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मेरी कहानी / शौर्यपथ / बहुत अमीर होते हैं वे लोग, जो नजरों से भी प्यार लुटाते चलते हैं और जिस पर प्यार की एक नजर पड़ जाए, तो उससे खुशनसीब कोई और नहीं होता। इसलिए कहा गया है कि मां सबसे अमीर होती है और उसके आंचल में बच्चे सबसे खुशनसीब। हालांकि यह भी कुदरत का स्याह करिश्मा ही है कि कोई मां प्यार के मामले में कंगाल हो, तो उसका बच्चा जाहिर है, बदनसीब ही होगा। पर ऐसी भी क्या बदनसीबी कि ममता भरी एक नजर के लिए दिल तरस जाए! मां या पिता, दोनों में से कोई तो निगाह भर देख ले, तो चैन आ जाए। सेना में रह चुके सेल्समैन पिता घर से ऐसे निकलते थे कि मानो उनकी सारी जिम्मेदारियां बाहर ही बसती हों और अभिनेत्री मां घर ऐसे लौटती थीं, मानो एक पैर बाहर ही रह गया हो।
संसाधनों की कोई कमी न थी, लेकिन एक धाय भरोसे बच्चे पल रहे थे। मां और पिता जब कभी मिलते थे, तब पता चलता था कि दुश्मनी क्या होती है। खुलकर लड़ाई होती थी, पास-पड़ोस तक गालियों की गंदगी बरसती थी। जिन हाथों को पुचकारने का धर्म निभाना था, वही हाथ ऐसे उठते थे कि लगता था, पिता पहले विश्व युद्ध से लौटे नहीं हैं, अभी वहीं दो-दो हाथ कर रहे हैं। सुधरने के आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आते थे। परस्पर प्रेम और समर्पण के अभाव ने माता-पिता को बेरहम बना दिया था और यह आफत बच्चों पर भी समान रूप से बरसती थी। शारीरिक हिंसा से कई गुना ज्यादा मानसिक हिंसा से वह बच्चा मार्लन गुजर रहा था। सोचता रहता कि मां और पिता का ध्यान अपनी ओर कैसे खींचा जाए? ऐसा क्या किया जाए कि उनकी एक निगाह मिल जाए? वे देखने को मजबूर हो जाएं और उन्हें अपनी तंग जिंदगी में अपने बच्चे से भी कुछ खुशी नसीब हो। वैसे मार्लन को पता था कि माता और पिता अपनी-अपनी दुनिया में हर मुमकिन मनमानी करते हुए बहुत खुश हैं। उन्हें बच्चों की परवाह नहीं, लेकिन ऐसा क्या किया जाए कि दो पल वे अपने बच्चों के साथ भी बिताएं?
एक दिन मां घर में बैठी मिल गईं और मार्लन ने अपनी नई योग्यता का प्रदर्शन शुरू किया, ताकि मां नजर भर देख लें। मार्लन ने उस गाय का अभिनय शुरू किया, जो मां को प्यारी थी। मां ने अपने बेटे की हरकतों को नजर उठाकर देखा और उनकी आंखों में खुशी छलक आई। बेटा तो हर्ष से निहाल हो गया। सबसे बड़ी बात थी कि उसने कुछ ऐसा किया, जो मां को पसंद आया और मां ने देखा। उस ग्यारह साल के बच्चे का दिल बाग-बाग हो गया। एक राह मिली कि अभिनय ही वह कला है, जिस पर मां रीझ सकती हैं। गाय का अभिनय कर खुशी मिली, तो चस्का लग गया। फिर कभी घोडे़ का अभिनय, तो कभी किसी पड़ोसी बच्चे का अभिनय, एक सिलसिला चल पड़ा।
कभी-कभी पिता भी देख लेते थे, लेकिन कभी तारीफ नहीं करते थे। अपने बेटे को हमेशा नाकारा साबित करते थे। साफ कहते थे, तुम जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते। तारीफ तो मां भी नहीं करती थीं, कभी देख भर लेतीं, तो भी कमाल हो जाता। मार्लन को पता चल गया कि ध्यान खींचना है, तो बेहतर से बेहतर अभिनय करो, जान डाल दो, जिसे निभा रहे हो, उस किरदार को जी जाओ। और यह सब किसलिए? बस प्यार भरी एक नजर के लिए। मां और पिता के लिए। खुशी के चंद लम्हों के लिए। ऐसे लम्हे, जिनकी बुनियाद पर दुनिया का सबसे शानदार अभिनेता खड़ा हुआ।
आज मनोरंजन की दुनिया में शायद ही कोई ऐसा होगा, जो अभिनेता मार्लन ब्रैंडो (1924-2004) को नहीं जानता होगा। बड़े परदे पर गॉडफादर और अन्य अनेक किरदारों को साकार कर देने वाले मार्लन ने बचपन की तड़प व त्रासदी को अपना कलात्मक हथियार बना लिया। बिगड़ैल पिता को भले सुधार न सके, लेकिन एक दिन वह आया, जब पिटती हुई मां के पक्ष में जा खड़े हुए और पिता की कनपटी से पिस्तौल लगाकर कहा, ‘देखो, यह आखिरी बार है, अब कभी हाथ मत लगाना, वरना छोड़ूंगा नहीं’। जब कभी परदे पर गुस्सा दिखाने की जरूरत पड़ती, तो मार्लन अपने पिता को याद कर लेते थे और गुस्सा अनायास फट पड़ता था। हालांकि उन्होंने सफल होने के बाद पिता को फिल्म निर्माता बनाया और उनकी जरूरतों का पूरा ध्यान भी रखा, लेकिन पिता की मौत के बाद वह अक्सर हंसते हुए कह देते थे कि वह आदमी कुछ सेकंड के लिए भी सामने आ जाए, तो मैं उसका जबड़ा तोड़ दूंगा। और जिस साल मार्लन को अभिनय के लिए पहला ऑस्कर अवॉर्ड मिला, उसी साल दुनिया से जाते-जाते मां को एहसास हुआ कि बच्चों को पालने में बड़ी कमी रह गई। उन्होंने अफसोस का इजहार किया, लेकिन क्या फायदा? जब जो होना था, हो चुका था।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय मार्लन ब्रैंडो, अमेरिकी अभिनेता और निर्देशक
शौर्यपथ / उनके सामने दो विकल्प थे- किसी पुरअम्न मुल्क में एक खुशहाल जिंदगी और दूसरा, अपने गरीब व नाकाम देश (सोमालिया) में लौटकर खौफ व दुश्वारियों के बीच जीना। डॉक्टर हौवा अब्दी ने अपने वतन से वफा का रास्ता चुना। और बड़ी बात यह कि उन्हें अपने इस फैसले पर कभी अफसोस नहीं हुआ। तब भी नहीं, जब एक आतंकी समूह के सैकड़ों गुर्गों ने उनके अस्पताल पर हमला कर दिया था।
सन 1947 में मोगादिशु के एक खाते-पीते परिवार में हौवा पैदा हुईं। पिता खुद शिक्षित थे, इसलिए उन्होंने अपनी बेटियों को स्कूल भेजने में कभी कोताही नहीं की। मगर जब हौवा 12 साल की थीं, प्रसव के दौरान उनकी मां की मौत हो गई। वेदना से छटपटाती मां का चेहरा हौवा के भीतर जैसे नक्श हो गया। काश! उनकी मां को कोई डॉक्टर बचा लेता।
महज 12 साल की हौवा पर अचानक चार छोटी बहनों की देखरेख की जिम्मेदारी आ पड़ी। दादी थीं, मगर उम्रदराज होने के कारण जल्दी ही थक जाती थीं। ऐसे में, हौवा ने सारी जिम्मेदारियां निभाते हुए खुद से एक वादा किया कि वह पढ़-लिखकर डॉक्टर ही बनेंगी, ताकि किसी की मां को यूं मरने से बचा सकें। पढ़ने में तो वह शुरू से ही जहीन थीं, अब उसके साथ एक बड़ा मकसद आ जुड़ा था।
सन 1964 की बात है। हौवा तब 17 साल की थीं। हायर सेकेंडरी की तालीम मुकम्मल हो रही थी और यहीं से उन्हें अपने सपने की तरफ मुुड़ना था। संयोग से उसी वक्त उन्हें तत्कालीन सोवियत संघ का वजीफा मिल गया और वह मास्को पहुंच गईं। और फिर वहां से कीव। कीव अब यूके्रन की राजधानी है। वहां पर मेडिकल की पढ़ाई के दौरान ही उनकी मुलाकात अदन मोहम्मद से हुई। अदन भी सोमाली थे। वहीं पढ़ रहे थे। दोनों ने 1973 में शादी कर ली।
कीव से स्नातक और स्त्री रोग में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद हौवा वापस अपने मुल्क लौट आईं और यहां सरकारी अस्पतालों में उन्होंने काम करना शुरू कर दिया। इस दौरान वह दो बेटी और एक बेटे की मां बन चुकी थीं। जिंदगी ठीक गुजर रही थी, मगर देश की स्वास्थ्य सेवाओं की हालत देख हौवा बहुत दुखी रहती थीं। सोमालिया में अस्पताल बहुत कम थे और मरीज ज्यादा। गरीबी, भूख, कुपोषण ने तो जैसे इस भूखंड से गहरी नातेदारी पाल ली है। खैर, जब भी किसी महिला के प्रसव के दौरान मरने की खबर सुनतीं, तो हौवा बेचैन हो उठतीं। लगता, जैसे मां तड़प रही हैं।
लिहाजा 1983 में उन्होंने अपनी पैतृक जमीन पर एक कमरे का क्लिनिक शुरू किया। सोमालिया के तत्कालीन राष्ट्रपति ने खुद उन्हें इसकी इजाजत दी थी। हौवा अब आसपास की खानाबदोश, कबाइली औरतों को प्रेरित करने लगीं कि वे उनके पास सुरक्षित प्रसव के लिए आएं। मुफ्त, किफायती इलाज और काबिलियत ने हौवा को दूर-दूर तक मशहूर कर दिया। मगर 1991 में सोमालिया गृह युद्ध की चपेट में आ गया। इसके बावजूद हौवा मानव सेवा से नहीं डिगीं। 5 मई, 2010 की सुबह लगभग 750 लड़ाकों ने हौवा अब्दी अस्पताल पर धावा बोल दिया। हौवा कुछ समझ पातीं, उसके पहले ही उनकी कनपटी से बंदूक सटाकर एक आतंकी गरज उठा- ‘तुम क्यों अस्पताल चला रही हो? अव्वल तो तुम औरत हो, और फिर बूढ़ी भी। इसे फौरन बंद करो।’
हौवा ने गौर किया, किशोरवय के ये गुर्गे उस समूह के थे, जो हाथ काट डालने और व्यभिचार के आरोपियों को पत्थर मार-मारकर मौत के घाट उतार देने के लिए कुख्यात है। फिर भी उन्होंने पूरे साहस के साथ कहा, ‘मैं अपना अस्पताल नहीं छोड़ूंगी। अगर मरूंगी भी, तो अपनों के बीच और पूरी गरिमा के साथ।’ आतंकियों ने कई दिनों तक अस्पताल को अपने कब्जे में रखा। इस बीच कई बच्चे इलाज के अभाव में मर गए। फिर तो आस-पास की सैकड़ों औरतें हौवा के समर्थन में अस्पताल के इर्द-गिर्द जमा हो गईं। बढ़ते जन-आक्रोश और वैश्विक दबाव के आगे आतंकियों को झुकना पड़ा। वे न सिर्फ अस्पताल छोड़कर भागने को बाध्य हुए, बल्कि उन्होंने डॉक्टर हौवा से लिखित में माफी भी मांगी।
सन् 1983 में एक कमरे से शुरू हुए हौवा अब्दी अस्पताल में आज चार सौ बेड और तीन-तीन ऑपरेशन थिएटर हैं, उनकी दोनों बेटियां भी डॉक्टर बन चुकी हैं और हाथ बंटाती हैं। आधा दर्जन से अधिक डॉक्टरों और चालीस से अधिक नर्सों के साथ यह अस्पताल हजारों लोगों की खिदमत कर रहा है। इसके साथ ही गृह युद्ध में यतीम हुए बच्चों व बेवा औरतों के लिए भी हौवा ने पनाहगाह और स्कूल शुरू किए हैं। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वह अब तक करीब 90 हजार सोमाली लोगों की जिंदगी में उम्मीद की किरण लेकर आई हैं। इसके लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है।
एक सफल या सार्थक जिंदगी में से हौवा ने अपने लिए सार्थक जीवन चुना है। और उनके इस फैसले पर पूरी मानवता को फख्र होगा। सोमाली लोगों की ‘मामा हौवा’को काफी सारे लोग सोमालिया की मदर टेरेसा भी कहते हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह हौवा अब्दी, डॉक्टर व मानवाधिकारवादी
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारतीय चुनाव आयोग लोकसभा की एक सीट और विधानसभाओं की 56 सीटों पर उपचुनाव कराने को तैयार है, तो इससे पता चलता है कि महामारी की वजह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं रुकेगी। मंगलवार को आठ सीटों के लिए तय उपचुनाव को जब रद्द किया गया था, तब यह माना जा रहा था कि कोरोना के दौर में मतदान आधारित कोई चुनाव नहीं हो सकेगा। लेकिन यह साफ हो गया है कि जिन सीटों पर अब आयोग चुनाव के लिए तैयार है, उनमें वे आठ सीटें भी शामिल हैं। आठ सीटों को लेकर जल्दी इसलिए भी है, क्योंकि इनके लिए 7 सितंबर तक चुनाव हो जाने चाहिए। बाकी बची 49 सीटों के लिए सितंबर का पूरा समय है। सब कुछ ठीक रहा और स्थानीय प्रशासन ने कोई अड़ंगा नहीं लगाया, तो आयोग चुनाव प्रक्रिया तेज कर देगा। वैसे भी, बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियां चल ही रही हैं। समय पर चुनाव कराना आयोग की जिम्मेदारी है और अगर वह इसे निभाने को लालायित है, तो उसकी सराहना होनी चाहिए। हालांकि काफी कुछ सरकारों को भी तय करना है। अगस्त, सितंबर तक कोरोना जिन इलाकों में काबू में आ जाएगा, वहां तो ज्यादा परेशानी नहीं होगी, मगर उसी दौर में कोरोना चरम पर रहा, तो चुनाव टालने की नौबत आ सकती है। इतना तय है कि कोरोना के समय चुनाव कराने के लिए ज्यादा संसाधन, वाहन और सुरक्षा बलों की जरूरत पडे़गी। हर एक मतदान केंद्र पर बचाव के दिशा-निर्देशों की पालना कराना आसान नहीं होगा। लंबी लाइन और मतदाताओं की परस्पर दूरी को बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।
सर्वाधिक 27 सीटों पर मध्य प्रदेश में उपचुनाव होने हैं। मणिपुर में 11, गुजरात में आठ, तो उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल में चार-चार सीटें और झारखंड में भी दो सीटें खाली हैं। हरियाणा, छत्तीसगढ़ इत्यादि में भी सीटें खाली हैं। संविधान के तहत इन सीटों को खाली नहीं रखा जा सकता। रिक्त विधानसभा क्षेत्रों के नागरिकों के अधिकारों की बहाली और किसी सांविधानिक संकट से बचने के लिए चुनाव जरूरी हैं। हो सकता है, जो प्रतिनिधि ऐसे मुश्किलों के बीच से चुनाव जीतकर आएं, वे जनता के बेहतर सेवक साबित हों। हो सकता है, जो सरकारें कोरोना के दौर में बनें, वे शायद ज्यादा समर्पित और संवेदनशील हों।
एक बड़ी महामारी के समय चुनाव का दुर्लभ अनुभव देश को होने जा रहा है। विभिन्न पार्टियां वर्चुअल रैलियां आयोजित कर रही हैं। ऐसे में, अपेक्षित शारीरिक दूरी बरतते हुए भी लोगों से संपर्क करना और मतदान के लिए रिझाना कैसे संभव है, यह देखना दिलचस्प होगा। हो सकता है, विशाल रैलियों और जनसभाओं में होने वाली बेहिसाब भीड़ से प्रभावित होने का मौका न मिलने पर लोग अपने प्रतिनिधि के बारे में सही फैसला कर सकें। ऐसा नहीं है कि कोरोना के समय दुनिया में चुनाव बंद हो गए हैं। दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में कोरोना के समय में ही चुनाव हुए हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव 3 नवंबर को तय है और इसकी प्रक्रिया भी वहां शुरू हो चुकी है। दुनिया के जिम्मेदार लोकतंत्रों ने यह संकेत दे दिया है कि कोरोना की वजह से चुनाव नहीं रुकने वाले। किसी बहाने से चुनाव से बचना ठीक नहीं। कोरोना के समय सुरक्षित चुनाव कुछ महंगा पड़ सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल रखने के लिए हमें इस लागत से गुजरना होगा।
ओपिनियन / शौर्यपथ / आज ‘विजय दिवस’है। ठीक 21 बरस पहले हमने संसार के सबसे दुर्गम इलाकों में से एक में थोपी गई जंग जीतकर साबित कर दिया था कि हिन्दुस्तानियों के हौसले कभी पस्त नहीं होते। युद्ध-नीति के मुताबिक, हर जय-पराजय के अपने निश्चित सबक होते हैं। क्या नई दिल्ली के सत्ता-सदन ने इस अनुभव का पर्याप्त लाभ उठाया? लद्दाख की सीमाओं पर पसरे तनाव ने इस सवाल को बेहद मौजूं और धारदार बना दिया है।
पहले कारगिल की बात। इसकी जड़ें अतीत में धंसी हुई थीं। साल 1984 में सियाचिन की बर्फीली चोटियां गंवाने के बाद जनरल जिया के समक्ष तत्कालीन डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स-पाकिस्तान ने एक जवाबी कार्ययोजना पेश की। इस रणनीति के तहत पाकिस्तानी फौज को सर्दियों में कारगिल की चोटियों पर चढ़कर श्रीनगर-लेह राजमार्ग को काट देना था। जिया ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। वजह? उन दिनों वह अपने आका अमेरिका के साथ मिलकर अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को बाहर करने में लगे थे। उनके पास इस सवाल का जवाब नहीं था कि कारगिल के जवाब में अगर भारत ने समूचा युद्ध छेड़ दिया, तो रावलपिंडी का रक्षा प्रतिष्ठान दो मोर्चों के बीच सैंडविच तो नहीं बन जाएगा?
परवेज मुशर्रफ ने इसे नए संदर्भों में देखा। उनकी अगुवाई में फल-फूल रहे ‘गैंग ऑफ फोर’ ने पुरानी योजना को झाड़-पोंछकर नया जामा पहना दिया। परवेज मुशर्रफ इससे इतने मुतमइन थे कि बिना प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बताए, उन्होंने ‘नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री’ के जवानों को कूच के आदेश दे दिए। यह अभियान इतना गोपनीय रखा गया कि थल सेना के अन्य कमांडरों के साथ वायु सेना के आला अफसर तक इससे अनजान रहे। भारत ने जब अपनी सरजमीं खाली कराने के लिए हवाई हमले शुरू किए, तब वे हक्का-बक्का रह गए। समूचा सत्ता प्रतिष्ठान उनसे असहमत था, सेना के अन्य अंग अनभिज्ञ थे और भारतीय प्रतिक्रिया अनपेक्षित थी।
वे भारतीय वायु सेना की कार्रवाई का प्रतिरोध भी नहीं कर सकते थे। नई दिल्ली जो कर रही थी, अपनी जमीन पर कर रही थी। नियंत्रण रेखा लांघने का मतलब होता युद्ध, जिसके लिए वे उस समय तैयार न थे। यही नहीं, तब तक उन्होंने यह भी नहीं माना था कि भारतीय चौकियों पर कब्जा जमाए बैठे लोग उनके नियमित सैनिक हैं। जनरल मुशर्रफ किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए और नवाज शरीफ हताश। निराशा भरे माहौल में इन्हें 4 जुलाई, 1999 को ह्वाइट हाउस की चौखट चूमनी पड़ी। उस बैठक के दौरान बिल क्लिंटन की मुद्रा बेहद कठोर थी। शरीफ ने कुछ शर्तों के साथ वापसी की बात कही। क्लिंटन ने कहा कि आपकी कोई शर्त नहीं मानी जाएगी। पाकिस्तान की भलाई इसी में है कि उसके दस्ते शराफत से वापस चले जाएं। नतीजतन, पाक फौजियों को लौटना पड़ा था। इस प्रक्रिया में भी उनके तमाम फौजी मारे गए। मुशर्रफ का यह गुनाह बेलज्जत साबित हुआ।
मुझे याद है, उन दिनों भी समझदार लोग कह रहे थे कि इस जीत का उल्लास मनाइए, पर सबक भी सीखिए। हमारी सीमाएं विशाल और बहुआयामी हैं। इनकी हिफाजत के लिए हम अभी तक तैयार नहीं हैं। तब 1962 की चीन से हुई जंग को भी याद किया गया था। जुलाई 1999 से जुलाई 2020 तक एनडीए और यूपीए ने दस-दस बरस हुकूमत की, पर सीमा सुरक्षा के मामले में हम आज भी सौ फीसदी अंकों के अधिकारी नहीं हैं। चीन के इस अतिक्रमण ने कारगिल और मुंबई पर आतंकवादी हमले सहित तमाम पुराने जख्मों को हरा कर दिया है। हम चीन, पाकिस्तान और आतंक के हमसायों से तब तक नहीं जूझ सकते, जब तक कि सीमाएं सुरक्षित न हों।
चीन ने पिछले दिनों लद्दाख में वही तरीका अख्तियार किया, जो कारगिल में पाकिस्तान ने किया था। उनके सैनिक उस समय कारगिल की चोटियों पर जम चुके थे, जब अटल बिहारी वाजपेयी दोस्ती की बस लेकर लाहौर में अपना खैरमकदम करा रहे थे। चीनी राष्ट्रपति ने भी कुछ माह पूर्व 11 अक्तूबर, 2019 को चेन्नई के समीप मामल्लपुरम में भारतीय आतिथ्य का लुत्फ उठाया था। कभी पल्लव सम्राटों की आर्थिक राजधानी रहे इस शहर से चीन को भी तिजारत होती थी। लगा था, पुराने दिन लौट रहे हैं, पर कूटनीति भले मनोभावों की कीमत पर ही फलती-फूलती है।हालांकि, बीजिंग की नीयत में खोट पहले से ही नजर आ रही थी। इससे पहले डोका ला और उससे भी पहले दौलत बेग ओल्डी, दीपसांग में दोनों देशों की सेनाएं हफ्तों तक आमने-सामने रही थीं। हमें इसलिए भी सतर्क रहना चाहिए था, क्योंकि कई वर्षों से पीएलए के दस्ते वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास निर्माण कर रहे थे। उनके दस्ते ऐसी दुर्गम जगहों पर निरंतर अभ्यास कर रहे थे। इसीलिए संघर्ष के वक्त तैयारी के मामले में चीनी हमसे कहीं आगे थे।
यही वजह है कि जब वे अंदर आए, तो उन्हें वापस लौटाना कारगिल से कहीं ज्यादा दुष्कर साबित हो रहा है। अभी तक यह भी साफ नहीं हो सका है कि ये वापस लौटे हैं, तो कितना लौटे हैं? प्रधानमंत्री की घोषणा के बावजूद विपक्षी दल और कई अवकाश प्राप्त सैन्य व कूटनीतिक सेवा के अधिकारी इसे मानने को तैयार नहीं हैं। पर एक बात तय है कि शी जिनपिंग और उनकी सत्ता चौकड़ी को अंदाज नहीं था कि भारत इतनी दृढ़ता से पेश आएगा। 15 जून को गलवान में हमारे जवानों ने शहादत दी और अब जो आंकडे़ सामने आ रहे हैं, उससे जाहिर है कि चीनी सैनिकों को अधिक तादाद में हताहत होना पड़ा। तब से अब तक सीमा और कूटनीति के मोर्चे पर कोई कसर नहीं छोड़ी गई है।
ध्यान दें। आज की भांति कारगिल के मामले में भी भारतीय नेकनीयती जगजाहिर थी और इसका खामियाजा पाकिस्तान को उठाना पड़ा। उसने अमेरिका की हमदर्दी हमेशा के लिए खो दी और यह कहने का हक भी कि भारतीय भूमि पर खूंरेजी करने वाले लोग दहशतगर्द नहीं, बल्कि मुजाहिदीन हैं। अब यही हाल चीन का हो रहा है। उसे दुनिया भर में कडे़ प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका सहित पश्चिम के सारे देश उसकी हरकत के खिलाफ हैं। इंग्लैंड, जापान और तमाम देशों ने भारत की तरह चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए हैं। उसके उपनिवेशवादी विस्तार को रोकने का सबसे बढ़िया तरीका यही है कि हम बीजिंग की कारोबारी सत्ता पर चोट करें। विश्व बिरादरी यही कर रही है। क्या देंग जियाओ पिंग की नीति को हवा में उड़ा डालने वाले शी जिनपिंग भी वही गलती कर बैठे हैं, जो कभी जनरल अयूब खां और भुट्टो की जोड़ी अथवा जनरल परवेज मुशर्रफ ने की थी? चाहे जो हो, पर यह तय है कि हमें अपनी ऐतिहासिक भूलों से बचना होगा। भारत शताब्दियों से अपनी सीमाओं की निगहबानी के मामले में नादान साबित होता रहा है। यह आत्मघाती सिलसिला अब थम जाना चाहिए।शशि शेखर
भिलाई / शौर्यपथ / भिलाई इस्पात संयंत्र की नब्ज के रूप में काम करने वाला विभाग है, इन्टीग्रेटेड कंट्रोल सिस्टमजिसे हम इंकास विभाग के नाम से जानते हैं। इस विभाग का प्रमुख कार्य है फाइबर ऑप्टिक डेटा नेटवर्क का रखरखाव, पीएलसी आधारित सिस्टम का मेंटेनेंस, हॉट शॉप्स व मिल्स में प्रोसेस ऑटोमेशन को चलाने हेतु पीएलसी स्पेयर्स की खरीदी, विभिन्न ब्रेकडाउन्स का निराकरण आदि।
इंकास की शुरुआत वर्ष 1986 में हुई। यह विभाग हमारे संयंत्र में प्लांट स्वचालन और कम्प्यूटरीकरण तथा डेटा संचार के क्षेत्र में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। 1986 से पहले, संयंत्र में अधिकांश उपकरण कंप्यूटर संगत नहीं थे। परन्तु संयंत्र के ऑटोमेशन के लिए कंप्यूटर संगत प्रक्रिया को लागू करना इसकी पहली आवश्यकता थी। इसलिए विभाग के लिए पहला काम कंप्यूटर संगत प्रक्रिया संकेतों को प्राप्त करने के लिए उचित उपायों की पहचान कर इसे प्राप्त करना था। इस जरूरत को विभाग ने इंस्ट्रूमेंटेशन विभाग और प्रोडक्शन शॉप्स के सक्रिय सहयोग के साथ पूरा किया। यह स्वचालन की दिशा में पहला कदम था।
महाप्रबंधक प्रभारी इंकास के शंकरसुब्रमण्यन ने स्टील प्लांट के क्रमिक ऑटोमेशन की प्रक्रिया को समझाते हुए बताया कि हमारे संयंत्र में 5 अलग-अलग स्तर के ऑटोमेशन सिस्टम लगे हुए हैं। लेवल-0 में सेंसरों और माप उपकरणों का उपयोग किया गया है, लेवल-1 क्षेत्र विशेष में स्थानीय स्तर पर प्रक्रिया नियंत्रण प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है, लेवल-2 में शॉप लेवल ऑटोमेशन शामिल है, लेवल-03 के तहत केंद्रीय निगरानी प्रणाली और प्रबंधन सूचना प्रणाली लगाई गई है, लेवल-04 में ईआरपी/एमईएस के माध्यम से व्यापारिक लेनदेन के लिए ऑटोमेशन किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि इंकास का गठन विभिन्न उत्पादन और सेवा इकाइयों में स्वचालन प्रणाली की पहचान, अवधारणा और कार्यान्वयन के लिए किया गया था और यह उनकी सुचारू कार्यप्रणाली को सुनिश्चित करता है।
इंकास विभाग का कार्यक्षेत्र प्लांट, माइंस तथा अस्पताल से लेकर टाउनशिप क्षेत्र में फैला हुआ है। प्लांट के भीतर के क्षेत्र को 5 जोन में विभाजित किया गया है-आयरन जोन, स्टील जोन, मिल्स जोन, एनर्जी मैनेजमेंट जोन और नेटवर्किंग ग्रुप। विभाग का सम्पर्क अपने फाइब्रो ऑप्टिक नेटवर्क के माध्यम से संयंत्र के प्रत्येक क्षेत्र के कोने-कोने में है। इसके अलावा, इंकास विभाग संयंत्र की नई परियोजनाओं के तहत लगे विभिन्न विभागों जैसे यूआरएम, ब्लास्ट फर्नेस-8, कोक ओवन बैटरी-11 एवं एसएमएस-3 में अत्याधुनिक ऑटोमेशन की अवधारणा, सिस्टम को बनाए रखने, डेटा साझा करने के लिए नेटवर्क कनेक्शन, उत्पादों के डिस्पैच तथा ब्रेकडाउन्स के समाधान हेतु अपनी भूमिका का बखूबी निर्वहन कर रहा है।
इंकास विभाग के महाप्रबंधक एम पी सिंह ने बताया कि प्लांट और टाउनशिप क्षेत्र में व्यवसाय और प्रक्रिया अनुप्रयोगों को चलाने के लिए, 2 कोर स्विच, 15 एरिया स्विच/राउटर्स, 4 एग्रेगेशन स्विच और 500 से अधिक एज स्विच लगाए गए हैं। साथ ही संचार व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु एक प्रतिबद्ध सर्वर सिस्टम को मेंटेन किया जाता है जिसके माध्यम से संचार की आवश्यकता को बनाए रखने के लिए ईमेल, इंटरनेट प्रॉक्सी और एंटीवायरस जैसी इन्फ्रास्ट्रक्चर सेवाएँ प्रदान की जाती हैं। लगभग 500 किमी फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क के माध्यम से संयंत्र के लगभग 6000 उपयोगकर्ताओं तथा टाउनशिप के 750 उपयोगकर्ताओं को जोड़ा गया है। वे आगे कहते हैं कि ईआरपी के माध्यम से डेटा साझा करना, सेल नेट के माध्यम से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा, प्लांट के अंदर उपकरणों से डेटा कैप्चर करने और डेटा की उपलब्धता सुनिश्चित करने के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सांविधिक प्रदूषण उत्सर्जन संबंधित पर्यावरण डेटा उपलब्ध कराया जाता है। विभाग द्वारा संयंत्र के उत्पादन गतिविधियों को सक्षम और सुचारू बनाए रखने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता है। वर्ष 2013 से इंकास में कार्यरत् ओसीटी श्री कुंचे साई किरण का कहना है कि उन्हें खुशी है कि उन्हें आयरन जोन में प्रोसेस ऑटोमेशन कार्य को संपादित करने का मौका मिला है। जिसके तहत सॉफ्टवेयर्स व पीएलसी प्रोग्रामिंग को अपडेट करने से लेकर वर्चुअल सर्वर की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ एचएमआई क्लाइंट के माध्यम से नेटवर्किंग को सक्षम बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं। उन्हें गर्व है कि एसपी-3, कोक ओवन बैटरी-11, ब्लास्ट फर्नेस-8 और ओएचपी-बी में मॉडेक्स परियोजनाओं की कमीशनिंग में सहयोग प्रदान किया है।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / क्या आपने कभी ऐसे लोगों को देखा है, जो हमेशा कुछ न कुछ खाते रहते हैं? हर समय कुछ न कुछ खाते रहना सेहत के लिए अच्छा नहीं होता।यह आदत धीरे-धीरे ईटिंग डिसऑर्डर तक जाती है। ईटिंग डिसॉर्डर खानपान की आदतों से संबंधित एक गंभीर स्थिति है, जो नकारात्मक रूप से आपके स्वास्थ्य, भावनाओं और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करती है। इस समस्या से ग्रस्त लोगों में खानपान की आदतें सामान्य नहीं रहतीं। कुछ लोग अपने शरीर की आवश्यकता से अधिक खाते हैं, तो कई लोग उससे बहुत कम खाते हैं।
ईटिंग डिसॉर्डर के प्रकार
एनारेक्सिया नवरेसा, बुलिमिया नवरेसा और बिंज ईटिंग डिसॉर्डर सबसे सामान्य प्रकार के डिसॉर्डर हैं। इसके अलावा कुछ और ईटिंग डिसॉर्डर हैं, जिनमें पिका, रूमिनेशन डिसॉर्डर और अवाइडेंट/रिस्ट्रक्टिव फूड इनटेक डिसॉर्डर प्रमुख हैं।
एनारेक्सिया नवरेसा
एनारेक्सिया नवरेसा को आम भाषा में एनारेक्सिया कहा जाता है। यह एक घातक ईटिंग डिसॉर्डर है। इसमें शरीर का वजन कम हो जाता है, क्योंकि जो लोग एनारेक्सिया से पीड़ित होते हैं, वे अपने भार और शरीर के आकार को नियंत्रित करने का अत्यधिक प्रयास करते हैं। एनारेक्सिया से पीड़ित लोग कैलरी का सेवन अत्यधिक कम कर देते हैं या वजन कम करने के लिए दूसरे उपायों को अपनाते हैं। इसमें अत्यधिक व्यायाम करना, पेट साफ रखने के लिए लैक्जेटिव का सेवन या खाने के बाद उल्टी कर देना जैसी चीजें शामिल होती हैं। वजन कम करने के ये प्रयास तब भी जारी रहते हैं, जब वजन अत्यधिक कम हो जाता है। कभी-कभी इससे पीड़ित लोग खुद को इतना भूखा मारते हैं कि यह स्थिति उनके लिए घातक हो जाती है।
बुलिमिया नवरेसा
बुलिमिया घातक ईटिंग डिसॉर्डर है। इससे पीड़ित व्यक्ति का खानपान पर नियंत्रण नहीं रहता। ऐसे लोग थोड़े समय में ही अधिक मात्रा में खा लेते हैं और अस्वस्थ तरीके से उस अतिरिक्त कैलोरी को कम करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि अधिक खाने के बाद ऐसे लोग शर्म और अत्यधिक भय से भर जाते हैं। वजन बढ़ने के डर से वे उल्टी करने का प्रयास करते हैं, अत्यधिक व्यायाम करते हैं या लैक्जेटिव का उपयोग करते हैं, ताकि अतिरिक्त कैलरी मल द्वारा निकल जाए।
बिंज ईटिंग डिसॉर्डर
बिंज ईटिंग डिसॉर्डर से पीड़ित लोग नियमित रूप से अत्यधिक भोजन खाते हैं। ऐसे लोगों को इस बात का पूरा एहसास रहता है कि उनका अपने खानपान पर नियंत्रण नहीं रहा। बिंज के बाद भी लोग अपने व्यवहार के कारण आत्मग्लानि, गुस्से या शर्म से भर जाते हैं, लेकिन बुलिमिया की तरह वे इस अतिरिक्त कैलरी इनटेक को व्यायाम या दूसरे तरीकों से बाहर निकालने का प्रयास नहीं करते।
अन्य ईटिंग डिसॉर्डर
पिका : पिका एक ऐसा ईटिंग डिसॉर्डर है, जिसमें व्यक्ति को नॉनफूड आइटम खाने का मन करता है, जैसे साबुन, कपड़ा, टैलकम पाउडर, धूल, चॉक आदि। यह समस्या महीने में कम से कम एक बार तो होती ही है। पिका न स्वास्थ्य के लिए अच्छा है और न ही सामाजिक रूप से। लगातार इन चीजों के सेवन से स्वास्थ्य संबंधी कई जटिलताएं हो सकती हैं, जैसे पॉयजनिंग, पाचन मार्ग संबंधी समस्या या संक्रमण। पिका अकसर दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के साथ होता है, जैसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर।
खाना खजाना / शौर्यपथ / बटाटा गोलगप्पे चाट वीकेंड के लिए सबसे खास रेसिपी है। यह रेसिपी बच्चों को भी बहुत पसंद आएगी। आइए, जानते हैं रेसिपी-
सामग्री :
गोलगप्पे- आवश्यकतानुसार
उबले आलू- 2
चाट मसाला पाउडर- 1 चम्मच
नीबू का रस- 1 चम्मच
बारीक कटा प्याज- 2
दही के लिए सामग्री :
दही- 1/2 कप
काला नमक- स्वादानुसार
चीनी- 1 चम्मच
गार्निशिंग के लिए:
लाल मिर्च पाउडर- आवश्यकतानुसार
चाट मसाला पाउडर-आवश्यकतानुसार
हरी चटनी- 1/2 कप
मीठी चटनी- 1/2 कप
सेव- 1 कप
विधि :
एक बाउल में आलू का छिलका छीलकर मैश करें। उसमें चाट मसाला और नीबू का रस डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। एक दूसरे बाउल में दही, काला नमक और चीनी डालकर अच्छी तरह से फेंट लें। सर्विंग प्लेट में पानी पूरी रखें और एक-एक करके सारी पानी पूरी के बीच में छेद करें। उसमें थोड़ा-थोड़ा आलू वाला मिश्रण डालें। ऊपर से थोड़ा-थोड़ा प्याज, दही, दोनों चटनियां, सेव, चाट मसाला, लाल मिर्च पाउडर और धनिया पत्ती डालें। तुरंत सर्व करें।
टिप्स / शौर्यपथ / कुकिंग टिप्स की बात करें, तो ये छोटे-छोटे टिप्स खाने को और भी टेस्टी बना देते हैं। आज हम आपको ऐसे ही टिप्स बताएंगे जिससे कि चिकन की रेसिपी और भी टेस्टी बनेगी-
-चिकन को पकाते वक्त शुरुआत में उसे हमेशा तेज आंच पर पकाएं ताकि उसका जूस सील हो जाए, उसके बाद उसे धीमी आंच पर पकाएं।
-चिकन के टुकड़ों में मसाले अच्छी तरह से लग जाएं, इसके लिए एक प्लास्टिक की पॉलिथिन में पहले मसाले और मैरीनेट की सभी सामग्री डालें और उसे अच्छी तरह से हिलाएं। इसके बाद चिकन को पकाएं। इसका फायदा यह होगा कि चिकन में मसाले अच्छी तरह से रच-बस जाएगा।
-फ्राइड चिकन बनाते वक्त चिकन को तलने से पहले आटे या मैदा में रोल करने की जगह, मिल्क पाउडर में रोल करें। तलने के बाद चिकन का रंग अच्छा आएगा।
-अगर आप चाहती हैं कि आपके बनाए कबाब मुलायम बनें और उन्हें चबाने में खाने वाले को परेशानी न हो, तो उन्हें अपेक्षाकृत ज्यादा देर तक मैरीनेट करें और साथ ही जरूरत से ज्यादा पकाएं नहीं।
-चिकन को हमेशा ऊंचे तापमान पर पकाएं ताकि उसके सभी बैक्टीरिया पूरी तरह से मर जाएं।
-चिकन की साफ-सफाई के दौरान खास सतर्कता बरतें। चिकन को हमेशा गर्म पानी से धोएं। साथ ही जिस बरतन में आपने कच्चे चिकन को रखा है, उसे भी गर्म पानी से धोना न भूलें। कच्चे चिकन को छूने के बाद अपने हाथों को साबुन से धोना न भूलें। इसके अलावा अगर आप कच्चे चिकन को फ्रिज में स्टोर कर रही हैं, तो इस बात का ध्यान रखें कि उसका जूस खाने के दूसरे सामान में न लगे।
सेहत / शौर्यपथ / आहार विशेषज्ञ दिन में कम से कम दो लीटर पानी पीने की सलाह देते हैं लेकिन रोजाना दो लीटर पानी पीना सभी लोगों के लिए मुमकिन नहीं है।इस वजह यह है कि किसी को प्यास ज्यादा लगती है तो किसी को कम।ऐसे में जाहिर सी बात है कि कम प्यास लगने वाले लोग पानी भी कम पीते होंगे।ऐसे में आपको अपनी डाइट में कुछ ऐसी चीजें जोड़नी चाहिए जिससे कि शरीर में पानी की कमी की पूर्ति हो सके।आइए, जानते हैं कुछ ऐसे ही आहार-
दही
डिहाइड्रेशन की समस्या से दूर रखने में दही सबसे अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसमें पानी की मात्रा 85 प्रतिशत होती है और शरीर के लिए जरूरी प्रोबायोटिक भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं।यह गर्मी की एलर्जी से बचाव के लिए भी शरीर का खूब साथ देता है। यह प्रोटीन, विटामिन बी और कैल्शियम का अच्छा स्त्रोत है।
ब्रोकली
ब्रोकली में 89 प्रतिशत तक पानी होता है और यह न्यूट्रिशन से भरपूर होती है। इसकी प्रकृति एंटी इनफ्लेमेटरी होती है, जिस कारण यह गर्मी में होने वाली एलर्जी से बचाव करती है। इसे आप सलाद में कच्चा ही खा सकते हैं और टोस्ट के साथ हल्का तल कर भी इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। काफी संख्या में लोग इसकी सब्जी भी बनाते हैं।
सेब
एक कहावत है कि डॉंक्टर को खुद से दूर रखने के लिए रोजाना एक सेब खाएं। अनेक तरह से फायदेमंद सेब में 86 प्रतिशत पानी होता है। फाइबर, विटामिन सी आदि का तो यह अच्छा स्त्रोत है ही।
सलाद
सलाद के पत्ते में जल तत्व 95 प्रतिशत होता है। सैंडविच में इसका अच्छा इस्तेमाल होता है। प्रोटीन और ओमेगा 3 से भरपूर सलाद पत्ते में फैट भी नहीं होता और कैलोरी भी बहुत कम होती है।
चावल
पके हुए चावल भी गर्मी में आपके लिए काफी फायदेमंद हैं। इनमें 70 प्रतिशत जल तत्व होता है। इनमें पर्याप्त मात्रा में आयरन, कार्बोहाइड्रेट आदि भी होते हैं। आपको दिन मेें एक कटोरी चावल जरूर खानेे चाहिए।
धर्म संसार / शौर्यपथ / दैत्यराज दंभ संतानहीन थे। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए कठिन तप कर भगवान विष्णु को प्रसन्न किया। श्रीहरि ने दंभ से वरदान मांगने को कहा। दंभ ने मांगा— प्रभु! मुझे अपने समान तेजस्वी और बलवान पुत्र का वरदान दीजिए, जो तीनों लोकों में अजेय और महापराक्रमी हो। नारायण के आशीर्वाद से दंभ के यहां एक बलशाली पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया शंखचूड़। आरंभ में शंखचूड़ बहुत धर्मवान था। उसने पुष्कर में जाकर घोर तप किया। ब्रह्माजी उसके तप से प्रसन्न हुए। ब्रह्मा ने वर मांगने को कहा। शंखचूड ने ब्रह्मदेव से वर मांगा कि वह देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने शंखचूड़ को इच्छित वरदान के साथ-साथ नारायण कवच भी प्रदान किया।
शंखचूड़ का विवाह धर्मध्वज की परम तेजस्वी और साध्वी कन्या तुलसी से हुआ। शंखचूड का जन्म श्रीहरि के आशीर्वाद से हुआ था। ब्रह्मा से उसने वरदान लिया था। यह सोचकर शंखचूड़ में अभिमान आ गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड़ ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर देवता भगवान विष्णु की शरण में गए। श्रीहरि ने कहा- मैंने स्वयं दंभ को अपने समान परम बलशाली पुत्र का वरदान दिया है। इसलिए शंखचूड़ के अत्याचारों से महादेव ही मुक्ति दिला सकते हैं। देवताओं ने महादेव को जाकर अपना कष्ट सुनाया। महादेव देवताओं के दुख दूर करने को तैयार हो गए। महादेव व शंखचूड़ के बीच घोर युद्ध आरंभ हुआ। शंखचूड़ के पास नारायण कवच था। इसके साथ-साथ उसकी पत्नी वृंदा ने, जिनका नाम तुलसी भी है, पतिव्रत धर्म के प्रभाव से शंखचूड़ को एक अभेद्य कवच से युक्त कर दिया था। इस कारण महादेव उसका वध नहीं कर पा रहे थे।
देवताओं ने श्रीहरि से शंखचूड़ के वध की राह निकालने की प्रार्थना की। शंखचूड़ बड़ा दानी भी था। वह प्रतिदिन दान किया करता था। श्रीविष्णु ब्राह्मण रूप बनाकर शंखचूड़ के पास गए और नारायण कवच दान में ले लिया। उसके बाद श्रीहरि ने शंखचूड़ का रूप धारण किया और तुलसी के पास गए। अनेक वर्ष के बाद पति को लौटा देख तुलसी प्रसन्न हुईं और पत्नी समान आचरण किया। तुलसी का पतिव्रत खंडित हो गया। इसके खंडित होते ही कवच भंग हो गया। महादेव ने त्रिशूल से शंखचूड़ का वध कर दिया। कहते हैं कि त्रिशूल के प्रहार से नारायण के समान बलशाली शंखचूड़ की हड्डियां चूूर हुईं, तो उससे शंख बना।
चतुर्भुज नारायण अपने एक हाथ में शंख धारण करते हैं। इसलिए श्रीहरि एवं अन्य देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है, परंतु महादेव ने उसका वध किया था, इसलिए उनका शंख से जलाभिषेक करना निषिद्ध है। गजानन भी शिवपुत्र हैं, इसलिए उन्हें भी शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता।
धर्म संसार / शौर्यपथ / हर साल श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है। इस बार 25 जुलाई 2020 को देशभर में नागपंचमी मनाई जाएगी। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के बाद हस्त नक्षत्र रहेगा। इस दौरान मंगल वश्चिक लग्न में होंगे खास संयोग यह है कि इसी दिन कल्कि भगवान की जयंती भी है और इसी दिन विनायक चतुर्थी व्रत का पारण होगा।
पंडित नीरज शास्त्री के अनुसार नाग पंचमी के दिन नाग देवता के स्वरूपों की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और मनचाहा वरदान देते हैं। इसके अलावा जिन जातकों पर काल सर्प का दोष है उनके लिए भी यह दिन बहुत अहम माना गया है।
मान्यता है कि इस दिन सर्पों की पूजा करने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं और काल सर्प दोष से ग्रसित जातकों को इस दोष से मुक्ति से मिलती है। जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प दोष है, उन्हें तो विशेष तौर पर नागपंचमी को विशेष पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
नाग पंचमी के देव
नागपंचमी पूजा और व्रत के आठ नाग देव माने गए हैं- अनन्त, वासुकि, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट और शंख नामक अष्टनागों की पूजा की जाती है। नागपंचमी पर वासुकि नाग, तक्षक नाग और शेषनाग की पूजा का विधान है। इस बार नागपंचमी श्रावण मास की 25 जुलाई शनिवार को मनाई जाएगी।
नागपंचमी का महत्व
हिन्दू धर्म में मान्यता है कि सर्प ही धन की रक्षा करते हैं। इसलिए धन-संपदा व समृद्धि की प्राप्ति के लिए नाग पंचमी मनाई जाती है। इस दिन श्रीया, नाग और ब्रह्म अर्थात शिवलिंग स्वरुप की आराधना से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है और साधक को धनलक्ष्मी का आशिर्वाद मिलता है।
क्यों मनाया जाता है नागपंचमी का पर्व
नागपंचमी मनाने के पीछे मान्यता है कि समुद्र मंथन के बाद जो विष निकला उसे पीने को कोई तैयार नहीं था। अंतत: भगवान शिव ने उसे पी लिया। भगवान शिव जब विष पी रहे थे, तभी उनके मुख से विष की कुछ बूंदें नीचे गिरीं और सर्प के मुख में समा गई। इसके बाद ही सर्प जाति विषैली हो गई. सर्पदंश से बचाने के लिए ही इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है।
नजरिया / शौर्यपथ / वैसे तो कोरोना से सभी क्षेत्रों का बुरा हाल है, लेकिन बैंकिंग क्षेत्र का हाल आगामी महीनों में सबसे बुरा होने वाला है। इसकी पुष्टि बैंकों द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक से तीन लाख करोड़ रुपये के कर्ज खातों को पुनर्गठित (रिस्ट्रक्चरिंग) करने की मांग से होती है। मोटे तौर पर ये कर्ज होटल, विमानन और रियल एस्टेट क्षेत्र से जुडे़ हैं। इन क्षेत्रों को कोरोना की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। इनके ऋण खातों को पुनर्गठित करने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि इसके बाद कंपनियों को अनेक तरह से राहत दी जाती है। कुछ समय के लिए पुनर्गठित खाते गैर-निष्पादित आस्ति (एनपीए) होने से बच जाते हैं और कंपनियों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का मौका मिल जाता है। दरअसल, कंपनी के दिवालिया होने पर बैंक जितनी वसूली कर सकते हैं, उससे कहीं अधिक पैसे उन्हें ऋण खातों के पुनर्गठन से मिलने की उम्मीद होती है।
अप्रैल 2020 के अंत तक होटल क्षेत्र पर बैंकों के 45,862 करोड़ रुपये, विमानन क्षेत्र पर 30,000 करोड़ रुपये और रियल एस्टेट क्षेत्र पर 2.3 लाख करोड़ रुपये बकाया थे। इन क्षेत्रों को उबरने में छह महीने से भी ज्यादा समय लग सकता है। रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक, खस्ता हाल विमानन क्षेत्र को अपना अस्तित्व बचाने के लिए आगामी तीन साल में लगभग 35,000 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी। आज कई होटल कर्ज में हैं। व्यावसायिक रियल एस्टेट और किराए के कारोबार में भी 25 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट के कयास लगाए जा रहे हैं। ऐसे में, इन क्षेत्रों से जुड़े ऋण खातों का पुनर्गठन और जरूरी हो जाता है।
ध्यान रहे, भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को खुदरा ऋणों की किस्त और ब्याज को सिर्फ टालने का निर्देश दिया है, माफ करने का नहीं। अगर कर्जदार मोराटोरियम का फायदा लेना चाहते हैं, तो उन्हें बाद में किस्त व ब्याज, दोनों चुकाने होंगे। अनुमान है कि मोराटोरियम अवधि समाप्त होने के बाद बड़ी संख्या में कार, गृह व व्यक्तिगत ऋण एनपीए में तब्दील हो सकते हैं। ऐसे में, एनपीए से उपजी समस्याओं के निवारण के लिए सरकार को बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की जरूरत पड़ेगी। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर का भी कहना है कि बैंकों का पुनर्पूंजीकरण समय की मांग है। बैंकों का हालिया विलय भी इस बीमारी के इलाज में असमर्थ है।
भारतीय स्टेट बैंक, केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक व बैंक ऑफ बड़ौदा पूंजी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। स्टेट बैंक को 20,000 करोड़ रुपये तक पूंजी जुटाने की मंजूरी मिली है और पंजाब नेशनल बैंक 7,000 करोड़ रुपये तक की पूंजी जुटाने के लिए शेयरधारकों से मंजूरी लेने वाला है। इनके अलावा, दूसरे बैंक पूंजी के लिए सरकार पर निर्भर हैं। वैसे अभी तक पुनर्पूंजीकरण के बहुत अच्छे नतीजे नहीं निकले हैं। सरकार ने संचयी तौर पर वित्त वर्ष 2015 से वित्त वर्ष 2020 के दौरान बैंकों में लगभग 43 अरब डॉलर की पूंजी डाली है, लेकिन बैंकों के पूंजी आधार में सुधार नहीं हो पाया, क्योंकि बैंकों का नुकसान निवेशित पूंजी से दो-तीन गुना ज्यादा था। बैंकों में डाली गई पूंजी का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा पिछले दो साल में डाला गया है।
बैंकिंग क्षेत्र अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन यह क्षेत्र एनपीए की समस्या से जूझ रहा है। दिसंबर 2019 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट में कहा गया था कि सितंबर 2020 तक भारतीय अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों का एनपीए कुल कर्ज के 9.9 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच सकता है। सितंबर 2020 में 53 देशी-विदेशी बैंकों की पूंजी कम हो जाएगी। बैंकों का मुनाफा कम होगा, जिससे उन्हें ऋण देने में परेशानी होगी। सभी क्षेत्रों को खोलने के बाद उद्योगों को वित्तीय सहायता की जरूरत पड़ेगी। सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है, जिसकी एक बड़ी राशि जरूरतमंदों को ऋण के रूप में दी जानी है। ऐसे में, अगर बैंकों को पूंजी की समस्या का सामना करना पड़ा, तो अर्थव्यवस्था में मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। अत: मौजूदा स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक को कॉरपोरेट और खुदरा ऋणों को डूबने से बचाने के हरसंभव उपाय करने होंगे। साथ ही, सबसे जरूरी यह है कि जो लोग और कंपनियां सक्षम हैं, वे अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऋण चुकाएं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)सतीश सिंह , मुख्य प्रबंधक, आर्थिक अनुसंधान, एसबीआई
सम्पादकीय / शौर्यपथ / कोरोना के खिलाफ लड़ाई में सरकारों द्वारा सख्ती में बढ़ोतरी न केवल जरूरी, बल्कि स्वागतयोग्य भी है। झारखंड में कोरोना नियमों की अनदेखी करने वालों और मास्क न पहनने वालों पर एक लाख रुपये का जुर्माना लग सकता है और दो साल की जेल हो सकती है। झारखंड की कैबिनेट ने बुधवार को संक्रामक रोग अध्यादेश 2020 पारित किया है। कोरोना के खिलाफ लड़ाई में ऐसी कड़ाई करने वाला वह देश का पहला राज्य बन गया है। कागज पर ही सही, यह नियम प्रथम दृष्टया काफी कड़ा दिखता है, लेकिन जिस तरह से झारखंड में संक्रमण बढ़ रहा है, उसे रोकने के लिए ऐसे कदमों का व्यापक सांकेतिक महत्व है। अलबत्ता, इसे लागू करना सहज नहीं होगा। इसकी सही अनुपालना सुनिश्चित करने के लिए सबसे पहले सरकारी महकमे और पुलिस-प्रशासन के तमाम लोगों को समाज के सामने आदर्श पेश करना होगा। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि हमारे नेता स्वयं बचाव और मास्क पहनने की दिशा में आदर्श बनकर उभरें। लोगों को लगे कि उनके सभी बडे़ नेता और बडे़ अधिकारी स्वयं मास्क पहनने लगे हैं, तो लोग भी प्रेरित होंगे। अभी आए दिन हम देखते हैं कि किस तरह से मास्क पहनने की अनिवार्यता का मखौल बनाया जाता है। कोई दिखावे के लिए टांग लेता है, तो कोई अपनी नाक नहीं ढकता, तो कोई मास्क अपने गले में लटका लेता है। मास्क से जिस तरह खिलवाड़ हो रहा है, उसमें सरकारें अगर कड़ाई के लिए मजबूर होती जाएं, तो कोई आश्चर्य नहीं। गरीबों की दृष्टि से देखें, तो जुर्माना राशि जरूर ज्यादा है और यह भी संभव है कि इस अध्यादेश या कानून का दुरुपयोग भी होगा। अत: ऐसे कानून बनाते हुए हमारी सरकारों को पूरी तरह तैयार रहना चाहिए। केवल काननू बना देना पर्याप्त नहीं है, उसकी पालना ही सब कुछ है।
झारखंड में कोरोना मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। खबरें आ रही हैं कि सरकारी अस्पतालों में जगह कम पड़ने लगी है। ऐसे में, सरकार लोगों पर ही नहीं, बल्कि निजी अस्पतालों व बैंक्वेट हॉल आदि पर भी दबाव बनाए हुए है। इन्हें आइसोलेशन वार्ड के रूप में इस्तेमाल करने की योजना है। आने वाले दिनों में झारखंड और संक्रमण बहुल अन्य राज्यों में ऐसे कडे़ कदम सामान्य बात हो जाएंगे। लॉकडाउन खुलने के बाद ज्यादातर राज्यों में संक्रमण बढ़ा है, विशेष रूप से गरीब या अभावग्रस्त राज्यों में स्थिति चिंताजनक होती जा रही है।
आम दिनों में ही जो चिकित्सा सेवा दबाव महसूस करती है, कोरोना के समय में उसका क्या हाल होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। कड़ाई केवल आम लोगों पर न हो, जो सेवा में लगा हुआ तंत्र है, उसे भी पूरी मुस्तैदी से काम करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करना होगा कि आम लोगों को इलाज के लिए भटकना न पड़े। सुशासन की कड़ाई के साथ ही स्वशासन की भी जरूरत बढ़ गई है। लोग यदि अनुशासित हो जाएं, तो फिर कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई आसान हो जाएगी। विश्वास बनाए रखना होगा। कोरोना से जंग हम जरूर जीतेंगे। ध्यान रहे, लगभग आठ लाख लोग ठीक हो चुके हैं और अभी देश में सक्रिय मरीजों की संख्या चार लाख भी नहीं है। एक दिन आएगा, जब चंद मरीज रह जाएंगे, लेकिन तब तक हमें सावधानी बरतनी पड़ेगी और सुरक्षित रहना होगा।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / गाजियाबाद में एक पत्रकार जब पुलिस के पास अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने जाता है, तब उसकी रिपोर्ट तो लिखी नहीं जाती, बल्कि इसकी सूचना छेड़छाड़ करने वालों तक पहुंचा दी जाती है। नतीजतन, अपराधी उस पत्रकार पर सरेआम जानलेवा हमला कर उसे गंभीर रूप से घायल कर देते हैं और इलाज के दौरान उसकी मौत हो जाती है। जब इस पर बवाल मचा, तो प्रशासन अब हरकत में आया है। सवाल यह है कि अपराध होने के बाद ही सक्रियता क्यों दिखती है पुलिस? ऐसे सभी मामलों में लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों/ सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह से मुआवजे की राशि काटी जानी चाहिए और इन कर्मियों की नौकरी छीनकर पीड़ित के परिजन को दी जानी चाहिए। कानून का राज फिर से स्थापित करने के लिए इस तरह की मिसालें आवश्यक हैं।
आदित्य अवस्थी, डीएलएफ कैपिटल ग्रीन्स, नई दिल्ली
छात्रों के हित में
किसी भी देश के स्वर्णिम भविष्य का रास्ता स्कूलों से ही निकलता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता किस स्तर की है? इस समय कोरोना संक्रमण-काल में हर जगह शिक्षा की स्थिति डांवांडोल है। स्कूल कब खुलेंगे, यह कोई नहीं कह सकता? अभिभावक घबराहट में हैं, और वे स्कूल खुलने पर भी फिलहाल बच्चों को भेजने के लिए तैयार नहीं हैं। ऑनलाइन शिक्षा की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन स्कूल बंद रहने की स्थिति में अन्य कोई विकल्प भी नहीं है। ऐसे में, सीबीएसई ने 30 फीसदी पाठ्यक्रम कम करने का जो फैसला किया है, वह बच्चों और अध्यापकों के हित में है। मगर हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि पाठ्यक्रम से ऐसे अंश न हटा दिए जाएं, जिससे शिक्षा की अवधारणा और उसकी गुणवत्ता किसी तरह प्रभावित हो।
सत्य प्रकाश, लखीमपुर खीरी
अच्छा फैसला
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने इस वर्ष ऑस्ट्रेलिया में होने वाली ट्वंटी-20 विश्व कप प्रतियोगिता को स्थगित करने का निर्णय सही दिशा में लिया है। कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण पिछले कुछ महीनों से विश्व स्तरीय क्रिकेट मैचों का आयोजन दिवास्वप्न जैसा हो गया है। जाहिर है, किसी भी देश का कोई भी खिलाड़ी ट्वंटी-20 विश्व कप खेलने के लिए फिलहाल न तो शारीरिक रूप से तैयार है, और न ही मानसिक रूप से। हालांकि, आईसीसी के इस फैसले से क्रिकेटप्रेमियों को जरूर निराशा हुई होगी, पर ट्वंटी-20 विश्व कप के स्थगित होने से आईपीएल के आयोजन की संभावनाएं बढ़ गई हैं, जो सुखद है।
तुषार आनंद, वेस्ट बेली रोड, पटना
बाढ़ से बेहाल
बाढ़ की वजह से बिहार लगभग हर साल विकास की दौड़ में पिछड़ जाता है। यहां बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। प्रभावित परिवारों के लिए ढंग से रहने-खाने की व्यवस्था नहीं होती, तो वे सड़कों पर रहने को मजबूर होते हैं। अगर इस बार भी सरकार ने बाढ़ पीड़ितों की सुध नहीं ली, तो इसी तरह की दर्दनाक तस्वीर फिर से दिखेगी। इस बार बाढ़ तो चुनाव का एजेंडा भी बन गया है। मगर दिक्कत यह है कि विपक्षी पार्टियां भी बाढ़ नियंत्रण के वादे पर चुनाव लड़ना चाहती हैं। इस तरह की राजनीति बंद होनी चाहिए। राज्य सरकार अगर जागरूक नहीं होती है, तो जनता को ही सरकार पर दबाव बनाना होगा। आखिर कब तक वे अपनी किस्मत को कोसते रहेंगे? यह बाढ़ ही है, जिसके कारण बिहार आज इतना पिछड़ा राज्य माना जाता है। इसकी वजह से होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई करने में ही अभिभावक बेहाल हो जाते हैं। वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिला पाते। इससे बेरोजगारी दर भी बढ़ रही है। राज्य सरकार को इस पर चिंतन करना होगा।
आफताब आलम, अरवल, बिहार
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
