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धर्म संसार / शौर्यपथ / शिव के प्रिय मास श्रावण में चारों ओर धर्म का पवित्र वातावरण बन जाता है। इस माह का लाभ सभी को उठाना चाहिए। इस माह में जपे गए मंत्र सिद्ध और असरकारी होते हैं। शिव को प्रसन्न करते हैं।
इस माह में सर्वव्याधि नाश, बुद्धि, व ज्ञानवृद्धि, ऐश्वर्य प्राप्ति, सुख-सौभाग्य आदि के लिए भगवान शिव की पूजा करके दुग्ध की धारा से अभिषेक करते हुए निम्न मंत्रों का जाप करना चाहिए। आइए जानिए श्रावण मास के कुछ खास विशेष मंत्र-
श्रावण मास विशेष : 10 शिव मंत्र
1. ॐ जुं स:।
2. ॐ हौं जूं स:।
3. ॐ त्र्यंम्बकम् यजामहे, सुगन्धिपुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।'
4. 'ॐ ऐं नम: शिवाय।
5. 'ॐ ह्रीं नम: शिवाय।'
6. 'ऐं ह्रीं श्रीं 'ॐ नम: शिवाय' : श्रीं ह्रीं ऐं
7. चंद्र बीज मंत्र- 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्रमसे नम:', चंद्र मूल मंत्र 'ॐ चं चंद्रमसे नम:'।
8. शिव गायत्री मंत्र- ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्र प्रचोदयात्।।
9. ॐ नमः शिवाय
10. ॐ ऐं ह्रीं शिव गौरीमय ह्रीं ऐं ऊं।
श्रावण मास में सिर्फ 'दारिद्रयदहन शिवस्तोत्रम्' पढ़ने से बेशुमार धन संपदा मिलने के योग बनते हैं।
दारिद्रयदहन शिवस्तोत्रम् :
विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय
कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय।
कर्पूरकांतिधवलाय जटाधराय
दारिद्रयदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥1॥
गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय
कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय।
गङ्गाधराय गजराजविमर्दनाय ॥दारिद्रय. ॥2॥
भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय
उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय ॥ दारिद्रय. ॥3॥
चर्माम्बराय शवभस्मविलेपनाय
भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय।
मञ्जीरपादयुगलाय जटाधराय ॥ दारिद्रय. ॥4॥
पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय
हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय।
आनंतभूमिवरदाय तमोमयाय ॥दारिद्रय. ॥5॥
भानुप्रियाय भवसागरतारणाय
कालान्तकाय कमलासनपूजिताय।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय ॥दारिद्रय. ॥6॥
रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय
नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय।
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय ॥ दारिद्रय. ॥7॥
मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय
गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय।
मातङग्चर्मवसनाय महेश्वराय ॥ दारिद्रय. ॥8॥
वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणम्।
सर्वसम्पत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम्।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥9॥
उपरोक्त मंत्रों का जाप कम से कम 108 बार अवश्य करें। साथ इन मंत्रों के जाप और इस स्तोत्र का पाठ करने से आप सुख, सौभाग्य और ऐश्वर्य सभी कुछ पा सकते हैं।
मेरी कहानी / शौर्यपथ / वह स्याह दौर ऐसा था, जब घोड़े भी गुलामों से ज्यादा खुश नजर आते थे। घोडे़ कभी-कभी ही काम में लगते थे, खूब खाते थे, गुलामों के हाथों नहाने-सहलाने की सेवा पाते थे, पर गुलामों के लिए क्या दिन-क्या रात? लगे रहो मशीन की तरह। ऊपर से मालिक की नजर टेढ़ी हो जाए, तो खैर नहीं। उस दिन अस्तबल में 16 साल का गुलाम डगलस अपने मालिक के घोड़ों की सेवा में लगा था। पीछे से उसका श्वेत मालिक दबे पांव दाखिल हुआ। हाथों में रस्सी लिए आते ही डगलस का एक पैर पकड़ लिया। डगलस चौंका, अगले ही पल समझ गया कि मालिक उसे बांधने वाला है, फिर पीटेगा और हो सकता है, जान ही ले ले।
लड़के का अपराध था कि उसने अपने मूल मालिक से जाकर अत्याचार की शिकायत की थी। हालांकि वहां भी सुनवाई नहीं हुई थी। सब जानते थे कि कोवे नाम का यह खेत मालिक अश्वेतों का मनोबल तोड़ने के लिए कुख्यात है। गुलामों के शौकीन घटिया लोग कहते थे, जब किसी गुलाम के पर निकलने लगें, तो उसे कोवे के हवाले कर दो। कोवे की बड़ी दहशत थी। पिछली बार मालिक ने बीमार होने के बावजूद पैरों से ठोकर मार-मारकर अधमरा कर दिया था। जब पांच घंटे तक घिसटते हुए डगलस अपने मूल मालिक के पास पहुंचा, तो सिर से पैर तक सूखे, ताजा खून से सना हुआ था। फिर भी मूल मालिक ने कोवे को बढ़िया इंसान बताकर बचाव किया। वह हैवानियत का ऐसा दौर था, जब ज्यादातर श्वेत आपस में मिले होते थे। अश्वेतों के विलाप पर कान न देना उनकी आदत में शुमार था।
जाहिर है, डगलस को लौटना पड़ा और आते ही पैरों में रस्सी बांधकर जानवरों से भी बुरे बर्ताव की तैयारी नुमाया हो गई। उसने तत्काल कूदकर पैर को छुड़ाया। न जाने कहां से ताकत उमड़ आई कि नहीं, अब अपने को बचाना है, अब मार खाए, तो मर ही जाएंगे। डगलस अपनी चुस्त कद-काठी के साथ तनकर खड़ा हो गया, कोवे घूरकर झपटा, लेकिन उसके गिरेबां पर दो मजबूत हाथ आ लगे। कोवे चिल्लाया, ‘तो तुमने तय कर लिया है, तुम लड़ना चाहते हो?’ उसे उम्मीद थी कि डगलस इतना सुनते ही गिरेबां छोड़ देगा, पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाएगा। लेकिन इस बार वक्त एक नई कहानी लिख रहा था।
दर्द से भरे डगलस ने कोवे के गिरेबां को और कसते हुए अपनी मंशा का इजहार कर दिया। कोवे के बुलाने पर एक आदमी दौड़ा-दौड़ा आया, उसने डगलस को जैसे ही पीछे से पकड़ा, छाती के ठीक नीचे पसलियों पर कोहनी का जोरदार वार पड़ा। चोट खाने वाला अपना दर्द थामे जमीन पर गोल हो गया। अब तो कोवे की हालत और बिगड़ी। एक और गुलाम दौड़कर आया, लेकिन यह कहते हुए मदद करने से मुकर गया कि वह यहां काम करने के लिए भेजा गया है, लड़ाई में भाग लेने के लिए नहीं। अब अस्तबल में रह गए कोवे और डगलस। गुत्थमगुत्था। कोवे सोच रहा था कि यह 16 साल का लड़का ही तो है, शुरुआती ताकत दिखा रहा है, पकड़ ढीली पड़ते ही इसे रगड़ दूंगा। यह बात डगलस भी जानता था कि कोवे को मौका नहीं देना है। एक भी मौका दिया, तो शामत टूट पड़ेगी। अब जब पकड़ ही लिया है, तो जोर आजमाइश हो ही जाए। कब तक इस गोरे का अत्याचार सहते रहेंगे? पिछले छह महीनों में इसने मार-मारकर शरीर को घाव बना दिया है। हमें भी दर्द होता है भाई, जैसे तुम्हें अभी मेरी जकड़न में हो रहा है।
जकड़ने-रगड़ने में दोनों जमीन पर गिर गए। कोवे ने जब नाखून गड़ाने की कोशिश की, तो उसे और ज्यादा प्यासे नाखूनों को भुगतना पड़ा। छोटी थप्पड़ का जवाब बड़ी थप्पड़ से और हल्के मुक्के का जवाब भारी मुक्के से मिला। कोवे को यह भी चिंता हो रही थी कि इलाके के लोग कहीं यह लड़ाई न देख लें। वह सिर घुमाकर इधर-उधर देख लेता था और कोशिश करता था कि किसी आड़ में ही लड़ाई हो। पूरे दो घंटे लड़ाई के बाद कोवे की हिम्मत टूट गई, पर वह पुलिस के पास नहीं गया। वह नहीं चाहता था, लोग जानें कि उसकी पिटाई हुई है, वह भी एक लड़के के हाथों। फायदा यह हुआ कि डगलस अत्याचार से बच गए।
मनोबल एकदम से बढ़ गया और बस चार साल लगे, गुलामी दूर हो गई। फ्रेडरिक डगलस (1818-1895) ने गुलामों को आजाद कराने, समाज सुधारने, नस्लभेद, रंगभेद से लड़ने, खूब लिखने और भाषण देने में अपना जीवन लगा दिया। फ्रेडरिक डगलस अमेरिका में उप-राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल होने वाले पहले अश्वेत थे। आज उन्हें पूरा अमेरिका सम्मान देता है। वह आज भी प्रेरणास्रोत हैं, तन, मन, धन से बलवान बनो, क्योंकि बल न काला होता है, न गोरा। बल से कोई तुम्हें गुलाम बना सकता है और बल से ही तुम गुलाम बनने से बच सकते हो।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय फ्रेडरिक डगलस समाज सुधारक नेता
जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / अमेरिकी प्रांत कैनसस में एक छोटा-सा शहर है जंक्शन सिटी। आज भी बमुश्किल पच्चीस-तीस हजार की आबादी होगी। वारेन एडम्स और मैरी एडम्स इसी शहर के बाशिंदे थे। फौजी पृष्ठभूमि होने की वजह से दोनों की मुलाकात दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई थी। वारेन एक सैनिक थे और मैरी उन दिनों नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थीं। जब युद्ध छिड़ा, मैरी ने अपने माता-पिता को बताए बिना ही फौज ज्वॉइन कर ली थी। उस समय लगभग डेढ़ लाख अमेरिकी महिलाओं ने मैरी की तरह देशसेवा का प्रण लिया था। नर्सिंग का प्रशिक्षण पूरा होने के बाद मैरी को कैनसस के फोर्ट रिले में नियुक्ति मिल गई, जहां वह जख्मी सैनिकों की खिदमत करती थीं।
एडम्स दंपति के पास दौलत भले न थी, मगर उनमें प्यार और हौसला खूब था, और इसकी बदौलत ही वे एक सुकून भरी जिंदगी जी रहे थे। मियां-बीवी, दोनों काफी मेहनत करते, ताकि अपने पांचों बच्चों को जमाने के लिहाज से सारी सुविधाएं दे सकें। इन्हीं पांच संतानों में से एक हैं मैरीलीन हेसन। मैरीलीन जब नौ साल की थीं, तब अचानक पिता का साया उन सबके सिर से उठ गया। वारेन एडम्स दिल के दौरे का शिकार हो गए थे। हालांकि, उसके पहले वह कभी बीमार नहीं पडे़ थे, इसलिए पांच से 15 साल के बच्चों को समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह क्या हुआ?
मैरी एडम्स के पास पति की मौत का शोक मनाने का वक्त नहीं था। वह एक हिम्मती महिला थीं और फिर घर के हालात भी इसकी इजाजत नहीं देते थे। अपने बच्चों को मायूस, पस्तहिम्मत देखना उन्हें गवारा नहीं हुआ। उन्होंने ऑफिस जाना शुरू कर दिया। काम पर जाने से पहले वह पांचों बच्चों की एक-एक जरूरत का ख्याल रखतीं और सबको कोई न कोई एक सबक देकर निकलतीं, ताकि वे अनुशासन में रहें।
घर की कमाई आधी रह गई थी, मगर पांच-सात साल के बच्चे इतने होशमंद कहां होते हैं कि मां की मजबूरियों को समझ पाते? वे कई बार किसी चीज की जिद करने लगते, तो मां उदास हो जातीं। पर नौ साल की मैरीलीन मां की पीड़ा समझने लगी थीं। अतंत: मैरी एडम्स ने वॉर बॉन्ड की राशि से एक इमारत खरीदी, जिसमें चार छोटे-छोटे अपार्टमेंट थे। उन्होंने उनको किराये पर लगाया, ताकि कुछ पैसे आ सकें। लेकिन बच्चे बड़े हो रहे थे, और सबके स्कूल-कॉलेज के खर्चे व घर की जरूरतें भी बढ़ती जा रही थीं। पैसे कम पड़ ही जाते। अंतत: उन्होंने बच्चों के स्कूल के कैफेटेरिया में पार्ट टाइम नौकरी भी की, ताकि कुछ कमाई के साथ-साथ बच्चों के करीब रह सकें। उनका अब बस एक ही सपना था कि बच्चे अच्छी तालीम हासिल कर एक बेहतर मुकाम हासिल करें।
घर के प्रत्येक बडे़ बच्चे को यह हिदायत थी कि वह अपने से छोटे भाई-बहन की देखभाल करे। मैरीलीन अपनी मां के संघर्ष को काफी करीब से देख रही थीं। इसने उनके ऊपर गहरा असर डाला। पढ़ाई के साथ-साथ वह छोटे भाई-बहन को तो संभालतीं, और अपार्टमेंट में साफ-सफाई जैसे छोटे-मोटे काम भी कर देतीं, ताकि उससे कुछ पैसे मिलें और मां की मदद हो सके। मां हर महीने मैरीलीन को पांच डॉलर बिलों के भुगतान के लिए और सात डॉलर घर के राशन के लिए देतीं और कहतीं, ‘मुझे उम्मीद है तुम सही फैसले करोगी।’
मैरीलीन ने 1979 में अलबामा यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में एमए किया। उनके पास कोलंबिया बिजनेस स्कूल और हॉर्वर्ड बिजनेस स्कूल की भी डिग्रियां हैं। अलबामा यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने यूएस ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स में नौकरी शुरू की। लेकिन उनकी मंजिल तो कुछ और थी। साल 1983 उनके लिए एक बड़ा मौका लेकर आया और उन्होंने लॉखीद मार्टिन कंपनी ज्वॉइन की। रक्षा क्षेत्र की अमेरिका की अग्रणी कंपनी। दुनिया भर के देशों को लड़ाकू विमान, ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर और रक्षा उपकरण मुहैया कराने वाली सबसे बड़ी वैश्विक कंपनियों में एक।
मैरीलीन ने इसके बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह कंपनी के विभिन्न विभागों से अनुभव बटोरकर आगे बढ़ती रहीं। उनकी काबिलियत और दूरदर्शिता ने नवंबर 2012 में उन्हें कंपनी के निदेशक मंडल में पहुंचा दिया और महज तीन महीने के भीतर वह लॉखीद मार्टिन की सीईओ की कुरसी पर बैठी थीं। उनके नेतृत्व में लॉखीद के कारोबार ने शानदार ऊंचाइयां देखीं। और इसी मार्च में जब उन्होंने यह पद छोड़ा, तब तक इसकी पूंजी तीन गुनी हो चुकी थी।
साल 2010 से 2020 तक मैरीलीन हेसन को लगातार दुनिया की शीर्ष पचास प्रभावशाली, शक्तिशाली महिलाओं या फिर सीईओ में गिना जाता रहा। दो वर्ष पूर्व वह सर्वश्रेष्ठ सीईओ चुनी गईं। कभी एक-एक डॉलर को बेहद किफायत से खर्र्चने वाली मैरीलीन आज सात अरब से अधिक की संपत्ति की मालकिन हैं। मगर इस मुकाम पर भी वह अपनी मां को कहीं अधिक कर्मठ मानती हैं। ये उन्हीं के शब्द हैं, ‘मेरी मां ने वह सब किया, जो बडे़-बड़े नेता करते हैं। उन्होंने भविष्य के लीडरों को हौसले दिए।’
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह मैरीलीन हेसन बिजनेस लीडर, पूर्व सीईओ
नजरिया / शौर्यपथ /भले ही भारत में कोविड-19 संक्रमण बढ़ रहा है, रोजाना करीब 50,000 मामले आ रहे हैं, लेकिन सरकार ने अनलॉक 3.0 लागू करने का फैसला लिया है। अनलॉक 3.0 निश्चित रूप से आर्थिक गतिविधियों को तेज करने वाला है। कुछ आर्थिक वृद्धि दर्ज भी हुई है, लेकिन इसे अर्थव्यवस्था में पूरी बहाली मान लेना अतिशयोक्ति होगी। आर्थिक गतिविधियों को रियायत मिली है, लेकिन अभी अर्थव्यवस्था मंदी से उबरने के किसी भी संकेत से दूर है। हालांकि, इस साल मानसून की बारिश अच्छी होने की उम्मीद है, साथ ही, कृषि ऐसा अकेला क्षेत्र है, जहां मजबूत वृद्धि की संभावना जताई जा रही है।
पिछले वित्त वर्ष में चार प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि के साथ कृषि क्षेत्र देश में तीसरे स्थान पर रहा था। आज ऐसी संभावना नहीं है कि कृषि 2019-20 के समान विकास दर दर्ज करे। मुद्दा यह है कि क्या चार-पांच प्रतिशत की विकास दर के साथ हमारा कृषि क्षेत्र बाकी अर्थव्यवस्था को भी संभालने के लिए पर्याप्त है। ध्यान रहे, बाकी क्षेत्रों में नकारात्मक विकास दर देखी जा रही है। समग्र विकास को अगर देखें, तो कृषि विकास अप्रासंगिक लग सकता है, क्योंकि कृषि का राष्ट्रीय आय में योगदान सिर्फ 15 प्रतिशत है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि कृषि विकास देश में आर्थिक गतिविधियों का एक मुख्य संचालक है। चूंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग घटी हुई है, इसलिए पूरी अर्थव्यवस्था लंबे समय से संकट में है।
इस पर अब आम सहमति है कि मौजूदा मंदी मुख्य रूप से घटती मांग का नतीजा है। कृषि विकास कितना प्रभावशाली है, इसे आंकने के लिए कृषि उत्पादन में वृद्धि की बजाय किसान की आय को देखना चाहिए। कृषि उत्पादन में वृद्धि का तात्पर्य किसानों की आय में वृद्धि से है। किसानों की आय अनेक चीजों पर निर्भर है। सबसे अहम बात, यह किसानों की उपज की कीमत पर निर्भर है, मगर अभी इस मोर्चे पर शुरुआती संकेतक बहुत उत्साहजनक नहीं हैं। थोक मूल्य सूचकांक पिछले तीन महीनों में थोक मूल्यों में गिरावट के साथ अपस्फीति की ओर इशारा कर रहा है। कीमतें घट रही हैं और किसानों की आय भी। मुद्र्रास्फीति में गिरावट का मतलब है कि अधिकांश खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट का रुख है। भले ही अनाज की कीमतों में सकारात्मक मुद्रास्फीति जारी है, लेकिन अन्य अधिकांश खाद्य पदार्थ, जैसे फल, सब्जियां, अंडे, मुर्गी और मछली की कीमतों में गिरावट जारी है। गिरावट का यह क्रम अब दूध की कीमतों में भी दिख रहा है और अन्य महत्वपूर्ण नकदी फसलों, जैसे कपास व तिलहन में भी। इसलिए भले ही कृषि उत्पादन में वृद्धि जारी हो, मगर यह वृद्धि किसानों के लिए बेहतर आय में नहीं बदल रही है। कृषि की लागत में वृद्धि के साथ अधिकांश छोटे और सीमांत किसानों की आय में वृद्धि की बजाय गिरावट की आशंका है।
पिछले दो वर्षों के दौरान किसान कुछ भाग्यशाली थे, जब राजनीतिक अभियानों के कारण सरकारों ने बड़ी मात्रा में अनाज खरीद की थी, पर इसका दूसरा पहलू यह है कि इस साल सरकारी खरीद की सुविधा पहले की तरह रहने की संभावना नहीं है। अनाज भंडार अभी भरे हुए हैं। किसानों की आय जब दबाव में है, तब कमजोर गैर-कृषि क्षेत्रों से भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचने की आशंका है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि अब कुल आय का केवल एक-तिहाई हिस्सा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बाकी दो-तिहाई हिस्से में छोेटे और मध्यम उद्यम हैं, जो महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। गांवों में आय या कमाई घटने का एक और कारण भी है कि कई शहरी प्रवासी अपने गांव लौट आए हैं।
ऐसे में, भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दिखने की संभावना तब तक नहीं है, जब तक कि कृषि को राजकोषीय प्रोत्साहन न हासिल हो। ऐसे वित्तीय उपाय करने होंगे, जिससे कृषि वस्तुओं की व्यापक मांग पैदा हो। सरकार को अपना खर्च बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी। न केवल खरीद और सब्सिडी में वृद्धि के माध्यम से, बल्कि गैर-कृषि ग्रामीण क्षेत्र को भी बढ़ावा देकर मांग में वृद्धि की जा सकती है। राजकोषीय प्रोत्साहन का एक और बड़ा दौर न केवल जरूरी है, बल्कि खरीफ फसलों के इस मौसम में अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए भी जरूरी है। भारतीय किसानों ने अपना काम किया है, अब समय है कि सरकार अपना काम करे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)हिमांशु, एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयू
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / बढ़ते कोरोना संक्रमण के समय डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के वेतन सुनिश्चित करने के लिए यदि सुप्रीम कोर्ट की जरूरत पड़ रही है, तो यह न केवल दुखद, बल्कि शर्मनाक भी है। डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी केवल देश के नागरिक ही नहीं, बल्कि इस वक्त कोरोना के खिलाफ लड़ रहे योद्धा हैं, ऐसे योद्धाओं के वेतन-भत्ते सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। पर पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक और त्रिपुरा जैसे राज्यों ने डॉक्टरों के भुगतान में देरी या ढिलाई की है। कुछ राज्यों ने डॉक्टरों के क्वारंटीन समय को भी छुट्टी माना है, यह तो और दुखद है। यह सब जानते हैं कि सौ से ज्यादा डॉक्टरों की मौत कोरोना से लड़ते हुई है और बड़ी संख्या में डॉक्टर कोरोना को पराजित करके ड्यूटी पर लौटे हैं, ऐसे में, तमाम सरकारों को इस सेवक बिरादरी का विशेष ध्यान रखना चाहिए था और शिकायत सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने की नौबत नहीं आनी चाहिए थी। इन कोरोना योद्धाओं के उत्साह और समर्पण को बनाए रखने के लिए भी विशेष पहल जरूरी है। उन इलाकों में तो खास तौर पर संवेदनशील पहल-प्रोत्साहन की जरूरत है, जहां मरीजों की सेवा से डॉक्टरों के बचने की शिकायतें आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को निर्देश देते हुए आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत कदम उठाने का आदेश दिया, तो कोई आश्चर्य नहीं। केंद्र को इन बातों का खुद भी ध्यान रखना होगा और महामारी के समय सारा भार राज्यों के कंधों पर नहीं छोड़ना चाहिए। जिन राज्यों ने डॉक्टरों के वेतन में कोताही बरती है, उन्हें सुधार के लिए विवश करना समय की मांग है।
ध्यान रहे, आज कोरोना के खिलाफ युद्ध जिस मुकाम पर है, हम अपनी लड़ाई या तैयारी में कहीं से भी कमी नहीं आने दे सकते। भारत में अकेले गुरुवार को 55,000 से ज्यादा नए मामले सामने आए हैं। संक्रमितों ने 16 लाख का आंकड़ा पार कर लिया है। जाने गंवाने वालों की संख्या 36,000 के आंकड़े को छू चुकी है। आज चार लाख से अधिक संक्रमण के साथ महाराष्ट्र सबसे अधिक प्रभावित राज्य बना हुआ है, लेकिन यह ज्यादा अफसोसजनक है कि डॉक्टरों की वेतन संबंधी शिकायतें महाराष्ट्र से भी आई हैं। कहना न होगा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब जैसे अपेक्षाकृत विकसित राज्यों को कोरोना के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करना चाहिए था।
केंद्र ने भले ही अनलॉक होने की ओर बढ़ने संबंधी कुछ घोषणाएं की हैं, लेकिन सच यही है कि राज्यों की चिंता लगातार बढ़ रही है। ठीक होने वालों की संख्या बढ़ी है, 10 लाख से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं, चिंता यह कि संक्रमण के मामले अब 21 दिन में ही दोगुना होने लगे हैं। विशेषज्ञों का मामना है, संख्या देखकर घबराने की ज्यादा जरूरत नहीं, हो सकता है कि जैसे-जैसे जांच की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे मामले भी बढ़ते लग रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों की जल्दी से जल्दी जांच व उसकी रिपोर्ट की ओर सरकार को और ध्यान देना चाहिए। जांच और नतीजों की खामियों को दूर करना भी जरूरी है। कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच दिशा-निर्देशों का स्पष्ट होना भी जरूरी है। यह भी विडंबना ही है कि लॉकडाउन और अनलॉक होने की प्रक्रिया साथ-साथ चल रही है। राज्यों के अंदर व राज्यों के बीच बेहतर समन्वय अब और जरूरी हो गया है, साथ ही, केंद्र की जिम्मेदारी भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / एक बहुप्रतीक्षित सपना साकार होने के करीब है, जब रामलला की मनोहारी छवि एक भव्य मंदिर में विराजेगी। निस्संदेह, करोड़ों देशवासियों की आस्था के विजय-पर्व पर भावनाओं का सैलाब उमड़ आना अपेक्षित है। लिहाजा, दशकों से तंबू-प्रवास में रह रहे रामलला के भव्य मंदिर की शुरुआत को उत्सव का स्वरूप क्यों न दिया जाए? एक तरफ, अयोध्या में इसकी तैयारियों की भव्यता अपने चरम पर है, तो वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम की जन्मस्थली वाले प्रदेश में ही इंसानी संवेदनाओं की हत्या सारी मर्यादाओं को तार-तार कर रही है। हैवानियत की एक तस्वीर लिए मन बार-बार पूछ रहा है कि राम तो आएंगे, पर उनका रामराज्य कब आएगा? कहते हैं कि पैदा होने से पहले और मरने के बाद इंसान जाति-धर्म के बंधनों से मुक्त रहता है। फिर उस शव की जाति उसका पीछा क्यों नहीं छोड़ पाई, जो एक स्त्री का था? तथाकथित निम्न जाति की स्त्री होने में भला उसका क्या कुसूर था कि सम्मान के साथ विदा लेने का उसका हक भी उससे छीन लिया गया?
एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड
गरीबों की सुध
गरीबों का कोई नहीं होता, पर उसकी वजह से सब जरूर होते हैं। इतिहास से लेकर वर्तमान तक यह वाक्य सही जान पड़ता है। गरीबों का न कोई धर्म होता है, न जाति, और न कोई उनके सम्मान की कद्र करता है। वे तो बस इस भेड़चाल भरी दुनिया में पिसते रहते हैं। उनके लिए योजनाएं बंद एसी कमरों में बनती हैं, अफसरों व नेताओं को उनकी दयनीय स्थिति सुधारने के उपाय तलाशने के लिए विदेश भेजा जाता है, पर आजादी के सात दशकों के बाद भी गरीबी देश में बनी हुई है। यहां तक कि अब उसमें एक बार फिर वृद्धि होती दिख रही है। कोरोना संक्रमण ने गरीबों के लिए चुनौती बढ़ा दी है। क्या हमारे नीति-नियंता उनकी सुध लेंगे?
हर्ष कुमार, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
एक नई चुनौती
कोरोना के गंभीर संक्रमण-काल में प्राकृतिक आपदा भी गंभीर चुनौती पेश कर रही है। ऐसा लग रहा है कि एक समस्या खत्म हुई नहीं कि दूसरी आ गई है। हालांकि, इसकी एक वजह हम खुद भी हैं, क्योंकि प्रकृति में मानव का हस्तक्षेप काफी भयावह है। उत्तर बिहार और असम में तो स्थिति कहीं ज्यादा चिंताजनक है, जहां एक बड़ी आबादी बाढ़ से घिरी हुई है। यहां न जाने कितने लोग बेघर हो चुके हैं और वे सड़कों पर ही रहकर अपना गुजारा कर रहे हैं। मुुश्किल यह भी है कि जब बाढ़ का पानी उतरता है, तो कई तरह की बीमारियां पैदा होती हैं, जिससे इंसानी जान-माल की व्यापक क्षति होती है। इसलिए यह जरूरी है कि बाढ़ पीड़ितों के हितों में सरकार विशेष कदम उठाए। हालांकि, यह आम लोगों का भी फर्ज है कि बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए वे आगे आएं और बढ़-चढ़कर मदद करें।
उदय कुमार ,जादोपुर, गोपालगंज
खत्म हो दादागिरी
पूरी दुनिया को कोरोना बीमारी देने के कारण चीन सभी के लिए सिरदर्द बना हुआ है। ऐसे में, उसके खिलाफ सभी राष्ट्रों को मिलकर ठोस रणनीति बनानी चाहिए। इसमें संयुक्त राष्ट्र को भी शामिल किया जाना चाहिए। दिक्कत यह भी है कि चीन अब भी विस्तारवादी नीति अपना रहा है। हमारे साथ लद्दाख में उलझने के अलावा वह कई अन्य देशों से भी सीमा विवाद में शामिल है। इसलिए यह समझ में नहीं आता कि परेशानी झेलने के बाद भी दुनिया के देश चीन के खिलाफ एकजुट प्रयास क्यों नहीं कर रहे? संभव है, इसके पीछे उसका एक बड़ी आर्थिक ताकत होना कारण हो। हालांकि, बड़ी से बड़ी आर्थिक ताकत को भी अकेला कर दिया जाए, तो वह सुधर जाती है। चीन के साथ यही रणनीति अपनाई जानी चाहिए। सभी देशों को उससे रिश्ता खत्म कर लेना चाहिए।
सुमित कुमार रस्तोगी
संभल, उत्तर प्रदेश
ओपिनियन / शौर्यपथ / चीन पिछले कई वर्षों से भारत को घेरने की योजना पर काम कर रहा है। इसके लिए वह हमारे पड़ोसी देशों पर किसी न किसी तरह से अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है। पाकिस्तान को तो वह अपना ‘आयरन ब्रदर’ बना ही चुका है, कुछ ऐसा ही कथित ‘मजबूत भाईचारा’ वह अफगानिस्तान और नेपाल के साथ भी निभाना चाहता है। इसके अलावा, म्यांमार के साथ आर्थिक गलियारे के निर्माण पर सहमति बनाकर, बांग्लादेश में भारी निवेश करके, मालदीव के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाकर और श्रीलंका की निर्माण-परियोजनाओं पर अपनी पकड़ मजबूत करके वह क्षेत्र में भारत-विरोधी नीति को लगातार हवा दे रहा है। ऐसे में, असली सवाल यही है कि चीन की काट हम किस तरह निकालें? इसका सही-सही जवाब तभी मिल सकेगा, जब गंभीरता से यह चिंतन हो कि उप-महाद्वीप के तमाम पड़ोसी देशों से भौगोलिक, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रिश्ता चीन की तुलना में कहीं ज्यादा गहरा होने के बावजूद हमसे चूक कहां हुई?
दरअसल, भारत ने आसपास के देशों से रिश्ते बेहतर बनाने के बहुत सीमित प्रयास किए हैं। बेशक, हाल के वर्षों में ‘नेबरहुड फस्र्ट’ यानी पड़ोस-प्रथम की नीति अपनाई गई है, लेकिन इस पर फिलहाल संजीदा काम होता दिख नहीं रहा है। कुछ यही हाल दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) का भी है। पाकिस्तान के साथ खराब रिश्ते की वजह से यह मंच अब बहुत ज्यादा कारगर नहीं रहा। हां, बंगाल की खाड़ी पर निर्भर दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के सात देशों के संगठन बिम्सटेक से उम्मीद पाली जा सकती है, पर इसके लिए भी भारत को अपने तईं प्रयास करने होंगे। द्विपक्षीय और क्षेत्रीय सहयोग की भी यही तस्वीर है। बांग्लादेश, भूटान, नेपाल व भारत के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने पर सहमति बन चुकी है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसमें मनमाफिक प्रगति नहीं हुई है। क्षेत्र में सभी देशों के लिए सुरक्षा और विकास की खास नीति पर भी मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में जोर दिया गया है, पर इसका असर दिखना अभी बाकी है।
एक मुश्किल यह भी है कि हम पड़ोस के देशों से विभिन्न परियोजनाओं के लिए समझौते तो कर लेते हैं, लेकिन उनको अमल में लाना कभी-कभी तकनीकी वजहों से काफी मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि कभी तय वक्त पर धनराशि नहीं जारी हो पाती, तो कभी सामान की आपूर्ति रुक जाती है। इसके बरअक्स, चीन कहीं अधिक तेजी से अपनी परियोजनाएं पूरी करता है। जाहिर है, हर देश के साथ अलग-अलग तरीके से हमें अपना द्विपक्षीय रिश्ता आगे बढ़ाना होगा। अगर इस पर गंभीरता से काम हुआ, तो पड़ोसी देश भी हमारे साथ ‘चीन कार्ड’ नहीं खेल सकेंगे, जो अभी इसलिए अमल में लाया जाता है, ताकि हम पर दबाव बने।
हमें कई दूसरे उपाय भी करने होंगे। मसलन, प्राकृतिक आपदाओं को संभालने के लिए एक संयुक्त कार्ययोजना बनाने की पहल करना। अभी बाढ़, तूफान जैसी कुदरती आपदाओं से जितने हम पीड़ित होते हैं, उतने ही हमारे पड़ोसी देश भी होते हैं। इसीलिए हमें क्षेत्रीय स्तर पर एक ऐसा तंत्र बनाना चाहिए कि मुसीबत के समय सभी देशों को उससे मदद मिल सके। इसी तरह, जलवायु परिवर्तन की समस्या से सामूहिक तौर पर लड़ने के लिए भी हमें पड़ोसी देशों को तैयार करना चाहिए।
‘एजुकेशन हब’ बनकर भी भारत पड़ोसी देशों से मित्रता मजबूत कर सकता है। आसपास के देशों के छात्र यहां आकर अपना कौशल निखार सकते हैं। मगर इसके लिए उन्हें बेहतर शैक्षणिक माहौल दिए जाने की व्यवस्था करनी होगी। ‘मेडिकल टूरिज्म’ भी एक अन्य क्षेत्र है, जहां भारत नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है। कोविड-19 महामारी ने मजबूत स्वास्थ्य ढांचे के महत्व पर खासा जोर दिया है। इसी तरह, पड़ोसी देशों के नौजवानों से उभरती तकनीक और प्रौद्योगिकी की जानकारी साझा करना भी हमारे हित में होगा।
यह सब करने के लिए जहां सरकार की तरफ से नीतिगत फैसले की दरकार है, वहीं नई परिपाटी शुरू करने भी जरूरत है, ताकि योजनाओं को जमीन पर उतारा जा सके। जैसे, वीजा जारी करने की प्रक्रिया को सरल बनाना। इतना ही नहीं, अमेरिका की तरह हमारे यहां भी ‘ग्रीन कार्ड’ जैसी व्यवस्था शुरू की जा सकती है, जिससे रोजगार पाने की उम्मीद रखने वाले दूसरे देशों के नौजवान भारत की तरफ आकर्षित हों। इससे न सिर्फ विदेशी कामगारों का दस्तावेजीकरण हो सकेगा, बल्कि अपने देश की आर्थिक सेहत भी सुधर सकेगी। द्विपक्षीय और क्षेत्रीय सहयोग की परस्पर लाभकारी व्यवस्था भी बननी चाहिए, ताकि पड़ोसी देशों को यह मालूम चले कि चीन की दोस्ती में वे उसके आर्थिक उपनिवेश बन जाएंगे, जबकि भारत का साथ उन्हें एक बराबरी का एहसास दिलाएगा।
चिंता की बात यह भी है कि भारत और आसपास के देशों में बमुश्किल व्यापार होता है। हम महज चार-पांच फीसदी कारोबार ही पड़ोसी देशों के साथ करते हैं। जाहिर तौर पर इसमें सुधार जरूरी है। फिर, ‘बॉर्डर ट्रेड’ यानी सीमावर्ती इलाकों में आपसी व्यापार को भी बढ़ावा देना चाहिए। इससे न सिर्फ रोजगार के नए दरवाजे खुलेंगे, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचेगा। म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश आदि देशों के साथ हम यह प्रयोग कर सकते हैं। इससे क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखला की अवधारणा को भी बल मिलेगा, जिससे आपस में विश्वास की डोर मजबूत होगी। ऐसी कोई शृंखला इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कोरोना की वजह से वैश्विक आपूर्ति शृंखला काफी प्रभावित हुई है। मगर हां, इसके लिए हमें अपने वीजा नियमों और सीमा शुल्क से जुड़े प्रावधानों की गंभीर समीक्षा करनी पडे़गी।
उपमहाद्वीप के तमाम देशों से रिश्ते मजबूत बनाने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि कोविड-19 के कारण क्षेत्रीय भू-राजनीति पर काफी असर पड़ा है। ऐसे में, पुरानी नीतियों से हम चीन को जवाब नहीं दे सकते। परस्पर लाभ पहुंचाने वाले द्विपक्षीय रिश्ते और पड़ोसी देशों को पर्याप्त तवज्जो देने वाली पड़ोसी-प्रथम की नीति पर हमें आगे बढ़ना चाहिए। बंगाल की खाड़ी और समुद्री सुरक्षा पर भी अधिक ध्यान देना होगा, क्योंकि बंगाल की खाड़ी में चीन की गतिविधियां काफी बढ़ गई हैं। भारत सरकार बेशक इस दिशा में प्रयास कर रही है, पर अब भी काफी कुछ किया जाना है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)अरविंद गुप्ता, पूर्व डिप्टी एनएसए, डायरेक्टर, वीआईएफ
रायपुर / शौर्यपथ / प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी अगस्त माह का प्रथम सप्ताह विश्व स्तनपान सप्ताह के रूप में मनाया जा रहा है। यह सर्वविदित है कि शिशु के लिए स्तनपान सर्वोत्तम आहार तथा शिशु का मौलिक अधिकार है।
विश्व स्तनपान सप्ताह 2020 विश्व स्तनपान सप्ताह विगत वर्षों की तरह इस वर्ष भी 1 से 7 अगस्त 2020 के बीच मनाया जाएगा । इस वर्ष का स्तनपान सप्ताह का थीम “सपोर्ट ब्रेस्टफीडिंग फॉर ए हेल्थीअर प्लानेट” है जो इस बात पर जोर देती है कि स्वस्थ और सेहतमंद विश्व के लिए स्तनपान का समर्थन करना बहुत जरूरी है ।
मां का दूध शिशु के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण है । माँ का दूध जिसे पहला टीका भी कहा जाता है और यह खुद में पूर्ण आहार है छः माह तक यह शिशु को डायरिया, निमोनिया और कुपोषण से बचाने और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। समस्त गतिविधियों का संचालन शासन द्वारा निर्धारित कोविड-19 के दिशा निर्देशों को ध्यान में रखते हुए मनाया जाएगा जैसे साबुन से बार बार हाथ धोना, मास्क का उपयोग,और दूरी बनाए रखना।
राज्य बाल रोग एवं टीकाकरण अधिकारी डॉ.अमर सिंह ठाकुर ने बताया शिशु के लिए स्तनपान मौलिक अधिकार तथा सर्वोत्तम आहार है । जिन शिशुओं को 1 घंटे के अंदर स्तनपान नहीं कराया जाता उन में नवजात मृत्यु दर की संभावनाएं 33% बढ़ जाती है। छः माह तककी आयु तक शिशु को केवल स्तनपान कराने पर आम रोग जैसे दस्त एवं निमोनिया के खतरे में क्रमशः 11% एवं 15% कमी लाई जा सकती है । अधिक समय तक स्तनपान करने वाले बच्चों की मानसिक और शारीरिक वृद्धि उन बच्चों की अपेक्षा अधिक होती है जिन्हें मां का दूध थोड़े समय के लिए प्राप्त होता है ।
स्तनपान स्तन कैंसर से होने वाली मृत्यु को भी कम करता है । विभिन्न शोधों से यह स्पष्ट हो चुका है कि स्तनपान से न केवल शिशुओं और माताओं को बल्कि समाज और देश को भी कई प्रकार के लाभ होते हैं । स्तनपान की महत्वता तथा शिशु एवं बाल मृत्यु दर में कमी के लिए उनके प्रभाव को दृष्टिगत रखते हुए आवश्यक है कि जन्म के 1 घंटे के भीतर नवजात को स्तनपान प्रारंभ कराया जाए और 6 माह तक केवल स्तनपान कराया जाए । शिशु के 6 माह पूरे होने पर संपूरक आहार देना प्रारंभ किया जाए और शिशु के 2 वर्ष पूरे होने तक स्तनपान जारी रखा जाए इसलिए स्तनपान कराने में माताओं का सहयोग एवं स्तनपान को बढ़ावा दिया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण गतिविधि में से एक है ।
भारत सरकार द्वारा वर्ष 2016 में स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए (MAA--- Mother’s Absolute Affection) यानि मां कार्यक्रम की शुरुआत की थी । डॉ. ठाकुर ने कहा ‘’मां’’ कार्यक्रम के अंतर्गत सभी चिकित्सा इकाइयों को बेबी फ्रेंडली बनाने की आवश्यकता है सफल स्तनपान के साथ प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी नियमित रूप से मां और समुदाय के साथ संपर्क में रहे जिसे गर्भवती महिला और जन्म के समय से 2 साल तक के बच्चों को नियमित रूप से सहयोग मिलता रहे। चिकित्सा स्वास्थ्य केंद्र में होने वाले प्रसव में चिकित्सक स्टाफ नर्स एलएचवी और एएनएम सभी को स्तनपान के लिए परामर्श दें । आवश्यकता हो वहां मां की सहायता भी करें । ध्यान रखें कि किसी भी अवस्था में व्यवसायिक एक शिशु आहार को बढ़ावा ना दें । एक लिखित स्तनपान नीति की उपलब्धता सुनिश्चित करें ।
इस नीति को लागू करने के लिए सभी स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों का आवश्यक क्षमता वर्धन स्वास्थ्य कर्मी द्वारा सभी गर्भवती महिलाओं को स्तनपान के लाभ और प्रबंधन के बारे में सूचना प्रदान की जायेगी और स्वास्थ्य कर्मी द्वारा माताओं को जन्म के घंटे के भीतर स्तनपान कराने में मदद करते हैं।
छत्तीसगढ़ में 1 घंटे के अंदर स्तनपान की दर मात्र 47.1% है (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 4) जिसको चिकित्सक, स्वास्थयकर्मी और समुदाय स्तर पर स्तनपान के व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए अत्याधिक प्रयास करने किये जा रहे है ।
बिलासपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ प्रदेश में कला और अभिनय के क्षेत्र कई सितारे धीरे-धीरे टीम टिमा कर अपने कला और अभिनय के बल पर न सिर्फ ऊपर आ रहे है बल्कि अपनी चमक से पुरे प्रदेश को गौरवान्वित भी कर रहे है आज हम बात कर रहे है टिक टाक क्वीन अनुकृति पांडे जो कि बिलासपुर में एक मध्यम वर्गीय ब्राहमण परिवार में जन्म ली और स्वप्रेरित होकर अभिनय और मॉडलिंग के क्षेत्र में मॉडल के रूप में काम कर चुकी है 14 वर्ष के उम्र से ही अनुकृति ने मॉडलिंग कर अपने प्रतिभा से दर्शको और प्रशंसको के बिच एक प्रतिबिंब बनकर उभरी है.बहुमुखी प्रतिभा की धनी अनुकृति अभी महज 18 वर्ष की है किन्तु मेहनत और लगन से ही उन्होंने अपनी पहचान लोगो के बीच बनाई है.जिससे लगातार उन्हें प्रशंसा के साथ काम भी मिला मिलनसार व् मृदुभाषी अनुकृति के फैन फोल्लोविंग बिलासपुर छत्तीसगढ़ ही नहीं देश-विदेश से भी है इन्होने अपना सफर टिकटोक से शुरुवात कर लगभग 1.35 मिलियन लोगों के दिलों में जगह बनाई अपने अंदर के कलाकार को टिकटाक के माध्यम से प्रशंसको तक पहुँचाने में सफल रही.अपने करियर की शुरुआत विज्ञापनों से की जिसमे डाउट नट एप एक शिक्षा प्रद एप है ,वॉच,ड्रेस,ज्वेलरी,म्यूजिक एवं गूगल एप्स जैसे सेगमेंट में विज्ञापन शामिल है हाल ही में इन्होने मुंबई के मशहूर निर्माता निर्देशक समीर चंद्रा की वैब सीरीज में काम किया है जिसके बाद इनके पास ऍमटीवी पॉप सेगमेंट में लीड मॉडल के लिए ऑफर आये है.अहमदाबाद,मुंबई के मीट और ग्रीट जैसे सेलेब्रिटी प्रोग्राम तक का सफर इन्होने अपनी कड़ी मेहनत से प्राप्त किया बताया जा रहा है कि नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की हालिया एक वेब सिरिस मे भी अनुकृति को रोल मिल सकता है बिलासपुरवासियो के लिए यह बड़ी खबर है कि शहर कि बेटी को ऐसा मुकाम मिला जिससे वो पूरा प्रदेश का नाम दुनिया में रौशन कर सकती है .
खाना खजाना / शौर्यपथ / ईद-उल-अजहा के लाजवाब व्यंजन
शीरखुरमा
सामग्री :
100 ग्राम सेंवई, 1 टेबलस्पून घी, 3 लीटर दूध, 250 ग्राम शक्कर, 10-12 टेबलस्पून पिसा हुआ चावल, 4-5 हरी इलायची दाने पिसे हुए, 1 कप मिल्क पावडर, 100 ग्राम खारक रातभर पानी में भिगोकर रखे और बारीक कटे हुए, 50 ग्राम बादाम बारीक कटे हुए, 50 ग्राम किशमिश, 50 ग्राम पिस्ता, 50 ग्राम नारियल के बारीक कतले तथा 1 टेबलस्पून केवड़ा।
विधि :
सबसे पहले इलायची पावडर, चावल के पावडर तथा शकर को थोड़े से दूध में घोलकर रखें। घी को एक बड़े बर्तन में धीमी आंच पर गर्म करें। इस घी में सेंवई डालकर सुनहरा होने तक भूनें। इसे बार-बार पलटते रहें ताकि ये जले नहीं। अब भूरी हो गई सेंवई को एक प्लेट में अलग निकालकर रख दें। उसी बर्तन में अब दूध डाल दें और उबालें।
उबलते दूध में इलायची पावडर, शकर तथा पिसा हुआ चावल डाल दें। दूध को मध्यम आंच पर गाढ़ा होने तक उबालें और बीच में चलाते रहें। अब इसमें खारक, बादाम, किशमिश, पिस्ता, नारियल तथा सेंवई डाल दें। सेंवई के नर्म होने तक इसे पकाएँ। अब आँच पर से उताकर केवड़ा डालें और थोड़े और ड्राययफ्रूट्स से सजाकर पेश करें।
चिकन सैंडविच विद बटर
सामग्री :
8 स्लाइस डबल रोटी, 1 कप छोटे टुकड़ों में कटा व पका हुआ चिकन, 1 बड़ा प्याज बारीक कटा हुआ, आधा कप हरा धनिया, 3 हरी मिर्च बारीक कटी, चौथाई कप मेयोनेज, चौथाई कप खट्टी मलाई, मक्खन, स्वादानुसार नमक।
विधि :
सबसे पहले डबल रोटी पर मक्खन लगाएं। फिर चिकन में प्याज, हरी मिर्च, नमक, मलाई और मेयोनेज मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें।
इस मिश्रण को मक्खन लगी डबल रोटी पर लगाएं और दूसरी डबल रोटी से उसे कवर करें। सैंडविच को टोस्टर में रखकर सेंकें और मूली और गाजर के साथ सर्व करें।
मसालेदार चिकन बिरयानी
सामग्री :
एक किलो चिकन, एक किलो बासमती चावल, 250 ग्राम रिफाइंड तेल, 500 ग्राम कटा प्याज, 500 ग्राम कटे टमाटर, एक कप दही, 10-15 हरी मिर्च लंबी कटी हुई, पांच-पांच ग्राम दालचीनी, इलायची व लौंग, एक बड़ा चम्मच लहसुन-अदरक का पेस्ट, दो लीटर पानी, नमक स्वादानुसार।
विधि :
सबसे पहले चावल को साफ करके आधे घंटे के लिए पानी में भिगो दें। चिकन को बड़े-बड़े टुकड़ों में काट लें। आवश्यक मात्रा में तेल गर्म करके प्याज भूनें। अब हरी मिर्च, इलायची, दालचीनी, लौंग मिलाए तथा भून लें।
प्याज सुनहरे हो जाने के पश्चात लहसुन-अदरक का पेस्ट और टमाटर डालकर सभी को भूनें। चिकन के टुकड़े, दही, नमक डालें। चिकन को पकने दें। अब चावल और आवश्यकतानुसार करीब दो लीटर पानी डालें तथा पकने दें। अब अच्छी तरह मिलाकर ढक्कन बंद करके चावलों को पकने दें।
मसालेदार चिकन चॉप्स
सामग्री :
4 मध्यम आकार के चिकन के टुकड़े, 4 हरी मिर्च, एक मध्यम आकार का प्याज, 1 बड़ा चम्मच बारीक कटा अदरक-लहसुन, आधा छोटा चम्मच पेपर कॉर्न, एक चुटकी हल्दी पावडर, आधा कप बारीक कटा हरा धनिया, एक बड़ा चम्मच घी और स्वादानुसार नमक।
विधि :
चिकन को लेकर उसके सभी तरफ छुरी की सहायता से चीरा लगाएं और अलग रखें। अब जार में कटी प्याज, हरी मिर्च, हरा धनिया, अदरक-लहसुन, पेपर कॉर्न, हल्दी और नमक मिला कर मिक्सर ग्राइंडर में पीसें और एक पेस्ट बना लें।
अब इस पेस्ट को चिकन के साथ अच्छी तरह से मिलाएं और एक घंटे के लिए ऐसे ही छोड़ दें। अब एक फ्राइंग पैन में तेल गर्म होने के लिए रखें। जब तेल अच्छा गर्म हो जाए तब इसमें चिकन के टुकड़े डालें और मध्यम आंच पर 10 मिनट तक पकाएं।
इसके बाद इसे ढंक दें और तीन मिनट तक या फिर चिकन के नर्म होने तक धीमी आंच पर पकाएं। ताजे हरे धनिए की पत्तियों और तली हुई प्याज के साथ परोंसे।
सीक कबाब
ईद-उल-अजहा के खास मौके पर सीक कबाब बनना भी लाजिमी है। कई सारे खुशबूदार मसालों से तैयार सीक कबाब का स्वाद ऐसा होता है कि एक बार खाने के बाद इसका स्वाद भूल नहीं पाएंगे आप। इसको बनाने के लिए चिकन के बहुत ही बारीक पीस में मसाले मिलाकर कबाब तैयार किए जाते हैं और उन्हें चटनी के साथ परोसा जाता है। यह व्यंजन हर किसी को पसंद आता है।
लाजवाब हैदराबादी मटन
सामग्री :
500 ग्राम मटन, दो प्याज, एक टमाटर, दो बड़े चम्मच अदरक-लहसुन का पेस्ट, तीन हरी मिर्च, दो बड़े चम्मच किसा नारियल, पाव चम्मच हल्दी, दो चम्मच धनिया पावडर, आधा चम्मच जीरा पावडर, एक चम्मच लाल मिर्च पावडर, आधा छोटा चम्मच गरम मसाला, एक कप दही, एक दालचीनी का टुकड़ा, 4 लौंग, दो हरी इलाइची, एक तेज पत्ता, एक बड़ा चम्मच खसखस, थोड़ी-सी केसर, एक बड़ा चम्मच क्रीम, दो बड़े चम्मच तेल, एक बड़ा चम्मच घी और स्वादानुसार नमक।
विधि :
सबसे पहले मटन को अच्छी तरह साफ कर लें। अब एक बड़े चम्मच कुनकुने दूध में केसर को भिगाकर रखें। खसखस को 10 मिनट तक पानी में भिगाकर रखें। अब मटन के टुकड़ों को एक बड़े कटोरे में लें, इसमें अदरक-लहसुन का पेस्ट, हरी मिर्च, लाल मिर्च, धनिया तथा जीरा पावडर और दही मिलाएं। अच्छी तरह मिलाने के बाद इसे एक घंटे के लिए ऐसे ही छोड़ दें।
अब खसखस और किसे हुए नारियल को पीस कर इसका पेस्ट बना लें। एक कड़ाही में तेल और घी गर्म करें। जब यह उबलने लगे तब इसमें सारे मसाले मिला दें और थोड़ी देर पकाएं। फिर इमसें प्याज डालें और सुनहरा-भूरा होने तक पकाएं।
तत्पश्चात इसमें टमाटर डालें और तेल छोड़ने तक पकाएं। इसके बाद इसमें मटन डालें और अच्छी तरह मिलाएं। इसे ढक्कन से ढंक कर धीमी आंच पर ग्रेवी के गाढ़े होने तक पकाएं। फिर इसमें खसखस और नारियल का पेस्ट डालें और अच्छे से मिलाएं। फिर से इसे ढंके और 2 मिनट तक पकाएं। अब इसमें 1½ कप पानी मिलाएं और उबलने दें। जब यह उबलने लगे तब इसमें स्वादानुसार नमक डालकर अच्छी तरह मिलाएं।
धीमी आंच पर ढंक कर इसे मटन के नर्म होने तक पकाएं और जब ग्रेवी आपकी इच्छानुसार गाढ़ी हो जाए, तब इसमें गरम मसाला डालकर अच्छे से मिलाएं। फिर इसमें दूध में भीगा हुआ केसर मिलाएं और आंच बंद कर दें। कटे हुए बादाम और हरे धनिए से सजा कर परोसें।
स्वीटकॉर्न चिकन सूप
सामग्री :
उबला हुआ चिकन 250 ग्राम, 4 भुट्टे, 2 चम्मच मक्खन, 1 प्याज कद्दूकस किया हुआ, 1 ली. पानी, 40 ग्राम कॉर्नफ्लोर (पानी मिला कर तैयार किया गया पेस्ट), नमक और काली मिर्च स्वादानुसार, 1 चम्मच शक्कर, 1 चम्मच अजीनोमोटो, 2 चम्मच सफेद विनेगर।
विधि :
चार में से तीन भुट्टे बारीक पीस लें। एक भुट्टे के बारीक टुकड़े काट लें और पीसे हुए भुट्टे में मिलाकर रख दें। अब एक पेन में मक्खन डालकर कद्दूकस प्याज तलकर उसमें भुट्टे का मिश्रण और उबला हुआ चिकन मिला लें।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ /आमतौर पर महिलाएं व लड़कियां अपनी त्वचा की रंगत निखारने के लिए पार्लर में ब्लीच करवाती है या कई बार घर पर खुद ही करती है। अगर आप भी घर पर खुद से ब्लीच करती हैं तो ये 10 बातें आपको जरूर जानना चाहिए -
1. चेहरे को साफ-सुथरा व कांतिमय बनाने के लिए 'ब्लीच' एक बेहतर विकल्प है। ब्लीच आपकी त्वचा के अनचाहे बालों को छिपाने के साथ ही त्वचा में सोने सा निखार भी लाता है।
2. ब्लीच का इस्तेमाल हाथ, पैर व पेट पर भी वेक्स के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।
3. ध्यान रहे ब्लीच में अमोनिया की मात्रा निर्देशानुसार ही मिलाए। इसमें अमोनिया की अधिक मात्रा आपके चेहरे को नुकसान पहुंचा सकती है।
4. इसे लगाते समय बस इस बात का जरूर ध्यान रखें कि यदि यह आंखों के ऊपर लग गया तो बहुत अधिक नुकसानदेह हो सकता है। बेहतर होगा कि आप इसे आंखों व आई ब्रो पर नहीं लगाएं।
5. आजकल बाजार में कई प्रकार की कंपनियों के ब्लीच उपलब्ध हैं, जिनके ट्रायल पैक का इस्तेमाल कर आप उन्हें अपनी स्कीन पर आजमा सकती है।
6. बॉक्स पर दिए गए निर्देशानुसार ही ब्लीच क्रीम में अमोनिया पावडर की मात्रा डालें।
7. क्रीम और पावडर के इस मिश्रण को पहले कोहनी पर या अन्य जगह पर लगाकर देखें।
8. त्वचा में अधिक जलन होने पर मिश्रण में क्रीम की मात्रा बढ़ाएं।
9. हमेशा ब्रांडेड कंपनी का ही ब्लीच इस्तेमाल करें।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / कोरोनावायरस से बचने के लिए सोशल डिस्टेंसिग रखी जा रही हैं। वहीं राखी का त्योहार भी नजदीक है, ऐसे में महिलाएं पार्लर जानें से बचना चाहती है, लेकिन बढ़ी हुई आईब्रो भी उन्हें काफी परेशान कर रही हैं। यदि आप भी चाहती है। बिना पार्लर जाएं घर में आइब्रो को सही शेप देना। तो ये लेख आपके लिए हैं। तो आइए जानते है कुछ खास टिप्स जिसकी मदद से आप बिना पार्लर का रूख किए घर में ही अपनी आईब्रो को सही शेप दे सकती हैं।
सबसे पहले आप गुनगुने पानी से अपने चेहरे को धो लीजिए। अब इसे आईब्रो ब्रश के माध्यम से अच्छी तरह से साफ कर लें।
अब आपको अपनी त्वचा को एक हाथ से टाइट पकड़ना है। अब धीरे-धीरे अपने आईब्रो के बालों को आईब्रो प्लकर (tweezer) की मदद से निकालें। लेकिन इस बात का जरूर ध्यान दें कि आप एक-एक करके अपने आईब्रो के बालों को साफ करें ताकि आपको इससे ज्यादा तकलीफ न हो, क्योंकि ऐसे में त्वचा लाल भी पड़ सकती है। जब आप आईब्रो को साफ करें तो इस बात का ध्यान रखें कि आपको हेयर ग्रोथ के डायरेक्शन में ही इसे निकालना है।
अब लंबी आईब्रो को सेट करने के लिए आईब्रो कैंची का इस्तेमाल करें और इन्हें सही शेप में लाएं।
अब अपनी आईब्रो को ब्रश के माध्यम से चेक करें कि आपकी आईब्रो सही शेप में आई है या नहीं?
इस बात का जरूर ध्यान दें कि आपको रोज थोड़े-थोड़े आईब्रो के एक्स्ट्रा बालों को निकालना है। यदि आप एक साथ ऐसा करती हैं, तो आपकी त्वचा लाल पड़ सकती है। साथ ही ज्यादा ग्रोथ का इंतजार न करें, थोड़ी ही ग्रोथ में इन्हें साफ करना शुरू कर दें तो ही यह बेहतर है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / महाभारत में भगवान श्री कृष्ण के बहुत सारे शत्रु थे जिसमें से सबसे बड़ा शत्रु तो मगध का शासक जरासंध था। हालांकि हम यहां सिर्फ उन लोगों के बारे में संक्षिप्त में बताएंगे तो भगवान श्रीक कृष्ण के रिश्तेदार होने के बावजूद उनके कट्टर शत्रु थे।
1.कंस मामा : भगवान कृष्ण का मामा था कंस। वह अपने पिता उग्रसेन को राज पद से हटाकर स्वयं शूरसेन जनपद का राजा बन बैठा था। कंस को मालूम था कि मेरी बहन देवकी का आठवां पुत्र मेरी मौत का कारण बनेगा। यही कारण था कि वह भगवान श्री कृष्ण को हर हाल में मारना चाहता था। बहुत प्रयास करने के बाद भी जब वह बाल कृष्ण को नहीं मार पाया तब योजना अनुसार कंस ने एक समारोह के अवसर पर कृष्ण तथा बलराम को आमंत्रित किया।
वह वहीं पर कृष्ण को मारना चाहता था, किंतु कृष्ण ने उस समारोह में कंस को बालों से पकड़कर उसकी गद्दी से खींचकर उसे भूमि पर पटक दिया और इसके बाद उसका वध कर दिया। कंस को मारने के बाद देवकी तथा वसुदेव को मुक्त किया और उन्होंने माता-पिता के चरणों में वंदना की। लेकिन इस एक घटना से जरासंध उनका कट्टर शत्रु बन गया, क्योंकि कंस जरासंध का जमाई था। जरासंध के कारण ही कृष्ण और कालयवन का युद्ध हुआ था।
2.शिशुपाल : शिशुपाल कृष्ण की बुआ का लड़का था। जब शिशुपाल का जन्म हुआ तब उसके 3 नेत्र तथा 4 भुजाएं थीं। वह गधे की तरह रो रहा था। तभी आकाशवाणी हुई कि बालक बहुत वीर होगा तथा उसकी मृत्यु का कारण वह व्यक्ति होगा जिसकी गोद में जाने पर बालक अपने भाल स्थित नेत्र तथा दो भुजाओं का परित्याग कर देगा। इस आकाशवाणी और उसके जन्म के विषय में जानकर अनेक वीर राजा उसे देखने आए। शिशुपाल के पिता ने बारी-बारी से सभी वीरों और राजाओं की गोद में बालक को दिया।
अंत में शिशुपाल के ममेरे भाई श्रीकृष्ण की गोद में जाते ही उसकी 2 भुजाएं पृथ्वी पर गिर गईं तथा ललाटवर्ती नेत्र ललाट में विलीन हो गया। इस पर बालक की माता ने दु:खी होकर श्रीकृष्ण से उसके प्राणों की रक्षा की मांग की। श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं इसके 100 अपराधों को क्षमा करने का वचन देता हूं।
शिशुपाल के शत्रु होने के कई कारण थे। उनमें से एक कारण यह भी था कि शिशुपाल अपने मित्र रुक्म की बहन रुक्मणि से विवाह करता चाहता था। लेकिन वह ऐसा कर नहीं सकता। रुक्मणी ने भगवान श्रीकष्ण से विवाह किया था। कालांतर में शिशुपाल ने अनेक बार श्रीकृष्ण को अपमानित किया और उनको गाली दी, लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें हर बार क्षमा कर दिया। अंत में एक सभा में जब शिशुपाल ने 100वां अपराध किया तब श्री कृष्ण ने अपने सुदर्शन से उसका सिर अलग कर दिया। शिशुपाल ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए जरासंध से संधि कर रखी थी। जरासंध के साथ मिलकर उसने श्रीकृष्ण पर कई हमले किए थे।
3.दुर्योधन : भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा का हरण करके विवाह किया था। दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण का समधी था। ऐसे कई मौके आए जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को शक्तिसंपन्न होने से रोक दिया। हालांकि दुर्योधन श्रीकृष्ण का शत्रु होने के बावजूद उनसे मित्रता रखता था। लेकिन उसने श्रीकृष्ण की मित्रता को उतना महत्व नहीं दिया जितना की कर्ण की मित्रता को दिया।
दुर्योधन ने तीन गलतियां की थी। पहली यह कि उसने श्रीकृष्क्ष की जगह उनकी नारायणी सेना का चयन किया। दूसरी यह कि अपनी माता के लाख कहने पर भी वह उनके सामने पेड़ के पत्तों से बना लंगोट पहनकर गया। तीसरी यह कि तीसरी और अंतीम गलती उसने की थी वो थी युद्ध में आखिर में जाने की भूल। यदि वह पहले ही जाता तो कई बातों को समझ सकता था और शायद उसके भाई और मित्रों की जान बच जाती। लेकिन श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से कहा कि 'तुम्हारी हार का मुख्य कारण तुम्हारा अधर्मी व्यवहार और अपनी ही कुलवधू का वस्त्राहरण करवाना था। तुमने स्वतयं अपने कर्मों से अपना भाग्य लिखा।'
4.कर्ण : कुंति पुत्र कर्ण एक महान योद्ध था जो कौरवों की ओर से लड़ा था। कुंती श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन और भगवान कृष्ण की बुआ थीं। कुंति का पुत्र होने के कारण कर्ण भगवान श्री कृष्ण का भाई था। कृष्ण के कारण ही कर्ण को अपने कवच और कुंडलों को इंद्र को दान देने पड़े थे। युद्ध के सत्रहवें दिन शल्य को कर्ण का सारथी बनाया गया। उस दिन कर्ण तथा अर्जुन के मध्य भयंकर युद्ध होता है। युद्ध के दौरान श्री कृष्ण अपने रथ को उस ओर ले जाते हैं जहां पास में ही दलदल होता है। कर्ण का सारथ यह देख नहीं बाता है और उसके रथ का एक पहिया दलदल में फंस जाता है।
रथ के फंसे हुए पहिये को कर्ण निकालने का प्रयास करते हैं। इसी मौके का लाभ उठाने के लिए श्रीकृष्ण अर्जुन से तीर चलाने को कहते हैं। बड़े ही बेमन से अर्जुन असहाय अवस्था में कर्ण का वध कर देता है। इसके बाद कौरव अपना उत्साह हार बैठते हैं। उनका मनोबल टूट जाता है। फिर शल्य प्रधान सेनापति बनाए जाते हैं, परंतु उनको भी युधिष्ठिर दिन के अंत में मार देते हैं। श्री कृष्ण ने अर्जुन को बचाने के लिए कई उपक्रम किए थे।
5.मित्रवन्दा : अवन्ती के राजा थे विन्द और अनुविन्द। उनकी बहिन मित्रविन्दा ने स्वयंवर में श्रीकृष्ण को ही अपना पति बनाना चाहा लेकिन उनके भाइयों ने रोक दिया, क्योंकि वे दुर्योधन के वशवर्ती तथा अनुयायी थे। वे चाहते थे कि उनकी बहिन का विवाह दुर्योधन से ही हो। मित्रविन्द श्रीकृष्ण की बुआराज्याधिदेवी की कन्या थी। राज्याधिदेवी की बहिन कुंति थी। इसका मतलब यह कि मित्रविन्दा श्रीकृष्ण की बहिन थी। भगवान श्रीकृष्ण राजाओं की भरी सभा में मित्रविन्दा का हरण कर ले गए। इस दौरान बलराम और श्रीकृष्ण को मित्रवन्दा के भाइयों से युद्ध भी करना पड़ा था।
6.रुक्म : महाभारत के अनुसार विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी के 5 भाई थे- रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली। रुक्मिणी श्रीकृष्ण से विवाह करना चाहती थी लेकिन उसके भाई उसका विवाह शिशुपाल से करना चाहते थे। शिशुपाल का गहरा मित्र था रुक्म। रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो।
रुक्म ने माता-पिता के विरोध के बावजूद अपनी बहन का शिशुपाल के साथ रिश्ता तय कर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं। रुक्मिणी को जब इस बात का पता लगा, तो वह बड़ी दुखी हुई। उसने अपना निश्चय प्रकट करने के लिए एक ब्राह्मण को द्वारिका श्रीकृष्ण के पास भेजा। अंतत: रुक्म और शिशुपाल के विरोध के कारण ही श्रीकृष्ण को रुक्मिणी का हरण कर उनसे विवाह करना पड़ा। श्री कृष्ण को इस दौरान रुक्मी से युद्ध भी करना पड़ा था।
नजरिया / शौर्यपथ / प्रेमचंद को कैसे पढ़ें? यह सवाल इसलिए जरूरी है कि प्रेमचंद को पढ़ने की इतनी दृष्टियां, विचार और उठा-पटक है कि इन सबके बीच मूल प्रेमचंद छिप से जाते हैं। जब से प्रेमचंद ने लिखना शुरू किया, विवाद उनके पीछे लगे रहे। कोई कहेगा कि ग्राम जीवन तो ठीक, शहरी जीवन प्रेमचंद से नहीं सधता। कोई कहेगा, समाज का बाहरी स्वरूप तो है, मन की जटिलताओं की समझ नहीं है। कोई कहेगा, स्त्री मन की समझ नहीं है। उन पर बहुतेरे हमले भी हुए, मगर यह तय है कि शताब्दियों से जिनका जीवन व संघर्ष साहित्य से बहिष्कृत था, उन्हें वह साहित्य के दायरे में ले आए। साहित्य के परिसर में सूरदास, होरी, धनिया, दुक्खी, मंगल, गंगी, घीसू, माधो जैसे पात्रों का दाखिला हुआ और उनके जीवन की कहानी कही जाने लगी। साहित्य में पहले से जड़ जमाए लोगों की जमीन सरकनी शुरू हुई, तो उन पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगा, मुकदमे हुए। उन्हें घृणा का प्रचारक कहा गया। जब गोरखपुर में गांधी का आगमन हुआ, तब प्रेमचंद सुनने गए और लौटकर थोडे़ दिन में सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। गांधी व उनके आंदोलन के प्रति सहानुभूति थी, लिहाजा प्रेमचंद का एक गांधीवादी पाठ तैयार हुआ। उन्हें गांधीवाद के दायरे में पढ़ने का नजरिया सामने आया।
मृत्यु के थोड़े दिनों पहले प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता की। प्रगतिशील धारा ने उन्हें अपने गोल में शामिल मान लिया और उनका प्रगतिशील पाठ सामने आया। प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने साहित्य का उद्देश्य शीर्षक व्याख्यान दिया था, जिसे प्रगतिशीलता के घोषणापत्र का दर्जा मिला। पर इसी व्याख्यान में उनके कथन ‘लेखक स्वभावत: प्रगतिशील होता है’, के हवाले से उन्हें प्रगतिशील खेमे से बाहर दिखाने की कोशिशें होती रहीं और प्रेमचंद का हिंदू पाठ भी तैयार हुआ। इसी क्रम में दलित आंदोलन आया और उसने प्रेमचंद को दलित विरोधी करार दिया। इन तमाम बातों के बावजूद समाज में उनकी मौजूदगी बदस्तूर बनी हुई है। जो उनसे प्यार करते हैं, वे पंथ-वाद के पचडे़ में नहीं पड़ते।
यहां दिलचस्प सवाल है, वह सूत्र क्या है, जिससे प्रेमचंद इतने महबूब लेखक बने हुए हैं? यहां मेरे ध्यान में दो निबंध आते हैं। एक लेख कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का है, मेरी मां ने मुझे प्रेमचंद का भक्त बनाया और दूसरा लेख व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का है, प्रेमचंद के फटे जूते। इन दोनों लेखकों को प्रेमचंद पर लिखने की प्रेरणा उनका फोटो देखकर हुई थी। परसाई लिखते हैं, ‘प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फोटो खिंचा रहे हैं। ...दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है, जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है। ...सोचता हूं, फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी?’
अब मुक्तिबोध का बयान सुन लीजिए, ‘प्रेमचंद और प्रसाद, दोनों खड़े हैं।... जूते की कैद से बाहर निकलकर अंगुलियां बड़े मजे से मैदान की हवा खा रही हैं। फोटो खिंचवाते वक्त प्रेमचंद अपने विन्यास से बेखबर हैं। उन्हें तो इस बात की खुशी है कि वह प्रसाद के साथ खड़े हैं, और फोटो निकलवा रहे हैं’। यानी दोनों लेखकों को प्रेमचंद की सहजता आकृष्ट करती है। दोनों ने प्रेमचंद का जो चित्र खींचा है, वह आम भारतीय का ही चित्र है। प्रेमचंद की असाधारणता का स्रोत वास्तव में उनकी साधारणता में है। मुक्तिबोध लिखते हैं, ‘मेरी मां सामाजिक उत्पीड़नों के विरुद्ध क्षोभ और विद्रोह से भरी हुई थीं। ...वह स्वयं उत्पीड़ित थीं। और भावना द्वारा, स्वयं की जीवन-अनुभूति द्वारा, मां स्वयं प्रेमचंद के पात्रों में अपनी गणना कर लिया करती थीं’। मां के जरिए ही मुक्तिबोध को प्रेमचंद मिलते हैं।
दूसरी तरफ परसाई हैं, जो प्रेमचंद से पूछ बैठते हैं, ‘चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया?’ फिर इस सवाल का उत्तर भी देते हैं, ‘मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज, जो परत-पर-परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया’। परसाई इशारा करते हैं कि प्रेमचंद समाज में मौजूद बहुत से पत्थरों पर प्रहार करते हैं। इसलिए प्रेमचंद उन लोगों की पहली पसंद हैं, जिनकी राह में ठोकर मौजूद हैं। ऐसे लोग उन्हें अपना हमसफर पाते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) सदानंद शाही , प्रोफेसर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
