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सम्पादकीय / शौर्यपथ /समय के अनुरूप शिक्षा नीति का बदलना जितना स्वाभाविक है, उतना ही आवश्यक भी। 34 साल बाद नई शिक्षा नीति का आना लगभग तय था, इसकी चर्चा तो दशक भर से चल रही थी, लेकिन समय के अनुरूप सबकी मंजूरी के साथ एक नीति तय करना आसान नहीं होता। अब जो नीतिगत बदलाव हो रहे हैं, उनका सबसे बड़ा पहलू यह है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता और उपयोगिता, दोनों को ही बल मिलेगा। स्कूली स्तर पर ही छात्रों को किसी न किसी कार्य कौशल से जोड़ दिया जाएगा। इसका अर्थ है, जब बच्चा स्कूल से पढ़कर निकलेगा, तो उसके पास एक ऐसा हुनर होगा, जिसका वह आगे की जिंदगी में इस्तेमाल कर सकेगा। इससे शिक्षा को एक व्यावसायिक बल भी मिलेगा। ऐसे करोड़ों मां-बाप होंगे, जो खुश होंगे कि उनका बच्चा स्कूल में न केवल पढ़ेगा, बल्कि कोई काम भी सीखेगा। नई शिक्षा नीति को अंतिम रूप देने के लिए बनाई गई समिति का नेतृत्व कर रहे डॉ कस्तूरीरंगन ने सही कहा है कि नई शिक्षा नीति बेरोजगार तैयार नहीं करेगी।
दूसरी बड़ी पहल यह हुई कि स्कूल शिक्षा को विभिन्न चरणों में बांट दिया गया है। यहां सर्वाधिक फायदा फाउंडेशन स्टेज पर होगा। भारत में उन बच्चों की एक बड़ी संख्या रही है, जो सीधे पहली कक्षा में दाखिला लेते रहे हैं। सरकारी विद्यालयों में नर्सरी या प्री-स्कूल या स्कूल पूर्व शिक्षा की जरूरत को नहीं माना जा रहा था। निजी क्षेत्र में प्री-स्कूल शिक्षा का विगत तीन दशकों में बहुत विकास हुआ है, जिससे सरकारी स्कूलों का आकर्षण भी घटा है। ज्यादातर निजी स्कूल सीधे पहली कक्षा में किसी बच्चे को प्रवेश नहीं देते हैं, लेकिन अब देश के सभी स्कूलों को प्री स्कूल शिक्षा का आदर करना पड़ेगा। यह बच्चों के ज्ञान-स्तर व पढ़ाई की एकरूपता के लिए जरूरी है। यह एक प्रमाण है कि शिक्षा में निजी क्षेत्र किस तरह से सरकारी शिक्षा को प्रभावित और संवद्र्धित करता है। प्री-स्कूल के लिए आंगनबाड़ी व्यवस्था का उपयोग यथोचित है। यह समय बुनियादी पढ़ाई में एकरूपता लाने की दिशा में कारगर हो सकता है। अब प्री-स्कूल के तीन वर्ष और सामान्य स्कूल के शुरुआती दो वर्ष अर्थात कुल पांच वर्ष के लिए नया पाठ्यक्रम बनाया जाएगा। यहां सरकार को तय करना होगा कि देश के सभी स्कूलों में यह पांच वर्षीय पाठ्यक्रम लागू हो जाए, ताकि बच्चों का समतापूर्ण शैक्षणिक विकास हो। नई शिक्षा नीति को यदि किसी ऊंचे मुकाम पर ले जाना है, तो बुनियादी अर्थात फाउंडेशन स्टेज पर ही शिक्षा की गुणवत्ता के लिए प्रयास करने पड़ेंगे।
10+2 और एफफिल की विदाई हो गई है। मोटे तौर पर एक्टिविटी आधारित शिक्षण पर ध्यान रहेगा। प्रयोगों के जरिए बच्चों को विज्ञान, गणित, कला आदि की पढ़ाई कराई जाएगी। कक्षा छह से पढ़ाई विषय आधारित होने लगेगी और कक्षा छह से ही कौशल विकास कोर्स भी शुरू हो जाएंगे। कक्षा नौ से 12 की पढ़ाई दो चरण में होगी, जिनमें विषयों का गहन अध्ययन कराया जाएगा। विषय चुनने की आजादी भी होगी। परीक्षा और प्रदर्शन का आकलन भी बदलने वाला है, इस मोर्चे पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और राज्यों के शिक्षा मंत्रालयों को ज्यादा सावधानी से काम करना होगा। बोर्ड की परीक्षा का तनाव घटे, लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता नहीं घटनी चाहिए। नई नीति को साकार करने के लिए शिक्षकों और शिक्षा प्रबंधन की गुणवत्ता भी सुधारनी पड़ेगी।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / बुधवार का दिन भारत के लिए ऐतिहासिक रहा। काफी साल के बाद देश में नए लड़ाकू विमानों का आगमन हुआ है। राफेल से पहले भारत ने रूस से सुखोई खरीदा था। अच्छी बात यह है कि जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, तभी से वह नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के लिए प्रयासरत है। राफेल के आने के बाद अब भारत अपनी ही जमीन से चीन और पाकिस्तान के अंदरूनी ठिकानों पर हवाई हमले कर पाएगा। इसी तरह, बुधवार की दूसरी घटना आने वाले समय में भारत को विश्व-गुरु बनाने की दिशा में सहायक साबित होगी। सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की है, जो मैकाले की शिक्षा नीति को पलटकर रख देगी। नई नीति से उद्यमी ज्यादा पैदा होंगे, क्योंकि इसमें किताबी ज्ञान से ज्यादा हुनर निखारने पर जोर दिया गया है। आजादी के बाद से ही इसकी आवश्यकता महसूस की जा रही थी, लेकिन पिछली सरकारों ने इस दिशा में कुछ ठोस नहीं किया। मौजूदा सरकार उम्मीदों पर खरी उतर रही है।
ब्रज किशोर सिंह
चुनौतियां कायम हैं
बेशक सरकार ने नई शिक्षा नीति को मंजूर कर लिया है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि बगैर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए यह नीति कैसे सफल हो पाती है? नई शिक्षा नीति के तहत सरकार का पहला फोकस 5+3+3+4 शिक्षा के लिए स्कूलों और कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना और प्रशिक्षित लोगों की नियुक्ति है। जाहिर है, इस नीति को उपयोगी बनाने के लिए इसमें आम लोगों की भागीदारी जरूरी है। नई नीति में कुछ बदलाव समय के अनुरूप जरूर किए गए हैं, पर अधिकांश परिवर्तन बगैर इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाए लागू करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसका शायद ही सुखद नतीजा निकले।
आशीष रंजन पांडे, बरडीहा, गढ़वा
मातृभाषा पर जोर
तमाम बाल मनोवैज्ञानिक व विशेषज्ञ लगातार यह कहते रहे हैं कि बच्चे की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। इसी भाषा में बच्चा आसानी से सीख और समझ सकता है और उसका बौद्धिक विकास भी तुलनात्मक रूप से बेहतर होता है। सन् 1882 में अंग्रेजों ने जो हंटर शिक्षा आयोग गठित किया था, उसने भी यही सिफारिश की थी कि प्राथमिक शिक्षा स्थानीय (मातृ) भाषा में दी जानी चाहिए। विडंबना ही है कि जिस तथ्य को अंग्रेजों ने वर्षों पहले पहचान लिया था, उसको लेकर हम आजादी के सात दशकों के बाद भी भ्रम की स्थिति में रहे। सुखद है कि नई शिक्षा नीति में इसे कुबूल कर लिया गया है और प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही देने की बात कही गई है। इससे बच्चों में सीखने, सोचने और समझने की क्षमता तेजी से बढ़ेगी। हमारा देश भी उन्नति और प्रगति के उच्चतम स्तर तक पहुंचेगा।
सुरेंद्र कुमार, नजफगढ़, दिल्ली
गांवों में फैलता संक्रमण
कोरोना का कहर ऐसा बरपा कि गांवों से पलायन कर चुके लोग भी वापस अपने घर को लौट आए। लाखों श्रमिकों की चुनौती भरी घर वापसी हम सबको याद ही है। लेकिन इन श्रमिकों के साथ वे लोग भी गांव वापस आए हैं, जो संपन्न थे। अध्ययन यह बता रहा है कि जिन शहरों में प्रदूषण का स्तर अधिक है, वहां कोरोना मरीजों की संख्या में वृद्धि देखी गई है। तापमान बढ़ने से कोरोना संकट कम होगा, यह तो महज एक अनुमान रहा, हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं दिखा। ऐसे में, मानसून के बाद ठंड की दस्तक मुश्किलें बढ़ा सकती हैं। ठंड में इम्यूनिटी कमजोर होना आम बात है। इसीलिए बीमारी फैलने का खतरा भी होगा। चिंता की बात यह है कि यह खतरा सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं होगा। गांवों की ओर रुख करने वाले लोग भी इससे बच नहीं पाएंगे। इसीलिए प्रशासन को अभी से ही तैयारी कर लेनी चाहिए।
कीर्ति सैनी, हिसार
ओपिनियन / शौर्यपथ / सरकार की किसी भी नीति का मूल मकसद होता है, समस्याओं को पहचानना और उनका बेहतर समाधान। नई शिक्षा नीति इस कसौटी पर कमोबेश खरी उतरती दिख रही है। मौजूदा वक्त में शिक्षा की घटती गुणवत्ता देश की सबसे गंभीर समस्या है। नई शिक्षा नीति इस पर ध्यान दे रही है। कई दूसरी समस्याओं का भी इसमें सैद्धांतिक हल ढूंढ़ा गया है। मगर बड़ा और अहम सवाल यह है कि इसे व्यावहारिकता की जमीन पर उतारना कितना आसान है? इसका जवाब खोजने से पहले हमें शिक्षा क्षेत्र की घटती गुणवत्ता की वजहों पर गौर करना होगा।
हमारा शिक्षा क्षेत्र योग्य शिक्षकों की कमी से लगातार जूझ रहा है। उनको प्रशिक्षण देने वाले बीएड और डीएलएड कॉलेज शिक्षा माफिया के गढ़ बन गए हैं। इनमें से कई कॉलेज तो ऐसे हैं, जो अस्तित्व में ही नहीं हैं, लेकिन डिग्रियां खूब बांटते हैं। यहां से प्रशिक्षण पाने वाले शिक्षक बच्चों को कैसी शिक्षा दे पाएंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है। नई शिक्षा नीति इस परंपरा को तोड़ने के लिए प्रतिबद्ध दिखती है। अब राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद शिक्षकों के लिए पेशेवर मानक तो तैयार करेगा ही, टीचर्स ट्रेनिंग के लिए एक नया सिलेबस भी बनाएगा, जिसके कारण शिक्षण-कार्य के लिए कम से कम योग्यता चार वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स हो जाएगी। इस पर फैसला तीन साल पहले ही हो गया था, लेकिन नई नीति के माध्यम से अब इसे अमल में लाने का प्रयास हो रहा है।
शिक्षकों का चयन भी एक बड़ी समस्या है। एक पूर्व मुख्यमंत्री शिक्षक चयन में फर्जीवाडे़ के कारण इन दिनों जेल में भी हैं। नई शिक्षा नीति इसके लिए चयन परीक्षा की वकालत करती है। इसके अलावा, वह यह भी सुनिश्चित करती है कि चयन के बाद शिक्षक पठन-पाठन में लगातार शामिल रहें और अपनी योग्यता को निखारने के लिए प्रशिक्षण-कार्य करते रहें। स्कूली बच्चों को मातृभाषा में पढ़ने की छूट देना भी एक अच्छी सोच है। हालांकि, इसे व्यावहारिक रूप में अमल में लाना मुश्किल होगा, क्योंकि आज स्कूलों को जितने शिक्षकों की दरकार है, उतने की भी नियुक्ति नहीं हो पा रही है। फिर, मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराने से ऐसे शिक्षकों की जरूरत बढ़ जाएगी, जो दो भाषाओं में दक्ष हों। जाहिर है, इन सबके लिए योग्य शिक्षकों के अलावा पर्याप्त धनराशि की भी जरूरत होगी, जिसके बारे में नई शिक्षा नीति स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहती।
खराब शैक्षणिक व्यवस्था की दूसरी वजह है, बच्चों के आकलन की गलत प्रक्रिया। मौजूदा मूल्यांकन प्रक्रिया से यह पता नहीं चलता कि बच्चा कितना सीख रहा है? इसके लिए अब एक राष्ट्रीय संस्था बनाई जाएगी, जो समय-समय पर मूल्यांकन करेगी। अब तक यह काम एनसीईआरटी के जिम्मे था, जो अच्छा काम तो कर रही थी, मगर एक विशेषज्ञ संस्था बन जाने से हालात और बेहतर होंगे। इस संस्था को न सिर्फ धरातल की समस्याओं का ज्ञान होगा, बल्कि उनके समाधान का मार्गदर्शन भी वह कर सकेगी।
तीसरा कारण था, नौनिहालों की शिक्षा पर नाममात्र का ध्यान। अभी तक इस बारे में ज्यादा सोचा ही नहीं गया था, जबकि सात-आठ साल का बच्चा दिमागी रूप से संयत हो जाता है। ‘अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन’ यानी बच्चों के शुरुआती दिनों की शिक्षा काफी मायने रखती है। नई शिक्षा नीति बताती है कि इसके लिए शिक्षा विभाग और बच्चों की बेहतरी में जुटी संस्थाएं आपस में मिलकर काम करेंगी।
चौथी वजह है, उच्च शिक्षा यानी महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए होने वाली रस्साकशी। इसी के कारण 10-12वीं की परीक्षा में परीक्षार्थियों को भाषा के पेपर में भी शत-प्रतशित अंक मिलने लगे हैं। चूंकि नई शिक्षा नीति के तहत दाखिले की परीक्षा आयोजित की जाएगी, इसलिए दसवीं-बारहवीं में परीक्षार्थियों पर बनने वाला अंकों का दबाव खत्म हो जाएगा। यह परीक्षा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होगी, जिससे बच्चे अपनी योग्यता के मुताबिक महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में दाखिला ले सकेंगे।
पांचवां कारण है, छात्र-छात्राओं का ढर्रे पर सोचना। इससे उच्च शिक्षा को लेकर नीरसता का माहौल बनने लगा था। मगर नई शिक्षा नीति पाठ्येत्तर गतिविधियों और वोकेशनल कोर्स पर पर्याप्त ध्यान दे रही है। इससे बच्चों में परंपरा से हटकर काम करने की सोच विकसित होगी, और आने वाले वर्षों में उनमें यह समझ भी विकसित हो सकेगी कि वोकेशनल कोर्स करने से नौकरी मिलने की संभावना तुलनात्मक रूप से ज्यादा है।
जाहिर है, नई शिक्षा नीति समस्याओं पर तो गौर कर रही है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर उनका आधा-अधूरा समाधान ही पेश कर रही है। इसमें पहली समस्या तो जाहिर तौर पर धनराशि के अभाव की है। पैसों का इंतजाम कैसे होगा, इस पर नई नीति चुप है। इसमें सिर्फ मान लिया गया है कि बजट का इंतजाम हो जाएगा। फिर, अन्य कठिनाइयां भी हैं, जैसे मातृभाषा में पठन-पाठन की मुश्किलें। जरूरी था कि शिक्षा की बेहतरी में निजी क्षेत्र के महत्व को पहचाना जाता। आंकडे़ साफ बताते हैं कि निजी स्कूल में जाने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। माना जाता है कि लगभग 50 प्रतिशत बच्चे अभी ही निजी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं। बेशक, सरकारी स्कूलों की व्यवस्था में सुधार जरूरी है, लेकिन निजी स्कूलों के महत्व को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। नई शिक्षा नीति निजी स्कूलों की बात एकाध जगहों पर करती भी है, तो उन पर नियंत्रण की बात करती है, उनको प्रोत्साहित करने की नहीं। अगर सरकार इनमें निवेश को प्रोत्साहित करे या निजी-सार्वजनिक सहयोग के तहत निजी स्कूलों को कुछ राहत दे, तो देश का शैक्षणिक माहौल काफी हद तक सुधर सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि निजी स्कूलों को मनमानी की छूट दे दी जाए। उन पर निगरानी रखते हुए उनका लाभ उठाने की जरूरत है।
नई शिक्षा नीति से इंस्पेक्टर राज के लौटने का भी एहसास होता है। इसमें उच्च शिक्षा के लिए एक ही नियामक संस्था की वकालत की गई है। तकनीकी रूप से उसे नियामक तो नहीं कहा गया है, लेकिन जिस तरह के दायित्व उसे सौंपे जाने की संभावना है, उससे वह काम नियामक का ही करेगी। इससे भी बचा जाना चाहिए था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) अनिल स्वरूप, पूर्व शिक्षा सचिव, भारत सरकार
राजनांदगांव / शौर्यपथ / एक ओर जहां कोविड-19 के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है वहीं दूसरी ओर पढ़ई तंूहर दुआर को अधिक सफल बनाने के उद्देश्य से राजनांदगांव जिले के मोहला विकासखंड अंतर्गत शासकीय प्राथमिक शाला रेंगाकठेरा में संसदीय सचिव इन्द्रशाह मंडावी ने स्मार्ट शाला का शुभारंभ किया। उल्लेखनीय है कि शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रेंगाकठेरा के शिक्षक मोहम्मद सईद कुरैशी ने स्वयं के व्यय से प्राथमिक शाला रेंगाकठेरा के बच्चों को बौद्धिक विकास एवं डिजिटल पढ़ाई कराने के उद्देश्य से स्मार्ट टी.वी. उपलब्ध कराया है जिसके कारण बच्चों में पढ़ाई के प्रति ललक एवं रुचि बढ़ी है और विद्यार्थियों को भी ऑनलाईन शिक्षा के लिए बेहतर सुविधा उपलब्ध हो सकी है।
शिक्षक सईद कुरैशी के इस पहल को मोहला-मानपुर विधायक इन्द्रशाह मंडावी एवं स्थानीय समाज सेवी संजय जैन ने शिक्षकों के लिए अनुकरणीय पहल बताया है। सईद कुरैशी इंग्लिश विषय के शिक्षक है जो एससीईआरटी रायपुर के पुस्तक प्रकाशक टीम के सदस्य भी है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए एवं छात्रों के हित में समय-समय पर निजी खर्च के द्वारा नवाचार भी करते रहते है। जिसके कारण इन्हें इस वर्ष राज्यपाल शिक्षक सम्मान के लिए भी चयनित किया गया है।
विधायक मंडावी ने अपने उद्बोधन में कहा कि सभी स्कूलों में डिजिटल पढ़ाई को बढ़ावा देकर लीड कर रहे जिला शिक्षा अधिकारी श्री हेतराम सोम, डीएमसी भूपेश साहू, जिला मीडिया प्रभारी सतीश ब्यौहरे और एबीईओ मोहला राजेन्द्र कुमार देवांगन की प्रसंशा की। उन्होंने कहा कि मोहला-मानपुर विकासखंड के बच्चे पढ़ाई के क्षेत्र में अग्रणी है। विगत कुछ सालों से यहां के बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बेहतर परिणाम ला रहें हैं और भविष्य में भी शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करते रहेंगे क्योंकि हमारा क्षेत्र पूरी तरह से विकास के पथ पर अग्रसर है। वर्तमान में मोहला के कई स्कूल डिजिटल पढ़ाई की दिशा में कदम बढ़ा रहे है। शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षकों को प्रेरित करके समुदाय से सहयोग लेकर की जा रही इस नवाचारी पहल की प्रसंशा करते हुए संसदीय सचिव श्री इंद्रशाह मंडावी ने इसे अनुकरणीय बताया।
इस मौके पर सभी अतिथियों ने शिक्षकों को इस शुभ कार्य के लिए बधाई दी। स्मार्ट क्लास उद्घाटन समारोह में शिक्षाविद संजय जैन, श्रीमती नम्रता सिंह, श्रीमती कमला देवी पिस्दा, जनपद सदस्य श्रीमती सत्यभामा कलामे, शमा परवीन, प्राचार्य वी.पी. प्रजापति, राजेन्द्र कुमार देवांगन, एबीईओ विष्णु साहू, संकुल समन्वयक अमर सिंह ठाकुर, सुनील शर्मा, नंदकुमार साहू, श्रीमती प्रेमलता शर्मा, श्रीमती सुनीता वर्मा,आभिकेश वर्मा, दिनेश बघेल, युगल किशोर सिन्हा, वी.पी. भुवार्य एवं शाला विकास समिति के सभी सदस्यगण, पालकगण उपस्थित रहे।
खेल / शौर्यपथ / टीम इंडिया के स्टार क्रिकेटर और लिमिटेड ओवर फॉर्मैट में टीम के उप-कप्तान रोहित शर्मा को मौजूदा समय के बेस्ट बल्लेबाजों में गिना जाता है। सफेद गेंद क्रिकेट में वो बेस्ट सलामी बल्लेबाज कहे जाते हैं। रोहित जब पारी का आगाज करने जाते हैं, तो वो शुरुआत में थोड़ा धीरे खेलते हैं और कुछ नर्वस भी नजर आते हैं, लेकिन एक बार टिकने के बाद वो विरोधी गेंदबाजों की बैंड बजा डालते हैं। रोहित की पारी की शुरुआत को देखकर विरोधी गेंदबाजों को लगता है कि वो उन पर हावी हो सकते हैं। न्यूजीलैंड के तेज गेंदबाज लॉकी फर्गुसन ने रोहित की जमकर तारीफ की है। उन्होंने कहा कि अगर आप रोहित को आउट नहीं कर पाते हैं, तो यह बल्लेबाज मैच से आपको पूरी तरह से बाहर कर सकता है।
रोहित के पास तमाम शानदार शॉट्स हैं, और वो बहुत ही आसानी से छक्के भी जड़ते हैं। रोहित जितनी देर क्रीज पर टिकते जाते हैं, विरोधी टीमों को दिक्कतें भी उसके साथ ही बढ़ती रहती हैं। यही वजह है कि रोहित इकलौते ऐसे बल्लेबाज हैं, जिनके खाते में वनडे इंटरनैशनल में तीन डबल सेंचुरी दर्ज हैं। वनडे इंटरनैशनल का हाइएस्ट स्कोर भी रोहित (264) के नाम ही दर्ज है। 2014 में उन्होंने यह पारी श्रीलंका के खिलाफ खेली थी। इसके अलावा टी20 इंटरनैशनल में रोहित चार सेंचुरी जड़ चुके हैं और अभी तक कोई भी क्रिकेटर टी20 इंटरनैशनल में इतनी सेंचुरी नहीं जड़ सका है।
'स्मिथ, वॉर्नर और विराट को गेंदबाजी करना भी चैलेंजिंग'
स्पोर्ट्सकीड़ा पर जब फर्गुसन से पूछा गया कि किस बल्लेबाज को गेंदबाजी करना उन्हें सबसे मुश्किल लगता है, तो उन्होंने कहा, 'अच्छा सवाल है, ऐसे कुछ बल्लेबाज हैं। रोहित शर्मा मुझे बहुत चैलेंजिंग लगते हैं। अगर आप उन्हें जल्द आउट नहीं करते हैं, तो वो बड़ा स्कोर बना लेते हैं। वो आपकी गेंद की लेंथ को बहुत जल्दी पिक करते हैं और मेरी यही ताकत है। वो वर्ल्ड क्लास बल्लेबाज हैं।' इस लिस्ट में फर्गुसन ने ऑस्ट्रेलिया के स्टीव स्मिथ, डेविड वॉर्नर के अलावा टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली को भी शामिल किया।
'रोहित शर्मा असाधारण बल्लेबाज'
उन्होंने कहा, 'स्टीव स्मिथ, डेविड वॉर्नर, विराट कोहली- ये सभी वर्ल्ड क्लास बल्लेबाज किसी कारण से हैं। इनको गेंदबाजी करना हमेशा मुश्किल होता है। आपको अच्छा लगता है, जब आप टॉप-ऑर्डर के बल्लेबाजों को आउट कर लेते हैं और आपको मिडिल ऑर्डर और लोअर ऑर्डर के बल्लेबाजों को गेंदबाजी करने का मौका मिलता है।' उन्होंने कहा, 'मैं रोहित शर्मा का बड़ा फैन हूं, मुझे लगता है कि वो एक असाधारण बल्लेबाज हैं।'
मेरी कहानी / शौर्यपथ / मैं जब बहुत छोटा था, तब मुझे पता नहीं था कि ‘जाट’ किसको कहते हैं। उन्हीं दिनों मैं एक मैच खेलने रोहतक गया था। जैसे ही मुझे पता चला कि वहां जाट बहुत होते हैं, तो मैंने कोच सर से कहा कि मुझे जाट दिखाइएगा। कोच साहब हंसने लगे। मैं दिल्ली में रहता था, रोहतक एक दूसरे प्रदेश का हिस्सा था, इसलिए मैं जानता नहीं था। उससे पहले दिल्ली से बाहर ज्यादा गया भी नहीं था।
मेरे करियर में रणजी ट्रॉफी का एक मैच बहुत यादगार है। पहली पारी में मैं ‘जीरो’ पर आउट हो गया था। मैच के दौरान मुझे हाथ में बहुत ज्यादा चोट लग गई थी। हाथ की चमड़ी पूरी छिल गई थी। डॉक्टर ने कहा कि 15 दिन तक बल्ला भी नहीं पकड़ पाओगे। यह मैच वानखेड़े स्टेडियम में था। तब वानखेड़े स्टेडियम में ‘साइड’ में प्रैक्टिस विकेट हुआ करती थीं। वहां ‘स्लाइड’ मारी, तो हाथ बुरी तरह छिल गया। डॉक्टर ने कहा कि अगर बैट पकड़ोगे, तो ‘इन्फेक्शन’ का खतरा है। बावजूद इसके मैंने बल्लेबाजी की। हम दो सौ से ज्यादा के लक्ष्य का पीछा कर रहे थे। उस मैच में मैंने 120 रन नॉट आउट बनाए, वह भी एक हाथ से बल्लेबाजी करके। मैच उत्तर प्रदेश के खिलाफ था। पहली पारी में हमारे ऊपर 60 रनों की ‘लीड’ थी, तब भी हमने वह मैच जीता था। उस साल मैंने चार शतक लगाए थे। कप्तानी करते हुए पहले चार मैचों में ये लगातार चार शतक लगे थे।
इसके बाद 2003 में भारतीय टीम विश्व कप खेलकर लौटी थी। सौरव गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम ने फाइनल तक का सफर तय किया था, पर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को हरा दिया था। वहां से लौटने के बाद खिलाड़ियों को ‘ब्रेक’ चाहिए था। इसी समय भारतीय टीम को बांग्लादेश के खिलाफ सीरीज खेलनी थी। इसी सीरीज के लिए मुझे पहली बार भारतीय टीम के लिए चुना गया। मुझे ‘सेलेक्ट’ तो पहले ही होना चाहिए था। मैंने जिम्बॉब्वे के खिलाफ एक दिन में 200 रन बनाए थे। उस साल मैंने तीन ‘बैक टु बैक’ दो सौ किए थे। मैंने ये तीन दोहरे शतक रेलवे, साइड गेम में जिम्बॉब्वे के खिलाफ और फिर सीजन के पहले मैच में रेलवे के खिलाफ लगाए थे, फिर भी मेरे ‘सेलेक्शन’ में देरी हुई। मुझे लगातार लग रहा था कि अब मुझे मौका मिलना चाहिए, पर मौका मिल नहीं रहा था। मेरी बेचैनी और ‘नर्वसनेस’ बढ़ते जा रहे थे। मुझे लग रहा था कि बांग्लादेश के खिलाफ मौका मिल तो गया है, पर अगर सीरीज में रन नहीं बने, तो कहीं दोबारा सब कुछ फिर से तो शुरू नहीं करना पड़ेगा। कीर्ति आजाद सेलेक्टर थे। उन दिनों टीम में सेलेक्शन की जानकारी या तो फोन से मिलती थी या फिर टीवी चैनल से। मोबाइल का दौर इतना नहीं था। जब यह खबर आई, तो मेरी नानी मुझे मंदिर लेकर गई थीं। मेरी नानी वैसे भी मंदिर बहुत जाती थीं।
भारतीय टीम में चुने जाने का संतोष बहुत बड़ा था, क्योंकि मैंने बहुत रन बनाए थे। मैं काफी समय से टीम में चुने जाने का इंतजार कर रहा था। इंटरनेशनल टीम में चुने जाने से पहले मेरे 15 से ज्यादा फस्र्ट क्लास शतक थे। आजकल तो खिलाड़ी एक-दो शतक लगाते हैं और फिर आईपीएल के जरिए टीम में आ जाते हैं। मेरी औसत 55-56 रनों की थी, जब मुझे टीम इंडिया में चुना गया। इसके बाद अगले चार साल में मुझे लगभग 20-22 मैचों में ही मौका मिला। जिसमें मेरे दो शतक थे। टेस्ट टीम में भी मेरा ‘सेलेक्शन’ हो गया था। उसमें भी मैं शतक लगा चुका था। अब 2007 विश्व कप की टीम चुने जाने का वक्त था। 2007 विश्व कप में मेरे साथ बिल्कुल वही हुआ था, जो आज अंबाती रायडू के साथ हुआ है। मैं लगातार टीम के साथ था। मैच खेल रहा था। एक मैच में मेरी ‘परफॉरमेंस’ खराब थी और उसमें रॉबिन उथप्पा ने अच्छा प्रदर्शन किया था।
पहले मैं टीम से बाहर हुआ और फिर ‘स्क्वाड’ से भी बाहर हो गया। इसके बाद विश्व कप की टीम से भी बाहर हो गया। जब आप विश्व कप से एक सीरीज पहले टीम से बाहर हो जाएं, तो बहुत निराशा होती है। अगर आप एक साल पहले बाहर हो जाएं, तो हालात स्वीकार करने का समय मिल जाता है। आपको पता चल जाता है कि आप टीम की ‘स्कीम ऑफ थिंग्स’ में नहीं हैं, लेकिन अगर आप एक सीरीज पहले बाहर हों, तो बहुत बुरा लगता है। मेरे साथ यह भी था कि 2007 से पहले मैं कोई विश्व कप खेला नहीं था। अंडर-19 विश्व कप भी मैंने ‘मिस’ किया था, जिसमें युवराज सिंह, मोहम्मद कैफ खेलकर उभरे थे। उस समय जोनल वनडे हुआ करते थे। उसमें मैंने पांच मैच खेले थे। पांचों मैच में मेरे 50 रन थे। चार मैंचों में मैं नॉट आउट था। इसके बाद भी मुझे मौका नहीं मिला था। फिर 2007 की विश्व कप टीम में भी जब मुझे मौका नहीं मिला, तो बहुत निराशा हुई। इतनी ज्यादा कि मुझे लगा कि मैं क्रिकेट खेलना छोड़ ही दूंगा।
(जारी)गौतम गंभीर, पूर्व क्रिकेटर और सांसद
जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / तमिलनाडु के घने जंगलों में बसा है पुल्लूचेरी। हिन्दुस्तान के सुदूर इलाकों में बसे गांव-बस्ती की तरह पुल्लूचेरी तक पहुंचने से पहले ही तरक्की की सड़़क खत्म हो जाती थी। मदुरई से करीब 15 किलोमीटर दूर बसे इसी गांव की हैं चिन्ना पिल्लई। चिन्ना सिर्फ 12 साल की थीं, जब उनकी शादी कर दी गई और थोड़े दिनों बाद ही उन्हें अलागर कोविल गांव के खेतों में मजदूरी के लिए ले जाया गया। वहां के खेतों में काम करने वाले ज्यादातर श्रमिक आस-पास की बस्तियों से आते थे। इनमें चिन्ना का गांव भी शामिल था।
एक के बाद एक चिन्ना दो बेटे और तीन बेटियों की मां बन गईं, और उनकी जिंदगी बेबस खेतिहर मजदूरों की तरह जमींदारों और साहूकारों की उधारी व कर्ज तले दबती चली गई। चिन्ना और पति पेरुमल जी-तोड़ खेतों में मेहनत करते, मगर कर्ज कम होने का नाम ही न लेता। साहूकार बेबस मजदूरों से तीन सौ गुना सूद वसूलते थे, मगर कोई उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। खेत मालिक भी बहुत कम मजदूरी देते थे। चिन्ना को यह सब मंजूर न था। वह कहती हैं- ‘मैं अपने खेत मालिक से लगातार विनम्रता के साथ दोहराती रहती कि वह हम सबकी दिहाड़ी बढ़ा दें। कुछ इससे नाराज भी हो गए, मगर यह हमारा हक था और हम अपना हक ही तो मांग रहे थे।’
चिन्ना अपने जैसी महिला मजदूरों की टीम लीडर थीं, और उन सबकी स्थिति लगभग एक जैसी थी। क्योंकि वे सब असंगठित थीं, इसलिए वे खेत मालिकों पर कोई दबाव भी नहीं बना सकती थीं। चिन्ना ने इस नियति से मुठभेड़ का इरादा बांधा। उन्होंने 1990 में छोटी-छोटी बचत के जरिए अपने भविष्य को सुरक्षित करने की मुहिम शुरू की। इसके लिए उन्होंने अपने समूह की महिलाओं को सबसे पहले भरोसे में लिया। 15 महिलाओं ने 20 रुपये महीना बचाना शुरू किया। जो पैसे जमा होते, वे समूह की किसी जरूरतमंद महिला को कर्ज के रूप में दिए जाते और उस महिला को उस पर 60 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होता। साहूकारों के 300 प्रतिशत के मुकाबले यह छोटी ब्याज दर थी।
चंद महीनों में ही यह स्वयं सहायता समूह ‘कलंजियम’ लोगों में अपना भरोसा बढ़ाता गया और चिन्ना की कोशिशों ने आहिस्ता-आहिस्ता उनके समुदाय की महिलाओं को आत्मनिर्भर बना दिया। आलम यह था कि सदस्य न सिर्फ आपात स्थिति में कर्ज लेते, बल्कि छोटे-मोटे करोबार के लिए भी वे इसकी मदद लेने लगे। धन फाउंडेशन से जुड़ने के बाद इस स्वयं सहायता समूह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगभग तीन दशक पहले चिन्ना पिल्लई ने पुल्लूचेरी की गरीब औरतों को सशक्त बनाने का जो बीज बोया था, वह अब 13 राज्यों के 12 लाख परिवारों का विशाल वृक्ष बन गया है।
शुरू-शुरू में तो महिलाओं के पति इस मुहिम का विरोध करते थे, क्योंकि उन्हें यकीन नहीं हो पा रहा था, फिर इसकी बैठकों में भाग लेने के लिए कई बार वे खाना पकाने में देर कर देती थीं, इसलिए भी वे नाराज हो जाते, लेकिन फिर वे खुद उन्हें अपनी साइकिल पर बिठाकर लाने लगे। चिन्ना चाहती हैं कि महिलाएं इतनी सबल हों कि वे अपने परिवार और संतान का भविष्य संवार सकें। वह इसके लिए शिक्षा को बहुत अहम मानती हैं। उन्हें खुद तो पढ़ने-लिखने का मौका नहीं मिला, लेकिन उनकी दूरदर्शिता ने उनके बच्चों को तालीम से महरूम नहीं होने दिया। वह कहती हैं- ‘बदलाव का सबसे बड़ा औजार है शिक्षा। मैं चाहती हूं कि हमारी अगली पीढ़ी इतनी सुशिक्षित और सशक्त हो कि कोई उसके भरोसे का फायदा न उठा सके। मैं चाहती हूं कि देश के किसी भी गरीब को अपनी आर्थिक बदहाली के कारण गरिमामय जिंदगी जीने से वंचित न रहना पड़े।’
चिन्ना को एक-एक लाख रुपये के तीन पुरस्कार मिले। उन्होंने उनकी आधी रकम अपने पास रखी और आधी अपने आंदोलन को दान में दे दी। इनमें से एक पुरस्कार उन्हें जनवरी 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों मिला था। वह पुरस्कार था- स्त्री शक्ति पुरस्कार। उनकी ख्याति से ईष्र्यालु लोगों ने परेशान करने का मौका तब भी नहीं छोड़ा। वह याद करती हैं कि उन्हें यह सम्मान लेने दिल्ली जाना था, तो कहा गया कि आप विमान से जाएंगी, तो आपको दिल का दौरा पड़ जाएगा और मुझे टे्रन से ले जाया गया। लेकिन इस पुरस्कार समारोह में प्रधानमंत्री ने जो किया, उसने देश-दुनिया में चिन्ना को श्रद्धा के आसन पर बिठा दिया। दरअसल, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह कहते हुए चिन्ना के पैर छू लिए थे कि ‘मैं चिन्ना में शक्ति देखता हूं।’
चिन्ना की ख्याति ने उनके गांव और समुदाय को देश भर में नाम और सम्मान दिलाया है। उन्हें जानकी देवी बजाज पुरस्कार के अलावा तमिलनाडु सरकार के प्रतिष्ठित अवैयार अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। अभी हाल ही में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। सम्मान मिलने के बाद चिन्ना के अल्फाज थे- दुनिया में मशहूर तो मैं अटलजी के कारण ही हुई।
प्रस्तुति: चंद्रकांत सिंह
चिन्ना पिल्लई सामाजिक कार्यकर्ता
नजरिया / शौर्यपथ / जब भारत जनवरी 2021 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्य के रूप में शामिल हो जाएगा, तब वहां अनेक मसलों से रूबरू होगा। क्या संयुक्त राष्ट्र आने वाले दिनों में दुनिया के लोगों के लिए मानवीय सहायता और गलत काम करने वालों के विरुद्ध न्याय को बेहतर तरीके से सुनिश्चित कर पाएगा? सीरिया, यमन और अफगानिस्तान जैसे देशों में चल रहे संघर्ष के समाधान में क्या वह मदद कर सकेगा? अशांत जगहों से भाग रहे शरणार्थियों की रक्षा करेगा?
चीन, रूस या अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों में भी मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, लेकिन ऐसे देशों की आलोचना न करने की वजह से मानवाधिकार समूहों ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की बार-बार आलोचना की है। जवाब में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र व उसके सदस्य देशों से आग्रह किया कि वे अधिकारों की बढ़ती चुनौतियों पर अधिक ध्यान देने के मकसद से ‘कॉल टु एक्शन ऑन ह्यूमन राइट्स’ की पहल करें। अब दुनिया भर में उत्पीड़न का सामना करने वालों के अधिकारों के बचाव की दिशा में भारत से भी बड़ी उम्मीदें होंगी। भारत सरकार ने कहा है कि सुरक्षा परिषद में भारत तर्क व संयम की आवाज बुलंद करेगा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत दृढ़ विश्वास के साथ काम करेगा।
दुर्भाग्य से अन्य देशों में मानवाधिकारों के सम्मान को बढ़ावा देने के मामले में भारत का रिकॉर्ड खराब रहा है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत ने आमतौर पर देश-विशिष्ट प्रस्तावों पर ही अमल किया है। भारत रोहिंग्या मामले अर्थात म्यांमार में जातीय शोषण या फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते के ड्रग युद्ध जैसे मामलों में संयुक्त राष्ट्र की पहल का समर्थन करने में नाकाम रहा है। कुछ ही मौके आए हैं, जब भारत ने आवाज उठाई है। अतीत में देखें, तो भारत ने श्रीलंका में कथित युद्ध अपराधों की जवाबदेही की चर्चा की थी। हाल की बात करें, तो हांगकांग में अधिकारों की रक्षा के प्रति भारत ने चिंता का इजहार करते हुए कहा है कि इसे ‘ठीक से, गंभीरता से और निष्पक्ष रूप से देखा जाए’।
भारत दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में अपने सैनिक भेजकर महत्वपूर्ण योगदान करता रहा है और सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनने की इच्छा रखता है। संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान किसी संघर्ष के बाद स्थितियों की निगरानी, जांच और मानवाधिकार पर ध्यान केंद्रित रखते हैं। भारत को ऐसी कोशिशों का विस्तार करते हुए नेतृत्व और समर्थन का प्रदर्शन करना चाहिए। दुनिया में मानवाधिकार के पक्ष में खड़े होने के लिए अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड को भी देखना चाहिए। जहां भारत लंबे समय से ज्यादा स्वतंत्र समाज रहा है, वहीं चीन एकदलीय अधिनायकवादी राज्य है। हाल ही में भारत ने भी चीन जैसी पाबंदियों की कुछ नकल की है। जब सूचना, संचार, मनोरंजन, शिक्षा और व्यवसाय इत्यादि क्षेत्रों में इंटरनेट बुनियादी आजादी का हिस्सा हो गया है, तब भारत में कुछ पाबंदियां दिखी हैं।
अमेरिका में पुलिस द्वारा अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद जो आंदोलन हुआ, उसने दुनिया या भारत पर कोई खास असर नहीं डाला है। भारतीय पुलिस में भी ज्यादती का पुराना ढर्रा जारी है। हाशिये पर पड़े वंचितों के संरक्षण की जरूरत पर अधिकारी चुप रहते हैं। उधर, अमेरिका में पुलिस ने न सिर्फ अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया है, बल्कि प्रदर्शनकारियों की रक्षा में नाकाम रही है। कुछ मामलों में तो पुलिस खुद हमलों में शामिल दिखी है।
आज भारत निर्णायक मोड़ पर है। जब भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शामिल हो जाएगा, तब उसके पास दो विकल्प होंगे, या तो वह मानवाधिकार का सम्मान करने वाले देशों के पक्ष में खड़ा हो जाए या फिर चीन, रूस, ब्राजील जैसे देशों के साथ तालमेल बनाकर चलता रहे। ये देश अक्सर मानवाधिकार के मामले में वैश्विक नियम आधारित कानूनी प्रणाली को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश करते हैं। दुनिया में आक्रामक होता चीन, कोरोना की वजह से सेहत व आजीविका पर दोहरे संकट की पृष्ठभूमि में साल 2021 का आगाज भारत के लिए अहम मौका होगा। देखना है, देश मानवाधिकारों के समर्थकों के साथ खड़ा होता है या मानवाधिकारों को कमजोर करने वालों के साथ?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) मीनाक्षी गांगुली,दक्षिण एशिया निदेशक, ह्यूमन राइट्स वाच
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारत में राफेल जैसे लड़ाकू विमान का लंबे समय से चल रहा इंतजार खत्म हो गया। पांच विमानों की पहली खेप के भारत पहुंचते ही हमारी ताकत में जो इजाफा हुआ है, उससे निश्चित ही हमारी सेनाओं के मनोबल में वृद्धि हुई होगी। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हम रक्षा सौदों में दो दशक से ज्यादा ढिलाई की वजह से कोई भी लड़ाकू विमान खरीद नहीं पा रहे थे।
जब 2016 में फ्रांस के साथ 36 राफेल के लिए सौदा हुआ, तब हमें भूलना नहीं चाहिए कि उसे लेकर किस तरह के विवाद हुए थे। राजनीतिक क्षेत्र में किस तरह से चर्चाएं हुई थीं। बहुत अप्रिय ढंग से आरोप-प्रत्यारोप लगे थे। संभव है, राजनीतिक विवाद न होते और रक्षा सौदों के प्रति हमारे प्रतिष्ठानों में पूरी निष्ठा व त्वरा होती, तो भारत को नए विमानों के लिए इतना लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता।
पिछली सदी में सुखोई विमान खरीदे गए थे, अब 23 साल बाद राफेल मिला है, तो भारत में इसके मानसिक-सामरिक महत्व को समझा जा सकता है। अव्वल तो भारतीय गगन में एक असुरक्षा का भाव आने लगा था, पुराने पड़ चुके मिग विमानों की दुखद स्थिति आए दिन रुलाने लगी थी। ऐसे विमानों को उड़ाने की जरूरत पड़ रही थी कि जिन्हें उड़ते ताबूत तक कह दिया जाता था। बेशक, अब राफेल के आने के बाद हम अपनी वायुसेना के और उज्ज्वल भविष्य की ओर देख सकेंगे। सुखोई-30 जैसे विमान अभी भी सेवारत हैं, लेकिन सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें राफेल या उससे भी विकसित 200 से ज्यादा विमानों की जरूरत है। और अभी तो पांच विमानों के साथ शुरुआत हुई है, अगले साल तक जब सभी 36 राफेल भारत आ जाएंगे, तो जाहिर है, देशवासियों को ज्यादा सुरक्षा का एहसास कराएंगे। राफेल का आना बड़ी खुशखबरी है, लेकिन हमें अपना पारंपरिक संयम भी नहीं खोना चाहिए। भारत ने हथियार या विमान कभी भी किसी पर हमले के लिए नहीं खरीदे हैं, हमारी एक-एक रक्षा खरीद अपने बचाव के लिए है। हमें किसी अन्य देश की जमीन नहीं चाहिए, हमें किसी पर हमला नहीं करना है, हमें केवल अपना बचाव करना है। हां, जो हमसे दुश्मनी पालना चाहते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि भारत ईंट का जवाब पत्थर से दे सकता है। साथ ही, इस रक्षा उपलब्धि के पक्ष या विपक्ष में किसी तरह की सियासत से बचना चाहिए।
राफेल का आना हमारे लिए एक प्रेरणा भी है कि हम आगे के लिए और तैयार रहें। संसाधनों से भरे भारत में अब उस दौर का आगाज हो जाना चाहिए, जब हमें किसी भी देश से कोई रक्षा उपकरण खरीदने की जरूरत नहीं पड़े। अभी भारत स्वयं अगर बहुत सक्षम नहीं है, तो उसे दूसरे विकसित सहयोगी देशों के साथ मिलकर अपनी ही सीमा में रक्षा निर्माण उद्यम लगाना चाहिए। यह प्रयास शुरुआत में बहुत महंगा भले लगे, लेकिन दूरगामी रूप से भारत को इससे व्यापक मजबूती मिलेगी।
रक्षा के मोर्चे पर कोई भी तैयारी जयघोष के साथ हो, यह जरूरी नहीं। ऐसी तैयारियों को चुपचाप अंजाम देकर परिणाम देश के सामने रख देना चाहिए। राफेल या सुखोई जैसे विमानों के नए संस्करणों पर भारत को काम करना चाहिए। हमें पुराने साथी देशों जैसे रूस को भी साथ रखना होगा। राफेल की रोशनी में उन तमाम रक्षा खरीद और निर्माण योजनाओं में तेजी आनी चाहिए, जिनसे अपना देश और मजबूत होगा।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / कोरोना वायरस धीरे-धीरे पूरे देश में अपने पैर पसार चुका है। इससे राष्ट्र एकजुट होकर जरूर लड़ रहा है, लेकिन कई दूसरी समस्याएं भी अब पैदा होने लगी हैं। ऐसी ही एक समस्या है, घरेलू हिंसा। हालांकि, जब हम घरेलू हिंसा की बात करते हैं, तो हमारे सामने असहाय महिलाओं का दृश्य कौंध जाता है। लेकिन आज तस्वीर कुछ अलग है। इससे आज घर-परिवार के छोटे-बड़े सभी लोग प्रभावित हैं। अब इसके दायरे में बड़े-बुजुर्ग भी आ गए हैं। लंबे समय तक चले लॉकडाउन में घरेलू हिंसा के मामलों में चौंकाने वाली बढ़ोतरी हुई है। इसकी एक वजह बढ़ता मानसिक तनाव है, जिसके कारण घर में क्लेश बढ़ गया है। घरेलू हिंसा सदा से ही समाज के लिए अभिशाप रही है, लेकिन कोरोना काल में इसमें वृद्धि शर्मनाक है। इससे पार पाने के उपाय गंभीरता से किए जाने चाहिए।
विकास सिंह बघेल , दिल्ली
याद आएंगे वे दिन
एनालॉग यानी एंटीना की सहायता से दूरदर्शन देखना अब संभव नहीं रहा। वर्षों से इसी तरह प्रसारित हो रहा दूरदर्शन का मुख्य चैनल अब अचानक बंद कर दिया गया है। इससे एक स्वर्णिम पल इतिहास बन गया। चूंकि अधिकतर लोगों के पास डिश होने की वजह से एंटीना का कम इस्तेमाल हो रहा था, इसलिए यह कदम उठाया गया है, लेकिन दूर-दराज और पहाड़ी इलाकों में अब भी साधारण एंटीना मुख्य विकल्प है। ऐसे में, एनालॉग सर्विस बंद करने की बजाय कुछ और उपाय निकाले जाने चाहिए थे। संभव हो, तो यह सेवा फिर से शुरू की जाए, ताकि एंटीना से भी लोग दूरदर्शन को देख सकें। दूरदर्शन की ताकत ही यही है कि इसकी पहुंच देश के हर घर में है, इसीलिए इसे सिर्फ डिश के माध्यम से प्रसारित किए जाने से न सिर्फ इसकी पहुंच कम होगी, बल्कि जनता की यह आवाज भी कमजोर पड़ जाएगी।
विवेक भारद्वाज, विष्णु धाम, सहारनपुर
रक्षा-सूत्र का बंधन
राखी का त्योहार नजदीक है। यह पावन पर्व भाई और बहन के आपसी अटूट प्रेम को दर्शाता है, लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में यह त्योहार भी अपनी सार्थकता खोता दिख रहा है। दूसरे त्योहारों की तरह राखी में भी अब दिखावा ज्यादा होने लगा है। रक्षा-सूत्र का बंधन सिर्फ एक धागा नहीं, बल्कि भाई और बहन के अटूट स्नेह व विश्वास का भरोसेमंद बंधन है, जो आज के दौर में कई बार औपचारिकता का निबाह भर लगता है। दिक्कत यह है कि हमारा आपसी प्रेम-व्यवहार सिर्फ मोबाइल और ऑनलाइन संदेशों तक सीमित होता जा रहा है। एक शहर में रहकर भी हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि मिलने का वक्त भी कथित तौर पर नहीं निकाल पाते। इस बार हमें इस सोच से पार पाना चाहिए। आपसी स्नेह जागृत करते हुए हम रिश्तों में गुम हो चुकी मिठास को फिर से पा सकते हैं। इससे इस पावन पर्व की सार्थकता भी बनी रहेगी और रक्षा-सूत्र का मान भी बढ़ेगा।
माधुरी शुक्ला
सारनाथ, वाराणसी
एप पर प्रतिबंध
विश्व के सभी देशों को समझ लेना चाहिए कि भारत जितना नरम और शांतिप्रिय देश है, उतना ही सख्त भी है। चीन के अति-आत्मविश्वास को चूर-चूर करने के लिए हमारी सरकार ने एक और सराहनीय कदम उठाया है। जून माह में चीन के 59 एप पर पाबंदी लगाई गई थी और अब देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिहाज से उसके 47 अन्य एप पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इन एप को प्रतिबंधित करके सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ की उड़ान को और ऊंचाई दी है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रतिबंध से भारतीय एप और नवाचार कंपनियों के लिए नए-नए मार्ग खुलेंगे, जिससे उन्हें वैश्विक स्तर पर अधिक से अधिक अपना कौशल दिखाने और कारोबार बढ़ाने का मौका मिलेगा।
अमन जायसवाल, दिल्ली
ओपिनियन / शौर्यपथ / अभी जनवरी में ही हुआवेई को दूरसंचार क्षेत्र में सीमित कामकाज की अनुमति दी गई थी, लेकिन अपने इस फैसले को अचानक से पलटते हुए ब्रिटेन ने चीन की इस कंपनी पर अब प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। पाबंदी के तहत इस साल के अंत, यानी 31 दिसंबर से ब्रिटेन की मोबाइल-प्रदाता कंपनियां हुआवेई कंपनी से 5जी उपकरण नहीं खरीद सकेंगी, साथ ही ब्रिटिश दूरसंचार ऑपरेटर भी अपने यहां लगे सभी हुआवेई किट 2027 तक हटा लेंगे। ब्रिटेन के डिजिटल और संस्कृति मंत्री ओलिवर डाउडेन ने मई में अमेरिका द्वारा कंपनी पर लगाए गए प्रतिबंध को इसकी वजह बताया है। उनका कहना है कि चूंकि अमेरिकी पाबंदी से हुआवेई की आपूर्ति शृंखला को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है, इसलिए ब्रिटेन अब यह उम्मीद नहीं कर सकता कि कंपनी आने वाले दिनों में अपने 5जी उपकरणों की सुरक्षा की गारंटी दे सकेगी।
ब्रिटेन के इस फैसले का अमेरिका ने तत्काल स्वागत किया है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने ब्रिटेन की सराहना करते हुए समान सोच रखने वाले अन्य देशों से भी बीजिंग के खिलाफ कार्रवाई करने का आह्वान किया है। दूसरी तरफ, बीजिंग ने ब्रिटेन के इस ‘आधारहीन प्रतिबंध’ का ‘कड़ा विरोध’ किया है और चेतावनी दी है कि अपनी कंपनियों के ‘जायज हितों की रक्षा के लिए चीन तमाम कदम’ उठाएगा, क्योंकि ‘किसी भी फैसले या कार्रवाई की कीमत जरूर चुकानी पड़ती है’। देखा जाए, तो ब्रिटेन की सरकार अपने फैसले की कीमत साफ-साफ समझ भी रही है, क्योंकि इस पाबंदी के बाद वहां 5जी के विस्तार में अब वक्त लगेगा। इस फैसले से उसे रणनीतिक नुकसान भी होगा, क्योंकि उससे चीन का साथ छूट सकता है। यह सब ऐसे वक्त में होगा, जब ब्रेग्जिट-बाद के दौर में अपने कारोबारी रिश्तों को बढ़ाने के लिए ब्रिटेन दुनिया की तमाम बड़ी ताकतों से रिश्ते मजबूत करना चाह रहा है।
बहरहाल, ट्रंप प्रशासन द्वारा मई में हुआवेई पर नई पाबंदी लगाने के बाद से उसके सेमीकंडक्टर की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसके कारण ब्रिटेन में उसकी लागत बढ़ गई है। फिर, बोरिस जॉनसन सरकार को सुरक्षा समीक्षा के एक नए दौर के लिए भी जाना जाता है, जिसकी झलक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के फैसले में दिखी और पाबंदी का यह कदम उठाया गया। ब्रिटेन-अमेरिका संबंध भी इस फैसले की एक वजह है, क्योंकि जनवरी में जब हुआवेई को ब्रिटेन में कारोबार की अनुमति दी गई थी, तब ट्रंप प्रशासन ने यह साफ कर दिया था कि लंदन के साथ वाशिंगटन के ‘विशेष रिश्ते’ की समीक्षा की जाएगी। इससे न सिर्फ दोनों देशों के बीच सुरक्षा और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान की डोर प्रभावित होती, बल्कि अमेरिका-ब्रिटेन में व्यापार समझौते को लेकर जारी बातचीत पर भी प्रतिकूल असर पड़ता। जाहिर है, ब्रिटेन का नया रुख ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत है, क्योंकि अमेरिका-चीन विवाद पर तटस्थ रुख अपनाने वाले अन्य देशों को भी इसी तरह से मनाया जा सकता है।
पिछले दो दशकों से ब्रिटेन में कारोबार कर रही हुआवेई के लिए यकीनन यह एक मुश्किल घड़ी है। इससे यूरोप में उसका कारोबार प्रभावित हो सकता है, जहां कुल वैश्विक बिक्री का करीब एक चौथाई उत्पाद वह बेचती है। फ्रांस ने भी सीमित अवधि के लिए लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था करके हुआवेई-5जी उपकरणों के इस्तेमाल को सीमित करने का फैसला किया है। इसे भी कंपनी पर एक वास्तविक प्रतिबंध के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि फ्रांस सरकार ने इसे सीधे-सीधे नहीं कुबूला है। जर्मनी भी हुआवेई पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, क्योंकि पूरे यूरोप में चीन के खिलाफ नकारात्मक माहौल बन गया है। वर्षों तक बीजिंग की जी-हुजूरी करने वाला यूरोपीय संघ भी अब उसके खिलाफ मुखर है। उसकी नाराजगी की वजह कोविड-19 के खिलाफ शुरुआत में बीजिंग द्वारा ढीला रवैया अपनाने से लेकर हांगकांग में नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को लेकर यूरोप में चलाया गया भ्रामक अभियान है। अब चीन को एक ‘सार्वभौमिक दुश्मन’ के रूप में देखा जा रहा है, जो तमाम समझौतों, नियमों और संस्थानों के साथ-साथ मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने पर आमादा है।
साफ है, जो लड़ाई अब तक वाशिंगटन अकेले लड़ता हुआ दिख रहा था, उसमें कई दूसरे राष्ट्र भी शामिल हो गए हैं। इससे युद्ध का मैदान पूरी तरह से बदल गया है। भारत की प्रतिक्रिया पर भी खूब नजर है। पिछले साल नई दिल्ली ने हुआवेई को 5जी ट्रायल में भाग लेने की अनुमति दी थी, जो कोविड-19 संक्रमण की वजह से संभव नहीं हो सका। मगर अब सीमा-विवाद और नई दिल्ली की चिंताओं के प्रति बीजिंग की बेरुखी के कारण भारत-चीन द्विपक्षीय रिश्तों का ताना-बाना पूरी तरह से बदल गया है। नई दिल्ली का सख्त रुख कायम है और संभावना यही है कि हुआवेई को शायद ही भारत में 5जी नेटवर्क लागू करने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। नई दिल्ली यह संकेत दे रही है कि महत्वपूर्ण निर्माण-परियोजनाओं में चीनी कंपनियों की भागीदारी को सीमित करने या रोकने का मतलब यदि आर्थिक और तकनीकी नुकसान है, तब भी भारत यह कीमत चुकाने को तैयार है। मगर बीजिंग पर भी इसका खूब असर होगा, क्योंकि वह एक ऐसे बाजार से हाथ धो लेगा, जहां आने वाले वर्षों में चीन के बाद सबसे अधिक 5जी उपभोक्ता होंगे। यूरोपीय बाजार से बाहर होने के बाद यह हुआवेई के लिए एक विनाशकारी झटका हो सकता है।
साफ है, हुआवेई पर पाबंदी महज एक तकनीकी या आर्थिक मसला नहीं है, बल्कि कई देशों के लिए यह एक राजनीतिक फैसला है। कारोबारी और प्रौद्योगिकी रिश्ते को हथियार बनाने का चीन का फैसला ही अब उसके खिलाफ जाता दिख रहा है। कई मुल्क अब जैसे को तैसा की रणनीति आजमाने लगे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) हर्ष वी पंत, प्रोफेसर, किंग्स कॉलेज, लंदन,नई दिल्ली
मुख्यमंत्री ने सपरिवार कौशल्या माता मंदिर में पूजा अर्चना कर प्रदेश की सुख समृद्धि की कामना की , छत्तीसगढ़ सरकार ने राम वन गमन पर्यटन परिपथ में प्रस्तावित 09 स्थलों के विकास के लिए बनाया है 137.45 करोड़ का कान्सेप्ट प्लान ,चंदखुरी मंदिर के सामने बायपास सड़क की स्वीकृति: राष्ट्रीयकृत बैंक की शाखा भी खुलेगी , पर्यटकों की सुविधा के लिए स्थलों में पेयजल, शौचालय, विद्युतीकरण, रेस्टोरेंट, पहुंच मार्ग बनाये जाएंगे , मुख्यमंत्री ने मंदिर परिसर में लगाया बेल का पौधा
रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ में राजधानी रायपुर के समीप माता कौशल्या की जन्मभूमि चंदखुरी में शीघ्र ही भव्य मंदिर का निर्माण शुरू हो जाएगा। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आज धर्मपत्नी श्रीमती मुक्तेश्वरी बघेल और परिवार के सदस्यों के साथ चंदखुरी पहुंचकर वहां स्थित माता कौशल्या के प्राचीन मंदिर में पूजा-अर्चना की और प्रदेश की खुशहाली और समृद्धि की कामना की। उन्होंने मंदिर के सौन्दर्यीकरण और परिसर के विकास के लिए तैयार परियोजना की विस्तृत जानकारी ली। मुख्यमंत्री ने कहा कि मंदिर के सौन्दर्यीकरण के दौरान मंदिर के मूलस्वरूप को यथावत रखते हुए यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए।

उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ सरकार राम वन गमन पथ पर पडऩे वाले महत्वपूर्ण स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रही है। इसकी शुरूआत चंदखुरी स्थित माता कौशल्या के मंदिर के सौंदर्यीकरण कार्य के बीते 22 दिसम्बर को भूमि-पूजन के साथ कर दी गई है। भव्य मंदिर की निर्माण की कार्ययोजना में परिसर में विद्युतीकरण, तालाब का सौंदर्यीकरण, घाट निर्माण, पार्किंग, परिक्रमा पथ का विकास आदि कार्य शामिल किए गए हैं।
मुख्यमंत्री बघेल ने कहा है कि छत्तीसगढ़ भगवान राम का ननिहाल है। यहां कण-कण में भगवान राम बसे हुए है। भगवान राम ने वनवास का बहुत सा समय यहां व्यतीत किए हैं। छत्तीसगढ़ सरकार भगवान राम के वन गमन मार्ग को पर्यटन परिपथ के रूप में विकसित कर रही है ताकि इन स्थलों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिल सके। श्री बघेल ने कहा कि चंदखुरी में 15 करोड़ की लागत से सौन्दर्यीकरण का कार्य कराया जाएगा। उन्होंने इस अवसर पर यहां तालाब के बीच से होकर गुजरने वाले पुल की मजबूती के साथ ही यहां परिक्रमा पथ, सर्वसुविधायुक्त धर्मशाला और शौचालय बनाने कहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सौन्दर्यीकरण कार्य का भूमिपूजन हो गया है यहां अगस्त के तीसरे सप्ताह से निर्माण कार्य प्रारंभ हो जाएगा।

मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर ग्रामीणों की मांग पर मंदिर के पास से बायपास सड़क की स्वीकृति प्रदान करते हुए आवश्यक कार्यवाही के निर्देश दिए। वहीं ग्राम वासियों की सहुलियत को देखते हुए चंदखुरी में राष्ट्रीयकृत बैंक की शाखा खोलने के निर्देश जिला अधिकारियों को दिए है। श्री बघेल ने इस अवसर पर मंदिर परिसर पर बेल और उनकी धर्मपत्नी ने महुआ का पौधा भी रोपा। इसके साथ ही परिसर में आवंला, पीपल, अमरूद और करंज आदि के पौधे भी लगाए गए। मुख्यमंत्री ने इन रौपे गए पौधों पर सेरीखेड़ी महिला समूह द्वारा बांस से बनाए जा रहे ट्री-गार्डो का लगवाया। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर ग्रामीणजनों से गौठान और गोधन न्याय योजना सहित गांव में उपलब्ध अन्य सुविधाओं की चर्चा की। इस अवसर पर नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ. शिव कुमार डहरिया, जनपद पंचायत आरंग के अध्यक्ष खिलेश देवांगन, ग्राम पंचायत चंदखुरी की सरपंच श्रीमती मालती धीवर और कौशल्या माता समिति के अध्यक्ष देवेन्द्र वर्मा और ग्रामीणजन उपस्थित थे।
अहिवारा / शौर्यपथ / अहिवारा नगर पालिका चुनाव के समय में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के चुनाव मेेंं क्रॉस वोटिंग करने का आरोप लगा था और जांच में सही पाया गया। नगर कांग्रेस कमेटी अहिवारा के अध्यक्ष अनिल श्रीवास्तव ने छत्तीसगढ़ शासन के कैबिनेट मंत्री जगतगुरु गुरु रूद्रकुमार को चुनाव के बाद क्षेत्र में अध्यक्ष न बनने और उपाध्यक्ष न बनने पर समीक्षा की और जिन्होंने अंजाम दिया कैबिनेट मंत्री जगतगुरु रूद्र कुमार के द्वारा नगर कांग्रेस कमेटी अहिवारा के अध्यक्ष अनिल श्रीवास्तव ने अपने लेटर पैड में 3 पार्षदों के नाम लिखे गए वार्ड नंबर 8 हेमंत साहू, वार्ड नंबर 9 दुलारी भुवन साहू, वार्ड नंबर 10 स्टालिन समुएल इन सभी को निष्कासित करने के लिए मंत्री के समक्ष दस्तावेज पेश किए गए थे। उन्ही के अनुशंसा में जिला अध्यक्ष दुर्ग ग्रामीण निर्मल कोसरे के निर्देशानुसार वार्ड नंबर 10 पार्षद स्टालिन समुएल को निष्कासित पार्टी से 6 साल के लिए कर दिया गया है। आपको जानकारी हो 26 तारीख को स्टालिन जुआ के हाई प्रोफाइल में पकड़ा गए थे। यह जुआ और सट्टा कई सालों से संचालित करने में सम्मिलित थे। पकड़ आने के बाद इसमें आरोपित होने से कांग्रेस पार्टी की छवि धूमिल हुई। इस अनुशासनहीनता को देखते हुए जिला अध्यक्ष निर्मल कोसरे ने तत्परता दिखाते हुए आज इन्हें पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिए।
सेहत / शौर्यपथ / डायबिटीज के मरीजों के लिए एक अच्छी खबर आई है। शोधकर्ताओं ने डायबिटीज को मात देने के लिए एक नई चिकित्सीय रणनीति विकसित की है। इससे न सिर्फ मरीजों में डायबिटीज को नियंत्रित किया जा सकेगा बल्कि उसे पनपने से भी रोका जा सकेगा।
शोधकर्ताओं ने कहा, अग्नाशय की कोशिकाओं में विटामिन डी रिसेप्टर (वीडीआर) का स्तर संतुलित बनाए रखकर डायबिटीज को विकसित होने से रोका जा सकता है। साथ ही इस रोग के विकास के कारण होने वाली अग्नाशय कोशिकाओं की क्षति को भी रोका जा सकता है। बता दें कि अग्नाशय की कोशिकाएं इंसुलिन को संश्लेषित और स्रावित करती हैं।
यह अध्ययन ऑटोनोमा डी बार्सिलोना यूनिवर्सिटी में साइबर्स एरिया ऑफ डायबिटीज एंड एसोसिएटेड मेटाबॉलिक डिजीज के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। शोधकर्ताओं ने कहा, विटामिन डी की कमी से दोनों प्रकार के टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज के पनपने का अधिक खतरा रहता है। विटामिन डी रिसेप्टर जीन में बदलाव होने से इस बीमारी का मजबूत संबंध है। हालांकि, डायबिटीज के विकास में इस विटामिन रिसेप्टर की विशिष्ट भागीदारी का कारण अब तक पता नहीं चला है।
चूहों पर किया अध्ययन
यह नया अध्ययन चूहों पर किया गया। इसमें उनके व्यवहार का विश्लेषण करके डायबिटीज के विकास में अग्नाशय कोशिकाओं की वीडीआर द्वारा निभाई गई भूमिका को समझने का प्रयास किया गया। शोधकर्ताओं ने टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज से ग्रस्त चूहों के अग्नाशय में कम वीडीआर देखा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी देखा कि डायबिटीज ग्रस्त चूहों की बी कोशिकाओं में वीडीआर का स्तर बढ़ाने से इस बीमारी की रोकथाम हुई।
शोधकर्ताओं ने कहा कि वीडीआर के सही स्तर डायबिटीज के खतरे को कम कर सकता है। शोधकर्ता एलबा कैसलस ने कहा, इन परिणामों से पता चलता है कि डायबिटीज को विकसित होने से रोकने और बी कोशिकाओं को क्षति से बचाने के लिए वीडीआर के स्तर को संतुलित बनाए रखना आवश्यक हो सकता है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
