September 08, 2026
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    ओपिनियन / शौर्यपथ /पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी से आती खबरें सुखद हैं। चीन की सेना कई वजहों से पीछे लौटने को मजबूर हुई है। पहला कारण तो निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल है। उन्होंने हालात से निपटने के लिए दोतरफा रणनीति अपनाई। एक तरफ, उन्होंने सेना का मनोबल बढ़ाया और उसके लिए आधुनिक साजो-सामान जुटाए, तो वहीं दूसरी तरफ, लेह-लद्दाख जाकर पड़ोसी देश को यह संदेश दिया कि शीर्ष स्तर पर बनी सहमति जमीन पर उतारी जाए, तो वह दोस्ती के लिए भी तैयार हैं। इसके बाद ही अजीत डोभाल को सक्रिय किया गया, जो चीन के मामलों में प्रधानमंत्री के निजी प्रतिनिधि रहे हैं।
    यह सही है कि कई बार युद्ध आवश्यक हो जाता है, पर किसी भी राष्ट्र के लिए यह एकमात्र विकल्प नहीं होना चाहिए। इससे बचने के लिए अपनी आंतरिक शक्तियों को मजबूत करना आवश्यक है। भारत ने भी यही किया। हमने आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाए, साथ ही वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपना योगदान बढ़ाना शुरू किया। एक बड़ा उपभोक्ता बाजार हमारे हित में है ही। लिहाजा, चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने की शुरुआत हुई। फिर तो, अन्य देश भी खुलकर हमारे साथ आ गए और बीजिंग की आलोचना करने लगे, जबकि शुरुआत में इन देशों ने 20 भारतीय सैनिकों के बलिदान पर महज शोक जताया था।
    हालांकि, चीनी नेतृत्व की भी तारीफ करनी चाहिए। उसने सही समय पर अपने कदम पीछे खींचे हैं। बीजिंग ने यह फैसला तब किया, जब वहां का मीडिया बार-बार 1962 के संघर्ष की याद दिला रहा था और कूटनीतिज्ञ पाकिस्तान और नेपाल के रास्ते नई दिल्ली को घेरने की रणनीति बनाने में मशगूल थे। मगर भारत सरकार ने आपसी मतभेद खत्म कराने में आखिरकार सफलता हासिल कर ली।
    अब सवाल यह है कि आगे की क्या रणनीति बनाई जाए? एक आशंका यह भी है कि कहीं 1962 तो नहीं दोहराया जा रहा, क्योंकि उस वर्ष भी पीछे लौटकर चीन ने हम पर हमला बोला था? मगर मैं इससे इत्तफाक नहीं रखता। हमने इस बार चीन की आंखों में आंखें डालकर उसे पीछे हटने को मजबूर किया है। फिर भी, हमें सजग और सावधान रहना होगा।
    हमारा फायदा इसी में है कि सेना को बैरकों में रहने दिया जाए। सीमा पर बेवजह की उसकी तैनाती भय का माहौल बनाएगी। मगर इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास-कार्य रोक दिए जाएं। वहां न सिर्फ बुनियादी ढांचे का निर्माण और आर्थिक विकास जरूरी है, बल्कि स्थानीय लोगों को भावनात्मक और आर्थिक रूप से शेष भारत से जोड़ना भी आवश्यक है। इस बाबत पहले की सरकारों ने उचित प्रयास नहीं किए, जिसके कारण हमारे कई क्षेत्रों पर पड़ोसी देशों का कब्जा है। इससे वैश्विक मंचों पर गलत संदेश जाता है। हमारी सदाशयता हमारी कमजोरी समझ ली गई है।
    ऐसे संदेश कितने खतरनाक होते हैं, इसका पता पहले और दूसरे विश्व युद्ध से चलता है। इन दोनों महासमर की शुरुआत तब हुई, जब एक पक्ष को दूसरा कमजोर महसूस होने लगा। जब ऐसी सोच हावी हो जाती है, तो फिर संघर्ष स्वाभाविक तौर पर पैदा हो जाता है। ईरान-इराक युद्ध का भी यही संदेश है। अच्छी बात है कि इस बार भारत धारणा की जंग में मजबूत होकर उभरा है। पिछले पांच-छह वर्षों में हमने न सिर्फ पड़ोसी देशों के तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास-कार्य किए हैं, बल्कि उनकी उकसाने वाली कार्रवाइयों को उसी की भाषा में जवाब भी दिया है।
    मौजूदा तनातनी का अंत एक नई उम्मीद को जन्म दे रहा है। हम बीजिंग को यह एहसास दिलाने में सफल हुए हैं कि विश्व के आर्थिक विकास में अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटना उचित नहीं। एशिया की शांति भी हमारी दोस्ती पर ही निर्भर है। इसमें हम कितना सफल हो पाते हैं, इसका जवाब तो आने वाले दिनों में मिलेगा, पर विश्व में सकारात्मक योगदान की हमारी उम्मीदें कुछ जरूरी काम करने के बाद पूरी हो सकती हैं।
    इसमें सबसे पहला काम तो सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी बढ़ाना है। इसके लिए वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर, यानी बुनियादी ढांचे का निर्माण जरूरी है। आंतरिक ताकतों को मजबूत किए बिना हम बाहरी शक्तियों का मुकाबला नहीं कर सकते। दूसरा, हमें आतंकवाद के खिलाफ तमाम देशों को एक करना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है, ताकि पाकिस्तान जैसे आतंकवाद के मददगार देश किसी अन्य राष्ट्र द्वारा इस्तेमाल न हो सकें। तीसरा काम है, चीन की विस्तारवादी नीतियों का विरोध। बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) में शामिल न होकर भारत ने इसकी शुरुआत पहले ही कर दी है। चौथा, पड़ोसी देशों के साथ चीन के व्यवहार का मूल्यांकन। दरअसल, दक्षिण चीन सागर सहित चीन का कई राष्ट्रों के साथ सीमा विवाद है। हांगकांग का मसला भी काफी गंभीर है। चीन का इन देशों के प्रति बदलता रुख हमें कई संदेश दे सकता है। अगर बदलाव सकारात्मक आते हैं, तो यह माना जा सकता है कि चीन का नेतृत्व नई सोच का हिमायती है। और अगर ऐसा नहीं होता, तो हमें सावधान रहना होगा, क्योंकि गलवान घाटी में पीछे हटना चीन का छलावा भी हो सकता है।
    चीन के भीतरी हालात पर भी हमें नजर रखनी होगी। ऐसी चर्चा गरम है कि बीजिंग के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व में मतभेद गहरा रहे हैं। चीन बेशक कम्युनिस्ट समाज है, पर वहां कन्फ्यूशियसवाद हावी है। इस तरह के समाज में अच्छे काम करने वालों की तारीफ होती है, तो विफल होने पर उसकी जमकर लानत-मलामत भी की जाती है। लिहाजा, अपनी छवि चमकाने के लिए सियासी और सैन्य नेतृत्व अलग-अलग राह पकड़ सकते हैं। जरूरी यह भी है कि हम भी अपने आंतरिक मतभेदों से ऊपर उठें। पहले पाकिस्तान जैसे देश हमारे मनमुटावों का फायदा उठाते थे, अब बीजिंग इससे लाभ कमाना चाहता है। उसे यह मौका नहीं मिलना चाहिए।
    इसमें आत्मनिर्भरता की नीति हमारे लिए काफी कारगर साबित हो सकती है, मगर इसे लेकर हमें संकीर्ण नजरिया नहीं रखना चाहिए। हमारी आत्मनिर्भरता संरक्षणवाद का पोषक नहीं बननी चाहिए। ऐसी नीति हमारी कई कमजोरियों को बेपरदा कर सकती है। इससे हम पर कई तरह के दबाव बनने लगेंगे, जिनसे हमारे हितों को चोट पहुंच सकती है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)शशांक, पूर्व विदेश सचिव

     

    भिलाई / शौर्यपथ /  छत्तीसगढ़ प्रदेश को हरियालीयुक्त एवं प्रदूषणमुक्त करने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के आव्हान पर बीएसपी एंसीलरी इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ने सोमवार 6 जुलाई को औद्योगिक क्षेत्र स्थित भिलाई इंजीनियरिंग वक्र्स के सामने वृक्षारोपण किया. इस अवसर पर जिला उद्योग केंद्र के अधिकारियों सहित एसोसिएशन के संरक्षक,पदाधिकारी एवं उद्योगपति काफी संख्या में उपस्थित थे. वृक्षारोपण अभियान की शुरुआत जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक राजीव शुक्ला एवं वरिष्ठ उद्योगपति सुरेंद्र सिंह कैम्बो ने पेड़ लगाकर की. इसके पश्चात एसोसिएशन के संरक्षक के. के. झा एवं अध्यक्ष अरविंदर सिंह खुराना ने पेड़ लगाया. तत्पश्चात एसोसिएशन के सभी पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने एक एक पेड़ लगाया.
    वृक्षारोपण पश्चात मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक राजीव शुक्ला ने एसोसिएशन के इस अभियान की प्रशंसा की. उन्होंने कहा कि प्रदेश के मुखिया भूपेश बघेल ने एक घर एक पेड़ का जो आह्वान किया है इसकी शुरुआत आप लोगों ने की है यह काफी सराहनीय है. वृक्षारोपण के साथ-साथ उन्होंने उद्योगपतियों से वाटर हार्वेस्टिंग को भी गंभीरता से लेने कहा।  एसोसिएशन के अध्यक्ष  खुराना ने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जो आह्वान किया है उसकी सफलता के लिए हमने वृक्षारोपण का अभियान आज से शुरू कर दिया है. यह अभियान आने वाले एक-दो महीने तक चलता रहेगा. हमारे एसोसिएशन के हर एक पदाधिकारी एवं सदस्य अपने घरों एवं अपने उद्योगों में पेड़ लगाएंगे.
     एसोसिएशन के संरक्षक  झा ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ को पूरे देश में प्रदूषणमुक्त, प्रथम राज्य बनाने का संकल्प लिया है. उस अभियान की शुरुआत आज से हमने कर दी है. हम संकल्पित हैं कि औद्योगिक क्षेत्र के हर एक उद्योग में कम से कम 5 पौधे लगाए जाएंगे. अन्य संस्थानों को भी पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. यह मुहिम अब रुकेगी नहीं, चलती ही रहेगी. वाटर हार्वेस्टिंग का जिक्र करते हुए श्री झा ने कहा कि यह जानकर सभी को खुशी होगी कि छत्तीसगढ़ प्रदेश का वाटर लेवल पिछले वर्ष की तुलना में 3 मीटर ऊपर आ गया है. हमारे थोड़े प्रयास की और जरूरत है।
     इस अवसर पर जिला उद्योग केंद्र से  चौरसिया, संजय सिंह उपस्थित थे. वहीं एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ सदस्य सुरेंद्र सिंह कैम्बो, महासचिव व्यास शुक्ला, कोषाध्यक्ष विजय अग्रवाल,चमन लाल बंसल, जे.के. जैन, मयूर कुकरेजा, भगवान अग्रवाल, रामचंद्र स्वामी, देशराज यादव, रविशंकर मिश्रा, जितेंद्र पाल सिंह, राजा संधू, अनिल शुक्ला, गुरु लाल सिंह विरदी, कमलजीत सिंह विरदी, गगनप्रीत सिंह मथारू, राजीव कुमार, राजेश खंडेलवाल, शशि भूषण सहित सैकड़ों की संख्या में उद्योगपति उपस्थित थे.
    भिलाई / शौर्यपथ / भूतपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पुण्यतिथि पर 8 जुलाई को श्रद्धांजलि सभा व वैचारिक गोष्ठी का आयोजन भारतरत्न लोकनायक जयप्रकाश नारायण स्मारक प्रतिष्ठान,आचार्य नरेंद्र देव स्मृति जन अधिकार अभियान समिति एवं चंद्रशेखर फाउंडेशन की ओर से संयुक्त रूप से किया गया है। 
    कार्यक्रम के संयोजक आर पी शर्मा ने बताया कि दिवंगत प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की 13 वीं पुण्यतिथि पर सुबह 9:30 बजे श्रद्धांजलि दी जाएगी। इसके उपरांत वैचारिक गोष्ठी रखी गई है। जिसका विषय 'Óवर्तमान महामारी का दौर और राजनीति व्यवस्था पर श्रद्धेय चंद्रशेखरजी की प्रासंगिकताÓÓ रखा गया है। यह कार्यक्रम भारतरत्न लोकनायक जयप्रकाश नारायण स्मारक प्रतिष्ठान, एचएससीएल कालोनी, रूआबांधा में होगा। सभी आगंतुकों से कोरोना गाइड लाइन का पालन करते हुए मास्क सहित आने व समान दूरी बरतने की अपील की गई है। 

    शौर्यपथ। सेहत । दुनिया में कोरोनावायरस के मामले 60 लाख को पार कर चुके हैं. तमाम बड़े देश परेशान हैं कि किस तरह इस संक्रमण को रोका जाए. इस बीच हार्वर्ड ने एक स्टडी रिपोर्ट जारी की है. इसमें कहा गया है कि सेक्स के दौरान कपल्स को फेस मास्क पहनना चाहिए. स्टडी में कहा गया है कि अगर कोई कपल मास्क पहनकर सेक्स करता है तो इससे कोरोना वायरस एक-दूसरे को ट्रांसमिट करने का खतरा काफी कम हो जाता है. हार्वर्ड की स्टडी ये स्टडी Annals of Internal Medicine जर्नल में छपी है. इसमें सेक्स के दौरान मास्क के अलावा और भी कई तरह की सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है. सेक्स के दौरान सावधानियां स्टडी में कहा गया है कि सेक्स के दौरान फेस मास्क पहनें. सेक्स से पहले और बाद में जरूर नहाएं. इस दौरान जहां भी आप संपर्क में रहे हैं, उन जगहों को साबुन या अल्कोहल वाइप्स से साफ करें. यानी सेनेटाइज जरूर करें.आपको जानकर हैरानी होगी कि स्टडी में कहा गया है कि अगर आप कोरोना से बचना चाहते हैं तो सबसे सुरक्षित ये होगा कि इस समय सेक्स ना करें. मास्टरबेशन को लो-रिस्क बताया गया है.(एजेंसी)

    शौर्यपथ । सेहत ।पिछले कुछ सालों में लोग मोबाइल फोन, इंटरनेट के इतना समय बिताने लगे हैं क‍ि उनकी द‍िनचर्या में भी बदलाव आ गए हैं. जीवनशैली पर तो इनका असर हुआ ही है, अब एक र‍िसर्च में कहा गया है क‍ि इन चीजों के अत्‍यधिक प्रयोग का असर सेक्‍स लाइफ (Sex Life) पर भी द‍िखने लगा है. र‍िसर्च में दावा ये र‍िसर्च क‍िया गया अमेरिका में. इसमें दावा किया गया है कि पुरुषों में सेक्‍स ड्राइव पहले की अपेक्षा कम हो रही है. इस तरह के व्‍यवहार का प्रमुख कारण गेमिंग, सोशल मीडिया, मोबाइल, इंटरनेट को बताया गया है. चौंकाने वाले खुलासे रिसर्च में सेक्‍स और सेक्‍स की इच्‍छा को लेकर कई तरह के सवाल लोगों से कि‍ए गए. र‍िपोर्ट में पता चला क‍ि साल 2000 के बाद से अमेरिकी युवाओं में सेक्स को लेकर द‍िलचस्‍पी काफी कम हुई है. र‍िसर्च को जामा नेटवर्क ओपन जर्नल में प्रकाशित किया गया है. यौन निष्क्रियता बढ़ी रिसर्च में 25-34 साल के पुरुषों और महिलाओं के बीच यौन निष्क्रियता भी बढ़ रही है. कई लोगों ने कहा क‍ि प‍िछले एक साल से उन्‍होंने किसी से शारीर‍िक संबंध स्‍थापित नहीं क‍िए हैं. सोशल मीडिया है वजह व‍िशेषज्ञ कह रहे हैं क‍ि अब लोगों के पास रात में करने को कई और काम हैं. वे सेक्स को छोड़कर सोशल मीडिया, इंटरनेट पर अधि‍क समय बि‍ताते हैं. गेमिंग का क्रेज भी इसकी एक प्रमुख वजह है. रिसर्च में इस बात का भी अंदेशा जताया गया है क‍ि कोरोनावायरस जैसी महामारी के कारण लोगों में सेक्स को लेकर अनिच्छा और ज्यादा बढ़ सकती है.(एजेंसी )

    लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / ऐसे कई फूड है जिन्हें एक पूरी रात भिगोकर रखने के बाद, अगले दिन खाना अपेक्षाकृत अधिक फायदेमंद होता है। क्योंकि अंकुरित होने के बाद उनकी नुट्रिशन वैल्यू बढ़ जाती है, साथ ही ये आसानी से पच जाते है जो सेहत के लिए अच्छा है। हम आपको बता रहे हैं ऐसी ही 8 चीजों के बारे में जिन्हें रातभर भिगोकर खाना आपकी इम्यूनिटी को मजबूत करने में सहायक होगा -
    1 मेथीदाना -

    इनमें फाइबर्स भरपूर मात्रा में होते हैं जो कब्ज को दूर कर आंतों को साफ रखने में मदद करते हैं। डायबिटीज के रोगियों के लिए भी मेथीदाने फायदेमंद हैं। साथ ही इनका सेवन महिलाओं में पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द को भी कम करता हैं।

    2 खसखस -

    ये फोलेट, थियामिन और पैंटोथेनिक एसिड का अच्छा सोर्स होता हैं। इसमें मौजूद विटामिन बी मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है जिससे वजन को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
    3 अलसी -

    अलसी या फ्लैक्स सीड्स ओमेगा-3 फैटी एसिड का एकमात्र शाकाहारी सोर्स माना जाता हैं। अलसी का सेवन बैड कोलेस्ट्रॉल को घटाकर हमारे दिल को भी हेल्दी रखता हैं।

    4 मुनक्का -

    इसमें मैग्नीशियम, पोटेशियम और आयरन काफी मात्रा में होते हैं। मुनक्के का नियमित सेवन कैंसर कोशिकाओं में बढ़ोतरी को रोकता है। इससे हमारी स्किन भी हेल्दी और चमकदार रहती है। एनीमिया और किडनी स्टोन के मरीजों के लिए भी मुनक्का फायदेमंद है।
    5 खड़े मूंग -

    इनमें प्रोटीन, फाइबर और विटामिन बी भरपूर मात्रा में होता है। इनका नियमित सेवन कब्ज दूर करने में बहुत फायदेमंद होता है। इसमें पोटेशियम और मैग्नेशियम भी भरपूर मात्रा में होने की वजह से डॉक्टरस हाई बीपी के मरीजों को इसे रेगुलर खाने की सलाह देते है।

    6 काले चने -

    इनमें फाइबर्स और प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा होती हैं जो कब्ज दूर करने में सहायक होते है।
    7 बादाम -

    इसमें मैग्नीशियम होता है जो हाई बीपी के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि नियमित रूप से भीगी हुई बादाम खाने से खराब कोलेस्ट्रॉल का लेवल कम हो जाता है।

    8 किशमिश -

    किशमिश में आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में होते हैं। भीगी हुई किशमिश को नियमित रूप से खाने से स्किन हेल्दी और चमकदार बनती है। साथ ही शरीर में आयरन की कमी भी दूर होती है।

     

    सेहत / शौर्यपथ / खाना खाने के फायदे तो आपको पता होंगे, लेकिन खाना चबाने के यह फायदे आप नहीं जानते होंगे। लेकिन ठीक तरीके से खाना चबाने के यह फायदे, आपको जरूर पता होने चाहिए...

    1 खाना खाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसे ठीक तरीके से चबाना। अच्छी तरह चबा-चबाकर खाने से आप कम खाते हैं और आपका पेट भी जल्दी भर जाता है।

    2 जब आप चबा-चबाकर खाते हैं तो आपका पाचन तंत्र, पाचन के लिए खुद को तैयार करता है। इस तरह से आप जितना चबा-चबाकर खाते हैं, उतना ही बेहतर आपका पाचनतंत्र काम करता है।

    3 ठीक तरीके से चबाते हुए भोजन करने से, भोजन कई टुकड़ों में बंटकर सलाईवा के साथ मिलकर, बेहतर पाचन के लिए तैयार हो जाता है। वहीं अच्छी तरह से न चबाने पर ठीक से पाचन नहीं होता।

    4 अच्छी तरह चबाकर खाने का एक फायदा यह भी है, कि आप भोजन का ठीक तरह से स्वाद ले पाते हैं और देर तक उसका आनंद भी उठा सकते हैं।

    5 धीरे-धरे चबाकर खाने पर आपके शरीर को जरूरी हार्मोन स्त्रवण के लिए काफी समय मिल जाता है, जैसे लेप्टिन, ग्रेलिन आदि। इनका पाचन क्रिया में अहम योगदान है।

    खाना खजाना / शौर्यपथ / मूंग की दाल की कचौड़ी तो आपने खाई ही होगी। आज हम आपको मूंग चीज कचौड़ी बनाना बता रहे हैं। ये खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होती है। इसे आप आसानी से घर में बना सकते हैं।

    सामग्री :

    गेहूं का आटा- 1/2 कप

    मैदा- 1/2 कप

    ओट्स- 1/4 कप

    तेल- 2 चम्मच

    नमक- स्वादानुसार

    मसाले के लिए

    अंकुरित मूंग उबली हुई- 1 कप

    उबली हुई शकरकंदी- 1/2 कप

    मोजरेला चीज- 1/4 कप

    नमक- स्वादानुसार

    चिली फ्लेक्स-1 छोटा चम्मच

    मिक्स्ड हब्र्स- 1 छोटा चम्मच

    तेल- तलने के लिए


    विधि :
    मूंग चीज कचौड़ी बनाने के लिए सबसे पहले कचौड़ी के आटे की सभी चीज गेहूं का आटा, मैदा, ओट्स, नमक और तेल मिलाकर गूंद लीजिए। अंकुरित मूंग, शकरकंदी, चिली फ्लेक्स, मिक्स हब्र्स और नमक डालकर मिक्स करें और बॉल्स बनाए। बॉल्स के बीच में थोड़ा-सा मोजरेला चीज भी डालें। आटे से मीडियम आकार की पूरी बेल लें। बीच में स्र्टंफग बॉल्स रखकर चारों कोनों को सील कर कचौड़ी का आकार दें। कड़ाही में तेल गर्म करें और कचौड़ी को सुनहरा होने तक दोनों ओर से तल लें। धनिया-पुदीना की चटनी के साथ पेश करें।

    मेरी कहानी / शौर्यपथ / उस पढ़ाई को छूट जाना था, जिसमें कामयाबी दूर-दूर तक नहीं दिख रही थी। मैट्रिक में दो बार फेल होकर समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे पास हुआ जाए? मन पढ़ाई में कैसे रमाया जाए? मन इतना चंचल था कि जिधर आवाज होती, उधर भाग लेता और एक बार भाग जाता, तो उसे लौटाने में बहुत जोर आता। अपनी पढ़ाई बोझिल और दुनिया के अन्य तमाम विषय दिलचस्प लगते थे। ले-देकर गणित की किताबों में मन ठहरता था, क्योंकि वहां डोर सुलझी हुई थी। एक बार तरीका पता चल गया, तो प्रश्न हल करते बढ़ते चलो, पर बाकी विषय पहाड़ थे। काश! एक ही विषय की परीक्षा होती, तो सफलता कदम चूमती, लेकिन यहां अनेक विषय मिलकर गणित की कमाई पर पानी फेर देते थे। छवि बन गई थी कि इस लड़के का मन पढ़ाई में नहीं लगता, गांव से शहर गया, लेकिन वहां भी फेल!
    ऊपर से भाग्य ने भी पीठ दिखा दी, असमय ही पिता का साया उठ गया। गांव लौटना पड़ा। उम्र में 18वां साल लग चुका था और दिखने लगा था कि अब आगे की पढ़ाई पर पूर्ण विराम लग जाएगा। शहर में रहने, आने-जाने और परीक्षा फीस इत्यादि का बोझ भारी था। ये ऐसे बड़े खर्चे थे, जिनके सामने घुटने टेक देना तय लग रहा था। पर एक दिन मां अपना पूरा उत्साह समेटे सामने आ खड़ी हुई, ‘चल, बांध अपना सामान। परीक्षा के दिन आ रहे हैं, इस बार तुझे सफल होना ही है’।
    बेटा स्तब्ध था। मां ने आंचल से रुपये निकाले और बेटे की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘ले तेरी यात्रा का खर्च और परीक्षा की फीस’।
    सवाल वाजिब था, ‘अम्मा, कहां से आए पैसे?’
    मां ने अपने को समेटते हुए नजरें झुकाए कहा, ‘मैंने अपने बचे हुए गहने बेच दिए, तेरी पढ़ाई सबसे जरूरी है’।
    पिता के गुजर जाने के बाद टूटी हुई मां की सूनी आंखों में झांकते हुए बेटा भाव में बह चला। उसके दो बार फेल होने के बावजूद मां का विश्वास कायम है। वह अपनी सबसे गाढ़ी पूंजी बेटे की पढ़ाई पर लगा रही है। मां का यह रूप देख बेटा मानो हठात् नींद से जाग गया। वह ऐसी प्यारी मां की उम्मीद को दो बार से तोड़ रहा है और अब भी उलझनें इतनी हैं कि तीसरी बार भी तोड़ने की तैयारी लगती है। मां अपने जेवर बेचकर खड़ी है कि बेटा पास कर जाए, आगे पढ़ाई करके कुछ बन जाए और बेटा है कि अपने मन को काबू में नहीं रख सकता। जहां पूरी जिंदगी दांव पर लगी हो, वहां एक परीक्षा परेशान कर रही है? बेटे का मन धिक्कार उठा। कुछ पल की भाव-प्रबल खामोशी के बाद मन ने ठान लिया और बोल पड़ा, ‘अम्मा, मुझे नाम कमाना होगा, तभी मेरा जीवन सार्थक होगा।’
    बेटे की अच्छी पढ़ाई के लिए मां का समर्पण नया नहीं था। अब बेटे की समझ में आ रहा था कि कैसे वह घर से भाग रहा था। पांच साल पहले, दूर काशी पहुंचकर केले बेच पैसे कमाने की योजना थी। स्कूल से लौटने में देरी हुई, तो मां खोज में दौड़ पड़ी थी और भागते बेटे को पकड़ लाई थी और समझाया था कि गरीबी से मत घबरा, सिर्फ पढ़ाई से मन लगा। तब बात बेटे की समझ में नहीं आई थी, पर जब मां ने अपने गहने बेच दिए, तब बेटे का हौसला इतना फौलादी हो गया कि जिंदगी में कभी फेल होने या कभी हारने की गुंजाइश ही नहीं बची। कामयाबी का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मैट्रिक और उसके बाद मेडिकल कॉलेज, लेकिन दुर्भाग्य ने भी पीछा नहीं छोड़ा। उष्णकटिबंधीय स्पू्र नामक छोटी आंत में होने वाली बीमारी की वजह से पहले बडे़ भाई और फिर छोटे भाई की जान गई। दृढ़ता और बढ़ी कि मेडिकल की पढ़ाई और शोध के जरिए इस बीमारी का इलाज खोजना है। भारत में रिसर्च की सुविधा नहीं थी। विदेश जाना मजबूरी थी। 1923 में मां के लाल येल्लाप्रगडा सुब्बाराव निकल चले कुछ कर गुजरने।
    अमेरिका में जहां एक ओर संघर्ष का कारवां था, वहीं दूसरी ओर था, उपलब्धियों का चमकदार सिलसिला। पहले फोलिक एसिड, एंटी-फोलिक एसिड, एटीपी-एनर्जी फॉर लाइफ, फोसफॉस मैथड, फिलारियासिस, विटामिन बी12 इत्यादि अनेक आधारभूत उपलब्धियों को सुब्बाराव (1895-1948) ने अंजाम दिया। प्रचार से हमेशा दूर रहने वाले संकोची सुब्बाराव 25 वर्ष लगातार अमेरिका में विज्ञान की सेवा करते रहे। भाइयों को जो रोग दुनिया से ले गया था, उसके इलाज की खोज के साथ ही कैंसर के इलाज- कीमोथेरेपी की भी बुनियाद सुब्बाराव के खाते में दर्ज है। वह भारत लौटने का सपना संजोए महज 53 की उम्र में दुनिया से चले गए। उनके निधन के बाद एक अखबार ने लिखा, ‘वह सदी के सबसे प्रख्यात चिकित्सा दिमागों में से एक थे’, तो किसी ने भारत मां के उस लाल को सम्मान से नवाजते हुए दर्ज किया, ‘बौनों के बीच कद्दावर’।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याययेल्लाप्रगडा सुब्बाराव, प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक

     

    जीना इसी का नाम है /शौर्यपथ/ मैंने अपनी पूरी जिंदगी अफसरों के दरवाजे खोले। मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चों के लिए भी कोई दरवाजे खोले। वे भी इस मुकाम तक पहुंचें। वे भी अफसर बनें।- ये अल्फाज उस पिता के थे, जिनके पास अपने बच्चों की फीस भरने तक के पूरे पैसे न थे, मगर लायक बेटी ने इस अल्फाज के हर हर्फ पर अपना ईमान रख दिया। और आज वह पाकिस्तानी ईसाई समुदाय की पहली सीएसएस हैं। यानी देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा की अफसर- राबेल केनेडी!
    सियालकोट के जॉन केनेडी का यह ख्वाब कितना दुस्साहसिक था, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता था। अव्वल तो वह मसीह बिरादरी, यानी अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं और फिर उनकी नौकरी भी ऐसी थी कि उससे घर के ही सारे खर्च पूरे न हों। मगर सपने ऊंचे न देखे जाएं, तो नजीर कैसे कायम होगी? जॉन फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू, यानी एफबीआर में ड्राइवर हैं। साल 1985 में उन्हें इस महकमे में नौकरी मिली और तब से लाहौर, गुजरांवाला और सियालकोट में वह अलग-अलग अफसरों की खिदमत करते रहे हैं।
    कहते हैं, सोहबत का असर आपकी सीरत में जरूर दिखता है। जॉन के भीतर भी वह हसरत इसी सोहबत की वजह से उठी थी। जिस किसी अफसर के साथ उनकी ड्यूटी पड़ती, वह उसकी शख्सियत के खूबसूरत पहलुओं को अपने बच्चों के लिए समेट लाते। राबेल कहती हैं, ‘मेरे वालिद जब भी किसी सीएसएस अफसर के साथ टूर पर जाते, तो वहां से लौटकर हमें उनकी तमाम खूबियों, उनके इल्म के बारे में काफी कुछ बताते। उनकी बातों से हम भाई-बहन काफी मुतासिर होते थे।’
    सीएसएस का ख्वाब आहिस्ता-आहिस्ता पिता की आंखों से उतर राबेल के मन में जा बसा था। मगर इसके लिए अच्छी तालीम बहुत जरूरी थी। जॉन और उनकी बीवी सबीहा ने अपनी सारी ख्वाहिशें बच्चों पर कुर्बान कर दीं। करीब दो साल तक उन दोनों ने अपने लिए कुछ भी नहीं खरीदा, बस बच्चों की जरूरतों को वे जीते रहे। इस कोशिश में सियालकोट के जीसस ऐंड मैरी कॉन्वेंट का बड़ा साथ मिला। स्कूल ने राबेल और बाकी के चार भाई-बहनों की फीस आधी माफ कर दी थी।
    पढ़ाई में राबेल का प्रदर्शन शानदार रहा। वह लगातार ऊंचे नंबरों के साथ पोजिशन लेती रहीं। बेटी की प्रतिभा देख पिता की उम्मीदें भी मजबूत होती गईं। वह हर कदम पर राबेल का हौसला बढ़ाते रहे। जीसस ऐंड मैरी कॉन्वेंट से मैट्रिक करने के बाद वह सियालकोट के ही स्टैंडर्ड कॉलेज पहुंचीं, जहां से उन्होंने जूलॉजी में मास्टर्स की डिग्री ली। पर राबेल को अब तक बखूबी इल्म हो चुका था कि उन्हें सामाजिक-आर्थिक मोर्चे के साथ-साथ ‘क्लास’ और अल्पसंख्यक होने के दबाव से भी लड़ना है।
    मास्टर्स करने के साथ-साथ राबेल कुछ ऐसा करना चाहती थीं, जिससे पिता का आर्थिक बोझ कुछ कम हो सके और छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई में भी मदद हो पाए। सिविल सर्विसेज की किताबें और अन्य सामग्रियों के लिए भी पैसे चाहिए थे। राबेल अपने उसी स्कूल में दरख्वास्त लिए पहुंचीं, जहां से उन्होंने मैट्रिक्युलेशन किया था। स्कूल उनकी प्रतिभा से अच्छी तरह वाकिफ था। बहैसियत शिक्षक उनका नया सफर शुरू हो गया। शुरू में 12 हजार रुपये तनख्वाह थी, जो बढ़ते-बढ़ते 24 हजार हो गई।
    मगर राबेल की असली मंजिल तो कुछ और थी। इरादा भी बुलंद था, हालांकि उलझनें भी कम न थीं। सबसे बड़ी परेशानी तो यही थी कि सीएसएस इम्तिहान के लिए कौन-कौन से विषय चुने जाएं? यह उनका पहला प्रयास था। इससे उबरने में पिता के साहबों ने उनकी काफी मदद की। उन्होंने राबेल को न सिर्फ विषयों के चयन, बल्कि किस तरह से तैयारी करनी चाहिए, इसके बारे में गहराई से बताया। तजुर्बेकार लोगों की सलाहों ने इस इम्तिहान से जुड़ी तमाम गांठों को खोल दिया। उन्हें बस अब जुट जाना था।
    आखिरकार, फरवरी 2019 में सीएसएस इम्तिहान की तारीख भी आ गई। तैयारी मुकम्मल थी, खुद पर भरोसा भी पूरा था, पूरे आत्मविश्वास के साथ इंटरव्यू भी दिया था, मगर नतीजा तो किसी और को तय करना था, सो एक बेकली भी बनी रही। बीते 17 जून को भाई से सूचना मिली कि सीएसएस का रिजल्ट आ गया है। रिजल्ट देखने के लिए जब बहन-भाई ने वेबसाइट को खोला, तो वह ओवरलोडेड थी। सबकी धड़कनें बढ़ने लगी थीं, तभी तैयारी में रहनुमाई करने वाले एक सज्जन ने फोन करके मुबारकबाद दी। तब से बधाइयों का सिलसिला जारी है। राबेल पाकिस्तान विदेश सेवा के लिए चुनी गई हैं। उनके दो और भाई-बहन इस वर्ष की परीक्षा में बैठे हैं। यकीनन, राबेल की कामयाबी ने उनका हौसला बढ़ाया होगा।
    मुल्क के विदेश मंत्री ने जब जॉन केनेडी को फोन करके कहा कि आपकी परवरिश पर पूरे मुल्क को नाज है, तो पिता की आंखों के कोर भीग गए। तालीम और किताबों से अपनी जिंदगी में वंचित रह गए जॉन को लायक बेटी ने पूरे पाकिस्तान में मशहूर कर दिया है।
    प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंहराबेल केनेडी, पाकिस्तानी ईसाई सीएसएस

     

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