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सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / कोरोना महामारी ने अमेरिकी समाज और उसके शासन से जुडे़ कई मिथकों को ध्वस्त किया है। अमेरिका की केंद्रीय आव्रजन संस्था ‘इमिग्रेशन ऐंड कस्टम्स एनफोर्समेंट’ (आईसीई) का ताजा फैसला इसका नया उदाहरण है। आईसीई ने सोमवार को फरमान सुनाया कि अमेरिका में पढ़ रहे उन तमाम विदेशी छात्रों को देश छोड़ना पड़ेगा, जिनकी यूनिवर्सिटी ने आगामी सेमेस्टरों में ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था मुकम्मल कर ली है। यदि इसके बावजूद कोई छात्र अमेरिका में टिका रहा, तो उसे जबरन बाहर किया जाएगा। जाहिर है, इस फैसले का असर लाखों विदेशी विद्यार्थियों पर पडे़गा। खासकर भारत और चीन के छात्र इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे, क्योंकि सबसे ज्यादा इन्हीं दोनों देशों के विद्यार्थियों की तादाद है। यही नहीं, उन हजारों विद्यार्थियों के आगे भी फिलहाल अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है, जो सितंबर से नए अकादमिक-सत्र में भाग लेने के लिए अमेरिका पहुंचने वाले थे।
इसमें कोई दोराय नहीं कि इस महामारी से निपटने में प्रशासनिक कमियों को लेकर अमेरिकी समाज में अंदरखाने काफी उबाल है। जल्द ही वहां राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में, ट्रंप प्रशासन अमेरिकी अवाम को अब यह दिखाना चाहता है कि उसे सिर्फ उनका ख्याल है। महामारी के बाद वह वीजा नियमों में कई बदलाव कर चुका है। मगर हकीकत यह है कि दुनिया में सबसे अधिक जान-माल का नुकसान उठाने के बावजूद अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों में कोरोना से निपटने को लेकर अब भी समन्वय की भारी कमी है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट महामारी के सवाल पर आज भी अलग-अलग नजरिया रखते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ लगातार आगाह कर रहे हैं कि अमेरिका की स्थिति बेहद गंभीर है, और यह महामारी के बीचोबीच खड़ा है, पर राष्ट्रपति ट्रंप के बेहद करीबी लोग ही संक्रमण से बचाव के मान्य उपायों का मजाक उड़ाते फिर रहे हैं। वे मास्क पहनने की अनिवार्यता की भी खिल्ली उड़ाने से बाज नहीं आ रहे, जबकि ठोस नजीर सामने हैं कि जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने कैसे मास्क और फिजिकल डिस्टेंसिंग के जरिए इस घातक वायरस के प्रसार को काबू करने में सफलता पाई है। मगर सच्ची कोशिश और प्रतीकात्मक लड़ाई अमेरिकी समाज के दोहरेपन को अक्सर दुनिया के सामने ले आती रही है। कोरोना महामारी ने एक बार फिर इसे उजागर कर दिया है।
ठीक है, हर सरकार अपने नागरिकों के हितों का ख्याल सबसे ऊपर रखती है, पर उसका यह भी फर्ज है कि अपनी भौगोलिक सीमा में दूसरे देशों के बाशिंदों के मानव अधिकारों की भी वह रक्षा करे। वैसे भी, ये विद्यार्थी शरणार्थी नहीं हैं, जिन्हें अमूमन हर देश एक बोझ समझता है। ये वे विद्यार्थी हैं, जिनसे अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने मोटी फीस वसूली है। एक ऐसे वक्त में, जब अंतरराष्ट्रीय सरहदें बंद हैं, तमाम उड़ानें रद्द हैं, ट्रंप प्रशासन को इन विदेशी छात्रों को उनके मुल्क तक सुरक्षित पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उच्च शिक्षा उद्योग का अच्छा-खासा योगदान है। उसे सालाना करीब 37 अरब डॉलर की कमाई इससे हो रही है। मुश्किल समय के ऐसे आचरण भावी विद्यार्थियों को उससे विमुख भी कर सकते हैं। बहरहाल, इस नई स्थिति में देशों और सरकारों के लिए भी एक सबक है, अपने यहां ज्यादा से ज्यादा विश्व-स्तरीय संस्थान खड़े कीजिए।
ओपिनियन / शौर्यपथ /पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी से आती खबरें सुखद हैं। चीन की सेना कई वजहों से पीछे लौटने को मजबूर हुई है। पहला कारण तो निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल है। उन्होंने हालात से निपटने के लिए दोतरफा रणनीति अपनाई। एक तरफ, उन्होंने सेना का मनोबल बढ़ाया और उसके लिए आधुनिक साजो-सामान जुटाए, तो वहीं दूसरी तरफ, लेह-लद्दाख जाकर पड़ोसी देश को यह संदेश दिया कि शीर्ष स्तर पर बनी सहमति जमीन पर उतारी जाए, तो वह दोस्ती के लिए भी तैयार हैं। इसके बाद ही अजीत डोभाल को सक्रिय किया गया, जो चीन के मामलों में प्रधानमंत्री के निजी प्रतिनिधि रहे हैं।
यह सही है कि कई बार युद्ध आवश्यक हो जाता है, पर किसी भी राष्ट्र के लिए यह एकमात्र विकल्प नहीं होना चाहिए। इससे बचने के लिए अपनी आंतरिक शक्तियों को मजबूत करना आवश्यक है। भारत ने भी यही किया। हमने आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाए, साथ ही वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपना योगदान बढ़ाना शुरू किया। एक बड़ा उपभोक्ता बाजार हमारे हित में है ही। लिहाजा, चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने की शुरुआत हुई। फिर तो, अन्य देश भी खुलकर हमारे साथ आ गए और बीजिंग की आलोचना करने लगे, जबकि शुरुआत में इन देशों ने 20 भारतीय सैनिकों के बलिदान पर महज शोक जताया था।
हालांकि, चीनी नेतृत्व की भी तारीफ करनी चाहिए। उसने सही समय पर अपने कदम पीछे खींचे हैं। बीजिंग ने यह फैसला तब किया, जब वहां का मीडिया बार-बार 1962 के संघर्ष की याद दिला रहा था और कूटनीतिज्ञ पाकिस्तान और नेपाल के रास्ते नई दिल्ली को घेरने की रणनीति बनाने में मशगूल थे। मगर भारत सरकार ने आपसी मतभेद खत्म कराने में आखिरकार सफलता हासिल कर ली।
अब सवाल यह है कि आगे की क्या रणनीति बनाई जाए? एक आशंका यह भी है कि कहीं 1962 तो नहीं दोहराया जा रहा, क्योंकि उस वर्ष भी पीछे लौटकर चीन ने हम पर हमला बोला था? मगर मैं इससे इत्तफाक नहीं रखता। हमने इस बार चीन की आंखों में आंखें डालकर उसे पीछे हटने को मजबूर किया है। फिर भी, हमें सजग और सावधान रहना होगा।
हमारा फायदा इसी में है कि सेना को बैरकों में रहने दिया जाए। सीमा पर बेवजह की उसकी तैनाती भय का माहौल बनाएगी। मगर इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास-कार्य रोक दिए जाएं। वहां न सिर्फ बुनियादी ढांचे का निर्माण और आर्थिक विकास जरूरी है, बल्कि स्थानीय लोगों को भावनात्मक और आर्थिक रूप से शेष भारत से जोड़ना भी आवश्यक है। इस बाबत पहले की सरकारों ने उचित प्रयास नहीं किए, जिसके कारण हमारे कई क्षेत्रों पर पड़ोसी देशों का कब्जा है। इससे वैश्विक मंचों पर गलत संदेश जाता है। हमारी सदाशयता हमारी कमजोरी समझ ली गई है।
ऐसे संदेश कितने खतरनाक होते हैं, इसका पता पहले और दूसरे विश्व युद्ध से चलता है। इन दोनों महासमर की शुरुआत तब हुई, जब एक पक्ष को दूसरा कमजोर महसूस होने लगा। जब ऐसी सोच हावी हो जाती है, तो फिर संघर्ष स्वाभाविक तौर पर पैदा हो जाता है। ईरान-इराक युद्ध का भी यही संदेश है। अच्छी बात है कि इस बार भारत धारणा की जंग में मजबूत होकर उभरा है। पिछले पांच-छह वर्षों में हमने न सिर्फ पड़ोसी देशों के तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास-कार्य किए हैं, बल्कि उनकी उकसाने वाली कार्रवाइयों को उसी की भाषा में जवाब भी दिया है।
मौजूदा तनातनी का अंत एक नई उम्मीद को जन्म दे रहा है। हम बीजिंग को यह एहसास दिलाने में सफल हुए हैं कि विश्व के आर्थिक विकास में अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटना उचित नहीं। एशिया की शांति भी हमारी दोस्ती पर ही निर्भर है। इसमें हम कितना सफल हो पाते हैं, इसका जवाब तो आने वाले दिनों में मिलेगा, पर विश्व में सकारात्मक योगदान की हमारी उम्मीदें कुछ जरूरी काम करने के बाद पूरी हो सकती हैं।
इसमें सबसे पहला काम तो सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी बढ़ाना है। इसके लिए वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर, यानी बुनियादी ढांचे का निर्माण जरूरी है। आंतरिक ताकतों को मजबूत किए बिना हम बाहरी शक्तियों का मुकाबला नहीं कर सकते। दूसरा, हमें आतंकवाद के खिलाफ तमाम देशों को एक करना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है, ताकि पाकिस्तान जैसे आतंकवाद के मददगार देश किसी अन्य राष्ट्र द्वारा इस्तेमाल न हो सकें। तीसरा काम है, चीन की विस्तारवादी नीतियों का विरोध। बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) में शामिल न होकर भारत ने इसकी शुरुआत पहले ही कर दी है। चौथा, पड़ोसी देशों के साथ चीन के व्यवहार का मूल्यांकन। दरअसल, दक्षिण चीन सागर सहित चीन का कई राष्ट्रों के साथ सीमा विवाद है। हांगकांग का मसला भी काफी गंभीर है। चीन का इन देशों के प्रति बदलता रुख हमें कई संदेश दे सकता है। अगर बदलाव सकारात्मक आते हैं, तो यह माना जा सकता है कि चीन का नेतृत्व नई सोच का हिमायती है। और अगर ऐसा नहीं होता, तो हमें सावधान रहना होगा, क्योंकि गलवान घाटी में पीछे हटना चीन का छलावा भी हो सकता है।
चीन के भीतरी हालात पर भी हमें नजर रखनी होगी। ऐसी चर्चा गरम है कि बीजिंग के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व में मतभेद गहरा रहे हैं। चीन बेशक कम्युनिस्ट समाज है, पर वहां कन्फ्यूशियसवाद हावी है। इस तरह के समाज में अच्छे काम करने वालों की तारीफ होती है, तो विफल होने पर उसकी जमकर लानत-मलामत भी की जाती है। लिहाजा, अपनी छवि चमकाने के लिए सियासी और सैन्य नेतृत्व अलग-अलग राह पकड़ सकते हैं। जरूरी यह भी है कि हम भी अपने आंतरिक मतभेदों से ऊपर उठें। पहले पाकिस्तान जैसे देश हमारे मनमुटावों का फायदा उठाते थे, अब बीजिंग इससे लाभ कमाना चाहता है। उसे यह मौका नहीं मिलना चाहिए।
इसमें आत्मनिर्भरता की नीति हमारे लिए काफी कारगर साबित हो सकती है, मगर इसे लेकर हमें संकीर्ण नजरिया नहीं रखना चाहिए। हमारी आत्मनिर्भरता संरक्षणवाद का पोषक नहीं बननी चाहिए। ऐसी नीति हमारी कई कमजोरियों को बेपरदा कर सकती है। इससे हम पर कई तरह के दबाव बनने लगेंगे, जिनसे हमारे हितों को चोट पहुंच सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)शशांक, पूर्व विदेश सचिव
शौर्यपथ। सेहत । दुनिया में कोरोनावायरस के मामले 60 लाख को पार कर चुके हैं. तमाम बड़े देश परेशान हैं कि किस तरह इस संक्रमण को रोका जाए. इस बीच हार्वर्ड ने एक स्टडी रिपोर्ट जारी की है. इसमें कहा गया है कि सेक्स के दौरान कपल्स को फेस मास्क पहनना चाहिए. स्टडी में कहा गया है कि अगर कोई कपल मास्क पहनकर सेक्स करता है तो इससे कोरोना वायरस एक-दूसरे को ट्रांसमिट करने का खतरा काफी कम हो जाता है. हार्वर्ड की स्टडी ये स्टडी Annals of Internal Medicine जर्नल में छपी है. इसमें सेक्स के दौरान मास्क के अलावा और भी कई तरह की सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है. सेक्स के दौरान सावधानियां स्टडी में कहा गया है कि सेक्स के दौरान फेस मास्क पहनें. सेक्स से पहले और बाद में जरूर नहाएं. इस दौरान जहां भी आप संपर्क में रहे हैं, उन जगहों को साबुन या अल्कोहल वाइप्स से साफ करें. यानी सेनेटाइज जरूर करें.आपको जानकर हैरानी होगी कि स्टडी में कहा गया है कि अगर आप कोरोना से बचना चाहते हैं तो सबसे सुरक्षित ये होगा कि इस समय सेक्स ना करें. मास्टरबेशन को लो-रिस्क बताया गया है.(एजेंसी)
शौर्यपथ । सेहत ।पिछले कुछ सालों में लोग मोबाइल फोन, इंटरनेट के इतना समय बिताने लगे हैं कि उनकी दिनचर्या में भी बदलाव आ गए हैं. जीवनशैली पर तो इनका असर हुआ ही है, अब एक रिसर्च में कहा गया है कि इन चीजों के अत्यधिक प्रयोग का असर सेक्स लाइफ (Sex Life) पर भी दिखने लगा है. रिसर्च में दावा ये रिसर्च किया गया अमेरिका में. इसमें दावा किया गया है कि पुरुषों में सेक्स ड्राइव पहले की अपेक्षा कम हो रही है. इस तरह के व्यवहार का प्रमुख कारण गेमिंग, सोशल मीडिया, मोबाइल, इंटरनेट को बताया गया है. चौंकाने वाले खुलासे रिसर्च में सेक्स और सेक्स की इच्छा को लेकर कई तरह के सवाल लोगों से किए गए. रिपोर्ट में पता चला कि साल 2000 के बाद से अमेरिकी युवाओं में सेक्स को लेकर दिलचस्पी काफी कम हुई है. रिसर्च को जामा नेटवर्क ओपन जर्नल में प्रकाशित किया गया है. यौन निष्क्रियता बढ़ी रिसर्च में 25-34 साल के पुरुषों और महिलाओं के बीच यौन निष्क्रियता भी बढ़ रही है. कई लोगों ने कहा कि पिछले एक साल से उन्होंने किसी से शारीरिक संबंध स्थापित नहीं किए हैं. सोशल मीडिया है वजह विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अब लोगों के पास रात में करने को कई और काम हैं. वे सेक्स को छोड़कर सोशल मीडिया, इंटरनेट पर अधिक समय बिताते हैं. गेमिंग का क्रेज भी इसकी एक प्रमुख वजह है. रिसर्च में इस बात का भी अंदेशा जताया गया है कि कोरोनावायरस जैसी महामारी के कारण लोगों में सेक्स को लेकर अनिच्छा और ज्यादा बढ़ सकती है.(एजेंसी )
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / ऐसे कई फूड है जिन्हें एक पूरी रात भिगोकर रखने के बाद, अगले दिन खाना अपेक्षाकृत अधिक फायदेमंद होता है। क्योंकि अंकुरित होने के बाद उनकी नुट्रिशन वैल्यू बढ़ जाती है, साथ ही ये आसानी से पच जाते है जो सेहत के लिए अच्छा है। हम आपको बता रहे हैं ऐसी ही 8 चीजों के बारे में जिन्हें रातभर भिगोकर खाना आपकी इम्यूनिटी को मजबूत करने में सहायक होगा -
1 मेथीदाना -
इनमें फाइबर्स भरपूर मात्रा में होते हैं जो कब्ज को दूर कर आंतों को साफ रखने में मदद करते हैं। डायबिटीज के रोगियों के लिए भी मेथीदाने फायदेमंद हैं। साथ ही इनका सेवन महिलाओं में पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द को भी कम करता हैं।
2 खसखस -
ये फोलेट, थियामिन और पैंटोथेनिक एसिड का अच्छा सोर्स होता हैं। इसमें मौजूद विटामिन बी मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है जिससे वजन को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
3 अलसी -
अलसी या फ्लैक्स सीड्स ओमेगा-3 फैटी एसिड का एकमात्र शाकाहारी सोर्स माना जाता हैं। अलसी का सेवन बैड कोलेस्ट्रॉल को घटाकर हमारे दिल को भी हेल्दी रखता हैं।
4 मुनक्का -
इसमें मैग्नीशियम, पोटेशियम और आयरन काफी मात्रा में होते हैं। मुनक्के का नियमित सेवन कैंसर कोशिकाओं में बढ़ोतरी को रोकता है। इससे हमारी स्किन भी हेल्दी और चमकदार रहती है। एनीमिया और किडनी स्टोन के मरीजों के लिए भी मुनक्का फायदेमंद है।
5 खड़े मूंग -
इनमें प्रोटीन, फाइबर और विटामिन बी भरपूर मात्रा में होता है। इनका नियमित सेवन कब्ज दूर करने में बहुत फायदेमंद होता है। इसमें पोटेशियम और मैग्नेशियम भी भरपूर मात्रा में होने की वजह से डॉक्टरस हाई बीपी के मरीजों को इसे रेगुलर खाने की सलाह देते है।
6 काले चने -
इनमें फाइबर्स और प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा होती हैं जो कब्ज दूर करने में सहायक होते है।
7 बादाम -
इसमें मैग्नीशियम होता है जो हाई बीपी के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि नियमित रूप से भीगी हुई बादाम खाने से खराब कोलेस्ट्रॉल का लेवल कम हो जाता है।
8 किशमिश -
किशमिश में आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में होते हैं। भीगी हुई किशमिश को नियमित रूप से खाने से स्किन हेल्दी और चमकदार बनती है। साथ ही शरीर में आयरन की कमी भी दूर होती है।
सेहत / शौर्यपथ / खाना खाने के फायदे तो आपको पता होंगे, लेकिन खाना चबाने के यह फायदे आप नहीं जानते होंगे। लेकिन ठीक तरीके से खाना चबाने के यह फायदे, आपको जरूर पता होने चाहिए...
1 खाना खाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसे ठीक तरीके से चबाना। अच्छी तरह चबा-चबाकर खाने से आप कम खाते हैं और आपका पेट भी जल्दी भर जाता है।
2 जब आप चबा-चबाकर खाते हैं तो आपका पाचन तंत्र, पाचन के लिए खुद को तैयार करता है। इस तरह से आप जितना चबा-चबाकर खाते हैं, उतना ही बेहतर आपका पाचनतंत्र काम करता है।
3 ठीक तरीके से चबाते हुए भोजन करने से, भोजन कई टुकड़ों में बंटकर सलाईवा के साथ मिलकर, बेहतर पाचन के लिए तैयार हो जाता है। वहीं अच्छी तरह से न चबाने पर ठीक से पाचन नहीं होता।
4 अच्छी तरह चबाकर खाने का एक फायदा यह भी है, कि आप भोजन का ठीक तरह से स्वाद ले पाते हैं और देर तक उसका आनंद भी उठा सकते हैं।
5 धीरे-धरे चबाकर खाने पर आपके शरीर को जरूरी हार्मोन स्त्रवण के लिए काफी समय मिल जाता है, जैसे लेप्टिन, ग्रेलिन आदि। इनका पाचन क्रिया में अहम योगदान है।
खाना खजाना / शौर्यपथ / मूंग की दाल की कचौड़ी तो आपने खाई ही होगी। आज हम आपको मूंग चीज कचौड़ी बनाना बता रहे हैं। ये खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होती है। इसे आप आसानी से घर में बना सकते हैं।
सामग्री :
गेहूं का आटा- 1/2 कप
मैदा- 1/2 कप
ओट्स- 1/4 कप
तेल- 2 चम्मच
नमक- स्वादानुसार
मसाले के लिए
अंकुरित मूंग उबली हुई- 1 कप
उबली हुई शकरकंदी- 1/2 कप
मोजरेला चीज- 1/4 कप
नमक- स्वादानुसार
चिली फ्लेक्स-1 छोटा चम्मच
मिक्स्ड हब्र्स- 1 छोटा चम्मच
तेल- तलने के लिए
विधि :
मूंग चीज कचौड़ी बनाने के लिए सबसे पहले कचौड़ी के आटे की सभी चीज गेहूं का आटा, मैदा, ओट्स, नमक और तेल मिलाकर गूंद लीजिए। अंकुरित मूंग, शकरकंदी, चिली फ्लेक्स, मिक्स हब्र्स और नमक डालकर मिक्स करें और बॉल्स बनाए। बॉल्स के बीच में थोड़ा-सा मोजरेला चीज भी डालें। आटे से मीडियम आकार की पूरी बेल लें। बीच में स्र्टंफग बॉल्स रखकर चारों कोनों को सील कर कचौड़ी का आकार दें। कड़ाही में तेल गर्म करें और कचौड़ी को सुनहरा होने तक दोनों ओर से तल लें। धनिया-पुदीना की चटनी के साथ पेश करें।
मेरी कहानी / शौर्यपथ / उस पढ़ाई को छूट जाना था, जिसमें कामयाबी दूर-दूर तक नहीं दिख रही थी। मैट्रिक में दो बार फेल होकर समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे पास हुआ जाए? मन पढ़ाई में कैसे रमाया जाए? मन इतना चंचल था कि जिधर आवाज होती, उधर भाग लेता और एक बार भाग जाता, तो उसे लौटाने में बहुत जोर आता। अपनी पढ़ाई बोझिल और दुनिया के अन्य तमाम विषय दिलचस्प लगते थे। ले-देकर गणित की किताबों में मन ठहरता था, क्योंकि वहां डोर सुलझी हुई थी। एक बार तरीका पता चल गया, तो प्रश्न हल करते बढ़ते चलो, पर बाकी विषय पहाड़ थे। काश! एक ही विषय की परीक्षा होती, तो सफलता कदम चूमती, लेकिन यहां अनेक विषय मिलकर गणित की कमाई पर पानी फेर देते थे। छवि बन गई थी कि इस लड़के का मन पढ़ाई में नहीं लगता, गांव से शहर गया, लेकिन वहां भी फेल!
ऊपर से भाग्य ने भी पीठ दिखा दी, असमय ही पिता का साया उठ गया। गांव लौटना पड़ा। उम्र में 18वां साल लग चुका था और दिखने लगा था कि अब आगे की पढ़ाई पर पूर्ण विराम लग जाएगा। शहर में रहने, आने-जाने और परीक्षा फीस इत्यादि का बोझ भारी था। ये ऐसे बड़े खर्चे थे, जिनके सामने घुटने टेक देना तय लग रहा था। पर एक दिन मां अपना पूरा उत्साह समेटे सामने आ खड़ी हुई, ‘चल, बांध अपना सामान। परीक्षा के दिन आ रहे हैं, इस बार तुझे सफल होना ही है’।
बेटा स्तब्ध था। मां ने आंचल से रुपये निकाले और बेटे की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘ले तेरी यात्रा का खर्च और परीक्षा की फीस’।
सवाल वाजिब था, ‘अम्मा, कहां से आए पैसे?’
मां ने अपने को समेटते हुए नजरें झुकाए कहा, ‘मैंने अपने बचे हुए गहने बेच दिए, तेरी पढ़ाई सबसे जरूरी है’।
पिता के गुजर जाने के बाद टूटी हुई मां की सूनी आंखों में झांकते हुए बेटा भाव में बह चला। उसके दो बार फेल होने के बावजूद मां का विश्वास कायम है। वह अपनी सबसे गाढ़ी पूंजी बेटे की पढ़ाई पर लगा रही है। मां का यह रूप देख बेटा मानो हठात् नींद से जाग गया। वह ऐसी प्यारी मां की उम्मीद को दो बार से तोड़ रहा है और अब भी उलझनें इतनी हैं कि तीसरी बार भी तोड़ने की तैयारी लगती है। मां अपने जेवर बेचकर खड़ी है कि बेटा पास कर जाए, आगे पढ़ाई करके कुछ बन जाए और बेटा है कि अपने मन को काबू में नहीं रख सकता। जहां पूरी जिंदगी दांव पर लगी हो, वहां एक परीक्षा परेशान कर रही है? बेटे का मन धिक्कार उठा। कुछ पल की भाव-प्रबल खामोशी के बाद मन ने ठान लिया और बोल पड़ा, ‘अम्मा, मुझे नाम कमाना होगा, तभी मेरा जीवन सार्थक होगा।’
बेटे की अच्छी पढ़ाई के लिए मां का समर्पण नया नहीं था। अब बेटे की समझ में आ रहा था कि कैसे वह घर से भाग रहा था। पांच साल पहले, दूर काशी पहुंचकर केले बेच पैसे कमाने की योजना थी। स्कूल से लौटने में देरी हुई, तो मां खोज में दौड़ पड़ी थी और भागते बेटे को पकड़ लाई थी और समझाया था कि गरीबी से मत घबरा, सिर्फ पढ़ाई से मन लगा। तब बात बेटे की समझ में नहीं आई थी, पर जब मां ने अपने गहने बेच दिए, तब बेटे का हौसला इतना फौलादी हो गया कि जिंदगी में कभी फेल होने या कभी हारने की गुंजाइश ही नहीं बची। कामयाबी का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मैट्रिक और उसके बाद मेडिकल कॉलेज, लेकिन दुर्भाग्य ने भी पीछा नहीं छोड़ा। उष्णकटिबंधीय स्पू्र नामक छोटी आंत में होने वाली बीमारी की वजह से पहले बडे़ भाई और फिर छोटे भाई की जान गई। दृढ़ता और बढ़ी कि मेडिकल की पढ़ाई और शोध के जरिए इस बीमारी का इलाज खोजना है। भारत में रिसर्च की सुविधा नहीं थी। विदेश जाना मजबूरी थी। 1923 में मां के लाल येल्लाप्रगडा सुब्बाराव निकल चले कुछ कर गुजरने।
अमेरिका में जहां एक ओर संघर्ष का कारवां था, वहीं दूसरी ओर था, उपलब्धियों का चमकदार सिलसिला। पहले फोलिक एसिड, एंटी-फोलिक एसिड, एटीपी-एनर्जी फॉर लाइफ, फोसफॉस मैथड, फिलारियासिस, विटामिन बी12 इत्यादि अनेक आधारभूत उपलब्धियों को सुब्बाराव (1895-1948) ने अंजाम दिया। प्रचार से हमेशा दूर रहने वाले संकोची सुब्बाराव 25 वर्ष लगातार अमेरिका में विज्ञान की सेवा करते रहे। भाइयों को जो रोग दुनिया से ले गया था, उसके इलाज की खोज के साथ ही कैंसर के इलाज- कीमोथेरेपी की भी बुनियाद सुब्बाराव के खाते में दर्ज है। वह भारत लौटने का सपना संजोए महज 53 की उम्र में दुनिया से चले गए। उनके निधन के बाद एक अखबार ने लिखा, ‘वह सदी के सबसे प्रख्यात चिकित्सा दिमागों में से एक थे’, तो किसी ने भारत मां के उस लाल को सम्मान से नवाजते हुए दर्ज किया, ‘बौनों के बीच कद्दावर’।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याययेल्लाप्रगडा सुब्बाराव, प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक
जीना इसी का नाम है /शौर्यपथ/ मैंने अपनी पूरी जिंदगी अफसरों के दरवाजे खोले। मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चों के लिए भी कोई दरवाजे खोले। वे भी इस मुकाम तक पहुंचें। वे भी अफसर बनें।- ये अल्फाज उस पिता के थे, जिनके पास अपने बच्चों की फीस भरने तक के पूरे पैसे न थे, मगर लायक बेटी ने इस अल्फाज के हर हर्फ पर अपना ईमान रख दिया। और आज वह पाकिस्तानी ईसाई समुदाय की पहली सीएसएस हैं। यानी देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा की अफसर- राबेल केनेडी!
सियालकोट के जॉन केनेडी का यह ख्वाब कितना दुस्साहसिक था, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता था। अव्वल तो वह मसीह बिरादरी, यानी अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं और फिर उनकी नौकरी भी ऐसी थी कि उससे घर के ही सारे खर्च पूरे न हों। मगर सपने ऊंचे न देखे जाएं, तो नजीर कैसे कायम होगी? जॉन फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू, यानी एफबीआर में ड्राइवर हैं। साल 1985 में उन्हें इस महकमे में नौकरी मिली और तब से लाहौर, गुजरांवाला और सियालकोट में वह अलग-अलग अफसरों की खिदमत करते रहे हैं।
कहते हैं, सोहबत का असर आपकी सीरत में जरूर दिखता है। जॉन के भीतर भी वह हसरत इसी सोहबत की वजह से उठी थी। जिस किसी अफसर के साथ उनकी ड्यूटी पड़ती, वह उसकी शख्सियत के खूबसूरत पहलुओं को अपने बच्चों के लिए समेट लाते। राबेल कहती हैं, ‘मेरे वालिद जब भी किसी सीएसएस अफसर के साथ टूर पर जाते, तो वहां से लौटकर हमें उनकी तमाम खूबियों, उनके इल्म के बारे में काफी कुछ बताते। उनकी बातों से हम भाई-बहन काफी मुतासिर होते थे।’
सीएसएस का ख्वाब आहिस्ता-आहिस्ता पिता की आंखों से उतर राबेल के मन में जा बसा था। मगर इसके लिए अच्छी तालीम बहुत जरूरी थी। जॉन और उनकी बीवी सबीहा ने अपनी सारी ख्वाहिशें बच्चों पर कुर्बान कर दीं। करीब दो साल तक उन दोनों ने अपने लिए कुछ भी नहीं खरीदा, बस बच्चों की जरूरतों को वे जीते रहे। इस कोशिश में सियालकोट के जीसस ऐंड मैरी कॉन्वेंट का बड़ा साथ मिला। स्कूल ने राबेल और बाकी के चार भाई-बहनों की फीस आधी माफ कर दी थी।
पढ़ाई में राबेल का प्रदर्शन शानदार रहा। वह लगातार ऊंचे नंबरों के साथ पोजिशन लेती रहीं। बेटी की प्रतिभा देख पिता की उम्मीदें भी मजबूत होती गईं। वह हर कदम पर राबेल का हौसला बढ़ाते रहे। जीसस ऐंड मैरी कॉन्वेंट से मैट्रिक करने के बाद वह सियालकोट के ही स्टैंडर्ड कॉलेज पहुंचीं, जहां से उन्होंने जूलॉजी में मास्टर्स की डिग्री ली। पर राबेल को अब तक बखूबी इल्म हो चुका था कि उन्हें सामाजिक-आर्थिक मोर्चे के साथ-साथ ‘क्लास’ और अल्पसंख्यक होने के दबाव से भी लड़ना है।
मास्टर्स करने के साथ-साथ राबेल कुछ ऐसा करना चाहती थीं, जिससे पिता का आर्थिक बोझ कुछ कम हो सके और छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई में भी मदद हो पाए। सिविल सर्विसेज की किताबें और अन्य सामग्रियों के लिए भी पैसे चाहिए थे। राबेल अपने उसी स्कूल में दरख्वास्त लिए पहुंचीं, जहां से उन्होंने मैट्रिक्युलेशन किया था। स्कूल उनकी प्रतिभा से अच्छी तरह वाकिफ था। बहैसियत शिक्षक उनका नया सफर शुरू हो गया। शुरू में 12 हजार रुपये तनख्वाह थी, जो बढ़ते-बढ़ते 24 हजार हो गई।
मगर राबेल की असली मंजिल तो कुछ और थी। इरादा भी बुलंद था, हालांकि उलझनें भी कम न थीं। सबसे बड़ी परेशानी तो यही थी कि सीएसएस इम्तिहान के लिए कौन-कौन से विषय चुने जाएं? यह उनका पहला प्रयास था। इससे उबरने में पिता के साहबों ने उनकी काफी मदद की। उन्होंने राबेल को न सिर्फ विषयों के चयन, बल्कि किस तरह से तैयारी करनी चाहिए, इसके बारे में गहराई से बताया। तजुर्बेकार लोगों की सलाहों ने इस इम्तिहान से जुड़ी तमाम गांठों को खोल दिया। उन्हें बस अब जुट जाना था।
आखिरकार, फरवरी 2019 में सीएसएस इम्तिहान की तारीख भी आ गई। तैयारी मुकम्मल थी, खुद पर भरोसा भी पूरा था, पूरे आत्मविश्वास के साथ इंटरव्यू भी दिया था, मगर नतीजा तो किसी और को तय करना था, सो एक बेकली भी बनी रही। बीते 17 जून को भाई से सूचना मिली कि सीएसएस का रिजल्ट आ गया है। रिजल्ट देखने के लिए जब बहन-भाई ने वेबसाइट को खोला, तो वह ओवरलोडेड थी। सबकी धड़कनें बढ़ने लगी थीं, तभी तैयारी में रहनुमाई करने वाले एक सज्जन ने फोन करके मुबारकबाद दी। तब से बधाइयों का सिलसिला जारी है। राबेल पाकिस्तान विदेश सेवा के लिए चुनी गई हैं। उनके दो और भाई-बहन इस वर्ष की परीक्षा में बैठे हैं। यकीनन, राबेल की कामयाबी ने उनका हौसला बढ़ाया होगा।
मुल्क के विदेश मंत्री ने जब जॉन केनेडी को फोन करके कहा कि आपकी परवरिश पर पूरे मुल्क को नाज है, तो पिता की आंखों के कोर भीग गए। तालीम और किताबों से अपनी जिंदगी में वंचित रह गए जॉन को लायक बेटी ने पूरे पाकिस्तान में मशहूर कर दिया है।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंहराबेल केनेडी, पाकिस्तानी ईसाई सीएसएस
नजरिया / शौर्यपथ /अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फिर से चुने जाने की संभावना हाल के दिनों में धूमिल हुई है। उन्होंने खुद इस बात को स्वीकार किया, जब फॉक्स न्यूज के एंकर सीन हैनिटी के साथ इंटरव्यू के दौरान वह भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि जो बिडेन ‘आपके राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं, क्योंकि कुछ लोग मुझे प्यार नहीं करते’। रियलक्लियर पॉलिटिक्स के सर्वे के मुताबिक, ट्रंप 9.3 अंकों से बिडेन से पीछे चल रहे हैं, जबकि फाइवथर्टीएट के सर्वे के मुताबिक, वह 9.6 अंकों से पीछे हैं। वह विस्कॉन्सिन, मिशिगन, पेंसिल्वेनिया और फ्लोरिडा जैसे राज्यों में भी पीछे हैं, जिनकी गिनती स्विंग स्टेट्स (अस्पष्ट चुनावी रुझान वाले राज्यों) में होती है और जहां 2016 में उन्होंने जीत हासिल की थी। जॉर्जिया और एरिजोना में वह दौड़ में हैं, जहां हरेक राष्ट्रपति चुनाव में कमोबेश रिपब्लिकन को ही वोट मिलता रहा है। टेक्सास की भी तस्वीर यही है, जहां के मतदाता मुख्य रूप से रिपब्लिकन पार्टी को ही चुनते रहे हैं।
जब से ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं, तब से गॉलअप पोल की अनुमोदन रेटिंग में उन्हें कभी भी 49 फीसदी के ऊपर जाते नहीं देखा गया। पर अभी उनकी छवि को बट्टा इसलिए लगा है, क्योंकि अपने कार्यकाल की दो सबसे बड़ी मुश्किलों से ठीक से निपटने में वह सफल नहीं माने गए हैं। इसमें से पहला संकट कोविड-19 महामारी है, जिससे अब तक 1,28,000 से अधिक अमेरिकियों की जान जा चुकी है और करीब 28 लाख लोग संक्रमित हैं। दूसरी मुश्किल जाहिर तौर पर नस्लवाद-विरोधी आंदोलन है, जो देश में गहराई तक फैल गया है।
कोरोना वायरस को ट्रंप ने अनाधिकार प्रवेश करने वाला खतरा माना, जो उनके कार्यकाल की सबसे बेशकीमती उपलब्धि और दूसरे कार्यकाल का टिकट चुरा बैठा है। उनकी वह कीमती उपलब्धि थी, मुल्क की बढ़ती अर्थव्यवस्था। और फिर, देश में अधिक ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने विरोध-प्रदर्शनों का इस्तेमाल किया, ताकि नवंबर के चुनाव में वह अपने समर्थकों को एकजुट कर सकें । मगर अभी समय है। लुढ़कने से पहले अपने कदम वापस खींचने के लिए ट्रंप खूब जाने जाते हैं। अक्तूबर, 2016 के ‘एक्सेस हॉलीवुड टेप’ को याद कीजिए, जिसमें ट्रंप किस तरह महिलाओं के खिलाफ अशालीन टिप्पणी करते हुए डींगें मार रहे थे। तब उनके चुनाव अभियान में जुटे कई लोगों ने हार मान ली थी। लेकिन वह 2016 का ‘अक्तूबर सरप्राइज’ था, यानी ऐसा अप्रत्याशित घटनाक्रम, जो चुनावी गुणा-गणित को पलटने में सक्षम हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिस प्रत्याशी पर आरोप लगते हैं, उसे इससे उबरने या इसका तोड़ निकालने के लिए पूरा समय नहीं मिल पाता। यह शब्द अमेरिकी चुनाव में बतौर मुहावरा खूब इस्तेमाल होता है। पर हम सभी जानते हैं कि ट्रंप इससे बखूबी बच निकले।
भारत में भी इसके अगले महीने कुछ इसी तरह का घटनाक्रम रहा। उसका कोई नाम तो नहीं है, लेकिन इसे ‘इंडियाज नवंबर सरप्राइज’ कहा जा सकता है। यह 9 नवंबर को ट्रंप के अप्रत्याशित चयन से सामने आया, क्योंकि हिलेरी क्लिंटन की जीत को लेकर भारत आश्वस्त था। इसी खुमारी में भारतीय राजनयिक परेशान थे कि किसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बधाई फोन ट्रंप तक पहुंचे। हालांकि जल्द ही वे यह बताने में सफल रहे कि मोदी उन वैश्विक नेताओं में एक थे, जिन्होंने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को पहले फोन किया था। यहां महत्वपूर्ण बात बधाई फोन कॉल नहीं, क्योंकि वह 10 नवंबर की सुबह भी लग सकती थी, खास बात यह है कि नई दिल्ली को जो बिडेन के साथ भी अपने संपर्क के रास्ते खुले रखने चाहिए। यदि अब तक ऐसा नहीं किया गया है, तो इसकी जरूरत पड़ सकती है।
बिडेन भारत के लिए अजनबी भी नहीं हैं। भारत को समर्थन देने का उनका लंबा रिकॉर्ड है। इसमें बतौर सीनेटर असैन्य परमाणु समझौता का समर्थन शामिल है। वह 2013 में उप-राष्ट्रपति के रूप में भारत आ चुके हैं और तब उन्होंने भारत में अपने रिश्तेदार के होने की बात कही थी, जिनसे वह अपना उपनाम साझा करते हैं। इससे भी अच्छी बात यह है कि इस हफ्ते की शुरुआत में उन्होंने कहा है कि यदि वह राष्ट्रपति बनते हैं, तो भारत के साथ अपने संबंध को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे और एच-1बी वीजा निलंबन को रद्द कर दिया जाएगा। बिडेन कदम बढ़ा चुके हैं। ऐसे में, अब भारत क्या करेगा?
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / नस्लभेद एक ऐसी खामी है, जो इंसानी समाज का पीछा नहीं छोड़ रही है। दुनिया में एक समय रंग के आधार पर इंसानों की खरीद-फरोख्त से लेकर आज अमेरिका में उठते नस्लवादी जुमलों तक अनेक ऐसे स्याह पहलू हैं, जो न केवल दुखद, बल्कि शमर्नाक हैं। भले ही 17वीं सदी से एक नस्लीय विज्ञान खड़ा करने की कोशिश हुई है, जिसके तहत किसी नस्ल को रंग के आधार पर श्रेष्ठ, तो किसी को कमतर बताने का उपक्रम रहा है। लेकिन धीरे-धीरे यह सिद्ध होता गया है कि इंसानों के बीच कोई खास फर्क नहीं है। रंग के आधार पर किसी नस्ल को कमतर या श्रेष्ठ नहीं बताया जा सकता। त्वचा का बदलता रंग एक विकासवादी प्रक्रिया का हिस्सा है।
त्वचा के रंग की विविधता पर हाल ही में एक ऐतिहासिक अध्ययन सामने आया है। जीन के विकास का पता लगाने में जुटी टीम ने यह जांचा कि जीन दुनिया भर में कैसे यात्रा करते हैं। टीम इस नतीजे पर पहुंची है कि अफ्रीकी मूल के लोगों के एक बडे़ हिस्से में जीन में ऐसे बदलाव हुए, जो उनकी त्वचा के रंग के लिए जिम्मेदार हैं। साइंस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि दो जीन, एचईआरसी 2 और ओसीए 2, यूरोपीयों की हल्की त्वचा, आंखों और बालों से जुड़े हैं। वास्तव में, अफ्रीका एक ऐसा महादेश है, जहां हर रंग के लोग पाए जाते हैं। अत: यह नहीं कहा जा सकता कि रंग के आधार पर उनमें कोई किसी से श्रेष्ठ या कमतर है। त्वचा का रंग एक जैविक प्रक्रिया मात्र है। कोई तुक नहीं कि नस्लवाद जारी रखा जाए।
18वीं शताब्दी में स्वीडिश प्रकृतिवादी कोरोलस लिनिअस ने इंसानों को चार समूहों में बांटा था, यूरोपीय, अमेरिकी, एशियाई और अफ्रीकी। 19वीं सदी के पहले दशक में अमेरिका में एक मानव विज्ञानी सैमुअल जॉर्ज मॉर्टन हुए, जो दुनिया भर से मिली खोपड़ियों को मापते रहे और यह बताया कि रंग व श्रेष्ठता का रिश्ता मस्तिष्क के आकार से जुड़ा है। वह बताना चाहते थे कि श्वेत लोगों की खोपड़ी बड़ी होती है और इसीलिए वे श्रेष्ठ होते हैं, जबकि सच यह कि खोपड़ी के आकार से श्रेष्ठता का कोई लेना-देना नहीं है। अश्वेतों की भी खोपड़ी बड़ी होती है और श्वेतों में भी छोटी खोपड़ी पाई जाती है। पहले भी ऐसे वैज्ञानिक थे, जो बड़ी खोपड़ी और श्रेष्ठता के बीच किसी रिश्ते को खारिज करते थे, पर ऐसे वैज्ञानिकों को नजरंदाज कर दिया जाता था। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि श्वेत श्रेष्ठ हैं, इसलिए वे अश्वेतों पर राज करने के अधिकारी हैं और इसी गलत विचार का परिणाम है कि आज भी श्वेत पुलिस वाले निर्दोष अश्वेत के गले पर सवार हो उसके प्राण ले लेते हैं। अनेक वैज्ञानिक यह मानते रहे हैं कि दुनिया में करीब 63 नस्ल के इंसान रहते हैं, लेकिन श्रेष्ठता नस्ल से तय नहीं होती। 1990 से 2003 के बीच हुए डीएनए अनुसंधान के तहत आनुवंशिकी के साथ मानव वंश को डिकोड करने के बाद पाया गया कि सभी मानव समान हैं, उनमें असाधारण रूप से 99.9 प्रतिशत साम्यता है। जो 0.1 प्रतिशत अंतर है, वह सिर्फ हमारे वातावरण और कुछ अन्य बाहरी कारकों से तय होता है। वैज्ञानिक आईक्यू या बौद्धिक स्तर के आधार पर भी नस्लभेद को खारिज कर चुके हैं। संदेश स्पष्ट है, यदि हर इंसान को एक तरह का पालन-पोषण, शिक्षा और परिवेश मिले, तो इंसानों के बीच कोई असमानता नहीं रह जाएगी।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूर घर वापस आ गए थे, लेकिन अब राजनीतिक हथियार की तरह उपयोग होने के बाद धीरे-धीरे उन्हीं शहरों में लौटने लगे हैं, जहां से उन्होंने वापसी की थी। मजदूरों की वापसी की मजबूरी समझी जा सकती है, क्योंकि जिस वक्त वे अपने घर लौटे थे, तब सरकार सहित तमाम संस्थानों ने उनको अपने ही राज्य में कुशलता के आधार पर रोजगार देने की बात कही थी, लेकिन मजदूरों के हाथ खाली ही रहे। अब जब सब कुछ धीरे-धीरे खुल रहा है, तो इन मजदूरों के लिए दो वक्त की रोटी जुटा पाना भी मुश्किल हो रहा है। परिवार के भरण-पोषण के लिए वे फिर परदेश का रुख करने लगे हैं, जबकि वहां इस बात की गारंटी कोई लेने को तैयार नहीं है कि यदि इस प्रकार की विपदा फिर आती है, तो क्या उन्हें सरकार पर भरोसा करना चाहिए? ऐसे में, क्या यह अच्छा नहीं होगा कि हुनर के हिसाब से उनको अपने राज्यों में ही काम मिले, ताकि उन्हें फिर से प्रवासी बनने की पीड़ा न भुगतनी पड़े?
अभिनव त्रिपाठी
बेल्थरा रोड, बलिया
उकसावे में नेपाल
आजकल भारत और नेपाल के बीच तनाव चल रहा है। बिगड़ते आपसी रिश्ते की वजह नेपाल में बढ़ता राष्ट्रवाद है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तमाम घरेलू मुद्दों पर असफल हो चुके हैं। अपनी सरकार बचाने के लिए वे लोगों में राष्ट्रवादी सोच भरना चाहते हैं। राष्ट्रवाद का होना अच्छी बात है, लेकिन जब यह साम्राज्यवाद के साथ मिल जाता है, तब बहुत खतरनाक हो जाता है। ऐसा हमें यूरोप में देखने को मिला था, जब साम्राज्यवाद से जुड़कर राष्ट्रवाद 1914 में यूरोप को महाविपदा की ओर ले गया। नेपाल का राष्ट्रवाद भी इसी कदम पर बढ़ता दिख रहा है, जो उसे महाविपदा की ओर ले जाएगा।
चेतन कुमार कर्ण
साथ दे विपक्ष
लोकतंत्र में विपक्ष की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उसका काम सरकार को सलाह देना, गलत निर्णय का विरोध करना और सही फैसले का स्वागत करना है। विपक्ष का काम यह नहीं है कि वह सरकार के अच्छे कामों का भी विरोध करे। वर्तमान परिस्थिति में विपक्ष सरकार को सुझाव दे, न कि विकास के कामों को रोकने का प्रयास करे। जैसे, चीन के मुद्दे पर विपक्ष को सरकार और सेना के साथ चलना चाहिए। साथ ही सेना की कार्यशैली पर उसे सवाल नहीं उठाना चाहिए। मगर विपक्ष के ऐसा न करने से जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है। सत्ता पाने के लिए हर हद तक उतर जाना राजनीतिक दलों को शोभा नहीं देता।
रितेश आनंद, गोड्डा, झारखंड
सावधानी जरूरी
विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख के अनुसार, कोरोना महामारी का अभी सबसे बुरा समय आना बाकी है। यहां उल्लेखनीय है कि चीन में लगभग छह महीने पहले कोविड-19 का पहला मामला सामने आया था। तब अनुमान लगाया गया था कि इससे अधिकतम आठ सौ लोग मारे जाएंगे, लेकिन आज कोरोना से एक करोड़ से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और पांच लाख से ज्यादा लोगों की जान यह वायरस ले चुका है। एक कहावत है कि अगर आप गीदड़ का शिकार करने जा रहे हैं, तो तैयारी शेर के शिकार की होनी चाहिए। लेकिन अपने यहां जन-सामान्य में कोविड-19 को लेकर उल्टा ही ट्रेंड दिख रहा है। बिना मास्क के घूमना, दो गज की दूरी का पालन न करना और इस बीमारी को हल्के में लेना इसके संक्रमण के ग्राफ को प्रतिदिन नई ऊंचाइयां दे रहा है। सरकार ने विगत तीन महीने में जागरूकता पैदा कर दी है, लेकिन कुछ लोग अपनी ही धुन में हैं। वे अपनी और अपने परिवार के लोगों के लिए तो संकट बुला ही रहे हैं, समाज और देश का भी अहित कर रहे हैं।
मनोज कुमार शर्मा, स्याना
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
