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धर्म संसार / शौर्यपथ / सांदीपनि ऋषि विष्णु के कच्छप और मोहिनी अवतार की कथा के बाद वामन अवतार की कथा सुनाते हैं। पिछले एपिसोड में वामन अवतार के कथा की शुरुआत हुई थी।
फिर सांदीपनि ऋषि बताते हैं कि भगवान विष्णु वामनरूप में अवतार लेकर महाबली की यज्ञशाल के द्वार पर उस समय पहुंचे जब उसका सौवां यज्ञ आरंभ होने वाला था। एक सेवक आकर महाबली को बताता है यज्ञशाला के द्वार पर एक याचक आया है और वह आपसे मिलने की याचना कर रहा है। यह सुनकर शुक्राचार्य कहते हैं कि महाराज यज्ञ का संकल्प करने जा रहे हैं वो जो भी मंगता है, वहीं से देकर भेज दो। तब सेवक कहता है कि मैंने उसे मुंहमांगी भिक्षा लेने की बात कही थी परंतु वह महाराज के हाथों भिक्षा लेने की हठ कर रहा है।
यह सुनकर दानवीर राजा महाबली यज्ञशाल छोड़कर उन्हें दान देने के लिए उठते हैं तो शुक्राचार्य रोककर कहते हैं कि यज्ञ का मुहूर्त निकला जा रहा है। राजा कहते हैं कि जब तक मेरे राज्य में एक भी याचक है तो मैं यज्ञ कैसे कर सकता हूं? यह कहकर वह ब्राह्मण वेशधारी वामन के पास पहुंचकर उनसे कहते हैं कि कहो क्या चाहिए तुम्हें? तब वामन भगवान कहते हैं, राजन! आप भक्त प्रहलाद के पौत्र और महान आत्मा विरोचन के पुत्र हैं और आप स्वयं महान दानवीर हैं अत: यह ब्राह्मण आपसे अपनी यज्ञशाला के लिए तीन पग भूमि दान में मांगने आया है। यह सुनकर राजा महाबली हंसते हुए कहते हैं बस तीन पगभूमि? अरे मांगना हो तो एक राज्य मांग लो।
तभी वहां शुक्राचार्य आकर कहते हैं कि हे राजन! आपका अंतिम यज्ञ पूर्ण होने पर आप त्रिलोकी के राजा बन जाएंगे और यह जो ब्राह्ण है यह और कोई नहीं विष्णु है जो छल से आपके पास आए हैं। यह तीन पग में ही संपूर्ण लोक को नाप देंगे। राजा महाबली यह सुनकर कहते हैं कि हे महर्षि! मेरे द्वार पर चाहे कोई भी आए, मैं अपने पूर्वजों की परंपरा के अनुसार उसे खाली हाथ वापस नहीं जाने दे सकता। इससे मेरी और मेरे पूर्वजों की कीर्ती प्रतिष्ठा गिर जाएगी। यदि ये सचमुच में ही विष्णु है तो यह मेरा सौभाग्य है कि स्वयं भगवान मेरे द्वार पर याचक बनकर खड़े हैं। यह सुनकर शुक्राचार्य क्रोधित होकर कहते हैं राजन यदि तुम इन्हें दान दोगे तो मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम श्रीहिन हो जाओ। ऐसा कहकर शुक्राचार्य वहां से चले जाते हैं।
फिर महाबली कहते हैं, हे ब्रह्मण श्रेष्ठ! मैं आपको दान दूंगा। ऐसा कहकर महाबली हाथ में जल लेकर दान का संकल्प लेकर दान का श्लोक पढ़ते हैं और कहते हैं कि भक्त प्रहलाद का पौत्र और विरोचन का पुत्र आपको तीन पग भूमि दान में देता है।
दान का संकल्प लेने के बाद वामन रूपी प्रभु विष्णु अपने वामन रूप में ही विराट होने लगते हैं। यह देखकर राजा और उसके सभी सेवक अचंभित होकर हाथ जोड़ लेते हैं। आसमान से देवता भी भगवान के इस रूप को देखते हैं। विराट से विराट होकर वामन भगवान अपने दो पग में ही त्रिलोक को नापकर कहते हैं, हे दैत्य राज बली! तुमने मुझे तीन पग भूमि देने का वचन दिया था। दो पग में तो मैंने सारी त्रिलोकी नाप दी। इस प्रकार तुम्हारा सबकुछ मेरा हो चुका है। परंतु अभी तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई है क्योंकि अब तुम्हारे पास कुछ नहीं रहा। इसलिए तीसरा पग रखने के लिए तुम मुझे कोई स्थान नहीं दे सकते। तुम्हारा वचन झूठा हो गया।
आसमान में देखते हुए आश्चर्य चकित और अचंभित दैत्यराज महाबली कहते हैं, नहीं भगवन मैं अपने वचन को सत्य करके दिखाता हूं। आप अपना तीसरा पैर मेरे सिर पर रखिये। यह कहकर राजा अपना सिर झुका देते हैं। यह सुनकर भगवान प्रसन्न होकर अपना तीसरा पैर दैत्यराज बली के सिर पर रखकर हटा लेते हैं।
फिर भगवान विष्णु रूप में प्रकट हो जाते हैं। यह देखकर बली अति प्रसन्न होकर भगवान के हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है। फिर भगवान कहते हैं, महात्मा बली तुम सचमुच दृढ़ प्रतिज्ञ हो। हम तुमसे अति प्रसन्न हैं। गुरु के श्राप और हमारी माया से भी भयभीत नहीं हुए। सबकुछ खोकर भी तुमने अपना वचन पूरा किया है। अत: हम तुम्हें वो स्थान देते हैं जो बड़े-बड़े देवताओं के लिए भी प्राप्त करना कठिन है। सावर्णि मनवंतर में तुम्हें मेरे परम भक्त इंद्र का पद प्राप्त होगा। तब तक तुम सुतल लोक में अपने दादा महाराज प्रहलाद के साथ आनंदपूर्वक निवास करोगे। तुम मुझे वहां सदा सर्वदा पास ही देखोगे। यह सुनकर बली अति प्रसन्न हो जाता है और तब भगवान वहां से अदृश्य हो जाते हैं।
सांदीपनि ऋषि से यह कथा सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि गुरुदेव भगवान तो सर्वशक्तिमान हैं। वे चाहे तो अपने संकल्प मात्र से ही दुष्टों का नाश कर सकते हैं। फिर उन्हें इस प्रकार धरती पर स्वयं आने की क्या आवश्यकता है? यह सुनकर ऋषि कहते हैं तुमने सत्य ही कहा, इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि उनकी लीलाओं को देखकर संसार के समस्त प्राणियों में यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि उसका कोई रखवाला है जो उसे हर संकट से बचा सकता है। यह विश्वास ही उसे धर्म पर दृढ़ रहने के लिए प्रेरणा देता हैं।
फिर ऋषि सांदीपनि कहते हैं कि अब तक मैंने तुम्हें भगवान के जिन अवतारों की कथा सुनाई है वे प्राय: आवेशावतार थे जो 10 और 11 कलाओं से सुशोभित थे। आज मैं तुम्हें भगवान के रामावतार की कथा सुनाऊंगा जो 12 कलाओं से सुशोभित थे। इस अवतार की विशेषता ये है कि भगवान ने अपने आदर्श रूप को स्थापित किया। जिस समय श्रीराम का अवतार हुआ उसी काल में श्री परशुरामजी भी इस धरती पर उपस्थित थे। दो अवतारों का एक साथ धरती पर होना भी उस काल की विशेषता थी। परंतु पुराणों के अनुसार जब श्री परशुरामजी का श्रीराम से सामना हुआ तो परशुरामजी का अवतार काल समाप्त हो गया। एक प्रकार से श्री परशुरामजी को भी आवेशावतार ही कहा जा सकता है।
फिर सांदीपनि ऋषि सीता के स्वयंवर में परशुरामजी के आगमन और उनके द्वारा श्रीराम को विष्णु का धनुष देने की घटना को सुनाते हैं और बताते हैं कि परशुरामजी को श्रीराम में विष्णु के दर्शन हुए तो वे समझ गए कि मेरा अवतार काल समाप्त हुआ और वे उसी क्षण तपस्या के लिए चले गए। फिर सांदीपनि ऋषि भगवान श्रीराम के जन्म, बचपन और उनके गुरुकुल जाने तक की कथा सुनाते हैं। जय श्रीकृष्ण।
नजरिया /शौर्यपथ /चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की टुकड़ियों के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हुई झड़पों में भारतीय सेना के एक कर्नल सहित 20 जवानों की मौत पर शोक व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोर दिया कि हमारे जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। हमारे लिए भारत की अखंडता और संप्रभुता सर्वोच्च है और इसकी रक्षा करने से हमें कोई रोक नहीं सकता। उन्होंने यह भी कहा कि ‘मतभेदों को विवाद नहीं बनने देना चाहिए’, लेकिन यही दिशा है, जिधर भारत-चीन संबंध अब बढ़ चले हैं। देश में रोष और पीड़ा की भावना के मद्देनजर यह विवाद आगे बढ़ सकता है।
सीमा पर संघर्ष में पीएलए के मारे गए सैनिकों की संख्या के बारे में खबरें अपुष्ट हैं। यह याद दिलाता है कि चीन अपने हताहत सैनिकों की कोई आधिकारिक संख्या जारी नहीं करता है। उदाहरण के लिए, भारत के साथ 1962 के युद्ध में चीनी हताहतों की संख्या भी पहले सामने नहीं आई थी। हताहतों की संख्या को पीएलए के आंतरिक सैन्य इतिहास के दस्तावेजों में 1990 के दशक के मध्य में ही साझा किया गया। यह ध्यान रखना अहम है कि भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र के पारदर्शी दृष्टिकोण और चीन जैसे सत्तावादी शासन की अलहदा दृष्टि के बीच एक स्पष्ट अंतर है। गलवान में पीएलए ने जिन बर्बर तरीकों को अपनाया है, उसके कई कारण बताए जा रहे हैं। पीएलए द्वारा पूर्वी लद्दाख में घुसपैठ और सीमा बढ़ाने के कारणों की गहराई में जाना होगा, शायद उसी तरीके से, जैसे कारगिल समीक्षा समिति बनाई गई थी और ऐसा करते हुए नीतिगत कमियों को दूर करना होगा। फिलहाल हमारा ध्यान ‘क्यों’ पर नहीं, ‘आगे क्या’ पर होना चाहिए।
भारत को अपने विकल्पों को सामने रख सावधानी से सोचना होगा और दृढ़ रहना होगा। एक कर्नल का नुकसान किसी भी सेना के लिए बड़ा झटका होता है और भारतीय सेना जैसा उचित समझेगी, जवाब देगी। नाथू ला और चो ला की 1967 की लड़ाई में भारत ने 100 जानें गंवाईं, लेकिन अक्तूबर 1962 के अपमान के दाग को मिटा दिया था, वह जवाब पीएलए की सामूहिक यादों का हिस्सा होगा। हां, भारत के विकल्प सैन्य क्षेत्र से आगे निकल जाएंगे, और यह वास्तव में उन उद्देश्यों से तय होगा, जो नई दिल्ली खुद के लिए तात्कालिक और दीर्घकालिक, दोनों तौर पर तय करेगी। चीन को पूर्वी लद्दाख से वापस पहले की स्थिति में भेजना प्राथमिकता व उद्देश्य होगा, लेकिन जैसा कि जाहिर है, इस उद्देश्य को हासिल करना ही भारत के लिए चुनौती है। चीन अभी गलवान घाटी और अन्य क्षेत्रों में अधिक लाभदायक स्थिति में है, जहां वह आगे बढ़ा है या जहां कब्जा कर चुका है। जहां तक चल रही वार्ता का संबंध है, भारत के लिए यह स्थिति बहुत अनुकूल नहीं है।
क्षेत्र संबंधी विवाद को जान-बूझकर आगे बढ़ाने की कला में चीन माहिर है। वह भलमनसाहत में पीछे हटता दिखते हुए भी अंतत: यह सुनिश्चित करता है कि उस भूभाग पर उसका कब्जा सच्चाई में बदल जाए। डोका ला के मामले में भी यही दिखा था। क्षेत्रीय और सामरिक भूगोल के प्रति चीन की अंतर्निहित योजना के बारे में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। पर भारत ने रणनीतिक भूगोल या सैन्य इतिहास से सीखने को लेकर कोई संकल्प या कौशल नहीं दर्शाया है। लोकतांत्रिक उद्देश्य असंतोष और बहस से पनपते हैं, पर संकट के समय हमें राष्ट्रीय सर्वसम्मति से काम लेना चाहिए। चीन से मिली चुनौती एक अपील भी है कि सियासी दल परस्पर जूझना बंद कर दें। इस दिशा में आयोजित सर्वदलीय बैठक उत्साहजनक है। पिछले 60 वर्षों के इतिहास से संकेत मिलता है कि भारत के भीतर राजनीतिक व वैचारिक विभाजन का फायदा उठाने में चीन सक्षम रहा है, ताकि वह अशांत द्विपक्षीय संबंधों की कहानी अपने हिसाब से लिख सके।
ध्यान रहे, चीन 21वीं सदी के आर्थिक व तकनीकी तंत्र का हिस्सा रहेगा और भारत के विकल्प भी इससे अलग नहीं होंगे। चाहे महामारी दुनिया को दो-धु्रवीय बना दे या लोकतांत्रिक देशों का एक विवादित समूह बन जाए, इससे भारत का रुख तय होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए गलवान की चुनौती पंडित नेहरू और 1962 के आघात के समान हो सकती है या 1982 के मार्गरेट थैचर व फॉकलैंड विजय के समान। अगले कुछ महीने भारत व एशिया के लिए अहम होंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) सी उदय भास्कर, निदेशक, सोसाइटी ऑफ पॉलिसी स्टडीज
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की दस साल बाद वापसी जितनी सुखद है, उससे कहीं अधिक जरूरी है। ऐसे समय में भारत का निर्विरोध चुना जाना भी महत्व रखता है। बुधवार को हुए चुनाव में 193 सदस्यीय महासभा में भारत ने 184 मत प्राप्त किए और सबसे बड़ी बात यह कि एशिया प्रशांत क्षेत्र से भारत की दावेदारी पर पिछले साल जून में ही मुहर लग गई थी। तात्कालिक रूप से हमें आश्चर्यजनक जरूर लगेगा, पर तब भारत की इस दावेदारी का चीन और पाकिस्तान ने भी समर्थन किया था। हमारे प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गैर-स्थाई सदस्य के रूप में भारत के चुने जाने पर उचित ही गहरी कृतज्ञता व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रहते हुए भारत वैश्विक शांति, सुरक्षा और समानता को बढ़ावा देने के लिए सभी सदस्य देशों के साथ मिलकर काम करेगा और यही समय की मांग है।
भारत को सुरक्षा परिषद में तत्काल कोई जगह नहीं मिलेगी और एक जनवरी अर्थात अगले साल ही वह नए रूप में अपनी सक्रियता बढ़ाएगा। बड़ा सवाल यह है कि इस सदस्यता के मायने क्या हैं और भारत इससे किस हद तक लाभ उठा सकता है? भारत पहले भी सात बार सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्य रह चुका है। गौर करने की बात है कि सुरक्षा परिषद में उसकी सबसे मजबूत स्थिति 1970 के दशक में थी, जब भारत की नीतियां ज्यादा स्पष्ट और मुखर थीं। बांग्लादेश के गठन से लेकर संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न अभियानों में भारत की भूमिका को देखते हुए ही उस दशक में हमें दो बार (1972-73 और 1977-78) सुरक्षा परिषद में यह सदस्यता नसीब हुई थी। इस लिहाज से देखें, तो 1993 से 2010 तक एक लंबा दौर रहा, जब हम सुरक्षा परिषद में नहीं थे और हमारी नीतियां तेजी से उदार हो रही थीं। संभव है, इस लंबे अंतराल में भी सुरक्षा परिषद में अगर हमारी भूमिका बड़ी होती, तो हम आज बेहतर स्थिति में होते। अब फिर मौका हमारे हाथ लगा है, तो इसे अधिकतम सीमा तक इस्तेमाल करना हमारी जिम्मेदारी है। ध्यान रहे, पिछले दिनों डब्ल्यूएचओ के कार्यकारी बोर्ड की अध्यक्षता भी भारत को मिली है। इस गाढ़े समय में ये बडे़ मौके हैं, जिनका पूरा फायदा हम उठा सकते हैं।
हमें ध्यान रखना होगा कि राजनय की दुनिया में हमारी आधिकारिक सक्रियता बढ़ना सबसे जरूरी है। राजनय में सक्रियता के बिना हम अपनी पूरी ताकत, क्षमता, योग्यता, कौशल और विशालता का लाभ नहीं ले पाएंगे। चीन जिस तरह से हमें सॉफ्ट टारगेट समझ रहा है, उसकी गलतफहमी सिर्फ भारत की सक्रियता से ही दूर हो सकती है। अभी सभी देश खामोश हैं, क्योंकि हमें हस्तक्षेप या मध्यस्थता मंजूर नहीं है। लेकिन जब भारत आगे आकर सक्रिय होगा, तो उसे मित्र, शत्रु और तटस्थ देशों का अंदाजा होगा। राजनय के मोर्चे पर अभी चीन हमसे असमान रूप से आगे है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में उसे वीटो पावर हासिल है। वह अपने खिलाफ होने वाली किसी भी कोशिश का पीछा कर सकता है। अत: भारत को विश्व स्तर पर किसी भी मंच पर शिथिलता से काम नहीं लेना चाहिए। एक-एक देश महत्वपूर्ण है। चीन के करीबी देशों को भी जमीनी हकीकत बताने में कोई हर्ज नहीं है। साथ ही, अपने अन्य निकटतम पड़ोसियों के साथ भी हमें तालमेल बढ़ाने की जरूरत है, तभी हम अपने विकास के लिए जरूरी सुकून जुटा पाएंगे।
मेलबॉक्स /शौर्यपथ / कोविड-19 महामारी के कारण शिक्षा और स्वास्थ्य के बीच संघर्ष जारी है। असल में, अगले महीने सीबीएसई 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं आयोजित करना चाह रहा है। मेडिकल और इंजीनिर्यंरग की कई प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन भी अगले माह होना है। मगर कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए कई अभिभावकों ने इन परीक्षाओं के आयोजन को लेकर चिंता जताई है, जो वाजिब भी है। इन परीक्षाओं में लाखों परीक्षार्थी शामिल होते हैं। ऐसे में, इनका आयोजन बच्चों व किशोरों के स्वास्थ्य के मद्देनजर होना चाहिए। किसी भी प्रकार की हड़बड़ी या लापरवाही लाखों प्रतियोगियों की सेहत को खतरे में डाल सकती है। लिहाजा स्वास्थ्य और शिक्षा के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है।
सत्यम कुमार, नालंदा, बिहार
तेल के बढ़ते दाम
कोरोना संकट और चीन-सीमा विवाद के बीच पेट्रोल-डीजल के दाम लगभग पांच रुपये प्रति लीटर बढ़ चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कम हुई कीमतों का कोई लाभ शायद ही भारतीयों को मिल पाया। कारण स्पष्ट है कि जन-हितकारी सरकार आम आदमी को होने वाले लाभ को अपनी कमाई में जोड़कर अपना गणित सुधारने में जुटी रही। आम आदमी के बिगड़े हुए गणित से जैसे उसे कोई सरोकार न हो। पेट्रोलियम पदार्थों पर मनमानी नीतियां लागू करके सरकार जनमानस को क्या संदेश देना चाहती है, यह तो वही जाने, पर आम आदमी के लिए ऐसी नीतियां कष्टकारी सिद्ध हो रही हैं, जिसका एहसास सरकार को होना ही चाहिए।
सुधाकर आशावादी, ब्रह्मपुरी, मेरठ
विश्वासघाती चीन
वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हमारे सैनिकों पर अचानक हमला करके चीन ने अक्षम्य अपराध किया है। इस विश्वासघाती हमले के बाद भारत और चीन के बीच रहा-सहा विश्वास भी दरक गया है। अब चीन को कड़ा सबक सिखाना ही चाहिए। इसके लिए सैन्य, कूटनीतिक, राजनीतिक उपायों के साथ-साथ जबर्दस्त आर्थिक नाकेबंदी भी हमें करनी होगी, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था को चोट लगे। वहां से होने वाले आयात में हरसंभव कटौती का प्रयास केंद्र सरकार को करना चाहिए। ऐसी खबरें आई हैं कि हमारे यहां कई प्रोजेक्ट में चीन की कंपनियों को ठेके दिए गए हैं। उन ठेकों को रद्द करते हुए नए टेंडर जारी किए जाने चाहिए और उसमें चीनी कंपनियों के शामिल होने पर रोक लगा देनी चाहिए। हमारे देश में ही करोड़ों प्रशिक्षित लोग बेरोजगार हैं। हम उनके श्रम का सही इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर हम ‘मेक इन इंडिया’ को बुलंद कर सके, तो आत्मनिर्भर आसानी से बन सकेंगे। चीन की हर तरह से आर्थिक कमर तोड़ने के अलावा भारत के पास कोई अन्य विकल्प नहीं है।
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद
योग शिक्षकों की अनदेखी
यह सच है कि सरकार ने योग को देश की प्राचीन पद्धति के रूप में अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। आज हम सभी स्वस्थ जीवन जीने के लिए योग-क्रिया करते हैं। यह बात भी साबित हो चुकी है कि नियमित योग करने से स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन जीने में काफी मदद मिलती है। परंतु यह भी एक दुखद सत्य है कि सरकार योग शिक्षकों को लगातार उपेक्षित कर रही है। नियमित योग शिक्षकों को बहाल करने की बजाय अनुबंध पर कुछ स्कूलों में शिक्षकों को बहाल करके उनके भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। राज्य सरकार योग दिवस पर आयोजन करके अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रही है। शारीरिक शिक्षा अनुदेशकों की बहाली निश्चय ही अच्छी बात है, लेकिन जिन विद्यार्थियों ने योग में पीजी डिप्लोमा और एमए किया है, उनके बारे में केंद्र या राज्य सरकारों का न सोचना काफी दुखद है। स्थाई रोजगार से ही हम विद्यार्थियों में विश्वास पैदा होगा, तभी स्वस्थ तन और मन का भी विकास हो सकेगा।
रीना कुमारी, पटना, बिहार
ओपिनियन / शौर्यपथ / गलवान घाटी की दुखद घटना के बाद अब देश में कई हिस्सों से चीनी उत्पादों के बहिष्कार की मांग उठने लगी है। ‘बायकॉट चीन’ की मजबूत होती जनभावना के बीच केंद्र सरकार ने भी बीएसएनएल और एमटीएनएल जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनियों से कहा है कि वे 4जी के लिए चीन की कंपनियों को टेंडर जारी न करें। मगर जिस तरह से नई दिल्ली और बीजिंग के बीच कारोबारी रिश्ते मजबूत हैं, क्या चीन को किनारे करना संभव है? वह भी तब, जब वैश्विक दुनिया में हर देश के हित दूसरे राष्ट्र से जुड़े हुए हैं?
चीन के साथ हमारा कारोबार कई रूपों में होता है। हम उससे पतंग का मांझा, चीनी मिट्टी की मूर्तियां, गुलाल, पिचकारी, दीपावली की झालरें जैसी गैर-जरूरी चीजें भी मंगवाते हैं, और मोबाइल फोन, इंजीनिर्यंरग व इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के जरूरी कल-पूर्जे भी। गैर-जरूरी उत्पादों के विकल्प हमारे पास मौजूद हैं, लेकिन जरूरी वस्तुओं का आयात तब तक नहीं रोका जा सकता, जब तक उसे हासिल करने का दूसरा रास्ता हमारे पास न हो।
इसके अलावा, चीन पर हमारी व्यापारिक निर्भरता बहुत ज्यादा है। दोनों देशों के बीच पिछले साल लगभग 92 अरब डॉलर का आपसी कारोबार हुआ है, जिसमें हमने चीन से आयात ज्यादा किया और निर्यात कम। सरकार के स्तर पर ‘बायकॉट चीन’ इसलिए भी संभव नहीं है, क्योंकि दोनों देश विश्व व्यापार संगठन के कायदे-कानूनों से बंधे हैं। इसलिए अधिकृत रूप से हम टैरिफ, यानी सीमा शुल्क नहीं लगा सकते। मगर हां, नॉन-टैरिफ बैरियर का लाभ जरूर उठाया जा सकता है। इसका अर्थ है कि सरकार प्रत्यक्ष तौर पर कोई बंदिश नहीं लगाएगी, लेकिन वह परोक्ष रूप से आपसी कारोबार प्रभावित कर सकती है।
सवाल है कि यह होगा कैसे? यह तो तभी संभव है, जब लोगों में राष्ट्रवाद की भावना काफी मजबूत हो जाए। आज कोई भी देश खुलकर किसी दूसरे राष्ट्र की मुखालफत नहीं कर सकता, क्योंकि उनमें कई तरह के कूटनीतिक रिश्ते होते हैं। इसीलिए सरकारें टकराव को हरसंभव टालने के उपाय करती हैं। मगर परदे के पीछे से गैर-राजनीतिक संगठनों के माध्यम से राष्ट्रवाद का माहौल बनाकर वे एक-दूसरे को चोट पहुंचाती रही हैं।
वैसे भी, मौजूदा हालात में सैन्य टकराव न तो चीन के हित में है, और न ही भारत के हित में। कोरोना-संक्रमण ने हर राष्ट्र को गंभीर आर्थिक मुश्किलों में झोंक दिया है। ऐसे में, नॉन-टैरिफ बैरियर ही हमारे लिए सही रास्ता है। गैर-जरूरी उत्पादों के बहिष्कार से चीन को चार-पांच बिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान नहीं होगा, लेकिन इसका संदेश दूर तक अवश्य जाएगा। उसे एहसास होगा कि यदि वह सीमा पर आक्रामक रुख अपनाता है, तो उसे आर्थिक तौर पर इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। उससे भारत जैसा बड़ा बाजार छिन सकता है।
अभी चीन की आर्थिक सेहत भी बहुत अच्छी नहीं है। उसने कोरोना के पहले चरण को भले ही संभाल लिया, लेकिन अब वहां संक्रमण के नए मामले तेजी से पसरने लगे हैं। कोविड-19 के बारे में सही जानकारी छिपाने को लेकर पश्चिमी देश भी उस पर हमलावर हैं। ऐसे में, वह शायद ही कोई नया तनाव बढ़ाना पसंद करेगा। हमारे लिए एक अच्छी बात यह भी है कि दुनिया के तमाम देश अब समझने लगे हैं कि किसी एक मुल्क पर निर्भरता ठीक नहीं है। इसी निर्भरता की वजह से चीन वैश्विक सप्लाई का केंद्र बन गया था। मगर कोरोना-काल में चीन की हालत बिगड़ते ही पूरी दुनिया भी प्रभावित हो गई। अब सभी देश स्थानीय आपूर्ति शृंखला पर अधिकाधिक ध्यान देने लगे हैं। चीन को इसका भी नुकसान होगा। उसके हाथों से अब कई बाजार निकलेंगे। अमेरिका, जापान जैसे कई देशों ने अपनी कंपनियों को वापस अपने देश में बुलाना शुरू भी कर दिया है। इससे आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पडे़गा।
जब से हमने विश्व व्यापार संगठन के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, यह एक धारणा बन गई थी कि जितना अधिक कारोबार हम करेंगे, उतनी ही अधिक खुशहाली आएगी। मगर असलियत में यह विकास तब होता है, जब व्यापार दो समान धरातल वाले देशों के बीच हो। भारत और चीन के कारोबारी रिश्ते का भी यही सच है। चीन कई मामलों में हमसे विकसित है। इसकी बड़ी वजह यही है कि उसने तकनीक और प्रौद्योगिकी की तरफ खासा ध्यान दिया। भूमंडलीकृत दुनिया में तकनीक और प्रौद्योगिकी संपन्न देश ही आगे बढ़ते हैं। हम इस मामले में पिछड़ गए, क्योंकि कहीं न कहीं हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर रही। कोठारी आयोग ने अरसे पहले सार्वजनिक शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का छह प्रतिशत खर्च करने की सिफारिश की थी, लेकिन आज तक हम ऐसा नहीं कर पाए हैं। आज भी बमुश्किल चार प्रतिशत ही सार्वजनिक शिक्षा पर खर्च होता है। यही हाल स्वास्थ्य और अनुसंधान व विकास (आरऐंडडी) का भी है। बेशक अपने यहां बड़ी संख्या में इंजीनियर और डॉक्टर डिग्री पाते हैं, लेकिन विश्व पटल पर जरूरी योग्यता का अभाव उनमें देखा जाता है।
जाहिर है, दीर्घकालिक योजना बनाए बिना हम चीन का मुकाबला नहीं कर सकते। मगर तात्कालिक नुकसान उसे तभी पहुंचाया जा सकता है, जब आम जनता में इसके लिए एकजुटता दिखे। हालांकि, इसमें भी एक बड़ी दिक्कत यह है कि सरकार की नीतियों में सभी लोगों का विश्वास नहीं है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि राजनेता खुद अपनी नीतियों के प्रति ईमानदार नहीं दिखते। अगर वाकई हम चीन का आर्थिक मुकाबला करना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमारी सरकारों को संवेदनशील होना होगा। उनको आम जनता के दुख-दर्द में शामिल होना होगा। क्या हमारे हुक्मरान इसके लिए तैयार हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं) अरुण कुमार,अर्थशास्त्री
दुर्ग / शौर्यपथ / जिस उम्र में बच्चों के हाथ में किताबें और खिलौने होने चाहिए उस उम्र में उन्हें भिक्षावृत्ति की ओर ढकेलना एक जघन्य अपराध ही नहीं है बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी एक घृणित कार्य है। बच्चों से उनका बचपन छीनने का हक किसी को नहीं है, उनके माता पिता को भी नहीं। बच्चों से भीख मंगवाने पर जेजे एक्ट के तहत सजा का प्रावधान भी है।
कलेक्टर डॉ. सर्वेश्वर भूरे ने विगत दिनों जिला बाल संरक्षण समिति की बैठक में स्पष्ट कर दिया था बच्चों की मासूमियत से खिलवाड़ किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसी कड़ी में चाइल्ड लाइन द्वारा आज विशेष रेस्क्यू अभियान के चलाकर 03 बच्चों को भिक्षावृत्ति से रोककर उनके पालकों तक पहुँचाया गया। इस रेस्क्यू अभियान में चाइल्ड लाइन द्वारा पहले बालकों को अपने संरक्षण में लिया उसके बाद बाल कल्याण समिति में प्रस्तुत किया। बाल कल्याण समिति के आदेशानुसार बच्चों को उनके परिजनों को सौप दिया गया, बच्चों को सौपने के पश्चात चाइल्ड लाइन के केंद्र समन्वय द्वारा परिजनों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा गया कि अगली बार यदि बच्चे भीख मांगते पाए गए तो परिजनों को जे जे एक्ट के तहत सजा होगी।
इस रेस्क्यू अभियान में पुलिस विभाग का विशेष सहयोग रहा साथ ही स्वयंसेवी कार्यकर्ता कृतिका देवांगन ने भी अपनी सहभागिता निभाई, चाइल्ड लाइन टीम मेम्बर सविता साहू, भारती बिसेन, ललिता मानिकपुरी, राकेश गुप्ता एवं परामर्शदाता आशीष साहू का भी रेस्क्यू अभियान में महत्वपूर्ण योगदान रहा।
सेहत / शौर्यपथ / आलू हमारी रसोई में सबसे आवश्यक सामग्री में से एक है, वहीं हर तरह के व्यंजनों में हम इसका उपयोग करते हैं। इसके साथ ही एक चमकदार त्वचा के लिए भी आलू का इस्तेमाल किया जाता है। यदि आलू को आइस क्यूब के रूप में चेहरे पर लगाया जाए तो यह न केवल आपकी त्वचा में रेडनेस को कम करता है, वहीं सूजन से भी छुटकारा दिलाता है।
कैसे करें तैयार
आलू के आइस क्यूब को तैयार करने के लिए आपको एक आलू व नींबू की आवश्यकता है। आलू का रस निकाल लें। इसमें कुछ बूंदें नींबू की डालें। इन्हें अच्छी तरह मिला लें।
आइस ट्रे में इन्हें निकालें, फिर 1 दिन बाद इसे बाहर निकालें।
इन आइस क्यूब को तुरंत डायरेक्ट अपने चेहरे पर न लगाएं, वरन इसे किसी कपड़े में लपेटकर फिर अपने चेहरे पर लगाएं।
कुछ देर तक अपने चेहरे पर इसे लगा रहने दें, फिर कुछ देर बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लें।
फायदे
त्वचा में चमक लाने के लिए यह फायदेमंद है। इसके इस्तेमाल से चेहरे की त्वचा चिकनी होगी और मुंहासे खत्म हो जाएंगे।
आलू के आइस क्यूब्स अंडर आई डार्क सर्कल्स का इलाज करने में मदद करते हैं।
चेहरे पर धूप की वजह से आई टैनिंग को कम करने का काम करता है और चेहरे पर ग्लो आता है।
मुंहासों के दाग इसके नियमित इस्तेमाल से गायब होने लगते हैं।
सेहत / शौर्यपथ / गर्मी के मौसम में पसीना। गर्मी से अधिकतर लोग परेशान रहते हैं लेकिन एक हेल्दी त्वचा के लिए पसीना आना जरूरी होता है। कई लोग मानते हैं कि पसीना आपकी त्वचा को तैलीय बनाता है और सभी छिद्रों को अवरुद्ध करता है, लेकिन यह सच नहीं है। वास्तव में यदि आप पसीना नहीं बहाते हैं तो इसका मतलब है कि आपके छिद्र पहले से ही भरे हुए हैं और आपकी त्वचा मुंहासे-ब्रेकआउट के लिए लगभग तैयार है।
जब आपको गर्मी लगती है और पसीना आता है तो आपको प्यास भी लगती है जिससे आप ज्यादा पानी पीते हैं। इससे आपकी त्वचा को कई तरह के फायदे पहुंचते हैं। आइए जानते हैं पसीना आपकी त्वचा के लिए फायदेमंद क्यों है।
पसीना आपके शरीर के सभी हानिकारक विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। ये टॉक्सिन जब पसीने के रूप में नहीं निकलते हैं, तो त्वचा को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप मुंहासे व दाने होते हैं।
जब आपको पसीना आता है तो आपके शरीर से minerals and natural salt निकलता है, जो एक प्राकृतिक एक्सफोलिएटर की तरह काम करता है। यह रोम छिद्रों को साफ करता है और त्वचा में जमी गंदगी और अशुद्धियों को साफ करता है, साथ ही रूखी त्वचा और एलर्जी की समस्या को भी कम करता है।
चेहरे पर जमी गंदगी और अशुद्धियों को दूर करता है।
पसीना हमारे शरीर से सभी गंदगी और बची हुई मृत त्वचा कोशिकाओं को बाहर निकालने में मदद करता है, साथ ही त्वचा को साफ करता है।
पसीना आपकी त्वचा को फ्रेश महसूस कराता है। यदि आप कभी भी वर्कआउट करके या तेज चलने के 1 घंटे के बाद आईने में देखते हैं, तो आपकी त्वचा में एक अलग ही चमक नजर आती है। यह आपके चेहरे पर आए स्वेटिंग के कारण होता है, जो आपकी त्वचा में जमी गंदगी को साफ करता है।
खानाखाजना / शौर्यपथ / आंवले का लजीज मुरब्बा
सामग्री : 1 किलो ताजे आंवला, 10 ग्राम चूना, 25 ग्राम मिश्री, सवा किलो शक्कर, 1 चम्मच काली मिर्च, 5-7 केसर के लच्छे, पाव चम्मच इलायची पावडर।
विधि : 1 किलो ताजे एवं साफ-सुथरे आंवले लेकर पानी में तीन दिन भीगने दें। इसके बाद उन्हें पानी से निकालकर कांटों से गोद लें और चूना पानी में घोलकर उसमें आंवले को तीन दिन तक भीगने दें। चौथे दिन साफ पानी से धोकर मिश्री तथा पानी में उन्हें भाप दें। फिर कपड़े पर फैलाकर सुखा लें।
अब चाशनी बनाकर उसमें आंवले छोड़ दें और पकाएं। जब आंवले अच्छी तरह गल जाएं तब उसमें काली मिर्च, केसर और इलायची मिला दें। तत्पश्चात मुरब्बा ठंडा करके मर्तबान में भरकर रख दें। तैयार आंवले का मुरब्बा दिल को ताकत और दिमाग को तरोताजा करने साथ-साथ सेहत के बहुत ही लाभदायी है।
भरवां आंवले का अचार
सामग्री : 1 किलो ताजे बड़े आकार के आंवले, 100 ग्राम राई, 100 ग्राम सरसों, 100 ग्राम पिसी लाल मिर्च, आधा चम्मच हल्दी, 25 ग्राम सौंफ, चुटकीभर हींग, 500 ग्राम मीठा तेल, नमक स्वादानुसार।
विधि : आंवलों को धोकर कपड़े से साफ पौंछ कीजिए। अब एक बर्तन में आंवले डालकर दो बड़े चम्मच तेल डालकर धीमी आंच पर पकाएं। हल्के से पकने पर उन्हें आंच से उतार कर ठंडा कर लें। तत्पश्चात आंवलों की गुठलियां अलग कर दें।
अब कड़ाही में तेल गरम करके उसे थोड़ा-सा ठंडा कर लें। इस तेल में उपरोक्त सभी मसालें डालकर चलाएं। पूरी तरह ठंडा होने पर आंवले में चम्मच की सहायता से मसाला भर दें और जार में भरकर बंद कर दें। लीजिए तैयार है आंवले का स्वादिष्ट चटपटा भरवां अचार। आंवला पाचनशक्ति बढ़ाकर भूख बढ़ाता है आलस्य को दूर करता है।
आंवले की तरी वाली सब्जी
सामग्री : 200 ग्राम बेसन, 10-15 कली सूखे आंवले (जो बाजार में सूखे हुए मिलते हैं), 4-5 हरी मिर्च, 4-5 कली लहसुन, अदरक एक गांठ (बारीक कटी हुई), 250 ग्राम प्याज (किसी हुई), 1 चम्मच लाल मिर्च, 1 चम्मच सूखा धनिया, 1 चम्मच हल्दी, 2 बड़े चम्मच मॉयन के लिए तेल 1/2 (आधा) चम्मच सौंफ, जीरा, अजवाइन, तेलपात, स्वादानुसार नमक, गरम मसाला, तलने के लिए तेल।
खुरमे बनाने की विधि : सबसे पहले 10-15 सूखे आंवलों को गरम तेल में तलिए, ठंडा होने पर बारीक मिक्सी में पीसिए। आंवला और बेसन साथ में मिलाकर छान लीजिए। ऊपर दी गई सामग्री में से आधी सामग्री बेसन के साथ मिला लीजिए (प्याज, हरी मिर्च, अदरक, लहसुन, सौंफ, अजवाइन, लाल मिर्च, स्वादानुसार नमक, मॉयन के लिए दो चम्मच तेल) आदि सभी सामग्री डालकर खुरमे की तरह आटा गूंथ लें। गैस पर कड़ाही रखकर तेल गरम करके गूंथे हुए आटे की छोटे, गोल, चपटे खुरमे बनाकर तलिए, सुनहरा होने पर निकालिए।
तरी के लिए सामग्री : सबसे पहले कड़ाही में दो बड़े चम्मच तेल डालकर गरम करें। फिर उसमें जीरा व तेजपान और उपरोक्त बची हुई आधी सामग्री (अदरक, हरी मिर्च, प्याज, लहसुन) डालकर सुनहरा होने तक भूनें। फिर उसमें एक-एक चम्मच सूखा धनिया, लाल मिर्च, हल्दी डालकर भूनें।
जब मसाले तेल छोड़ने लगे तो आधा लीटर पानी डालकर एक उबाली लें, और आंवले के खुरमे डाल दें। फिर 15 से 20 मिनट तक पकने दें। पकने के बाद आधा चम्मच गरम मसाला व हरा धनिया डालकर गर्म-गर्म पराठे के साथ सर्व करें।
धर्म संसार / शौर्यपथ / सांदीपनि ऋषि विष्णु के मत्स्य अवतार की कथा के बाद कहते हैं कि अब मैं तुम्हें श्रीहरि के कच्छप अवतार की कथा सुनाता हूं।
फिर सांदिपनि ऋषि महाराज महाबली और उनके असुरों एवं इंद्र और उनके देवताओं द्वारा समुद्र मंथन, अमृत वितरण के दौरान युद्ध और असुरों द्वारा धनवंतरि देव से अमृत का कलश छुड़ाकर भाग जाना फिर श्रीहरि के मोहिनी रूप में प्रकट होने की कथा को श्रीकृष्ण और बलराम को सुनाते हैं।
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा
सभी असुर अमृत कलश के अमृत को पहले पीने की होड़ के चलते आपस में लड़ते हैं तभी मोहिनी रूप धारण कर भगवान विष्णु असुरों के समक्ष प्रकट होकर नृत्य करने लगते हैं। सभी का ध्यान उस ओर चला जाता है। राहु, केतु और महाबली सभी दैत्य उनका नृत्य देखने के बाद पूछते हैं सुंदरी कौन हो तुम? सभी देवता भी वहां आकर खड़े हो जाते हैं।
मोहिनी रूप धारण किए विष्णु पहले तो कहते हैं कि मैं स्वच्छंद नारी हूं। कुलीन लोगों का मनोरंजन करती हूं। फिर वे असुरों को धर्म और न्याय की बात बताकर लुभाते हैं और कहते हैं कि जो उच्च कुल का होता है वह कलह को छोड़कर न्याय करता है। फिर मोहिनी असुरों को अपने शब्द और मोहजाल में फांसकर कहती हैं कि मैं यही सोचकर इतनी दूर से आपकी सभा देखने आई थी कि परंतु यहां तो कलह कलेश है, द्वैष है, अन्याय है तो यहां मेरा मन नहीं लगेगा। अच्छा मैं चलती हूं। तभी एक असुर कहता है, हे मोहिनी तुम्हारे यहां आने से ऐसा लगा जैसे वसंत ऋतु आ गई हो। अगर हम यह कलह छोड़कर द्वैष मिटा दें तो क्या तुम यहां रुकोगी? और हम सबका मनोरंजन करोगी?
मोहिनी कहती हैं बड़े चतुर हो परंतु तुमने न्याय की बात नहीं की? तब असुर कहता है हम अन्याय भी नहीं करेंगे। तब मोहिनी कहती हैं परंतु इसका निर्णय कौन करेगा? तब वह असुर कहता है तुम। महाबली भी कहते हैं हां तुम। हम न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म का सारा निर्णय तुम पर छोड़ते हैं। यह सुनकर मोहिनी कहती हैं प्रमाण। तब एक असुर अमृत कलश दिखाकर कहता है प्रमाण तो ये है। ये है अमृत कलश जिसे चाहे पिला दो और जिसे चाहे प्यासा मार डालो।
फिर मोहिनी उस असुर के हाथ से अमृत कलश लेकर कहती हैं, ना ना ना, इतना बड़ा उत्तरदायित्व मेरे कंधों पर ना डालो। मेरे कंधे बड़े कोमल है। मेरा मन बड़ा चंचल है। शास्त्र कहता है कि कुलीन पुरुषों को किसी स्वच्छंद नारी पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। तुम महर्षि कश्यप के कुल से हो, फिर सोच लो।
तब महाबली कहते हैं, देवी बड़े से बड़ा वीर, कुलीन, महात्मा और योगी जब किसी सुंदर स्त्री के नयनों से घायल हो जाता है तो वह अपना सबकुछ उसकी ठोकरों में डाल देता है। तब उसे उचित-अनुचित, पाप-पुण्य का कोई भान नहीं रहता। यही दशा हमारी है। जो तुम्हारी इच्छा हो वही करो। योग्य-अयोग्य, पात्र-कुपात्र तुम्ही जानों। जिसे अमृत के योग्य समझो उसे अमृत दो और जिसे अपने सौंदर्य के योग्य समझो उसे अपने सौंदर्य का रसपान कराओ और जिसे अपने योग्य समझो उसे अपना आप सौंप दो। जो तुम्हें पा लेगा उसे फिर अमृत की क्या आवश्यकता।
यह सुनकर मोहिनी कहती हैं कि सत्य कहा, प्राणी यदि ऐसा ही समर्पण भगवान के समक्ष कर दे तो तक्षण मुक्ति पा ले। परंतु शायद भगवान नारी के ही रूप में अधिक शक्तिशाली होते हैं। यह सुनकर दैत्य समझ नहीं पाते हैं कि यह मोहिनी क्या कहना चाहती है तभी मोहिनी कहती हैं, अच्छी बात है अब मैं ही न्याय करूंगी। फिर मोहिनी अपनी माया से नृत्यसभा का निर्माण करके सभी देवता और दानवों को अलग-अलग लाइन से बैठा देती हैं। फिर वह कहती हैं कि जैसा कि आपने स्वयं ही कहा है कि मैं जिसे जिस योग्य समझूंगी, उसे उसी रस का पान कराऊंगी। स्वीकार है? सभी देवता और दानव एक साथ कहते हैं स्वीकार है, स्वीकार है परंतु नृत्य के साथ। मोहिनी कहती हैं अच्छा। फिर वह अमृत कलश को एक निश्चित जगह पर रखकर नृत्य करने लगती हैं।
एक ओर देवताओं के राजा इंद्र और दूसरी ओर दैत्यों के राजा महाबली बैठकर नृत्य का आनंद उठाते हैं। फिर मोहिनी नृत्य गान करते हुए ही कलश उठाकर पहले इंद्र को अमृत पान कराती हैं और पुन: कलश को ले जाकर रख देती है। फिर अपनी माया से कलश को बदलकर उस कलश को उठाकर लाती हैं और बली को उस कलश का जल पिलाती हैं और पास ही बैठे दूसरे असुर को भी जल पिलाती हैं। सभी समझते हैं कि ये अमृत है। तभी एक असुर मदमस्त होकर उठता है और मोहिनी के साथ ही नृत्य करने लगता है। यह देखकर दो असुर और उठकर नृत्य करने लगते हैं।
कलश बदल-बदल कर वह देव और असुरों को जल पिलाती रहती हैं। फिर कुछ देव भी अमृत पीने के बाद नृत्य करने लगते हैं। तभी एक असुर मोहिनी के इस छल को देख लेता है। तब वह चुपचाप वेश देवता का धारण करके देवताओं की पंक्ति में बैठ जाता है। उस असुर का यह छल चंद्रदेव देख लेते हैं।
मोहिनी उसे अमृत पिलाने लगती है तभी वह देवता कहते हैं मोहिनी ये तो दानव है। तभी मोहिनी बने भगवान विष्णु अपने असली रूप में प्रकट होकर अपने सुदर्शन चक्र से उस दानव की गर्दन काट देते हैं और फिर वे वहां से अदृश्य हो जाते हैं। यह देखकर बाली कहता है धोका, हमारे साथ धोका हुआ है। यह सुनकर इंद्रदेव कहते हैं आक्रमण और वहां युद्ध प्रारंभ हो जाता है।
सांदीपनि ऋषि कहते हैं तब देवता और असुरों में भयानक युद्ध छिड़ गया जिसे पुराणों में देवासुर संग्राम कहा गया है। अमृत पिकर देवता बलवान हो चुके थे। इसलिए इंद्र के हाथों स्वयं महाराज बली भी मारे गए। लेकिन दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य संजीविनी विद्या जानते थे। इसलिए युद्ध के पश्चात उन्होंने उन सभी दैत्यों को जिनके सिर धड़ से अलग नहीं हुए थे उनको जीवित कर दिया। सबसे पहले उन्होंने राजा बली को जीवित किया।
राजा बली परम भक्त प्रहलाद के पौत्र थे और परमवीर भी थे। इंद्र से उस हार का बदला लेने के लिए शुक्राचार्य ने राजा बली से सौ यज्ञ कराने का अनुष्ठान कराया। 99वें यज्ञ के दौरान शुक्राचार्य ने उनको आशीर्वाद देकर कहा कि अब केवल एक यज्ञ रह गया है और यदि वह भी निर्विघ्न पूरा हो जाए तो आपके 100 यज्ञ पूरे हो जाएंगे और उसी समय इंद्रपद सर्वदा के लिए आपका हो जाएगा। स्वर्ग पर देवताओं का वर्चस्व सदैव के लिए समाप्त हो जाएगा। यह यज्ञ तुम्हारे तप की ही नहीं, हमारे बल और विद्या की भी परीक्षा है। अब देवगुरु बृहस्पति भी देख लेंगे कि समस्त देवताओं को तेजहिन करके यह शुक्राचार्य असुर जाति को त्रिलोकी का राज्य दिला सकता है। यह सुनकर महाबली कहता है कि और विष्णु भी देख लेंगे कि उनकी माया और छल से असुर शक्ति को आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता है।
उधर, सभी देवता गुरु बृहस्पति के साथ भगवान विष्णु के पास जाकर कहते हैं प्रभु यदि उसका सौंवा यज्ञपूर्ण हो जाएगा तो वह तीनों लोकों का अधिपति हो जाएगा। विष्णु कहते हैं कि जो तपस्या करेगा और कर्म करेगा वो तो उसका फल पाएगा ही, ये तो प्रकृति का विधान है। इस पर बृहस्पति कहते हैं कि परंतु जो प्रकृति का विधान विनाश की ओर जाने लगे और अधर्म की स्थापना हो तो उसे रोका जाना चाहिए प्रभु। आपको प्रकृति के विधान के ऊपर जाकर दैवीय विधान के माध्यम से इस विनाश को रोकना चाहिए। यह सुनकर विष्णु कहते हैं आपका वचन सत्य है। हम अपने उत्तरदायित्व का अवश्य निर्वाह करेंगे।
फिर सांदीपनि ऋषि बताते हैं कि भगवान विष्णु वामनरूप में अवतार लेकर महाबली की यज्ञशाल के द्वार पर उस समय पहुंचे जब उसका सौवां यज्ञ आरंभ होने वाला था। एक सेवक आकर महाबली को बताता है यज्ञशाला के द्वार पर एक याचक आया है और वह आपसे मिलने की याचना कर रहा है। यह सुनकर शुक्राचार्य कहते हैं कि महाराज यज्ञ का संकल्प करने जा रहे हैं वो जो भी मंगता है, वहीं से देकर भेज दो। तब सेवक कहता है कि मैंने उसे मुंहमांगी भिक्षा लेने की बात कही थी परंतु वह महाराज के हाथों भिक्षा लेने की हठ कर रहा है। जय श्रीकृष्ण।
धर्म संसार / शौर्यपथ / कुण्डली में राहु-केतु परस्पर 6 राशि और 180 अंश की दूरी पर दृष्टिगोचर होते हैं जो सामान्यतः आमने-सामने की राशियों में स्थित प्रतीत होते हैं। कुण्डली में राहु यदि कन्या राशि में है तो राहु अपनी स्वराशि का माना जाता है। यदि राहु कर्क राशि में है तब वह अपनी मूलत्रिकोण राशि में माना जाता है। कुण्डली में राहु यदि वृष राशि मे स्थित है तब यह राहु की उच्च स्थिति होगी। मतान्तर से राहु को मिथुन राशि में भी उच्च का माना जाता है। कुण्डली में राहु वृश्चिक राशि में स्थित है तब वह अपनी नीच राशि में कहलाएगा। मतान्तर से राहु को धनु राशि में नीच का माना जाता है। लेकिन यहां राहु के पहले घर में होने या मंदा होने पर क्या सावधानी रखी जानिए।
कैसा होगा जातक : दौलतमंद तो होगा पर खर्चा बहुत होगा। यहां व्यक्ति की बुद्धि ही उसका साथ देगी बशर्ते वह अति कल्पनावादी न हो। 1 से 6 तक जैसी बुध की हालत वैसी राहु की मानी जाएगी। 7 से 12 तक जैसी केतु की हालत वैसी राहु होगी। पहला घर मंगल और सूर्य से प्रभावित होता है, यह घर किसी सिंहासन की तरह होता है। पहले घर में बैठा ग्रह सभी ग्रहों का राजा माना जाता है। जातक अपनी योग्यता से बड़ा पद प्राप्त करेगा। इस घर में राहु उच्च के सूर्य के समान परिणाम देगा, लेकिन सूर्य को ग्रहण माना जाएगा अर्थात सूर्य जिस भाव में बैठा है उस भाव के फल प्रभावित होंगे। यदि मंगल, शनि और केतु कमजोर हैं तो राहु बुरे परिणाम देगा अन्यथा यह पहले भाव में अच्छे परिणाम देगा।
5 सावधानियां :
1. व्यर्थ के बोलते रहने से बचें और वाणी पर नियंत्रण रखें।
2. सोच-समझकर बुद्धि से काम लें और अति कल्पना से बचें।
3. व्यर्थ के तंत्र, मंत्र या यंत्र आदि के चक्कर में न पढ़ें।
4. पिता, गुरु और अपने से बड़ों का सम्मान करें।
5. ससुराल पक्ष से संबंध अच्छे रखें। ससुराल वालों से बिजली के उपकरण या नीले कपड़े नहीं लेने चाहिए।
क्या करें :
1. गले में चांदी पहनें।
2. बहते पानी में नारियल भी बहाएं।
3. बहते पानी में 400 ग्राम सुरमा बहाएं।
4. गुरु का उपाय करें।
5. 1:4 के अनुपात में जौ में दूध मिलाएं और बहते पानी में बहाएं।
नजरिया / शौर्यपथ / एक अनुमान है कि भारत में लगभग एक करोड़ 60 लाख ऐसे कामगार हैं, जो सिलाई-कढ़ाई-बुनाई जैसे कामों से जुडे़ हुए हैं। ये कामगार मुख्यत: ग्रामीण भारत में रहते हैं, और हमारे कपड़ा उद्योग की उस जटिल प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिस पर शायद ही कभी दुनिया की नजर जाती है। न सिर्फ संख्या बल के लिहाज से यह एक बड़ी तादाद है, बल्कि ये कामगार हमारे कुशल श्रमबल का हिस्सा हैं। पेशेवर गहन जानकारियों के लिहाज से ये लोग काफी हुनरमंद हैं और इन्होंने यह ज्ञान बेहद काबिल मास्टरों से सीखा है, जो सदियों से हमारे समाज का हिस्सा रहे हैं।
1960 के दशक में पहली बार मैंने पश्चिम बंगाल के गांवों में कपड़े पर सोने की बारीक कढ़ाई का काम होते देखा। वहां पर यह काम सदियों से चलन में रहा है। कहा जाता है कि सोने की कढ़ाई की शुरुआत ईरान में हुई और भारत में यह सल्तनत काल में आई। इन गांवों की कशीदाकारी को बंगाल के नवाबों का संरक्षण हासिल था। वास्तव में, हमारा देश ऐसी ग्रामीण-कार्यशालाओं से भरा पड़ा है, उन्हें आर्थिक मदद और बेहतर बुनियादी ढांचे की जरूरत है, क्योंकि इसके बिना अब ये जीवित नहीं रह सकेंगी। महामारी के बाद देश के हथकरघा व दस्तकारी क्षेत्र को जीवित रहने के लिए रास्ता चाहिए। सरकारी एंपोरियमों की अब कोई प्रासंगिकता नहीं है।
दरअसल, इस संदर्भ में हमारा नजरिया ही गलत है। एक बेहतर हैंडलूम उत्पाद को, जो न सिर्फ मनमोहक, बल्कि पारिस्थितिकी के अनुकूल भी होता है, सहानुभूति के साथ नहीं बेचा जा सकता। उसे मार्केटिंग व रिटेलिंग की आधुनिक तकनीक की जरूरत है। उसे दुनिया में श्रेष्ठतम रूप में पेश किए जाने की आवश्यकता है। प्रतिस्पद्र्धी बाजार में बने रहने का यही एक रास्ता है। यह हम सब जानते हैं कि देश में सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया कराने वाले क्षेत्रों में कृषि के बाद कपड़ा क्षेत्र दूसरे नंबर पर आता है। 200 साल पहले तक दुनिया को कपडे़ का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता हमारा देश था। मगर आजादी के मिलने तक यह अपने ही कपड़ों की कॉपी इंग्लैंड के औद्योगिक क्षेत्रों से लेकर इस्तेमाल करने वाला देश बन गया। जाहिर है, कारीगरी की हमारी समृद्ध आर्थिकी के तहस-नहस हो जाने के कारण भारत के ग्रामीण बाजार बुरी तरह प्रभावित हुए।
लेकिन आजादी के बाद सरकार ने अपनी हस्तशिल्प विरासत को फिर से जिंदा करने की कोशिश की और चमत्कारिक रूप से भारत ने कई बिसरा दिए गए कौशल को पुनर्जीवित भी कर लिया। यह एक दूरदर्शिता भरा लक्ष्य अवश्य था, मगर इसे आसानी से हासिल नहीं किया जा सका। भारतीय दस्तकारी की विरासत को सहेजने के लिए निरंतरता से भरा एक प्रगतिशील पुनरोद्धार आंदोलन चलाया गया। इन कपड़ों को ‘विश्वकर्मा’ प्रदर्शनियों की एक शृंखला के रूप में देश-दुनिया में लॉन्च किया गया।
पिछले दो दशकों से भी अधिक वक्त में भारतीय फैशन उद्योग ने काफी प्रगति की है। और बाकी दुनिया के उलट इसके पास डिजाइनरों की एक देशज टीम है। इस टीम में सिर्फ वही नहीं हैं, जो रैंप पर दिखते हैं, बल्कि इसका हिस्सा वे कामगार भी हैं, जो गांवों में बसते हैं। इनमें बुनकर, कशीदाकारी करने वाले, और साज-सज्जा की डिजाइन तैयार करने वाले कारीगर शामिल हैं। ज्यादातर भारतीय वस्त्रों और उनके ग्लैमराइजेशन का श्रेय इन्हें दिया जा सकता है। महामारी के कारण इस क्षेत्र की हालत को देखते हुए बहुत जरूरी है कि सरकार अपनी तरफ से कोई पहल करे, जैसा उसने 1950 के दशक में किया था, ताकि देश की दस्तकारी को बचाया जा सके। दुनिया आज कपड़ों के उत्पादन में काफी उन्नत मशीनरी का इस्तेमाल करती है और इसका असर क्या होता है, यह हम बनारसी साड़ी के मामले में देख सकते हैं। चीनी उत्पादों ने बनारस के हैंडलूम बाजार को बरबाद कर दिया है। महामारी बाद इस क्षेत्र के कामगारों के लिए आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। वस्त्र के क्षेत्र में एक बौद्धिक संपदा के आगे संकट का सवाल तो खैर है ही।
सरकार को इस क्षेत्र में स्टार्ट-अप को प्रोत्साहित करने के लिए आगे आना चाहिए। ग्रामीण कृषि पृष्ठभूमि में दस्तकारी वाले कपड़ों का बेहतर उत्पादन हो सकता है। इसके लिए बुनियादी ढांचे या कौशल विकास में ज्यादा निवेश की जरूरत भी नहीं। यह दुनिया में हमारा इकलौता ‘मेड इन इंडिया बाइ हैंड’ ब्रांड होगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) रितु कुमार, फैशन डिजाइनर
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / जिस देश की सीमा पर तनाव हो, उसका एकजुट होना समय की सबसे बड़ी मांग है। यह एकजुटता देश के जवानों की शहादत का भी सबसे सच्चा सम्मान है। आज जब देश के लोग और तमाम नेता शहीदों का सम्मान कर रहे हैं, उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं, तब यह हमारे लिए देश के पक्ष में विचार करने का सही समय है। ध्यान रहे, चीन के भी जवान शहीद हुए हैं, लेकिन उनके सम्मान के लिए उसके नेताओं के पास दो शब्द भी नहीं हैं। चीन ने कितने जवान खोए हैं, वह शायद ही बताए, लेकिन भारत में एक-एक जवान की जान कीमती है। वाजिब सम्मान के साथ अपने जवानों की शहादत को सदियों तक याद करना हमारी परंपरा रही है। इस परंपरा के सच्चे सम्मान का ही एक बुनियादी व्यवहार हमारी एकजुटता है।
आज ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों ने अपने आपसी मतभेदों को भुला दिया है और वे सरकार व सेना के साथ खड़ी हैं। सीमा पर होने वाला कोई भी संघर्ष किसी एक नेता या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, देश की जिम्मेदारी है। सैनिक देश की रक्षा की शपथ लेते हैं, देश के लिए जान गंवाते हैं। ऐसे में, हमारे रक्षा मंत्री और अन्य नेताओं ने बिल्कुल सही कहा है, शहादत बेकार नहीं जाएगी। यदि हम वाकई चाहते हैं कि शहादत सार्थक हो, तो हमें सबसे पहले एकजुट होने की जरूरत को महसूस करना होगा। राजनीतिक एकजुटता सबसे जरूरी है और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आगामी बैठकों का खास महत्व है। ध्यान रहे, चीन के प्रति हमारा सांस्कृतिक-ऐतिहासिक-आर्थिक-राजनीतिक जुड़ाव हमें किसी निर्णय लेने की प्रक्रिया में संकोची बना देता है। हम एक कदम आगे बढ़ाकर दो कदम पीछे खींच लेते हैं, लेकिन हम मिल-जुलकर यह नहीं देखते कि चीन कदम-दर-कदम कहां से कहां पहुंच गया है। हमें एकजुट होकर इस सच को सामने लाना चाहिए। ध्यान रहे, चीन अपने लोगों को यह नहीं बता रहा कि उसने भारत की जमीन पर कहां-कहां, किस-किस आधार पर दावा कर रखा है। वह गलवान घाटी को चीनी क्षेत्र बता रहा है, तो यह जरूरी है कि हम दुनिया को सच बताएं।
सख्त शासन की वजह से चीन अपने इतिहास, विरासत व पूर्वजों के विरुद्ध चल रहा है, वरना उसे याद रहता कि चीनी धर्मगुरु कन्फ्यूसियस ने कहा था, ‘एकता, वास्तव में, लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने की अनुमति देती है, और फिर खुशी हासिल करती है’। चीन एक समय बुद्धमय भी हो गया था, आज भी वहां बुद्ध का बहुत प्रभाव है। उसे सोचना चाहिए कि जिस देश की जमीन पर वह निगाह गड़ाए बैठा है, वह देश उसी बुद्ध का है, जिनके शांति और अहिंसा के संदेश के सामने संसार झुक जाता है। चीन सब भूल गया, पर हमें नहीं भूलना है। सीमा पर तनाव भी हमारे लिए चौतरफा प्रेरणा का समय है। कूटनीतिक, राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक, सामाजिक और साथ ही कोरोना के मोर्चे पर भी हमें और एकजुट होकर मुकाबला करना है। 45 साल बाद जो शहादत हुई है, वह चेतावनी है कि हमें अपना रास्ता ठीक कर लेना चाहिए। देशसेवा के प्रति समर्पण के अभाव और एकजुटता की कमी की वजह से ही भारतीय लोकतंत्र की शोभा कम होती है और चीन हमारी खामियों के बहाने ही लोकतंत्र और हमारी ताकत का मखौल उड़ाता है। बेशक, हम एकजुट हुए, तो सबको सही जवाब मिल जाएगा।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
