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धर्म संसार / शौर्यपथ / श्रावण गणेश चतुर्थी व्रत है। गणेश जी का व्रत करने वाले यह ध्यान रखें कि कृष्ण पक्ष में चतुर्थी रात में चंद्रोदय के समय रहनी चाहिए और शुक्लपक्ष में मध्याह्न में। इसमें उदया तिथि नहीं ली जाती है। हां, तृतीया के साथ चतुर्थी ले सकते हैं, लेकिन चतुर्थी के साथ पंचमी तिथि नहीं होनी चाहिए। समस्त देवी-देवताओं में प्रथम पूज्य गणेश जी की लीलाएं अत्यंत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने ही माता-पिता को सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्रदान की।
दूर्वा गणेश जी को उसी तरह प्रिय है, जिस तरह से शिवजी को बेलपत्र और नारायण को तुलसी। गणेश विवेक हैं। विद्यावरिधि बुद्धिविधाता हैं। असल में जिसके पास विवेक होगा, उसी को सनातन धर्म के अनुसार आदिशक्ति दुर्गा, सूर्य, शिव और श्री हरि आदि पंचदेवों की अक्षुण्ण ऊर्जा प्राप्त होगी। गणेश हैं, तभी तो सृष्टि रची जा सकी। ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने से पहले उनकी पूजा की। विघ्न का डर तो रहा ही होगा, पर सकारात्मक ऊर्जा, विवेक संपन्नता की इच्छा भी रही होगी। इसलिए जहां गणेश हैं, वहीं समस्त देवी-देवता विराजमान हैं।
कैसे करें गणेश चतुर्थी व्रत-
लाल रंग के वस्त्र गणेश जी को पहनकर उन्हें बेलपत्र, अपामार्ग, शमीपत्र, दूर्वा अपर्ण करना चाहिए। धन की अच्छी स्थिति होने पर 21 लड्डू , 21 दूब, जामुन आदि के साथ फल, पंचमेवा, पान आदि तो होना ही चाहिए। 10 लड्डूओं का दान करना चाहिए। आरती आदि करके 'गणेश्वरगणाध्यक्ष गौरीपुत्र गजानन। व्रतं संपूर्णता यातु त्वत्प्रसादादिभानन।।' श्लोक का उच्चारण करते हुए प्रार्थना करें। गणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले को उदय हुए चंद्रमा, श्री गणेश और चतुर्थी माता को गंध, अक्षत आदि के साथ अध्र्य अवश्य देना चाहिए। इसके बाद मीठा भोजन कर सकते हैं।
गणेश चतुर्थी व्रत का महत्व-
इस श्रावण कृष्ण चतुर्थी व्रत के बारे में कहा जाता है कि माता पार्वती जब शिव जी को पति के रूप में पाने के लिए तप कर रही थीं और शिवजी प्रस्न्न नहीं हो रहे थे, तब उन्होंने यह व्रत किया। व्रत करने के पश्चात उनका शिव से विवाह संपन्न हुआ। हनुमान ने सीता की खोज में जाने पर यह व्रत किया। रावण को जब राजा बलि ने पकड़ कर कैद कर लिया, तब रावण ने यह व्रत किया था। गौतम की पत्नी अहिल्या ने भी इस व्रत को किया था।
गणेश चतुर्थी व्रत संकटों से बचाता है-
यह व्रत कम से कम एक या तीन वर्ष करें। जिनका विवाह नहीं हो पा रहा है, उन्हें तो यह व्रत अवश्य करना चाहिए। शनि की साढे साती से पीड़ित राशियों-धनु, मकर, कुंभ और शनि की ढैया वाली राशियों -मिथुन और तुला वाले लोगों को भी यह व्रत संकटों से बचाता है।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / तपती गर्मी के बाद बारिश का मौसम तन और मन दोनों को सुकून देता है। लेकिन मानसून का मजा तब किरकिरा हो जाता है जब इस समय घरों में सीलन, फंगस और तरह-तरह के इंफेक्शन लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाते हैं। इस समय लोग वैसे ही कोरोना महामारी की वजह से बेहद डरे हुए हैं। ऐसे में खुद को सेहतमंद रखने के साथ अपने घर को भी संक्रमणमुक्त रखना बेहद जरूरी है। तो आइए जानते हैं आखिर कैसे बारिश के मौसम में अपने घर को सीलन और फंगस से रखें दूर।
क्यों होती है घरों में सीलन-
बरसात के मौसम में कीटाणु और सूक्ष्मजीव की संख्या तेजी से बढ़ने लगती है। इसका मुख्य कारण थर्मल इंसुलेशन न होना, साफ-सफाई की कमी, घर में धूप-हवा का ठीक से न आना सीलन और नमी पैदा करता है। जिससे फंगस की समस्या भी देखने को मिलती है।
सेहत को नुकसान-
घर में सीलन होने की वजह से अल्टरनारिया, एस्परजिलस, पेनिसिलियम और क्लोडोस्पोलियम जैसी फंगल प्रजातियां पनपने लगती हैं। जिससे व्यक्ति को दमा, एलर्जी, डर्मिटाइटिस और राइनाइटिस के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
सीलन और फंगस से घर को ऐसे रखें दूर-
-सीलन की समस्या मानसून में अक्सर ज्यादा देखने को मिलती है। ऐसे में बाथरूम, टॉयलेट, बंद पड़े कमरे में, जहां फंगस, सीलन और कीट आसानी से पनप सकते हैं कीटनाशक छिड़काव और फ्यूमिगेशन करवाकर कीट और मच्छर,मक्खियों से छुटकारा पा सकते हैं।
-किचन और बाथरूम जहां पानी का इस्तेमाल अधिक होता है और धूप नहीं पहुंच पाती, ऐसी जगह को सूखा रखने की कोशिश करें।
-हफ्ते में एक दिन किचन की किसी अच्छे कीटनाशक से सफाई करें।
-नमी , सीलन वाले कमरे में न सोएं।
-प्राकृतिक रूप से घर में धूप को आने दें। घर की खिड़कियों को कुछ देर के लिए जरूर खोलकर रखें।
-सीलन से पहले ही खराब हो चुकी दीवारों को ठीक करने के लिए दरारों में वॉटरप्रूफ चूना भरें। ऐसा करने से दोबारा उस जगह सीलन नहीं आएगी।
-लौंग का इस्तेमाल करके भी आप घर की सीलन से निजात पा सकते हैं। इसके लिए आप लौंग और दालचीनी को करीब आधा घंटा पानी में डालकर छोड़ दें। आधे घंटे बाद इस पानी को उबालकर इसे रूम प्रेशनर की तरह प्रयोग करें।
खाना खजाना / शौर्यपथ / राजस्थान दुनियाभर में न सिर्फ अपनी रंग-बिरंगी संस्कृति बल्कि अपने तीखे-चटपटे खानपान के लिए भी काफी फेमस है। राजस्थान का भोजन तीखा और मसालेदार होने के बावजूद विदेशी लोगों में भी काफी पसंद किया जाता है। मानसून का महीना चल रहा है तो क्यों न ट्राई की जाए राजस्थान की ट्रेडिशनल रेसिपी राजस्थानी बंजारा गोश्त।
राजस्थानी बंजारा गोश्त बनाने के लिए लगने वाली सामग्री-
मटन, सरसों का तेल, प्याज, लहसुन का पेस्ट, अदरक का पेस्ट, देगी मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, हल्दी पाउडर, गाढ़ा दही, धनिया बीज पीसकर भुना हुआ, लौंग, साबुत काली मिर्च, सूखी लाल मिर्च, दालचीनी छड़ी, काला नमक
राजस्थानी बंजारा गोश्त बनाने की विधि-
1- सबसे पहले कड़ाही में सरसों का तेल गर्म कर लें। अब उसमें करी पत्ता, काली मिर्च, लौंग, दालचीनी और सूखी लाल मिर्च डालकर एक मिनट के लिए चलाएं।
2- अब कड़ाही में कटा हुआ प्याज डालकर उसे अच्छी तरह पका लें।
3-प्याज पकने के बाद अब इसमें अदरक और लहसुन का पेस्ट डालकर उसे भी 5 मिनट के लिए अच्छी तरह से पका लें।
4- कड़ाही में अब देगी मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, हल्दी पाउडर और काला नमक डालकर उसे 5 मिनट तक अच्छी तरह पकाएं।
5- मटन के टुकड़ों को अब इस मसाले में डालकर 10-15 मिनट के लिए ढक्कन से कवर करके अच्छी तरह पकने दें।
6-अब मटन में दही मिलाकर इसे और 10 मिनट तक पकाएं, जब तक कि मांस पककर तैयार न हो जाए।
7- अब मटन को हरी मिर्च और अदरक के साथ गार्निश करके सर्व करें।
खाना खजाना / शौर्यपथ / मानसून में हल्की-हल्की बारिश के बीच आपके हाथों में गर्म मसाला चाय के साथ कुरकुरे प्याज के पकौड़े से भरी एक प्लेट रखी हो, तो वाकई किसी के भी मुंह में देखकर पानी आ जाए। प्याज के पकौड़े ज्यादातर हर भारतीय घर में पंसद और बनाए जाते हैं। यह एक पॉपुलर स्ट्रीट फूड है, जो अचानक घर आए मेहमानों के लिए या फिर मानसून का मजा लेने के लिए अक्सर घरों में बनाएं जाते हैं। लेकिन कई बार लोगों की यह शिकायत रहती है कि उनके पकौड़े क्रिस्पी नहीं बनते, तो देर किस बात की आज आपको बताते हैं कैसे बनाएं जाते हैं मार्केट स्टाइल में क्रिस्पी प्याज के पकौड़े।
प्याज के पकौड़े के लिए सामग्री-
-2 प्याज-
-¼ बाउल- बेसन
-1½ टी स्पून-लाल मिर्च का पाउडर
-1 टेबिल स्पून-चावल का आटा
-¾ कप-हरा धनिया
-¼ टी स्पून-हींग
-स्वादानुसार-नमक
-½ कप-पानी
-2 टेबिल स्पून- तेल तलने के लिए
प्याज के पकौड़े बनाने की विधि-
प्याज के पकौड़े बनाने बनाने के लिए सबसे पहले दो प्याज लेकर उनके ऊपर और नीचे का हिस्सा काट लें। अब प्याज को छीलकर उसका ऊपरी सख्त हिस्सा भी काट लें। अब प्याज को दो टुकड़ों में कांट कर आधा-आधा करके पतले और लंबे टुकड़ों में कांट लें।
अब कटे प्याज को एक बाउल में निकालकर इसकी लेयर्स निकाल लें। इसी बाउल में अब बेसन लेकर इसमें लाल मिर्च पाउडर, चावल का आटा, हिंग, नमक और कटा हुआ हरा धनिया डालकर सभी चीजों को अच्छे से मिक्स कर लें। अब बाउल में थोड़ा-थोड़ा पानी डालकर इसका एक गाढ़ा घोल बना लें।
अब एक पैन में तेल गर्म करें। गर्म तेल के दो चम्मच इस बेसन के घोल में डालकर अच्छे से मिक्स करें। तेल गर्म होने पर अपने हाथों की मदद से, एक एक कर पकौड़े बना कर तेल में डालते जाएं। पकौड़ों को 2 मिनट तक मध्यम आंच पर तलने के बाद उन्हें पलट दें। पकौड़ों को तब तक तले जब तक यह दोनों ओर से गोल्डन ब्राउन न हो जाए। पकौड़ों को तेल से निकालकर, गर्मा-गर्म सर्व करें।
नजरिया / शौर्यपथ कोरोना वायरस की वजह से करीब चार माह के व्यवधान के बाद इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज के बीच टेस्ट मैच की शुरुआत के साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की वापसी हो गई। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच 13 मार्च को सिडनी मैदान पर बिना दर्शकों के मैच खेले जाने के बाद से यह पहला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच है। क्रिकेट की वापसी होने के बाद अब निगाहें इस साल के आखिर में ऑस्ट्रेलिया में होने वाले टी-20 विश्व कप के स्थगन और आईपीएल के आयोजन की घोषणा पर लग गई हैं। आईसीसी बोर्ड की इस हफ्ते के अंत में होने वाली बैठक में विश्व कप के स्थगन की घोषणा तय मानी जा रही है। इसकी वजह क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का अब इससे ध्यान हटाकर सितंबर मध्य में इंग्लैंड के साथ लिमिटेड ओवरों की सीरीज आयोजित करने पर ध्यान केंद्रित करना है। कोरोना की वजह से ज्यादातर क्रिकेट बोर्डों की आर्थिक तौर पर कमर टूट चुकी है और वे खिलाड़ियों की फीस में खासी कटौती कर चुके हैं। इसलिए दुनिया के ज्यादातर क्रिकेटर हमेशा से टी-20 विश्व कप की जगह आईपीएल के आयोजन के पक्षधर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें भाग लेना उनकी माली हालत को सुधार सकता है।
अब सवाल यह है कि बीसीसीआई को यदि टी-20 विश्व कप की विंडो मिल भी जाती है, तो क्या वह अपने यहां इस टी-20 लीग को आयोजित करने की स्थिति में भी है? देश में कोरोना वायरस के लगातार पैर पसारने से तो नहीं लगता कि यहां इस समय आईपीएल आयोजन की स्थिति है और साल के आखिर तक इन हालात में बदलाव की भी संभावना नजर नहीं आ रही है। सभी क्रिकेट बोर्ड इस बात को अच्छे से जानते हैं कि आईपीएल का आयोजन करने से कोरोना के कारण बिगड़ी आर्थिक हालत पटरी पर आ सकती है। संयुक्त अरब अमीरात और श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड तो पहले ही आईपीएल के आयोजन अपने यहां कराने का प्रस्ताव बीसीसीआई को भेज चुके हैं। अब इसमें नया नाम न्यूजीलैंड क्रिकेट बोर्ड का भी जुड़ गया है। न्यूजीलैंड कोरोना से मुक्त होने वाला पहला देश भी है। अब यह बीसीसीआई को तय करना है कि साल 2009 की तरह क्या इस बार भी आईपीएल का आयोजन विदेश में किया जाए?
इसमें कोई दो राय नहीं है कि न्यूजीलैंड में आईपीएल दर्शकों के साथ आयोजित किया जा सकता है, लेकिन यूएई और श्रीलंका में इसे आयोजित करने पर यह बात पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती। लेकिन न्यूजीलैंड में आईपीएल कराने के खिलाफ एक ही बात जाती है कि उसके और भारत के बीच समय में करीब साढ़े सात घंटे का फर्क है, इसलिए वहां भारतीय समयानुसार देर से देर दोपहर 12.30 बजे तक मैच शुरू कराए जा सकते हैं, लेकिन इस कारण भारत में दफ्तरों में काम करने वाले ज्यादातर लोग इन मैचों से नहीं जुड़ सकेंगे। इसके अलावा, वहां मैचों में भारतीय उपमहाद्वीप की तरह दर्शक भी नहीं जुट सकते। फिर, यूएई को 2014 में आईपीएल के कुछ मैच आयोजित करने का अनुभव है, तो श्रीलंका में आयोजन किफायती रह सकता है।
बीसीसीआई को दुनिया भर के क्रिकेट बोर्डों में सबसे अमीर माना जाता है और इसमें आईपीएल की भी अहम भूमिका है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि वर्ष 2018 से 2022 का मीडिया राइट्स करार स्टार स्पोट्र्स से 4,087 करोड़ रुपये का हुआ है। यही नहीं, बीसीसीआई टाइटल प्रायोजक, आधिकारिक पार्टनर्स, अंपायरों के प्रायोजक व स्ट्रेटजिक टाइम आउट प्रायोजकों के जरिए भी कमाई करता है। इसी तरह, कोई जीते या हारे, खूब कमाई होती है। इन वजहों से ही इस लीग से जुड़े लोग इसे रद्द करने के पक्ष में नहीं हैं। इनका मानना है कि कोरोना की वजह से लॉकडाउन हो चुकी क्रिकेट अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है।
बीसीसीआई आईपीएल के आयोजन के संबंध में कोई भी घोषणा करने को लेकर देखो और इंतजार करो की नीति अपना रहा है। वह चाहता है कि पहले टी-20 विश्व कप के स्थगन की घोषणा हो और फिर चीनी कंपनियों के प्रायोजक होने का मामला सुलझे, उसके बाद ही आईपीएल के आयोजन को लेकर कोई घोषणा की जाए। वैसे बीसीसीआई सितंबर के आखिर से लेकर नवंबर की शुरुआत के बीच आईपीएल आयोजन करने का मन बना चुका है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)मनोज चतुर्वेदी, वरिष्ठ खेल पत्रकार
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / से अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई है, तब से देश में कोरोना मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अभी हम संक्रमितों के मामले में तीसरे सबसे बड़े देश हैं। बहुत सारे लोगों ने लॉकडाउन का मजाक उड़ाया था, परंतु अनलॉक में मरीजों की बढ़ती संख्या उन्हें माकूल जवाब दे रही है। गनीमत है कि हमारे यहां इस बीमारी के कारण मृत्यु-दर कम है, लेकिन इसका एक प्रभाव यह है कि लोग असावधान हो गए हैं। यह हाल तब है, जब स्वास्थ्य संसाधन के लिहाज से हमारी हालत बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे में, यदि सामुदायिक संक्रमण फैलता है, तो बीमारी पर काबू पाना काफी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए एक सच्चे नागरिक का हम फर्ज निभाएं और सुरक्षित रहने का हर तरीका अपनाएं। सजगता ही इसका निदान है।
आनंद पाण्डेय, रोसड़ा
हकीकत समझे नेपाल
आज नेपाल जिस प्रकार चीन के इशारे पर भारत को आंखें दिखाने की हिमाकत कर रहा है, उसे इसका अंदाजा नहीं है कि चीन धीरे-धीरे उस पर कब्जे की कोशिश में है। आजाद भारत में पहली बार ऐसा हुआ है कि बेटी-रोटी के संबंधों के बीच दूसरी ओर से कंटीली तारों से सीमा-रेखा खींचे जाने की बात कही गई और भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का प्रयास किया गया। ऐसी स्थिति में भारत को ठोस कदम उठाना ही होगा। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत चीन कई देशों की अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमा चुका है। वह रह-रहकर हमें भी आंखें दिखाता है। ऐसे में, नेपाल को यह समझ लेना चाहिए कि चीन के प्रति दोस्ताना रवैया भविष्य में उसे परतंत्र बना सकता है। उसे अपनी संप्रभुता की रक्षा करनी चाहिए, ताकि उसका अस्तित्व स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बरकरार रहे।
बिन्नी कुमारी, सारण
पीछे लौटा चीन
वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पिछले लगभग दो महीनों से जो भारी तनाव बना हुआ था, उसमें अब काफी सुधार आया है और चीन की सेना वापस लौटने लगी है। यह एक सुखद खबर है, क्योंकि युद्ध से किसी भी देश का भला नहीं होता। भारत की जवाबी कार्रवाइयों और आर्थिक चोट के बाद चीन में यह नरमी आई है। दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्ता बेहद जरूरी है, क्योंकि दोनों एशिया की सबसे महत्वपूर्ण ताकतें हैं। इनका आपस में टकराना इस पूरे उपमहाद्वीप में शांति के लिहाज से अच्छा नहीं होगा। इससे विश्व राजनीति पर भी असर पडे़गा। सबसे अच्छी बात यह है कि समय रहते बीजिंग को इस बात का एहसास हो गया और वह पीछे लौट गया।
शुभम पांडेय गगन
अयोध्या, फैजाबाद
विवाद बनाम व्यापार
किसी देश की अर्थव्यवस्था पर चोट करने से उसकी अकल ढीली पड़ जाती है। इसका ज्वलंत उदाहरण चीन है। वह भारत से टकराने की नीति से पीछे हट गया है। दरअसल, भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए उसके 59 एप पर पाबंदी लगा दी, साथ ही रेलवे ने चीन की कंपनियों को मिले ठेके रद्द कर दिए। हमारे इस सख्त रुख को देखकर चीन को यह बात समझ में आ गई कि भारत विवाद और व्यापार एक साथ नहीं करेगा। इसके बाद चीन पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में पीछे हटने लगा। इससे स्वाभाविक तौर पर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बहाल हो सकेगी। इससे नेपाल के तेवर भी नरम पड़ जाएंगे। मानचित्र विवाद को उसने बेवजह ही तान दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के उकसावे में आकर वह ऐसा कर रहा है। चूंकि अब चीन को एहसास हो गया है कि भारत 1962 के दौर से काफी आगे बढ़ चुका है, इसलिए वह शायद ही हमसे टकराना चाहेगा। ऐसा होने पर नेपाल भी ढीला पड़ता जाएगा, क्योंकि उसे चीन का साथ शायद ही मिले।
राकेश चौधरी, दरभंगा, बिहार
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / कोरोना महामारी ने अमेरिकी समाज और उसके शासन से जुडे़ कई मिथकों को ध्वस्त किया है। अमेरिका की केंद्रीय आव्रजन संस्था ‘इमिग्रेशन ऐंड कस्टम्स एनफोर्समेंट’ (आईसीई) का ताजा फैसला इसका नया उदाहरण है। आईसीई ने सोमवार को फरमान सुनाया कि अमेरिका में पढ़ रहे उन तमाम विदेशी छात्रों को देश छोड़ना पड़ेगा, जिनकी यूनिवर्सिटी ने आगामी सेमेस्टरों में ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था मुकम्मल कर ली है। यदि इसके बावजूद कोई छात्र अमेरिका में टिका रहा, तो उसे जबरन बाहर किया जाएगा। जाहिर है, इस फैसले का असर लाखों विदेशी विद्यार्थियों पर पडे़गा। खासकर भारत और चीन के छात्र इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे, क्योंकि सबसे ज्यादा इन्हीं दोनों देशों के विद्यार्थियों की तादाद है। यही नहीं, उन हजारों विद्यार्थियों के आगे भी फिलहाल अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है, जो सितंबर से नए अकादमिक-सत्र में भाग लेने के लिए अमेरिका पहुंचने वाले थे।
इसमें कोई दोराय नहीं कि इस महामारी से निपटने में प्रशासनिक कमियों को लेकर अमेरिकी समाज में अंदरखाने काफी उबाल है। जल्द ही वहां राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में, ट्रंप प्रशासन अमेरिकी अवाम को अब यह दिखाना चाहता है कि उसे सिर्फ उनका ख्याल है। महामारी के बाद वह वीजा नियमों में कई बदलाव कर चुका है। मगर हकीकत यह है कि दुनिया में सबसे अधिक जान-माल का नुकसान उठाने के बावजूद अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों में कोरोना से निपटने को लेकर अब भी समन्वय की भारी कमी है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट महामारी के सवाल पर आज भी अलग-अलग नजरिया रखते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ लगातार आगाह कर रहे हैं कि अमेरिका की स्थिति बेहद गंभीर है, और यह महामारी के बीचोबीच खड़ा है, पर राष्ट्रपति ट्रंप के बेहद करीबी लोग ही संक्रमण से बचाव के मान्य उपायों का मजाक उड़ाते फिर रहे हैं। वे मास्क पहनने की अनिवार्यता की भी खिल्ली उड़ाने से बाज नहीं आ रहे, जबकि ठोस नजीर सामने हैं कि जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने कैसे मास्क और फिजिकल डिस्टेंसिंग के जरिए इस घातक वायरस के प्रसार को काबू करने में सफलता पाई है। मगर सच्ची कोशिश और प्रतीकात्मक लड़ाई अमेरिकी समाज के दोहरेपन को अक्सर दुनिया के सामने ले आती रही है। कोरोना महामारी ने एक बार फिर इसे उजागर कर दिया है।
ठीक है, हर सरकार अपने नागरिकों के हितों का ख्याल सबसे ऊपर रखती है, पर उसका यह भी फर्ज है कि अपनी भौगोलिक सीमा में दूसरे देशों के बाशिंदों के मानव अधिकारों की भी वह रक्षा करे। वैसे भी, ये विद्यार्थी शरणार्थी नहीं हैं, जिन्हें अमूमन हर देश एक बोझ समझता है। ये वे विद्यार्थी हैं, जिनसे अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने मोटी फीस वसूली है। एक ऐसे वक्त में, जब अंतरराष्ट्रीय सरहदें बंद हैं, तमाम उड़ानें रद्द हैं, ट्रंप प्रशासन को इन विदेशी छात्रों को उनके मुल्क तक सुरक्षित पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उच्च शिक्षा उद्योग का अच्छा-खासा योगदान है। उसे सालाना करीब 37 अरब डॉलर की कमाई इससे हो रही है। मुश्किल समय के ऐसे आचरण भावी विद्यार्थियों को उससे विमुख भी कर सकते हैं। बहरहाल, इस नई स्थिति में देशों और सरकारों के लिए भी एक सबक है, अपने यहां ज्यादा से ज्यादा विश्व-स्तरीय संस्थान खड़े कीजिए।
ओपिनियन / शौर्यपथ /पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी से आती खबरें सुखद हैं। चीन की सेना कई वजहों से पीछे लौटने को मजबूर हुई है। पहला कारण तो निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल है। उन्होंने हालात से निपटने के लिए दोतरफा रणनीति अपनाई। एक तरफ, उन्होंने सेना का मनोबल बढ़ाया और उसके लिए आधुनिक साजो-सामान जुटाए, तो वहीं दूसरी तरफ, लेह-लद्दाख जाकर पड़ोसी देश को यह संदेश दिया कि शीर्ष स्तर पर बनी सहमति जमीन पर उतारी जाए, तो वह दोस्ती के लिए भी तैयार हैं। इसके बाद ही अजीत डोभाल को सक्रिय किया गया, जो चीन के मामलों में प्रधानमंत्री के निजी प्रतिनिधि रहे हैं।
यह सही है कि कई बार युद्ध आवश्यक हो जाता है, पर किसी भी राष्ट्र के लिए यह एकमात्र विकल्प नहीं होना चाहिए। इससे बचने के लिए अपनी आंतरिक शक्तियों को मजबूत करना आवश्यक है। भारत ने भी यही किया। हमने आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाए, साथ ही वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपना योगदान बढ़ाना शुरू किया। एक बड़ा उपभोक्ता बाजार हमारे हित में है ही। लिहाजा, चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने की शुरुआत हुई। फिर तो, अन्य देश भी खुलकर हमारे साथ आ गए और बीजिंग की आलोचना करने लगे, जबकि शुरुआत में इन देशों ने 20 भारतीय सैनिकों के बलिदान पर महज शोक जताया था।
हालांकि, चीनी नेतृत्व की भी तारीफ करनी चाहिए। उसने सही समय पर अपने कदम पीछे खींचे हैं। बीजिंग ने यह फैसला तब किया, जब वहां का मीडिया बार-बार 1962 के संघर्ष की याद दिला रहा था और कूटनीतिज्ञ पाकिस्तान और नेपाल के रास्ते नई दिल्ली को घेरने की रणनीति बनाने में मशगूल थे। मगर भारत सरकार ने आपसी मतभेद खत्म कराने में आखिरकार सफलता हासिल कर ली।
अब सवाल यह है कि आगे की क्या रणनीति बनाई जाए? एक आशंका यह भी है कि कहीं 1962 तो नहीं दोहराया जा रहा, क्योंकि उस वर्ष भी पीछे लौटकर चीन ने हम पर हमला बोला था? मगर मैं इससे इत्तफाक नहीं रखता। हमने इस बार चीन की आंखों में आंखें डालकर उसे पीछे हटने को मजबूर किया है। फिर भी, हमें सजग और सावधान रहना होगा।
हमारा फायदा इसी में है कि सेना को बैरकों में रहने दिया जाए। सीमा पर बेवजह की उसकी तैनाती भय का माहौल बनाएगी। मगर इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास-कार्य रोक दिए जाएं। वहां न सिर्फ बुनियादी ढांचे का निर्माण और आर्थिक विकास जरूरी है, बल्कि स्थानीय लोगों को भावनात्मक और आर्थिक रूप से शेष भारत से जोड़ना भी आवश्यक है। इस बाबत पहले की सरकारों ने उचित प्रयास नहीं किए, जिसके कारण हमारे कई क्षेत्रों पर पड़ोसी देशों का कब्जा है। इससे वैश्विक मंचों पर गलत संदेश जाता है। हमारी सदाशयता हमारी कमजोरी समझ ली गई है।
ऐसे संदेश कितने खतरनाक होते हैं, इसका पता पहले और दूसरे विश्व युद्ध से चलता है। इन दोनों महासमर की शुरुआत तब हुई, जब एक पक्ष को दूसरा कमजोर महसूस होने लगा। जब ऐसी सोच हावी हो जाती है, तो फिर संघर्ष स्वाभाविक तौर पर पैदा हो जाता है। ईरान-इराक युद्ध का भी यही संदेश है। अच्छी बात है कि इस बार भारत धारणा की जंग में मजबूत होकर उभरा है। पिछले पांच-छह वर्षों में हमने न सिर्फ पड़ोसी देशों के तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास-कार्य किए हैं, बल्कि उनकी उकसाने वाली कार्रवाइयों को उसी की भाषा में जवाब भी दिया है।
मौजूदा तनातनी का अंत एक नई उम्मीद को जन्म दे रहा है। हम बीजिंग को यह एहसास दिलाने में सफल हुए हैं कि विश्व के आर्थिक विकास में अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटना उचित नहीं। एशिया की शांति भी हमारी दोस्ती पर ही निर्भर है। इसमें हम कितना सफल हो पाते हैं, इसका जवाब तो आने वाले दिनों में मिलेगा, पर विश्व में सकारात्मक योगदान की हमारी उम्मीदें कुछ जरूरी काम करने के बाद पूरी हो सकती हैं।
इसमें सबसे पहला काम तो सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी बढ़ाना है। इसके लिए वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर, यानी बुनियादी ढांचे का निर्माण जरूरी है। आंतरिक ताकतों को मजबूत किए बिना हम बाहरी शक्तियों का मुकाबला नहीं कर सकते। दूसरा, हमें आतंकवाद के खिलाफ तमाम देशों को एक करना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है, ताकि पाकिस्तान जैसे आतंकवाद के मददगार देश किसी अन्य राष्ट्र द्वारा इस्तेमाल न हो सकें। तीसरा काम है, चीन की विस्तारवादी नीतियों का विरोध। बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) में शामिल न होकर भारत ने इसकी शुरुआत पहले ही कर दी है। चौथा, पड़ोसी देशों के साथ चीन के व्यवहार का मूल्यांकन। दरअसल, दक्षिण चीन सागर सहित चीन का कई राष्ट्रों के साथ सीमा विवाद है। हांगकांग का मसला भी काफी गंभीर है। चीन का इन देशों के प्रति बदलता रुख हमें कई संदेश दे सकता है। अगर बदलाव सकारात्मक आते हैं, तो यह माना जा सकता है कि चीन का नेतृत्व नई सोच का हिमायती है। और अगर ऐसा नहीं होता, तो हमें सावधान रहना होगा, क्योंकि गलवान घाटी में पीछे हटना चीन का छलावा भी हो सकता है।
चीन के भीतरी हालात पर भी हमें नजर रखनी होगी। ऐसी चर्चा गरम है कि बीजिंग के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व में मतभेद गहरा रहे हैं। चीन बेशक कम्युनिस्ट समाज है, पर वहां कन्फ्यूशियसवाद हावी है। इस तरह के समाज में अच्छे काम करने वालों की तारीफ होती है, तो विफल होने पर उसकी जमकर लानत-मलामत भी की जाती है। लिहाजा, अपनी छवि चमकाने के लिए सियासी और सैन्य नेतृत्व अलग-अलग राह पकड़ सकते हैं। जरूरी यह भी है कि हम भी अपने आंतरिक मतभेदों से ऊपर उठें। पहले पाकिस्तान जैसे देश हमारे मनमुटावों का फायदा उठाते थे, अब बीजिंग इससे लाभ कमाना चाहता है। उसे यह मौका नहीं मिलना चाहिए।
इसमें आत्मनिर्भरता की नीति हमारे लिए काफी कारगर साबित हो सकती है, मगर इसे लेकर हमें संकीर्ण नजरिया नहीं रखना चाहिए। हमारी आत्मनिर्भरता संरक्षणवाद का पोषक नहीं बननी चाहिए। ऐसी नीति हमारी कई कमजोरियों को बेपरदा कर सकती है। इससे हम पर कई तरह के दबाव बनने लगेंगे, जिनसे हमारे हितों को चोट पहुंच सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)शशांक, पूर्व विदेश सचिव
शौर्यपथ। सेहत । दुनिया में कोरोनावायरस के मामले 60 लाख को पार कर चुके हैं. तमाम बड़े देश परेशान हैं कि किस तरह इस संक्रमण को रोका जाए. इस बीच हार्वर्ड ने एक स्टडी रिपोर्ट जारी की है. इसमें कहा गया है कि सेक्स के दौरान कपल्स को फेस मास्क पहनना चाहिए. स्टडी में कहा गया है कि अगर कोई कपल मास्क पहनकर सेक्स करता है तो इससे कोरोना वायरस एक-दूसरे को ट्रांसमिट करने का खतरा काफी कम हो जाता है. हार्वर्ड की स्टडी ये स्टडी Annals of Internal Medicine जर्नल में छपी है. इसमें सेक्स के दौरान मास्क के अलावा और भी कई तरह की सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है. सेक्स के दौरान सावधानियां स्टडी में कहा गया है कि सेक्स के दौरान फेस मास्क पहनें. सेक्स से पहले और बाद में जरूर नहाएं. इस दौरान जहां भी आप संपर्क में रहे हैं, उन जगहों को साबुन या अल्कोहल वाइप्स से साफ करें. यानी सेनेटाइज जरूर करें.आपको जानकर हैरानी होगी कि स्टडी में कहा गया है कि अगर आप कोरोना से बचना चाहते हैं तो सबसे सुरक्षित ये होगा कि इस समय सेक्स ना करें. मास्टरबेशन को लो-रिस्क बताया गया है.(एजेंसी)
शौर्यपथ । सेहत ।पिछले कुछ सालों में लोग मोबाइल फोन, इंटरनेट के इतना समय बिताने लगे हैं कि उनकी दिनचर्या में भी बदलाव आ गए हैं. जीवनशैली पर तो इनका असर हुआ ही है, अब एक रिसर्च में कहा गया है कि इन चीजों के अत्यधिक प्रयोग का असर सेक्स लाइफ (Sex Life) पर भी दिखने लगा है. रिसर्च में दावा ये रिसर्च किया गया अमेरिका में. इसमें दावा किया गया है कि पुरुषों में सेक्स ड्राइव पहले की अपेक्षा कम हो रही है. इस तरह के व्यवहार का प्रमुख कारण गेमिंग, सोशल मीडिया, मोबाइल, इंटरनेट को बताया गया है. चौंकाने वाले खुलासे रिसर्च में सेक्स और सेक्स की इच्छा को लेकर कई तरह के सवाल लोगों से किए गए. रिपोर्ट में पता चला कि साल 2000 के बाद से अमेरिकी युवाओं में सेक्स को लेकर दिलचस्पी काफी कम हुई है. रिसर्च को जामा नेटवर्क ओपन जर्नल में प्रकाशित किया गया है. यौन निष्क्रियता बढ़ी रिसर्च में 25-34 साल के पुरुषों और महिलाओं के बीच यौन निष्क्रियता भी बढ़ रही है. कई लोगों ने कहा कि पिछले एक साल से उन्होंने किसी से शारीरिक संबंध स्थापित नहीं किए हैं. सोशल मीडिया है वजह विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अब लोगों के पास रात में करने को कई और काम हैं. वे सेक्स को छोड़कर सोशल मीडिया, इंटरनेट पर अधिक समय बिताते हैं. गेमिंग का क्रेज भी इसकी एक प्रमुख वजह है. रिसर्च में इस बात का भी अंदेशा जताया गया है कि कोरोनावायरस जैसी महामारी के कारण लोगों में सेक्स को लेकर अनिच्छा और ज्यादा बढ़ सकती है.(एजेंसी )
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / ऐसे कई फूड है जिन्हें एक पूरी रात भिगोकर रखने के बाद, अगले दिन खाना अपेक्षाकृत अधिक फायदेमंद होता है। क्योंकि अंकुरित होने के बाद उनकी नुट्रिशन वैल्यू बढ़ जाती है, साथ ही ये आसानी से पच जाते है जो सेहत के लिए अच्छा है। हम आपको बता रहे हैं ऐसी ही 8 चीजों के बारे में जिन्हें रातभर भिगोकर खाना आपकी इम्यूनिटी को मजबूत करने में सहायक होगा -
1 मेथीदाना -
इनमें फाइबर्स भरपूर मात्रा में होते हैं जो कब्ज को दूर कर आंतों को साफ रखने में मदद करते हैं। डायबिटीज के रोगियों के लिए भी मेथीदाने फायदेमंद हैं। साथ ही इनका सेवन महिलाओं में पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द को भी कम करता हैं।
2 खसखस -
ये फोलेट, थियामिन और पैंटोथेनिक एसिड का अच्छा सोर्स होता हैं। इसमें मौजूद विटामिन बी मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है जिससे वजन को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
3 अलसी -
अलसी या फ्लैक्स सीड्स ओमेगा-3 फैटी एसिड का एकमात्र शाकाहारी सोर्स माना जाता हैं। अलसी का सेवन बैड कोलेस्ट्रॉल को घटाकर हमारे दिल को भी हेल्दी रखता हैं।
4 मुनक्का -
इसमें मैग्नीशियम, पोटेशियम और आयरन काफी मात्रा में होते हैं। मुनक्के का नियमित सेवन कैंसर कोशिकाओं में बढ़ोतरी को रोकता है। इससे हमारी स्किन भी हेल्दी और चमकदार रहती है। एनीमिया और किडनी स्टोन के मरीजों के लिए भी मुनक्का फायदेमंद है।
5 खड़े मूंग -
इनमें प्रोटीन, फाइबर और विटामिन बी भरपूर मात्रा में होता है। इनका नियमित सेवन कब्ज दूर करने में बहुत फायदेमंद होता है। इसमें पोटेशियम और मैग्नेशियम भी भरपूर मात्रा में होने की वजह से डॉक्टरस हाई बीपी के मरीजों को इसे रेगुलर खाने की सलाह देते है।
6 काले चने -
इनमें फाइबर्स और प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा होती हैं जो कब्ज दूर करने में सहायक होते है।
7 बादाम -
इसमें मैग्नीशियम होता है जो हाई बीपी के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि नियमित रूप से भीगी हुई बादाम खाने से खराब कोलेस्ट्रॉल का लेवल कम हो जाता है।
8 किशमिश -
किशमिश में आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में होते हैं। भीगी हुई किशमिश को नियमित रूप से खाने से स्किन हेल्दी और चमकदार बनती है। साथ ही शरीर में आयरन की कमी भी दूर होती है।
सेहत / शौर्यपथ / खाना खाने के फायदे तो आपको पता होंगे, लेकिन खाना चबाने के यह फायदे आप नहीं जानते होंगे। लेकिन ठीक तरीके से खाना चबाने के यह फायदे, आपको जरूर पता होने चाहिए...
1 खाना खाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसे ठीक तरीके से चबाना। अच्छी तरह चबा-चबाकर खाने से आप कम खाते हैं और आपका पेट भी जल्दी भर जाता है।
2 जब आप चबा-चबाकर खाते हैं तो आपका पाचन तंत्र, पाचन के लिए खुद को तैयार करता है। इस तरह से आप जितना चबा-चबाकर खाते हैं, उतना ही बेहतर आपका पाचनतंत्र काम करता है।
3 ठीक तरीके से चबाते हुए भोजन करने से, भोजन कई टुकड़ों में बंटकर सलाईवा के साथ मिलकर, बेहतर पाचन के लिए तैयार हो जाता है। वहीं अच्छी तरह से न चबाने पर ठीक से पाचन नहीं होता।
4 अच्छी तरह चबाकर खाने का एक फायदा यह भी है, कि आप भोजन का ठीक तरह से स्वाद ले पाते हैं और देर तक उसका आनंद भी उठा सकते हैं।
5 धीरे-धरे चबाकर खाने पर आपके शरीर को जरूरी हार्मोन स्त्रवण के लिए काफी समय मिल जाता है, जैसे लेप्टिन, ग्रेलिन आदि। इनका पाचन क्रिया में अहम योगदान है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
