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नजरिया / शौर्यपथ / सब उन्हें मास्टर जी कहते थे और कुछ खास चाहने वाले माई। हिंदी फिल्मों में एक ऐसा दौर भी था, जब कोरियोग्राफर सरोज खान का ओहदा सितारों से कहीं ज्यादा था। उनके बारे में कई कहानियां सुनने को मिलती थीं। कैसे उन्होंने ठीक से स्टेप न करने पर नामी हीरोइन के पैर में डंडा मार दिया, कैसे लगातार चार दिन रिहर्सल करवाकर एक नवोदित हीरोइन को अस्पताल पहुंचा दिया वगैरह-वगैरह। मेरे मन में बनी एकदम कड़क डांस मास्टर की छवि उस दिन टूट गई, जब मैं पहली बार प्रेम फिल्म (1990) के डांस रिहर्सल पर उनसे मिलने जुहू (मुंबई) पहुंची।
सरोज खान अपनी टीम के साथ हंस रही थीं, चाय पी रही थीं और चुटकुले सुना रही थीं। मुझे देखते ही उन्होंने सवाल किया, ‘मेरे बारे में क्या सुनकर आई हो?’ एक ठहाके के साथ सुनी-सुनाई कहानियां हवा हो गईं। मेरे सामने थीं सालों के संघर्ष से तपकर निखरी एक कद्दावर डांस कोरियोग्राफर, जिसने कलाकारों को यह सबक दिया कि जब तक चेहरे पर नृत्य नहीं झलकेगा, दर्शकों के अंदर नहीं उतरेगा। उन दिनों मिस्टर इंडिया का हवा-हवाई और तेजाब का एक-दो-तीन गाना मशहूर हो चुका था। सरोज खान का जादू चल निकला था। पर वह अपनी सफलता से बहुत प्रभावित नहीं लग रही थीं। उन्होंने मुझे इसे यूं समझाया, ‘मैं तीन साल की उम्र से इंडस्ट्री में काम कर रही हूं। पर अब जाकर मुंबई में अपना घर खरीद पाई हूं। मेरे लिए यह सबसे बड़ी सफलता है।’
हिंदी फिल्मों में डांस कोरियोग्राफी का दूसरा दौर सरोज खान से शुरू होता है। पहले दौर में तमाम डांस कोरियोग्राफर पुरुष हुआ करते थे। सरोज खान के लिए इस पुरुष प्रधान क्षेत्र में अपने आपको साबित करना आसान नहीं था। पर बिना संकोच के वह कहती थीं, ‘मुझे इसलिए भी दूसरों से बेहतर काम करना था, क्योंकि सब मानकर चल रहे थे कि एक औरत सितारों को नचा नहीं पाएगी। मुझे टफ बनना पड़ा। मैं अंदर से बिल्कुल सख्त नहीं हूं। बात-बात पर हंसती हूं, रो पड़ती हूं। पर सबके सामने ऐसा करूं, तो मुझे काम कौन देगा?’
सरोज खान का पैदाइशी नाम था निर्मला नागपाल। बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान से मुंबई आ गया। गुजारे के लिए पिता ने तीन साल की बेटी को फिल्मों में बाल कलाकार बना दिया। फिल्मों में बैक ग्राउंड डांसर बनने के लिए निर्मला डांस मास्टर बी सोहनलाल से डांस सीखने लगीं। उन्होंने ही उनका नाम बदलकर सरोज रखा। जब वह तेरह साल की थीं, सोहनलाल ने एक दिन उनके गले में काले रंग की माला डालने के बाद कह दिया, आज से तुम मेरी पत्नी हुई। सोहनलाल की उम्र उस समय 41 साल थी। उनसे अलग होने के बाद सरोज ने सरदार रोशन खान से निकाह कर लिया था। सरोज खान को अपने अतीत को लेकर कोई शिकायत नहीं थी। वह कहती थीं, ‘मेरी जिंदगी का सफर कभी सीधा नहीं रहा। दो शादी, तीन बच्चे, यह संघर्ष, ये सब शायद पहले से लिखा था। अगर ऐसा न होता, तो पूरी जिंदगी बैक ग्राउंड डांसर बनकर काट देती। कभी एक सफल कोरियोग्राफर नहीं बन पाती।’
डांस मास्टर सोहनलाल ने ही सरोज खान को यह मंत्र दिया था, कोई भी काम आधे मन से मत करो। सरोज ने कभी अपने काम के साथ समझौता नहीं किया। हिंदी फिल्मों की दो बड़ी नायिकाओं को उन्होंने बेहतरीन डांस स्टेप्स दिए और एक तरह से वह उनकी गुरु मां बन गईं। श्रीदेवी से मिलने से पहले सरोज खान का कोई वजूद नहीं था। हिम्मतवाला में श्रीदेवी को देखने के बाद उनकी दिली तमन्ना थी श्रीदेवी के साथ काम करने की। उनकी यह इच्छा सुभाष घई की कर्मा में पूरी हुई। श्रीदेवी ने ही मिस्टर इंडिया में हवा-हवाई गाना उनसे करने को कहा। इस गाने ने श्रीदेवी के साथ-साथ सरोज खान को भी सितारा बना दिया। श्रीदेवी उन्हें माई कहती थीं, सरोज खान भी उन्हें बेटी मानती थीं। ऐसा ही रिश्ता उनका माधुरी दीक्षित के साथ था। ये दोनों नायिकाएं सरोज खान के हर स्टेप और मूवमेंट को भव्यता के साथ पेश करती थीं। इन दोनों की कामयाबी में सरोज खान के करामाती स्टेप्स का बहुत बड़ा हाथ रहा है।
नब्बे के दशक के लगभग हर बड़े सितारे के साथ सरोज खान ने काम किया। बाजीगर में शाहरुख खान का फेमस दोनों हाथ फैलाने वाला आइकॉनिक मूव भी सरोज खान ने ही दिया है।जयंती रंगनाथन,कार्यकारी संपादक,
सम्पादकीय / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लद्दाख यात्रा न केवल तात्कालिक, बल्कि एक ऐसे दीर्घकालिक संदेश की तरह है, जिसकी गूंज दुनिया में कुछ समय तक बनी रहेगी। विशेषज्ञ भी यह मान रहे हैं कि जो वह दिल्ली में बैठकर नहीं कर पा रहे थे, उसे उन्होंने लेह-लद्दाख पहुंचकर कर दिखाया। उन्होंने मोर्चे पर सैनिकों के बीच जाकर जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही है, उसकी प्रासंगिकता अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सबसे ज्यादा है। भले उन्होंने चीन का नाम न लिया, पर दो टूक कहा कि विस्तारवाद का दौर समाप्त हो चुका है, यह विकास का दौर है। वाकई उनका यह कहना चीन की नीतियों और दुस्साहस पर एक प्रतिकूल टिप्पणी है।
सीमा पर पहुंचकर श्रीकृष्ण को याद करने का भी अपना महत्व है। एक ओर, बांसुरी है, तो दूसरी ओर, सुदर्शन चक्र। भारतीय राजनय जहां एक ओर, बंधुत्व और सद्भाव में विश्वास करता आया है, वहीं भारत की बहुमूल्य जमीन पर कुछ साम्राज्यवादी शक्तियों की गिद्ध दृष्टि कभी-कभी उसे अशांत करती रही है। आज भारत को सीमा पर फिर ललकारा गया है, वीर भारतीय जवानों का खून बहा है, भावनाएं ज्वार पर हैं, लेकिन तब भी भारत अपनी सद्भावी नीतियों को भूला नहीं है। भारत के संयम और भावनाओं के पक्ष में दुनिया की शक्तियां खुलकर सामने आने लगी हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान इत्यादि अनेक सशक्त देश हैं, जो भारत के साथ खड़े हैं और चीन की निंदा का ग्राफ धीरे-धीरे बढ़ रहा है। चीनी एप पर लगाए गए प्रतिबंध इत्यादि को अगर हम सांकेतिक भी मानें, तब भी दुनिया के कोने-कोने तक भारत की नाराजगी पहुंची है। उम्मीद करनी चाहिए और बहुत हद तक संभव है कि भारतीय प्रधानमंत्री के लद्दाख पहुंचने से पड़ोसी देश भारत की नाराजगी को साफ तौर पर समझ सकेगा। बेशक, तनाव के दिनों में किसी प्रधानमंत्री का मोर्चे पर जाना और सेना के आला अधिकारियों के लगातार दौरे यह साबित करते हैं कि हम अपनी जमीन और जवानों के मनोबल के साथ हैं।
कोई आश्चर्य नहीं, प्रधानमंत्री का यह दौरा चीन को अच्छा नहीं लगा है और उसने चल रही बातचीत का हवाला दिया है। क्या जब सैन्य स्तर पर बातचीत चल रही थी, तब भारतीय प्रधानमंत्री को वहां नहीं जाना चाहिए था? इस सवाल के जवाब के लिए हमें बातचीत की गुणवत्ता पर एक बार जरूर नजर डाल लेनी चाहिए। लगभग पांच दौर की बातचीत सीमा पर हो चुकी है। वार्ताएं 12-12 घंटे तक चली हैं, पर नतीजा सिफर रहा है। वार्ता इसलिए नहीं होती कि कोई देश अपनी सीधी बात को बार-बार दोहराता रहे और सामने बैठा देश किसी भी जायज बात पर कान न दे। शायद चीन चाहता है कि भारत कुछ समय बाद शांत पड़ जाए और गलवान घाटी की भारतीय जमीन पर उसके शिविर स्थाई मान लिए जाएं। यह चीन का पुराना तरीका बताया जाता है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि यह तरीका चीन को उल्टा पड़ रहा है। उसकी हठधर्मिता से उसके प्रति न सिर्फ भारत, बल्कि अन्य देशों में भी नाराजगी बढ़ रही है। प्रधानमंत्री के दौरे का यह संदेश भी है कि बेनतीजा वार्ताओं से परे भी भारत सोच रहा है। भारत की सोच के प्रति चीन को समझदार बनना पडे़गा। वह समझदारी दिखाने में जितनी देरी करेगा, दुश्मनी की गांठ को अपने ही हाथों और बड़ी करता चला जाएगा। ध्यान रहे, इस बार उसकी विस्तारवादी तानाशाही पूरी दुनिया को चुभ रही है।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / भारत सरकार ने कुछ रेल मार्गों पर निजी क्षेत्रों को आमंत्रण देने का निर्णय लिया है। विपक्षी दलों ने बिना कुछ समझे सरकार के फैसले का विरोध शुरू कर दिया है। वे इस निर्णय को गरीब-विरोधी बताकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। कांग्रेस शायद यह भूल चुकी है कि निजीकरण को बढ़ावा देने वाले प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव उसी के पार्टी के थे। लेकिन आज की जनता जागरूक है, और उसे पता है कि यह निर्णय उसके हित में है। पूर्व में हवाई जहाज से यात्रा करना बड़े लोगों का एकाधिकार था, मगर जब अधिक से अधिक निजी कंपनियों को इसमें उतारा गया, तो हवाई जहाज की यात्रा मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों की पहुंच में आ गई। इसका दूरगामी परिणाम निकला और देश के विकास में पंख लगे। आज दुनिया के कई विकसित देशों में रेलवे का निजीकरण हो चुका है। वहां की रेल सुविधाएं हमसे काफी बेहतर हैं। अब समय आ गया है कि भारत में भी ऐसा प्रयास हो और रेल यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधा मिले।
हिमांशु शेखर, टिकारी, गया
किताबों का दान
साहित्य के प्रति अनुराग होना ही चाहिए। लेखन और उसके शब्दों के भावों को सही तरीके से समझा जाए, तो रचनाकार की रचना साकार होकर मन को छू लेती है। इसके साथ ही साहित्य हमें एक-दूसरे से भी जोड़ता है। ऐसे में, जरूरी है कि साहित्यिक किताबों को रद्दी में न बेचकर वाचनालयों, स्कूलों व महाविद्यालयों जैसे शिक्षण संस्थानों या साहित्यिक संस्थाओं को भेंट किया जाए, ताकि साहित्य के उपासकों के लिए वे लाभकारी हो सकें। हम सभी को किताबें दान करनी ही चाहिए।
संजय वर्मा, मनावर, धार
यह कैसी आत्मनिर्भरता
विकास के नाम पर विश्व के सबसे बड़े रेलवे का निजीकरण किया जा रहा है। एक ओर हम आत्मनिर्भर बनने की सोच रहे हैं, तो दूसरी ओर सरकार खुद आत्मनिर्भर रेल को दूसरों पर निर्भर बना रही है। पहले आम जन इसी मुद्दे पर वोट दिया करते थे कि रेलवे का किराया सस्ता होगा, बस में सुविधाएं मिलेंगी, मगर धीरे-धीरे राजनीति हावी होती गई। आज भी, तमाम खर्चों के बावजूद भारतीय रेल फायदा कमा रही है, फिर इसके निजीकरण की आखिर क्या आवश्यकता पड़ गई? सवाल यह भी है कि तेजस और वंदे भारत जैसी ट्रेनों में कितने लोग यात्रा करने में सक्षम हैं? भले ही जापान, ब्रिटेन, कनाडा जैसे देशों में रेलवे का निजीकरण हुआ, लेकिन उनकी जीडीपी हमसे ज्यादा है और वे विकसित भी हैं। ऐसे में, राजनेताओं को कोई भी कदम उठाने से पहले यह अवश्य विचार करना चाहिए कि आखिर जनता से जब वे वोट मांगने जाएंगे, तो किस नाम और काम पर? सरकार जन सेवा के लिए चुनी जाती है, जिससे गरीब को सहारा मिले। संभव है कि आने वाले समय में रेलवे में एकाधिकार होने से सरकार और निजी कंपनी को तो फायदा हो, मगर जनता को नहीं।
अमन जायसवाल
दिल्ली विश्वविद्यालय
सावधानी से हो प्रयोग
हम लोग बिना सोचे-समझे किसी भी शब्द का बहुत अधिक प्रयोग करने लगते हैं, जिसमें एक शब्द ‘शहीद’ भी है। यह हमारी जुबान पर ऐसा चढ़ गया है कि हम अपने वीरगति प्राप्त सैनिकों को भी शहीद कहते हैं। पर शहीद का शाब्दिक अर्थ है, धर्म की राह पर चलते हुए, खुदा का काम करते हुए अपनी जान अर्पित कर देना। क्या फौजियों के लिए यह शब्द इस्तेमाल होना चाहिए, जो राष्ट्र की सेवा करते हुए अपना बलिदान देते हैं? हमारी फौज, पुलिस या अद्र्धसैनिक बल एक पेशेवर सेना है, जो देश, समाज और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अपनी जान न्योछावर करती है, इसलिए उनके लिए सही शब्द बलिदानी है।
सरिता पांडेय
पावन चिंतन धारा आश्रम
ओपिनियन / शौर्यपथ / एक अन्य एशियाई ताकत के उद्भव से चीन असहज हो गया है। संयुक्त राष्ट्र और दूसरे वैश्विक मंचों पर भारत द्वारा पेश किए जाने वाले प्रस्तावों पर हीला हवाली करने के अलावा, वह उप-महाद्वीप में नई दिल्ली के प्रभाव को रोकने की कोशिशों में भी जुटा है। चारों तरफ से हमें घेरने के लिए वह हमारे पड़ोसी देशों पर फोकस कर रहा है। पाकिस्तान के साथ एक सामरिक साझेदारी उसने की है, जबकि अन्य देशों के साथ अपने कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य संबंध आगे बढ़ाए हैं। इस काम के लिए बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) का इस्तेमाल किया गया है। एक हाथ लो और दूसरे हाथ दो के साथ-साथ वह दादागिरी की नीति भी अपनाता है। इंडो-पैसिफिक (हिंद महासागर व प्रशांत क्षेत्र के बीच का भू-राजनीतिक इलाका), अफ्रीका और कुछ अन्य क्षेत्रों में चीन ने आंतरिक मामलों में निर्लज्जता से दखलंदाजी की है।
यह सही है कि उभरती हुई तमाम बड़ी ताकतें भू-राजनीतिक क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए आक्रामक हो जाती हैं। मगर इस मामले में चीन का व्यवहार अपरिपक्व दिखता है। बेशक अपनी समग्र राष्ट्रीय ताकत (सीएनपी) को उसने तेजी से बढ़ाया है, पर अब भी कई आंतरिक और बाहरी चुनौतियां हैं, जो राष्ट्रपति शी जिनपिंग की रातों की नींद हराम करती हैं। ये चुनौतियां अर्थव्यवस्था, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी, यानी पीएलए के नेतृत्व, राष्ट्रीय मनोबल और दुनिया भर में बढ़ती चीन-विरोधी भावना से जुड़ी हुई हैं।
दरअसल, चीन की सिकुड़ती अर्थव्यवस्था ने बडे़ पैमाने पर बेरोजगारी पैदा की है। सरकार के स्वामित्व वाले उद्यमों को सशक्त बनाने की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की नीति ने निजी क्षेत्र को खासा प्रभावित किया है, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब 65 प्रतिशत और नई नौकरियों के सृजन में लगभग 90 फीसदी का योगदान देता है। इसके अलावा, विनिर्माण क्षेत्र की समस्या, बढ़ते कर्ज और बुजुर्ग होती आबादी (जो भविष्य में श्रम-बल को कम करेगी) दीर्घावधि में चीन की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करेगी।
साल 2012 में शी जिनपिंग ने पीएलए को विश्व स्तरीय सेना बनाने की घोषणा की थी, जो 2049 तक ‘दुनिया के सर्वशक्तिमान मुल्क’ बनने की चीन की राह को आसान बनाएगी। तब से, सेना की जंगी ताकत बढ़ाने और सीपीसी के प्रति उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए तमाम सुधार कार्य किए गए हैं। हालांकि, सुधारों में निजी तौर पर रुचि ले रहे शी जिनपिंग पीएलए नेतृत्व के पेशेवर मानकों से खुश नहीं हैं, क्योंकि उसके पास युद्ध लड़ने का व्यावहारिक अनुभव नहीं है। कई थिंक-टैंकों ने बताया है कि पीएलए के पास अन्य सेनाओं को चुनौती देने लायक जरूरी क्षमताओं का अभाव है।
इसी तरह, समग्र राष्ट्रीय ताकत (सीएनपी) का एक महत्वपूर्ण घटक राष्ट्रीय मनोबल है। चीन के इस मनोबल को उसकी एकतरफा मीडिया रिपोर्टिंग व ‘वुल्फ वॉरियर्स’ के नाम से शुरू कूटनीतिक सक्रियता से नहीं आंकना चाहिए। इन दोनों का मकसद पश्चिमी और भारतीय मीडिया का मुकाबला करने के साथ-साथ शासन के चीनी मॉडल का प्रचार-प्रसार और शी जिनपिंग को एक वैश्विक नेता के रूप में पेश करना है। मगर बेरोजगारी में वृद्धि, नागरिक स्वतंत्रता पर पाबंदी और वंचितों व अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की वजह से अंदरखाने में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है। पार्टी के नियंत्रण का दायरा बढ़ाने संबंधी शी जिनपिंग के सख्त रुख से भी लोग नाराज दिखते हैं। सार्वजनिक सूचनाओं की मानें, तो 2013 से 2018 के बीच जिनपिंग ने 23 लाख से अधिक कर्मचारियों को बर्खास्त और कैद किया, जिनमें पीएलए के कई वरिष्ठ अधिकारी और नौकरशाह भी शामिल हैं।
इस सूरतेहाल में यह कहना अनुचित नहीं कि पूर्वी लद्दाख में पीएलए ने जो दुस्साहस दिखाया है, वह गलत आकलन के साथ उठाया गया उसका कदम है। संभवत: बीजिंग को भारत से दृढ़ राजनीतिक-सैन्य प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। हमारा सैन्य ढांचा और जवाबी रणनीति, उसकी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने की हमारी तरकीबें और अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने की हमारी क्षमता निश्चय ही बीजिंग की मुश्किलें बढ़ाएंगी।
भारत की फौरी रणनीति यही होनी चाहिए कि सैन्य और सियासी बातचीत के जरिए वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बहाल की जाए। सेना को तमाम संभव विकल्पों के बाद ही आजमाना चाहिए। इन विकल्पों के साथ-साथ हमें अपनी बढ़त बनाए रखने, साइबर डोमेन में व्यावहारिक कदम उठाने और पाकिस्तान के दुस्साहस को विफल करने के लिए भी तैयार रहना होगा।
रही बात दीर्घकालिक रणनीति की, तो यह व्यावहारिक और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनानी होगी। चीन से मिलने वाले धोखे का खतरा कम से कम रहे, इसके लिए हमें तमाम रास्तों और उपायों के साथ तोड़ निकालना होगा। यहां तोड़ असल में वे उद्देश्य हैं, जो हम चीन को लेकर हासिल करना चाहते हैं। उपाय का अर्थ राजनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक, सैन्य और सूचना तत्व के साथ-साथ सरकार के सामने उपलब्ध अन्य आंतरिक व बाह्य संसाधन हैं, जबकि रास्ते का मतलब कुशल व प्रभावी तरीकों से संसाधनों का इस्तेमाल करना है, ताकि हम अपने उद्देश्य में सफल हो सकें।
अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के दौरान, चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने वाली नीतियों का लाभ भारत को उठाना चाहिए, और अपनी सामरिक ताकत बढ़ाने व बुनियादी ढांचे के विस्तार की तरफ तेजी दिखानी चाहिए। पहाड़ों पर जवाब देने में सक्षम माउंटेन स्ट्राइक कॉप्र्स पर फिर से गौर करना संभवत: एक रणनीतिक अनिवार्यता है। इसका इस्तेमाल नव-निर्मित युद्ध समूहों में हो सकता है। मैं इस मुद्दे पर इसलिए बल दे रहा हूं, क्योंकि जुलाई, 2014 में चीन की आधिकारिक यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया था कि पीएलए नेतृत्व में इस पलटन को लेकर चिंता और बेचैनी है।
चूंकि जरूरी सामरिक ताकत के विकास में अभी वक्त लगेगा, इसलिए क्षेत्रीय सैन्य समीकरणों को संतुलित करने के लिए समान सोच वाले देशों को एकजुट करना समझदारी है। हालांकि, इसके लिए काफी मेहनत करनी होगी। चीन की कटुता का प्रभावी मुकाबला करने के लिए राष्ट्र को अपने थल सैनिकों, नौसैनिकों और वायु सैनिकों के पीछे मजबूती से एकजुट होना चाहिए। यह सेना के मनोबल को उच्चतम स्तर पर बनाए रखने में मदद करेगा, जो कि जीत हासिल करने की अनिवार्य शर्त होती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)जनरल बिक्रम सिंह, पूर्व थलसेना प्रमुख
भिलाई / शौर्यपथ / शुक्रवार को आयोजित एक प्रेसवार्ता में एमजे स्कूल की डायरेक्टर श्रीलेखा विरुलकर ने बताया कि एमजे स्कूल मां जगदम्बे एजुकेशनल सोसाइटी का एक नया उपक्रम है। 5 एकड़ के परिसर में फैला यह स्कूल बेहतरीन अध्ययनकक्षों के अलावा इनडोर जिम, 2 एकड़ के गार्डन एरिया, प्ले ग्राउण्ड सहित अन्य सुविधाओं से लैस है। स्कूल में घुड़सवारी, तीरंदाजी सहित ऐसी अनेक सुविधाएं हैं जो बच्चों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करती हैं। एमजे एजुकेशनल सोसाइटी पिछले दो दशकों से शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान दे रहा है। एमजे स्कूल में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्कृति एवं शिक्षण पद्धतियों का खूबसूरत तालमेल देखने को मिलेगा। वैश्वीकरण के इस युग मे इसकी नितांत आवश्यकता महसूस की जाती है। एमजे स्कूल में 500 वर्ग मीटर के क्लास रूम हैं जिसमें 2 विद्यार्थियों के बीच 6 मीटर की दूरी होगी। स्कूल में प्रत्येक विद्यार्थी पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। पाठ्यक्रम के अलावा अनेक गतिविधियां होंगी जिससे छात्र का सर्वांगीण विकास हो। इनमें भाषण, वाद-विवाद, अध्ययनयात्रा, कैंप, आदि का गतिविधियों का नियमित संचालन किया जाएगा। सुसज्जित विज्ञान प्रयोगशाला में नर्सरी से लेकर सभी क्लास के बच्चों की पहुंच होगी जहां वे खेल-खेल विज्ञान से जुड़ेंगे। यह बच्चों में वैज्ञानिक अभिरुचि उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध होगी।एमजे स्कूल प्रत्येक विद्यार्थी की जिज्ञासा, प्रतिस्पर्धा एवं अवलोकन के स्तर को बनाए रखने के साथ-साथ उसमें उत्तरोत्तर प्रगति के लिए प्रतिबद्ध है। प्रत्येक क्लासरूम में रंग-बिरंगी रुचिकर बाल साहित्य से सजी लाइब्रेरी है जो बच्चों को पुस्तकों से जोड़ेगी और उन्हें अपनी रुचि के अनुसार कुछ पढऩे के लिए प्रेरित करेगी। इससे बच्चों का स्क्रीन टाइम (मोबाइल या टीवी पर बिताया जाने वाला समय) स्वयं ही कम हो जाएगा।
बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए प्रतिमाह हेल्थ चेकअप के साथ ही समयबद्ध टीकाकरण किए जाने का भी व्यवस्था की गई है। स्कूल द्वारा महीने में कम से कम दो बार बच्चों के पालकों के साथ परामर्श बैठकें की जाएंगी। हम बच्चों को पढऩे का उपयुक्त परिवेश देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। बच्चों के समुचित, संतुलित एवं पूर्ण शारीरिक विकास के लिए स्कूल में आंतरिक मिनी जिम की व्यवस्था है। इसका लाभ बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में भी मिलेगा। इसके अतिरिक्त बच्चों के लिए प्ले स्टेशन, हॉर्स राइडिंग (घुड़सवारी), आर्चरी (तीरंदाजी) एवं अन्य एडवेंचर स्पोट्र्स की भी व्यवस्था की गई है। एडवेंचर स्पोट्र्स के अन्य आकर्षणों में रॉक क्लाइंबिंग एवं रोप क्लाइंबिंग भी शामिल है जो बच्चों के कोर स्ट्रेंथ को विकसित करेगा।शाला परिसर में एक टॉय ट्रेन (छोटी रेलगाड़ी) है जो बगीचे के चक्कर लगाएगी। चारों तरफ हरियाली, विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधे बच्चों को प्रकृति से जोड़ेगी। यहां बच्चों का परिचय लगभग सभी पालतू एवं जंगली जानवरों से होगा जिससे उन्हें प्रकृति को समझने में मदद मिलेगी।
बच्चों को यातायात के नियमों से परिचित कराने एवं उनमें ड्राइविंग स्किल्स विकसित करने के लिए बैटरी ऑपरेटेड कार, जीप एवं स्कूटी स्कूल में उपलब्ध है। शारीरिक एवं मानसिक संतुलन स्थापित करने तथा इसे एक्टिविटी से जोडऩे के लिए म्यूजिक एंड डांस स्टूडियो है। ड्राइंग एवं पेंटिंग के साथ-साथ बच्चे संगीत एवं नृत्य को भी बतौर हॉबी सीख पाएंगे।स्कूल में बच्चों की सुरक्षा के लिए अनेक उपाय किये गये हैं। पूरा स्कूल परिसर सीसी टीवी कैमेरा की निगरानी में रहेगी जिसकी मानीटरिंग मल्टी लेवल पर की जाएगी। इसके अलावा शाला परिसर में तीन फीट की ऊंचाई तक दीवारों की पैडिंग की गई है ताकि टकराने पर भी बच्चों को चोट न लगे। फर्नीचर्स की किनारियों पर भी सुरक्षा परत है। डोर सेफ्टी का भी ख्याल रखा गया है।श्रीमती विरुलकर ने बताया कि यह स्कूल इसी शिक्षा सत्र से शुरु होने था लेकिन कोरोना काल के कारण विलंब होने से यह सत्र आगामी वर्ष 2021-22 से शुरु होगा। इसकी सारी प्रक्रियाएं अपने अंतिम चरण में है। पत्रकारवार्ता के दौरान मुनमुन चटर्जी, श्वेता भाटिया, अर्चना त्रिपाठी, अमित सर, जुनेटों से हरिश शर्मा उपस्थित थे।
रायपुर / शौर्यपथ / कोरोना के कारण लगाये गये लॉकडाउन पीरियड में समाज के बुजुर्गो, दिव्यांगजनों और निराश्रितों को राहत पहंुचाने छत्तीसगढ़ सरकार ने विशेष प्रयास किये हैं। पूरे राज्य के साथ बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में भी नियमित पेंशन राशि समय पर उपलब्ध कराने के अलावा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के अंतर्गत भी 44 हजार 978 हितग्राहियों को लाभान्वित किया गया है। प्रति हितग्राही एक हजार रूपये के मान से 5-5 सौ रूपये दो किश्तों में लगभग 4 करोड़ 50 लाख रूपये हितग्राहियों के खाते में जमा किये गये हैं। समाज के संवेदनशील तबके से जुड़े होने की वजह से उन्हें नगद संगवारी के सहयेाग से उनके गांव एवं घर पर जाकर राशि मुहैया कराई गई है। लॉकडाउन अवधि में सहज तरीके से घर पहंुच पेंशन सेवा प्रदाय करने वाले जिले के नगद संगवारी परियोजना को काफी सराहना मिली है।
लॉकडाउन की अवधि में लोगों के लिए बैंक जा कर पैसा आहरण करना कठिन था। ऐसी स्थिति में नगद संगवारी पेंशनधारियों के लिए लाईफलाईन साबित हुए हैं। जिले में सक्रिय 320 नगद संगवारियों ने कोरोना संक्रमण की विषम परिस्थिति में भी पेंशनधारियों के घर-घर जाकर लगभग 5 करोड़ 60 लाख रू राशि का नगद भुगतान किया है। जिससे दिव्यांग एव बुर्जुग पंेशनधारियों को आवागमन में होने वाली परेशानियों तथा बैंको के बाहर लम्बी-लम्बी कतारो से छुटकरा मिला है।
कोरोना काल में समाज कल्याण विभाग के संरक्षण में जिले के दिव्यांग समूह भी जागरूकता फैलाने में समान रूप से सक्रिय रहे। संगी-साथी दिव्यांग समूह, लाहोद, अन्नपूर्णा दिव्यांगसमूह, लटुवा, सक्षम दिव्यांग समूह, ताराशिव ने कोरोना से बचाव के लिए ढेरों मास्क सिलाई कर तैयार किये। उन्होंने गांव में घर-घर, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, किराना दुकानदारों, सब्जीवालो, कोटवार आदि को लगभग 3 हजार 500 मास्क का निःशुल्क वितरण किया गया। विभाग की पहल पर मास्क की बेहतर क्वालिटी को देखते हुए सरकारी विभागों द्वारा दिव्यांग समूह से 17 हजार से अधिक मास्क की खरीददारी की गई है, जिससे समूहों का लगभग 1 लाख 90 हजार रूपये का व्यवसाय हुआ है। दिव्यांग समूह के संचालक श्री राम पटेल का कहना है कि प्रशासन के इस प्रकार सहयोग से दिव्यांग साथियों को लॉकडाउन अवधि में संकट के समय में स्वरोजगार के अवसर प्राप्त हुआ और आत्मनिर्भरता मिली है।
समाज कल्याण विभाग द्वारा स्थानीय निकायों एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के सहयोग से 1लाख 70 हजार से अधिक निराश्रितों, जरूरतमंदों एवं प्रवासी श्रमिकों हेतु सूखा राशन सामग्री एवं भोजन पैकेट की व्यवस्था की गई। इनमें 212 दिव्यांगजन एवं 46 तृतीय लिंग समुदाय के लोग शामिल थे। इन्हें 15 किलो चॉवल, 02 किलो दाल,तेल,साबुन,मसाले और हरी सब्जी का पैकेट बना कर प्रदान किया गया। कोरोना अवधि में विभागीय योजनार्गत 67 परिवारो को राष्टीªय परिवार सहायता के तहत 13 लाख 40 हजार रू का बैंक खाते के माध्यम से वितरण किया गया। 11 दिव्यंाग नवदम्पत्ति को निःशक्त विवाह प्रोत्साहन अन्तर्गत 6 लाख रूपए की सहायता राशि प्रदाय की गई। नोवल कोरोना वायरस कोविड-19 का वृ़द्धजनो में तेजी से होने वाले संक्रमण को ध्यान मे रखते हुए वृद्धाश्रम मे विशेष सावधानी बरती गई हेै।
रायपुर / शौर्यपथ / हौसले और स्वावलंबन से शारीरिक अक्षमता को भी हराया जा सकता है। जगदलपुर के गंगानगर वार्ड निवासी निवासी दिव्यांग संतोष के इसी हौसले को मुख्यमंत्री युवा स्व-रोजगार का संबल मिला और अब उन्होंने दिव्यांगता को अपने हौसले के सामने विफल कर दिया है। दोनों पैरों से दिव्यांग संतोष कुमार शर्मा ने हिम्मत की और अपने वार्ड में ही किराना दुकान को अपनी आय का जरिया बनाया। छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें मुख्यमंत्री युवा स्व-रोजगार योजना के तहत प्रशिक्षण और एक लाख का ऋण देकर उनके व्यवसाय को आगे बढ़ाने में सहयोग किया। इससे दिव्यांग संतोष का जीवन आत्मनिर्भर हो गया है। वह खुद के साथ अपने परिवार का भी पालन-पोषण करने में सक्षम बन गए हैं।
संतोष जन्म से एक वर्ष बाद से ही दोनों पैरों से चलने में असमर्थ हो गए। उनकेे पिता श्री रामजुलन मजदूरी कर परिवार का पूरे पालन-पोषण करते थे। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पैसों की तंगी देखते हुए श्री संतोष ने 12 वीं तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद 06 हजार की जमा पूंजी से एक किराना दुकान शुरू किया। कम बजट के कारण व्यवसाय कम चलता था। इसी बीच संतोष शर्मा को जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र से संचालित मुख्यमंत्री युवा स्व-रोजगार योजना की जानकारी मिली, उन्होंने उद्योग केंद्र से संपर्क किया। उद्योग अधिकारियों ने उन्हें मार्गदर्शन दिया और उनके निवेदन पर किराना व्यवसाय के लिए ऋण प्रकरण तैयार कर बैंक को प्रेषित किया। बैंक से एक लाख का ऋण स्वीकृत किया गया।
जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र द्वारा संतोष को एक सप्ताह का उद्यमिता प्रशिक्षण भी दिया गया जिससे उन्हें व्यवसाय चलाने संबंधी नई जानकारियां मिली। प्रशिक्षण के बाद योजना के अनुसार उद्योग विभाग ने 15 हजार मार्जिन मनी अनुदान स्वीकृत किया। बैंक द्वारा फरवरी 2020 में उन्हें 01 लाख रूपए का ऋण दिया गया। एक लाख रूपये की लागत से उन्होंने किराना एवं डेली नीड्स का शहर के गीदम रोड़ में प्रारंभ किया। व्यवसाय से अब उन्हें पर्याप्त आय हो रही है। इससे वे बैंक को 26 सौ रूपए की ऋण की किश्त नियमित जमा करते हुए अपने परिवार का भरण पोषण भी कर रहे हैं। युवाओं हेतु स्वरोजगार योजना को लाभकारी बताते हुए श्री संतोष कहते है कि ’काम ढूंढने वाले नहीं, काम देने वाले बनें’।
रायपुर / शौर्यपथ / खाद्य मंत्री अमरजीत भगत ने प्रदेश की सभी शासकीय उचित मुल्य की दुकानों में सी.सी.टी.व्ही कैमरा शीघ्र लगाने के निर्देश दिए हैं। श्री भगत ने आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित सभी जिलों के खाद्य अधिकारियों की बैठक में खाद्यान्न भण्डारण और वितरण की समीक्षा की। उन्होंने राज्य के सभी पहुंचविहीन क्षेत्रों की राशन दुकानों में खाद्यान्न भण्डारण और वितरण की जानकारी ली और तीन दिन के भीतर चार माह के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न भण्डारण करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने सभी राशन कार्डधारी परिवारों के सदस्यों की आधार सिडिंग शीघ्र करने को कहा है, ताकि अगस्त माह में वन नेशन वन राशन कार्ड योजना छत्तीसगढ़ मंे भी शुरू की जा सके। उन्होंने कहा कि राज्य के सभी राशन दुकानों की दीवारों को तिरंगा कलर से पोताई करने के निर्देश दिए गए थे। जिन दुकानों में पोताई का कार्य नहीं हो पाया है, उन दुकानों में एक सप्ताह के भीतर पोताई कराने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि तिरंगा कलर में पोताई होने से प्रदेश की राशन दुकानों में एकरूपता आएगी और अंजान व्यक्ति भी देखकर पहचान जाएगा राशन दुकान को।
मंत्री ने राशन दुकानों का युक्तियुक्तकरण करने के भी निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि 8 लाख से अधिक एपीएल परिवारों के राशन कार्ड बनाए गए हैं। राशन कार्डाें की संख्या बढ़ने से राशन दुकानों की संख्या भी बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक ग्राम पंचायतों में एक-एक राशन दुकान एवं शहरी क्षेत्रों के वार्डाें में आवश्यकता के अनुरूप एक या दो राशन दुकान खोले जाए, जहां नए राशन दुकान खोलने की जरूरत हो उसका प्रस्ताव शीघ्र देने को कहा है। मंत्री भगत ने कहा कि नए राशन दुकान में तिरंगा कलर से पोताई और सीसीटीव्ही कैमरा लगाने के बाद ही दुकान का संचालन शुरू किया जाए। श्री भगत ने प्रदेश के जिन उचित मूल्य की दुकानों की शिकायतें आयी है, उसका तत्काल निराकरण करने के निर्देश दिए हैं। श्री भगत ने खाद्य विभाग द्वारा कोरोना काल में लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने के कार्य को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि विषम परिस्थितियों में भी नागरिकों एवं प्रवासी श्रमिकों को समय पर राशन उपलब्ध कराया गया वह बड़ी उपलब्धि है।
खाद्य विभाग के सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह ने बताया कि राज्य के शहरी क्षेत्रों के 50 प्रतिशत से अधिक उचित मूल्य की दुकानों में सीसीटीव्ही कैमरा लगाए जा चुके हैं। सभी दुकानों में एक सप्ताह के भीतर सीसीटीव्ही कैमरा लगवाने के निर्देश जिला खाद्य अधिकारियों को दिए गए हैं। राशन दुकानों में सीसीटीव्ही कैमरा लगने के बाद सॉफ्टवेयर के माध्यम से उपभोक्ता मोबाईल पर अपने राशन दुकानों को देख सकेेंगे और राशन दुकान खुली या बंद होने की जानकारी घर बैठे ले सकेंगे। इसके माध्यम से सभी उचित मूल्य की दुकानों में होने वाली गतिविधियोें की जानकारी भी मिलेगी और इसकी मॉनिटरिंग भी आसानी से हो सकेगी। बैठक में विशेष सचिव मनोज सोनी, एमडी मार्कफेड सहित अन्य अधिकारी मौजूद थे।
आजकल लोग बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाने के बजाए गूगल की शरण में जा रहे हैं। यहां वे अपने लक्षणों के आधार पर बीमारी के बारे में सर्च कर रहे हैं और उसका निदान जानने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन एक शोध में खुलासा किया गया है कि तीन में से दो लोगों को गूगल पर गलत जानकारी मिलती है।
यह ट्रेंड उनकी सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। यह शोध ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में स्थित एडिथ कोवान विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने किया। इसके लिए उन्होंने 36 से अधिक अंतरराष्ट्रीय वेब-आधारित लक्षण की जांच करने वाली वेबसाइट्स का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि लक्षण के आधार पर रोग की पहचान वाले मामले केवल 36 फीसदी ही सही पाए गए। यही नहीं सिर्फ 52 फीसदी मामलों में ही बीमारी की सही जानकारी को सर्च रिजल्ट में शीर्ष तीन में दर्शाया गया।
गूगल द्वारा चिकित्सकों के पास जाने की चेतावनी भी आधे से ज्यादा मामलों में गलत पाई गई। केवल 49 फीसदी मामलों में ही डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी गई।
49 % लोगों को ही डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी गई
36 % लक्षण के आधार पर रोग की पहचान वाले मामले सही मिले
कई बीमारी पता नहीं होती-
शोध बताता है कि ऐसी वेबसाइटों के पास स्थानीय बीमारियों का डाटा नहीं होता। ऑस्ट्रेलिया में वे रॉस रिवर फीवर और हेंड्रा वायरस को नहीं पहचान पाते। डाटा के आधार पर शोधकर्ताओं ने कहा कि इमरजेंसी के दौरान चिकित्सकों से मिलने की सलाह सिर्फ 60 फीसदी मामलों में ही सही पाई गई।
यह एक सिंड्रोम है-
अधिकांश लोग साइबरक्रॉ्ड्रिरयाक सिंड्रोम के शिकार होते हैं। इसके तहत सिरदर्द या बीमारी का पहला लक्षण दिखते ही गूगल पर सर्च करना शुरू कर देते हैं। लेकिन, हकीकत यह है कि इन वेबसाइट या एप को बहुत सावधानी से देखना चाहिए, क्योंकि आपकी मेडिकल हिस्ट्री इन्हें नहीं पता होती।
कोरोना के बाद इजाफा-
कोरोना संकट के बाद छोटी-मोटी बीमारियों जैसे पेट दर्द या हल्के जुकाम से पीड़ित लोग भी डॉक्टरों के पास जाने से बच रहे हैं। वे गूगल पर ही लक्षणों की पहचान करवाने वाले लोगों से बीमारी का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी संख्या में अचानक इजाफा हुआ है।
डॉक्टर का कोई विकल्प नहीं-
शोधकर्ता मिशेला हिल ने कहा, ये प्लेटफॉर्म डॉक्टर का विकल्प नहीं हो सकते। ये सिर्फ सुरक्षा की झूठी भावना प्रदान कर सकते हैं।
इन्हें सबसे ज्यादा खोजा गया-
-लगातार खांसी और बुखार
-डायबिटीज के लक्षण
-उच्च रक्तचाप के लक्षण
-पेट दर्द
धर्म संसार /शौर्यपर्थ / आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष त्रयोदशी के दिन माता पार्वती को समर्पित जया-पार्वती व्रत किया जाता है। विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किए जाने वाले इस व्रत के प्रभाव से अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान प्राप्त होता है। अविवाहित लड़कियों द्वारा इस व्रत के रहने से शीघ्र ही विवाह होता है और भरा पूरा परिवार मिलता है। सुखमय जीवन के लिए विवाहित स्त्रियों को यह व्रत अवश्य रखना चाहिए। इस पावन व्रत का पुण्य वट सावित्री व्रत के समान माना जाता है। इस व्रत को विजया पार्वती व्रत भी कहा जाता है।
मान्यताओं के अनुसार इस व्रत का रहस्य भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को बताया था। इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की विधि विधान से पूजा अर्चना करें। मां पार्वती का ध्यान कर सुख-सौभाग्य और गृह शांति के लिए सच्चे मन से प्रार्थना करें। घर के मंदिर में भगवान शिव-माता पार्वती की मूर्ति स्थापित करें। इस व्रत में नमक का सेवन पूरी तरह से वर्जित माना जाता है। व्रत में गेहूं का आटा, सब्जियां भी नहीं खानी चाहिए। व्रत के दौरान फलाहार कर सकते हैं। इस व्रत के प्रभाव से संतान की प्राप्ति होती है। श्रद्धापूर्वक जया पार्वती व्रत का विधि-विधान से पालन करने से माता पार्वती प्रसन्न होती हैं और हर मनोकामना पूर्ण करती हैं। व्रत समाप्ति के एक रात पहले रात्रि जागरण करना चाहिए। इसे जयापार्वती जागरण कहते हैं।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / कहते हैं आप जीवन के किसी भी कठिन दौर से क्यों न गुजर रहे हो लेकिन आपको संभालने के लिए उम्मीद की एक किरण ही काफी है। जैसे, आपका मूड कितना भी खराब क्यों न हो लेकिन कुछ विचार या छोटी-छोटी बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर हमारी उदासी हट जाती है और हम सकारात्मकता से भर जाते हैं। एक नजर डालते हैं ऐसे ही ऊर्जावान विचारों पर जो जीवन की किसी भी तरह की निराशा हावी होने पर आपको सकारात्मकता से भर देगी-
आपकी कल्पना ही आपकी सीमा है
कहते हैं आपको जब तक कोई नहीं रोक सकता जब तक कि आप अपनी सीमा निर्धारित न कर लें। ऐसे में आपको अपनी कल्पनाओं में हमेशा कुछ बड़ा सोचना है, जिससे कि आपमें कुछ अच्छा करने और आगे बढ़ने की ललक बने रहे।
छोटी-छोटी चीजें आपके अच्छे दिन लाती हैं
आज जो काम आपको छोटा लग रहा है, वो एक दिन आपको दुनिया भर में पहचान दिलाएगा।ऐसे में छोटे-छोटे प्रयासों को बिल्कुल बंद न करें। हमेशा जीवन की छोटी-छोटी चीजों को पूरा करते हुए बड़े अर्थ साधें।
संघर्ष में अपनी ताकत तलाशें
आप जीवन में संघर्षों को परेशानियां नहीं बल्कि अपनी ताकत तलाशने के मौकों के रूप में देंखे। आप पाएंगे कि हर संघर्ष को पार करने के बाद आपका व्यक्तित्व काफी अच्छा हो जाएगा।
बीते हुए कल को आज पर हावी न होने दें
आपको बीते हुए कल को आज पर हावी नहीं होने देना है। हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘जो बीत गई वो बात गई’ पर अमल करते हुए नए सिरे से हर दिन जीवन की नई शुरुआत करें।
चिकन या मटन बिरयानी तो आपने कई बार खाई होगी, अब अपनी बिरयानी डिश में कुछ नई रेसिपीज को जोडऩा चाहते हैं, तो आप फिश बिरयानी भी ट्राई कर सकते हैं। आइए, जानते हैं इसकी रेसिपी-
सामग्री :
मछली 750 ग्राम,
बासमती चावल 500 ग्राम (30 मिनट तक भीगे हुए),
दही– 01 कप (फेंटा हुआ),
प्याज 04 (बारीक कटा हुआ),
हरी मिर्च 06 (बारीक कटे हुए),
हरी धनिया 01 गड्डी (कटी हुई),
नींबू का रस 01 छोटा चम्मच,
अदरक-लहसुन पेस्ट 02 छोटे चम्मच,
तेल आवश्यकतानुसार।
विधि :
फिश बिरयानी बनाने के लिए सबसे पहले मछली को अच्छी तरह से साफ करके धो लें। उसके बाद आधा दही एक बाउल में निकालें और उसमें नींबू का रस और अदरक लहसुन का पेस्ट मिला लें। तैयार मिश्रण को मछलियों के ऊपर डाल कर उसे अच्छी तरह से लपेट लें और ढक कर रख दें।
अब भीगे हुए चावल को धो कर एक बर्तन में निकाल लें। उसमें जरूरत भर का पानी और थोड़ा सा नमक मिलाएं और उसे 75 त्न तक पका लें।
एक कड़ाही में थोड़ा सा तेल डाल कर उसे गर्म करें। तेल गर्म होने पर उसमें प्याज डालें और सुनहरा होने तक भून लें। इसके बाद कड़ाही में टमाटर और बचा हुआ दही डालें और पांच मिनट तक पका लें।
जब टमाटर नरम हो जाए, उसमें मछली के पीस और हरी मिर्च डाल दें और आंच को धीमी करके चलाते हुए पकाएं। जब मछली अच्छी तरह से सिक जाए, कड़ाही को गैस से उतार कर अलग रख दें।
अब एक पैन लेकर उसे गैस पर धीमी आंच पर रखें। पैन में सबसे पहले एक तिहाई पका हुआ चावल डालें। उसके ऊपर से आधी मछली और आधी धनिया की पत्ती डालें और बराबर फैला दें। फिर उसके ऊपर से एक तिहाई चावल की लेयर बना कर डाल दें।
अब चावल के ऊपर बची हुई मछली डाल कर ऊपर से बचे हुए चावल की लेयर लगा दें। अब पैन को ढक कर लगभग 15 मिनट तक पकाएं उसके बाद बिरयानी को अच्छी तरह से चला कर मिक्स कर लें और गैस को बंद कर दें।
आपकी आपकी बिरयानी तैयार है। बस इसे हरी धनिया से गार्निश करें और अचार अथवा चटनी के साथ गर्मा-गरम परोसें।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
