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सेहत / शौर्यपथ / हर किसी को गुस्सा आता है और यह बेहद स्वाभाविक है। लेकिन, अगर आप उनमें से हैं जो अपने गुस्से का इजहार नहीं करते तो सर्तक हो जाइए। अपने गुस्से को व्यक्त करने में न सिर्फ आपकी मानसिक भलाई है बल्कि मस्तिष्काघात (ब्रेन स्ट्रोक)को रोकने में भी यह अहम भूमिका निभाता है। यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के शोधकर्ताओं की टीम ने पाया है कि गुस्से को दबाकर रखने से महिलाओं के कारोटिड धमनियों में गंदगी (प्लाक)जमने लगती है जिससे मस्तिष्काघात का खतरा बढ़ जाता है।
दिमाग को खून सप्लाई करती हैं धमनियां-
यह धमनियों दिमाग तक होने वाली खून की सप्लाई को नियंत्रित करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इन धमनियों में सिकुड़न आने से मस्तिष्काघात का खतरा जानलेवा हो सकता है। पूर्व के शोधों के अनुसार लंबे समय तक तनाव में रहने से दिमाग में सूजन पैदा होती है जिससे मस्तिष्काघात, दिल के दौरे, और सीने में दर्द के खतरे बढ़ जाते हैं।
भावनात्मक अभिव्यक्ति और दिमागी स्वास्थ्य में संबंध-
प्रमुख शोधकर्ता कारेन जाकुबोवस्की ने कहा, हमारे शोध से पता चलता है कि महिलाओं में सामाजिक-भावनात्मक अभिव्यक्ति और दिमाग के स्वास्थ्य के बीच संबंध पाया गया है। इस तरह के शोध महत्वूपर्ण होते हैं क्योंकि यह दर्शाता है कि कैसे किसी महिला का भावनात्मक स्वभाव उसके शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इन परिणामों से प्रोत्साहित होकर स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को अपने रोगियों के सामाजिक-भावनात्मक कारकों को ध्यान में रखते हुए एक निवारक देखभाल योजना की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए।
मस्तिष्काघात अमेरिका में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण है। स्ट्रोक सेंटर के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में हर साल मस्तिष्काघात से 140,000 लोगों की मौत हो जाती है। यूके में मस्तिष्काघात चौथा सबसे बड़ा मौता का कारण है। यहां साल भर में करीब 100,000 लोगों की मौत मस्तिष्काघात के कारण हो जाती है।
एथेरोस्क्लेरोसिस ब्रेन स्ट्रोक का कारण-
एथेरोस्क्लेरोसिस ब्रेन स्ट्रोक का एक प्रमुख कारण है। यदि पट्टिका फट जाती है, तो यह एक रक्त का थक्का बना सकता है जो आगे मस्तिष्क तक ऑक्सीजन युक्त रक्त के प्रवाह को अवरुद्ध करता है। महिलाओं में पुरुषों की तुलना में स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है और उनके ठीक होने की संभावना कम होती है। यह मासिक धर्म चक्र, हार्मोनल गर्भ निरोधकों और गर्भावस्था की जटिलताओं से जुड़ा हुआ है।
शोधकर्ता इस बात की जानने के इच्छुक थे कि गुस्से को स्वयं दबा लेने से महिलाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है। उन्होंने लिखा, कई लोगों ने तर्क से बचने या किसी रिश्ते के टूटने से बचाने के प्रयास में अपने विचारों और भावनाओं को अंदर ही छुपा या दबा लेते हैं। गुस्से को दबा लेने से महिलाएं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में गिरावट आती है।
ऐसे किया गया अध्ययन-
इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 40 से 60 साल के उम्र की 304 महिलाओं पर शोध किया। यह सभी महिलाएं धूम्रपान नहीं करती थीं। इन महिलाओं से पूछा गया कि यह कितनी जल्दी-जल्दी अपने गुस्से को व्यक्त करती थीं। अल्ट्रासाउंड स्कैन की मदद से उनके कारोटिड धमनियों ने जमा गदंगी के स्तर को आंका गया।
इन परिणामों से पता चला कि जो महिलाएं अपने गुस्से को दबा रही थीं उनमें एथेरोस्क्लेरोसिस का खतरा ज्यादा था। पूर्व के शोधों में कहा गया है कि दिमाग के तनाव का स्तर बढ़ने से दिमाग बोन मैरो को संकेत भेजता है कि वो और सफेद रक्त कोशिकाएं बनाए। यह सफेद कोशिकाएं धमनियों में सूजन पैदा कर सकती हैं।
गुस्से का इंसानी शरीर पर असर-
- शरीर में एड्रिनालिन और नोराड्रिनलिन हॉर्मोंस का स्तर बढ़ जाता है
- उच्च रक्तचाप, सीने में दर्द, तेज सिर दर्द, माइग्रेन, एसिडिटी जैसी कई शारीरिक बीमारियां हो सकती हैं।
- जो लोग जल्दी-जल्दी और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाते हैं, उन्हें स्ट्रोक, किडनी की बीमारियां और मोटापा होने का जोखिम होता है।
- ज्यादा पसीना आना, अल्सर और अपच जैसी शिकायतें भी गुस्से की वजह से हो सकती हैं।
- ज्यादा गुस्से की वजह से दिल के रक्त को पंप करने की क्षमता में कमी आती है और इसकी वजह से दिल की मांसपेशियों को क्षति पहुंचती है।
- लगातार गुस्से से रैशेज, मुंहासे जैसी स्किन से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / प्राकृतिक नियमों के अनुसार एक महिला तभी तक गर्भधारण कर सकती है जब तक उसे मासिक धर्म आता है। सामान्तय महिलाएं 50 साल की उम्र में रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) की अवस्था प्राप्त कर लेती हैं। रजोनिवृत्ति वो अवस्था होती है जब मासिक धर्म बंद हो जाते हैं और गर्भधारण करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। लेकिन, अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसा प्रजजन संबंधी इलाज ढूंढ़ निकाला है जिसकी मदद से रजोनिवृत्ति के बाद भी महिलाएं मां बन सकेंगी।
ग्रीस में वैज्ञानिकों ने ऐसा ही एक इलाज विकसित किया है जिसकी मदद से रजोनिवृत्ति प्राप्त कर चुकी तीन महिलाओं ने बच्चों को जन्म दिया है। ग्रीस के जेनेसिस एथेंस फर्टिलिटी क्लीनिक के विशेषज्ञों ने इस इलाज में एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया है जिसका इस्तेमाल घावों को जल्द ठीक करने के लिए किया जाता है। यह तकनीक ऊतकों और रक्त वाहिकाओं को बढ़ावा देती है। इस तकनीक को प्लेटलेट रिच प्लाजमा (पीआरपी) कहते हैं।
ऐसे किया गया शोध-
क्लीनिक के विशेषज्ञों ने 46 से 49 साल के उम्र की महिलाओं के अंडाशय में पीआरपी इंजेक्ट किया। यह सभी महिलाएं रजोनिवृत्ति को प्राप्त कर चुकी थीं। जब महिलाएं रजोनिवृत्ति प्राप्त कर लेती हैं तब वे गर्भधारण नहीं कर पातीं। नए इलाज की मदद से 70 फीसदी प्रतिभागियों में मासिक धर्म को दोबारा शुरू किया जा सका।
इनमें वे महिलाएं शामिल थीं जिन्हें पांच साल से मासिक धर्म नहीं हुआ था। शोधकर्ताओं की टीम ने तीन महिलाओं से अंडे लिए और उन्हें लैब में निषेचित किया। फिर इससे उन्हें गर्भधारण कराया गया।
ज्यादा उम्र में मां बनना होगा आसान-
क्लीनिक के विशेषज्ञ कोंस्टानटिनोस पानटोस ने कहा कि यह इलाज ज्यादा उम्र में भी महिलाओं को मां बनने में मदद करेगा। उन्होंने कहा, कई महिलाएं 40 की उम्र तक अपने करियर पर ध्यान देती हैं और फिर बच्चों के बारे में सोचती हैं। ऐसे में कई महिलाओं के रजोनिवृत्ति की उम्र आ जाती है और वे बच्चे पैदा नहीं कर पाती। पानटोस ने कहा कि इस इलाज के लिए भी महिलाओं की उम्र सीमा तय करना जरूरी है।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / शहद को सेहत और स्किन दोनों के लिए बेहद कारगर माना जाता है। रोजाना एक चम्मच शहद के सेवन से आपकी सेहत ठीक रहती है बल्कि इससे आपकी स्किन में भी निखार आता है लेकिन अक्सर शहद की शुद्धता को लेकर मन में सवाल उठते हैं, ऐसे में आप इन उपायों से असली-नकली शहद की पहचान कर सकते हैं-
ऐसे करें शहद की पहचान
विनिगर और पानी के सॉलूशन में शहद की कुछ बूंदें डालें। अगर इस मिश्रण में फोम यानी झाग बनने लगता है तो इसका मतलब है कि आपके शहद में मिलावट की हुई है और शहद शुद्ध नहीं है। जब शहद को गर्म चीज के संपर्क में लाया जाता है तो शहद जलता नहीं है। इस टेस्ट को करने के लिए शहद में कॉटन बड या माचिस की तीली को डुबोएं और फिर उसे जलाने की कोशिश करें। अगर वो जल जाता है तो इसका मतलब है कि शहद शुद्ध है। अगर शहद मिलावटी है तो वह सही तरीके से जलेगा नहीं, अगर आपका शुद्ध शुद्ध है तो वह पानी में पूरी तरह से घुलेगा नहीं और एक बार घोलने के बाद आपको काफी मेहनत करनी पड़ेगी ताकि शहद पानी में घुल जाए लेकिन अगर शहद मिलावटी है और उसमें चीनी का ग्लूकोज की मिलावट की गई है तो वह आसानी से पानी में घुल जाएगा और फिर सफेद मार्क छोड़ देगा।
धर्म संसार / शौर्यपथ / 18 अगस्त 2020, मंगलवार को कुशोत्पाठिनी अमावस्या है। इस दिन पोला पिठोरा पर्व मनाया जाता है। भाद्रपद मास की इस अमावस्या तिथि को कुशग्रहणी अमावस्या कहते हैं।
अगस्त महीने में खेती-किसानी का काम समाप्त हो जाने के बाद भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को पोला त्योहार मनाया जाता है। प्रतिवर्ष पिठोरी अमावस्या पर मनाया जाने वाला पोला-पिठोरा पर्व मूलत: खेती-किसानी से जुड़ा त्योहार है। भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को यह पर्व विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं छत्तीसगढ़ में मनाया जाता है।
महाराष्ट्रीयन समाज में पिठोरी अमावस्या पर पोला (पोळा) पर्व धूमधाम से मनाया जाता है और यह छत्तीसगढ़ का लोक पर्व भी है। इस दिन अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए चौसष्ठ योगिनी और पशुधन का पूजन किया जाएगा। इस अवसर पर जहां घरों में बैलों की पूजा की जाएगी, वहीं लोग पकवानों का लुत्फ भी उठाएंगे। इसके साथ ही इस दिन 'बैल सजाओ प्रतियोगिता' का आयोजन किया जाता है।
पोला त्योहार मनाने के पीछे यह कहावत है कि अगस्त माह में खेती-किसानी का काम समाप्त होने के बाद इसी दिन अन्नमाता गर्भ धारण करती है यानी धान के पौधों में इस दिन दूध भरता है इसीलिए यह त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार पुरुषों-स्त्रियों एवं बच्चों के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। इस दिन पुरुष पशुधन (बैलों) को सजाकर उनकी पूजा करते हैं।
स्त्रियां इस त्योहार के वक्त अपने मायके जाती हैं। छोटे बच्चे मिट्टी के बैलों की पूजा करते हैं। इस दिन पोला पर्व की शहर से लेकर गांव तक धूम रहती है। इस दौरान जगह-जगह बैलों की पूजा-अर्चना होती है। गांव के किसान भाई सुबह से ही बैलों को नहला-धुलाकर सजाएंगे और फिर घरों में लाकर विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना करके घरों में बने पकवान उन्हें खिलाते हैं।
पर्व के 2-3 दिन पहले से ही बाजारों में मिट्टी के बैलजोड़ी बिकते दिखाई देते हैं। बढ़ती महंगाई के कारण इनके दामों में भी बढ़ोतरी हो गई है। इसके अलावा मिट्टी के अन्य खिलौनों की भी भरमार बाजारों में दिखाई देती है। लेकिन इस बार कोरोना वायरस के चलते पोला पर्व पर हमेशा जैसी रौनक नहीं होगी। महाराष्ट्र में कोरोना की अधिकता के कारण यह पर्व बेजान और फीका-फीका रहने की संभावना है। इस दिन मिट्टी और लकड़ी से बने बैल चलाने की भी परंपरा है। पहले कई गांवों में इस अवसर पर बैल दौड़ का भी आयोजन किया जाता था, लेकिन समय के साथ यह परपंरा अब समाप्त होने लगी है। इस अवसर पर बैल दौड़ और बैल सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इसमें अधिक से अधिक किसान अपनी बैलों के साथ भाग लेते हैं। खास सजी-संवरी बैलों की जोड़ी को इस दौरान पुरस्कृत भी किया जाता है। लेकिन इस बार यह रौनक नजर नहीं आ पाएगी।
दरअसल, यह त्योहार कृषि आधारित पर्व है। वास्तव में इस पर्व का मतलब खेती-किसानी, जैसे निंदाई-रोपाई आदि का कार्य समाप्त हो जाना है, लेकिन कई बार अनियमित वर्षा के कारण ऐसा नहीं हो पाता है। बैल किसानों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। किसान बैलों को देवतुल्य मानकर उसकी पूजा-अर्चना करते हैं।
महाराष्ट्रीयन परिवारों में पोला पर्व के दिन घरों में खासतौर पर पूरणपोली (पूरणपोळी/ पोसाटोरी) और खीर बनाई जाती है। बैलों को सजाकर उनका पूजन किया जाता है, फिर उन्हें पूरणपोली और खीर भी खिलाई जाती है। शहर के प्रमुख स्थानों से उनकी रैली निकाली जाती है।
जिन-जिन घरों में बैल होते हैं, वे इस दिन अपने बैलों की जोड़ी को अच्छी तरह सजा-संवारकर इस दौड़ में लाते हैं। मोती मालाओं तथा रंग-बिरंगे फूलों और प्लास्टिक के डिजाइनर फूलों और अन्य आकृतियों से सजी खूबसूरत बैलों की जोड़ी हर इंसान का मन मोह लेती है।
कई समाजवासी पोला पर्व को बहुत ही उत्साहपूर्वक मनाते हैं। बैलों की जोड़ी का यह पोला उत्सव देखते ही बनता है। खासतौर पर छत्तीसगढ़ में इस लोकपर्व पर घरों में ठेठरी, खुरमी, चौसेला, खीर-पूरी जैसे कई लजीज व्यंजन बनाए जाते हैं।
इस पूजन के बाद माताएं अपने पुत्रों से पहले 'अतिथि कौन?' इस तरह पूछेंगी और इस दौरान पुत्र अपना नाम माता को बताएंगे, उसके बाद ही पूरणपोली और खीर का प्रसाद ग्रहण करेंगे। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में मनाया जाने वाला लोक पर्व का यह नजारा देखने में बहुत ही खूबसूरत दिखाई देता है, लेकिन इस बार शायद यह संभव नहीं हो पाएगा।
कुशोत्पाटनी अमावस्या 2020 : जानिए इस दिन क्या करें,क्या न करें
18 अगस्त 2020 को कुशोत्पाटनी अमावस्या है। इसे कुशग्रहणी अमावस्या भी कहते हैं। कुशोत्पाठिनी अमावस्या और पोला पिठोरा भी कुछ लोग कहते हैं...कुशोत्पाटनी अमावस्या पर उखाड़ा गया कुश 1 वर्ष तक प्रयोग किया जा सकता है। सामान्यत: किसी भी अमावस्या को उखाड़ा गया कुश 1 मास तक प्रयोग किया जा सकता है।
कुश को हमारे शास्त्रों में विशेष शुद्ध माना गया है। हमारे शास्त्रों में जप इत्यादि करते समय कुश को पावित्री के रूप में धारण करने का नियम है। कुश उखाड़ने के लिए श्रद्धालुओं को निम्न रीति का प्रयोग करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में कुश की महती आवश्यकता होती है।
1. प्रात: काल स्नान के उपरांत सफेद वस्त्र धारण कर कुश उखाड़ें।
2. कुश उखाड़ते समय अपना मुख उत्तर या पूर्व की ओर रखें।
3. सर्वप्रथम 'ॐ' बोलकर कुश का स्पर्श करें। फ़िर निम्न मंत्र पढ़कर प्रार्थना करें-
'विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिनिसर्जन।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ! स्वस्तिकरो भव॥'
4. तत्पश्चात् हथेली और अंगुलियों के द्वारा मुट्ठी बनाकर एक झटके से कुश उखाड़ें। कुश को एक बार में ही उखाड़ना चाहिए। अत: पहले उसे लकड़ी के नुकीले टुकड़े से ढीला कर लें, लोहे का स्पर्श ना करावें।
5. कुश उखाड़ते समय 'हुं फ़ट्' कहें।
प्रयोग करने योग्य कुश-
1. जिसका अग्रभाग कटा न हो।
2. जो जला हुआ ना हो।
3. जो मार्ग या गंदे स्थान पर ना हो।
नजरिया / शौर्यपथ / शनिवार को जब देश स्वतंत्रता दिवस के जश्न में डूबा था, तमिलनाडु के वरिष्ठ मंत्री मुख्यमंत्री ई पलानीसामी और उप-मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम के बीच सुलह-समझौते कराने में व्यस्त थे। देर शाम मुख्यमंत्री व उप-मुख्यमंत्री ने एक साझा बयान जारी करते हुए पार्टी के नेताओं को सख्त निर्देश दिया कि वे मीडिया में पार्टी या नेतृत्व पर किसी तरह की टीका-टिप्पणी से बचें। यह बयान, दरअसल दोनों नेताओं के बीच सरकार व पार्टी पर नियंत्रण बनाने के सवाल पर चल रहे परोक्ष युद्ध का नतीजा है, जिसका दायरा बढ़कर समर्थकों तक पहुंच गया है। इन सबकी शुरुआत एक मंत्री के उस बयान से हुई, जिसमें जोर दिया गया कि अन्नाद्रमुक पार्टी अपने नेता ई पलानीसामी को बतौर चेहरा पेश करते हुए विधानसभा चुनाव लड़ेगी। जवाब में एक अन्य मंत्री ने कहा कि चुनाव के बाद विधायक अपना नेता खुद चुनेंगे। स्वतंत्रता दिवस के दिन हालात बिगड़ गए, जब पनीरसेल्वम के समर्थकों ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग वाले पोस्टर उनके गृहनगर में चिपकाए और पलानीसामी के समर्थकों ने उसे फाड़ दिया। नतीजतन, चेन्नई में पनीरसेल्वम के घर पर शांति बैठक हुई, जिसमें पलानीसामी के 10 मंत्रियों ने उप-मुख्यमंत्री के साथ गंभीर विमर्श किया। इसके बाद प्रस्ताव मुख्यमंत्री को भेजे गए थे, जिसका नतीजा यह संयुक्त बयान रहा। हालांकि, इसमें असल मुद्दा गौण है और उस पर चर्चा की बजाय पार्टी के नेताओं के लिए सलाह जारी की गई है।
पनीरसेल्वम दो बार कार्यवाहक मुख्यमंत्री बन चुके हैं, जब जयललिता को भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाना पड़ा था। दोनों बार उन्होंने वफादार की तरह अपने कर्तव्यों का पालन किया। अम्मा की मौत के बाद उनकी सहयोगी वी के शशिकला ने उन्हें तीसरी बार यह दायित्व सौंपा। संदेश साफ था कि पिछली दो पारियों की वजह से उनको यह पद सौंपा गया है, इसलिए उन्हें अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर नहीं करनी चाहिए। 31 दिसंबर, 2016 को शशिकला ने औपचारिक रूप से अन्नाद्रमुक की बागडोर संभाल ली और 5 फरवरी, 2017 को उन्हें विधायक दल का नेता भी चुन लिया गया। नतीजतन, अगले दिन ही पनीरसेल्वम ने पद छोड़ दिया, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें पद पर बने रहने का कहा, क्योंकि आय से अधिक संपत्ति के मामले में वह एक फैसले का इंतजार कर रहे थे, जो शशिकला के खिलाफ आया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। लिहाजा शशिकला की नई पसंद पलानीसामी बने।
पलानीसामी और पनीरसेल्वम के बीच गुटीय लड़ाई रोकने के लिए केंद्र ने एक सौदा किया, क्योंकि एकजुट अन्नाद्रमुक हर किसी के हित में था। शायद इसी सौदे के तहत पलानीसामी के पद पर बने रहने की सहमति बनी और पनीरसेल्वम उप-मुख्यमंत्री बनाए गए। पनीरसेल्वम को पार्टी संयोजक बनाकर अन्नाद्रमुक की बागडोर भी उन्हीं के हाथों में सौंपी गई। पर यह पूर्ण व्यवस्था नहीं थी, पलानीसामी को सह-संयोजक बनाया गया व महासचिव का पद खाली रखा गया। भाजपा की मंशा शायद यह थी कि जब तक राज्य में उसका समर्थन-आधार नहीं बन जाता, तब तक सूबे की मित्र-सरकार की मदद से अपनी पकड़ मजबूत बनाकर रखी जाए। अगर उसकी यह योजना थी, तो यह कारगर साबित नहीं हुई है, क्योंकि पलानीसामी धीरे-धीरे मजबूत हुए हैं।
बहरहाल, मुख्यमंत्री ने पिछले पखवाड़े में नई शिक्षा नीति की मुखालफत करके अपने प्रशंसकों व आलोचकों को चौंका दिया। गणेश चतुर्थी के जुलूस पर पाबंदी लगााने से भी उनके आलोचक मुखर हुए हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने तो यह तक दावा किया है कि उनकी पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में एजेंडा तय करेगी। आमतौर पर तमिलनाडु में राष्ट्रीय पार्टियां जूनियर सहयोगी रही हैं, इसलिए उनका यह बयान चौंकाने वाला है, क्योंकि सूबे में भाजपा का आधार सीमित है। चूंकि सितंबर के पहले हफ्ते में शशिकला की रिहाई हो सकती है, इसलिए माना जा रहा है कि उनके सक्रिय होने से पहले ही पलानीसामी और पनीरसेल्वम अपनी हैसियत मजबूत बनाना चाहते हैं। अब जबकि विधानसभा चुनाव आठ महीने दूर है, दोनों नेता अपने-अपने तरीके से नैरेटिव गढ़ना चाहते हैं। पैर जमाने के लिए भाजपा की आक्रामक नीति ने भी यहां के चुनावी माहौल को दिलचस्प बना दिया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार
सम्पादकीय / शौर्यपथ / सोशल मीडिया के जिस मंच को दुनिया भर में अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा अलंबरदार माना जाता रहा है, उस ‘फेसबुक’ पर इन दिनों जैसी तोहमतें लग रही हैं, वे यकीनन स्वतंत्र अभिव्यक्ति के पैरोकारों को निराश करने वाली हैं। लेकिन उतनी ही चिंताजनक बात यह भी है कि इस कंपनी की एक वरिष्ठ अधिकारी को धमकाने की कोशिश की गई है। फेसबुक की क्षेत्रीय पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर अंखी दास ने दिल्ली पुलिस में इस बाबत शिकायत दर्ज कराई है। विडंबना देखिए, जिस नफरती प्रवृत्ति के खिलाफ कथित नरमी बरतने के आरोपों पर फेसबुक को सफाई देनी पड़ रही है, उसकी अधिकारी अब दूसरी तरफ के असहिष्णु लोगों के निशाने पर हैं। दरअसल, पिछले दिनों एक बड़े अमेरिकी अखबार ने खबर छापी थी कि फेसबुक कंपनी भारत में पक्षपाती भूमिका अपना रही है और सत्ताधारी नेताओं की घोर सांप्रदायिक टिप्पणियों को भी प्रतिबंधित नहीं कर रही। जाहिर है, विपक्ष को एक मौका हाथ लग गया है और वह इसे यूं ही नहीं छोड़ना चाहता।
‘हेट स्पीच’ और नुकसानदेह सामग्रियों के खिलाफ फेसबुक में बाकायदा एक बड़ा विभाग है और उसका काम ही है ऐसी सामग्रियों की निगरानी करना और उन्हें प्रकाशित-प्रसारित होने से रोकना, जो न सिर्फ नस्लीय घृणा, सांप्रदायिक विद्वेष को बढ़ावा देने वाली हों, बल्कि जो मानव स्वास्थ्य को किसी भी रूप में नुकसान पहुंचाने वाली हों। मौजूदा कोरोना काल में हमने देखा और महसूस भी किया कि इसके इलाज के तरह-तरह के टोटकों और फर्जी तजवीजों के खिलाफ फेसबुक ने तत्परता से कदम उठाया। इसमें कोई दोराय नहीं कि यह बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि दुनिया भर में हर सेकंड छह नए यूजर इस माध्यम से जुड़ रहे हैं और रोजाना लाखों तस्वीरें व टिप्पणियां इस पर पोस्ट की जा रही हैं। ऐसे में, इस माध्यम की बुनियादी खूबी की रक्षा करते हुए इसके दुरुपयोग को रोकना एक बहुत बड़ी चुनौती है। कंपनी ने प्रकारांतर से स्वीकार भी किया है कि उसे अभी इस दिशा में काम करने की जरूरत है।
लेकिन फेसबुक एक कारोबारी कंपनी है और व्यावसायिक हित-अहित से संचालित उसकी नीतियां तभी तक मान्य हैं, जब तक उसकी पहुंच वाले देशों के आंतरिक मामलों में वे कोई बाधा नहीं खड़ी करतीं। भारत में जो ताजा विवाद खड़ा हुआ है, वह राजनीतिक पक्षधरता से जुड़ा है, इसीलिए इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। हालांकि, फेसबुक ने अपनी सफाई पेश की है कि उसकी नीतियां तटस्थता पर आधारित हैं और वे किसी देश की किसी पार्टी से प्रभावित नहीं हैं। लेकिन दुर्योग से कई अन्य देशों में ऐसे ही आरोप उस पर पहले भी लग चुके हैं। तुर्की में तो इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए सांसद बाकायदा एक कानूनी मसौदा तैयार कर रहे हैं। हमारे यहां फेसबुक यूजर्स की संख्या 34 करोड़ से भी अधिक है। इतने बड़े बाजार को कंपनी नजरअंदाज नहीं कर सकती, क्योंकि किसी भी कंपनी की तरक्की में साख का बड़ा योगदान होता है। बहरहाल, हमें यह तो देखना ही पडे़गा कि कोर्ई भी बाहरी तत्व हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को किसी रूप में प्रभावित न करने पाए। अपनी सुरक्षा के मद्देनजर हमने चीन के दर्जनों एप को अभी हाल में ही प्रतिबंधित किया है, तो फेसबुक और ट्विटर जैसे जन-प्रभावशाली माध्यमों पर भी हमें हर पल नजर रखनी होगी।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / लॉकडाउन के समय से सभी स्कूलों में ऑनलाइन कक्षाएं तो शुरू हो गईं, लेकिन वे बस नाम की रह गई हैं। विशेषकर प्राइमरी कक्षाओं में तो शिक्षक प्रश्नोत्तर की एक सारणी बनाकर पीडीएफ के रूप में अभिभावकों को भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ले रहे हैं। न तो विद्यार्थियों को विषय-वस्तु के बारे में समझाया जाता है, न बच्चों से कोई संवाद किया जाता है। बच्चे केवल स्क्रिन पर देखकर प्रश्नों के उत्तर अपनी कॉपी में उतार लेते हैं। कई बच्चे मोबाइल फोन अथवा कंप्यूटर के आगे बैठे तो रहते हैं, पर पढ़ने में उनकी कोई रुचि नहीं होती। यहां मैं दोष शिक्षकों को दूंगी कि उन्हें इस तरह पढ़ाना चाहिए कि बच्चे सरल तरीके से सब कुछ समझ सकें। वर्तमान स्थिति में शिक्षण-सामग्री और पठन-पाठन, दोनों ही उपयोगी और रुचिपूर्ण हो, तभी ऑनलाइन कक्षा का उद्देश्य पूरा होगा।
विभा गुप्ता, बेंगलुरु
डूब गया सितारा
चेतन चौहान का निधन एक तारा के टूटने के समान है। क्रिकेट के मैदान में कई ऑलराउंडर देखने को मिलते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में चंद लोग ही ऑलराउंडर बनते हैं। क्रिकेट के मशहूर बल्लेबाज रहे चेतन चौहान ने हमेशा इस खेल से अपना लगाव बनाए रखा और विभिन्न भूमिकाओं में रहकर इसकी सेवा की। बाद में समाज सेवा के लिए वह राजनीति में आए, और अभी उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल में भी शामिल थे। अपनी काबिलियत से वह विरोधियों का भी दिल जीत लेते थे। यही वजह है कि क्रिकेटर, प्रशासक और राजनेता, सभी भूमिका में वह सफल साबित हुए। उनका जीवन सदैव नौजवानों को मार्गदर्शन और प्रेरणा देता रहेगा। उनके आकस्मिक निधन से समाज, राजनीति और खेल जगत, सभी को अपूरणीय क्षति हुई है।
हिमांशु शेखर, गया
आत्मनिर्भरता पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाल किले से दिए गए भाषण में सबसे प्रमुख मुद्दा था, आत्मनिर्भर भारत, जिसके लिए सरकार प्रतिबद्ध दिखती है। इसी कारण से गरीब मजदूरों, छोटे कारोबारियों, कुटीर उद्योग वाले व्यापारियों को बैंक से बिना किसी ब्याज के कर्ज मुहैया कराया जा रहा है। जिस दिन ये छोटे कुनबे के लोग अपने-अपने व्यापार में सफल होंगे, देश का विकास खुद हो जाएगा। प्लास्टिक के गिलास को छोड़कर कुल्हड़ का प्रयोग करना ही देश और हमारे स्वास्थ्य के लिए श्रेयस्कर है। सरकार सभी नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने के भरसक प्रयास कर रही है, जिससे हमारी पूंजी और मुनाफा हमारा रहे, कोई दूसरे देश की कंपनी न ले जाए। जल्द ही भारत आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर होगा। इसके लिए सभी नागरिकों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
शुभम पांडेय गगन
अयोध्या, उत्तर प्रदेश
मैदान को टाटा
अपनी कप्तानी और बल्लेबाजी से हजारों-लाखों लोगों का दिल जीतने वाले भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी ने स्वतंत्रता दिवस की शाम को अपने इंस्टाग्राम पर ‘पल दो पल का शायर हूं’ कहते हुए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। इससे स्वाभाविक तौर पर उनके समर्थकों को झटका लगा और उनमें मायूसी छा गई। हालांकि, धौनी के संन्यास के बाद उनके जोड़ीदार सुरेश रैना ने भी ऐसा ही एलान किया और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट छोड़ने की बात कही। धौनी टीम इंडिया के एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी ही नहीं थे, बल्कि सलाहकार और टीम की जीत की राह बनाने वाले एक अच्छे फिनिशर भी थे। रैना के साथ उनकी जोड़ी तो वाकई तमाम क्रिकेटप्रेमियों को याद रहेगी। भले ही रैना और धौनी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया है, पर जब-जब अंतरराष्ट्रीय मैचे खेले जाएंगे, उनकी बात जरूर होगी।
अनिल, दिल्ली विश्वविद्यालय
ओपिनियन / शौर्यपथ / तमाम आशंकाओं के बीच रूस जब ढोल-बाजे के साथ कोरोना वायरस की वैक्सीन लेकर बाजार में उतर रहा है, तब वाल्डेमर हॉफकिन को याद करना जरूरी हो जाता है। हॉफकिन रूस के पड़ोसी देश यूक्रेन में पैदा हुए थे और उन्होंने अपनी ज्यादातर पढ़ाई रूस में ही की थी, लेकिन हम हॉफकिन को जानते हैं उन दो वैक्सीन के कारण, जो उन्होंने भारत को दी थीं। एक थी, हैजे की वैक्सीन और दूसरी, प्लेग की। इन दोनों ही वैक्सीन ने भारत को दो महामारियों से मुक्त कराने में बड़ी भूमिका निभाई थी। हैजे की वैक्सीन उन्होंने पेरिस के पास्टर इंस्टीट्यूट में विकसित की थी और प्लेग की मुंबई में रहकर। दोनों ही बार उन्होंने वैक्सीन का इंजेक्शन सबसे पहले खुद को लगाया था। वैसे यह उन दिनों का एक आम चलन भी था। वैक्सीन सुरक्षित है, इसका भरोसा दिलाने के लिए उस दौर के तमाम बॉयो-केमिस्ट उसे सबसे पहले अपने ऊपर ही आजमाते थे।
तब से एक सदी से ज्यादा का समय बीत चुका है और इस बीच अब यह तरीका बदल गया है। वैक्सीन विकसित करने वालों को अब इस तरह का करतब दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती। अब दुनिया भर में वैक्सीन के परीक्षण का एक निश्चित प्रोटोकॉल है, और यह माना जाता है कि उस प्रोटोकॉल के पालन से जो वैक्सीन तैयार होगी, वह पूरी तरह सुरक्षित होगी। लेकिन रूस ने इस रास्ते को नहीं अपनाया और वैक्सीन की विश्वसनीयता साबित करने के लिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बेटी को इसका पहला इंजेक्शन लगाया गया, यानी एक ही झटके में रूस ने वैक्सीन विज्ञान को उस जगह पहुंचा दिया है, जहां वह एक सदी पहले खड़ा था। वह भी शायद इस उम्मीद में कि दुनिया रूस की इस उपलब्धि का लोहा मानने को मजबूर हो जाए।
ऐसा सिर्फ रूस ही ने नहीं किया, बल्कि कई अन्य देश भी इसकी तैयारी कर रहे हैं। चीन ने तीसरे चरण का परीक्षण किए बिना ही रेड आर्मी के सैनिकों को वैक्सीन लगाने की इजाजत दे दी है, जहां से अच्छे परिणामों की खबरें भी दुनिया भर में प्रसारित की जा रही हैं। इस बीच खबर यह भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यह चाहते हैं कि अमेरिकी वैक्सीन 3 नवंबर से पहले बाजार में आ जाए, ताकि जब वहां राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो, तो लोग टं्रप की इस उपलब्धि का गौरव-बोध लेकर वोट डालने जाएं। हालांकि, वैज्ञानिक कह रहे हैं कि वैक्सीन को लांच करना अगले साल के शुरू में ही संभव हो पाएगा। इस बीच ऐसी खबरें भी आईं कि रूस, चीन व ईरान हैकिंग करके अमेरिका से वैक्सीन शोध के आंकडे़ चुराने की कोशिश कर रहे हैं। वैक्सीन बनाने की इस होड़ को कई विशेषज्ञों ने वैक्सीन का राष्ट्रवाद भी कहा है।
अच्छी बात यह है कि तमाम आशंकाओं के विपरीत भारत ने अपने आप को जल्दबाजी की इस होड़ से दूर रखा। पिछले महीने स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति में कहा था कि तीसरे चरण के फास्ट ट्रैक परीक्षण के बाद भारत में बॉयोटेक की वैक्सीन को 15 अगस्त को जारी कर दिया जाएगा। तभी से यह अटकल लगाई जाने लगी थी कि प्रधानमंत्री लाल किले के अपने भाषण में इसकी घोषणा कर सकते हैं। हालांकि आलोचना के बाद मंत्रालय ने अपने रुख को बदल दिया था। लेकिन अब जब प्रधानमंत्री ने किसी तारीख की कोई घोषणा नहीं की है, तो यह साफ है कि भारत ने इसके खतरों को अच्छी तरह से समझ लिया है।
वैक्सीन के मामले में भारत का जोखिम रूस से कहीं ज्यादा बड़ा है। इस समय दुनिया की साठ प्रतिशत वैक्सीन का उत्पादन भारत में होता है। यह भी कहा जाता है कि दुनिया भर में दस साल तक के हर बच्चे को, जिसका पूरा टीकाकरण हुआ है, कम से कम एक भारतीय वैक्सीन जरूर लगी होगी। वैक्सीन के बाजार में भारत ने अपनी यह साख गुणवत्ता के कारण कई वर्षों में बनाई है। ऐसे में, थोड़ी सी भी जल्दबाजी या एक भी गलत कदम वर्षों की इस मेहनत पर पानी फेर सकता है।
बात सिर्फ वैक्सीन-कारोबार की ही नहीं है। मान लीजिए, परीक्षण में कुछ मामूली कमी रह जाए और बाद में पता लगे कि इससे सिर्फ आधा प्रतिशत लोगों को कोई समस्या या साइड इफेक्ट हो गया, तो कोरोना संक्रमण जिस बडे़ पैमाने पर देश में फैल चुका है, उसे देखते हुए हमें तकरीबन सभी नागरिकों को यह वैक्सीन लगानी ही पडे़गी। ऐसे में, आधा प्रतिशत का अर्थ होगा देश में साठ लाख से ज्यादा लोगों को एक नया रोग दे देना। इसलिए दुर्घटना से देर भली वाला रास्ता अपनाना ही समझदारी भी है। संक्रमण जिस तरह से फैल रहा है और उसके चलते जैसे आर्थिक और सामाजिक नतीजे देखने को मिल रहे हैं, उसमें दुनिया भर के वैज्ञानिकों पर यह दबाव है कि वे पहले जिस काम करने में कई साल लगा देते थे, उसे कुछ हफ्तों में पूरा कर लें। वे इसके लिए दिन-रात एक कर भी रहे हैं, लेकिन जल्दी के इस दबाव में गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता।
एक सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि समस्या जब पूरी दुनिया की है, तो राष्ट्रीय स्तर पर इसके समाधान क्यों खोजे जा रहे हैं? क्यों नहीं पूरी दुनिया के वैज्ञानिक इस पर एक साथ मिलकर काम करते? बात अपने आप में सही भी है, लेकिन पिछले अनुभव इस रास्ते को अपनाने की इजाजत नहीं देते। साल 2009 में जब दुनिया के बहुत सारे हिस्सों में स्वाइन फ्लू रोग फैल रहा था, तब तमाम कोशिशों के बाद अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने इसकी वैक्सीन विकसित कर ली थी। लेकिन घरेलू जरूरतों को देखते हुए उन्होंने इसके निर्यात पर पाबंदी लगा दी थी। अमेरिकी संस्था सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के आंकड़ों के अनुसार, जब तक यह पाबंदी हटी और वैक्सीन सब तक पहुंची, बाकी दुनिया में 5,75,000 लोगों की इस महामारी के कारण मौत हो गई थी। जाहिर है, भारत को अपनी वैक्सीन भी विकसित करनी होगी और बड़े पैमाने पर उसका उत्पादन भी करना होगा, लेकिन बिना किसी जल्दबाजी या हड़बड़ी के।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार
भिलाई / शौर्यपथ / भिलाई इस्पात संयंत्र की पॉवर सप्लाई विभाग (पीएसडी) और इलेक्ट्रो-टेक्नीकल लैब (ईटीएल) की टीम ने उपकरण आपूर्तिकर्ता के विशेषज्ञों के साथ मिलकर एमएसडीएस-5 में युद्धस्तर पर मरम्मत और जीर्णोद्धार के कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। जिसके फलस्वरूप संयंत्र के मॉडेक्स इकाइयों के उत्पादन को प्रभावित होने से बचाया जा सका। गत 20 मई को लगभग संध्या 4 बजे भिलाई इस्पात संयंत्र के एमएसडीएस-5 जीआईएस, 132 किलावॉट बस-2 बे-17 में फॉल्ट आ गया। इस सब-स्टेशन (एस/एस) की आपूर्ति मैसर्स गेंज हंगरी द्वारा की गई थी, जो वर्तमान में सीजी ग्लोबल के नाम से जानी जाती है। यह जीआईएस एस/एस के माध्यम से संयंत्र के यूनिवर्सल रेल मिल, बार एंड रॉड मिल, स्टील मेल्टिंग शॉप 3 और ब्लास्ट फर्नेस-8 को आपूर्ति किया जाता है।
इस दौरान सिर्फ एकमात्र बस, ही सही रूप में कार्य कर रहा था जिसके कारण मॉडेक्स इकाइयों को होने वाली बिजली की आपूर्ति की विश्वसनीयता कम हो गई थी। कार्य कर रहे 132 किलोवॉट बस-1 के किसी भी प्रकार के रूकावट आने पर सम्पूर्ण मॉडेक्स इकाइयों को लंबी अवधि के लिए बिजली की आपूर्ति बंद हो सकती थी। इसलिए, बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए जीआईएस के त्रुटिगत भाग की मरम्मत को प्राथमिकता पर किया जाना जरूरी था।
मेसर्स गैंज, हंगरी से इस बस-2 की मरम्मत के लिए संपर्क किया गया और तदनुसार, मेसर्स गंज ने सीजीएल इंडिया को इस रिपेयर कार्य को संपादित करने का काम सौंपा। सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए जीआईएस एस/एस के मरम्मत का कार्य 132 किलोवॉट बस-1 और 2 को पूर्णत: शटडाउन लेने पर ही हो सकता था। गत 07 अगस्त को यूआरएम में उत्पादन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए 132 किलोवॉट साइड में सीएसईबी की सहायता से वैकल्पिक अस्थायी आपूर्ति की व्यवस्था की गई। एमएसडीएस-1 से ब्लास्ट फर्नेस-8 के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाए रखा गया। 14 अगस्त, 2020 को प्रात: 06 बजे भिलाई इस्पात संयंत्र के पॉवर सप्लाई विभाग (पीएसडी) और ईटीएल की टीम ने सीजीएल के विशेषज्ञों के साथ मिलकर 132 किलोवॉट जीआईएस बस-2 के रिपेयर कार्य को प्रारंभ किया और 16 अगस्त, 2020 को प्रात: 12.30 बजे सफलतापूर्वक पूर्ण कर लिया।
विदित हो कि पीएसडी और ईटीएल की टीम ने संयुक्त रूप से 40 घंटे कार्य किया और निर्धारित समय सीमा से छ: घंटे पूर्व सिस्टम को सामान्य करने में सफलता हासिल की। इस टीम ने मौजूदा महामारी कोविड-19 के दौरान किसी भी संकट से निपटने का साहस दिखाते हुए इस महत्वपूर्ण कार्य को संपादित करने में अपने उत्कृष्ट कार्य कुशलता, उत्साह व ऊर्जा का परिचय दिया।
रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रदेशवासियों विशेष रूप से किसान भाइयों को पारंपरिक पोला तिहार की बधाई और शुभकामनाएं दी है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने नागरिकों के सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की है। अपने शुभकामना संदेश में उन्होंने कहा है कि पोला तिहार छत्तीसगढ़ की परम्परा, संस्कृति और लोक जीवन की गहराइयों से जुड़ा है। इस त्यौहार में उत्साह से बैलों और जाता-पोरा की पूजा कर अच्छी फसल और घर को धन-धान्य से परिपूर्ण होनेे के लिए प्रार्थना की जाती है।
यह त्यौहार हमारे जीवन में खेती-किसानी और पशुधन का महत्व बताता है। मुख्यमंत्री बघेल ने कहा कि यह पर्व बच्चों को हमारी संस्कृति और परम्पराओं से परिचय कराने का भी अच्छा माध्यम है। घरों में प्रतिमान स्वरूप मिट्टी के बैलों और बर्तनों की पूजा कर बच्चों को खेलने के लिए दिया जाता है,जिससे बच्चे अनजाने ही अपनी मिट्टी और उसके सरोकारों से जुड़ते हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कोविड-19 के प्रकोप को देखते हुए ग्रामीणों और किसान भाइयों से पोला तिहार के मनाने के दौरान मास्क लगाने तथा फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील की है।
भिलाई / शौर्यपथ / राष्ट्र के 74 वे स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में न्यू प्रेस क्लब ऑफ भिलाई नगर द्वारा नेहरू भवन में ध्वजारोहण कार्यक्रम आयोजित किया गया। भारत माता के तैल चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। क्लब के पदाधिकारियों एवं सदस्यो की गरिमामयी उपस्थिति में अध्यक्ष सुश्री भावना पांडेय ने ध्वजारोहण किया । राष्ट्रगान एवं जयघोष के साथ ध्वजारोहण का संक्षिप्त कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। तत्पश्चात वरिष्ठ पत्रकार कमल शर्मा के सौजन्य से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में उपयुक्त आयुर्वेदिक क्वाथ काढ़ा का वितरण किया गया। अपने संक्षिप्त उद्बोधन में अध्यक्ष सुश्री भावना पांडेय ने कहा कि उनकी कार्यकारिणी पत्रकार हित के कार्य निरंतर करते रहने के लिए प्रतिबद्ध है। वैश्विक महामारी कोरोना के दौरानए जब पूरी दुनिया लगभग थम सी गयी थी तब भी प्रेस क्लब अपने सदस्यों को राहत पहुचाने की दिशा में सफलता पूर्वक कार्य किया है। सदस्यों की मंशा अनुरूप, बच्चों की शिक्षा में रियायत दिलाने की दिशा में प्रयास जारी हैं। अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर भी कार्य प्रगति पर हैं । अध्यक्ष महोदया ने कहा कि आशा है जल्द ही सकारात्मक परिणाम सामने आने लगेंगे। इस अवसर पर शमशीर सिवानी ने देशभक्ति गजल प्रस्तुत किया तो कमल शर्मा ने अपने दादा जी द्वारा देश की स्वतंत्रता के लिए किये गये संघर्षों को विस्तृत रूप से बताया।
भिलाईनगर / शौर्यपथ / नगर पालिक निगम, भिलाई के कुरूद सीमा क्षेत्र से लगे कचांदूर स्थित कोविड केयर सेंटर में भर्ती मरीजों को गर्म व ताजा भोजन उपलब्ध करया जा रहा है। कोविड सेंटर से कुछ ही दूरी पर मरीजों को अच्छा पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के लिये कैंटिन में भोजन तैयार किया जा रहा है, मरीज ही नहीं बल्कि चिकित्सक स्टॉफ एवं कोविड सेंटर से जुड़े हुए अन्य भी यहीं का बना भोजन ग्रहण कर रहे हैं। आयुक्त श्री रघुवंशी सहित निगम के स्टॉफ भी यहां का बना भोजन खा चुके हैं।
सुबह 06 से रात्रि तक भोजन की बेहतर व्यवस्था-
कोविड केयर सेंटर में मरीजों को समय पर उत्तम खाना देने के लिए निगम ने बेहतर व्यवस्था की है। कैंटिन में मरीजों के लिए प्रात: 6 बजे चाय, बिस्किट, 7 बजे से 9 बजे तक इडली, सांभर बड़ा, साबुदाने की खिचड़ी, पोहा, आलू गुंडा, उपमा, फल इत्यादि में से एक नाश्ता, 11:30 बजे से दोपहर 2 बजे तक 2 सब्जी (उपलब्ध सीजनेबल) सलाद, पापड़, अचार, रोटी, रायता, मीठा से युक्त भोजन की थाली। दोपहर में 3 से 4 बजे के बीच तुलसी, अदरक, इलायची, लौंग, काली मिर्च इत्यादी से बनी हुई काढ़ा प्रदाय की जाती है। इसके बाद दोपहर 4 से 5 बजे के बीच पुन: चाय और बिस्किट, 5 से रात 10 बजे तक रात्रि भोजन की व्यवस्था उपलब्ध है, यदि कोई मरीज इस दरमियान विलंब से पहुंचता है तो उनके लिये तत्काालिक रूप से गर्म भोजन तैयार कर उपलब्ध कराया जाता है।
पेयजल के लिए प्रत्येक वार्ड में आरओ -
पेयजल के लिये निगम प्रशासन द्वारा प्रत्येक वार्ड में आरओ वाटर की व्यवस्था की गई है! आवश्यकता अनुसार मरीज कभी भी पेयजल का उपयोग कर सकते है। इसके अतिरिक्त कैंटिन में भी पानी बॉटल की सुविधा उपलब्ध है। दैनिक क्रिया के लिये भूतल से पानी, टंकियों तक पहुंचाने व्यवस्था की गई है।
मूलभूत सुविधाओं के बेहतर व्यवस्था के लिये टेक्निशियन उपलब्ध -
पेयजल समस्या, विद्युत इत्यादि से संबंधित समस्या के लिये मैकेनिक की व्यवस्था की गई है। जो इनमें से किसी भी प्रकार की खराबी आने पर सूचना मिलते ही समस्या ठीक करने का कार्य करते है। पृथक से मेन सुपरवाइजर एवं उनके अधीनस्थ सुपरवाइजर भी अपनी पाली में कोविड सेंटर से संबंधित समस्याओं पर निगरानी रखते हुए इसे दूर करते है। बेड शीट चेंज करने के लिए सिंगल यूज़ बेडशीट का उपयोग किया जा रहा है, जिसे समयानुसार परिवर्तन किया जाता है!
साफ सफाई एवं सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था-
सुरक्षा की दुष्टि से पुलिस जवानों की तैनाती पाली में की गई है, ताकि बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर रोक लगे एवं मरीज सेंटर से बाहर न निकल सके। सफाई के लिए 4 शिफ्ट में सफाई कर्मचारियों की तैनाती की गई है, जो पीपीई किट इत्यादि सुरक्षा उपकरणों से लैस होकर कोविड सेंटर में सफाई का जिम्मा संभाले हुए हैं। इसी तरह 4 पाली में चिकित्सकीय टीम की भी ड्यूटी निर्धारित की गई है।
मनोरंजन / शौर्यपथ / कोरोना वायरस की वजह से कई महीनों से थिएटर्स बंद हैं जिस वजह से अब कई फिल्में ओटीटी पर रिलीज हो रही हैं। इस बीच नसीरुद्दीन शाह ने समान की फिल्मों को लेकर एक ऐसा बयान दिया है जो काफी सुर्खियों में है। नसीरुद्दीन का कहना है कि उन्हें संदेह है कि जब सलमान की फिल्में ओटीटी पर रिलीज होगी तो क्या उन्हें वैसा ही रिएक्शन मिलेगा जैसा थिएटर्स में मिलता था।
नसीरुद्दीन ने राजीव मसंद के इंटरव्यू के दौरान कहा, 'यह देखना दिलचस्प होगा कि सलमान खान की फिल्में जब ओटीटी पर रिलीज होगी तो क्या तब भी फैन्स उसी तरह सीटी या ताली बजाएंगे, गलियों में नाचेंगे जैसे कि वह थिएटर्स पर फिल्म के रिलीज पर करते थे। मुझे इस बात पर शक है'।
बता दें कि सुशांत के निधन के बाद नेपोटिज्म को लेकर बहस छिड़ी हुई है। कुछ दिनों पहले नसीरुद्दीन से एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि क्या उन्हें लगता है कि इस बहस से कुछ बदलाव आएंगे? तो उन्होंने कहा था, इसकी सिर्फ उम्मीद की जा सकती है, लेकिन इस बहस का स्तर बहुत बचकाना हो रहा है। हम अपने गंदे लंगोट सबके सामने क्यों धो रहे हैं।
उन्होंने कहा था कि सुशांत के निधन के बाद लोग बॉलीवुड में नेपोटिज्म और आउसाइडर्स को लेकर बहस कर रहे हैं। वहीं कंगना रनौत को लेकर उन्होंने कहा कि वह कुछ फिल्ममेकर्स और स्टारकिड्स को निशाना बना रही हैं, यहां तक की तापसी पन्नू और स्वरा भास्कर जैसे एक्टर्स को वह बी ग्रेड बता रही हैं।
नसीरुद्दीन ने आगे कहा, 'अगर हम सभी ने सिकायत करना शुरू कर दिया तो ये इंडसट्री पृथ्वी की सबसे खराब जगह के रूप में जानी जाएगी'।
खाना खजाना / शौर्यपथ / अगर आप नॉन वेजिटेरियन हैं और शाम की पार्टी में मेहमानों के स्नैक्स को लेकर थोड़ी कंफ्यूज हो रही हैं तो टेंशन छोड़ इस रेसिपी को ट्राई करें। नॉन वेजिटेरियन लोगों को स्नैक्स में चिकन विंग्स बेहद पसंद आते हैं। खास बात यह है कि इन्हें बनाने के लिए आपको अपने फेवरेट केएफसी भी नहीं जाना पड़ेगा। आप घर बैठे ही केएफसी जैसे लजीज चिकन विंग्स बना सकती हैं। तो देर किस बात की आइए जानते हैं चिकन विंग्स बनाने की क्या है रेसिपी।
केएफसी स्टाइल चिकन विंग्स बनाने के लिए सामग्री-
मैरिनेट करने के लिए
-साफ किए हुए चिकन विंग्स
-हल्दी पाउडर
-दही
-लाल मिर्च पाउडर
-अदरक-लहसुन का पेस्ट
-काली मिर्च
-चिकन मसाला
-नींबू
कोटिंग के लिए-
-मसाला चिप्स
-तेल
केएफसी स्टाइल चिकन विंग्स बनाने का तरीका-
चिकन विंग्स बनाने के लिए सबसे पहले एक बाउल में चिकन विंग्स लेकर सभी सामग्री को मैरिनेट करने के लिए मिलाकर फ्रिज में 30 मिनट के लिए रख दें। अब मसाला चिप्स का पैकेट लेकर इसे थोड़ा भूरा होने तक भूने। अब इन चिप्स का पाउडर बना लें। अब मैरिनेट किया हुआ चिकन लेकर क्रश चिप्स के साथ इसे कोट करें।एक कड़ाही में तेल गर्म करके चिकन विंग्स को कुरकुरा होने तक भूनें। अब तले हुए चिकन विंग्स में नींबू का रस ऊपर से डालकर मेहमानों को गर्मा- गर्म सर्व करें।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
