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May 31, 2026
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लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / कटहल खाने के शौकीन लोगो को अब स्वाद के लिए ही नहीं बल्कि सेहतमंद बने रहने के लिए भी कटहल खाने का बहाना मिल गया है। खासकर उन लोगों को जो मधुमेह रोगी है और दवा खाने के बाद भी अपनी डायबिटीज कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं। हाल ही में अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के वार्षिक सम्मेलन में शनिवार को शिकागो में एक वीडियो लिंक के माध्यम से एक अध्ययन की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। जिसमें बताया गया कि कटहल का पाउडर प्लाज्मा में ग्लूकोज के स्तर को नीचे ले आता है।

दरअसल, टाइप 2 डा‍यबिटिज से ग्रस्त 40 लोगों पर एक शोध किया गया। इस शोध में 24 पुरुष और 16 महिलाएं शामिल थीं। उनकी औसत आयु 40 से 90 वर्ष थी। अध्ययन के दौरान, प्रतिभागियों को हरे कटहल के आटे का सेवन करने के लिए कहा गया। बेसलाइन पर उनका स्तऑर HbA1c 7.23 ± 0.47 फीसदी था। 12-सप्ताह के अध्ययन के अंत में उनका एचबीए 1 सी 6.98 ± 0.48 प्रतिशत था। जोसेफ ने बताया कि “उपवास और पोस्टपैंडियल प्लाज्मा ग्लूकोज लेवल में भी समान सुधार देखा गया।”

डोसा, इडली और ब्रेड में भी मिला सकते हैं ये आटा-
अध्ययन में पाया गया कि जब इस आटे को स्थानीय भोजन में मिलाकर इस्तेमाल किया गया तो परिणाम कमाल के थे। इस शोध में प्रतिदिन 30 ग्राम कटहल का आटा मधुमेह रोगियों के भोजन में शामिल किया गया। जिसकी वजह से रक्त शर्करा के स्तर में महत्वपूर्ण कमी देखी गई। कटहल के पाउडर को इडली, डोसा के आटे के मिश्रण में मिलाया जा सकता है और आटा ब्रेड बनाने में भी शामिल किया जा सकता है।

कैसे कर सकते हैं कटहल के आटे का सेवन-
मणिपाल ग्लोबल के बोर्ड के अध्यक्ष मोहनदास पई ने कहा कि वह पिछले दो साल से रोजाना रात के खाने के बाद अपने नाश्ते में दलिया और ग्रीन टी में एक चम्मच कटहल पाउडर ले रहे थे। “यह निश्चित रूप से मेरे रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मददगार साबित हुआ।

 

लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / जिंदगी की भागदौड़ में कई बार लोग इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें खुद यह महसूस होने लगता है कि वो सिर्फ एक मशीन बनकर रह गए हैं। रोजाना की तरह ऑफिस से घर, घर से ऑफिस करते-करते वो खुद के लिए ही क्वालिटी टाइम निकालना भूल जाते हैं। जिसकी वजह से तनाव, डिप्रेशन जैसी समस्याएं व्यक्ति को घेरने लगती हैं और वो अपसेंड माइंड रहने लगता है। अगर आपको भी खुद से यही शिकायत है तो जानें उन 5 उपायों के बारे में जो आपको हमेशा माइंडफुल रहने में करेंगे मदद।

1-जागरूक रहें-
जागरुक रहने पर व्यक्ति न सिर्फ हर पल को एन्जॉय करता है बल्कि उसे हर घटना उसके अनुक्रम में भी याद रहती है। तो हर बार जब आपका मन इधर-उधर भटकने लगे, तो उसे वापस काम पर ले आएं।

2-प्रोडक्टिविटी-
जब भी आपको लगे कि आपका शरीर थक रहा है, तो अपने काम को थोड़ा ब्रेक दें, जिससे शरीर को फि‍र से तरोताजा होने का मौका मिलेगा। इससे आप ज्‍यादा प्रोडक्टिविटी दे पाएंगे।

3-आभार करें व्यक्त-
कई शोध में यह कहा गया है कि आभार व्यक्त करने और महसूस करवाने का हमारे स्वास्थ्य और भावनाओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।अपनी जिंदगी में मौजूद हर वह चीज आपके लिए खास है, जो आपको दूसरों से अलग बनाती है। इन छोटी-छोटी चीजों के प्रति ग्रेटफुल होना आपको संतोष का अहसास करवाता है।

4-नए लक्ष्य करें तय-
अपने लक्ष्यों की अलाइनमेंट करने के लिए शांत दिमाग से खुद अपने लक्ष्यों पर फोकस करें। ऐसा करने से आपके लिए क्या सही है, क्या गलत है और क्या कम जरूरी है। इसका फैसला करके आप खुद की राह को ज्यादा बेहतर बना पाएंगे।

5-मेडिटेट करें-
मेडिटेशन माइंडफुल होने की कुंजी है। शुरूआत गहरी सांस लेने और छोड़ने से करें। आप जितनी प्रैक्टिस करेंगी, यह आपके लिए उतना ज्यादा फायदेमंद होगा।

 

धर्म संसार / शौर्यपथ / चार धाम विकास परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य शिव प्रसाद ममगाईं ने एक जुलाई से चार धाम यात्रा राज्य के भीतर के लोगों के लिए शुरू करने की मांग की। सीएम त्रिवेंद्र रावत से मिल कर उन्होंने पहले चार मैदानी जिलों को छोड़ कर पहाड़ी जिलों से यात्रा शुरू कराने की मांग की।

सीएम से मुलाकात के दौरान आचार्य ममगाईं ने कहा कि राज्य के पर्वतीय जिले जहां कोरेाना संक्रमण अधिक नहीं है और उन जिलों की स्थिति ठीक है। वहां के लोगों को चार धामों में दर्शन करने की अनुमति दी जाए। ताकि राज्य के भीतर लोगों को चार धाम यात्रा का लाभ मिल सके। अभी देहरादून, हरिद्वार, यूएसनगर, नैनीताल के लोगों को छोड़ कर बाकि जिलों को मंजूरी दी जाए। उन्होंने बताया कि सीएम ने सभी पक्षों से बात कर जल्द कोई ठोस फैसला लेने का आश्वासन दिया है।

अभी चार धाम यात्रा एक जुलाई से शुरू किए जाने का कोई फैसला नहीं लिया गया। अभी सभी जिलाधिकारियों से रिपोर्ट मांगी है। सभी पक्षों से बात कर ही शासन स्तर से कोई फैसला लिया जाएगा। - रविनाथ रमन, सीईओ उत्तराखंड चार धाम श्राइन बोर्ड

 

नजरिया / शौर्यपथ / बादलों के तूफान के रूप में इकट्ठा होने से आकाशीय बिजली बनने की शुरुआत होती है। बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े और बेहद ठंडे पानी की बूंदें आपस में टकराते हैं और इनके बीच विपरीत ध्रुवों के विद्युत कणों का प्रवाह होता है। वैसे तो, धन और ऋण एक-दूसरे को चुंबक की तरह अपनी ओर आकर्षित करते हैं, किंतु वायु के अच्छा संवाहक न होने के कारण विद्युत आवेश में बाधाएं आती हैं। अत: बादल की ऋणावेशित निचली सतह को छूने के प्रयास करती धनावेशित तरंगें भूमि पर गिर जाती हैं। चूंकि धरती विद्युत की सुचालक है। यह बादलों के बीच की परत की तुलना में अपेक्षाकृत धनात्मक रूप से चार्ज होती है। तभी इस तरह पैदा हुई बिजली का कुछ प्रवाह धरती की ओर हो जाता है। भारत में हर साल करीब 2,000 लोग इस तरह बिजली गिरने से मारे जाते हैं। मवेशियों और मकान आदि का भी नुकसान होता है।
गुरुवार को बिहार और उत्तर प्रदेश के अनेक हिस्सों में बिजली गिरी और करीब 125 लोग मारे गए। यह एक असामान्य घटना है। अमेरिका में हर साल बिजली गिरने से औसतन 30 और ब्रिटेन में तीन लोगों की मृत्यु होती है, जबकि भारत में यह आंकड़ा बहुत अधिक है। इसका मूल कारण यह है कि हमारे यहां आकाशीय बिजली गिरने के पूर्वानुमान व चेतावनी की व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है। आंकडे़ गवाह हैं कि हमारे यहां बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ में बिजली गिरने की घटनाएं ज्यादा होती हैं, और आमतौर पर दिन में ही लोग इसके शिकार बनते हैं। यदि तेज बरसात हो रही हो और बिजली कड़क रही हो, तो ऐसे में पानी भरे खेत के बीच में, किसी पेड़ के नीचे, और पहाड़ी स्थान पर जाने से बचना चाहिए। मोबाइल का इस्तेमाल भी खतरनाक होता है।
हमें यह समझना होगा कि इस तरह बहुत बडे़ इलाके में एक साथ घातक बिजली गिरने का असली कारण धरती का लगातार बदल रहा तापमान है। पहले आषाढ़ महीने में बहुत भारी बारिश नहीं होती थी, लेकिन अब बहुत थोड़े समय में जोरदार बारिश का होना और सावन-भादों का सूखा रह जाना, जलवायु परिवर्तन का त्रासद नतीजा है। एक बात और। बिजली गिरना जलवायु परिवर्तन का दुष्परिणाम तो है ही, इसके अधिक गिरने से जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को भी गति मिलती है। सनद रहे, बिजली गिरने के दौरान नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है और यह एक घातक ग्रीन हाउस गैस है। हालांकि, अभी बिजली गिरने और जलवायु परिवर्तन पर उसके प्रभाव को लेकर शोध कम हुए हैं, पर कई शोध इस बात को स्थापित करते हैं कि जलवायु परिवर्तन ने बिजली गिरने के खतरे को बढ़ाया है। इस दिशा में गहराई से काम करने के लिए ग्लोबल क्लाइमेट ऑब्जर्विंग सिस्टम के वैज्ञानिकों ने विश्व मौसम विज्ञान संगठन के साथ मिलकर एक विशेष शोध दल का गठन किया है। पर जलवायु परिवर्तन के बारे में हुए अध्ययनों से पता चला है कि यदि जलवायु में अधिक गरमाहट हुई, तो गरजदार तूफान कम, तेज आंधियां ज्यादा आएंगी और हर एक डिग्री ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती तक बिजली की मार की मात्रा 10 फीसदी तक बढ़ सकती है।
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले के वैज्ञानिकों ने वायुमंडल को प्रभावित करने वाले अवयवों और बिजली गिरने के बीच के संबंध पर एक शोध मई 2018 में प्रारंभ किया था। उनका आकलन था कि आकाशीय बिजली के लिए दो प्रमुख अवयवों की आवश्यकता होती है : तीनों अवस्थाओं (तरल, ठोस व गैस) में पानी और बर्फ बनाने से रोकने वाले घने बादल। वैज्ञानिकों ने 11 जलवायु मॉडल पर प्रयोग किए और पाया कि भविष्य में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में गिरावट आने से रही, अत: आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ेंगी।
एक और गौर करने की बात यह है कि अभी जिन इलाकों में बिजली गिरी है, उनमें से बड़ा हिस्सा धान की खेती का है और जहां धान के लिए पानी को एकत्र किया जाता है, वहां से ग्रीन हाउस गैस जैसे मीथेन का उत्सर्जन अधिक होता है। मौसम जितना अधिक गरम होगा, ग्रीन हाउस गैसें जितनी उत्सर्जित होंगी, उतनी ही अधिक बिजली ताकत के साथ धरती पर गिरेगी। साफ है, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण व जलवायु परिवर्तन पर काबू न पाया गया, तो समुद्री चक्रवातों, बिजली गिरने, बादल फटने जैसी भयावह त्रासदियां बढ़ती ही जाएंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

 

मेलबॉक्स / शौर्यपथ / आज जब कोरोना से निपटने में सरकार की नाकामी पर चर्चा होनी चाहिए, डीजल के लगातार बढ़ते दाम के बीच पहली बार इसकी कीमत पेट््रोल से पार जाने पर चिंता जताई जानी चाहिए, चीन की सेना के सीमा पार करने के खिलाफ सरकार की रणनीति पर बहस होनी चाहिए, तब 1975 के आपातकाल को तूल देना अफसोसनाक है। सबको मालूम है कि जनता ने इंदिरा गांधी को इसका सबक 1977 के आम चुनाव में सीखा दिया था। आज लोकतंत्र के काले अध्याय के रूप में इतिहास के अनैतिक फैसलों पर शोक मनाने से बेहतर है कि मौजूदा भारतीय लोकतंत्र पर मंडराते संकट के बादल का अंदाजा लगाया जाए। ‘द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ द्वारा जारी 2019 के डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत 160 देशों की सूची में 51वें स्थान पर एक त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र के रूप में मौजूद है। इसलिए बेहतर होगा कि इतिहास के दुर्भाग्यपूर्ण फैसलों को पीछे छोड़कर आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए।
अंकित कुमार मिश्रा, पटसा, समस्तीपुर

काल बनी बारिश
मानसून आते ही भारतीय किसान खुशी से झूम उठते हैं, क्योंकि यह वक्त खेतों की मेड़ बांधकर पानी को इकट्ठा करके धान रोपने का होता है। मगर इस बार 25 जून को यही मानसूनी बारिश बिहार और उत्तर प्रदेश में लोगों पर काल बनकर बरसी। इसमें बिजली गिरने से बिहार में लगभग 85 और उत्तर प्रदेश में करीब 25 लोगों की मौत हो गई। पर यह भी सच है कि प्राकृतिक आपदा रोकी नहीं जा सकती, सिर्फ सावधानी ही इसका बचाव है। इसलिए किसानों को कृषि-धर्म निभाने से पहले चैनलों या रेडियो पर जारी अलर्ट पर ध्यान देना चाहिए। मूसलाधार बारिश के समय विशेष सावधानी जरूरी है, क्योंकि हमारे अन्नदाताओं की जान बहुत कीमती है।
आनंद पाण्डेय, पंजियार टोली, रोसड़ा

अविश्वास बढ़ाता चीन
चीन की कथनी और करनी एक-दूसरे के विपरीत हैं। ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा लगाने वाला चीन 1962 में हमारी पीठ में छुरा घोंप चुका है। भारत के साथ ताजा घटनाक्रम में चीन ने अविश्वास और धोखेबाजी की वही पुरानी तरकीब अपनाई। इस बार बातचीत के बहाने उसने हमें धोखा दिया। जाहिर है, चीन पर अब कतई विश्वास नहीं किया जा सकता। वह इसलिए भी अविश्वास के लायक है, क्योंकि वहां लोकतंत्र नहीं है। वह भारत को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है, इसीलिए आर्थिक, राजनीतिक एवं सैन्य, तीनों स्तरों पर वह हमें घेरना चाहता है। मगर भारत भी अब बचाव की बजाय आक्रामक मुद्रा अपनाने को तैयार है। अब हम पलटकर उसे बखूबी जवाब दे सकते हैं। कोरोना महामारी के दौरान विश्व भी यह जान चुका है कि चीन मानवता का कितना बड़ा दुश्मन है और अपने हितों के लिए वह कितना नीचे गिर सकता है। भारत को अब इसी के मुताबिक अपनी रणनीति बनानी चाहिए।
उपेंद्र कुमार राय, पटना

खाली जेब पर बोझ
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन हमारे देश में पेट्रोल-डीजल के दामों में लगातार इजाफा हो रहा है। दिल्ली जैसे महानगर में तो डीजल की कीमत पेट्रोल से ज्यादा हो गई। आखिर तेल के दाम इस कदर क्यों बढ़ रहे हैं, जबकि कच्चे तेल के दामों में गिरावट है? क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि सरकार सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए ऐसा कर रही है? फिर भी, अभी इसकी कीमतों पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आम जनता को बडे़ संकटों का सामना करना पडे़गा। उनकी मुश्किलें इसलिए भी बढ़ेंगी, क्योंकि कोरोना की वजह से उनकी जेबें पहले से ही खाली हैं। उम्मीद है, सरकार लोगों की मुश्किलों को समझेगी और जल्द ही कीमतों में कमी करेगी।
शुभम पांडेय गगन

 

ओपिनियन / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए 26 जून को ‘आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश रोजगार अभियान’ का शुभारंभ कर दिया। वास्तव में, यह देश में कोरोना काल में रोजगार के लिए शुरू किया गया सबसे बड़ा अभियान है, जिस पर अपने राज्य लौटे मजदूरों के साथ ही देश की भी नजरें टिकी हैं। इसके तहत देश की सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य में करीब सवा करोड़ लोगों को विभिन्न परियोजनाओं के तहत रोजगार नसीब होगा।
वस्तुत: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश रोजगार अभियान’ का मुख्य लक्ष्य प्रदेश में वापस आए प्रवासी कामगारों को उनके ही क्षेत्र में हुनर व रुचि के आधार पर रोजगार प्रदान करने, स्थानीय स्तर पर उद्यमिता को बढ़ावा देने व रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए औद्योगिक संगठनों और अन्य संस्थानों को साथ जोड़ना है। जब लोग भी रोजगार के लिए सरकार की ओर देख रहे हैं, तब यह एक सराहनीय कदम है। देश के विभिन्न राज्यों में भी रोजगार निर्माण के लिए ऐसे विशेष अभियानों की जरूरत दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश के इस अभियान से अन्य राज्यों को भी यथोचित प्रेरणा मिलेगी।
आज निजी क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने के प्रयासों के साथ ही सरकारी स्तर पर ऐसी पहल बहुत जरूरी है। विशेष अभियानों के अलावा सरकारी विभागों में रिक्त पदों पर तत्परता के साथ नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने पर भी ध्यान देना होगा। सरकार ने विगत 14 मार्च को संसद में बताया है कि रेलवे, रक्षा, डाक सहित अन्य सरकारी विभागों में करीब 4.76 लाख भर्तियां की जानी हैं। इनमें से यूपीएससी, एसएससी और रेलवे भर्ती बोर्ड के जरिए 1.34 लाख और रक्षा विभाग में 3.4 लाख खाली पदों को भरा जाना है। केंद्र सरकार के अलावा राज्यों सरकारों के भी लाखों पद रिक्त हैं। सरकार के स्तर पर रिक्त पदों को भरने के लिए भी विशेष अभियान चलाने की जरूरत है। विशेष रोजगार अभियान को कुछ बहुत जरूरतमंद जिलों में चलाने के साथ ही मनरेगा में भी कोई कमी नहीं होनी चाहिए। काम मांगने वाले लोगों को रोजगार देकर समाज को व्यापक संकट से बचाया जा सकता है। ज्यादा लोगों को रोजगार देने से अर्थव्यवस्था को भी सीधे फायदा होगा। इससे मांग और आपूर्ति बढ़ेगी, विकास दर में तेजी आएगी।
यह साफ दिखाई दे रहा है कि कोविड-19 और लॉकडाउन की वजह से देश के असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों और कर्मचारियों के सामने रोजगार संकट ज्यादा बढ़ा है। इस दौर में देश में बेरोजगारी की चुनौती कितनी तेजी से बढ़ी है, इसका अनुमान प्राइवेट थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर मॉनिर्टंरग इंडियन इकोनॉमी’ द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। इसके मुताबिक, भारत में जनवरी 2020 में बेरोजगारी दर 7.2 प्रतिशत थी, यह फरवरी में 7.8 प्रतिशत और मार्च में 8.7 प्रतिशत हो गई। यह अप्रैल 2020 में 23.52 फीसदी तथा मई 2020 में 23.48 फीसदी हो गई। यद्यपि लॉकडाउन समाप्त होने के साथ-साथ बेरोजगारी दर में कमी बताई जा रही है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।
युवाओं को अपना मनोबल और व्यवस्था में विश्वास बनाए रखना चाहिए। चुनौतियां बढ़ी हैं, पर स्थिति ऐसी बुरी भी नहीं है कि जिससे उबरना मुश्किल हो। अच्छा रोजगार चाह रहे लोगों को किसी न किसी चीज में विशेषज्ञता या कार्य कुशलता के लिए प्रयास जरूर करना होगा। विभिन्न वैश्विक रिपोर्टों में तथ्य उभरकर सामने आ रहा है कि चालू वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की विकास दर में जोरदार गिरावट होगी, लेकिन आगामी वित्त वर्ष 2021-22 में देश की विकास दर में तेजी दिखाई देगी। भारत में रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। ऐसे में, दुनिया के मानव संसाधन शोध संगठनों का कहना है कि कोविड-19 की चुनौतियों से भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं शीघ्रतापूर्वक बाहर निकलेगी और रोजगार के मौके बढ़ेंगे। पिछले दिनों न्यूयॉर्क के मैनपॉवर ग्रुप द्वारा प्रकाशित 44 देशों के रोजगार के वैश्विक सर्वेक्षण के मुताबिक, कोविड-19 के बीच रोजगार के मामले में सकारात्मक परिवेश दिखाने वाले दुनिया के चार शीर्ष देशों में भारत भी शामिल है। भारत के अलावा केवल जापान, चीन और ताइवान में रोजगार को लेकर सकारात्मक परिदृश्य पाया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद और कोरोना काल के बीच भारत में जुलाई से सितंबर 2020 की तिमाही में पांच सेक्टरों- खदान, निर्माण, वित्त, बीमा और रियल एस्टेट में नौकरियों के नए रास्ते खुलेंगे।
प्रमुख मानव संसाधन कंपनी टीमलीज की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश के चार महानगरों, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को छोड़कर मेट्रो के रूप में उभरते शहरों- बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, अहमदाबाद, चंडीगढ़, कोच्चि, कोयंबटूर, आदि में रोजगार बढें़गे। इन शहरों में हेल्थ, फार्मा, ई-कॉमर्स, एफएमसीजी, कृषि, एग्रो-केमिकल्स, ऑटो-मोबाइल्स और इनसे जुड़ी सेवाओं, बीपीओ सेवाएं, निर्माण तथा रिएल एस्टेट व ऊर्जा क्षेत्र में रोजगार के मौके तेजी से बढ़ेंगे। इसमें कोई दो मत नहीं है कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत दिए गए आर्थिक पैकेज से देश के उद्योग-कारोबार क्षेत्र को जो लाभ मिलेगा, उससे रोजगार के मौके बढ़ेंगे।
युवाओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कोविड-19 के बाद आने वाले वर्षों में दुनिया के कई देशों में अर्थव्यवस्थाओं को संभालने के लिए प्रशिक्षित युवा हाथों की कमी होने वाली है। मानव संसाधन परामर्श संगठन कार्न फेरी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां दुनिया में 2030 तक कुशल श्रम बल का संकट होगा, वहीं भारत के पास 24.5 करोड़ अतिरिक्त कुशल श्रम बल होगा। साल 2030 तक दुनिया के 19 विकसित व कई विकासशील देशों में 8.52 करोड़ कुशल श्रम शक्ति की कमी हो जाएगी। ऐसे में,भारत इकलौता देश होगा, जिसके पास 2030 तक जरूरत से ज्यादा कुशल श्रम बल होगा। भारत दुनिया के तमाम देशों में कुशल श्रम बल को भेजकर फायदा उठा सकेगा।
निजी क्षेत्र में रोजगार की संभावनाओं का भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन इससे सरकारों की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। सरकारों को अपनी रोजगार योजनाओं को चाक-चौबंद तरीके से चलाकर समाज में राहत का भाव बनाए रखना होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री

 

जीवन सैली /शौर्यपथ / लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती॥
नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है।
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है॥
मन का साहस रगों में हिम्मत भरता है।
चढ़ कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है॥
मेहनत उसकी बेकार हर बार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती॥

हिन्दी के प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता की ये पंक्तियां "कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती" इसे आज भी हम जीवन में बहुत कुछ सीख सकते हैँ। परीक्षा के रूप में आई जीवन की पहली सीढ़ी पर मिली असफल हमें डरा नहीं सकती। कई बार देख गया कि 10वीं, 12वीं जैसी छोटी क्लासेस की परीक्षाओं में भी असफल होने या मन मुताबिक परिणाम न आने पर कई छात्र निराश हो जाते हैं। उन्हें लगने लगता है कि अब वह कुछ नहीं कर पाएंगे लेकिन ऐसे वक्त यदि हरिवंश राय बच्चन इस कविता जैसा पढ़ लें और अपने जीवन में अपनाने की कोशिया करें तो शायद आप अपने को पहले से और ज्यादा सशक्त महसूस करेंगे।

इसलिए देर क्या, छोटी सी प्रेरणा के साथ फिर शुरू करें बड़े लक्ष्य का एक मजबूत प्रयास।

पैरेंट्स की भी जिम्मेदारी: बोर्ड रिजल्ट किसी प्रतियोगी परीक्षा में आपकी लाड़ली/लाड़ले को आकांक्षा के अनुरूप परिणाम नहीं मिलता तो आपकी भी जिम्मेदारी है कि उसे गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें न कि उसकी हमेशा कमियां निकालते रहें। ध्यान रखें कि बच्चों को ऐसा कुछ न कहें जिनसे उनका मनोबल टूटे।

 

शौर्यपथ / पहली जुलाई से सनातन धर्मावलंबियों के शादी-ब्याह के शुभ मुहूर्त पर चातुर्मास के चलते चार महीने का ब्रेक लग जायेगा। पहली जुलाई को हरिशयन एकादशी है। मान्यता है कि इस एकादशी से प्रभु श्री हरि शयन को चले जाते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास शुरू हो जाता है।

चातुर्मास में सनातन धर्मावलंबियों के शादी ब्याह के शुभ मुहूर्त नहीं बनते हैं। हालांकि बनारसी पंचांगों में हरिशयन एकादशी से पहले 26 से 30 जून तक शादी-ब्याह के पांच शुभ मुहूर्त बचे हैं। दूसरी ओर मिथिला पंचागों के हिसाब से शादी-ब्याह के शुभ मुहूर्त 17 जून को ही समाप्त हो गये हैं। बनारसी पंचांग के हिसाब से चातुर्मास के बाद 25 नवंबर से शादी-ब्याह के शुभ मुहूर्त शुरू होंगे। वहीं मिथिला पंचांगों के मुताबिक 1 दिसंबर से शुभ विवाह के मुहूर्त शुरू होंगे।

वैदिक ज्योतिषी धीरेंद्र कुमार तिवारी ने महावीर और हृषीकेश पंचांगों के हिसाब से बताया कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष में 30 जून दशमी तिथि तक ही शादी-ब्याह के शुभ मुहूर्त हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी बुधवार एक जुलाई को हरिशयन और चातुर्मास शुरू हो जाएगा। हरिशयनी एकादशी के बाद अगला विवाह विवाह मुहूर्त 25 नवंबर से शुरू हो रहा है। हरि प्रबोधिनी एकादशी भी 25 नवंबर को है। इसी दिन से अगले विवाह मुहूर्त शुरू हो रहे हैं।

मिथिला पंचांग में इस वर्ष अब केवल छह शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य डा.राजनाथ झा ने मिथिला पंचांगों के हवाले से बताया कि इस वर्ष अब केवल छह शुभ मुहूर्त बचे हैं। मिथिला पंचांगों में चातुर्मास के समाप्त होने के बाद नवंबर माह में एक भी शुभ विवाह मुहूर्त नहीं हैं। हालांकि 25 नवंबर कोही चातुर्मास समाप्त हो जाता है। जबकि दिसंबर माह में केवल छह शुभ विवाह के मुहूर्त हैं 14 दिसंबर तक।

इस वर्ष अब 17 शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य पीके युग ने बनारसी पंचांगों के हवाले से बताया कि इस वर्ष शादी ब्याह के अब 17 शुभ मुहूर्त ही बचे हैं। इसमें जून में पांच,नवंबर में दो और दिसंबर में 10 शुभ विवाह मुहूर्त हैं। इस वर्ष चातुर्मास समाप्त होने के बाद 25 नवंबर से 14 दिसंबर तक केवल 12 शुभ विवाह मुहूर्त हैं।

जून में शुभ विवाह के मुहूर्त
(महावीर और ऋषिकेश पंचांग, बनारस के अनुसार)
शुक्रवार 26 जून, शनिवार 27 जून,रविवार 28 जून
सोमवार 29 जून, मंगलवार 30 जून.

नवंबर में विवाह मुहूर्त
(बनारसी पंचांगों के अनुसार)
25 नवंबर, 30 नवंबर

दिसंबर में विवाह मुहूर्त (बनारसी पंचांग)
1, 2 , 6 ,7 , 8 ,9 ,10 ,11,13 ,14

मिथिला पंचांग के अनुसार ,शुभ विवाह मुहूर्त:
दिसंबर में :2, 6, 7, 10, 11, 14

 

नजरिया / शौर्यपथ / भारत और चीन के बीच 15 जून की झड़प ने आखिरकार हिमालयी सीमा पर शांति के चार दशक के रिकॉर्ड को तोड़ दिया। चीन द्वारा हड़पी गई जमीन को खाली कराने से लेकर शीत युद्ध के आह्वान तक प्रतिक्रियाएं तीखी रही हैं। साल 1950 से न सही, इधर दो दशकों से चीन की बढ़त की चर्चा चल रही है। भारत-चीन संबंधों ने बहुत कुछ देखा है, जुड़ाव से लेकर वर्ष 1959 के नाटकीय अलगाव तक। 1962 में एक छोटा, पर घातक युद्ध हुआ और उसके बाद के दशकों में न युद्ध-न शांति की स्थिति रही। आखिरकार 1988 में दोनों देशों को कूटनीतिक सफलता मिली और संबंधों में एक सलीका बना, जिसके तहत सीमा विवादों को सुलझाए बिना आगे बढ़ने की राह बनी। मूल आधार यह था कि शांतिपूर्ण दायरे में संबंधों में विकास की रफ्तार रहेगी, मगर 15 जून की झड़प से दोनों देशों के बीच रही सहमति पर चोट पड़ी है।
स्पष्ट है, रिश्ते का अगला चरण एक शांतिपूर्ण सीमा पर निर्भर है, मगर इसका अर्थ सिर्फ यथास्थिति की बहाली नहीं होनी चाहिए। यदि यथास्थिति से हमारा आशय दो परमाणु संपन्न बड़े देशों से है, जो फिर से आक्रामक कवायद शुरू कर रहे हैं, तो यह स्थिति ज्यादा नहीं टिकने वाली। अब समीक्षा और एक नए संघर्ष-प्रबंधन ढांचे को लागू करने का समय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस विवाद को क्यों नहीं सुलझा सकते? चीनी विद्वान यूं सन ने समाधान में बाधा डालने वाली प्रमुख समस्या का एक सारांश पेश किया, ‘चीन के साथ सीमा समाधान में भारत जो रियायतें चाहता है, वे कठोर प्रतिबद्धताएं हैं, जिन्हें बाद में पलटा नहीं जा सकता। इसके विपरीत, चीन अमेरिका-चीनी रणनीतिक प्रतिस्पद्र्धा में भारत की तटस्थता चाहता है, जो अल्पकालिक और आसानी से समायोज्य है।’
रणनीतिक इरादों में अनिश्चितता की इस समस्या का निकट भविष्य में कोई कारगर समाधान नहीं है। हालांकि नए मानदंडों के जरिए सीमा स्थिर करना दोनों देशों के हित में संभव है। सबसे विवादास्पद है सीमा पर अनेक स्थानों पर बफर जोन में रचनात्मक दृष्टि रखना और हिंसक झड़पों से बचने के लिए समन्वय के साथ गश्ती की व्यवस्था करना। नई व्यवस्था बनाने के लिए यह जरूरी है। उत्साह या बड़बोलेपन में कई लोगों ने भारत-चीन संबंधों के टूटने की घोषणा तक कर दी। हमें ऐसे अतिरेक या आक्रामकता से बचना है। दोनों देशों के बीच रिश्ते कोई अचानक मुश्किल में नहीं पड़े हैं, इसके संकेत कुछ समय से स्पष्ट मिल रहे थे।
वास्तव में, हमारी चीन नीति असम्मत रही है। बेल्ट रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) से नौसेना सुरक्षा और 5-जी की उच्च तकनीक तक, दिल्ली अपनी बयानबाजी व कार्यों में मुखर रही है। यहां तक कि भू-राजनीतिक क्षेत्र में अमेरिका को जोड़ने में भी भारत नाकाम ही हुआ है। एशिया में भी दिल्ली चीन के पड़ोसियों को भविष्य की बाधा के रूप में आंकती रही है। पारंपरिक सहयोगी रूस के साथ भी हाल के वर्षों में सरकार की नीति पुरानी भू-रणनीति की याद दिलाती है। हमारे नीति-निर्माताओं की इस बात के लिए आलोचना की जा सकती है कि वे विश्वसनीय रणनीति के बिना ही चीन के संदर्भ में प्रतिस्पद्र्धात्मक कदम उठाते रहे। नई दिल्ली की असली नाकामी यह है कि व्यापक विदेश नीति के ढांचे में उसकी नीतिगत कथनी और करनी मेल नहीं खा रही हैं। चीन के साथ निरंतर जुड़ाव बहुध्रुवीय दुनिया में अग्रणी शक्ति के रूप में उभरने की एक भव्य रणनीति का हिस्सा था। इसकी बजाय, दिल्ली ने खुद को खाली खजाने व अप्रत्याशित साझीदारों के साथ चीन के खिलाफ कर लिया है। इतिहास बताता है, जब बड़ी ताकतों के साथ भारत के सकारात्मक व सशक्त संबंध थे, तब उसे चीन गंभीरता से लेता था। इतिहास यह भी दर्शाता है कि भारत के लिए शक्ति का संतुलन किस हद तक फायदेमंद हो सकता है।
भारत-अमेरिका और भारत-सोवियत (रूस) संबंधों ने भारत-चीन संबंधों को स्थिर रखने का काम किया और तभी भारत अपने हितों को पहचानने व आगे बढ़ाने में मजबूती से बना रहा। ऐसा तभी हुआ, जब स्थितियां भारत के अनुकूल थीं और वह चीन के साथ परस्पर लाभप्रद संबंधों को आकार देने में सक्षम था। तभी अंतरराष्ट्रीय माहौल का चतुराई से लाभ उठाने और एक परिष्कृत चीन नीति बनाए रखने में भी भारत ज्यादा सक्षम था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) जोरावर दौलत सिंह, फेलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, दिल्ली

 

सम्पादकीय / शौर्यपथ / देश के जिस चमकदार हिस्से को आदर्श बनकर चमकना था, वहां कोरोना संक्रमण का सबसे ज्यादा फैल जाना दुखद और चिंताजनक है। किसी भी देश की राजधानी में आबादी ज्यादा होती है, लेकिन इसके बावजूद उसे खुद को तमाम कमियों से बचना-बचाना पड़ता है, ताकि उस पर विश्वास कायम रहे। राजनीति से परे भी राजधानी का अपना महत्व है और यह महत्व वहां मौजूद सुविधाओं-संसाधनों की वजह से ही आकार लेता है। यह दुखद तथ्य है कि दिल्ली ने कोरोना के मामलों में उस मुंबई को पछाड़ दिया है, जो विगत लगभग दो महीने से सबसे आगे चल रही थी। मुंबई में जहां रोज आ रहे मामलों की संख्या में भारी कमी आई है, वहीं दिल्ली में एक दिन में 3,788 मामलों का सामने आना चिंता को बहुत बढ़ा देता है। यह दिल्ली के लिए पहले से कहीं ज्यादा ईमानदारी और मुस्तैदी से सोचने-करने का वक्त है। आने वाले दिनों में कई देशों से हवाई उड़ानें शुरू हो जाएंगी और एक राजधानी के रूप में दिल्ली की जो व्यापक जिम्मेदारियां हैं, उनसे बचना नामुमकिन है। कोरोना की चेन तोड़ने के लिए सरकार को युद्ध स्तर पर प्रयास करने चाहिए। अर्थव्यवस्था के लिए लॉकडाउन खुलना जरूरी है, पर ऐसा न हो कि संक्रमण इतनी तेजी से फैले कि अनलॉक होने का नुकसान ज्यादा और फायदे कम हो जाएं। उधर, लॉकडाउन खोलने के बाद महानगर चेन्नई की भी हालत खराब हो गई थी, तो वहां फिर 12 दिन का संपूर्ण लॉकडाउन लगाना पड़ा है। कोलकाता में भी राहत नहीं है, पश्चिम बंगाल सरकार ने लॉकडाउन को 31 जुलाई तक के लिए बढ़ा दिया है। दिल्ली में अभी लॉकडाउन का इरादा किसी नेता ने नहीं जताया है, पर संक्रमण को नहीं संभाला गया, तो कोरोना व लॉकडाउन की राजनीति शुरू करने का इंतजार करने वाले भी कम नहीं होंगे। राजनीति का अपना मिजाज है, जिसमें एक दोषी या आरोपी खोजा जाता है, लेकिन कोरोना के समय ऐसा कोई प्रयास करने की बजाय सकारात्मक ढंग से सोचना चाहिए।
अव्वल तो दिल्ली में परस्पर समन्वय बढ़ाना सबसे जरूरी है। निर्णायक नेताओं को रोष, राजनीति छोड़कर फैसले लेने होंगे। जनता देख रही है कि कौन क्या कर रहा है। अत: नेताओं को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी का एहसास गहराई से होना चाहिए। मरीज घर में रहे या अस्पताल आए, जैसे विषय पर विवाद का समय नहीं है। बहुत से लोग होंगे, जिनके घर में जगह या सुविधाएं नहीं होंगी, तो उनका अस्पताल आना विवशता है। अत: दोनों ही तरह कर सुविधाओं के साथ सरकार को चलना होगा। यह मरीजों के अनुकूल राह निकालने का समय है।
बहरहाल, दिल्ली सरकार ने घर-घर जांच का जो बीड़ा उठाया है, वह सराहनीय है। 15,000 से ज्यादा टीमें बन रही हैं, जिनमें 55 हजार से ज्यादा चिकित्सा सेवक शामिल होंगे, जो 34 लाख से अधिक घरों में जाकर लोगों की जांच करेंगे। ऐसे बड़े अभियान के समय लोगों की भी जिम्मेदारी है कि वे स्वयं आगे बढ़कर जांच कराएं। संभव है, घर-घर जांच से कोरोना के मामलों की संख्या बढ़ जाए, पर तब भी 6 जुलाई तक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और उसके बाद की रणनीतियों के साथ भी दिल्ली को तैयार रहना चाहिए। इस तैयारी की बुनियाद निर्णायकों के परस्पर समन्वय पर निर्भर है और जो थोड़े-बहुत मतभेद रह भी जाएं, तो उनका असर जांच या चिकित्सा टीमों पर नहीं पड़ना चाहिए।

 

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