बीच दुनिया इस महामारी का विकराल रूप देख रही है। वहीं, इस बार कोरोना के इन लक्षणों में सांस लेने में तकलीफ ऐसी वजह है, जिसकी वजह से इस बीमारी का डरावना रूप देखने को मिला। कोरोना के मरीजों में ऑक्सीजन लेवल की कमी होने के कारण उनकी हालत तेजी से बिगड़ती है। ऐसे में सभी लोग शरीर में ऑक्सीजन लेवल को बनाए रखने के लिए डाइट का खास ख्याल रख रहे हैं। आइए, जानते हैं ऑक्सीजन को बनाए रखने के लिए आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
इन चीजों के सेवन से बना रहा है ऑक्सीजन लेवल
शरीर में ऑक्सीजन लेवल बनाए रखने के लिए आयरन, कॉपर, विटामिन ए, विटामिन बी2, विटामिन बी3, विटामिन बी5, विटामिन बी6, विटामिन बी9 और विटामिन 12 की जरूरत होती है।
विटामिन बी12 के स्रोत-
मांसाहारी स्रोत - ऑर्गन मीट (लीवर), चिकन, टूना फिश और अंडे।
शाकाहारी स्रोत- मशरूम, आलू, एवोकाडो, मूंगफली, ब्रोकली, ब्राउन राइस और पनीर आदि।
विटामिन बी2-
मांसाहारी स्रोत - अंडे, ऑर्गन मीट (किडनीलीवर)।
शाकाहारी स्रोत- दूध, दही, ओट्स, बादाम, बींस और टमाटर।
विटामिन ए-
मांसाहारी स्रोत - आर्गन मीट, टूना फिश और अंडे में मिलता है।
शाकाहारी स्रोत- गाजर, शकरकंद, लौकी, आम, वनीला आइसक्रीम और पालक।
आयरन-
मांसाहारी स्रोत - ओएस्टर, चिकन, बत्तख और बकरे के मीट में।
शाकाहारी स्रोत- बींस, गहरे हरे रंग की पत्तेदार सब्जियां, दालेंऔर मटर।
कॉपर-
मांसाहारी स्रोत - ओएस्टर (सीप), क्रैब और टर्की।
शाकाहारी स्रोत- चॉकलेट, तिल, काजू, आलू, शिताके मशरूम।
Disclaimer- इस आलेख में दी गई जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है। हालांकि, हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। यह लेख केवल आपकी जानकारी बढ़ाने के उद्देश्य से लिखा गया है।
सेहत /शौर्यपथ / कहते हैं हेल्थ एक प्रोसेस है। आप एक दिन में हेल्दी नहीं होते। कई छोटी-छोटी चीजें आपको मजबूत बनाती हैं। यही बात इम्युनिटी पर भी लागू होती है। मजबूत इम्युनिटी हमारे बचपन के खान-पान पर भी निर्भर करती है। वहीं, बचपन में कुछ ऐसे टीके होते हैं, जिनके लगने से गंभीर बीमारियों से बचाव होता है। आज हम आपको ऐसे टीके बता रहे हैं, जिन्हें पांच साल के अंदर बच्चों को लगवाना बहुत जरूरी है।
ये टीके हैं बेहद जरूरी
-गर्भवती महिला एंव गर्भ मे पल रहे शिशु को टिटेनस की बीमारी से बचाने के लियेटिटेनसटाक्साइड 1 / बूस्टर टीका और दूसरा टीका एक महिने के अंतर में लगवाएं। अगर पिछले तीन वर्ष मे दो टीके लगे हों तो केवल एक टीका लगवा लेना ही काफी होता है।
-हेपेटाइटिस बी वायरस के संक्रमण से लीवर की सूजन आ जाती है, पीलिया हो जाता है और लंबे समय तक संक्रमण के बाद लीवर कैंसर का भी खतरा हो सकता है। यह टीका बेहद जरूरी है जो हिपेटाइटिस बी के संक्रमण से बचाव करता है।
-डीपीटी टीकों की एक श्रेणी होती है, जो इंसानो को होने वाले तीन संक्रामक बीमारियों डिफ्थीरिया, पर्टुसिस (काली खांसी) और टिटनेस से बचाव के लिए दिए जाते हैं।
-पोलियो का टीका पोलियो नामक बीमारी जिसमें बच्चे अपंग हो जाते हैं, से सुरक्षा प्रदान करता है। यह टीका भी बच्चों को जरूर लगवाना चाहिए।
-बच्चे को टीबी से बचाने के लिए अनिवार्य रूप से बी सी जी का टीका लगवा दें। बीसीजी का टीका लग जाने पर शिशु को टीबी की बीमारी से बचाया जा सकता है।
-हिब वेक्सीन का टीका बच्चों को डिफ्थीरिया, काली खांसी, टेटनस, हेपेटाइटिस-बी और एच इन्फलांजी-बी से सुरक्षित रखता है। हिब बेक्टीरिया के संक्रमण से न्यूमोनिया एवं मष्तिष्क ज्वर (मेनिनजाइटिस) जैसी गंभीर बीमारी हो सकती हैं।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
