August 09, 2026
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              नजरिया / शौर्यपथ / राजस्थान विधानसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी ने जब अशोक गहलोत और सचिन पायलट को जिम्मेदारी सौंपी थी, तब उन्होंने दोनों नेताओं को अपने साथ खड़ा करके एक खुशनुमा तस्वीर ट्वीट की थी। इस तस्वीर को उन्होंने राजस्थान का मिला-जुला रंग करार दिया था। पर इस तस्वीर कोे बरकरार रखने के लिए पौने दो साल बाद भी पहले दिन की तरह उन्हें दोनों नेताओं की लड़ाई में बीच-बचाव करना पड़ रहा है। एक माह तक चली रस्साकशी के बाद राजस्थान सरकार का संकट फिलहाल टल गया है, पर अशोक गहलोत व सचिन पायलट के बीच टकराव अभी भी बरकरार है। गहलोत की तमाम कोशिशों के बावजूद पार्टी में पायलट की वापसी से साफ है कि कांग्रेस अपने नेताओं को खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहती। इससे गहलोत को भी एहसास हो गया कि संगठन से जुड़े मामलों में उनका निर्णय अंतिम नहीं है।
    करीब एक माह तक चली इस लड़ाई में सचिन पायलट को भी वह सब हासिल नहीं हुआ, जिसके लिए उन्होंने बगावत का झंडा बुलंद किया था। पायलट को अपने साथ 30 विधायक होने का भरोसा था, पर बगावत के ऐलान के साथ ही कई भरोसेमंद विधायकों ने उनका साथ छोड़ दिया। आखिर में सिर्फ 19 विधायक उनके साथ गुरुग्राम के होटल पहुंचे। इनमें से भी कई विधायक मुख्यमंत्री के संपर्क में थे। गहलोत ने संख्या कम होने के बावजूद करीब 102 विधायक जुटा लिए थे। बसपा विधायकों के कांग्रेस में विलय का मामला अदालत में है और कई विधायकों पर उन्हें पूरा भरोसा नहीं था। दो-तीन विधायक भी इधर-उधर हुए, तो खेल पलट सकता था। उनकी रणनीति भाजपा पर टिकी थी। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के रुख को गहलोत अपने लिए फायदेमंद मान रहे थे, पर वह आश्वस्त नहीं थे। यही वजह है कि पार्टी अपने विधायकों को कभी एक होटल, तो कभी दूसरे होटल में घेराबंदी कर रोकने की कोशिश करती रही।
    इस पूरे मामले में अशोक गहलोत ने सरकार गिराने की साजिश करने वाले लोगों को मात देकर कांग्रेस को रणनीतिक बढ़त दिलाई है। मध्य प्रदेश के बाद पार्टी के हौसले पस्त थे। शुरुआत में तो लगा था कि राजस्थान भी हाथ से फिसल गया, पर गहलोत ने जिस तरह रणनीति को अंजाम दिया, उससे पार्टी की ताकत बढ़ गई है।
    पायलट को भी पता था कि गहलोत ने एक बार बहुमत साबित कर दिया, तो उनके लिए पार्टी में वापसी मुश्किल हो जाएगी। इसके साथ विधायकों की सदस्यता भी खत्म हो सकती है। पूरी कवायद में कांग्रेस एक विजेता के तौर पर उभरी है। पार्टी जहां राजस्थान में अपनी सरकार बचाने में सफल रही, वहीं टूट से भी बच गई। कांग्रेस लगातार कहती रही कि पायलट और उनके समर्थकों के लिए दरवाजे खुले हैं। गहलोत ने पायलट पर सीधा हमला बोला, तो सफाई देने में भी देर नहीं की।
    सचिन पायलट अब वापस आ चुके हैं। पार्टी ने उनकी शिकायतों पर विचार करने के लिए तीन सदस्यीय समिति के गठन के अलावा कोई वादा नहीं किया है। समिति पायलट और गहलोत के साथ विधायकों से चर्चा करके अपनी रिपोर्ट देगी। कमेटी की सिफारिशों के आधार पर कदम उठाए जाएंगे। पायलट समर्थक विधायकों को सरकार में पहले के मुकाबले ज्यादा लालबत्ती मिल सकती है। शुरुआती तौर पर ऐसा लगा कि पायलट ने राजनीतिक गलती की है, पर उन्होंने शुरू में जो बात कही, उसी पर कायम रहे। उन्होंने अपने हमले को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक सीमित रखा। यही सावधानी उनकी वापसी की वजह बनी। हो सकता है, पायलट कुछ दिन कमजोर नजर आएं, पर पार्टी में उनका कद बढे़गा।
    गहलोत को राजनीति का जादूगर कहा जाता है। कुछ हद तक यह बात सही भी है, क्योंकि अभी तक वह अपने सभी विरोधियों को मात देते हुए आगे बढ़ते रहे हैं। हरिदेव जोशी, परसराम मदेरणा, नवल किशोर शर्मा, शीशराम ओला और रामनिवास मिर्धा जैसे नेताओं को प्रदेश की राजनीति में दरकिनार कर गहलोत आगे बढे़ हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि पार्टी हाईकमान के निर्णय उनके लिए अंतिम हैं। ऐसे में, यह मामला उनके लिए इम्तिहान से कम नहीं है। गहलोत किस तरह पायलट के साथ अपनी अदावत भुलाकर उन्हें सम्मान देते हैं, यह राजस्थान में कांग्रेस सरकार की स्थिरता का पैमाना होगा और सचिन को अब एक नई शुरुआत करनी होगी।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) सुहैल हामिद, विशेष संवाददाता, हिन्दुस्तान

     

    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / देश के दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ अपनी कल की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अधिक से अधिक जांच की बात पर जिस तरह से जोर दिया, वह महामारी से निपटने में इस कदम की अहमियत को स्पष्ट कर देता है। उन्होंने उन राज्यों से खास तौर से अपील की कि वे अपने यहां जांच की रफ्तार और दायरा बढ़ाएं, जहां संक्रमण-दर और मृत्यु-दर अधिक हैं। बैठक के बाद प्रधानमंत्री ने ट्वीट करके बाकायदा बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना सरकारों से इस काम में तेजी लाने को कहा। इसमें कोई दोराय नहीं कि जांच की संख्या और दायरे के विस्तार के साथ संक्रमण के आंकडे़ बढ़ेंगे, लेकिन संक्रमितों को वक्त पर उपचार मुहैया कराकर ही मृत्यु-दर को कम किया जा सकता है। अब यह वैश्विक स्तर पर स्थापित तथ्य है कि जिन देशों ने बचाव के अन्य उपायों के साथ शुरुआती दौर में ही ज्यादा से ज्यादा जांच का रास्ता अपनाया, वे आज बेहतर स्थिति में हैं।
    हमारे लिए राहत की एक बात यह है कि मृत्यु-दर दो फीसदी के नीचे आ गई है। जाहिर है, रिकवरी रेट बढ़ रहा है। लेकिन महामारी से हमारी लड़ाई अभी काफी कठिन मोड़ पर है। चूंकि संक्रमण के मामले अब ग्रामीण इलाकों से भी काफी मिल रहे हैं, इसलिए हमें पहले से अधिक चिकित्सकों, अस्पतालों और अन्य संसाधनों की जरूरत पड़ेगी, जबकि हम अब तक इस जंग में तकरीबन 200 डॉक्टरों की शहादत दे चुके हैं और पहली कतार के कोरोना वॉरियर्स व अस्पतालों पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है। यही नहीं, लंबे लॉकडाउन और आर्थिक सुस्ती के कारण आम लोगों पर भी एक अलग किस्म का दबाव है। खुद प्रधानमंत्री ने कल की बैठक में इसका संकेत किया था। ऐसे में, एक राष्ट्र के तौर पर यह हमारे धैर्य की परीक्षा की घड़ी है। और महामारी को परास्त करने के लिए हमें इस परीक्षा में पास होना ही होगा।
    कल की बैठक में कुछ मुख्यमंत्रियों ने राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ) से कैप हटाने की भी मांग की, ताकि वे अपने सूबे में महामारी की चुनौतियों का मुकाबला अच्छे तरीके से कर सकें। अभी इस कोष से अधिकतम खर्च-सीमा 35 फीसदी है। पंजाब, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने केंद्र से इससे अधिक राशि निकालने की इजाजत मांगी है। राज्यों की यह मांग जायज लगती है, क्योंकि पिछले छह महीनों से उनकी राजस्व-उगाही बुरी तरह प्रभावित हुई है, और फिर बिहार व केरल जैसे राज्य तो बाढ़ की आपदा का भी सामना कर रहे हैं। स्वाभाविक है, उन्हें इस कैप की वजह से दुश्वारियां पेश आ रही हैं। बहरहाल, केंद्र और राज्यों ने जिस समन्वय के साथ अब तक इस महामारी का मुकाबला किया है, उसकी यकीनन सराहना की जानी चाहिए। तब तो और, जब अमेरिका जैसा मजबूत संघीय ढांचा इस महामारी में चरमराता हुआ दिखा और राष्ट्रपति ट्रंप व विपक्ष शासित राज्यों की तनातनी की कीमत हजारों अमेरिकियों को जान देकर चुकानी पड़ी। भारत में राज्यों के मुख्यमंत्री के साथ प्रधानमंत्री शुरुआत से ही लगातार बैठकें करते रहे हैं और इससे समस्याओं के मूल तक पहुंचने की एक समझ बनी है। यह एक मुश्किल लड़ाई है और विभिन्न शासकीय इकाइयों के बीच बेहतर तालमेल, अधिकतम जांच एवं व्यापक जन-जागरूकता से ही इसमें फतह मिल सकती है।

     

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल 15 अगस्त को दिए गए अपने भाषण में जनसंख्या नियंत्रण को आज की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बताया था, बावजूद इसके आज तक सरकार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा सकी है। यह समझने की जरूरत है कि किसी भी देश के संसाधन बहुत सीमित होते हैं, इसलिए असीमित रूप से बढ़ती जनसंख्या उस संसाधन को समय-पूर्व खत्म कर सकती है। जनसंख्या वृद्धि के कारण देश का विकास भी अवरुद्ध हो जाता है। इसलिए सरकार से गुजारिश है कि आगामी संसद सत्र में जनसंख्या नियंत्रण विधेयक पेश किया जाए, क्योंकि देश में लगातार बढ़ती आबादी को थामना बहुत जरूरी है। इसी से योजनाएं सही तरह धरातल पर कामयाब हो सकेंगी। इस दिशा में आगे बढ़ना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अब देश बढ़ती आबादी के बोझ तले हांफने लगा है।
    प्रमोद अग्रवाल गोल्डी, हल्द्वानी

    भीड़ में अकेला
    परदे पर अमूमन हर कहानी के जरिए जिंदगी और उसकी सार्थकता का पैगाम देने वाली फिल्मी और टीवी दुनिया में आखिर क्या हो गया है कि लगातार चमकते सितारों की खुदकुशी की खबरें आने लगी हैं? बीते एक हफ्ते में समीर शर्मा और अनुपमा पाठक की आत्महत्या ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि परदे की चकाचौंध के पीछे या तो सब कुछ ठीक नहीं है या फिर वहां हालात से लड़ते कलाकारों के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं है, जो वक्त पर उन्हें थाम सके। विडंबना यह है कि शायद हमारा समाज अभी इस स्तर तक संवेदनशील नहीं हुआ है या फिर भावनात्मक स्तर पर उसमें सामूहिकता का इतना विकास नहीं हुआ है कि वह अपने-अपने दायरे और पहुंच के लोगों पर गौर कर सके और वक्त पर उनके लिए सहारा बन जाए। वरना समीर शर्मा और अनुपमा पाठक, दोनों ने अपने सोशल मीडिया पर जिस तरह की तस्वीरों और वीडियो के जरिए अपनी मन:स्थिति का इजहार किया था, उससे साफ लग रहा था कि वे किसी भावनात्मक द्वंद्व से गुजर रहे हैं और खुद को अकेला पा रहे हैं।
    अरविंद पाराशर, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश

    तिरंगे वाले मास्क
    कई कंपनियां पैसा कमाने के उद्देश्य से बगैर सोचे-समझे कोई भी उत्पाद बाजार में ले आती हैं। उनका एकमात्र मकसद पैसा कमाना होता है। उनकी यह लालसा देश की अवमानना करने से भी नहीं चूकती। जैसे, स्वतंत्रता दिवस निकट आने पर मास्क बनाने वाली कंपनियों ने तिरंगे के चित्र वाले मास्क को बेचना शुरू कर दिया है। इस तरह के मास्क बनाना गलत है, क्योंकि इसे अपने मुंह पर लगाने के बाद व्यक्ति खांसता व छींकता भी है। फिर, अनुपयोगी होने पर उसे कूड़े में भी फेंक देता है। इस तरह तिरंगे वाले मास्क से हमारी राष्ट्रीयता के प्रतीक का अपमान होगा। इसलिए इन्हें खरीदना और बेचना प्रतिबंधित होना चाहिए। सरकार और स्थानीय प्रशासन के लोग इस पर अविलंब गौर करें।
    आशीष सकलेचा, जावरा

    बेखौफ अपराधी
    देश में आए दिन बलात्कार की घटनाएं घटित हो रही हैं। कोई भी राज्य इन घटनाओं से अछूता नहीं है। अभी हाल ही में दिल्ली में 12 वर्षीया बालिका के साथ जिस तरीके की र्दंरदगी की गई, उसे देखकर निर्भया कांड की यादें ताजा हो गईं। आखिर कब तक नारी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती रहेगी? यह हमारे सरकारी तंत्र की विफलता का परिणाम है कि निर्भया के दोषियों को इतने वर्षों के बाद सजा मिली। असल में, अपराधियों में खौफ इसीलिए नहीं होता, क्योंकि कहीं न कहीं हमारा सरकारी तंत्र गुनहगारों की मदद करता है! इसी कारण आज महिलाओं के प्रति अपराध की दर बढ़ रही है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून के साथ सरकारी तंत्र में भी व्यापक बदलाव लाने की जरूरत है।
    शुभम वैष्णव, राजस्थान

     

    ओपिनियन / शौर्यपथ / भारत और भारतीय कलाओं से भगवान श्रीकृष्ण का बहुत गहरा सरोकार है। यह पवित्र कलात्मक सरोकार या संबंध आध्यात्मिक भी है और व्यावहारिक भी। वाद्य यंत्रों की बात करें, तो भी श्रीकृष्ण ही आधार हैं। अगर बांसुरी की एक वाद्य के रूप में शुरुआत हुई, तो उन्हीं से हुई। 64 कलाओं के देवता कहलाने वाले कृष्ण की बांसुरी से खूब संगीत प्रवाहित-प्रसारित हुआ। संगीत के साथ ही नृत्य से भी वह गहरे जुड़े थे। यह सुविदित है कि उनके प्रेम-भक्ति पूर्ण महारास में संगीत और नृत्य, दोनों की प्रधानता थी। शास्त्र बताते हैं कि कृष्ण के सौजन्य से ही पूरे ब्रज में संगीत-नृत्य की गूंज उठती थी और आज भी उठती है।
    ब्रज के कन्हैया का संबंध भारतीय कलाओं से बहुत लंबे समय से चला आ रहा है और ऋषि-मुनियों ने भी इसे पूरे भक्ति भाव से आगे बढ़ाया। ऋषि-मुनि जब श्रीकृष्ण का ध्यान करते थे, तब गाने-नाचने को स्वत: प्रेरित हो जाते थे। श्रीकृष्ण की प्रेमपगी छाया में ही संगीत, नृत्य के अनेक पद-ग्रंथ रचे गए। बाद में सूरदास जैसे कवि हुए, जिन्होंने कृष्ण की महिमा में एक से एक पद लिखे। उनकी रचनाओं में कृष्ण के मोहक बालरूप और वृंदावन की कुंज गलियन की चर्चा बड़ी खूबसूरती से होती है। सूरदास अपनी रचनाओं में श्रीकृष्ण के प्रेरक स्वरूप को साकार कर देते हैं।
    सर्वज्ञात है कि हमारी परंपरा में या तो श्रीकृष्ण ने नृत्य किया या महादेव शिव ने। पुराणों के समय से इन दोनों देवताओं को नर्तक नाम से भी पुकारा जाता है। यह संभव है कि श्रीकृष्ण को शिवजी से ही संगीत-नृत्य का ज्ञान मिला हो। श्रीकृष्ण ने आम जनमानस को लुभाने के लिए बहुत सहजता से अपने कला ज्ञान का प्रयोग किया।
    कला जगत कृष्ण के बिना अधूरा है और विशेष रूप से कथक नृत्य और कृष्ण का प्रगाढ़ संबंध है। हमारे इष्टदेव कृष्ण ही हैं। बहुत पुराने समय से हम लोग उनकी पूजा करते आ रहे हैं। पूजा की यह विधि आज भी वही है। हम आज भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर पूरे भक्ति भाव से उनकी पूजा करते हैं। समय बदल गया, पहले लखनऊ में, मुझे याद है, मेरे यहां बहुत धूमधाम से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का आयोजन होता था। आज जन्माष्टमी को भले एक दिन तक समेट लिया गया हो, लेकिन पहले मेरे शहर लखनऊ में ही आयोजन छह दिन तक निरंतर चलता था। रोज पंडित जी के साथ मिलकर हम बहुत भावपूर्ण पूजा करते थे। आयोजन में बड़े-बड़े कलाकार, संगीतकार, नर्तक आते थे और अपनी प्रस्तुति भी देते थे। श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम दर्शाने के लिए ही वह कार्यक्रम होता था। मेरे पिता, दादा की खूब व्यस्तता हो जाती थी, छह दिन तक केवल श्रीकृष्ण उत्सव की धूम रहती थी। जो भी आयोजन में आता, खाली हाथ नहीं जाता, साथ में चावल, आटा, दाल, घी इत्यादि ले जाता था। बाहर से जो कलाकार देखने आते थे, उन्हें भी वहां गाना-बजाना करना पड़ता था। याद है, बड़े-बड़े कलाकार आते थे, लेकिन अब वह आयोजन नहीं रहा। तब हम कलाकारों को श्रीकृष्ण ही परस्पर जोड़ने का काम करते थे। बाबा उस आयोजन में खुद ही सबकी सेवा करते थे, बर्तन तक मांजते थे। भाव ऐसा होता था, मानो सचमुच भगवान ने बाल रूप में अवतार ले लिया हो। लखनऊ छूट गया। दिल्ली रहने लगा। मेरी बड़ी इच्छा है कि फिर से लखनऊ में कुछ कर सकूं।
    कथक नृत्य ही नहीं, भारत में जो अन्य शास्त्रीय नृत्य शैलियां हैं, उनमें भी कृष्ण के महत्व को माना गया है। हम कलाकार दक्षिण के हों या उत्तर के या पूरब के, कृष्ण की गाथाओं का प्रदर्शन और गायन हरेक ने किया है। अपनी-अपनी भाषा में सब गाते रहे हैं, लेकिन कृष्ण को कोई भुला नहीं पाया। कृष्ण की चर्चा और उनके प्रसंग पूरे कला जगत में विद्यमान हैं। त्यागराज जी ने भी कृष्ण को देखा, मीरा ने भी देखा, सूरदास ने देखा, हर किसी ने अपनी दृष्टि से कृष्ण प्रेम को समृद्ध किया। यहां तक कि मुसलमान भक्तों-कवियों ने भी कृष्ण के प्रेम में बड़े सुंदर पद कहे। अपने देश में गंगा-जमुनी तहजीब रही है और सब इसमें समान रूप से भागीदार रहे हैं।
    पहले जिस तरह से जन्माष्टमी मनाई जाती थी, उसमें फर्क आया है। अब आयोजन छोटे होते हैं, लेकिन पूजा की विधियां वही हैं, जो सदियों पहले थीं। हम लोग अभी भी मानते हैं, छठी के दिन तो विशेष आयोजन रहता है। पकवान बनते हैं, सौंठ के लड्डू भी बनते हैं। पहले ये लड्डू खूब बनते और बंटते थे, लेकिन अब सगुन भर के लिए थोड़े बना लिए जाते हैं। पुराने लखनऊ में कृष्ण की मान्यता आज भी बहुत है। पहले के दौर में भी मथुरा, वृंदावन में खूब कार्यक्रम होते थे और आज भी होते हैं। वहां कृष्ण को समर्पित अनेक कलाकार मंडलियां हैं। भारतीय विद्याओं और भारत को श्रीकृष्ण से अलग करके नहीं देखा जा सकता। वह हर जगह हैं।
    श्रीकृष्ण को निहारते, उनसे सीखते, उनको अपने अभिनय-नृत्य में उतारने की कोशिश करते मुझे इतना समय हो गया। अक्सर मैं तैयार होकर जब खड़ा होता हूं, तो सोचता हूं, हे भगवान, अब मुझे नचाओ। उनसे सीखने को अभी कितना कुछ है। आज लोगों और विशेष रूप से युवाओं को मेरा यही संदेश है कि कृष्ण का जो पूरा जीवन बीता है, उसका अवश्य ध्यान करें। भगवान ने अपने जीवन में बहुत छोटी उम्र में ही कितने बड़े-बड़े कार्य किए थे। जीवन में निरंतर संघर्ष करते रहे, जूझते रहे, लेकिन सदा मुस्कराते रहे। अपने माता-पिता को कैद से सुरक्षित छुड़ा लिया। सबको सुख दिया। सबके दुख को काटा। कालिया नाग सहित न जाने कितने असुरों को मार्ग से हटाया, ब्रज के लोगों को सुरक्षित किया। कृष्ण को अपने ध्यान में जरूर लाना चाहिए। हमारे बीच कृष्ण की ऐसी मनमोहक मूर्ति है कि उन्हें देखने मात्र से ही सबको सुख मिलता है। उनका आनंद लेना हो, तो शांत भाव से उनके सामने बैठ जाओ और उनकी महिमा व चरित्र को याद करो। उन्हें पढ़ो, समझो, तो शक्ति मिलेगी और सुख होगा।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) पंडित बिरजू महाराज, प्रसिद्ध नृत्य गुरु

     

    रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आज विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर राज्य में वनवासियों की खुशहाली और वनांचल के गांवों को स्वावलंबी बनाने के उद्ेदश्य से इंदिरा वन मितान योजना शुरू किए जाने की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस योजना के तहत राज्य के आदिवासी अंचल के दस हजार गांव में युवाओं के समूह गठित कर उनके माध्यम से वन आधारित समस्त आर्थिक गतिविधियों का संचालन किया जाएगा। इन समूहों के माध्यम से वनवासियों के स्वरोजगार और उनकी समृद्धि के नए द्वारा खुलेंगे। इस योजना के तहत समूहों के माध्यम से वनोपज की खरीदी, उसका प्रसंस्करण एवं मार्केटिंग की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। राज्य के प्रत्येक आदिवासी विकासखण्डों में वनोपज प्रसंस्करण केन्द्र की स्थापना किए जाने का लक्ष्य सरकार ने रखा है।
    मुख्यमंत्री ने कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों के 10 हजार गांवों में इस योजना के अंतर्गत समूह गठित किए जाएंगे, जिनमें युवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। प्रत्येक समूह में 10 से 15 सदस्य होंगे। इंदिरा वन मितान योजना में अनुसूचित क्षेत्रों के 19 लाख परिवारों को जोडऩे का लक्ष्य है। इस योजना के माध्यम से समूहों को वृक्ष प्रबंधन का अधिकार प्रदान किया जाएगा, जिससे वे वन क्षेत्रों के वृक्षों से वनोपज संग्रहण कर आर्थिक लाभ ले सकें। वनोपज की खरीदी की व्यवस्था समूह के माध्यम से की जाएगी, जिससे वनोपज का सही मूल्य मिल सके। समूह के माध्यम से लोगों के लिए स्व-रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे। वनोपजों की मार्केटिंग की व्यवस्था के साथ अनुसूचित क्षेत्रों के प्रत्येक विकासखण्ड में वनोपज प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना की जाएगी। एक यूनिट की अनुमानित लागत लगभग 10 लाख रूपए होगी। अनुसूचित क्षेत्रों के 85 विकासखण्ड में वनोपज प्रोसेसिंग यूनिट स्थापना के लिए 8 करोड़ 50 लाख रूपए की राशि प्राधिकरण मद से उपलब्ध कराई जाएगी। वनों में इमारती लकड़ी की बजाए फलदार और वनौषधियों के पौधे लगाए जाएंगे। जिससे वनवासियों की आय बढ़ सके।
    विश्व आदिवासी दिवस का गरिमामय कार्यक्रम मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में आयोजित हुआ। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, मंत्रीगणों, संसदीय सचिवों, विधायकों एवं जनप्रतिनिधियों तथा आदिवासी समाज के गणमान्य लोगों की मौजूदगी में कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित अतिथियों द्वारा आंगादेव, बूढ़ादेव एवं मां दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना से हुआ। इस अवसर पर आदिवासी नर्तक दल द्वारा गौर नृत्य की प्रस्तुति दी गयी। इस मौके पर मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम, कवासी लखमा, अमरजीत भगत, डॉ. शिव डहरिया, श्रीमती अनिला भेंडिय़ा तथा खनिज विकास निगम के अध्यक्ष गिरीश देवांगन भी नर्तक दलों के साथ मांदर की थाप पर थिरके और आदिवासी कला संस्कृति को आगे बढ़ाने और उसे जीवंत बनाए रखने की छत्तीसगढ़ सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया। आदिवासी गौर नृत्य में मंत्रीगणों की भागीदारी से मुख्यमंत्री निवास कार्यालय का पूरा वातावरण उत्साह और उमंग से भर उठा।
    मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपने उद्बोधन में आगे कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों का सबसे बड़ा संरक्षक रहा है। प्रकृति से निकटता और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित दोहन भावी पीढ़ी के बेहतर जीवन के लिए जरूरी है। उन्होंने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर हमें आदिवासी समाज के हित के सभी पहलुओं पर समग्रता से विचार करना चाहिए। उन्होंने आदिवासी समाज के प्रत्येक सदस्य और संगठन से अपील की कि वे अपने अधिकारों और विकास के अवसरों के बारे में मुखर हो। छत्तीसगढ़ सरकार सदैव आपके साथ है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार के काम-काज, नीतियों और फैसलों से आदिवासी अंचलों की फिजा में तेजी से बदलाव आ रहा है। जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के अधिकार की नई ईबारत लिखी जा रही है।
    मुख्यमंत्री ने इस मौके पर वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम का उल्लेख करते हुए कहा कि हमने राज्य के सभी पात्र वनवासियों को वन अधिकार पट्टा देने का अभियान शुरू किया है। छत्तीसगढ़ राज्य वनवासियों को व्यक्तिगत एवं सामुदायिक पट्टा देने के मामले में देश में अव्वल स्थान पर है। अभी तक राज्य में 4.50 लाख व्यक्तिगत तथा 43 हजार सामुदायिक पट्टे दिए जा चुकें है। वन अधिकार पट्टों के माध्यम से चार लाख 18 हजार हेक्टेयर भूमि आबंटित की गई है, जो देश में सर्वाधिक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि वन अधिकार पट्टों को मनरेगा, सिंचाई, खेती-किसानी और खाद्य संरक्षण जैसे अनेक कार्यो से जोड़कर पट्टे की ंभूमि को हमने वनवासियों के खुशहाली और आमदनी का माध्यम बनाने का प्रयास कर रहें है। उन्होंने इस मौके पर राज्य के सभी वन भूमि पट्टाधारियों से अपने अधिकार और अवसर का भरपूर लाभ उठाने की अपील की।
    मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ राज्य में लघु वनोपज की खरीदी और उनके समर्थन मूल्य में वृद्धि सहित शहीद महेन्द्र कर्मा तेन्दूपत्ता संग्राहक सामाजिक सुरक्षा योजना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार की यह तमाम कोशिशें आदिवासी भाई-बहनों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने तथा उन्हें विकास की मुख्य धारा में लाने के लिए की जा रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य में पहले सात लघु वनोपज की खरीदी होती थी, जिसे सरकार ने बढ़ाकर 31 कर दिया है। उन्होंने कहा कि महुआ सहित अन्य लघु वनोपजों के मूल्य में वृद्धि किए जाने से इसका सीधा फायदा संग्राहक परिवारों को हुआ है।
    मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी अंचलों में विशेषकर बस्तर में सिंचाई का रकबा बहुत कम है। इसे बढ़ाने और बस्तर अंचल के लोगों की हर जरूरत के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने हेतु बोधघाट परियोजना की शुरूआत की है। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के डूबान क्षेत्र में आने वाली भूमि का मुआवजा और पुनर्वास पैकेज आदिवासी समाज के लोग खुद तय करेंगे। उन्होंने कहा कि बोधघाट सिंचाई परियोजना की पुनर्वास नीति देश दुनिया की सबसे अच्छी नीति बने यह उनकी मंशा है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासी भाई-बहनों को सिर्फ जल, जंगल और जमीन की ताकत ही नही बल्कि शासन और प्रशासन की ताकत भी सौंपी है। उन्होंने इस मौके पर आदिवासी समाज के लोगों से पूरी सक्षमता के साथ आगे बढऩे और राज्य के विकास में भागीदारी निभाने की अपील की।
    इस अवसर पर मंत्री कवासी लखमा एवं मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम ने भी अपने विचार रखें। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आदिवासियों के हितों का ध्यान रखा है, उनका मान-सम्मान बढ़ाया है। मंत्रीद्वय ने कहा कि छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति को संरक्षित एवं संवर्धित करने तथा उसे विश्व पटल पर लाने की सराहनीय पहल मुख्यमंत्री ने की है। उन्होंने विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर वनांचल क्षेत्र के विकास के लिए मुख्यमंत्री द्वारा दी गई सौगातों के लिए उनका आभार जताया। कार्यक्रम को सर्वआदिवासी समाज के अध्यक्ष बी.पी.एस. नेताम ने भी सम्बोधित किया और आदिवासी समाज से संबंधित मांगों का ज्ञापन सौंपा।
    कार्यक्रम में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री अमरजीत भगत, कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे, गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू, वन मंत्री मोहम्मद अकबर, महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अनिला भेंडिय़ा, राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल और नगरीय विकास मंत्री डॉ. शिव कुमार डहरिया, संसदीय सचिव सुश्री शकुंतला साहू, चिंतामणि महाराज और जशपुर विधायक विनय भगत, राज्य खनिज विकास निगम के अध्यक्ष गिरीश देवांगन अनेक जनप्रतिनिधि, मुख्य सचिव आर.पी. मण्डल सहित अनेक प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित थे।

    दुर्ग / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार कमरछठ अथवा हलषष्ठी कल रविवार को मनाया जायेगा। इसके खरीददारी के लिए आज बाजारों मे ंभारी भीड़ उमड़ पड़ी क्योंकि एक तो कल ही कमरछठ है और रविवार को पूर्व लॉकडाउन के कारण कल बाजारे नही खुलेगी। अपने संतानों की लंबी उम्र के लिए माताएं निर्जला व्रत रख शिव पार्वती की पूजा करेंगी। इस पारम्परिक पर्व के एक दिन पहले आज भिलाई-दुर्ग के बाजारों में पूजन सामग्री खरीदने भीड़ उमड़ पड़ी। कोरोना संक्रमण को देखते हुए इस अवसर पर सगरी बनाकर सामूहिक पूजा-अर्चना किए जाने को लेकर महिलाओं में संशय की स्थिति बनी हुई है।
    छत्तीसगढ़ के पारम्परिक त्योहारों में से एक कमरछठ कल रविवार को मनाया जाएगा। संतान की लंबी उम्र के लिए मनाये जाने वले इस पर्व में बिना हल चली चीजों का उपयोग किया जाता है। इसमें पसहर चांवल सहित छह किस्म की भाजियों का उपयोग प्रमुख है। जिसमें चरोटा भाजी, कुम्हड़ा भाजी, चेंच भाजी, मुनगा भाजी, लाल भाजी, चौलाई भाजी शामिल है। इसके अलावा काशी के फूल, महुुआ के फूल व पत्ते, धान की लाई सहित भैंस के दूध और दही आदि भी कमरछठ के पूजन में इस्तेमाल की जाती है। आज भिलाई-दुर्ग सहित भिलाई-3, चरोदा, कुम्हारी जामुल आदि के बाजारों में पूजन सामग्री के अनेक अस्थायी पसरे लगे हुए थे। जहां लोगों ने खरीददारी की। कमरछठ में सार्वजनिक रुप से सगरी (छोटा सा तालाब) बनाकर महिलाएं सामूहिक रूप से शिव पार्वती की पूजा करती है। लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण के चलते हालात बिल्कुल विपरीत है। इस स्थिति में सगरी बनाकर सामूहिक पूजन होने पर फिलहाल संदेह बना हुआ है।

    रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ की विशेष आम सभा का आयोजन आज रायपुर के व्हीआईपी रोड स्थित होटल ग्रांड एम्पीरिया में प्रात: 11 बजे से किया गया। इस दौरान ओलंपिक संघ के 31 पदों के लिए चुनाव भी कराया गया जिसमें कुल 31 पदों के लिए 48 लोगों ने अपना नामांकन भरा था, जिसकी सूची गत 17 जुलाई को जारी कर दी गई थी। उसके बाद नाम वापसी की अंतिम तिथि तक कुल 30 पदों के लिए 31 लोग चुनाव मैदान में डटे थे जिसमें एक पद कोषाध्यक्ष के लिए दो लोगों फिरोज अंसारी और साही राम जाखड़ के चुनाव मैदान में रहने से चुनाव कराना पड़ा जिसमें 60 वोटों में से मोहम्मद फिरोज अंसारी को कुल 8 और साही राम जाखड़ को 52 वोट मिले और साही राम जाखड़ ने कोषाध्यक्ष पद पर कब्जा जमाया।
    निर्वाचित उम्मीदवार के पद का नाम
    जिसमें छग ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के रूप में प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जो छत्तीसगढ़ राज्य टेनिस संघ के अध्यक्ष है उनको चुना गया वहीं भिलाई विधायक एवं महापौर देवेन्द्र यादव छग हैण्डबॉल संघ के अध्यक्ष को उपाध्यक्ष, तथा महासमुंद जिला ओलंपिक संघ के अध्यक्ष विनोद चंद्राकर,
    दुर्ग जिला अध्यक्ष के रूप में प्रदेश बिलियड्र्स स्नूकर एसोसिएशन छग के अध्यक्ष विजय अग्रवाल, और महासचिव के रूप में बशीर अहमद खान जो प्रदेश तलवारबाजी संघ को, वरिष्ठ उपाध्यक्ष गजराज पगारिया
    वरिष्ठ उपाध्यक्ष, सीजी पी बिलियड्र्स और स्नूकर एसोसिएशन,, डॉ ए फरिश्ता को कार्यकारी अध्यक्ष छत्तीसगढ़ स्क्वैश एसोसिएशन, अखिल कुमार धगट को अध्यक्ष छत्तीसगढ़ बैडमिंटन संघ, शरद शुक्ला को अध्यक्ष छत्तीसगढ़ टेबल टेनिस एसोसिएशन, जी एस बामरा को अध्यक्ष छत्तीसगढ़ एथलेटिक्स एसोसिएशन, कैलाश मुरारका अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राज्य तीरंदाजी संघ महासचिव गुरुचरण सिंह होरा सचिव, छत्तीसगढ़ राज्य टेनिस संघ, संयुक्त सचिव डॉ विष्णु श्रीवास्तव सचिव छत्तीसगढ़ स्क्वैश एसोसिएशन, अरुण कुमार द्विवेदी अध्यक्ष छत्तीसगढ़ प्रदेश जूडो संघ,अभिजीत मिश्रा सचिव सीजी प्रदेश कयाकिंग एंड कैनोइंग एसोसिएशन,विजय अग्रवाल उपाध्यक्ष सीजी प्रदेश लॉन बॉलिंग एसोसिएशन, इंजी एन आर पराशर अध्यक्षए बस्तर जिला ओलंपिक संघ, मनीष श्रीवास्तव सचिव छत्तीसगढ़ हॉकी, कोषाध्यक्ष साही राम जाखड़ सचिव छत्तीसगढ़ तैराकी संघ को चुना गया।
    वही कार्यकारी सदस्य के रूप में कमलजीत अरोड़ा अध्यक्ष छत्तीसगढ़ एमेच्योर खो खो एसोसिएशन डॉ आलोक दुबे सचिव छत्तीसगढ़ ट्रायथलॉन एसोसिएशन, ठाकुर आनंद मोहन सिंह एडवोकेट हाईबल कोर्ट सीजी सचिव छत्तीसगढ़ राज्य तीरंदाजी संघ, पीयूष भाटिया एडवोकेटए एचएबल हाई कोर्ट सीजी अध्यक्ष स्की एंड स्नोबोर्ड एसोसिएशन ऑफ छत्तीसगढ़ आर के श्रीवास्तव सचिव छत्तीसगढ़ प्रदेश रोइंग एसोसिएशन, अनिल पुसदकर अध्यक्ष मॉडर्न पेंटाथलॉन एसोसिएशन ऑफ़ छत्तीसगढ़, वी आर चन्नावर छत्तीसगढ़ के साइक्लिंग एसोसिएशन के सचिव, डॉ अयाज अहमद खान सचिव छत्तीसगढ़ रग्बी फुटबॉल एसोसिएशन, जगन्नाथ यादव अध्यक्ष छत्तीसगढ़ कुश्ती संघ, जावेद अहमद खान सचिव नेटबॉल एसोसिएशन ऑफ छत्तीसगढ़, राजेश जांघेल सचिव छत्तीसगढ़ प्रदेश भारोत्तोलन संघ, शिव प्रसाद कापसे सचिवए सी जी प्रदेश एमेच्योर मुक्केबाजी संघ को चयन किया गया।

    भिलाई / शौर्यपथ / प्रोफेशनल कैरियर  के संचालक डॉ. संतोष रॉय रविवार 9 अगस्त को रात्रि साढे 8 बजे से कक्षा 11 वी और बारहवी के छात्रों के लिए एक सेमीनार का आयोजन कराने जा रहे है। इस सेमीनार को कम्बोडिया के घाना शहर के सीएमए एम वी चेलापति राव संबोधित करेंगे। कक्षा 11 वी और बारहवी के छात्रों के लिए सीएमएम एक बेहतर कैरियर, देश विदेश में सीएमए की क्या संभावनाएं है जैसे सवालों का जवाब इस सेमीनार से मिल जायेगा। एक बेहतर  कैरियर तो मुठ्ठी मे ंरखे रेत की तरह है। सही सयमसही जगह अमग रेत का उपयोग नही किया गया तो रेत हाथ से फिसल जायेगी। वैसे ही कैरियर के निर्णय लेने से बहुत देर की गयी तो वक्त हाथ से निकल जायेगा। अधिकतर लोग चर्चा तो बहुत करते हैं लेकिन निर्णय तक नही पहुंच पाते। सफलता की आधारशीला है शीघ्र निर्णय। उतावले निर्णय और शीघ्र निर्णय में अंतर है। कामर्स के क्षेत्र मेंनिरंतर बेहतर कार्य करने वाले डॉ. संतोष रॉय का कहना है कि 9 अगस्त को रात्रि साढे 8 बजे यह सेमीनार छात्र-छात्राओं एवं उनके पालकों के लिए आयोजित कियाग गया है। छात्र छात्राओं के साथ ही पालक भी एक्सपर्ट से जो सवाल पूछना है वे पूछ सकते है। 

    राजनांदगांव / शौर्यपथ / मानव सेवा एवं जनकल्याण के लिए अंचल सहित देशभर में पहचान बना चुकी बर्फानी सेवाश्रम समिति द्वारा 5 अगस्त को अयोध्या में हुए श्रीराम मंदिर निर्माण के भूमिपूजन के ऐतिहासिक अवसर पर बर्फानी आश्रम में भी श्रद्धाभक्ति भाव पूर्ण आयोजन के साथ ही दीपोत्सव कर परिसर को दीपावली के सामान रोशनी से जगमग किया गया। इस अवसर पर भगवान को मिष्ठान व फलों का भोग भी लगाया गया।
    संस्था के सचिव गणेश प्रसाद शर्मा गन्नू ने बताया कि अखिल भारतीय चर्तुः सम्प्रदाय के श्रीमहंत श्रीश्री 1011 योगाधिराज ब्रम्हर्षि बर्फानी दादा जी के आशीर्वाद व मार्गदर्शन से नगर में बर्फानी आश्रम स्थित मां पाताल भैरवी राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी दस महाविद्या द्वादश ज्योर्तिलिंग शिव शक्ति सिद्धपीठ में दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर स्थित राम दरबार में अयोध्या के साथ ही सारे विश्व में श्रीराम मंदिर निर्माण शिलान्यास अवसर पर उत्साह एवं भक्तिपूर्ण आयोजन किये गये। इसी के तहत राजनांदगांव संस्कारधानी में स्थित बर्फानी आश्रम में भी श्रीराम मंदिर निर्माण महोत्सव आयोजन श्रद्धा भक्तिभाव पूर्ण ढंग से आयोजित किया गया। 5 अगस्त को दोपहर 12 बजे से हनुमान चालीसा का पाठ प्रारंभ हुआ तथा अयोध्या में शिलान्यास पूजन के शुभ मुहूर्त पश्चात भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की आरती उतारी गई। इस अवसर पर भगवान श्रीराम, माता जानकी, लक्ष्मण जी एवं रामभक्त हनुमान का विशेष श्रृंगार कर सवामन दालबाटी चुरमा और अन्न व्यंजनों के अलावा फल का भोग प्रसाद भगवान को मंत्रोच्चार के मध्य अर्पित किया गया।
    हनुमान चालीसा का पाठ संस्था के अध्यक्ष राजेश मारू, उपाध्यक्ष दीपक जोशी, सचिव गणेश प्रसाद शर्मा गन्नू, महंत गोविंद दास, कोषाध्यक्ष नीलम जैन, महेन्द्र लुनिया, सूरज जोशी, आलोक जोशी, बलविंदर सिंह भाटिया, मनीष परमार, संजय खंडेलवाल, आलोक बिंदल, संतोष खंडेलवाल, प्रियांश सोनी, नत्थू सिंह महाराज के अलावा अन्य सदस्यगण के द्वारा किया गया। संस्था द्वारा 4 व 5 अगस्त को श्रीराम मंदिर सहित पूरे सिद्धपीठ में दीप प्रज्ज्वलित कर रोशनी भी की गई।

    राजनांदगांव / शौर्यपथ / कमरछठ यानी हलषष्ठी पर्व पर माताओं ने संतानों की दीर्घायु की कामना लेकर कठिन व्रत रखा। हलषष्ठी पर्व को उत्साहपूर्वक मनाते हुए महिलाओं ने दोपहर बाद पूजा-अर्चना शुरू की।
    सामूहिक रूप से शहरभर में अलग-अलग चौराहों और मोहल्लों में महिलाओं ने भगवान शिव और पार्वती की अलौकिक गाथाओं से जुड़ी कथाएं सुनी। माना जाता है कि कमरछठ पर्व भगवान शिव के पूरे परिवार से जुड़ा हुआ है। पूरे परिवार के सदस्यों की कथाओं के जरिये वर्णन किया जाता है। जिसमें मुख्य रूप से भगवान शिव और पार्वती की धार्मिक गाथाएं शामिल हैं।
    महिलाएं पूजा-अर्चना के दौरान प्रतिकात्मक रूप से गड्ढे खोदकर सगरी का निर्माण करती है। जिसमें पेड़-पौधे लगाकर अलग-अलग पूजन सामग्रियां चढ़ाई जाती है। वहीं भगवान शिव-पार्वती को भोग स्वरूप पसहर चावल, भैंस का दूध, दही, घी, बेल पत्ती, कांशी, खमार, बांटी, भौरा सहित अन्य सामग्रियां अर्पित की गई। दोपहर तक कथा और धार्मिक रूप से शिव-पार्वती का स्तुति गान करते हुए औलादों की लंबी आयु की कामना की।

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