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May 31, 2026
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मनोरंजन /शौर्यपथ / सुशांत सिंह राजपूत ने महेंद्र सिंह धोनी की बायोपिक एम एस धोनी में काम किया था। फिल्म की शूटिंग और प्रमोशन के दौरान सुशांत धोनी के परिवार के काफी क्लोज आ गए थे। वह उनसे मिलते रहते थे। इतना ही नहीं, एक बार तो सुशांत, अंकिता लोखंडे को भी धोनी की बेटी जीवा से मिलवाने ले गए थे।

सुशांत और अंकिता ने जीवा के साथ खूब मस्ती की थी। दोनों की फोटोज अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। बता दें कि इस फिल्म के बाद सुशांत और अंकिता दोनों अलग हो गए थे।

सुशांत सिंह राजपूत से ब्रेकअप के बाद भी अपने प्यार की निशानी को सहेज कर रख रखी थीं अंकिता लोखंडे

बता दें कि अंकिता, सुशांत से जितना प्यार करती थीं, उतना ही उनकी रिस्पेक्ट करती थीं। इतना ही नहीं भले ही दोनों के ब्रेकअप को इतने साल हो गए थे, लेकिन सुशांत के निधन से अंकिता काफी टूट गई थीं। वह सुशांत के परिवार से मिलने उनके घर भी गई थीं।

सुशांत को लेकर अंकिता के मन में इतनी रिस्पेक्ट थी कि आज भी उन्होंने अपने घर के नेमप्लेट से सुशांत का नाम नहीं हटाया। इस बात की जानकारी सुशांत और अंकिता के दोस्त संदीप सिंह ने दी।

दरअसल, संदीप ने सुशांत और अंकिता को लेकर इमोशनल पोस्ट किया। उन्होंने लिखा, 'अंकिता आपने केवल उसकी खुशी और सफलता के लिए प्रार्थना की। आपका प्यार सच्चा था। आपने अभी भी अपने घर के नेमप्लेट से उसका नाम नहीं हटाया है'।

सुशांत को अंकिता बचा सकती थीं

संदीप ने आगे यह भी लिखा, 'मुझे पता है कि केवल आप (अंकिता) ही उसे बचा सकती थीं। काश, आप दोनों की शादी हो जाती जैसा कि हमने सपना देखा था। आप उसे बचा सकती थीं अगर वह बस आपको वहां रहने देता। आप उसकी प्रेमिका, उसकी पत्नी, उसकी मां, हमेशा के लिए उसकी सबसे अच्छे दोस्त थीं। मैं तुमसे प्यार करता हूं अंकिता। मुझे उम्मीद है कि मैं आप जैसे दोस्त को कभी नहीं खो सकता।'

 

जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / करीब छह दशक पहले ब्रिटेन की गुलामी से आजाद हुआ नाइजीरिया बुरी खबरों के लिए ही सुर्खियों में अधिक रहा है। भुखमरी, गरीबी, नस्लवादी हिंसा और स्त्री उत्पीड़न के दाग तो जैसे इसके दामन से ही चिपक गए थे। हालांकि आज यह तेजी से आर्थिक तरक्की करने वाला एक अफ्रीकी देश है। साल 2014 में नाइजीरिया की एक अलग तरह की घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान इसकी ओर मोड़ा। उस वाकये की मुख्य किरदार थीं अडाओरा ओकोली। नाइजीरिया की एक युवा डॉक्टर।

जुलाई 2014 की बात है। ओकोली लागोस स्थित अपने हॉस्पिटल में तब कार्यरत थीं। एक दिन लाइबेरिया के 40 साल के पैट्रिक सोयर अपने इलाज के लिए उनके पास आए। वह काफी बीमार लग रहे थे। पैट्रिक को अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दी गई। अगले दिन जब वह उन्हें देखने गईं, तो पैट्रिक के बेड पर रखे ‘इंट्रावेनस फ्लूड बैग’ को भी हाथ में उठा लिया। यह असावधानी बरतते समय उन्हें जरा भी इलहाम नहीं था कि यह मरीज अतिसंक्रामक वायरस का शिकार भी हो सकता है, क्योंकि तब तक नाइजीरिया में इबोला का एक भी मामला पुष्ट नहीं हुआ था।

उन्हीं दिनों मानवाधिकार समूह ‘डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ ने एक अपील जारी की थी कि पश्चिम अफ्रीकी देशों को इबोला से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद की दरकार है। इस बयान के सामने आने के चंद रोज बाद ही पैट्रिक की मौत हो गई। पैट्रिक इबोला वायरस के संक्रमण का शिकार हुए थे। पैट्रिक की मौत के कुछ ही दिनों बाद ओकोली को उल्टियां आने लगीं, पेशाब का रंग बदलने लगा और उनमें डायरिया के लक्षण दिखने लगे। उन्हें समझते देर न लगी कि वह संक्रमित हो चुकी हैं। अगस्त में उनके खून की जांच की गई, जो पॉजिटिव निकली। उन्होंने फौरन अपनी मां को फोन किया कि उनके कमरे को बाहर से बंद कर दें और उसके आसपास किसी को न जाने दें। ओकोली ने मां को कहा, ‘घबराना नहीं, मैं जिंदा लौटूंगी।’

ओकोली को तुरंत ‘आइसोलेशन रूम’ में पहुंचा दिया गया। जब तक इस वायरस को लेकर लागोस में सतर्कता बरती जाती, तब तक इसने कई लोगों को अपना शिकार बना लिया था। ओकोली खुद एक डॉक्टर थीं, इसलिए हालात की गंभीरता को वह अच्छी तरह जान रही थीं। उनके साथ कई मरीज आइसोलेशन में थे, लेकिन उन सबकी देखभाल करने के लिए तब संक्रामक रोगों का एक ही विशेषज्ञ था। ओकोली कहती हैं, ‘हम प्रामाणिक थिरेपी पाने की स्थिति में नहीं थे। इस बीमारी को परास्त करने वाले किसी व्यक्ति का प्लाज्मा उपलब्ध नहीं था। मैं उन लम्हों में सिर्फ अपने ईश्वर से बातें कर सकती थी और मैंने पल-पल उससे यही गुहार लगाई कि मुझे तुम्हारी जरूरत है।’

ओकोली को मालूम था कि उन्हें तरल पदार्थ लेते रहना होगा, ताकि उनकी त्वचा में तरलता बनी रहे। अपनी नब्ज भी लगातार टटोलती रहीं। करीब एक हफ्ते के बाद उनकी सेहत में कुछ सुधार नजर आया। और फिर एक सुबह डॉक्टर उनके लिए वही पैगाम लेकर आया, जो किसी डॉक्टर को फरिश्ते के बराबर खड़ा कर देता है। डॉक्टर ने कहा, ‘ओकोली पिछले कई दिनों की जांच में तुम्हारी रिपोर्ट पॉजिटिव नहीं पाई गई है।’ वह एक नए जन्म की तरह था। एक पखवाडे़ के बाद जब ओकोली को वार्ड से छुट्टी मिली, तो वह एक लाल रिबन काटकर आगे बढ़ीं। यह प्रतीक था कि वह इंसानी दुनिया में फिर से लौट रही हैं।

नवंबर 2014 में अमेरिकन सोसायटी फॉर ट्रॉपिकल मेडिसिन ऐंड पब्लिक हेल्थ ने एक कॉन्फ्रेंस में अपने अनुभव साझा करने के लिए ओकोली को न्यू ऑरलेन्स आमंत्रित किया। बिल गेट्स इस कॉन्फ्रेंस के मुख्य वक्ता थे। ओकोली को लगा कि बिल गेट्स एक पीड़िता का नजरिया जानना चाहते हैं। कॉन्फ्रेंस के बाद वह नाइजीरिया लौटने वाली थीं, लेकिन टुलेन यूनिवर्सिटी की पब्लिक हेल्थ ऐंड ट्रॉपिकल मेडिसिन विभाग ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वह उनके यहां दाखिले के लिए आवेदन करें। बिल गेट्स ने उनके अनुभवों को अपनी वेबसाइट पर साझा किया है।

ओकोली ने इनफेक्शियस डिजीज एपिडेमियोलॉजी में मास्टर की पढ़ाई करने का मन बनाया, ताकि वह किसी भी महामारी से निपटने के विभिन्न पहलुओं को अच्छी तरह जान सकें। एक भुक्तभोगी के तौर पर वह जान चुकी थीं कि एक मरीज आखिर उन पलों में क्या सोचता है। वह कहती हैं कि ‘इस एहसास ने मेरी आंखें खोलीं कि संक्रामक रोग दरअसल गरीबी और ऐसे पिछड़े देशों की बीमारी है, जिनके पास इतने संसाधन नहीं कि इसे पसरने से रोक सकें।’

नाइजीरिया जैसे देशों में ऐसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है, जो जानते हों कि जब जानलेवा संक्रामक रोग का प्रसार हो, तो क्या करना चाहिए। अब एक बच्ची की मां ओकोली अपने मुल्क लौट संक्रामक रोगों से ग्रस्त लोगों की सेवा करना चाहती हैं। उनके शब्द हैं, ‘अंतत: यह ईश्वर की भक्ति और मानवता की सेवा है।’
(प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह) अडाओरा ओकोली, इबोला को मात दे चुकी डॉक्टर

 

नजरिया /शौर्यपथ / भारत भावुक इंसानों से भरा हुआ है। किसी का दुख-दर्द मन को जरा-सा छू जाए, तो नमी अंदर से उमड़ती है और आंखों से छलक आती है। कोई अचरज नहीं कि चीर-फाड़ और कड़वी दवाओं की पढ़ाई करके नया-नया निकला वह डॉक्टर अंदर से सिसक रहा था। हाथों में कुछ कागज थे, जिन पर ऐसे शब्द नुमाया थे, जो एक समाजसेवी के बलिदान की कहानी बखान रहे थे। कुछ देर ही कागज पर निगाह टिकती और फिर भावुकता कागजों से परे बहा ले जाती। कुछ संभलकर कागज पर लौटना होता और फिर शब्द भावनाओं का ज्वार उठा देते थे। मन सवाल करता कि ऐसे भी कोई करता है क्या? अपना देश यहां है और कहां दूर जाकर सेवा में लगे हैं? सेवा भी ऐसी कि दिन-रात रोम-रोम रमा हुआ है। विधि का विधान देखिए, करीब 600 कुष्ठ रोगियों की सेवा करते-करते खुद में भी रोग लग गया है। अरे पगले सेवक, अब तो छुट्टी ले, बहुत हुई सेवा। अब तो तुझे खुद रोग लग आया है, अब तू खुद बचे, न बचे? लौट जा अपने देश बेल्जियम, हवाई में कौन तेरा है? पर डेमियन नाम का वह सेवक सेवा का मोर्चा नहीं छोड़ता। सेवा से ऐसी श्रद्धा है कि हिम्मत कभी जवाब नहीं देती। तकलीफ बढ़ती है, तो सेवा की हिम्मत भी अगले पायदान चढ़ जाती है। वह बेमिसाल सेवक रोग से गलने-गलने तक दूसरों की सेवा करता है और फिर एक दिन थककर बिस्तर पर जा लेटता है हमेशा के लिए। उस दिन इंसानियत मुल्कों की सरहदों को ढहाकर जमीं से आसमां तक गूंज उठती है कि सब देख लो, ऐसा होता है इंसान।
ऐसी अनुपम सेवा कथा से गुजरते हुए ही डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस ने यह निश्चय किया था कि दुनिया में उन्हें भी कहीं मिले सेवा का मौका, तो कुछ कर गुजरें। वाकई, खूब चाहने से ही राह निकलती है। उन्हीं दिनों चीनी क्रांतिकारियों के कॉमरेड सैन्य जनरल झो दे की चिट्ठी आई थी, पंडित नेहरू के पास कांग्रेस और भारत के नाम। जापानी हमले का जवाब देते चीनी क्रांतिकारियों ने मदद की गुहार लगाई थी। तब अपना देश आजाद नहीं हुआ था। उस चिट्ठी में गुहार के चंद लफ्ज चीन के भावी पितामह माओ ने भी जोडे़ थे। उन्होंने लिखा था, ‘हमारी मुक्ति, भारतीयों और चीनियों की मुक्ति, सभी दलितों और उत्पीड़ितों की मुक्ति का संकेत होगी’। गुहार थी कि भेज सको, तो डॉक्टर भेजो, बड़ी संख्या में हम मारे जा रहे हैं। पंडित नेहरू से लेकर नेताजी बोस तक सभी कांग्रेसी नेता भावुक हो उठे थे। जगह-जगह अपील प्रसारित की गई। कौन डॉक्टर चीन सेवा के लिए जाना चाहता है?
अच्छा मौका डॉक्टर कोटनिस के हाथ लग गया। बहुत खुश हुए कि इंसानियत और अपनी योग्यता साबित करने का सुनहरा मौका आया है। भारत और भारतीयों की सेवा भावना को परदेशी जमीन पर साकार करना है। यही देश की परंपरा है, इंसान से इंसान का भाईचारा बढ़ाना है। पिता शांताराम कोटनिस तो बेटे के लिए दवाखाना खोलने की तैयारी में थे, लेकिन बेटे ने पत्र लिख भेजा कि चीन जाऊंगा, मंजूरी दीजिए। पिता कुछ निराश हुए, पर खुश भी थे कि बेटा देश की पुकार पर जा रहा है। उसके चर्चे होंगे, जय-जयकार होगी और फिर वह कोई हमेशा के लिए थोड़ी न जा रहा है, एक-दो साल में लौट आएगा। सेवा का स्वप्न लिए कोटनिस 2 सितंबर, 1938 को भारत से चीन के लिए जहाज से रवाना हुए। उनके साथ अन्य चार डॉक्टर भी थे- एम अटल, एम चोलकर, डी मुखर्जी और बी के बासु। डॉक्टरों में सबसे युवा 28 वर्ष के कोटनिस ही थे। चीन पहुंचने पर दिग्गज नेताओं, माओ और एन लाई ने भी बहुत सम्मान से इस्तकबाल किया। कोटनिस वहां सेवा में ठीक वैसे ही डूब गए, जैसे हवाई में डेमियन डूबे थे। वह चीनी जवानों की ऐसी ममता के साथ सेवा करते थे कि चीनी उन्हें लाड़ में ‘ब्लैक मदर’ कहते थे।
चीन की मुक्ति और नए वाम राष्ट्र के निर्माण के लिए भयानक लड़ाई चल रही थी। किसी दिन तो 800 के करीब घायल इलाज के लिए आ जाते थे। दो-दो, तीन-तीन दिन तक जगते हुए लगातार ऑपरेशन करने पड़ते थे। असह्य दबाव पड़ा, पर सेवा जारी रही। मिरगी के दौरे पड़ने लगे और 9 दिसंबर, 1942 को कोटनिस दुनिया से चले गए। महज 32 के थे। साथ आए डॉक्टर एक-एक कर स्वदेश लौटे, लेकिन कोटनिस न लौट सके, जैसे डेमियन भी नहीं लौट सके थे।
अपने पीछे चीनी पत्नी और पुत्र यिनहुआ (अर्थात भारत-चाइना) के साथ ही वह सेवा की ऐसी विरासत छोड़ गए कि चीन चाहकर भी उन्हें अर्थात अपने के दिहुआ को नहीं भुला सकता। डॉक्टर कोटनिस को विदा करते हुए चीन के पितामह माओ ने कहा था, ‘सेना ने एक मददगार हाथ खो दिया है; राष्ट्र ने एक दोस्त खो दिया है। आइए, हम हमेशा उनकी अंतरराष्ट्रीय भावना को ध्यान में रखें’।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय द्वारकानाथ शांताराम कोटनिस विश्व प्रसिद्ध चिकित्सक

 

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारत में कोरोना संक्रमण के खिलाफ एक दवा को दी गई मंजूरी किसी खुशखबरी से कम नहीं है। हल्के और मध्यम प्रकार के कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए इस एंटीवायरल दवा ‘फेविपिराविर’ को ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने अपनी इजाजत दे दी है। न केवल भारत में दवा आधिकारिक रूप से बनेगी, बल्कि यहां दवा बेचने की भी इजाजत मिल गई है। यह दवा जापान में फ्लू के खिलाफ प्रयोग में रही है और कोविड-19 के इलाज में भी इससे काम में लिया जा रहा है। भारतीय कंपनी भी इसके जेनेरिक संस्करण का निर्माण करती है और कोरोना के दिनों में भी कुछ देशों में इसकी आपूर्ति कर रही है। अब यह दवा भारत में भी कोरोना के खिलाफ काम आएगी, लेकिन इसे केवल डॉक्टर की आधिकारिक सलाह या देखरेख में ही लेने की मंजूरी दी गई है। दवा बनाने वाली कंपनी को अपने परीक्षण में बहुत उत्साहजनक नतीजे मिले हैं और अब इस दवा के सामूहिक प्रयोग से इसकी असली ताकत का बेहतर अंदाजा हो सकेगा। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह दवा ‘गेम चेंजर’ हो सकती है। यह दवा कोरोना के प्रारंभिक चरण में कारगर हो सकती है और कोरोना मामलों को गंभीर अवस्था में जाने से बचा सकती है। आगामी दो महीने में इस दवा के कारगर होने के संबंध में पुख्ता आंकड़े उपलब्ध हो जाएंगे। चूंकि यह दवा बहुत सस्ती है, इसका प्रयोग आसान है, इसलिए भी इसका कारगर होना भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश और पूरी दुनिया के लिए बड़ी बात होगी।
जब भारत में कोरोना संक्रमण के कुल मामले 4.12 लाख से ज्यादा हो गए हैं, जब 13 हजार से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, तब ऐसी किसी उम्मीद बंधाती दवा को मंजूरी देना और भी जरूरी हो गया था। भारत की बात करें, तो अभी 1.70 लाख से ज्यादा सक्रिय मामले हैं, जिनमें से गंभीर मामले पांच प्रतिशत के करीब पहुंच गए हैं। 95 प्रतिशत से ज्यादा मामले हल्के या मध्यम प्रकार के हैं और इनमें भी जिन मामलों में लक्षण स्पष्ट हैं, वहां यह दवा यदि रामबाण सिद्ध हो जाए, तो यह भारत के लिए बड़ी सफलता होगी।
खास बात यह है कि यह दवा एंटीवायरल है और इन दिनों दुनिया के वैज्ञानिक कोरोना की सीधी दवा या वैक्सीन की बजाय एंटीवायरल दवा बनाने में जुटने लगे हैं। कोरोना से लड़ने में ऐसी और भी दवाओं की जरूरत पड़ेगी। संभव है, विभिन्न चरणों और विभिन्न लक्षणों के लिए अलग-अलग एंटीवायरल दवाएं बनें। लेकिन यह तो मानना ही होगा कि यह कोरोना की सोलह आना पुख्ता दवा नहीं है, अभी भी फिजिकल डिस्टेंसिंग ही सबसे मुकम्मल उपाय है। भारत में लॉकडाउन खुलने के बाद संक्रमण में आई तेजी यह साफ कर देती है कि लोगों ने शारीरिक दूरी बनाए रखने में कोताही बरती है। लोगों को और मुस्तैदी से बताना होगा कि आज कोरोना से बचने के लिए भीड़ से बचना और अनजान लोगों से शारीरिक दूरी बनाना स्वस्थ रहने की बुनियादी शर्त है। ऐसे शोध सामने आ चुके हैं कि मास्क न पहनने पर संक्रमित होने का खतरा 70 प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ जाता है और मास्क पहनने पर खतरा 40 प्रतिशत घट जाता है। जिन देशों ने मास्क का यथोचित प्रयोग किया है, वहां संक्रमण काबू में आ रहा है। बेशक, पुख्ता दवा के मिलने तक कोरोना के खिलाफ जारी युद्ध में मास्क ही असली कवच है।

 

मेल बॉक्स / शौर्यपथ / भारत की सख्त आपत्ति के बावजूद नेपाल ने अपने नए नक्शे पर राष्ट्रपति की मंजूरी ले ली। अब यह नेपाल के संविधान का दस्तावेजी हिस्सा बन गया है। इससे भारत के तीन बड़े हिस्से कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा नेपाल के मानचित्र में जुड़ गए हैं। सवाल यह है कि नेपाल जैसा पड़ोसी देश आखिर क्यों भारत के लिए चुनौतियां खड़ी कर रहा है? रणनीतिकारों की मानें, तो अब नेपाल से भी हमारा सीमा-विवाद शुरू हो गया है। इसका अर्थ है कि वह भी पाकिस्तान और चीन की तरह हमारे लिए खतरा बन सकता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि नेपाल ने चीन के उकसावे में यह सब किया है, लेकिन भारत को नेपाल के इस दुस्साहस का गंभीरता से जवाब देना चाहिए। अगर आज कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया, तो बाद में उन हिस्सों पर हम अपना दावा कमजोर कर लेंगे। हमारी सरकार को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा। देश हर कदम पर उसके साथ खड़ा है।
मोहम्मद आसिफ
जामिया नगर, दिल्ली

लंबी लड़ाई की तैयारी
इस सदी की सबसे भयावह बीमारी कोविड-19 ने भारत ही नहीं, पूरे विश्व को अव्यवस्थित कर दिया है। विश्व की बड़ी से बड़ी आर्थिक ताकतें भी इसके सामने घुटने टेक चुकी हैं। अनिश्चितता के इस माहौल में जब सभी के मन में खौफ है और भविष्य के प्रति चिंता, तो हमें छोटी-छोटी खुशियों में ही जिंदगी को समेटना चाहिए। जिंदगी क्या है और कैसी है, यह इसी पर निर्भर करता है कि हम इसे जीते कैसे हैं? इसीलिए इस सदी का यह अनुभव जरूर त्रासद है, लेकिन ऐतिहासिक और मूल्यवान भी है। सरकारों द्वारा आधिकारिक और प्रशासनिक स्तर पर सामान्य जीवन में संतुलन बनाने के साथ-साथ देश और समाज को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं, वे न केवल सबक हैं, बल्कि आने वाले कल के लिए संजीवनी बूटी का काम करेंगे। साफ है कि हम एक मैराथन में दौड़ रहे हैं। हमें आने वाले दिनों, महीनों और संभवत: सालों के लिए भी तैयार रहना होगा।
सत्या नारायण पोद्दार

गंभीर विमर्श जरूरी
मशहूर अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का विचलित कर देने वाला आत्मघाती कदम सुर्खियों में है। निस्संदेह असफलताओं के चौराहे पर खड़े इंसान के लिए मौत का रास्ता आसान लगता है। मगर सफलता-असफलता छोटी हो या बड़ी, उसे आत्महत्या की वजह मान लेना सही नहीं। आत्महत्या पर होने वाली सार्वजनिक बहसों से अलग हमें उन कारणों को टटोलना होगा कि आत्महत्या जैसे कठोर कदम से लोग बच सकें। आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 15 प्रतिशत लोग हर वर्ष आत्महत्या करते हैं, जिसमें सभी लिंग, उम्र व आय के लोग शामिल हैं। निस्संदेह, मनोवैज्ञानिकों को ऐसे लोगों के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी उठानी होगी। देश में एक ऐसा माहौल तैयार किया जाना चाहिए कि लोग अपनी छोटी-बड़ी, सभी समस्याओं पर बेझिझक विमर्श कर सकें।
एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड

बढ़ता रुतबा
192 देशों में से 184 का समर्थन पाकर भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का फिर से अस्थाई सदस्य बन गया है। यह उपलब्धि भारत को यूं ही नहीं मिली है। जिस तरीके से हमने पूरे विश्व को अपना मानकर सभी के साथ भाईचारे की मिसाल पेश की है, उसी के कारण हमारा इतना रुतबा बढ़ा है। भारत हमेशा से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ में भरोसा रखता है और सभी देशों को एक परिवार मानता है। इसीलिए कोरोना-संक्रमण काल में भी हमने सभी जरूरतमंद देशों को दवा भेजी। इन्हीं सब कारणों से आज हम इस हैसियत में हैं कि सभी देश हमारी ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। यह हमारे लिए सुखद स्थिति है।
नीरज कुमार पाठक, नोएडा

 

दुर्ग / शौर्यपथ / शहर में वर्षों से नजूल भूमि पर अपना आशियाना बनाए बैठे गरीब व मजदूर वर्ग के 950 से अधिक स्लम बस्ती वासियों को शासन की योजना के अंतर्गत कलेक्टर दर से डेढ़ गुना कीमत पर रजिस्ट्री करवा के मालिकाना हक प्राप्त करने का नोटिस जारी किया गया जिसे समझ पाने के आभाव में बस्तियों में भय का माहौल बन गया। अपना आशियाना बचाने सैकड़ों लोगों ने विधायक अरुण वोरा से गुहार लगाई जिसके बाद उन्होंने राजस्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल से राजधानी पहुंचकर मामले का निराकरण करवाया। उन्होंने बताया कि शासन ने जनता को राहत देने के उद्देश्य से योजना बनाई है जिसकी सूचना देने हेतु नोटिस दिया गया है ताकि अपने सामथ्र्य के अनुसार लोग काबिज भूमि की रजिस्ट्री करवा सकें व बेदखली के खतरे से हमेशा के लिए निजात पा सकें।
      विधायक वोरा ने कहा कि मुख्यमंत्री भपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार उजाडऩे में नहीं बसाने में विश्वास रखती है किसी का भी आशियाना उजाड़ कर उसे बेघर नहीं किया जाएगा शासन की योजना लोगों के लिए अनिवार्य नहीं है अपितु इच्छुक परिवार इसका लाभ प्राप्त कर सकते हैं। मामले का पटाक्षेप होने के पश्चात लोगों ने राहत की सांस ली।

भिलाई / शौर्यपथ / पूरा विश्व कोरोना कोविड.19 से जूझ रहा है। इस संकटकाल में कई ऐसे योद्धा हैं जो चुपचाप अपने कार्यों में डटे हुए हैं। ऐसे ही कर्म योद्धाओं में शामिल हैं विद्युतए पानी और दूरभाष जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले लोग। ऐसे ही एक समर्पित कर्मवीरों की टीम ने अपने प्रयासों से शहर को सुकुन बख्शा है। इस्पात नगरी को निर्बाध विद्युत आपूर्ति करने वाली भिलाई इस्पात संयंत्र के नगर सेवाएँ विभाग के विद्युत अनुभाग के अधिकारियों और कार्मिकों की टीम जिसने इस चुनौती भरे समय में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है। इन्होंने इस दौरान और बेहतर सुविधा देने का प्रयास किया ताकि लोग घर में सुकुन से रह सकें। इन्होंने चुनौती को अवसर में बदल दिया। इन कर्मवीरों को सलाम।
ज्ञातव्य हो कि टाउनशिप का विद्युत नेटवर्क बेहद विस्तृत है। यह 13 सेक्टरों में बंटा भिलाई जिसमें लगभग 300 किलोमीटर से अधिक की एल टी लाईन और लगभग 170 किलोमीटर से अधिक की एच टी लाईन है। 30,000 से अधिक आवासों और 5,000 हजार से अधिक व्यावसायिक संस्थानों की बिजली की देखभाल 24 घंटे और साल भर करनी होती है। कोई त्यौहार और कोई छुट्टी नहीं। जब सभी त्यौहारों का आनंद उठाते हैं तब विद्युत आपूर्ति के इन योद्धाओं को जूझना होता है। काफी पुरानी व्यवस्थाए लाईन और सिस्टम जिसमें अभी भी कुछ पुराने उपकरण लगे हैं। एक बार खराब होने पर स्पेयर्स मिलना कठिन हो जाता है। लगभग 220 सब स्टेशन और लगभग 240 से अधिक ट्रांसफारमर की नियमित देखभाल और निर्बाध विद्युत आपूर्ति की चुनौती। हर व्यक्ति 10 मिनट भी बिना विद्युत के व्याकुल हो उठता है। ऐसे लोगों को घरों में रखना और उनकी आवश्यकता की शत.प्रतिशत पूर्ति करना निश्चित ही एक कठिन कार्य है। कोरोना के संकटकाल और बारिश के आगमन ने विद्युत अनुभाग के समक्ष अनेक चुनौतियाँ खड़ी कर रही है। इन चुनौतियों से निपटने हेतु विद्युत अनुभाग ने अपनी एक कारगर रणनीति बनाई है। आज हमने शहर के इन प्रतिबद्ध योद्धाओं से बातचीत की।
भिलाई इस्पात संयंत्र के विद्युत अनुभाग के प्रभारी महाप्रबंधक विद्युत दिनेश कुमार ने बताया कि उनकी टीम ने कोरोना की चुनौती और लाकडाउन के समय पर उत्कृष्ट सेवा प्रदान करने में कोई कोर.कसर नहीं छोड़ा। हमने हर चुनौती को अवसर में बदला है। इस संबंध में दिनेश कुमार ने आगे कहा कि जैसा कि सभी इस कोरोना के संबंध में सतर्क और जागरूक हैं। वैसे ही मैं और मेरी टीम ने भी पूरी सर्तकता रखी। जैसे.जैसे सूचना मिलती उसके हिसाब से हम भी स्टेप उठाते रहे। सरकार और प्रबंधन के दिशानिर्देशों के पालन का पूरा ध्यान रखा गया। प्रारंभ में कुछ परेशानी हुई। आने.जाने की तकलीफए स्वयं की सेफ्टी और मास्क आदि को लेकर किन्तु धीरे.धीरे सभी दिक्कतें दूर हो गई। सभी का पूरा सहयोग रहा। न्यूनतम मैन पावर में भी हमारी टीम ने बेहतर काम कर दिखाया है।
इस लाकडाउन के दौरान सभी कार्य सामान्य दिनों की तुलना में बेहतर तरीके से संपन्न हुए। यह सब टीम के सदस्यों का सहयोगए उत्साह और समर्पण की वजह से हुआ है। श्री दिनेश कुमार ने बताया कि हमारी टीम ने इस चुनौती भरे समय को भी एक अवसर के रूप लिया और कई अच्छे काम भी कर डालें। कल पर काम नहीं छोड़ा और कोई शिकायत का अवसर भी नहीं दिया। हमारा पूरा ध्यान हास्पिटल और पम्प हाउस पर भी रहा। पानी की आपूर्ति के दौरान पावर कट की जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया। कहीं कोई अनहोनी न हो और सब कुछ बेहतर और सामान्य रूप में संचालित होता रहे इसके लिये हम हमेशा सर्तक रहे। बारिश के मौसम को देखते हुए हमने विद्युत लाइन को बाधित करने वाले पेड़ों की डंगालों की कटाई प्रारंभ कर दी है। इसके अतिरिक्त टाउनशिप के सड़कों की लाईटों को बेहतर बनाने हेतु एलईडी लाईट लगाये जा रहे हैं। साथ ही जहाँ लो.वोल्टेज की समस्या है वहाँ पर नये सब.स्टेशनों की स्थापना की जा रही है।
डीजीएम ए के चैहान जो विद्युत विभाग में प्लानिंग और एयर कंडीशन देखते हैं उन्होंने कहा कि स्पेयर्स की कमी है इसके बावजूद हमने हर समस्या से निपटने का प्रयास किया है। पुराना सिस्टम और कार्मिकों की औसत आयु अधिक होने के बावजूद हमारी टीम ने बेहतर रिजल्ट दिये हैं।

दुर्ग / शौर्यपथ / राहुल गाँधी जी के जन्मदिन उत्सव न कर के प्रत्येक जिले में रक्तदान शिविर का आयोजन भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन छःग के प्रदेश NSUI अध्यक्ष  आकाश शर्मा के निर्देशानुसार आज रक्तदान के कार्यक्रम का आयोजन कर रक्तदान किए कोरोना के इस संकट काल में रक्त की अतिआवश्यकता हैं। ज्यादातर ब्लड बैंक रक्त के अभाव के कारण आवश्यक आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में दुर्ग जिला NSUI द्वारा जिला,विधानसभा पदाधिकारियों के संयुक्त नेतृत्व में चंदूलाल चंद्राकर हॉस्पिटल नेहरू नगर में 10 यूनिट ब्लड डोनेट किया गया NSUI कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस नेता गांधी के जन्मदिन के अवसर पर रक्तदान करके कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के पचासवें जन्मदिन के रक्तदान किया राहुल गांधी जी पार्टी के भीतर सबसे लोकप्रिय युवा नेता हैं और एनएसयूआई का सबसे अधिक जुड़ाव राहुल गांधी जी के साथ है, समय-समय पर राहुल जी युवा कार्यकर्ताओं को पार्टी के भीतर कई बड़े अवसर देते रहते हैं, जिसका उदाहरण छत्तीसगढ़ में भी है।

      सोनू साहू ने कहा कि हमारा साथ हमारे नेता राहुल गांधी के साथ हैं वो एन एस यु आई से बहुत प्यार करते हैं और उनके कारण ही आज आम युवा भी पार्टी के भीतर बड़े बड़े पदों पर है जिसका उदाहरण भिलाई के युवा महापौर/विधायक श्री देवेंद्र यादव जी है जो एनएसयूआई से छात्र राजनीति से दुर्ग जिला अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय सचिव जैसे विभिन्न पदों में रहकर वर्तमान समय मे आज विधायक,महापौर हैं आज हम उनके जन्मदिन पर रक्तदान करके उनकी ओर अपने कदम बढ़ा रहे हैं। प्रेम और निष्ठा को जाहिर कर रहे हैं हम सभी अंतिम सांस तक उनके साथ रहेंगे। राहुल गांधी जी जन्मदिन पर रक्तदान शिविर लगाने का मुख्य उद्देश्य देश में किसी की भी जान रक्त के अभाव में न जाएं इस अवसर पर प्रमुख रूप से दुर्ग जिला कार्यकारिणी अध्यक्ष गुरलीन सिंग,सोनू साहू,आकश यादव,शुभम झा,संदीप साव,पलाश, गुरमुख, प्रणय, अजय अमन दुबे, हरीश देवांगन, सूर्या, गोल्डी कोसरे प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

दुर्ग / शौर्यपथ / आज पूरे दुर्ग जिले के ग्रामीण अंचलों में पारंपरिक रोका छेका की रस्म निभाई गई। ग्राम पतोरा में भी इस रस्म का आयोजन हुआ और यह क्षण विशेष रूप से और भी खुशी में बदल गया क्योंकि पूजा के तुरंत पश्चात मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वीडियो कॉल के माध्यम से यहां के ग्रामीणों से बातचीत की। मुख्यमंत्री ने सरपंच से पूछा कि गायों की पूजा हो गई। आप सभी ने क्या संकल्प ले लिया। आप लोगों के उत्साह को देखकर बहुत खुशी महसूस हो रही है। गौठान को आगे बढ़ाने के लिए गठित समिति के सदस्य सभी ग्रामीण जन उत्साह से जुटे दिख रहे हैं।
रोकाछेका की रस्म को मनाने के लिए आप लोग इतने मेहनत से काम कर रहे हैं। यह बहुत खुशी की बात है रोकाछेका हमारी ग्रामीण संस्कृति की महत्वपूर्ण परंपरा है। इस परंपरा को निभाने के लिए आप लोगों के द्वारा जो यत्न किया गया है। आप लोग इतने उत्साह से जुड़े हैं यह देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। सरपंच श्रीमती अंजीता साहू ने मुख्यमंत्री को बताया कि आज हम लोगों ने सभी से मवेशियों को गौठान में ही रखने की शपथ लिवाई है। इसके लिए हम लोगों ने गौठान में पूरी तैयारी कर ली है। पैरा एकत्रित कर लिया है। पैरा काटने की मशीन भी हम लोगों ने रख ली है। मुख्यमंत्री ने कहा कि खरीफ फसल को बचाने के लिए रोकाछेका बहुत जरूरी परंपरा है। पहले गांव के सभी लोग ऐसे ही संकल्प लेते थे और उसके बाद फसल की रक्षा होती थी।
मुख्यमंत्री ने गांव के वरिष्ठ जनप्रतिनिधि अश्विनी साहू से भी चर्चा की। अश्विनी साहू ने बताया कि गांव में रोकाछेका के लिए दो.तीन दिनों से तैयारी की जा रही थी। सभी को रोकाछेका के दिन सामूहिक शपथ लेने के लिए प्रेरित किया गया है। सभी उत्साह से शपथ लेने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसके अलावा गौठान में भी खरीफ फसल के लिए मवेशियों को रखने के लिए आवश्यक तैयारियां कर ली गई है। श्री साहू ने गौठान की व्यवस्था के संबंध में भी जानकारी मुख्यमंत्री को दी। मुख्यमंत्री ने इस मौके पर पहाटिया से भी बात की। उन्होंने कहा कि पहाटिया लोगों के अच्छे कार्य की वजह से ही गौठान आगे बढ़ रहा है।
शासन ने गौठान को बढ़ावा देने के लिए रोकाछेका के अवसर पर महत्वपूर्ण घोषणाएं भी की है। उन्होंने गांव वालों को खरीफ फसल की शुभकामनाएं भी दी। इस मौके पर कलेक्टर डॉ सर्वेश्वर नरेंद्र भूरे भी उपस्थित रहे। इस मौके पर मुख्यमंत्री के ओएसडी आशीष वर्मा, एसडीएम विनय पोयाम, सीईओ मनीष साहू सहित अन्य अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि मौजूद थे।

खाना खजाना / शौर्यपथ / 1 कटोरी भुनी हुई तिल, थोड़ा-सा गुड़ का टुकड़ा, 2 छोटे चम्मच जीरा, पाव कटोरी मूंगफली (भुनी हुई), 2-3 हरी मिर्च दो टुकड़ों में कटी हुई, एक छोटी गांठ लहसुन की साफ की हुई, चुटकी भर हींग, नमक व लाल मिर्च स्वादानुसार।

विधि :

सबसे पहले हरी मिर्च और लहसुन को मिक्सी में डाल कर हल्का-सा दरदरा पीस लें। फिर बची सभी सामग्री को उसमें डालें और बारीक होने तक पीस लें, लजीज चटनी तैयार है। खाने में स्वादिष्ट और चटपटी इस चटनी को एयर टाइट डिब्बे में भर कर रखें और जब मन चाहें तब खाएं।
वैसे तो यह चटनी हर मौसम में खाई जा सकती है, लेकिन खास तौर पर सर्दियों के दिनों में सेहत के लिए बहुत लाभदायी है।

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