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// हरेली पर्व से होगी इस अभिनव योजना की शुरूआत: मुख्यमंत्री भूपेश बघेल
// गौ-पालन और गोबर प्रबंधन से पशुपालकों को होगा लाभ , गांवों में रोजगार और अतिरिक्त आय के अवसर बढ़ेंगे
// निर्धारित दर पर होगी गोबर की खरीदी, सहकारी समितियों से बिकेगी वर्मी कम्पोस्ट
// गोबर की खरीदी की दर तय करने पांच सदस्यीय मंत्री मण्डल की उप समिति गठित
// गोबर प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया का निर्धारण करेगी मुख्य सचिव की अध्यक्षता में सचिवों की कमेटी
रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ राज्य में गौ-पालन को आर्थिक रूप से लाभदायी बनाने तथा खुले में चराई की रोकथाम तथा सड़कों एवं शहरों में जहां-तहां आवारा घुमते पशुओं के प्रबंधन एवं पर्यावरण की रक्षा के लिए छत्तीसगढ़ राज्य में गोधन न्याय योजना शुरू करने का एलान किया है। इस योजना की शुरूआत राज्य में हरेली पर्व के शुभ दिन से होगी। मुख्यमंत्री बघेल ने आज अपने निवास कार्यालय के सभा कक्ष में ऑनलाईन प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य सरकार की इस अभिनव योजना की जानकारी दी।
मुख्यमंत्री ने गोधन न्याय योजना के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि इस योजना का उद्देश्य प्रदेश में गौपालन को बढ़ावा देने के साथ ही उनकी सुरक्षा और उसके माध्यम से पशुपालकों को आर्थिक रूप से लाभ पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने बीते डेढ़ सालों में छत्तीसगढ़ की चार चिन्हारी नरवा, गरूवा, घुरूवा, बाड़ी के माध्यम से राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने चारों चिन्हारियों को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। गांवों में पशुधन के संरक्षण और संवर्धन के लिए गौठानों का निर्माण किया गया है। राज्य के 2200 गांवों में गौठानों का निर्माण हो चुका है और 2800 गांवों में गौठानों का निर्माण किया जा रहा है। आने वाले दो-तीन महीने में लगभग 5 हजार गांवों में गौठान बन जाएंगे। इन गौठानों को हम आजीविका केन्द्र के रूप में विकसित कर रहे हैं। यहां बड़ी मात्रा में वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण भी महिला स्व-सहायता समूहों के माध्यम से शुरू किया गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि गोधन न्याय योजना राज्य के पशुपालकों के आर्थिक हितों के संरक्षण की एक अभिनव योजना साबित होगी। उन्होंने कहा कि पशुपालकों से गोबर क्रय करने के लिए दर निर्धारित की जाएगी। दर के निर्धारण के लिए कृषि एवं जल संसाधन मंत्री रविन्द्र चौबे की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय मंत्री मण्डलीय उप समिति गठित की गई है। इस समिति में वन मंत्री मोहम्मद अकबर, सहकारिता मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम, नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ. शिव कुमार डहरिया, राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल शामिल किए गए हैं। यह मंत्री मण्डलीय समिति राज्य में किसानों, पशुपालकों, गौ-शाला संचालकों एवं बुद्धिजीवियों के सुझावों के अनुसार आठ दिवस में गोबर क्रय का दर निर्धारित करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि गोबर खरीदी से लेकर उसके वित्तीय प्रबंधन एवं वर्मी कम्पोस्ट के उत्पादन से लेकर उसके विक्रय तक की प्रक्रिया के निर्धारण के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में प्रमुख सचिवों एवं सचिवों की एक कमेटी गठित की गई है। उन्होंने कहा कि राज्य में हरेली पर्व से पशुपालकों एवं किसानों से गोबर निर्धारित दर पर क्रय किए जाने की शुरूआत होगी। यह योजना राज्य में अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण साबित होगी और इसके दूरगामी परिणाम होंगे। इसके माध्यम से गांवों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। मुख्यमंत्री ने किसानों, पशुपालकों एवं बुद्धिजीवियों से राज्य में गोबर खरीदी के दर निर्धारण के संबंध में सुझाव देने का भी आग्रह किया।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य में खुले में चराई की परंपरा रही है। इससे पशुओं के साथ-साथ किसानों की फसलों का भी नुकसान होता है। शहरों में आवारा घूमने वाले मवेशियों से सड़क दुर्घटनाएं होती है, जिससे जान-माल दोनों का नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि गाय पालक दूध निकालने के बाद उन्हें खुले में छोड़ देते हैं। यह स्थिति इस योजना के लागू होने के बाद से पूरी तरह बदल जाएगी। पशु पालक अपने पशुओं के चारे-पानी का प्रबंध करने के साथ-साथ उन्हें बांधकर रखेंगे, ताकि उन्हें गोबर मिल सके, जिसे वह बेचकर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सके। मुख्यमंत्री ने कहा कि शहरों में आवारा घूमते पशुओं की रोकथाम, गोबर क्रय से लेकर इसके जरिए वर्मी खाद के उत्पादन तक की पूरी व्यवस्था नगरीय प्रशासन करेगा।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि इस योजना को पूरी तरह से आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के आधार पर तैयार किया गया है। इससे अतिरिक्त आमदनी सृजित होगी। रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इस योजना के क्रियान्वयन के लिए पूरा एक सिस्टम काम करेगा। एक सवाल का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्मी कम्पोस्ट के जरिए हम जैविक खेती की ओर बढेंगे। इसका बहुत बड़ा मार्केट उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि गोधन न्याय योजना के माध्यम से तैयार होने वाली वर्मी कम्पोस्ट खाद की बिक्री सहकारी समितियों के माध्यम से होगी। राज्य में किसानों के साथ-साथ वन विभाग, कृषि, उद्यानिकी, नगरीय प्रशासन विभाग को पौधरोपण एवं उद्यानिकी की खेती के समय बड़ी मात्रा में खाद की आवश्यकता होती है। इसकी आपूर्ति इस योजना के माध्यम से उत्पादित खाद से हो सकेगी। मुख्यमंत्री ने एक सवाल के जवाब में आगे यह भी कहा कि अतिरिक्त जैविक खाद की मार्केटिंग की व्यवस्था भी सरकार करेगी।
इस अवसर पर कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे, गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू, वन मंत्री मोहम्मद अकबर, सहकारिता मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम, नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ. शिव कुमार डहरिया, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री गुरू रूद्र कुमार, राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल, मुख्यमंत्री के पंचायत एवं ग्रामीण विकास सलाहकारप्रदीप शर्मा, मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग, मुख्य सचिव आर. पी. मण्डल, अपर मुख्य सचिव वित्त अमिताभ जैन, मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव सुब्रत साहू, मुख्यमंत्री के सचिव सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी, कृषि उत्पादन आयुक्त डॉ. एम. गीता सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
शौर्यपथ / आयुर्वेद में केवल जड़ी-बूटियों के गुण ही नहीं बल्कि खान-पान और रहन-सहन के बारे में भी बहुत कुछ लिखा गया है। आज हम आपको आयुर्वेद के अनुसार बालों में तेल लगाने के फायदे और इसका सही समय बताएंगे।
बालों में तेल लगाने के फायदे
'चम्पी’ या सिर की मालिश की प्रथा पीढ़ियों से चलती आ रही है और हम में से बहुत सारे लोग बालों को धोने से पहले सिर की मालिश करते हैं। माना जाता है कि बालों में तेल लगाने से, बालों को समय से पहले सफ़ेद होने से रोका जा सकता है, इससे बालों की जड़ मजबूत होती है और प्रेशर पॉइंट्स पर मालिश करने से तनाव कम होता है।
आयुर्वेद के अनुसार तेल लगाने से जुड़ी खास बातें
-आयुर्वेद के अनुसार सिरदर्द वात से जुड़ा होता है। इसलिए शाम 6 बजे बालों में तेल लगाना चाहिए। दिन का यह समय वात दूर करने के लिए बेहतर होता है।
-आप बालों में शैंपू करने से पहले भी हफ्ते में एक या दो बार तेल लगा सकते हैं। हालांकि बालों को धोने के बाद तेल लगाने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे बालों में धूल और मिट्टी की समस्या हो सकती है।
-बालों में नियमित तेल लगाने से स्कैल्प में रुसी और खुजली की समस्या दूर हो जाती है। तेल में नीम की पत्तियां डालकर गर्म कर लें और नहाने से पहले इसे स्कैल्प में अच्छी तरह लगाएं। इसके बाद गुनगुने पानी से बालों को धो लें। रुसी की समस्या से पूरी तरह छुटकारा मिल जाएगा।
-रात में सोने से पहले अपने बालों और स्कैल्प में अच्छी तरह तेल लगाना चाहिए। अगली सुबह गुनगुने पानी से बालों को धो लेना चाहिए।
-रात में सोने से आधे घंटे पहले बालों में तेल लगाकर हल्के हाथों से मसाज करने से अच्छी नींद आती है।
धर्म संसार /शौर्यपथ / वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण उत्तर प्रदेश की रामनगरी अयोध्या में छह जुलाई से शुरू होने वाले सुप्रसिद्ध सावन झूला मेला का आयोजन स्थगित कर दिया गया है। जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने मंगलवार को बताया कि मणिपर्वत से छह जुलाई से शुरू हो रहे प्रसिद्ध सावन झूला मेला और कांवड़ यात्रा को स्थगित कर दिया गया है।
श्रावण में सभी सोमवार को शिवालयों में श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं। अयोध्या में पारम्परिक सावन झूला मेला होता है जो मणिपर्वत पर प्रमुख मंदिरों के भगवान के विग्रहों को अपने-अपने मंदिर से लेकर श्रद्धालु आते हैं और झूलनोत्सव में लाखों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं, लेकिन इस वर्ष वैश्विक महामारी कोविड-19 से संक्रमण से बचाव के लिये श्रवण सावन झूला मेला व कांवड़ यात्रा स्थगित रहेगा।
संत-धमार्चार्यों ने कहा कि सावन झूला मेला और कांवड़ यात्रा को जिला प्रशासन द्वारा स्थगित करने पर वैश्विक महामारी कोविड-19 के संक्रमण से बचाव होगा।संत- धमार्चार्यों ने भी श्रद्धालुओं से अपने-अपने स्थलों पर ही पूजा अर्चना करने के लिए कहा है। उन्होंने कहा है कि सामूहिक रूप से मंदिरों में प्रवेश न करें। पांच-पांच की संख्या में ही मंदिर में जाए जिससे सरकार के दिशा-निदेर्शों का अनुपालन हो सके एवं सोशल डिस्टेंसिंग का भी ध्यान रखा जाए। कांवड़ संघ के अध्यक्ष मनोज जायसवाल ने कहा कि जिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों की कांवड़ यात्रा विभिन्न क्षेत्रों से निकलती है जो बस्ती व बैद्यनाथ धाम को जाती है लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुये कांवडिय़ां संघ के पदाधिकारियों ने निर्णय लिया है कि इस वर्ष कोई कांवड़ यात्रा नहीं निकाली जाएगी। सभी लोग मंदिरों में सोशल डिस्टेंसिंग के अनुसार ही जलाभिषेक करेंगे।
गौरतलब है कि छह जुलाई से सावन झूला मेला शुरू हो रहा है। यह मेला तकरीबन एक पखवाड़े तक चलता है। सावन मेले में आने वाले श्रद्धालु रिमझिम फुहारों में भी भव्य रस का रसास्वादन करते हैं और रात-रात भर विभिन्न मंदिरों में घूम-घूमकर भगवान के विग्रहों को झुलाते हैं। इस समय छटा देखते ही बनती है। सावन में गाये जाने वाले लोकगीत कजरी का भी चारों ओर गूंज सुनाई देता है। मणि पर्वत के मेले के दिन सीताराम झांकी को लेकर रामधुन गाते हुए श्रद्धालु मणिपर्वत पहुंचते हैं जहां वृक्षों में झूले डालकर भगवान के विग्रहों को झुलाया जाता है।
पूरे सावन में मंदिरों में दोनों समय भगवान के विग्रहों को झुलाये जाने की परम्परा है। मणि पर्वत पर पडऩे वाले झूलों में विग्रहों के अलावा छोटे-छोटे बच्चों को रामसीता के रूप में सजाकर झुलाया जाता है। सखी सम्प्रदाय के लोग मनमोहनक पोशाक पहनकर सोलह श्रृंगार करते हैं।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / कई बार जीवन में ऐसे मोड़ आ जाते हैं जब व्यक्ति का अपने गुस्से पर कंट्रोल नहीं रहता और वो जाने-अनजाने कुछ ऐसा कर बैठता है जिसकी वजह से भविष्य में उसे भारी नुकसान उठाना पड़ता है। तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि व्यक्ति को अपने क्रोध को मन के भीतर ही दबाए रखना चाहिए, बिल्कुल नहीं। आप कल्पना करके देखिए यदि किसी चिमनी के भीतर कोयला जलाकर रख दें लेकिन चिमनी से भाप बाहर निकलने का रास्ता न हो तो क्या होगा। स्वाभाविक है चिमनी फट जाएगी।
ठीक वैसे ही भावनात्मक रूप से चोटिल व्यक्ति यदि अपने मन से नकारात्मक भावनाओं को बाहर निकालने की जगह अपने मन के भीतर इकट्ठा करता रहेगा तो भविष्य में यह आदत उसके लिए खतरनाक साबित हो सकती है। ऐसे में आइए जानते हैं कैसे इन 5 उपायों को करके व्यक्ति मानसिक शांति बनाए रखने के साथ अपने गुस्से को भी बाहर निकाल सकता है।
व्यायाम करें -
मन से सभी नकारात्मक विचारों को निकालने के लिए वर्कआउट करें। वर्कआउट के दौरान एंडोर्फिन हॉर्मोन , जिसे हम हैप्पी हॉर्मोन भी कहते हैं शरीर से रिलीज होते हैं। जिससे व्यक्ति की मानसिक सेहत पर अच्छा असर पड़ता है।
गहरी सांस लें-
जब कभी आपको लगे कि आप अत्याधिक गुस्से में हैं तो भड़ास निकालने का बेहतर तरीका है कि एक कदम पीछे आएं और गहरी सांस लें।किसी भी परिस्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया न दें।
दोस्तों से करें खुलकर बात-
दोस्तों से बात करने से भावनाओं को बाहर आने का मौका मिलता है। लेकिन ध्यान रखें सिर्फ भरोसेमंद दोस्त के साथ ही अपनी भावनाओं को साझा करें, जो आपका सही मार्गदर्शन भी करें।
भावनाओं को कागज पर उतारें-
यदि आपके पास कोई भरोसेमंद दोस्त नहीं है तो खुद को अकेला न समझें, अपनी डायरी में पूरी ईमानदारी से अपनी भावनाओं को दर्ज करें। जब आप शांत हो जाएं, इस डायरी को दोबारा पढ़ें। आपको महसूस होगा कि आपके गुस्से ने कैसे आपकी तर्क शक्ति को ढक लिया था। जिसके बाद आप अपनी कमजोरियों पर काम कर सकेंगे।
दृष्टिकोण में करें बदलाव-
अमेरिका के ड्रेक्सल विश्वविद्यालय में किए गए एक अध्ययन में यह सामने आया है कि आप चाहें तनाव की किसी भी स्थिति में हों आर्ट आपके तनाव को कम कर आपको बेहतर महसूस करवाने में मदद करती है। तो देर किस बात की, एक खाली कैनवास लें और उस पर अपने गुस्से और हताशा को व्यक्त करने वाले अपनी मर्जी के रंग उड़ेल दें।
नजरिया / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री ने कोरोना-19 महामारी से लड़ते हुए कई सूत्र दिए हैं। उन्होंने भारत को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर देते हुए एक नारा दिया है, ‘लोकल के लिए बनो वोकल’। कहने का अभिप्राय कि भारतवर्ष में खूब संसाधन हैं, जिनसे विभिन्न प्रकार के उपयोगी सामान हम विश्व स्तर पर बना सकते हैं। भारत में असंख्य कुशल हाथ हैं, जिनका उपयोग करके प्राकृतिक संपदाओं से बहुत कुछ बनाया जा सकता है। वैसे भी भारत में बहुत कुछ सदियों से बनाया जाता रहा है। ऐसी-ऐसी चीजें बनाई जाती रही हैं, जिनके लिए बड़ी मशीनों की जरूरत नहीं होती। भारत का बना हुआ ढाका का मलमल, राजस्थान और गुजरात की कशीदाकारी, कश्मीर के कालीन और भी सामान देश ही नहीं, विदेश में भी बहुत प्रसिद्ध रहे हैं।
महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई लड़ते हुए स्वदेशी अपनाने की बात मौखिक रूप से ही नहीं कही, बल्कि उन्होंने चरखे को स्वावलंबन का प्रतीक बना लिया था। देखते-देखते हर घर में चरखा चलने लगा था। सूत के कपडे़ बनने लगे थे, बाद में धागों को रंगकर डिजाइनदार कपड़े बनने लगे थे। स्वतंत्रता मिलने से पहले ही गांव-गांव में चरखा समितियां बनाई गई थीं और खादी की साड़ी पहन सिर पर पल्लू रख विशेष आत्मविश्वास से भरी महिलाएं घर-घर से निकलती थीं। सूत व कपड़े की रंगाई-धुलाई के काम में लगकर आमदनी बढ़ाती थीं। स्वदेशी अपनाने के क्रम में मिल में बना तेल लोग नहीं अपनाते थे। गांव के कोल्हू पर अपने खेत से निकले हुए राई, सरसों के तेल का उपयोग करते थे। स्वतंत्रता मिलने के बाद सरकार ने भी केंद्रीय और राज्य स्तर पर खादी भंडार का निर्माण कराया। चरखे चलते रहे, पर धीरे-धीरे मिल के कपडे़ घर-घर आने लगे और हम गांधी के आंदोलन को भूल गए। अब पुन: ‘लोकल के लिए वोकल’ की बात उठी है, तो स्वदेशी का नारा फिर जोर पकड़ने लगा है।
1998 से 2004 तक मैं केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष थी। उन दिनों भी महिलाओं के हाथ में हुनर सिखाने एवं उनके हुनर से बने सामान बेचने की बात बहुत प्रसिद्ध थी। मैंने इस कार्य के लिए कई नारे दिए थे, जैसे- हुनर हो हर हाथ में, दिल में प्रेम का भाव। भेद मिटे हर द्वार से, जग में आए समभाव। और, जब आया हाथों में हुनर, हुलसा हिया, रंग गई चुनर। उन दिनों पूरे देश में बहुत-सी संस्थाओं द्वारा जूट, बांस, लाख ऐसे अन्यान्य प्रकार के उत्पादों का बाजार लगाया जाता था। कहीं-कहीं इसे ‘मेला’ भी कहा जाता था। आज ऐसे मेलों के तेज विकास की जरूरत है। ऐसे मेलों में खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने से लेकर सजावट के तमाम सामान लोगों को उपलब्ध होने चाहिए। ऐसे सामान की मांग होगी, तो ऐसे सामान बनाने वालों की संख्या और आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी। महिलाओं और गरीब घरों की स्थिति सुधरेगी।
इस क्षेत्र के कार्यों में गति देने के लिए मैंने एक अभिनव कार्यक्रम बनाया था, जिसके तहत संस्थाओं को विभिन्न औषधीय वृक्ष लगाने का कार्य सौंपा गया था। अध्ययन करके हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि पांच ऐसे पौधों को अपने घर के पास कम-से-कम जमीन में भी लगाया जाए, पांच वर्षों में उससे मिली आमदनी इतनी हो जाएगी, जिससे एक पांच सदस्यीय परिवार के भोजन, कपड़े का इंतजाम आसानी से हो जाएगा।
देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हर शहर में हाथ के बने सामान बेचने के लिए विशेष बाजार या बिक्री केंद्र की व्यवस्था हो। बाजार या बिक्री केंद्र के कर्मचारी ही सामान गांव से लेकर आएं और उत्पादकों व संस्थाओं को कीमत भी दें। इन महिलाओं या पुरुषों को पैकेजिंग के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि उनके सामान विदेशी बाजारों को भी आकर्षित कर सकें। इसी विशेष बिक्री केंद्र द्वारा ये जानकारियां दी जाएं कि कौन-कौन-से सामान की देश के बड़े शहरों व विदेश में मांग है? यदि इतनी सुविधा उत्पादकों, स्वयं सहायता समूहों, संस्थाओं को मिल जाए, तो इनकी आमदनी बढ़ जाएगी।
आज भारत ही नहीं, विश्व के विभिन्न देशों ने ‘पुन: भारतीयता की ओर’ यात्रा शुरू की है। भारत को आत्मनिर्भर बनाने की घोषणा पुन: भारतीयता की ओर आने का प्रयास ही है। कोविड-19 भारत के लिए भी संकट काल में वरदान साबित हो सकता है। आत्मनिर्भर व्यक्ति, परिवार व गांवों में आत्मविश्वास होता है, लेकिन दूसरों पर निर्भरता से स्वाभिमान की भी रक्षा नहीं होती।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)मृदुला सिन्हा, पूर्व राज्यपाल, गोवा
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ /वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सीमा के मोल्डी इलाके में हुई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की बैठक का नतीजा न सिर्फ दोनों देशों के अरबों नागरिकों के लिए, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए सुकून भरा कहा जाएगा। गलवान घाटी में 15 जून के हिंसक संघर्ष के बाद भारत और चीन के रिश्ते किस नाजुक मोड़ पर पहुंच गए थे, इसका अंदाजा इसी बात से लग जाना चाहिए कि भारत ने अपनी सेना को मौके पर हथियारों के इस्तेमाल की छूट दे दी है, बल्कि लेफ्टिनेंट कमांडर स्तर के दोनों वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को सहमति के बिंदु पर पहुंचने के लिए 10 घंटे से भी अधिक बात करनी पड़ी है। खबर है कि दोनों देश एलएसी पर अपनी-अपनी सेना को पीछे हटाने को तैयार हो गए हैं। निस्संदेह, दोनों पक्षों से इसी समझ-बूझ की दरकार थी। लेकिन यह समझदारी जमीनी स्तर पर दिखनी चाहिए, क्योंकि 6 जून को भी सैन्य अधिकारी एक सहमति बना चुके थे। उसके बाद 15 जून की दुखद घटना घटी।
अपने 20 जवानों की शहादत से भारतीय जनता बेहद आहत और आक्रोशित है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि चीन से लगी सरहद पर दशकों से शांति थी, जिसे चीन ने भंग किया। हाल के दिनों में पूर्वी लद्दाख में उसका रवैया दादागिरी भरा रहा है और भारत को यह कतई मंजूर नहीं है। लेकिन जैसा कि अक्सर होता है, हरेक देश अपनी सरहद की हिफाजत के लिए सर्वोच्च पराक्रम दिखाता है, और अंतत: प्रतिपक्षियों को वार्ता की मेज पर बैठना पड़ता है। इसलिए श्रेष्ठतम रणनीति यही है कि नुकसान के बाद वार्ता करने की बजाय बातचीत के जरिए नुकसान की आशंका निर्मूल कर दी जाए। जब तक दोनों देशों के बीच सीमा-विवाद का निपटारा निर्णायक रूप से नहीं होता, तब तक ऐसी स्थितियों की आशंका से बचने का एकमात्र रास्ता यही है कि सीमा पर हम अपने बुनियादी ढांचे को मजबूत करें। निस्संदेह, हाल के वर्षों में इस दिशा में काम हुए भी हैं। सड़कें बनी हैं, हेलीपैड बने हैं, मगर चीन के मुकाबले ये अब भी कुछ नहीं हैं। अब हम अच्छे रिश्तों के आधार पर भी अपनी सीमाओं और सैन्य जरूरतों से गाफिल नहीं रह सकते।
भारत की सरहदें खास तौर से दो पड़ोसियों की अलग-अलग रणनीति का निशाना बनती रही हैं। पाकिस्तान जहां अपनी दहशतगर्दी की विदेश नीति को अंजाम देने के लिए इससे घुसपैठ की ताक में रहता है, तो चीन विस्तारवादी रणनीति के तहत इसके अतिक्रमण के फिराक में। बीजिंग अब एक दबाव के तौर पर भी इस नुस्खे को आजमाने लगा है। यह महज संयोग नहीं है कि पिछले दो महीने से कोविड-19 के संक्रमण के मामले में वह डब्ल्यूएचओ में घिरता हुआ महसूस कर रहा था, और लगभग इसी समय उसने लद्दाख में अपनी सक्रियता बढ़ाई, यह जानते हुए कि भारत डब्ल्यूएचओ में एक जिम्मेदार ओहदे पर बैठ रहा है। इसलिए उससे लगी सीमाओं को लेकर हमें एक मुकम्मल नीति बनानी होगी। इसमें दो राय नहीं कि भारत और चीन आज दुनिया की दो बड़ी शक्तियां हैं। उनमें सीमित सैन्य टकराव भी किसी एक के लिए कम नुकसानदेह नहीं होगा। इसलिए समझदारी इसी में है कि दोनों देश बातचीत से अपने मतभेदों को पाटें और ऐसा माहौल बनाएं, जिससे सीमा-विवाद पर ठोस बातचीत का रास्ता खुले। महामारी से कराह रही मानवता को आज इन दोनों से सर्वश्रेष्ठ अक्लमंदी की आशा है।
मेलबॉक्स /शौर्यपथ / आत्मनिर्भर भारत की सफलता का ब्रह्मास्त्र है, वेस्ट मैटेरियल यानी अनुपयोगी सामान का पुनर्चक्रण। हमें समझना होगा कि कोई भी सामान अनुपयोगी नहीं होता, बस उसके रिसाइकिल करने की देर होती है। आज पुनर्चक्रण का यह काम मेट्रो या बड़े शहरों तक सीमित है, वह भी शत-प्रतिशत नहीं। यह जान लेना चाहिए कि चीन का माल इसलिए सस्ता होता है, क्योंकि वह पुनर्चक्रण में विश्वास करता है। यदि हमारे यहां भी ऐसी कोई व्यवस्था लागू हो जाए, तो उत्पादों की कीमतें काफी कम हो जाएंगी। इससे हम चीन की वस्तुओं को दाम के आधार पर टक्कर दे सकेंगे। सामूहिकता से भरे इन प्रयासों से नए रोजगार का भी सृजन होगा और पर्यावरण को साफ-सुथरा बनाए रखने में भी हम कामयाब हो सकेंगे। इसलिए विकासवाद के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के होने वाले बेतरतीब दोहन को सीमित करके हमें पुनर्चक्रण की तरफ बढ़ना चाहिए।
विकास पंडित, बड़वानी, मध्य प्रदेश
एकजुटता जरूरी
आज हमारा देश एक साथ कई मोर्चों पर उलझा हुआ है। कोविड-19, भुखमरी, आर्थिक विकास, पलायन के साथ-साथ अब चीन व नेपाल के साथ हमारा सीमा-विवाद भी गहरा गया है। देशप्रेमी अपनी लालसा को शांत करके हर परिस्थिति में सरकार और देश के साथ खडे़ हैं, पर विघ्न संतोषी सरकार और देश के आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। वे देश में धार्मिक अफवाह भी फैला रहे हैं। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया मंचों पर देश को टुकड़ों में बांटा जा रहा है। इसके जवाब में आम जनता में एकजुटता जरूरी है। लगता है, अंग्रेजों का गुलाम रहकर और अपनी संतानों को खोकर भी कुछ लोग आज तक यह नहीं समझ पाए हैं कि आपस में दुश्मनी रखना मजहब भी नहीं सिखाता है। हमें इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए।
ममता रानी, काशीपुर
उल्टा पड़ता दांव
चीन का कमोबेश अपने सभी पड़ोसी देशों से सीमा-विवाद है। सिर्फ जमीनी सीमा ही नहीं, वह दक्षिण चीन सागर में भी अपना दावा जताता रहा है। हालांकि, वहां अमेरिका के प्रत्यक्ष विरोध के कारण उसकी दाल नहीं गल रही है। चीन अब तक इसलिए बढ़ता रहा है, क्योंकि वह अपनी ताकत का प्रदर्शन करके सामने वाले देश को झुका देता है। यही हथकंडा उसने भारत के खिलाफ भी अपनाने की गुस्ताखी की है। पहले जरूर उसने हमारे कुछ क्षेत्रों को हथिया लिया है, लेकिन इस बार सरकार ने साफ कर दिया है कि उसकी एक भी मनमानी भारतीय सीमा के अंदर नहीं चलेगी। चीन की विस्तारवादी नीति पहली बार उस पर ही भारी पड़ती नजर आ रही है। गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों को निशाना बनाना उसे कितना भारी पड़ा है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हमारे सैनिकों से ज्यादा उसके सैनिकों की जान गई है। यह साफ बताता है कि भारत से उलझना अब चीन के लिए हर मोर्चे पर भारी पड़ने वाला है।
धीरज पाठक, शास्त्री नगर, चैनपुर
पुराने बनाम नए नोट
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वर्तमान में जारी किए जा रहे छोटे साइज के नए नोटों के कागज पुराने और अपेक्षाकृत निम्न गुणवत्ता के प्रतीत होते हैं। इस कारण जहां पुराने नोटों का जीवन लंबा महसूस हो रहा है, वहीं नए नोट जल्दी खराब हो रहे हैं। ऐसे में, केंद्र सरकार से अनुरोध है कि वह आरबीआई को इस बात के लिए निर्देशित करे कि उच्च गुणवत्ता के कागजों का ही नए नोटों में इस्तेमाल हो। इसके साथ ही प्लास्टिक कोटेड नोट भी जारी किए जाएं, ताकि पड़ोसी देशों से नकली नोटों की आने वाली खेप रोकी जा सके। इससे हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों से भी बचा जा सकेगा।
प्रमोद अग्रवाल गोल्डी, हल्द्वानी,
ओपिनियन /शौर्यपथ /अपनी युवावस्था में मैंने मैकमोहन रेखा पर लंबी दूरी के गश्ती दल का नेतृत्व किया है। एक बार हमारे दल को खांगला जाना था। हमें देर हो गई और शाम गहराने लगी थी, लेकिन हमें अपना काम पूरा करना था। गश्ती के दौरान भटककर हम सीमा के उस पार करीब एक किलोमीटर तक चले गए थे। हमने अपने दल को दो टीमों में बांटा और चीनी सैनिकों की नजर में आए बिना हम अगली सुबह खांगला पहुंच गए। एक युवा अधिकारी के रूप में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से यह मेरा पहला परिचय था। बाद में मैंने अरुणाचल प्रदेश में एलएसी डिवीजन और उसके बाद लद्दाख में 14वीं कोर की कमान संभाली। मैं कई बार गलवान घाटी से गुजर चुका हूं। यहां की पर्वत शृंखलाओं पर सीमा-रेखाएं एक भूलभुलैया हैं। यहां न कोई सीमा-रेखा है और न सीमा के करीब कोई पोस्ट। अभी पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन की जो सीमा-रेखा, यानी एलएसी है, वह 1962 की खूनी जंग का नतीजा है। यह युद्ध दोनों देशों के बीच में यहीं सबसे ऊबड़-खाबड़ और असह्य इलाके में लड़ा गया था। लड़ाई अक्तूबर-नवंबर में दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ), गलवान और हॉट स्प्रिंग्स, पैंगोंग झील के आर-पार, रजांगला और डेमचोक इलाकों में हुई थी। अत्यधिक कम तापमान और जान-माल की व्यापक क्षति के कारण उस युद्ध को रोक दिया गया था और चीन के सैनिक अपने ठिकानों पर वापस चले गए थे। इसी तरह, भारतीय सेना भी पास के ठिकानों पर लौट आई थी। तब से राजनीतिक तौर पर औपचारिक सीमांकन न हो पाने की वजह से दोनों देशों की सेनाएं यहां डटी हुई हैं। दोनों के बीच में सीमा-बंटवारे को लेकर 22 बार बातचीत हो चुकी है, पर नतीजा अब तक सिफर रहा है। भारत पूरे अक्साई चिन पर अपना दावा जारी रखे हुए है, तो चीन सीमा के पास वाले क्षेत्रों पर अपना दावा करता है, जिसे भारत ‘चीनी धारणा’ वाली सीमा रेखा कहता है।
दरअसल, अंग्रेजों ने इन सीमाओं को तय किए बिना छोड़ दिया था। उसके नक्शे में कई सीमाएं दिखाई देती हैं, जिनमें से एक कुन-लुन पहाड़ों के साथ चल रही है, जिसे जॉनसन-अर्दग रेखा कहा जाता है। इसके मुताबिक, अक्साई चिन जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है। एक अन्य रेखा, जो काराकोरम रेंज के करीब है, उसे मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड रेखा कहा जाता है। एक रेखा सुदूर पश्चिम में है, जो फॉरेन ऑफिस रेखा है। आजादी के बाद इसे तय करने का काम जम्मू और कश्मीर के शासकों, तिब्बत और भारत व चीन के हुक्मरानों पर छोड़ दिया गया था। मगर अब तक इसमें सफलता नहीं मिल सकी है।
भारत ने अपना नक्शा 1954 में ही जारी कर दिया था, जिसमें अंतरराष्ट्रीय रेखा बताती है कि अक्साई चिन भारत का हिस्सा है। फिर भी, चीन ने 1955 में यहां से गुजरता हुआ पश्चिमी राजमार्ग बनाया, जो तिब्बत को काशगढ़ और शिनजियांग से जोड़ता है। जैसा कि भारत का दावा है, चीनियों ने इस संवेदनशील राजमार्ग के पश्चिमी हिस्से को सुरक्षित रखने की सोची होगी। चिप-चाप नदी और गलवान नदी के जलक्षेत्रों के बीच काराकोरम रेंज के साथ चलने वाली रिज लाइनों पर प्रभावी होने से चीन की यह मंशा बखूबी पूरी हो सकती थी, और उसके बाद चांग-चेनमो रेंज के पश्चिम में रिज लाइनों के साथ दक्षिण-पूर्व में आगे बढ़ना उसके मुफीद होता। इन इलाकों को अपने कब्जे में रखने की कोशिश चीन इसलिए करता है, ताकि भारतीय सुरक्षा बलों को पश्चिमी राजमार्ग से दूर रखा जा सके। यहां आर्टिलरी और निगरानी का दायरा बढ़ाना बताता है कि वह अपनी रेखा को आगे बढ़ाकर पश्चिम की तरफ ले जाना चाहता है। मगर भारतीय सेना चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा में किए जाने वाले किसी भी बदलाव को रोकने के लिए संकल्पित है। उल्लेखनीय है कि एलएसी का पहली बार इस्तेमाल खुद चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन-लाई ने साल 1959 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्र में किया था।
आज, पूर्वी लद्दाख में 800 किलोमीटर से अधिक सीमा-रेखा है, जिसमें लगभग 550 किलोमीटर वास्तविक नियंत्रण रेखा है। चीनी गश्ती दल यह सुनिश्चित करते हैं कि वे दर्रे को बंद और जलग्रहण क्षेत्र को अपने कब्जे में रखें, ताकि भारतीय सैनिक जमीन पर और आगे न बढ़ सकें। वे ऐसे ट्रैक बनाते रहते हैं, जो आमतौर पर पश्चिमी राजमार्ग से निकलते हैं और उत्तरोत्तर एलएसी की ओर बढ़ते हैं, ताकि वे दर्रे या क्रॉसिंग प्वॉइंट पर हावी हो सकें। हॉट स्प्रिंग्स और गलवान में दोनों तरफ सड़कें व ट्रैक बनाए गए हैं। चीन को इस इलाके का ज्यादा फायदा मिलता है, क्योंकि उसकी तरफ यह अपेक्षाकृत खुला व समतल है और अपने पश्चिमी राजमार्ग की सुविधा भी उसे हासिल है।
एलएसी को लेकर न तो कोई सर्वे हुआ है और न ही जमीन पर सीमांकन। यह नक्शे पर मोटी कलम के साथ खींची गई रेखा है। इससे जमीन पर 100 मीटर तक अंतर हो सकता है, इसीलिए रेखा के इस पार या उस पार कुछ मीटर की दूरी पर बना टेंट भी समस्या पैदा कर सकता है। हालांकि, चीन के सैनिकों ने एलएसी के पास जहां तंबू गाड़ा, वहां से गलवान नाला सीधे दिखाई देता है, जहां भारत के लिहाज से संवेदनशील दरबूक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी रोड जाती है, इसीलिए यह भारत को नागवार गुजरा है। इस तरह के मामलों के शांतिपूर्ण निपटारे के लिए 1993 के बाद से दोनों देशों के बीच में कई समझौते हुए हैं। साल 1996 में हुआ एक समझौता कहता है कि इस तरह के सीमा-विवादों के निपटारे में सैन्य हथियारों का इस्तेमाल नहीं होगा।
चूंकि सीमा को लेकर अब तक अंतिम सहमति नहीं बन सकी है, इसलिए दोनों पक्ष कई बार आमने-सामने आ चुके हैं। इनमें साल 2013 में पूर्वी लद्दाख के डेपसांग, डेमचोक और चुमार में हुआ तनाव भी एक है। गलवान हालिया घटनाओं का चरम बिंदु है। इसका खतरनाक प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि दोनों राष्ट्रों के पास परमाणु हथियारों से संपन्न बड़ी सेनाएं हैं। क्या दोनों देश अभी युद्ध का जोखिम उठा सकते हैं, जब पूरी दुनिया के साथ वे भी कोरोना वायरस महामारी से लड़ रहे हैं? बहस का मुद्दा यह भी है कि चीन इस समय ऐसा कोई तनाव क्यों चाहेगा?
(ये लेखक के अपने विचार हैं) पीजेएस पन्नू, डिप्टी चीफ, इंटिग्रेटेड डिफेंस स्टाफ
दुर्ग / शौर्यपथ / भिलाई नगर के स्कूल शकुंतला विद्यालय के छात्र हर साल की भांति इस साल भी टॉप टेन में अपना स्थान बनाकर भिलाई सहित विद्यालय का नाम रौशन करने का काम किया है। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मण्डल रायपुर द्वारा घोषित हॉयर सेकेण्डरी एवं हाई स्कूल परीक्षा 2020 का आज परीक्षा परिणाम घोषित किया गया। महामारी के गहन अंधकार में शकुन्तला विद्यालय क्रमांक - 2 के 2 विद्यार्थियों ने प्रावीण्य सूची में स्थान प्राप्त कर अंकों की रिमझिम फुहारों से खुशनुमा माहौल बनाकर दुर्ग संभाग में सकारात्मकता का संचार कर दिया।
छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मण्डल की प्रावीण्य सूची में कक्षा बारहवीं के छात्र सौरभ साहू ने 96.20 प्रतिशत (500 मे से 481 अंक) के साथ चौथे स्थान प्राप्त किया एवं कक्षा दसवीं में महक यादव 97.8 प्रतिशत (600 में 587 अंक) के साथ आठवां स्थान प्राप्त किया। कक्षा बारहवीं की नेहा वर्मा मात्र एक अंक से प्रावीण्य सूची में आने से चूक गई। विद्यालय के छात्रों के प्राविण्य सूचि में आने पर विद्यालय के डायरेक्टर संजय ओझा, प्राचार्य विपिन ओझा सहित सभी शिक्षक और स्टाफ ने इन छात्रों को बधाई दी है।
इस साल भी उत्कृष्ट रहा विद्यालय का परिणाम
शकुन्तला विद्यालय क्र-2, रामनगर भिलाई विद्यालय के हॉयर सेकेण्डरी का परीक्षाफल 97.68: प्रतिशत रहा। कुल सम्मिलित 389 विद्यार्थियों में से 264 विद्यार्थी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुये । 90 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों की संख्या 19 रही । गणित में 68, भौतिक शास्त्र में 189, रसायन शास्त्र में 192, जीव विज्ञान में 93, अंग्रेजी में 203, हिन्दी में 216 एवं वाणिज्य 73 विद्यार्थियों ने विशेष योग्यता प्राप्त की । शाला स्तर पर नेहा वर्मा 94.8: द्वितीय स्थान, कागज वर्मा 94.6: तृतीय स्थान एवं देवेन्द्र कुमार 94.2: एवं नेहा निशाद 94: अकों के साथ चैथे एवं पांचवें स्थान पर रहें । आयुश भोई और देवेन्द्र ने भौतिक शास्त्र में 100 में 100 तथा रसायन में जितादिव्य पॉल ने 100 में 100 अंक प्राप्त किये ।
इसी क्रम में हाई स्कूल का परीक्षाफल 95.3: रहा। कुल 192 विद्यार्थी सम्मिलित हुये । जिसमें 18 विद्यार्थियों ने 90 प्रतिषत से अधिक अंक अर्जित किये ।
शाला स्तर पर षाष्वत मिश्रा 95.8:, प्रणय पाण्डेय एवं वर्तिका षर्मा 95.8: के साथ द्वितीय एवं षानिया अंजुम 94.6: के स्थान तृतीय स्थान वंदना बारिक 94 प्रतिषत के साथ चैथे स्थान एवं राहुल देवांगन 93.8: के साथ पांचवें स्थान पर रहे । इसी प्रकार दसवीं बोर्ड परीक्षा परिणाम में विशयवार 100 में 100 अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी गणित में शानिया अंजुम, शाष्वत मिश्रा, मोहित चैधरी तथा विज्ञान में महक यादव, अदिति शर्मा, वर्तिका शर्मा हैं ।
विद्यालय का हॉयर सेकेण्डरी एवं हाई स्कूल परीक्षा परिणाम उत्कृष्ट रहा । विद्यार्थियों की व्यक्तिगत प्रोन्नति का आधार उनका परिश्रम है, जिसके कारण विद्यालय उन्नति के उत्तरोत्तर सोपान की ओर अग्रसर है ।
शकुन्तला गु्रप ऑफ स्कूल्स के इस उत्कृष्ट परीक्षा परिणाम के लिए डायरेक्टर संजय ओझा, प्राचार्य प्रशासक एस.एस.गौतम, प्राचार्यद्वय विपिन ओझा, आरती मेहरा, प्रबंधक ममता ओझा, मेंनेजर व्ही दुबे, अभय दुबे, विभोर ओझा, उपप्राचार्य रंजना कुमार, अनीता नायर, हेड मिस्ट्रेस अर्चना मेश्राम, सीनियर मिस्ट्रेस बलजीत कौर, प्रभारी राजेश वर्मा, शिक्षक बी.एस.राजपूत, मनोज पाण्डेय, ममता बोस, शशि शाह, सुनीता सक्सेना, रूशाली माहूले, कविता साहू, शीला रौतेला, मुक्ता शाहा, विजय लक्ष्मी, अमित कुमार, प्रतिक साहू, उपेन्द्र देवांगन, मेघा नफाडे, संगीता भंडारी, आर.के.मिश्रा, सरिता सिंह, प्रीति सरवन, तृप्ति अग्रवाल, संगीता दुबे, कविता चैधरी, के.पी.तिवारी, साहिष्ता, छाया, सीमा दुबे, हरदीप कौर आदि ने विद्यार्थियों एवं अभिभावकों को बधाई देते हुये हर्ष व्यक्त किया।
दूध से बनने वाला दही हर तरह से गुणकारी है, क्योंकि इसमें ऐसे तत्व मौजूद हैं, जो कई तरह की बीमारियों से बचाव करते हैं। दही खाने में जितना स्वादिष्ट है, उतना ही स्वास्थ्य और सौंदर्य की दृष्टि से लाभकारी भी है। अधिकतर मरीजों को डाइटीशियन भी दही खाने की सलाह देते हैं, ताकि वो जल्दी से ठीक हो जाएं। यह अजीब है कि दूध से बनने वाला दही दूध से भी ज्यादा गुणकारी है। इसका कारण है कि दूध में अधिक मात्रा में फैट होता है, जिसकी अधिकता शरीर को नुकसान पहुंचाती है। इसके विपरीत दही में फैट बहुत कम होता है, जो शरीर के लिए फायदेमंद है।
सेहत /शौर्यपथ / दही मे पाए जाने वाले पोषक तत्व
दही में सबसे ज्यादा मात्रा में कैलोरी पाई जाती है, इसके अलावा इसमें प्रोटीन, विटामिन-डी, कैल्शियम होता है और फास्फोरस, लेक्टोज और आयरन तत्व भी शामिल होते हैं। दही खाने से कई तरह की शारीरिक परेशानियां ठीक हो सकती हैं। आइए जानते हैं कि दही से कैसे शारीरिक समस्याओं का निराकरण किया जा सकता है -
पाचन शक्ति मजबूत करने के लिए
दही खाने से पाचनशक्ति मजबूत होती है और पेट से संबंधित समस्याएं जैसे कब्ज, एसिडीटी आदि ठीक होती हैं। लिवर, किडनी और अल्सर की समस्या से ग्रसित लोगों को रोज ताजा दही खाना चाहिए, इससे उन्हें फायदा होगा।
दिल की बीमारियां ठीक करने के लिए
आजकल लोग जंक फूड खाने के आदि हो गए हैं और खानपान भी अनियमित हो गया है। अधिक वसायुक्त भोजन खाने से लोग दिल से जुड़ी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। जैसे हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल में असंतुलन जैसी परेशानियां बढ़ रही हैं। दिल के मरीजों के लिए दही काफी फायदेमंद होता है, क्योंकि इसमें फैट कम होता है और यह कोलेस्ट्रॉल व ब्लड प्रेशर के लेवल को संतुलित रखने में मदद करता है।
हड्डियों की परेशानियों को दूर करने के लिए
दही में कैल्शियम होने के कारण यह हड्डियों के लिए भी काफी लाभकारी है। दांत के लिए भी कैल्शियम जरूरी होता है। ऐसे में दही का सेवन शरीर का ढांचागत मजबूती देता है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए
दही में लेक्टबेसिलस बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, जो शरीर के कीटाणुओं से लड़ने में सहायक होते हैं और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसलिए दही का सेवन रोज करना चाहिए।
वजन कम करने के लिए
दही खाने से वजन भी कम किया जा सकता है क्योंकि दही खाने से पेट में खाने की पूर्ति हो जाती है और अधिक समय तक भूख भी नहीं लगती है। दही शरीर की वसा को कम करने में सहायक होता है और इससे प्रोटीन विटामिन्स भी मिल जाते हैं। व्यायाम करने के साथ ही रोज दही खाने से वजन कम किया जा सकता है।
त्वचा में निखार लाने के लिए
दही खाने से त्वचा में भी निखार आता है और धूप से जली हुई त्वचा भी ठीक होती है। दही का इस्तेमाल न सिर्फ खाने के लिए किया जाता है, बल्कि इसका उपयोग त्वचा को निखारने के लिए फैसपैक के रूप में भी किया जाता है। इससे मुंहासे और चेहरे के दाग धब्बे भी दूर होते हैं। दही में विटामिन सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो त्वचा की कोशिकाओं को संगठित करने में मदद करता है और टॉक्सिन को दूर करने में मदद करता है।
सेहत / शौर्यपथ / सब्जी विक्रेताओं से शहर के करीब एक दर्जन से अधिक लोग कोविड-19 संक्रमित हो चुके हैं लोगों को चिंता सताने लगी है कि कहीं सब्जी के माध्यम से कोरोना वायरस घरों में नहीं घुस रहा है। इसे लेकर लोग कई तरह की सावधानियां भी बरत रहें हैं
वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि इससे डरने की नहीं सावधानी बरतने की जरूरत है। सब्जी मंडी में कोविड-19 का संक्रमण तेजी से फैल रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए जिला प्रशासन ने सेक्टर-16 और डबुआ सब्जी मंडी को शनिवार से चार दिनों के लिए बंद करने का नर्णिय लिया है। यहां से करीब 8 से 10 सब्जी विक्रेता और आढ़ती इसकी चपेट में आ चुके हैं।
ऐसे में बाजार से सब्जी खरीदने को लेकर लोगों की चिंताएं बढ़ गई हैं। उन्हें यह चिंता सताने लगी है कि आखिर सब्जियों को खरीदें कैसे? कोविड-19 संक्रमण के दौरान सब्जियों को खरीदने का सही तरीका क्या है? खुद को कोरोना से कैसे बचाए। वहीं, आहार रोग विशेषज्ञ शिल्पा ठाकुर कई गुर बता रही हैं।
सब्जी विक्रेताओं से कोविड-19 संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। पिछले एक सप्ताह के दौरान डबुआ सब्जी मंडी, एनआईटी-एक, मुजेसर और सेक्टर 16 सब्जी मंडी से करीब 12 लोग इसकी चपेट में आ गए हैं। अब सब्जी के माध्यम से घर में घुसने वाले कोराना वायरस का डर सताने लगा है। एनआईटी पांच स्थित सुषमा नागर का कहना है कि कोविड-19 संक्रमण के डर से घर से निकलना तो बंद हो गयाा। खाने पर कैसे अंकुश लगाया जा सकता है।
फल और सब्जियों को धोने के खास तरीके
सब्जियों और फलों को 10 मिनटपानी में भिगो कर छोड़ दे, उसके बाद धो लें
फूलगोभी, पालक, बंदगोभी को दो प्रतिशत नमक वाले गर्म पानी से धोएं
सब्जियों को पानी से धोने के बाद सिरका या नींबू वाले पानी से धोएं तो बेहतर
छिलका सहित खाने वाले फलों को एक घंटे तक पानी में भिगोएं
अगर सब्जियां अच्छी हैं तो उन्हें कुछ देर धूप में भी रख सकते हैं
सब्जी को एक दिन बाद बनाने का प्रयास करें
सब्जी धोने से पहले और सब्जी धोने के बाद हाथों को साबुन से धोएं
क्या खाएं, क्या नहीं खाएं?
पौष्टिक आहार की मात्रा अधिक लें
मसालेदार खाना,तेल कम प्रयोग करें
खाने में सलाद का सेवन करें
फलों के नियमित सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है
ड्राईफ्रूट्स का इस्तेमाल करें और खाने में दालों का उपयोग करें
''कोरोना वायरस से घबराने की नहीं, सावधानियां बरतने की जरूरत है। सब्जियों से वायरस नहीं आता, भीड़ में मौजूद संक्रमित व्यक्ति से ही कोरोना वायरस का संक्रमण आपके घर में आता है। सब्जियों को कपड़े के थैले में लाएंष सब्जी को बाहर निकालकर उसे अच्छी तरह धो लें। वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए आपको संतुलित आहार की जरूरत है।''
सेहत / शौर्यपथ / चावल अब केवल पेट भरने की वस्तु नहीं रही बल्कि इसे कुपोषण की समस्या को दूर करने के लिए प्रोटीन और जिंक जैसे पोषक तत्वों से लैस कर दिया गया है तथा इसकी खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्रयास से देश में काम से कम धान की छह बायोफोटिफाइड किस्मों का विकास किया गया है जो जीवन के लिए जरूरी तथा शारीरिक विकास में सहायक प्रोटीन और जिंक से भरपूर है ।
धान का सी आर धान 31० प्रोटीन से भरा है जबकि डी डी आर धान 45 , डी डी आर धान 48 , डी डी आर धान 49 और जिनको राइस एम एस जिंक से लैस है । सी आर धान 311 ( मुकुल) प्रोटीन और जिंक दोनों की कमी को दूर करता है ।
प्रोटीन टिश्यू के विकास और उसकी मरम्मत के लिए जरूरी अमीनो एसिड तैयार करता है । इसकी कमी से लोगों का बौद्धिक विकास प्रभावित होता है और कई बार इसकी कमी से मौत भी हो जाती है । लाइसिन प्रोटीन में ब्लॉक तैयार करता है । इसकी कमी से अनेमिया की शिकायत हो सकती है और शारीरिक विकास रुक सकता है । जिंक एक प्रकार का खनिज है जिसकी कमी से शारीरिक विकास रुकता है और शरीर रचना की कई क्रियाएं प्रभावित होती है।
आम तौर पर चावल में सात से आठ प्रतिशत प्रोटीन होता है जबकि सी आर धान 31० में 1०.3 प्रतिशत प्रोटीन है । राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान कटक ने इस किस्म का विकास किया है । खरीफ सीजन के लिए यह किस्म उपयुक्त है जो 125 दिनों में तैयार होता है और प्रति हेक्टेयर 45 क्विंटल तक की पैदावार देता है । ओडिशा , मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में इसकी खेती की जाती है ।
डी डी आर धान 45 में 22.6 पी पी एम जिंक पाया जाता है जबकि प्रचलित किस्मों में इसकी मात्रा 12 से 16 पी पी एम होती है । करीब 13० दिनों में तैयार होने वाली इस किस्म की प्रति हेक्टेयर 5० क्विंटल पैदावार है । भारतीय धान अनुसंधान संस्थान हैदराबाद ने इसका विकास किया है जो खरीफ सीजन के लिए उपयुक्त है तथा कनार्टक , तमिलनाडु , आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसकी खेती की जाती है ।
भारतीय धान अनुसंधान संस्थान हैदराबाद ने ही डी डी आर धान 48 किस्म का विकास किया है जिसमें 24 पी पी एम जिंक है । करीब 138 दिनों में तैयार होने वाली इस किस्म की प्रति हेक्टेयर 52 क्विंटल पैदावार है । आंध्र प्रदेश , तेलंगाना , तमिलनाडु , केरल और कनार्टक में इसकी खेती की जाती है ।
डी डी आर धान 49 में 25.2 पी पी एम जिंक हैं जिसकी प्रति हेक्टेयर 5० क्विंटल पैदावार है । खरीफ और रबी सीजन में की जाती है जो 13० दिनों में तैयार हो जाती है । केरल , गुजरात और महाराष्ट्र में इसकी खेती की जाती है । जिनको राइस एम एस में 27.4 पी पी एम जिंक है जिसकी पैदावार 58 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है । पश्चिम बंगाल , ओडिशा और छत्तीसगढ़ में इसकी खेती की जाती है ।
सी आर धान 311 में 1०.1 प्रतिशत प्रोटीन और 42 पी पी एम जिंक है । राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान कटक ने इसका विकास किया है जो प्रति हेक्टेयर 46.2 क्विंटल की पैदावार देता है । करीब 124 दिनों में तैयार होने वाली इस किस्म की खेती ओडिशा में की जा रही है ।
खाना खजाना / शौर्यपथ / मीठे के शौकीन लोग मीठा खाने के लिए किसी त्योहार या मौके के मोहताज नहीं होते। मीठे का नाम सुनते ही मन में गाजर का हलवा,मूंग दाल हलवा या फिर लौकी के हलवे का ख्याल सबसे पहले आता है। लेकिन मीठे में एक डेसर्ट ऐसा भी है जो डाइनिंग टेबल पर आते ही स्वाद में इन सब हलवों की छुट्टी कर देता है। जी हां और वो है कद्दू का हलवा। तो देर किस बात की क्यों न आज ही घर पर परिवार के लोगों को यह मीठा सरप्राइज दिया जाए। चलिए जानते हैं कैसे बनाया जाता है कद्दू का हलवा।
सामग्री-
3 कप कद्दू
1 कप पानी
2 चम्मच खरबूज के बीज
2 चम्मच घी
1/2 कप चीनी
1 मुट्ठी ड्राई फ्रूट्स
4 हरी इलायची
कद्दू का हलवा बनाने की विधि-
कद्दू का हलवा बनाने के लिए सबसे पहले कद्दू को छिलके निकालकर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें। कद्दू काटने के बाद सभी ड्राई फ्रूट्स को भी बारीक काट लें। अब एक प्रेशर कुकर को गैस पर मध्यम आंच पर रख दें। कुकर में थोड़ा सा घी गर्म करके उसमें कटा हुआ कद्दू डालकर करीब 10 मिनट तक चलाएं। जब कद्दू पानी छोड़ने लगे तो उसमें थोड़ा सा पानी और डालकर उसे अच्छे से मिला लें। अब कुकर बंद करके उसमें 4 से 5 सीटी लगा लें।
जब प्रेशर कुकर की सारी सीटी निकल जाएं तो ढक्कन खोलकर देख लें कि कद्दू पका है या नहीं। इसके बाद गैस को धीमी आंच पर करके कद्दू को मैश करके थोड़ी देर के लिए ऐसे ही रख दें।अब कद्दू में चीनी और इलायची पाउडर मिला कर तब तक चलाएं जब तक कि वह गाढ़ा न हो जाए। गाढ़ा होने के बाद खरबूजे के बीज और ड्राई फ्रूट्स डालकर हलवे को एक मिनट तक पकाते रहें। जब हलवा बन जाए तो उसे एक सर्विंग बाउल में निकालकर खरबूजे के बीज और कटे हुए ड्राई फ्रूट्स से गार्निश करके सर्व करें। अब इस हलवे को ठंडा या गर्म, हर तरह से खा सकते हैं।
पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर रहस्यों से भरा हुआ है। पुराणों के अनुसार, पुरी में भगवान विष्णु ने पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतार लिया। यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। इनकी नगरी जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाई। पुरी को चार धाम में से एक माना जाता है। पुरी को धरती का बैकुंठ भी कहा गया है।
इस मंदिर में भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ भगवान विराजमान हैं। चैतन्य महाप्रभु इस नगरी में कई साल रहे। पुरी की रथयात्रा विश्व की सबसे बड़ी रथयात्रा मानी जाती है। इस मंदिर का रसोई घर दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर माना जाता है। कितने भी श्रद्धालु मंदिर में आ जाएं, लेकिन यहां अन्न की कभी कमी नहीं होती है। मंदिर के पट बंद होते ही प्रसाद भी समाप्त हो जाता है। रसोईघर में चूल्हे पर एक के ऊपर एक सात बर्तन रखकर प्रसाद तैयार किया जाता है और सबसे ऊपर वाले बर्तन का प्रसाद सबसे पहले तैयार होता है। मंदिर के शिखर पर लगा पवित्र सुदर्शन चक्र अष्टधातु से निर्मित है। इसे स्थापित करने की तकनीक आज भी रहस्य है। पुरी में आप कहीं भी हों, सुदर्शन चक्र को हमेशा सामने ही पाएंगे। मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज हमेशा हवा के विपरीत लहराता है। कहा जाता है कि इस मंदिर के ऊपर से कभी कोई पक्षी या विमान नहीं उड़ पाता है। एक पुजारी मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित ध्वज को रोजाना बदलते हैं। कहा जाता है कि अगर एक दिन भी ध्वज नहीं बदला गया तो मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा। मंदिर के मुख्य गुंबद की छाया किसी भी समय जमीन पर नहीं पड़ती है। महान सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर को प्रचुर मात्रा में स्वर्ण दान किया था। उन्होंने वसीयत की थी कि कोहिनूर हीरा इस मंदिर को दान कर दिया जाए।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
