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May 31, 2026
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खाना खजाना / शौर्यपथ / मूंग की दाल की कचौड़ी तो आपने खाई ही होगी। आज हम आपको मूंग चीज कचौड़ी बनाना बता रहे हैं। ये खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होती है। इसे आप आसानी से घर में बना सकते हैं।

सामग्री :

गेहूं का आटा- 1/2 कप

मैदा- 1/2 कप

ओट्स- 1/4 कप

तेल- 2 चम्मच

नमक- स्वादानुसार

मसाले के लिए

अंकुरित मूंग उबली हुई- 1 कप

उबली हुई शकरकंदी- 1/2 कप

मोजरेला चीज- 1/4 कप

नमक- स्वादानुसार

चिली फ्लेक्स-1 छोटा चम्मच

मिक्स्ड हब्र्स- 1 छोटा चम्मच

तेल- तलने के लिए


विधि :
मूंग चीज कचौड़ी बनाने के लिए सबसे पहले कचौड़ी के आटे की सभी चीज गेहूं का आटा, मैदा, ओट्स, नमक और तेल मिलाकर गूंद लीजिए। अंकुरित मूंग, शकरकंदी, चिली फ्लेक्स, मिक्स हब्र्स और नमक डालकर मिक्स करें और बॉल्स बनाए। बॉल्स के बीच में थोड़ा-सा मोजरेला चीज भी डालें। आटे से मीडियम आकार की पूरी बेल लें। बीच में स्र्टंफग बॉल्स रखकर चारों कोनों को सील कर कचौड़ी का आकार दें। कड़ाही में तेल गर्म करें और कचौड़ी को सुनहरा होने तक दोनों ओर से तल लें। धनिया-पुदीना की चटनी के साथ पेश करें।

मेरी कहानी / शौर्यपथ / उस पढ़ाई को छूट जाना था, जिसमें कामयाबी दूर-दूर तक नहीं दिख रही थी। मैट्रिक में दो बार फेल होकर समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे पास हुआ जाए? मन पढ़ाई में कैसे रमाया जाए? मन इतना चंचल था कि जिधर आवाज होती, उधर भाग लेता और एक बार भाग जाता, तो उसे लौटाने में बहुत जोर आता। अपनी पढ़ाई बोझिल और दुनिया के अन्य तमाम विषय दिलचस्प लगते थे। ले-देकर गणित की किताबों में मन ठहरता था, क्योंकि वहां डोर सुलझी हुई थी। एक बार तरीका पता चल गया, तो प्रश्न हल करते बढ़ते चलो, पर बाकी विषय पहाड़ थे। काश! एक ही विषय की परीक्षा होती, तो सफलता कदम चूमती, लेकिन यहां अनेक विषय मिलकर गणित की कमाई पर पानी फेर देते थे। छवि बन गई थी कि इस लड़के का मन पढ़ाई में नहीं लगता, गांव से शहर गया, लेकिन वहां भी फेल!
ऊपर से भाग्य ने भी पीठ दिखा दी, असमय ही पिता का साया उठ गया। गांव लौटना पड़ा। उम्र में 18वां साल लग चुका था और दिखने लगा था कि अब आगे की पढ़ाई पर पूर्ण विराम लग जाएगा। शहर में रहने, आने-जाने और परीक्षा फीस इत्यादि का बोझ भारी था। ये ऐसे बड़े खर्चे थे, जिनके सामने घुटने टेक देना तय लग रहा था। पर एक दिन मां अपना पूरा उत्साह समेटे सामने आ खड़ी हुई, ‘चल, बांध अपना सामान। परीक्षा के दिन आ रहे हैं, इस बार तुझे सफल होना ही है’।
बेटा स्तब्ध था। मां ने आंचल से रुपये निकाले और बेटे की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘ले तेरी यात्रा का खर्च और परीक्षा की फीस’।
सवाल वाजिब था, ‘अम्मा, कहां से आए पैसे?’
मां ने अपने को समेटते हुए नजरें झुकाए कहा, ‘मैंने अपने बचे हुए गहने बेच दिए, तेरी पढ़ाई सबसे जरूरी है’।
पिता के गुजर जाने के बाद टूटी हुई मां की सूनी आंखों में झांकते हुए बेटा भाव में बह चला। उसके दो बार फेल होने के बावजूद मां का विश्वास कायम है। वह अपनी सबसे गाढ़ी पूंजी बेटे की पढ़ाई पर लगा रही है। मां का यह रूप देख बेटा मानो हठात् नींद से जाग गया। वह ऐसी प्यारी मां की उम्मीद को दो बार से तोड़ रहा है और अब भी उलझनें इतनी हैं कि तीसरी बार भी तोड़ने की तैयारी लगती है। मां अपने जेवर बेचकर खड़ी है कि बेटा पास कर जाए, आगे पढ़ाई करके कुछ बन जाए और बेटा है कि अपने मन को काबू में नहीं रख सकता। जहां पूरी जिंदगी दांव पर लगी हो, वहां एक परीक्षा परेशान कर रही है? बेटे का मन धिक्कार उठा। कुछ पल की भाव-प्रबल खामोशी के बाद मन ने ठान लिया और बोल पड़ा, ‘अम्मा, मुझे नाम कमाना होगा, तभी मेरा जीवन सार्थक होगा।’
बेटे की अच्छी पढ़ाई के लिए मां का समर्पण नया नहीं था। अब बेटे की समझ में आ रहा था कि कैसे वह घर से भाग रहा था। पांच साल पहले, दूर काशी पहुंचकर केले बेच पैसे कमाने की योजना थी। स्कूल से लौटने में देरी हुई, तो मां खोज में दौड़ पड़ी थी और भागते बेटे को पकड़ लाई थी और समझाया था कि गरीबी से मत घबरा, सिर्फ पढ़ाई से मन लगा। तब बात बेटे की समझ में नहीं आई थी, पर जब मां ने अपने गहने बेच दिए, तब बेटे का हौसला इतना फौलादी हो गया कि जिंदगी में कभी फेल होने या कभी हारने की गुंजाइश ही नहीं बची। कामयाबी का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मैट्रिक और उसके बाद मेडिकल कॉलेज, लेकिन दुर्भाग्य ने भी पीछा नहीं छोड़ा। उष्णकटिबंधीय स्पू्र नामक छोटी आंत में होने वाली बीमारी की वजह से पहले बडे़ भाई और फिर छोटे भाई की जान गई। दृढ़ता और बढ़ी कि मेडिकल की पढ़ाई और शोध के जरिए इस बीमारी का इलाज खोजना है। भारत में रिसर्च की सुविधा नहीं थी। विदेश जाना मजबूरी थी। 1923 में मां के लाल येल्लाप्रगडा सुब्बाराव निकल चले कुछ कर गुजरने।
अमेरिका में जहां एक ओर संघर्ष का कारवां था, वहीं दूसरी ओर था, उपलब्धियों का चमकदार सिलसिला। पहले फोलिक एसिड, एंटी-फोलिक एसिड, एटीपी-एनर्जी फॉर लाइफ, फोसफॉस मैथड, फिलारियासिस, विटामिन बी12 इत्यादि अनेक आधारभूत उपलब्धियों को सुब्बाराव (1895-1948) ने अंजाम दिया। प्रचार से हमेशा दूर रहने वाले संकोची सुब्बाराव 25 वर्ष लगातार अमेरिका में विज्ञान की सेवा करते रहे। भाइयों को जो रोग दुनिया से ले गया था, उसके इलाज की खोज के साथ ही कैंसर के इलाज- कीमोथेरेपी की भी बुनियाद सुब्बाराव के खाते में दर्ज है। वह भारत लौटने का सपना संजोए महज 53 की उम्र में दुनिया से चले गए। उनके निधन के बाद एक अखबार ने लिखा, ‘वह सदी के सबसे प्रख्यात चिकित्सा दिमागों में से एक थे’, तो किसी ने भारत मां के उस लाल को सम्मान से नवाजते हुए दर्ज किया, ‘बौनों के बीच कद्दावर’।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याययेल्लाप्रगडा सुब्बाराव, प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक

 

जीना इसी का नाम है /शौर्यपथ/ मैंने अपनी पूरी जिंदगी अफसरों के दरवाजे खोले। मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चों के लिए भी कोई दरवाजे खोले। वे भी इस मुकाम तक पहुंचें। वे भी अफसर बनें।- ये अल्फाज उस पिता के थे, जिनके पास अपने बच्चों की फीस भरने तक के पूरे पैसे न थे, मगर लायक बेटी ने इस अल्फाज के हर हर्फ पर अपना ईमान रख दिया। और आज वह पाकिस्तानी ईसाई समुदाय की पहली सीएसएस हैं। यानी देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा की अफसर- राबेल केनेडी!
सियालकोट के जॉन केनेडी का यह ख्वाब कितना दुस्साहसिक था, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता था। अव्वल तो वह मसीह बिरादरी, यानी अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं और फिर उनकी नौकरी भी ऐसी थी कि उससे घर के ही सारे खर्च पूरे न हों। मगर सपने ऊंचे न देखे जाएं, तो नजीर कैसे कायम होगी? जॉन फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू, यानी एफबीआर में ड्राइवर हैं। साल 1985 में उन्हें इस महकमे में नौकरी मिली और तब से लाहौर, गुजरांवाला और सियालकोट में वह अलग-अलग अफसरों की खिदमत करते रहे हैं।
कहते हैं, सोहबत का असर आपकी सीरत में जरूर दिखता है। जॉन के भीतर भी वह हसरत इसी सोहबत की वजह से उठी थी। जिस किसी अफसर के साथ उनकी ड्यूटी पड़ती, वह उसकी शख्सियत के खूबसूरत पहलुओं को अपने बच्चों के लिए समेट लाते। राबेल कहती हैं, ‘मेरे वालिद जब भी किसी सीएसएस अफसर के साथ टूर पर जाते, तो वहां से लौटकर हमें उनकी तमाम खूबियों, उनके इल्म के बारे में काफी कुछ बताते। उनकी बातों से हम भाई-बहन काफी मुतासिर होते थे।’
सीएसएस का ख्वाब आहिस्ता-आहिस्ता पिता की आंखों से उतर राबेल के मन में जा बसा था। मगर इसके लिए अच्छी तालीम बहुत जरूरी थी। जॉन और उनकी बीवी सबीहा ने अपनी सारी ख्वाहिशें बच्चों पर कुर्बान कर दीं। करीब दो साल तक उन दोनों ने अपने लिए कुछ भी नहीं खरीदा, बस बच्चों की जरूरतों को वे जीते रहे। इस कोशिश में सियालकोट के जीसस ऐंड मैरी कॉन्वेंट का बड़ा साथ मिला। स्कूल ने राबेल और बाकी के चार भाई-बहनों की फीस आधी माफ कर दी थी।
पढ़ाई में राबेल का प्रदर्शन शानदार रहा। वह लगातार ऊंचे नंबरों के साथ पोजिशन लेती रहीं। बेटी की प्रतिभा देख पिता की उम्मीदें भी मजबूत होती गईं। वह हर कदम पर राबेल का हौसला बढ़ाते रहे। जीसस ऐंड मैरी कॉन्वेंट से मैट्रिक करने के बाद वह सियालकोट के ही स्टैंडर्ड कॉलेज पहुंचीं, जहां से उन्होंने जूलॉजी में मास्टर्स की डिग्री ली। पर राबेल को अब तक बखूबी इल्म हो चुका था कि उन्हें सामाजिक-आर्थिक मोर्चे के साथ-साथ ‘क्लास’ और अल्पसंख्यक होने के दबाव से भी लड़ना है।
मास्टर्स करने के साथ-साथ राबेल कुछ ऐसा करना चाहती थीं, जिससे पिता का आर्थिक बोझ कुछ कम हो सके और छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई में भी मदद हो पाए। सिविल सर्विसेज की किताबें और अन्य सामग्रियों के लिए भी पैसे चाहिए थे। राबेल अपने उसी स्कूल में दरख्वास्त लिए पहुंचीं, जहां से उन्होंने मैट्रिक्युलेशन किया था। स्कूल उनकी प्रतिभा से अच्छी तरह वाकिफ था। बहैसियत शिक्षक उनका नया सफर शुरू हो गया। शुरू में 12 हजार रुपये तनख्वाह थी, जो बढ़ते-बढ़ते 24 हजार हो गई।
मगर राबेल की असली मंजिल तो कुछ और थी। इरादा भी बुलंद था, हालांकि उलझनें भी कम न थीं। सबसे बड़ी परेशानी तो यही थी कि सीएसएस इम्तिहान के लिए कौन-कौन से विषय चुने जाएं? यह उनका पहला प्रयास था। इससे उबरने में पिता के साहबों ने उनकी काफी मदद की। उन्होंने राबेल को न सिर्फ विषयों के चयन, बल्कि किस तरह से तैयारी करनी चाहिए, इसके बारे में गहराई से बताया। तजुर्बेकार लोगों की सलाहों ने इस इम्तिहान से जुड़ी तमाम गांठों को खोल दिया। उन्हें बस अब जुट जाना था।
आखिरकार, फरवरी 2019 में सीएसएस इम्तिहान की तारीख भी आ गई। तैयारी मुकम्मल थी, खुद पर भरोसा भी पूरा था, पूरे आत्मविश्वास के साथ इंटरव्यू भी दिया था, मगर नतीजा तो किसी और को तय करना था, सो एक बेकली भी बनी रही। बीते 17 जून को भाई से सूचना मिली कि सीएसएस का रिजल्ट आ गया है। रिजल्ट देखने के लिए जब बहन-भाई ने वेबसाइट को खोला, तो वह ओवरलोडेड थी। सबकी धड़कनें बढ़ने लगी थीं, तभी तैयारी में रहनुमाई करने वाले एक सज्जन ने फोन करके मुबारकबाद दी। तब से बधाइयों का सिलसिला जारी है। राबेल पाकिस्तान विदेश सेवा के लिए चुनी गई हैं। उनके दो और भाई-बहन इस वर्ष की परीक्षा में बैठे हैं। यकीनन, राबेल की कामयाबी ने उनका हौसला बढ़ाया होगा।
मुल्क के विदेश मंत्री ने जब जॉन केनेडी को फोन करके कहा कि आपकी परवरिश पर पूरे मुल्क को नाज है, तो पिता की आंखों के कोर भीग गए। तालीम और किताबों से अपनी जिंदगी में वंचित रह गए जॉन को लायक बेटी ने पूरे पाकिस्तान में मशहूर कर दिया है।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंहराबेल केनेडी, पाकिस्तानी ईसाई सीएसएस

 

नजरिया / शौर्यपथ /अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फिर से चुने जाने की संभावना हाल के दिनों में धूमिल हुई है। उन्होंने खुद इस बात को स्वीकार किया, जब फॉक्स न्यूज के एंकर सीन हैनिटी के साथ इंटरव्यू के दौरान वह भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि जो बिडेन ‘आपके राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं, क्योंकि कुछ लोग मुझे प्यार नहीं करते’। रियलक्लियर पॉलिटिक्स के सर्वे के मुताबिक, ट्रंप 9.3 अंकों से बिडेन से पीछे चल रहे हैं, जबकि फाइवथर्टीएट के सर्वे के मुताबिक, वह 9.6 अंकों से पीछे हैं। वह विस्कॉन्सिन, मिशिगन, पेंसिल्वेनिया और फ्लोरिडा जैसे राज्यों में भी पीछे हैं, जिनकी गिनती स्विंग स्टेट्स (अस्पष्ट चुनावी रुझान वाले राज्यों) में होती है और जहां 2016 में उन्होंने जीत हासिल की थी। जॉर्जिया और एरिजोना में वह दौड़ में हैं, जहां हरेक राष्ट्रपति चुनाव में कमोबेश रिपब्लिकन को ही वोट मिलता रहा है। टेक्सास की भी तस्वीर यही है, जहां के मतदाता मुख्य रूप से रिपब्लिकन पार्टी को ही चुनते रहे हैं।
जब से ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं, तब से गॉलअप पोल की अनुमोदन रेटिंग में उन्हें कभी भी 49 फीसदी के ऊपर जाते नहीं देखा गया। पर अभी उनकी छवि को बट्टा इसलिए लगा है, क्योंकि अपने कार्यकाल की दो सबसे बड़ी मुश्किलों से ठीक से निपटने में वह सफल नहीं माने गए हैं। इसमें से पहला संकट कोविड-19 महामारी है, जिससे अब तक 1,28,000 से अधिक अमेरिकियों की जान जा चुकी है और करीब 28 लाख लोग संक्रमित हैं। दूसरी मुश्किल जाहिर तौर पर नस्लवाद-विरोधी आंदोलन है, जो देश में गहराई तक फैल गया है।
कोरोना वायरस को ट्रंप ने अनाधिकार प्रवेश करने वाला खतरा माना, जो उनके कार्यकाल की सबसे बेशकीमती उपलब्धि और दूसरे कार्यकाल का टिकट चुरा बैठा है। उनकी वह कीमती उपलब्धि थी, मुल्क की बढ़ती अर्थव्यवस्था। और फिर, देश में अधिक ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने विरोध-प्रदर्शनों का इस्तेमाल किया, ताकि नवंबर के चुनाव में वह अपने समर्थकों को एकजुट कर सकें । मगर अभी समय है। लुढ़कने से पहले अपने कदम वापस खींचने के लिए ट्रंप खूब जाने जाते हैं। अक्तूबर, 2016 के ‘एक्सेस हॉलीवुड टेप’ को याद कीजिए, जिसमें ट्रंप किस तरह महिलाओं के खिलाफ अशालीन टिप्पणी करते हुए डींगें मार रहे थे। तब उनके चुनाव अभियान में जुटे कई लोगों ने हार मान ली थी। लेकिन वह 2016 का ‘अक्तूबर सरप्राइज’ था, यानी ऐसा अप्रत्याशित घटनाक्रम, जो चुनावी गुणा-गणित को पलटने में सक्षम हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिस प्रत्याशी पर आरोप लगते हैं, उसे इससे उबरने या इसका तोड़ निकालने के लिए पूरा समय नहीं मिल पाता। यह शब्द अमेरिकी चुनाव में बतौर मुहावरा खूब इस्तेमाल होता है। पर हम सभी जानते हैं कि ट्रंप इससे बखूबी बच निकले।
भारत में भी इसके अगले महीने कुछ इसी तरह का घटनाक्रम रहा। उसका कोई नाम तो नहीं है, लेकिन इसे ‘इंडियाज नवंबर सरप्राइज’ कहा जा सकता है। यह 9 नवंबर को ट्रंप के अप्रत्याशित चयन से सामने आया, क्योंकि हिलेरी क्लिंटन की जीत को लेकर भारत आश्वस्त था। इसी खुमारी में भारतीय राजनयिक परेशान थे कि किसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बधाई फोन ट्रंप तक पहुंचे। हालांकि जल्द ही वे यह बताने में सफल रहे कि मोदी उन वैश्विक नेताओं में एक थे, जिन्होंने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को पहले फोन किया था। यहां महत्वपूर्ण बात बधाई फोन कॉल नहीं, क्योंकि वह 10 नवंबर की सुबह भी लग सकती थी, खास बात यह है कि नई दिल्ली को जो बिडेन के साथ भी अपने संपर्क के रास्ते खुले रखने चाहिए। यदि अब तक ऐसा नहीं किया गया है, तो इसकी जरूरत पड़ सकती है।
बिडेन भारत के लिए अजनबी भी नहीं हैं। भारत को समर्थन देने का उनका लंबा रिकॉर्ड है। इसमें बतौर सीनेटर असैन्य परमाणु समझौता का समर्थन शामिल है। वह 2013 में उप-राष्ट्रपति के रूप में भारत आ चुके हैं और तब उन्होंने भारत में अपने रिश्तेदार के होने की बात कही थी, जिनसे वह अपना उपनाम साझा करते हैं। इससे भी अच्छी बात यह है कि इस हफ्ते की शुरुआत में उन्होंने कहा है कि यदि वह राष्ट्रपति बनते हैं, तो भारत के साथ अपने संबंध को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे और एच-1बी वीजा निलंबन को रद्द कर दिया जाएगा। बिडेन कदम बढ़ा चुके हैं। ऐसे में, अब भारत क्या करेगा?

 

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / नस्लभेद एक ऐसी खामी है, जो इंसानी समाज का पीछा नहीं छोड़ रही है। दुनिया में एक समय रंग के आधार पर इंसानों की खरीद-फरोख्त से लेकर आज अमेरिका में उठते नस्लवादी जुमलों तक अनेक ऐसे स्याह पहलू हैं, जो न केवल दुखद, बल्कि शमर्नाक हैं। भले ही 17वीं सदी से एक नस्लीय विज्ञान खड़ा करने की कोशिश हुई है, जिसके तहत किसी नस्ल को रंग के आधार पर श्रेष्ठ, तो किसी को कमतर बताने का उपक्रम रहा है। लेकिन धीरे-धीरे यह सिद्ध होता गया है कि इंसानों के बीच कोई खास फर्क नहीं है। रंग के आधार पर किसी नस्ल को कमतर या श्रेष्ठ नहीं बताया जा सकता। त्वचा का बदलता रंग एक विकासवादी प्रक्रिया का हिस्सा है।
त्वचा के रंग की विविधता पर हाल ही में एक ऐतिहासिक अध्ययन सामने आया है। जीन के विकास का पता लगाने में जुटी टीम ने यह जांचा कि जीन दुनिया भर में कैसे यात्रा करते हैं। टीम इस नतीजे पर पहुंची है कि अफ्रीकी मूल के लोगों के एक बडे़ हिस्से में जीन में ऐसे बदलाव हुए, जो उनकी त्वचा के रंग के लिए जिम्मेदार हैं। साइंस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि दो जीन, एचईआरसी 2 और ओसीए 2, यूरोपीयों की हल्की त्वचा, आंखों और बालों से जुड़े हैं। वास्तव में, अफ्रीका एक ऐसा महादेश है, जहां हर रंग के लोग पाए जाते हैं। अत: यह नहीं कहा जा सकता कि रंग के आधार पर उनमें कोई किसी से श्रेष्ठ या कमतर है। त्वचा का रंग एक जैविक प्रक्रिया मात्र है। कोई तुक नहीं कि नस्लवाद जारी रखा जाए।
18वीं शताब्दी में स्वीडिश प्रकृतिवादी कोरोलस लिनिअस ने इंसानों को चार समूहों में बांटा था, यूरोपीय, अमेरिकी, एशियाई और अफ्रीकी। 19वीं सदी के पहले दशक में अमेरिका में एक मानव विज्ञानी सैमुअल जॉर्ज मॉर्टन हुए, जो दुनिया भर से मिली खोपड़ियों को मापते रहे और यह बताया कि रंग व श्रेष्ठता का रिश्ता मस्तिष्क के आकार से जुड़ा है। वह बताना चाहते थे कि श्वेत लोगों की खोपड़ी बड़ी होती है और इसीलिए वे श्रेष्ठ होते हैं, जबकि सच यह कि खोपड़ी के आकार से श्रेष्ठता का कोई लेना-देना नहीं है। अश्वेतों की भी खोपड़ी बड़ी होती है और श्वेतों में भी छोटी खोपड़ी पाई जाती है। पहले भी ऐसे वैज्ञानिक थे, जो बड़ी खोपड़ी और श्रेष्ठता के बीच किसी रिश्ते को खारिज करते थे, पर ऐसे वैज्ञानिकों को नजरंदाज कर दिया जाता था। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि श्वेत श्रेष्ठ हैं, इसलिए वे अश्वेतों पर राज करने के अधिकारी हैं और इसी गलत विचार का परिणाम है कि आज भी श्वेत पुलिस वाले निर्दोष अश्वेत के गले पर सवार हो उसके प्राण ले लेते हैं। अनेक वैज्ञानिक यह मानते रहे हैं कि दुनिया में करीब 63 नस्ल के इंसान रहते हैं, लेकिन श्रेष्ठता नस्ल से तय नहीं होती। 1990 से 2003 के बीच हुए डीएनए अनुसंधान के तहत आनुवंशिकी के साथ मानव वंश को डिकोड करने के बाद पाया गया कि सभी मानव समान हैं, उनमें असाधारण रूप से 99.9 प्रतिशत साम्यता है। जो 0.1 प्रतिशत अंतर है, वह सिर्फ हमारे वातावरण और कुछ अन्य बाहरी कारकों से तय होता है। वैज्ञानिक आईक्यू या बौद्धिक स्तर के आधार पर भी नस्लभेद को खारिज कर चुके हैं। संदेश स्पष्ट है, यदि हर इंसान को एक तरह का पालन-पोषण, शिक्षा और परिवेश मिले, तो इंसानों के बीच कोई असमानता नहीं रह जाएगी।

 

मेलबॉक्स / शौर्यपथ / लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूर घर वापस आ गए थे, लेकिन अब राजनीतिक हथियार की तरह उपयोग होने के बाद धीरे-धीरे उन्हीं शहरों में लौटने लगे हैं, जहां से उन्होंने वापसी की थी। मजदूरों की वापसी की मजबूरी समझी जा सकती है, क्योंकि जिस वक्त वे अपने घर लौटे थे, तब सरकार सहित तमाम संस्थानों ने उनको अपने ही राज्य में कुशलता के आधार पर रोजगार देने की बात कही थी, लेकिन मजदूरों के हाथ खाली ही रहे। अब जब सब कुछ धीरे-धीरे खुल रहा है, तो इन मजदूरों के लिए दो वक्त की रोटी जुटा पाना भी मुश्किल हो रहा है। परिवार के भरण-पोषण के लिए वे फिर परदेश का रुख करने लगे हैं, जबकि वहां इस बात की गारंटी कोई लेने को तैयार नहीं है कि यदि इस प्रकार की विपदा फिर आती है, तो क्या उन्हें सरकार पर भरोसा करना चाहिए? ऐसे में, क्या यह अच्छा नहीं होगा कि हुनर के हिसाब से उनको अपने राज्यों में ही काम मिले, ताकि उन्हें फिर से प्रवासी बनने की पीड़ा न भुगतनी पड़े?
अभिनव त्रिपाठी
बेल्थरा रोड, बलिया

उकसावे में नेपाल
आजकल भारत और नेपाल के बीच तनाव चल रहा है। बिगड़ते आपसी रिश्ते की वजह नेपाल में बढ़ता राष्ट्रवाद है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तमाम घरेलू मुद्दों पर असफल हो चुके हैं। अपनी सरकार बचाने के लिए वे लोगों में राष्ट्रवादी सोच भरना चाहते हैं। राष्ट्रवाद का होना अच्छी बात है, लेकिन जब यह साम्राज्यवाद के साथ मिल जाता है, तब बहुत खतरनाक हो जाता है। ऐसा हमें यूरोप में देखने को मिला था, जब साम्राज्यवाद से जुड़कर राष्ट्रवाद 1914 में यूरोप को महाविपदा की ओर ले गया। नेपाल का राष्ट्रवाद भी इसी कदम पर बढ़ता दिख रहा है, जो उसे महाविपदा की ओर ले जाएगा।
चेतन कुमार कर्ण

साथ दे विपक्ष
लोकतंत्र में विपक्ष की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उसका काम सरकार को सलाह देना, गलत निर्णय का विरोध करना और सही फैसले का स्वागत करना है। विपक्ष का काम यह नहीं है कि वह सरकार के अच्छे कामों का भी विरोध करे। वर्तमान परिस्थिति में विपक्ष सरकार को सुझाव दे, न कि विकास के कामों को रोकने का प्रयास करे। जैसे, चीन के मुद्दे पर विपक्ष को सरकार और सेना के साथ चलना चाहिए। साथ ही सेना की कार्यशैली पर उसे सवाल नहीं उठाना चाहिए। मगर विपक्ष के ऐसा न करने से जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है। सत्ता पाने के लिए हर हद तक उतर जाना राजनीतिक दलों को शोभा नहीं देता।
रितेश आनंद, गोड्डा, झारखंड

सावधानी जरूरी
विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख के अनुसार, कोरोना महामारी का अभी सबसे बुरा समय आना बाकी है। यहां उल्लेखनीय है कि चीन में लगभग छह महीने पहले कोविड-19 का पहला मामला सामने आया था। तब अनुमान लगाया गया था कि इससे अधिकतम आठ सौ लोग मारे जाएंगे, लेकिन आज कोरोना से एक करोड़ से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और पांच लाख से ज्यादा लोगों की जान यह वायरस ले चुका है। एक कहावत है कि अगर आप गीदड़ का शिकार करने जा रहे हैं, तो तैयारी शेर के शिकार की होनी चाहिए। लेकिन अपने यहां जन-सामान्य में कोविड-19 को लेकर उल्टा ही ट्रेंड दिख रहा है। बिना मास्क के घूमना, दो गज की दूरी का पालन न करना और इस बीमारी को हल्के में लेना इसके संक्रमण के ग्राफ को प्रतिदिन नई ऊंचाइयां दे रहा है। सरकार ने विगत तीन महीने में जागरूकता पैदा कर दी है, लेकिन कुछ लोग अपनी ही धुन में हैं। वे अपनी और अपने परिवार के लोगों के लिए तो संकट बुला ही रहे हैं, समाज और देश का भी अहित कर रहे हैं।
मनोज कुमार शर्मा, स्याना

 

 

ओपिनियन /शौर्यपथ / बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ, जब अमेरिका ने चीन की संचार कंपनी हुआवेई पर पाबंदी लगा दी थी। यहां तक कि अमेरिकी कंपनियों को भी उससे कोई संबंध रखने से रोक दिया गया। हुआवेई के स्मार्टफोन जो दुनिया भर में खासे लोकप्रिय हो रहे थे, उन पर अब गूगल प्ले स्टोर की सुविधा खत्म कर हो गई है। हुआवेई को सबसे ज्यादा झटका 5जी सेवा के मामले में लगा है। इसकी तकनीक विकसित करने के मामले में वह सबसे आगे है और अमेरिका को छोड़कर अभी तक जहां-जहां भी 5जी सेवा शुरू हुई है, ज्यादातर जगह हुआवेई की तकनीक ही इस्तेमाल हो रही है। अमेरिका का तर्क है कि हुआवेई चीन सरकार से नजदीकी रिश्ते रखने वाली कंपनी है, और वह चीन के लिए जासूसी का काम भी करती है। अमेरिका ने यही आरोप एक और चीनी कंपनी जेडटीई पर भी लगाए हैं और उस पर भी पाबंदी लग चुकी है। यह भी माना जाता है कि अमेरिका ने जो आरोप लगाए हैं, उसके पुख्ता सुबूत न होने के बावजूद इतने कड़े कदम उठाए गए हैं। ये कदम भी तब उठाए गए हैं, जब चीन और अमेरिका के बीच या तो व्यापारिक तनाव हैं या राजनयिक।
इसके मुकाबले अगर हम भारत द्वारा 59 चीनी मोबाइल एप पर पाबंदी को देखें, तो यह न तो उतना बड़ा कदम ही दिखता है और न ही उतना कड़ा। वह भी तब, जब चीन भारत से एक बहुत बड़े सामरिक तनाव में उलझा हुआ है। ऐसे मौकों पर इस तरह की पाबंदियां कोई नई बात नहीं हैं, इसलिए पूरी दुनिया ने भी इसे सहजता से ही लिया है। यूं भी इन दिनों अक्सर कहा जाता है कि पूरी दुनिया में युद्ध का सबसे बड़ा हथियार डाटा ही है, इसलिए भी ऐसे मौकों पर उन रास्तों को बंद करना जरूरी हो जाता है, जिनसे एक देश का डाटा दूसरे देश में पहुंच सकता है। फिर यह कदम भी उस चीन के खिलाफ उठाया गया है, जो इस तरह की पाबंदियों के मामले में सबसे आगे रहा है। वाट्सएप जैसे तमाम एप पर वहां पहले से ही पाबंदी है।
कई तरह से भारत का डाटा चीन के सर्वरों में पहुंच रहा है, यह कोई ऐसी जानकारी नहीं है, जिसकी भनक हाल-फिलहाल में ही लगी हो। इन्हीं 59 में से एक एप यूसी ब्राउजर पर तो कुछ समय पहले भी भारत में पाबंदी लगाई गई थी, लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया। तर्क तब भी डाटा का ही था। इसलिए डाटा के मामले में अभी जो चीन पर सर्जिकल स्ट्राइक की बात हो रही है, वह राजनयिक और कई भावनात्मक कारणों से जरूर महत्वपूर्ण हो सकती है, पर इससे आगे जाकर उससे कोई बड़ी उम्मीद फिलहाल नहीं बांधी जा सकती।
दुनिया के कारोबार में डाटा बड़ी टेढ़ी चीज है। किन्हीं एक-दो देशों के एप या सर्वरों पर पाबंदी लगाकर भी आप यह नहीं सोच सकते कि इससे डाटा का प्रवाह रुक जाएगा। डाटा का बाजार इस समय शायद दुनिया का सबसे जटिल बाजार है, जिसमें कौन-सा कहां पैदा हो रहा है, कहां जा रहा है, कहां जमा हो रहा है, कहां बिक रहा है और कहां उसका इस्तेमाल हो रहा है, उसके बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। मोबाइल एप, ईमेल सर्वर और वेबसाइट आपको जो मुफ्त सेवा देते हैं, उसके बदले वे आपकी जरूरत, पसंद-नापसंद, जान-पहचान, पूछताछ, खरीदारी, आदतों से जुड़े आंकड़े जमा करते हैं और इसके पहले कि आपका अगला दिन शुरू हो, उन्हें कई जगह बेचा जा चुका होता है। डाटा के इस बाजार में विक्रेता भी हैं, उनका भंडारण करने वाले, विश्लेषण करने वाले भी हैं, उनके दलाल भी हैं, उनके खरीदार भी हैं और चोर-उचक्के भी।
यह माना जाता है कि साइबर युग में डाटा का महत्व उतना ही है, जितना औद्योगिक क्रांति के बाद के युग में पेट्रोल का था। डाटा ही वह ईंधन है, जिससे इंटरनेट की दुनिया और इंटरनेट की कंपनियां चलती हैं। यह डाटा ही है, जिसके कारण गूगल दुनिया के बाजार में कोई भी सामान बेचे बगैर 66 अरब डॉलर के सालाना कारोबार वाली ऐसी कंपनी बन गई है, जिसकी कुल संपत्तियां 131 अरब डॉलर से भी ज्यादा हैं। डाटा से कमाई करने वाली कंपनियां आज जिस जगह पर पहुंच चुकी हैं, पेट्रोलियम का कारोबार करने वाली कोई भी कंपनी आज उसके आस-पास भी नहीं दिखती। और इस समय, जब पेट्रोलियम का बाजार लगातार उतार-चढ़ाव के झटकोंके बीच डोल रहा है, डाटा का कारोबार लगातार ऊपर की ओर जा रहा है।
ऐसे में, यह उम्मीद व्यर्थ है कि महज चंद पाबंदियों से डाटा का प्रवाह पूरी तरह रुक जाएगा, जिसने एक तरफ तो हार्डवेयर के जरिए हमारे बाजार के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमा रखा है, और दूसरी तरफ, वह डाटा कारोबार का बड़ा खिलाड़ी भी बन चुका है। और अगर हम भारत से चीन की ओर जाने वाले सभी तरह के डाटा पर जैसे-तैसे पूरी तरह पाबंदी लगा भी दें, तब भी इसे खुले बाजार से खरीदने का रास्ता उसके पास हमेशा रहेगा। पिछले कुछ समय में चीनी सर्वरों के जरिए जिस तरह से ऑस्ट्रेलिया में हैकिंग की लगातार कई कोशिशें हुई हैं, वह यह भी बताता है कि चीन ने साइबर डकैती की क्षमताएं भी हासिल कर ली हैं।
इस मामले में भी चीन से मुकाबले का रास्ता वही है, जो अन्य क्षेत्रों में है। चीन पर निर्भरता कम करने के लिए बडे़ पैमाने पर आधुनिक मैन्युफेक्चरिंग को भारत में स्थापित करने की बात की जाती रही है, यह बात अलग है कि यह काम कभी पूरे दिल से नहीं हुआ। इसी तरह, दवा उद्योग में कच्चे माल के लिए आधुनिक रसायन उद्योग में बड़ी कोशिशों की चर्चा पिछले कुछ समय में चलनी शुरू हुई है। यही काम हमें डाटा उद्योग में भी करना होगा। इस कारोबार का बड़ा खिलाड़ी बने बगैर हम साइबर अर्थव्यवस्था में पिछडे़ ही रहेंगे।
आत्म गौरव के क्षणों में अक्सर हम भारत को सॉफ्टवेयर उद्योग का सुपर पावर कह देते हैं, लेकिन सच यही है कि अच्छी कमाई के बावजूद हम इस क्षेत्र में अभी तक आउटसोर्सिंग हब बनने से बहुत आगे नहीं बढ़ सके हैं। मामला सिर्फ चीन का विकल्प बनने का नहीं है, कारोबार की उस मंजिल को पकड़ने का है, जिसकी ओर दुनिया बढ़ रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार

 

खाना खजाना / शौर्यपथ / सावन का महीना आते ही भोले बाबा के भक्त उनकी भक्ति में डूब जाते हैं। इस बार सावन इस सोमवार 6 जुलाई से शुरु हो रहे हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त पूरी श्रद्धा भाव से सावन के महीने में भगवान शिव की आराधना करता है उसकी सभी मनोकामना भगवान शंकर जरूर पूरी करते हैं। अगर आप भी इस सावन उपवास रखने की सोच रहे हैं तो फलाहार के लिए जानें कैसे बनाए जाते हैं क्रिस्पी आलू के टिप्स।

सामग्री-
-6 कच्चे केले
-आधा छोटा चम्मच काली मिर्च पिसी हुई
-सेंधा नमक एक छोटा चम्मच
-आधा चम्मच भूना जीरा पाउडर
-तलने के लिए तेल

विधि -
सबसे पहले कच्चे केले के छिलके उतार लीजिए। अब एक कड़ाही में घी या तेल गर्म कर लें। तेल गर्म होने के बाद कद्दूकस की मदद से तेल में चिप्स घिसती जाएं। चिप्स कुरकुरे होने पर तेल से बाहर निकाल लें। अब इन पर ऊपर से काली मिर्च, जीरा पाउडर और सेंधा नमक बुरकाएं। ठंडे होने पर चिप्स को एयर टाइट डिब्बे में भर कर रख दें। जरूरत पड़ने पर आप ये शुद्ध केले की चिप्स फलाहार करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

 

नजरिया / शौर्यपथ / सब उन्हें मास्टर जी कहते थे और कुछ खास चाहने वाले माई। हिंदी फिल्मों में एक ऐसा दौर भी था, जब कोरियोग्राफर सरोज खान का ओहदा सितारों से कहीं ज्यादा था। उनके बारे में कई कहानियां सुनने को मिलती थीं। कैसे उन्होंने ठीक से स्टेप न करने पर नामी हीरोइन के पैर में डंडा मार दिया, कैसे लगातार चार दिन रिहर्सल करवाकर एक नवोदित हीरोइन को अस्पताल पहुंचा दिया वगैरह-वगैरह। मेरे मन में बनी एकदम कड़क डांस मास्टर की छवि उस दिन टूट गई, जब मैं पहली बार प्रेम फिल्म (1990) के डांस रिहर्सल पर उनसे मिलने जुहू (मुंबई) पहुंची।
सरोज खान अपनी टीम के साथ हंस रही थीं, चाय पी रही थीं और चुटकुले सुना रही थीं। मुझे देखते ही उन्होंने सवाल किया, ‘मेरे बारे में क्या सुनकर आई हो?’ एक ठहाके के साथ सुनी-सुनाई कहानियां हवा हो गईं। मेरे सामने थीं सालों के संघर्ष से तपकर निखरी एक कद्दावर डांस कोरियोग्राफर, जिसने कलाकारों को यह सबक दिया कि जब तक चेहरे पर नृत्य नहीं झलकेगा, दर्शकों के अंदर नहीं उतरेगा। उन दिनों मिस्टर इंडिया का हवा-हवाई और तेजाब का एक-दो-तीन गाना मशहूर हो चुका था। सरोज खान का जादू चल निकला था। पर वह अपनी सफलता से बहुत प्रभावित नहीं लग रही थीं। उन्होंने मुझे इसे यूं समझाया, ‘मैं तीन साल की उम्र से इंडस्ट्री में काम कर रही हूं। पर अब जाकर मुंबई में अपना घर खरीद पाई हूं। मेरे लिए यह सबसे बड़ी सफलता है।’
हिंदी फिल्मों में डांस कोरियोग्राफी का दूसरा दौर सरोज खान से शुरू होता है। पहले दौर में तमाम डांस कोरियोग्राफर पुरुष हुआ करते थे। सरोज खान के लिए इस पुरुष प्रधान क्षेत्र में अपने आपको साबित करना आसान नहीं था। पर बिना संकोच के वह कहती थीं, ‘मुझे इसलिए भी दूसरों से बेहतर काम करना था, क्योंकि सब मानकर चल रहे थे कि एक औरत सितारों को नचा नहीं पाएगी। मुझे टफ बनना पड़ा। मैं अंदर से बिल्कुल सख्त नहीं हूं। बात-बात पर हंसती हूं, रो पड़ती हूं। पर सबके सामने ऐसा करूं, तो मुझे काम कौन देगा?’
सरोज खान का पैदाइशी नाम था निर्मला नागपाल। बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान से मुंबई आ गया। गुजारे के लिए पिता ने तीन साल की बेटी को फिल्मों में बाल कलाकार बना दिया। फिल्मों में बैक ग्राउंड डांसर बनने के लिए निर्मला डांस मास्टर बी सोहनलाल से डांस सीखने लगीं। उन्होंने ही उनका नाम बदलकर सरोज रखा। जब वह तेरह साल की थीं, सोहनलाल ने एक दिन उनके गले में काले रंग की माला डालने के बाद कह दिया, आज से तुम मेरी पत्नी हुई। सोहनलाल की उम्र उस समय 41 साल थी। उनसे अलग होने के बाद सरोज ने सरदार रोशन खान से निकाह कर लिया था। सरोज खान को अपने अतीत को लेकर कोई शिकायत नहीं थी। वह कहती थीं, ‘मेरी जिंदगी का सफर कभी सीधा नहीं रहा। दो शादी, तीन बच्चे, यह संघर्ष, ये सब शायद पहले से लिखा था। अगर ऐसा न होता, तो पूरी जिंदगी बैक ग्राउंड डांसर बनकर काट देती। कभी एक सफल कोरियोग्राफर नहीं बन पाती।’
डांस मास्टर सोहनलाल ने ही सरोज खान को यह मंत्र दिया था, कोई भी काम आधे मन से मत करो। सरोज ने कभी अपने काम के साथ समझौता नहीं किया। हिंदी फिल्मों की दो बड़ी नायिकाओं को उन्होंने बेहतरीन डांस स्टेप्स दिए और एक तरह से वह उनकी गुरु मां बन गईं। श्रीदेवी से मिलने से पहले सरोज खान का कोई वजूद नहीं था। हिम्मतवाला में श्रीदेवी को देखने के बाद उनकी दिली तमन्ना थी श्रीदेवी के साथ काम करने की। उनकी यह इच्छा सुभाष घई की कर्मा में पूरी हुई। श्रीदेवी ने ही मिस्टर इंडिया में हवा-हवाई गाना उनसे करने को कहा। इस गाने ने श्रीदेवी के साथ-साथ सरोज खान को भी सितारा बना दिया। श्रीदेवी उन्हें माई कहती थीं, सरोज खान भी उन्हें बेटी मानती थीं। ऐसा ही रिश्ता उनका माधुरी दीक्षित के साथ था। ये दोनों नायिकाएं सरोज खान के हर स्टेप और मूवमेंट को भव्यता के साथ पेश करती थीं। इन दोनों की कामयाबी में सरोज खान के करामाती स्टेप्स का बहुत बड़ा हाथ रहा है।
नब्बे के दशक के लगभग हर बड़े सितारे के साथ सरोज खान ने काम किया। बाजीगर में शाहरुख खान का फेमस दोनों हाथ फैलाने वाला आइकॉनिक मूव भी सरोज खान ने ही दिया है।जयंती रंगनाथन,कार्यकारी संपादक,

 

सम्पादकीय / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लद्दाख यात्रा न केवल तात्कालिक, बल्कि एक ऐसे दीर्घकालिक संदेश की तरह है, जिसकी गूंज दुनिया में कुछ समय तक बनी रहेगी। विशेषज्ञ भी यह मान रहे हैं कि जो वह दिल्ली में बैठकर नहीं कर पा रहे थे, उसे उन्होंने लेह-लद्दाख पहुंचकर कर दिखाया। उन्होंने मोर्चे पर सैनिकों के बीच जाकर जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही है, उसकी प्रासंगिकता अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सबसे ज्यादा है। भले उन्होंने चीन का नाम न लिया, पर दो टूक कहा कि विस्तारवाद का दौर समाप्त हो चुका है, यह विकास का दौर है। वाकई उनका यह कहना चीन की नीतियों और दुस्साहस पर एक प्रतिकूल टिप्पणी है।
सीमा पर पहुंचकर श्रीकृष्ण को याद करने का भी अपना महत्व है। एक ओर, बांसुरी है, तो दूसरी ओर, सुदर्शन चक्र। भारतीय राजनय जहां एक ओर, बंधुत्व और सद्भाव में विश्वास करता आया है, वहीं भारत की बहुमूल्य जमीन पर कुछ साम्राज्यवादी शक्तियों की गिद्ध दृष्टि कभी-कभी उसे अशांत करती रही है। आज भारत को सीमा पर फिर ललकारा गया है, वीर भारतीय जवानों का खून बहा है, भावनाएं ज्वार पर हैं, लेकिन तब भी भारत अपनी सद्भावी नीतियों को भूला नहीं है। भारत के संयम और भावनाओं के पक्ष में दुनिया की शक्तियां खुलकर सामने आने लगी हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान इत्यादि अनेक सशक्त देश हैं, जो भारत के साथ खड़े हैं और चीन की निंदा का ग्राफ धीरे-धीरे बढ़ रहा है। चीनी एप पर लगाए गए प्रतिबंध इत्यादि को अगर हम सांकेतिक भी मानें, तब भी दुनिया के कोने-कोने तक भारत की नाराजगी पहुंची है। उम्मीद करनी चाहिए और बहुत हद तक संभव है कि भारतीय प्रधानमंत्री के लद्दाख पहुंचने से पड़ोसी देश भारत की नाराजगी को साफ तौर पर समझ सकेगा। बेशक, तनाव के दिनों में किसी प्रधानमंत्री का मोर्चे पर जाना और सेना के आला अधिकारियों के लगातार दौरे यह साबित करते हैं कि हम अपनी जमीन और जवानों के मनोबल के साथ हैं।
कोई आश्चर्य नहीं, प्रधानमंत्री का यह दौरा चीन को अच्छा नहीं लगा है और उसने चल रही बातचीत का हवाला दिया है। क्या जब सैन्य स्तर पर बातचीत चल रही थी, तब भारतीय प्रधानमंत्री को वहां नहीं जाना चाहिए था? इस सवाल के जवाब के लिए हमें बातचीत की गुणवत्ता पर एक बार जरूर नजर डाल लेनी चाहिए। लगभग पांच दौर की बातचीत सीमा पर हो चुकी है। वार्ताएं 12-12 घंटे तक चली हैं, पर नतीजा सिफर रहा है। वार्ता इसलिए नहीं होती कि कोई देश अपनी सीधी बात को बार-बार दोहराता रहे और सामने बैठा देश किसी भी जायज बात पर कान न दे। शायद चीन चाहता है कि भारत कुछ समय बाद शांत पड़ जाए और गलवान घाटी की भारतीय जमीन पर उसके शिविर स्थाई मान लिए जाएं। यह चीन का पुराना तरीका बताया जाता है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि यह तरीका चीन को उल्टा पड़ रहा है। उसकी हठधर्मिता से उसके प्रति न सिर्फ भारत, बल्कि अन्य देशों में भी नाराजगी बढ़ रही है। प्रधानमंत्री के दौरे का यह संदेश भी है कि बेनतीजा वार्ताओं से परे भी भारत सोच रहा है। भारत की सोच के प्रति चीन को समझदार बनना पडे़गा। वह समझदारी दिखाने में जितनी देरी करेगा, दुश्मनी की गांठ को अपने ही हाथों और बड़ी करता चला जाएगा। ध्यान रहे, इस बार उसकी विस्तारवादी तानाशाही पूरी दुनिया को चुभ रही है।

 

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