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खाना खजाना / शौर्यपथ / ईद-उल-अजहा के लाजवाब व्यंजन
शीरखुरमा
सामग्री :
100 ग्राम सेंवई, 1 टेबलस्पून घी, 3 लीटर दूध, 250 ग्राम शक्कर, 10-12 टेबलस्पून पिसा हुआ चावल, 4-5 हरी इलायची दाने पिसे हुए, 1 कप मिल्क पावडर, 100 ग्राम खारक रातभर पानी में भिगोकर रखे और बारीक कटे हुए, 50 ग्राम बादाम बारीक कटे हुए, 50 ग्राम किशमिश, 50 ग्राम पिस्ता, 50 ग्राम नारियल के बारीक कतले तथा 1 टेबलस्पून केवड़ा।
विधि :
सबसे पहले इलायची पावडर, चावल के पावडर तथा शकर को थोड़े से दूध में घोलकर रखें। घी को एक बड़े बर्तन में धीमी आंच पर गर्म करें। इस घी में सेंवई डालकर सुनहरा होने तक भूनें। इसे बार-बार पलटते रहें ताकि ये जले नहीं। अब भूरी हो गई सेंवई को एक प्लेट में अलग निकालकर रख दें। उसी बर्तन में अब दूध डाल दें और उबालें।
उबलते दूध में इलायची पावडर, शकर तथा पिसा हुआ चावल डाल दें। दूध को मध्यम आंच पर गाढ़ा होने तक उबालें और बीच में चलाते रहें। अब इसमें खारक, बादाम, किशमिश, पिस्ता, नारियल तथा सेंवई डाल दें। सेंवई के नर्म होने तक इसे पकाएँ। अब आँच पर से उताकर केवड़ा डालें और थोड़े और ड्राययफ्रूट्स से सजाकर पेश करें।
चिकन सैंडविच विद बटर
सामग्री :
8 स्लाइस डबल रोटी, 1 कप छोटे टुकड़ों में कटा व पका हुआ चिकन, 1 बड़ा प्याज बारीक कटा हुआ, आधा कप हरा धनिया, 3 हरी मिर्च बारीक कटी, चौथाई कप मेयोनेज, चौथाई कप खट्टी मलाई, मक्खन, स्वादानुसार नमक।
विधि :
सबसे पहले डबल रोटी पर मक्खन लगाएं। फिर चिकन में प्याज, हरी मिर्च, नमक, मलाई और मेयोनेज मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें।
इस मिश्रण को मक्खन लगी डबल रोटी पर लगाएं और दूसरी डबल रोटी से उसे कवर करें। सैंडविच को टोस्टर में रखकर सेंकें और मूली और गाजर के साथ सर्व करें।
मसालेदार चिकन बिरयानी
सामग्री :
एक किलो चिकन, एक किलो बासमती चावल, 250 ग्राम रिफाइंड तेल, 500 ग्राम कटा प्याज, 500 ग्राम कटे टमाटर, एक कप दही, 10-15 हरी मिर्च लंबी कटी हुई, पांच-पांच ग्राम दालचीनी, इलायची व लौंग, एक बड़ा चम्मच लहसुन-अदरक का पेस्ट, दो लीटर पानी, नमक स्वादानुसार।
विधि :
सबसे पहले चावल को साफ करके आधे घंटे के लिए पानी में भिगो दें। चिकन को बड़े-बड़े टुकड़ों में काट लें। आवश्यक मात्रा में तेल गर्म करके प्याज भूनें। अब हरी मिर्च, इलायची, दालचीनी, लौंग मिलाए तथा भून लें।
प्याज सुनहरे हो जाने के पश्चात लहसुन-अदरक का पेस्ट और टमाटर डालकर सभी को भूनें। चिकन के टुकड़े, दही, नमक डालें। चिकन को पकने दें। अब चावल और आवश्यकतानुसार करीब दो लीटर पानी डालें तथा पकने दें। अब अच्छी तरह मिलाकर ढक्कन बंद करके चावलों को पकने दें।
मसालेदार चिकन चॉप्स
सामग्री :
4 मध्यम आकार के चिकन के टुकड़े, 4 हरी मिर्च, एक मध्यम आकार का प्याज, 1 बड़ा चम्मच बारीक कटा अदरक-लहसुन, आधा छोटा चम्मच पेपर कॉर्न, एक चुटकी हल्दी पावडर, आधा कप बारीक कटा हरा धनिया, एक बड़ा चम्मच घी और स्वादानुसार नमक।
विधि :
चिकन को लेकर उसके सभी तरफ छुरी की सहायता से चीरा लगाएं और अलग रखें। अब जार में कटी प्याज, हरी मिर्च, हरा धनिया, अदरक-लहसुन, पेपर कॉर्न, हल्दी और नमक मिला कर मिक्सर ग्राइंडर में पीसें और एक पेस्ट बना लें।
अब इस पेस्ट को चिकन के साथ अच्छी तरह से मिलाएं और एक घंटे के लिए ऐसे ही छोड़ दें। अब एक फ्राइंग पैन में तेल गर्म होने के लिए रखें। जब तेल अच्छा गर्म हो जाए तब इसमें चिकन के टुकड़े डालें और मध्यम आंच पर 10 मिनट तक पकाएं।
इसके बाद इसे ढंक दें और तीन मिनट तक या फिर चिकन के नर्म होने तक धीमी आंच पर पकाएं। ताजे हरे धनिए की पत्तियों और तली हुई प्याज के साथ परोंसे।
सीक कबाब
ईद-उल-अजहा के खास मौके पर सीक कबाब बनना भी लाजिमी है। कई सारे खुशबूदार मसालों से तैयार सीक कबाब का स्वाद ऐसा होता है कि एक बार खाने के बाद इसका स्वाद भूल नहीं पाएंगे आप। इसको बनाने के लिए चिकन के बहुत ही बारीक पीस में मसाले मिलाकर कबाब तैयार किए जाते हैं और उन्हें चटनी के साथ परोसा जाता है। यह व्यंजन हर किसी को पसंद आता है।
लाजवाब हैदराबादी मटन
सामग्री :
500 ग्राम मटन, दो प्याज, एक टमाटर, दो बड़े चम्मच अदरक-लहसुन का पेस्ट, तीन हरी मिर्च, दो बड़े चम्मच किसा नारियल, पाव चम्मच हल्दी, दो चम्मच धनिया पावडर, आधा चम्मच जीरा पावडर, एक चम्मच लाल मिर्च पावडर, आधा छोटा चम्मच गरम मसाला, एक कप दही, एक दालचीनी का टुकड़ा, 4 लौंग, दो हरी इलाइची, एक तेज पत्ता, एक बड़ा चम्मच खसखस, थोड़ी-सी केसर, एक बड़ा चम्मच क्रीम, दो बड़े चम्मच तेल, एक बड़ा चम्मच घी और स्वादानुसार नमक।
विधि :
सबसे पहले मटन को अच्छी तरह साफ कर लें। अब एक बड़े चम्मच कुनकुने दूध में केसर को भिगाकर रखें। खसखस को 10 मिनट तक पानी में भिगाकर रखें। अब मटन के टुकड़ों को एक बड़े कटोरे में लें, इसमें अदरक-लहसुन का पेस्ट, हरी मिर्च, लाल मिर्च, धनिया तथा जीरा पावडर और दही मिलाएं। अच्छी तरह मिलाने के बाद इसे एक घंटे के लिए ऐसे ही छोड़ दें।
अब खसखस और किसे हुए नारियल को पीस कर इसका पेस्ट बना लें। एक कड़ाही में तेल और घी गर्म करें। जब यह उबलने लगे तब इसमें सारे मसाले मिला दें और थोड़ी देर पकाएं। फिर इमसें प्याज डालें और सुनहरा-भूरा होने तक पकाएं।
तत्पश्चात इसमें टमाटर डालें और तेल छोड़ने तक पकाएं। इसके बाद इसमें मटन डालें और अच्छी तरह मिलाएं। इसे ढक्कन से ढंक कर धीमी आंच पर ग्रेवी के गाढ़े होने तक पकाएं। फिर इसमें खसखस और नारियल का पेस्ट डालें और अच्छे से मिलाएं। फिर से इसे ढंके और 2 मिनट तक पकाएं। अब इसमें 1½ कप पानी मिलाएं और उबलने दें। जब यह उबलने लगे तब इसमें स्वादानुसार नमक डालकर अच्छी तरह मिलाएं।
धीमी आंच पर ढंक कर इसे मटन के नर्म होने तक पकाएं और जब ग्रेवी आपकी इच्छानुसार गाढ़ी हो जाए, तब इसमें गरम मसाला डालकर अच्छे से मिलाएं। फिर इसमें दूध में भीगा हुआ केसर मिलाएं और आंच बंद कर दें। कटे हुए बादाम और हरे धनिए से सजा कर परोसें।
स्वीटकॉर्न चिकन सूप
सामग्री :
उबला हुआ चिकन 250 ग्राम, 4 भुट्टे, 2 चम्मच मक्खन, 1 प्याज कद्दूकस किया हुआ, 1 ली. पानी, 40 ग्राम कॉर्नफ्लोर (पानी मिला कर तैयार किया गया पेस्ट), नमक और काली मिर्च स्वादानुसार, 1 चम्मच शक्कर, 1 चम्मच अजीनोमोटो, 2 चम्मच सफेद विनेगर।
विधि :
चार में से तीन भुट्टे बारीक पीस लें। एक भुट्टे के बारीक टुकड़े काट लें और पीसे हुए भुट्टे में मिलाकर रख दें। अब एक पेन में मक्खन डालकर कद्दूकस प्याज तलकर उसमें भुट्टे का मिश्रण और उबला हुआ चिकन मिला लें।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ /आमतौर पर महिलाएं व लड़कियां अपनी त्वचा की रंगत निखारने के लिए पार्लर में ब्लीच करवाती है या कई बार घर पर खुद ही करती है। अगर आप भी घर पर खुद से ब्लीच करती हैं तो ये 10 बातें आपको जरूर जानना चाहिए -
1. चेहरे को साफ-सुथरा व कांतिमय बनाने के लिए 'ब्लीच' एक बेहतर विकल्प है। ब्लीच आपकी त्वचा के अनचाहे बालों को छिपाने के साथ ही त्वचा में सोने सा निखार भी लाता है।
2. ब्लीच का इस्तेमाल हाथ, पैर व पेट पर भी वेक्स के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।
3. ध्यान रहे ब्लीच में अमोनिया की मात्रा निर्देशानुसार ही मिलाए। इसमें अमोनिया की अधिक मात्रा आपके चेहरे को नुकसान पहुंचा सकती है।
4. इसे लगाते समय बस इस बात का जरूर ध्यान रखें कि यदि यह आंखों के ऊपर लग गया तो बहुत अधिक नुकसानदेह हो सकता है। बेहतर होगा कि आप इसे आंखों व आई ब्रो पर नहीं लगाएं।
5. आजकल बाजार में कई प्रकार की कंपनियों के ब्लीच उपलब्ध हैं, जिनके ट्रायल पैक का इस्तेमाल कर आप उन्हें अपनी स्कीन पर आजमा सकती है।
6. बॉक्स पर दिए गए निर्देशानुसार ही ब्लीच क्रीम में अमोनिया पावडर की मात्रा डालें।
7. क्रीम और पावडर के इस मिश्रण को पहले कोहनी पर या अन्य जगह पर लगाकर देखें।
8. त्वचा में अधिक जलन होने पर मिश्रण में क्रीम की मात्रा बढ़ाएं।
9. हमेशा ब्रांडेड कंपनी का ही ब्लीच इस्तेमाल करें।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / कोरोनावायरस से बचने के लिए सोशल डिस्टेंसिग रखी जा रही हैं। वहीं राखी का त्योहार भी नजदीक है, ऐसे में महिलाएं पार्लर जानें से बचना चाहती है, लेकिन बढ़ी हुई आईब्रो भी उन्हें काफी परेशान कर रही हैं। यदि आप भी चाहती है। बिना पार्लर जाएं घर में आइब्रो को सही शेप देना। तो ये लेख आपके लिए हैं। तो आइए जानते है कुछ खास टिप्स जिसकी मदद से आप बिना पार्लर का रूख किए घर में ही अपनी आईब्रो को सही शेप दे सकती हैं।
सबसे पहले आप गुनगुने पानी से अपने चेहरे को धो लीजिए। अब इसे आईब्रो ब्रश के माध्यम से अच्छी तरह से साफ कर लें।
अब आपको अपनी त्वचा को एक हाथ से टाइट पकड़ना है। अब धीरे-धीरे अपने आईब्रो के बालों को आईब्रो प्लकर (tweezer) की मदद से निकालें। लेकिन इस बात का जरूर ध्यान दें कि आप एक-एक करके अपने आईब्रो के बालों को साफ करें ताकि आपको इससे ज्यादा तकलीफ न हो, क्योंकि ऐसे में त्वचा लाल भी पड़ सकती है। जब आप आईब्रो को साफ करें तो इस बात का ध्यान रखें कि आपको हेयर ग्रोथ के डायरेक्शन में ही इसे निकालना है।
अब लंबी आईब्रो को सेट करने के लिए आईब्रो कैंची का इस्तेमाल करें और इन्हें सही शेप में लाएं।
अब अपनी आईब्रो को ब्रश के माध्यम से चेक करें कि आपकी आईब्रो सही शेप में आई है या नहीं?
इस बात का जरूर ध्यान दें कि आपको रोज थोड़े-थोड़े आईब्रो के एक्स्ट्रा बालों को निकालना है। यदि आप एक साथ ऐसा करती हैं, तो आपकी त्वचा लाल पड़ सकती है। साथ ही ज्यादा ग्रोथ का इंतजार न करें, थोड़ी ही ग्रोथ में इन्हें साफ करना शुरू कर दें तो ही यह बेहतर है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / महाभारत में भगवान श्री कृष्ण के बहुत सारे शत्रु थे जिसमें से सबसे बड़ा शत्रु तो मगध का शासक जरासंध था। हालांकि हम यहां सिर्फ उन लोगों के बारे में संक्षिप्त में बताएंगे तो भगवान श्रीक कृष्ण के रिश्तेदार होने के बावजूद उनके कट्टर शत्रु थे।
1.कंस मामा : भगवान कृष्ण का मामा था कंस। वह अपने पिता उग्रसेन को राज पद से हटाकर स्वयं शूरसेन जनपद का राजा बन बैठा था। कंस को मालूम था कि मेरी बहन देवकी का आठवां पुत्र मेरी मौत का कारण बनेगा। यही कारण था कि वह भगवान श्री कृष्ण को हर हाल में मारना चाहता था। बहुत प्रयास करने के बाद भी जब वह बाल कृष्ण को नहीं मार पाया तब योजना अनुसार कंस ने एक समारोह के अवसर पर कृष्ण तथा बलराम को आमंत्रित किया।
वह वहीं पर कृष्ण को मारना चाहता था, किंतु कृष्ण ने उस समारोह में कंस को बालों से पकड़कर उसकी गद्दी से खींचकर उसे भूमि पर पटक दिया और इसके बाद उसका वध कर दिया। कंस को मारने के बाद देवकी तथा वसुदेव को मुक्त किया और उन्होंने माता-पिता के चरणों में वंदना की। लेकिन इस एक घटना से जरासंध उनका कट्टर शत्रु बन गया, क्योंकि कंस जरासंध का जमाई था। जरासंध के कारण ही कृष्ण और कालयवन का युद्ध हुआ था।
2.शिशुपाल : शिशुपाल कृष्ण की बुआ का लड़का था। जब शिशुपाल का जन्म हुआ तब उसके 3 नेत्र तथा 4 भुजाएं थीं। वह गधे की तरह रो रहा था। तभी आकाशवाणी हुई कि बालक बहुत वीर होगा तथा उसकी मृत्यु का कारण वह व्यक्ति होगा जिसकी गोद में जाने पर बालक अपने भाल स्थित नेत्र तथा दो भुजाओं का परित्याग कर देगा। इस आकाशवाणी और उसके जन्म के विषय में जानकर अनेक वीर राजा उसे देखने आए। शिशुपाल के पिता ने बारी-बारी से सभी वीरों और राजाओं की गोद में बालक को दिया।
अंत में शिशुपाल के ममेरे भाई श्रीकृष्ण की गोद में जाते ही उसकी 2 भुजाएं पृथ्वी पर गिर गईं तथा ललाटवर्ती नेत्र ललाट में विलीन हो गया। इस पर बालक की माता ने दु:खी होकर श्रीकृष्ण से उसके प्राणों की रक्षा की मांग की। श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं इसके 100 अपराधों को क्षमा करने का वचन देता हूं।
शिशुपाल के शत्रु होने के कई कारण थे। उनमें से एक कारण यह भी था कि शिशुपाल अपने मित्र रुक्म की बहन रुक्मणि से विवाह करता चाहता था। लेकिन वह ऐसा कर नहीं सकता। रुक्मणी ने भगवान श्रीकष्ण से विवाह किया था। कालांतर में शिशुपाल ने अनेक बार श्रीकृष्ण को अपमानित किया और उनको गाली दी, लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें हर बार क्षमा कर दिया। अंत में एक सभा में जब शिशुपाल ने 100वां अपराध किया तब श्री कृष्ण ने अपने सुदर्शन से उसका सिर अलग कर दिया। शिशुपाल ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए जरासंध से संधि कर रखी थी। जरासंध के साथ मिलकर उसने श्रीकृष्ण पर कई हमले किए थे।
3.दुर्योधन : भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा का हरण करके विवाह किया था। दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण का समधी था। ऐसे कई मौके आए जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को शक्तिसंपन्न होने से रोक दिया। हालांकि दुर्योधन श्रीकृष्ण का शत्रु होने के बावजूद उनसे मित्रता रखता था। लेकिन उसने श्रीकृष्ण की मित्रता को उतना महत्व नहीं दिया जितना की कर्ण की मित्रता को दिया।
दुर्योधन ने तीन गलतियां की थी। पहली यह कि उसने श्रीकृष्क्ष की जगह उनकी नारायणी सेना का चयन किया। दूसरी यह कि अपनी माता के लाख कहने पर भी वह उनके सामने पेड़ के पत्तों से बना लंगोट पहनकर गया। तीसरी यह कि तीसरी और अंतीम गलती उसने की थी वो थी युद्ध में आखिर में जाने की भूल। यदि वह पहले ही जाता तो कई बातों को समझ सकता था और शायद उसके भाई और मित्रों की जान बच जाती। लेकिन श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से कहा कि 'तुम्हारी हार का मुख्य कारण तुम्हारा अधर्मी व्यवहार और अपनी ही कुलवधू का वस्त्राहरण करवाना था। तुमने स्वतयं अपने कर्मों से अपना भाग्य लिखा।'
4.कर्ण : कुंति पुत्र कर्ण एक महान योद्ध था जो कौरवों की ओर से लड़ा था। कुंती श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन और भगवान कृष्ण की बुआ थीं। कुंति का पुत्र होने के कारण कर्ण भगवान श्री कृष्ण का भाई था। कृष्ण के कारण ही कर्ण को अपने कवच और कुंडलों को इंद्र को दान देने पड़े थे। युद्ध के सत्रहवें दिन शल्य को कर्ण का सारथी बनाया गया। उस दिन कर्ण तथा अर्जुन के मध्य भयंकर युद्ध होता है। युद्ध के दौरान श्री कृष्ण अपने रथ को उस ओर ले जाते हैं जहां पास में ही दलदल होता है। कर्ण का सारथ यह देख नहीं बाता है और उसके रथ का एक पहिया दलदल में फंस जाता है।
रथ के फंसे हुए पहिये को कर्ण निकालने का प्रयास करते हैं। इसी मौके का लाभ उठाने के लिए श्रीकृष्ण अर्जुन से तीर चलाने को कहते हैं। बड़े ही बेमन से अर्जुन असहाय अवस्था में कर्ण का वध कर देता है। इसके बाद कौरव अपना उत्साह हार बैठते हैं। उनका मनोबल टूट जाता है। फिर शल्य प्रधान सेनापति बनाए जाते हैं, परंतु उनको भी युधिष्ठिर दिन के अंत में मार देते हैं। श्री कृष्ण ने अर्जुन को बचाने के लिए कई उपक्रम किए थे।
5.मित्रवन्दा : अवन्ती के राजा थे विन्द और अनुविन्द। उनकी बहिन मित्रविन्दा ने स्वयंवर में श्रीकृष्ण को ही अपना पति बनाना चाहा लेकिन उनके भाइयों ने रोक दिया, क्योंकि वे दुर्योधन के वशवर्ती तथा अनुयायी थे। वे चाहते थे कि उनकी बहिन का विवाह दुर्योधन से ही हो। मित्रविन्द श्रीकृष्ण की बुआराज्याधिदेवी की कन्या थी। राज्याधिदेवी की बहिन कुंति थी। इसका मतलब यह कि मित्रविन्दा श्रीकृष्ण की बहिन थी। भगवान श्रीकृष्ण राजाओं की भरी सभा में मित्रविन्दा का हरण कर ले गए। इस दौरान बलराम और श्रीकृष्ण को मित्रवन्दा के भाइयों से युद्ध भी करना पड़ा था।
6.रुक्म : महाभारत के अनुसार विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी के 5 भाई थे- रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली। रुक्मिणी श्रीकृष्ण से विवाह करना चाहती थी लेकिन उसके भाई उसका विवाह शिशुपाल से करना चाहते थे। शिशुपाल का गहरा मित्र था रुक्म। रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो।
रुक्म ने माता-पिता के विरोध के बावजूद अपनी बहन का शिशुपाल के साथ रिश्ता तय कर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं। रुक्मिणी को जब इस बात का पता लगा, तो वह बड़ी दुखी हुई। उसने अपना निश्चय प्रकट करने के लिए एक ब्राह्मण को द्वारिका श्रीकृष्ण के पास भेजा। अंतत: रुक्म और शिशुपाल के विरोध के कारण ही श्रीकृष्ण को रुक्मिणी का हरण कर उनसे विवाह करना पड़ा। श्री कृष्ण को इस दौरान रुक्मी से युद्ध भी करना पड़ा था।
नजरिया / शौर्यपथ / प्रेमचंद को कैसे पढ़ें? यह सवाल इसलिए जरूरी है कि प्रेमचंद को पढ़ने की इतनी दृष्टियां, विचार और उठा-पटक है कि इन सबके बीच मूल प्रेमचंद छिप से जाते हैं। जब से प्रेमचंद ने लिखना शुरू किया, विवाद उनके पीछे लगे रहे। कोई कहेगा कि ग्राम जीवन तो ठीक, शहरी जीवन प्रेमचंद से नहीं सधता। कोई कहेगा, समाज का बाहरी स्वरूप तो है, मन की जटिलताओं की समझ नहीं है। कोई कहेगा, स्त्री मन की समझ नहीं है। उन पर बहुतेरे हमले भी हुए, मगर यह तय है कि शताब्दियों से जिनका जीवन व संघर्ष साहित्य से बहिष्कृत था, उन्हें वह साहित्य के दायरे में ले आए। साहित्य के परिसर में सूरदास, होरी, धनिया, दुक्खी, मंगल, गंगी, घीसू, माधो जैसे पात्रों का दाखिला हुआ और उनके जीवन की कहानी कही जाने लगी। साहित्य में पहले से जड़ जमाए लोगों की जमीन सरकनी शुरू हुई, तो उन पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगा, मुकदमे हुए। उन्हें घृणा का प्रचारक कहा गया। जब गोरखपुर में गांधी का आगमन हुआ, तब प्रेमचंद सुनने गए और लौटकर थोडे़ दिन में सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। गांधी व उनके आंदोलन के प्रति सहानुभूति थी, लिहाजा प्रेमचंद का एक गांधीवादी पाठ तैयार हुआ। उन्हें गांधीवाद के दायरे में पढ़ने का नजरिया सामने आया।
मृत्यु के थोड़े दिनों पहले प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता की। प्रगतिशील धारा ने उन्हें अपने गोल में शामिल मान लिया और उनका प्रगतिशील पाठ सामने आया। प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने साहित्य का उद्देश्य शीर्षक व्याख्यान दिया था, जिसे प्रगतिशीलता के घोषणापत्र का दर्जा मिला। पर इसी व्याख्यान में उनके कथन ‘लेखक स्वभावत: प्रगतिशील होता है’, के हवाले से उन्हें प्रगतिशील खेमे से बाहर दिखाने की कोशिशें होती रहीं और प्रेमचंद का हिंदू पाठ भी तैयार हुआ। इसी क्रम में दलित आंदोलन आया और उसने प्रेमचंद को दलित विरोधी करार दिया। इन तमाम बातों के बावजूद समाज में उनकी मौजूदगी बदस्तूर बनी हुई है। जो उनसे प्यार करते हैं, वे पंथ-वाद के पचडे़ में नहीं पड़ते।
यहां दिलचस्प सवाल है, वह सूत्र क्या है, जिससे प्रेमचंद इतने महबूब लेखक बने हुए हैं? यहां मेरे ध्यान में दो निबंध आते हैं। एक लेख कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का है, मेरी मां ने मुझे प्रेमचंद का भक्त बनाया और दूसरा लेख व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का है, प्रेमचंद के फटे जूते। इन दोनों लेखकों को प्रेमचंद पर लिखने की प्रेरणा उनका फोटो देखकर हुई थी। परसाई लिखते हैं, ‘प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फोटो खिंचा रहे हैं। ...दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है, जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है। ...सोचता हूं, फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी?’
अब मुक्तिबोध का बयान सुन लीजिए, ‘प्रेमचंद और प्रसाद, दोनों खड़े हैं।... जूते की कैद से बाहर निकलकर अंगुलियां बड़े मजे से मैदान की हवा खा रही हैं। फोटो खिंचवाते वक्त प्रेमचंद अपने विन्यास से बेखबर हैं। उन्हें तो इस बात की खुशी है कि वह प्रसाद के साथ खड़े हैं, और फोटो निकलवा रहे हैं’। यानी दोनों लेखकों को प्रेमचंद की सहजता आकृष्ट करती है। दोनों ने प्रेमचंद का जो चित्र खींचा है, वह आम भारतीय का ही चित्र है। प्रेमचंद की असाधारणता का स्रोत वास्तव में उनकी साधारणता में है। मुक्तिबोध लिखते हैं, ‘मेरी मां सामाजिक उत्पीड़नों के विरुद्ध क्षोभ और विद्रोह से भरी हुई थीं। ...वह स्वयं उत्पीड़ित थीं। और भावना द्वारा, स्वयं की जीवन-अनुभूति द्वारा, मां स्वयं प्रेमचंद के पात्रों में अपनी गणना कर लिया करती थीं’। मां के जरिए ही मुक्तिबोध को प्रेमचंद मिलते हैं।
दूसरी तरफ परसाई हैं, जो प्रेमचंद से पूछ बैठते हैं, ‘चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया?’ फिर इस सवाल का उत्तर भी देते हैं, ‘मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज, जो परत-पर-परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया’। परसाई इशारा करते हैं कि प्रेमचंद समाज में मौजूद बहुत से पत्थरों पर प्रहार करते हैं। इसलिए प्रेमचंद उन लोगों की पहली पसंद हैं, जिनकी राह में ठोकर मौजूद हैं। ऐसे लोग उन्हें अपना हमसफर पाते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) सदानंद शाही , प्रोफेसर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय
सम्पादकीय / शौर्यपथ /समय के अनुरूप शिक्षा नीति का बदलना जितना स्वाभाविक है, उतना ही आवश्यक भी। 34 साल बाद नई शिक्षा नीति का आना लगभग तय था, इसकी चर्चा तो दशक भर से चल रही थी, लेकिन समय के अनुरूप सबकी मंजूरी के साथ एक नीति तय करना आसान नहीं होता। अब जो नीतिगत बदलाव हो रहे हैं, उनका सबसे बड़ा पहलू यह है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता और उपयोगिता, दोनों को ही बल मिलेगा। स्कूली स्तर पर ही छात्रों को किसी न किसी कार्य कौशल से जोड़ दिया जाएगा। इसका अर्थ है, जब बच्चा स्कूल से पढ़कर निकलेगा, तो उसके पास एक ऐसा हुनर होगा, जिसका वह आगे की जिंदगी में इस्तेमाल कर सकेगा। इससे शिक्षा को एक व्यावसायिक बल भी मिलेगा। ऐसे करोड़ों मां-बाप होंगे, जो खुश होंगे कि उनका बच्चा स्कूल में न केवल पढ़ेगा, बल्कि कोई काम भी सीखेगा। नई शिक्षा नीति को अंतिम रूप देने के लिए बनाई गई समिति का नेतृत्व कर रहे डॉ कस्तूरीरंगन ने सही कहा है कि नई शिक्षा नीति बेरोजगार तैयार नहीं करेगी।
दूसरी बड़ी पहल यह हुई कि स्कूल शिक्षा को विभिन्न चरणों में बांट दिया गया है। यहां सर्वाधिक फायदा फाउंडेशन स्टेज पर होगा। भारत में उन बच्चों की एक बड़ी संख्या रही है, जो सीधे पहली कक्षा में दाखिला लेते रहे हैं। सरकारी विद्यालयों में नर्सरी या प्री-स्कूल या स्कूल पूर्व शिक्षा की जरूरत को नहीं माना जा रहा था। निजी क्षेत्र में प्री-स्कूल शिक्षा का विगत तीन दशकों में बहुत विकास हुआ है, जिससे सरकारी स्कूलों का आकर्षण भी घटा है। ज्यादातर निजी स्कूल सीधे पहली कक्षा में किसी बच्चे को प्रवेश नहीं देते हैं, लेकिन अब देश के सभी स्कूलों को प्री स्कूल शिक्षा का आदर करना पड़ेगा। यह बच्चों के ज्ञान-स्तर व पढ़ाई की एकरूपता के लिए जरूरी है। यह एक प्रमाण है कि शिक्षा में निजी क्षेत्र किस तरह से सरकारी शिक्षा को प्रभावित और संवद्र्धित करता है। प्री-स्कूल के लिए आंगनबाड़ी व्यवस्था का उपयोग यथोचित है। यह समय बुनियादी पढ़ाई में एकरूपता लाने की दिशा में कारगर हो सकता है। अब प्री-स्कूल के तीन वर्ष और सामान्य स्कूल के शुरुआती दो वर्ष अर्थात कुल पांच वर्ष के लिए नया पाठ्यक्रम बनाया जाएगा। यहां सरकार को तय करना होगा कि देश के सभी स्कूलों में यह पांच वर्षीय पाठ्यक्रम लागू हो जाए, ताकि बच्चों का समतापूर्ण शैक्षणिक विकास हो। नई शिक्षा नीति को यदि किसी ऊंचे मुकाम पर ले जाना है, तो बुनियादी अर्थात फाउंडेशन स्टेज पर ही शिक्षा की गुणवत्ता के लिए प्रयास करने पड़ेंगे।
10+2 और एफफिल की विदाई हो गई है। मोटे तौर पर एक्टिविटी आधारित शिक्षण पर ध्यान रहेगा। प्रयोगों के जरिए बच्चों को विज्ञान, गणित, कला आदि की पढ़ाई कराई जाएगी। कक्षा छह से पढ़ाई विषय आधारित होने लगेगी और कक्षा छह से ही कौशल विकास कोर्स भी शुरू हो जाएंगे। कक्षा नौ से 12 की पढ़ाई दो चरण में होगी, जिनमें विषयों का गहन अध्ययन कराया जाएगा। विषय चुनने की आजादी भी होगी। परीक्षा और प्रदर्शन का आकलन भी बदलने वाला है, इस मोर्चे पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और राज्यों के शिक्षा मंत्रालयों को ज्यादा सावधानी से काम करना होगा। बोर्ड की परीक्षा का तनाव घटे, लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता नहीं घटनी चाहिए। नई नीति को साकार करने के लिए शिक्षकों और शिक्षा प्रबंधन की गुणवत्ता भी सुधारनी पड़ेगी।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / बुधवार का दिन भारत के लिए ऐतिहासिक रहा। काफी साल के बाद देश में नए लड़ाकू विमानों का आगमन हुआ है। राफेल से पहले भारत ने रूस से सुखोई खरीदा था। अच्छी बात यह है कि जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, तभी से वह नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के लिए प्रयासरत है। राफेल के आने के बाद अब भारत अपनी ही जमीन से चीन और पाकिस्तान के अंदरूनी ठिकानों पर हवाई हमले कर पाएगा। इसी तरह, बुधवार की दूसरी घटना आने वाले समय में भारत को विश्व-गुरु बनाने की दिशा में सहायक साबित होगी। सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की है, जो मैकाले की शिक्षा नीति को पलटकर रख देगी। नई नीति से उद्यमी ज्यादा पैदा होंगे, क्योंकि इसमें किताबी ज्ञान से ज्यादा हुनर निखारने पर जोर दिया गया है। आजादी के बाद से ही इसकी आवश्यकता महसूस की जा रही थी, लेकिन पिछली सरकारों ने इस दिशा में कुछ ठोस नहीं किया। मौजूदा सरकार उम्मीदों पर खरी उतर रही है।
ब्रज किशोर सिंह
चुनौतियां कायम हैं
बेशक सरकार ने नई शिक्षा नीति को मंजूर कर लिया है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि बगैर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए यह नीति कैसे सफल हो पाती है? नई शिक्षा नीति के तहत सरकार का पहला फोकस 5+3+3+4 शिक्षा के लिए स्कूलों और कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना और प्रशिक्षित लोगों की नियुक्ति है। जाहिर है, इस नीति को उपयोगी बनाने के लिए इसमें आम लोगों की भागीदारी जरूरी है। नई नीति में कुछ बदलाव समय के अनुरूप जरूर किए गए हैं, पर अधिकांश परिवर्तन बगैर इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाए लागू करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसका शायद ही सुखद नतीजा निकले।
आशीष रंजन पांडे, बरडीहा, गढ़वा
मातृभाषा पर जोर
तमाम बाल मनोवैज्ञानिक व विशेषज्ञ लगातार यह कहते रहे हैं कि बच्चे की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। इसी भाषा में बच्चा आसानी से सीख और समझ सकता है और उसका बौद्धिक विकास भी तुलनात्मक रूप से बेहतर होता है। सन् 1882 में अंग्रेजों ने जो हंटर शिक्षा आयोग गठित किया था, उसने भी यही सिफारिश की थी कि प्राथमिक शिक्षा स्थानीय (मातृ) भाषा में दी जानी चाहिए। विडंबना ही है कि जिस तथ्य को अंग्रेजों ने वर्षों पहले पहचान लिया था, उसको लेकर हम आजादी के सात दशकों के बाद भी भ्रम की स्थिति में रहे। सुखद है कि नई शिक्षा नीति में इसे कुबूल कर लिया गया है और प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही देने की बात कही गई है। इससे बच्चों में सीखने, सोचने और समझने की क्षमता तेजी से बढ़ेगी। हमारा देश भी उन्नति और प्रगति के उच्चतम स्तर तक पहुंचेगा।
सुरेंद्र कुमार, नजफगढ़, दिल्ली
गांवों में फैलता संक्रमण
कोरोना का कहर ऐसा बरपा कि गांवों से पलायन कर चुके लोग भी वापस अपने घर को लौट आए। लाखों श्रमिकों की चुनौती भरी घर वापसी हम सबको याद ही है। लेकिन इन श्रमिकों के साथ वे लोग भी गांव वापस आए हैं, जो संपन्न थे। अध्ययन यह बता रहा है कि जिन शहरों में प्रदूषण का स्तर अधिक है, वहां कोरोना मरीजों की संख्या में वृद्धि देखी गई है। तापमान बढ़ने से कोरोना संकट कम होगा, यह तो महज एक अनुमान रहा, हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं दिखा। ऐसे में, मानसून के बाद ठंड की दस्तक मुश्किलें बढ़ा सकती हैं। ठंड में इम्यूनिटी कमजोर होना आम बात है। इसीलिए बीमारी फैलने का खतरा भी होगा। चिंता की बात यह है कि यह खतरा सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं होगा। गांवों की ओर रुख करने वाले लोग भी इससे बच नहीं पाएंगे। इसीलिए प्रशासन को अभी से ही तैयारी कर लेनी चाहिए।
कीर्ति सैनी, हिसार
ओपिनियन / शौर्यपथ / सरकार की किसी भी नीति का मूल मकसद होता है, समस्याओं को पहचानना और उनका बेहतर समाधान। नई शिक्षा नीति इस कसौटी पर कमोबेश खरी उतरती दिख रही है। मौजूदा वक्त में शिक्षा की घटती गुणवत्ता देश की सबसे गंभीर समस्या है। नई शिक्षा नीति इस पर ध्यान दे रही है। कई दूसरी समस्याओं का भी इसमें सैद्धांतिक हल ढूंढ़ा गया है। मगर बड़ा और अहम सवाल यह है कि इसे व्यावहारिकता की जमीन पर उतारना कितना आसान है? इसका जवाब खोजने से पहले हमें शिक्षा क्षेत्र की घटती गुणवत्ता की वजहों पर गौर करना होगा।
हमारा शिक्षा क्षेत्र योग्य शिक्षकों की कमी से लगातार जूझ रहा है। उनको प्रशिक्षण देने वाले बीएड और डीएलएड कॉलेज शिक्षा माफिया के गढ़ बन गए हैं। इनमें से कई कॉलेज तो ऐसे हैं, जो अस्तित्व में ही नहीं हैं, लेकिन डिग्रियां खूब बांटते हैं। यहां से प्रशिक्षण पाने वाले शिक्षक बच्चों को कैसी शिक्षा दे पाएंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है। नई शिक्षा नीति इस परंपरा को तोड़ने के लिए प्रतिबद्ध दिखती है। अब राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद शिक्षकों के लिए पेशेवर मानक तो तैयार करेगा ही, टीचर्स ट्रेनिंग के लिए एक नया सिलेबस भी बनाएगा, जिसके कारण शिक्षण-कार्य के लिए कम से कम योग्यता चार वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स हो जाएगी। इस पर फैसला तीन साल पहले ही हो गया था, लेकिन नई नीति के माध्यम से अब इसे अमल में लाने का प्रयास हो रहा है।
शिक्षकों का चयन भी एक बड़ी समस्या है। एक पूर्व मुख्यमंत्री शिक्षक चयन में फर्जीवाडे़ के कारण इन दिनों जेल में भी हैं। नई शिक्षा नीति इसके लिए चयन परीक्षा की वकालत करती है। इसके अलावा, वह यह भी सुनिश्चित करती है कि चयन के बाद शिक्षक पठन-पाठन में लगातार शामिल रहें और अपनी योग्यता को निखारने के लिए प्रशिक्षण-कार्य करते रहें। स्कूली बच्चों को मातृभाषा में पढ़ने की छूट देना भी एक अच्छी सोच है। हालांकि, इसे व्यावहारिक रूप में अमल में लाना मुश्किल होगा, क्योंकि आज स्कूलों को जितने शिक्षकों की दरकार है, उतने की भी नियुक्ति नहीं हो पा रही है। फिर, मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराने से ऐसे शिक्षकों की जरूरत बढ़ जाएगी, जो दो भाषाओं में दक्ष हों। जाहिर है, इन सबके लिए योग्य शिक्षकों के अलावा पर्याप्त धनराशि की भी जरूरत होगी, जिसके बारे में नई शिक्षा नीति स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहती।
खराब शैक्षणिक व्यवस्था की दूसरी वजह है, बच्चों के आकलन की गलत प्रक्रिया। मौजूदा मूल्यांकन प्रक्रिया से यह पता नहीं चलता कि बच्चा कितना सीख रहा है? इसके लिए अब एक राष्ट्रीय संस्था बनाई जाएगी, जो समय-समय पर मूल्यांकन करेगी। अब तक यह काम एनसीईआरटी के जिम्मे था, जो अच्छा काम तो कर रही थी, मगर एक विशेषज्ञ संस्था बन जाने से हालात और बेहतर होंगे। इस संस्था को न सिर्फ धरातल की समस्याओं का ज्ञान होगा, बल्कि उनके समाधान का मार्गदर्शन भी वह कर सकेगी।
तीसरा कारण था, नौनिहालों की शिक्षा पर नाममात्र का ध्यान। अभी तक इस बारे में ज्यादा सोचा ही नहीं गया था, जबकि सात-आठ साल का बच्चा दिमागी रूप से संयत हो जाता है। ‘अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन’ यानी बच्चों के शुरुआती दिनों की शिक्षा काफी मायने रखती है। नई शिक्षा नीति बताती है कि इसके लिए शिक्षा विभाग और बच्चों की बेहतरी में जुटी संस्थाएं आपस में मिलकर काम करेंगी।
चौथी वजह है, उच्च शिक्षा यानी महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए होने वाली रस्साकशी। इसी के कारण 10-12वीं की परीक्षा में परीक्षार्थियों को भाषा के पेपर में भी शत-प्रतशित अंक मिलने लगे हैं। चूंकि नई शिक्षा नीति के तहत दाखिले की परीक्षा आयोजित की जाएगी, इसलिए दसवीं-बारहवीं में परीक्षार्थियों पर बनने वाला अंकों का दबाव खत्म हो जाएगा। यह परीक्षा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होगी, जिससे बच्चे अपनी योग्यता के मुताबिक महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में दाखिला ले सकेंगे।
पांचवां कारण है, छात्र-छात्राओं का ढर्रे पर सोचना। इससे उच्च शिक्षा को लेकर नीरसता का माहौल बनने लगा था। मगर नई शिक्षा नीति पाठ्येत्तर गतिविधियों और वोकेशनल कोर्स पर पर्याप्त ध्यान दे रही है। इससे बच्चों में परंपरा से हटकर काम करने की सोच विकसित होगी, और आने वाले वर्षों में उनमें यह समझ भी विकसित हो सकेगी कि वोकेशनल कोर्स करने से नौकरी मिलने की संभावना तुलनात्मक रूप से ज्यादा है।
जाहिर है, नई शिक्षा नीति समस्याओं पर तो गौर कर रही है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर उनका आधा-अधूरा समाधान ही पेश कर रही है। इसमें पहली समस्या तो जाहिर तौर पर धनराशि के अभाव की है। पैसों का इंतजाम कैसे होगा, इस पर नई नीति चुप है। इसमें सिर्फ मान लिया गया है कि बजट का इंतजाम हो जाएगा। फिर, अन्य कठिनाइयां भी हैं, जैसे मातृभाषा में पठन-पाठन की मुश्किलें। जरूरी था कि शिक्षा की बेहतरी में निजी क्षेत्र के महत्व को पहचाना जाता। आंकडे़ साफ बताते हैं कि निजी स्कूल में जाने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। माना जाता है कि लगभग 50 प्रतिशत बच्चे अभी ही निजी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं। बेशक, सरकारी स्कूलों की व्यवस्था में सुधार जरूरी है, लेकिन निजी स्कूलों के महत्व को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। नई शिक्षा नीति निजी स्कूलों की बात एकाध जगहों पर करती भी है, तो उन पर नियंत्रण की बात करती है, उनको प्रोत्साहित करने की नहीं। अगर सरकार इनमें निवेश को प्रोत्साहित करे या निजी-सार्वजनिक सहयोग के तहत निजी स्कूलों को कुछ राहत दे, तो देश का शैक्षणिक माहौल काफी हद तक सुधर सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि निजी स्कूलों को मनमानी की छूट दे दी जाए। उन पर निगरानी रखते हुए उनका लाभ उठाने की जरूरत है।
नई शिक्षा नीति से इंस्पेक्टर राज के लौटने का भी एहसास होता है। इसमें उच्च शिक्षा के लिए एक ही नियामक संस्था की वकालत की गई है। तकनीकी रूप से उसे नियामक तो नहीं कहा गया है, लेकिन जिस तरह के दायित्व उसे सौंपे जाने की संभावना है, उससे वह काम नियामक का ही करेगी। इससे भी बचा जाना चाहिए था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) अनिल स्वरूप, पूर्व शिक्षा सचिव, भारत सरकार
राजनांदगांव / शौर्यपथ / एक ओर जहां कोविड-19 के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है वहीं दूसरी ओर पढ़ई तंूहर दुआर को अधिक सफल बनाने के उद्देश्य से राजनांदगांव जिले के मोहला विकासखंड अंतर्गत शासकीय प्राथमिक शाला रेंगाकठेरा में संसदीय सचिव इन्द्रशाह मंडावी ने स्मार्ट शाला का शुभारंभ किया। उल्लेखनीय है कि शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रेंगाकठेरा के शिक्षक मोहम्मद सईद कुरैशी ने स्वयं के व्यय से प्राथमिक शाला रेंगाकठेरा के बच्चों को बौद्धिक विकास एवं डिजिटल पढ़ाई कराने के उद्देश्य से स्मार्ट टी.वी. उपलब्ध कराया है जिसके कारण बच्चों में पढ़ाई के प्रति ललक एवं रुचि बढ़ी है और विद्यार्थियों को भी ऑनलाईन शिक्षा के लिए बेहतर सुविधा उपलब्ध हो सकी है।
शिक्षक सईद कुरैशी के इस पहल को मोहला-मानपुर विधायक इन्द्रशाह मंडावी एवं स्थानीय समाज सेवी संजय जैन ने शिक्षकों के लिए अनुकरणीय पहल बताया है। सईद कुरैशी इंग्लिश विषय के शिक्षक है जो एससीईआरटी रायपुर के पुस्तक प्रकाशक टीम के सदस्य भी है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए एवं छात्रों के हित में समय-समय पर निजी खर्च के द्वारा नवाचार भी करते रहते है। जिसके कारण इन्हें इस वर्ष राज्यपाल शिक्षक सम्मान के लिए भी चयनित किया गया है।
विधायक मंडावी ने अपने उद्बोधन में कहा कि सभी स्कूलों में डिजिटल पढ़ाई को बढ़ावा देकर लीड कर रहे जिला शिक्षा अधिकारी श्री हेतराम सोम, डीएमसी भूपेश साहू, जिला मीडिया प्रभारी सतीश ब्यौहरे और एबीईओ मोहला राजेन्द्र कुमार देवांगन की प्रसंशा की। उन्होंने कहा कि मोहला-मानपुर विकासखंड के बच्चे पढ़ाई के क्षेत्र में अग्रणी है। विगत कुछ सालों से यहां के बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बेहतर परिणाम ला रहें हैं और भविष्य में भी शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करते रहेंगे क्योंकि हमारा क्षेत्र पूरी तरह से विकास के पथ पर अग्रसर है। वर्तमान में मोहला के कई स्कूल डिजिटल पढ़ाई की दिशा में कदम बढ़ा रहे है। शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षकों को प्रेरित करके समुदाय से सहयोग लेकर की जा रही इस नवाचारी पहल की प्रसंशा करते हुए संसदीय सचिव श्री इंद्रशाह मंडावी ने इसे अनुकरणीय बताया।
इस मौके पर सभी अतिथियों ने शिक्षकों को इस शुभ कार्य के लिए बधाई दी। स्मार्ट क्लास उद्घाटन समारोह में शिक्षाविद संजय जैन, श्रीमती नम्रता सिंह, श्रीमती कमला देवी पिस्दा, जनपद सदस्य श्रीमती सत्यभामा कलामे, शमा परवीन, प्राचार्य वी.पी. प्रजापति, राजेन्द्र कुमार देवांगन, एबीईओ विष्णु साहू, संकुल समन्वयक अमर सिंह ठाकुर, सुनील शर्मा, नंदकुमार साहू, श्रीमती प्रेमलता शर्मा, श्रीमती सुनीता वर्मा,आभिकेश वर्मा, दिनेश बघेल, युगल किशोर सिन्हा, वी.पी. भुवार्य एवं शाला विकास समिति के सभी सदस्यगण, पालकगण उपस्थित रहे।
खेल / शौर्यपथ / टीम इंडिया के स्टार क्रिकेटर और लिमिटेड ओवर फॉर्मैट में टीम के उप-कप्तान रोहित शर्मा को मौजूदा समय के बेस्ट बल्लेबाजों में गिना जाता है। सफेद गेंद क्रिकेट में वो बेस्ट सलामी बल्लेबाज कहे जाते हैं। रोहित जब पारी का आगाज करने जाते हैं, तो वो शुरुआत में थोड़ा धीरे खेलते हैं और कुछ नर्वस भी नजर आते हैं, लेकिन एक बार टिकने के बाद वो विरोधी गेंदबाजों की बैंड बजा डालते हैं। रोहित की पारी की शुरुआत को देखकर विरोधी गेंदबाजों को लगता है कि वो उन पर हावी हो सकते हैं। न्यूजीलैंड के तेज गेंदबाज लॉकी फर्गुसन ने रोहित की जमकर तारीफ की है। उन्होंने कहा कि अगर आप रोहित को आउट नहीं कर पाते हैं, तो यह बल्लेबाज मैच से आपको पूरी तरह से बाहर कर सकता है।
रोहित के पास तमाम शानदार शॉट्स हैं, और वो बहुत ही आसानी से छक्के भी जड़ते हैं। रोहित जितनी देर क्रीज पर टिकते जाते हैं, विरोधी टीमों को दिक्कतें भी उसके साथ ही बढ़ती रहती हैं। यही वजह है कि रोहित इकलौते ऐसे बल्लेबाज हैं, जिनके खाते में वनडे इंटरनैशनल में तीन डबल सेंचुरी दर्ज हैं। वनडे इंटरनैशनल का हाइएस्ट स्कोर भी रोहित (264) के नाम ही दर्ज है। 2014 में उन्होंने यह पारी श्रीलंका के खिलाफ खेली थी। इसके अलावा टी20 इंटरनैशनल में रोहित चार सेंचुरी जड़ चुके हैं और अभी तक कोई भी क्रिकेटर टी20 इंटरनैशनल में इतनी सेंचुरी नहीं जड़ सका है।
'स्मिथ, वॉर्नर और विराट को गेंदबाजी करना भी चैलेंजिंग'
स्पोर्ट्सकीड़ा पर जब फर्गुसन से पूछा गया कि किस बल्लेबाज को गेंदबाजी करना उन्हें सबसे मुश्किल लगता है, तो उन्होंने कहा, 'अच्छा सवाल है, ऐसे कुछ बल्लेबाज हैं। रोहित शर्मा मुझे बहुत चैलेंजिंग लगते हैं। अगर आप उन्हें जल्द आउट नहीं करते हैं, तो वो बड़ा स्कोर बना लेते हैं। वो आपकी गेंद की लेंथ को बहुत जल्दी पिक करते हैं और मेरी यही ताकत है। वो वर्ल्ड क्लास बल्लेबाज हैं।' इस लिस्ट में फर्गुसन ने ऑस्ट्रेलिया के स्टीव स्मिथ, डेविड वॉर्नर के अलावा टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली को भी शामिल किया।
'रोहित शर्मा असाधारण बल्लेबाज'
उन्होंने कहा, 'स्टीव स्मिथ, डेविड वॉर्नर, विराट कोहली- ये सभी वर्ल्ड क्लास बल्लेबाज किसी कारण से हैं। इनको गेंदबाजी करना हमेशा मुश्किल होता है। आपको अच्छा लगता है, जब आप टॉप-ऑर्डर के बल्लेबाजों को आउट कर लेते हैं और आपको मिडिल ऑर्डर और लोअर ऑर्डर के बल्लेबाजों को गेंदबाजी करने का मौका मिलता है।' उन्होंने कहा, 'मैं रोहित शर्मा का बड़ा फैन हूं, मुझे लगता है कि वो एक असाधारण बल्लेबाज हैं।'
मेरी कहानी / शौर्यपथ / मैं जब बहुत छोटा था, तब मुझे पता नहीं था कि ‘जाट’ किसको कहते हैं। उन्हीं दिनों मैं एक मैच खेलने रोहतक गया था। जैसे ही मुझे पता चला कि वहां जाट बहुत होते हैं, तो मैंने कोच सर से कहा कि मुझे जाट दिखाइएगा। कोच साहब हंसने लगे। मैं दिल्ली में रहता था, रोहतक एक दूसरे प्रदेश का हिस्सा था, इसलिए मैं जानता नहीं था। उससे पहले दिल्ली से बाहर ज्यादा गया भी नहीं था।
मेरे करियर में रणजी ट्रॉफी का एक मैच बहुत यादगार है। पहली पारी में मैं ‘जीरो’ पर आउट हो गया था। मैच के दौरान मुझे हाथ में बहुत ज्यादा चोट लग गई थी। हाथ की चमड़ी पूरी छिल गई थी। डॉक्टर ने कहा कि 15 दिन तक बल्ला भी नहीं पकड़ पाओगे। यह मैच वानखेड़े स्टेडियम में था। तब वानखेड़े स्टेडियम में ‘साइड’ में प्रैक्टिस विकेट हुआ करती थीं। वहां ‘स्लाइड’ मारी, तो हाथ बुरी तरह छिल गया। डॉक्टर ने कहा कि अगर बैट पकड़ोगे, तो ‘इन्फेक्शन’ का खतरा है। बावजूद इसके मैंने बल्लेबाजी की। हम दो सौ से ज्यादा के लक्ष्य का पीछा कर रहे थे। उस मैच में मैंने 120 रन नॉट आउट बनाए, वह भी एक हाथ से बल्लेबाजी करके। मैच उत्तर प्रदेश के खिलाफ था। पहली पारी में हमारे ऊपर 60 रनों की ‘लीड’ थी, तब भी हमने वह मैच जीता था। उस साल मैंने चार शतक लगाए थे। कप्तानी करते हुए पहले चार मैचों में ये लगातार चार शतक लगे थे।
इसके बाद 2003 में भारतीय टीम विश्व कप खेलकर लौटी थी। सौरव गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम ने फाइनल तक का सफर तय किया था, पर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को हरा दिया था। वहां से लौटने के बाद खिलाड़ियों को ‘ब्रेक’ चाहिए था। इसी समय भारतीय टीम को बांग्लादेश के खिलाफ सीरीज खेलनी थी। इसी सीरीज के लिए मुझे पहली बार भारतीय टीम के लिए चुना गया। मुझे ‘सेलेक्ट’ तो पहले ही होना चाहिए था। मैंने जिम्बॉब्वे के खिलाफ एक दिन में 200 रन बनाए थे। उस साल मैंने तीन ‘बैक टु बैक’ दो सौ किए थे। मैंने ये तीन दोहरे शतक रेलवे, साइड गेम में जिम्बॉब्वे के खिलाफ और फिर सीजन के पहले मैच में रेलवे के खिलाफ लगाए थे, फिर भी मेरे ‘सेलेक्शन’ में देरी हुई। मुझे लगातार लग रहा था कि अब मुझे मौका मिलना चाहिए, पर मौका मिल नहीं रहा था। मेरी बेचैनी और ‘नर्वसनेस’ बढ़ते जा रहे थे। मुझे लग रहा था कि बांग्लादेश के खिलाफ मौका मिल तो गया है, पर अगर सीरीज में रन नहीं बने, तो कहीं दोबारा सब कुछ फिर से तो शुरू नहीं करना पड़ेगा। कीर्ति आजाद सेलेक्टर थे। उन दिनों टीम में सेलेक्शन की जानकारी या तो फोन से मिलती थी या फिर टीवी चैनल से। मोबाइल का दौर इतना नहीं था। जब यह खबर आई, तो मेरी नानी मुझे मंदिर लेकर गई थीं। मेरी नानी वैसे भी मंदिर बहुत जाती थीं।
भारतीय टीम में चुने जाने का संतोष बहुत बड़ा था, क्योंकि मैंने बहुत रन बनाए थे। मैं काफी समय से टीम में चुने जाने का इंतजार कर रहा था। इंटरनेशनल टीम में चुने जाने से पहले मेरे 15 से ज्यादा फस्र्ट क्लास शतक थे। आजकल तो खिलाड़ी एक-दो शतक लगाते हैं और फिर आईपीएल के जरिए टीम में आ जाते हैं। मेरी औसत 55-56 रनों की थी, जब मुझे टीम इंडिया में चुना गया। इसके बाद अगले चार साल में मुझे लगभग 20-22 मैचों में ही मौका मिला। जिसमें मेरे दो शतक थे। टेस्ट टीम में भी मेरा ‘सेलेक्शन’ हो गया था। उसमें भी मैं शतक लगा चुका था। अब 2007 विश्व कप की टीम चुने जाने का वक्त था। 2007 विश्व कप में मेरे साथ बिल्कुल वही हुआ था, जो आज अंबाती रायडू के साथ हुआ है। मैं लगातार टीम के साथ था। मैच खेल रहा था। एक मैच में मेरी ‘परफॉरमेंस’ खराब थी और उसमें रॉबिन उथप्पा ने अच्छा प्रदर्शन किया था।
पहले मैं टीम से बाहर हुआ और फिर ‘स्क्वाड’ से भी बाहर हो गया। इसके बाद विश्व कप की टीम से भी बाहर हो गया। जब आप विश्व कप से एक सीरीज पहले टीम से बाहर हो जाएं, तो बहुत निराशा होती है। अगर आप एक साल पहले बाहर हो जाएं, तो हालात स्वीकार करने का समय मिल जाता है। आपको पता चल जाता है कि आप टीम की ‘स्कीम ऑफ थिंग्स’ में नहीं हैं, लेकिन अगर आप एक सीरीज पहले बाहर हों, तो बहुत बुरा लगता है। मेरे साथ यह भी था कि 2007 से पहले मैं कोई विश्व कप खेला नहीं था। अंडर-19 विश्व कप भी मैंने ‘मिस’ किया था, जिसमें युवराज सिंह, मोहम्मद कैफ खेलकर उभरे थे। उस समय जोनल वनडे हुआ करते थे। उसमें मैंने पांच मैच खेले थे। पांचों मैच में मेरे 50 रन थे। चार मैंचों में मैं नॉट आउट था। इसके बाद भी मुझे मौका नहीं मिला था। फिर 2007 की विश्व कप टीम में भी जब मुझे मौका नहीं मिला, तो बहुत निराशा हुई। इतनी ज्यादा कि मुझे लगा कि मैं क्रिकेट खेलना छोड़ ही दूंगा।
(जारी)गौतम गंभीर, पूर्व क्रिकेटर और सांसद
जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / तमिलनाडु के घने जंगलों में बसा है पुल्लूचेरी। हिन्दुस्तान के सुदूर इलाकों में बसे गांव-बस्ती की तरह पुल्लूचेरी तक पहुंचने से पहले ही तरक्की की सड़़क खत्म हो जाती थी। मदुरई से करीब 15 किलोमीटर दूर बसे इसी गांव की हैं चिन्ना पिल्लई। चिन्ना सिर्फ 12 साल की थीं, जब उनकी शादी कर दी गई और थोड़े दिनों बाद ही उन्हें अलागर कोविल गांव के खेतों में मजदूरी के लिए ले जाया गया। वहां के खेतों में काम करने वाले ज्यादातर श्रमिक आस-पास की बस्तियों से आते थे। इनमें चिन्ना का गांव भी शामिल था।
एक के बाद एक चिन्ना दो बेटे और तीन बेटियों की मां बन गईं, और उनकी जिंदगी बेबस खेतिहर मजदूरों की तरह जमींदारों और साहूकारों की उधारी व कर्ज तले दबती चली गई। चिन्ना और पति पेरुमल जी-तोड़ खेतों में मेहनत करते, मगर कर्ज कम होने का नाम ही न लेता। साहूकार बेबस मजदूरों से तीन सौ गुना सूद वसूलते थे, मगर कोई उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। खेत मालिक भी बहुत कम मजदूरी देते थे। चिन्ना को यह सब मंजूर न था। वह कहती हैं- ‘मैं अपने खेत मालिक से लगातार विनम्रता के साथ दोहराती रहती कि वह हम सबकी दिहाड़ी बढ़ा दें। कुछ इससे नाराज भी हो गए, मगर यह हमारा हक था और हम अपना हक ही तो मांग रहे थे।’
चिन्ना अपने जैसी महिला मजदूरों की टीम लीडर थीं, और उन सबकी स्थिति लगभग एक जैसी थी। क्योंकि वे सब असंगठित थीं, इसलिए वे खेत मालिकों पर कोई दबाव भी नहीं बना सकती थीं। चिन्ना ने इस नियति से मुठभेड़ का इरादा बांधा। उन्होंने 1990 में छोटी-छोटी बचत के जरिए अपने भविष्य को सुरक्षित करने की मुहिम शुरू की। इसके लिए उन्होंने अपने समूह की महिलाओं को सबसे पहले भरोसे में लिया। 15 महिलाओं ने 20 रुपये महीना बचाना शुरू किया। जो पैसे जमा होते, वे समूह की किसी जरूरतमंद महिला को कर्ज के रूप में दिए जाते और उस महिला को उस पर 60 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होता। साहूकारों के 300 प्रतिशत के मुकाबले यह छोटी ब्याज दर थी।
चंद महीनों में ही यह स्वयं सहायता समूह ‘कलंजियम’ लोगों में अपना भरोसा बढ़ाता गया और चिन्ना की कोशिशों ने आहिस्ता-आहिस्ता उनके समुदाय की महिलाओं को आत्मनिर्भर बना दिया। आलम यह था कि सदस्य न सिर्फ आपात स्थिति में कर्ज लेते, बल्कि छोटे-मोटे करोबार के लिए भी वे इसकी मदद लेने लगे। धन फाउंडेशन से जुड़ने के बाद इस स्वयं सहायता समूह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगभग तीन दशक पहले चिन्ना पिल्लई ने पुल्लूचेरी की गरीब औरतों को सशक्त बनाने का जो बीज बोया था, वह अब 13 राज्यों के 12 लाख परिवारों का विशाल वृक्ष बन गया है।
शुरू-शुरू में तो महिलाओं के पति इस मुहिम का विरोध करते थे, क्योंकि उन्हें यकीन नहीं हो पा रहा था, फिर इसकी बैठकों में भाग लेने के लिए कई बार वे खाना पकाने में देर कर देती थीं, इसलिए भी वे नाराज हो जाते, लेकिन फिर वे खुद उन्हें अपनी साइकिल पर बिठाकर लाने लगे। चिन्ना चाहती हैं कि महिलाएं इतनी सबल हों कि वे अपने परिवार और संतान का भविष्य संवार सकें। वह इसके लिए शिक्षा को बहुत अहम मानती हैं। उन्हें खुद तो पढ़ने-लिखने का मौका नहीं मिला, लेकिन उनकी दूरदर्शिता ने उनके बच्चों को तालीम से महरूम नहीं होने दिया। वह कहती हैं- ‘बदलाव का सबसे बड़ा औजार है शिक्षा। मैं चाहती हूं कि हमारी अगली पीढ़ी इतनी सुशिक्षित और सशक्त हो कि कोई उसके भरोसे का फायदा न उठा सके। मैं चाहती हूं कि देश के किसी भी गरीब को अपनी आर्थिक बदहाली के कारण गरिमामय जिंदगी जीने से वंचित न रहना पड़े।’
चिन्ना को एक-एक लाख रुपये के तीन पुरस्कार मिले। उन्होंने उनकी आधी रकम अपने पास रखी और आधी अपने आंदोलन को दान में दे दी। इनमें से एक पुरस्कार उन्हें जनवरी 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों मिला था। वह पुरस्कार था- स्त्री शक्ति पुरस्कार। उनकी ख्याति से ईष्र्यालु लोगों ने परेशान करने का मौका तब भी नहीं छोड़ा। वह याद करती हैं कि उन्हें यह सम्मान लेने दिल्ली जाना था, तो कहा गया कि आप विमान से जाएंगी, तो आपको दिल का दौरा पड़ जाएगा और मुझे टे्रन से ले जाया गया। लेकिन इस पुरस्कार समारोह में प्रधानमंत्री ने जो किया, उसने देश-दुनिया में चिन्ना को श्रद्धा के आसन पर बिठा दिया। दरअसल, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह कहते हुए चिन्ना के पैर छू लिए थे कि ‘मैं चिन्ना में शक्ति देखता हूं।’
चिन्ना की ख्याति ने उनके गांव और समुदाय को देश भर में नाम और सम्मान दिलाया है। उन्हें जानकी देवी बजाज पुरस्कार के अलावा तमिलनाडु सरकार के प्रतिष्ठित अवैयार अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। अभी हाल ही में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। सम्मान मिलने के बाद चिन्ना के अल्फाज थे- दुनिया में मशहूर तो मैं अटलजी के कारण ही हुई।
प्रस्तुति: चंद्रकांत सिंह
चिन्ना पिल्लई सामाजिक कार्यकर्ता
नजरिया / शौर्यपथ / जब भारत जनवरी 2021 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्य के रूप में शामिल हो जाएगा, तब वहां अनेक मसलों से रूबरू होगा। क्या संयुक्त राष्ट्र आने वाले दिनों में दुनिया के लोगों के लिए मानवीय सहायता और गलत काम करने वालों के विरुद्ध न्याय को बेहतर तरीके से सुनिश्चित कर पाएगा? सीरिया, यमन और अफगानिस्तान जैसे देशों में चल रहे संघर्ष के समाधान में क्या वह मदद कर सकेगा? अशांत जगहों से भाग रहे शरणार्थियों की रक्षा करेगा?
चीन, रूस या अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों में भी मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, लेकिन ऐसे देशों की आलोचना न करने की वजह से मानवाधिकार समूहों ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की बार-बार आलोचना की है। जवाब में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र व उसके सदस्य देशों से आग्रह किया कि वे अधिकारों की बढ़ती चुनौतियों पर अधिक ध्यान देने के मकसद से ‘कॉल टु एक्शन ऑन ह्यूमन राइट्स’ की पहल करें। अब दुनिया भर में उत्पीड़न का सामना करने वालों के अधिकारों के बचाव की दिशा में भारत से भी बड़ी उम्मीदें होंगी। भारत सरकार ने कहा है कि सुरक्षा परिषद में भारत तर्क व संयम की आवाज बुलंद करेगा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत दृढ़ विश्वास के साथ काम करेगा।
दुर्भाग्य से अन्य देशों में मानवाधिकारों के सम्मान को बढ़ावा देने के मामले में भारत का रिकॉर्ड खराब रहा है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत ने आमतौर पर देश-विशिष्ट प्रस्तावों पर ही अमल किया है। भारत रोहिंग्या मामले अर्थात म्यांमार में जातीय शोषण या फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते के ड्रग युद्ध जैसे मामलों में संयुक्त राष्ट्र की पहल का समर्थन करने में नाकाम रहा है। कुछ ही मौके आए हैं, जब भारत ने आवाज उठाई है। अतीत में देखें, तो भारत ने श्रीलंका में कथित युद्ध अपराधों की जवाबदेही की चर्चा की थी। हाल की बात करें, तो हांगकांग में अधिकारों की रक्षा के प्रति भारत ने चिंता का इजहार करते हुए कहा है कि इसे ‘ठीक से, गंभीरता से और निष्पक्ष रूप से देखा जाए’।
भारत दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में अपने सैनिक भेजकर महत्वपूर्ण योगदान करता रहा है और सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनने की इच्छा रखता है। संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान किसी संघर्ष के बाद स्थितियों की निगरानी, जांच और मानवाधिकार पर ध्यान केंद्रित रखते हैं। भारत को ऐसी कोशिशों का विस्तार करते हुए नेतृत्व और समर्थन का प्रदर्शन करना चाहिए। दुनिया में मानवाधिकार के पक्ष में खड़े होने के लिए अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड को भी देखना चाहिए। जहां भारत लंबे समय से ज्यादा स्वतंत्र समाज रहा है, वहीं चीन एकदलीय अधिनायकवादी राज्य है। हाल ही में भारत ने भी चीन जैसी पाबंदियों की कुछ नकल की है। जब सूचना, संचार, मनोरंजन, शिक्षा और व्यवसाय इत्यादि क्षेत्रों में इंटरनेट बुनियादी आजादी का हिस्सा हो गया है, तब भारत में कुछ पाबंदियां दिखी हैं।
अमेरिका में पुलिस द्वारा अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद जो आंदोलन हुआ, उसने दुनिया या भारत पर कोई खास असर नहीं डाला है। भारतीय पुलिस में भी ज्यादती का पुराना ढर्रा जारी है। हाशिये पर पड़े वंचितों के संरक्षण की जरूरत पर अधिकारी चुप रहते हैं। उधर, अमेरिका में पुलिस ने न सिर्फ अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया है, बल्कि प्रदर्शनकारियों की रक्षा में नाकाम रही है। कुछ मामलों में तो पुलिस खुद हमलों में शामिल दिखी है।
आज भारत निर्णायक मोड़ पर है। जब भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शामिल हो जाएगा, तब उसके पास दो विकल्प होंगे, या तो वह मानवाधिकार का सम्मान करने वाले देशों के पक्ष में खड़ा हो जाए या फिर चीन, रूस, ब्राजील जैसे देशों के साथ तालमेल बनाकर चलता रहे। ये देश अक्सर मानवाधिकार के मामले में वैश्विक नियम आधारित कानूनी प्रणाली को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश करते हैं। दुनिया में आक्रामक होता चीन, कोरोना की वजह से सेहत व आजीविका पर दोहरे संकट की पृष्ठभूमि में साल 2021 का आगाज भारत के लिए अहम मौका होगा। देखना है, देश मानवाधिकारों के समर्थकों के साथ खड़ा होता है या मानवाधिकारों को कमजोर करने वालों के साथ?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) मीनाक्षी गांगुली,दक्षिण एशिया निदेशक, ह्यूमन राइट्स वाच
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारत में राफेल जैसे लड़ाकू विमान का लंबे समय से चल रहा इंतजार खत्म हो गया। पांच विमानों की पहली खेप के भारत पहुंचते ही हमारी ताकत में जो इजाफा हुआ है, उससे निश्चित ही हमारी सेनाओं के मनोबल में वृद्धि हुई होगी। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हम रक्षा सौदों में दो दशक से ज्यादा ढिलाई की वजह से कोई भी लड़ाकू विमान खरीद नहीं पा रहे थे।
जब 2016 में फ्रांस के साथ 36 राफेल के लिए सौदा हुआ, तब हमें भूलना नहीं चाहिए कि उसे लेकर किस तरह के विवाद हुए थे। राजनीतिक क्षेत्र में किस तरह से चर्चाएं हुई थीं। बहुत अप्रिय ढंग से आरोप-प्रत्यारोप लगे थे। संभव है, राजनीतिक विवाद न होते और रक्षा सौदों के प्रति हमारे प्रतिष्ठानों में पूरी निष्ठा व त्वरा होती, तो भारत को नए विमानों के लिए इतना लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता।
पिछली सदी में सुखोई विमान खरीदे गए थे, अब 23 साल बाद राफेल मिला है, तो भारत में इसके मानसिक-सामरिक महत्व को समझा जा सकता है। अव्वल तो भारतीय गगन में एक असुरक्षा का भाव आने लगा था, पुराने पड़ चुके मिग विमानों की दुखद स्थिति आए दिन रुलाने लगी थी। ऐसे विमानों को उड़ाने की जरूरत पड़ रही थी कि जिन्हें उड़ते ताबूत तक कह दिया जाता था। बेशक, अब राफेल के आने के बाद हम अपनी वायुसेना के और उज्ज्वल भविष्य की ओर देख सकेंगे। सुखोई-30 जैसे विमान अभी भी सेवारत हैं, लेकिन सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें राफेल या उससे भी विकसित 200 से ज्यादा विमानों की जरूरत है। और अभी तो पांच विमानों के साथ शुरुआत हुई है, अगले साल तक जब सभी 36 राफेल भारत आ जाएंगे, तो जाहिर है, देशवासियों को ज्यादा सुरक्षा का एहसास कराएंगे। राफेल का आना बड़ी खुशखबरी है, लेकिन हमें अपना पारंपरिक संयम भी नहीं खोना चाहिए। भारत ने हथियार या विमान कभी भी किसी पर हमले के लिए नहीं खरीदे हैं, हमारी एक-एक रक्षा खरीद अपने बचाव के लिए है। हमें किसी अन्य देश की जमीन नहीं चाहिए, हमें किसी पर हमला नहीं करना है, हमें केवल अपना बचाव करना है। हां, जो हमसे दुश्मनी पालना चाहते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि भारत ईंट का जवाब पत्थर से दे सकता है। साथ ही, इस रक्षा उपलब्धि के पक्ष या विपक्ष में किसी तरह की सियासत से बचना चाहिए।
राफेल का आना हमारे लिए एक प्रेरणा भी है कि हम आगे के लिए और तैयार रहें। संसाधनों से भरे भारत में अब उस दौर का आगाज हो जाना चाहिए, जब हमें किसी भी देश से कोई रक्षा उपकरण खरीदने की जरूरत नहीं पड़े। अभी भारत स्वयं अगर बहुत सक्षम नहीं है, तो उसे दूसरे विकसित सहयोगी देशों के साथ मिलकर अपनी ही सीमा में रक्षा निर्माण उद्यम लगाना चाहिए। यह प्रयास शुरुआत में बहुत महंगा भले लगे, लेकिन दूरगामी रूप से भारत को इससे व्यापक मजबूती मिलेगी।
रक्षा के मोर्चे पर कोई भी तैयारी जयघोष के साथ हो, यह जरूरी नहीं। ऐसी तैयारियों को चुपचाप अंजाम देकर परिणाम देश के सामने रख देना चाहिए। राफेल या सुखोई जैसे विमानों के नए संस्करणों पर भारत को काम करना चाहिए। हमें पुराने साथी देशों जैसे रूस को भी साथ रखना होगा। राफेल की रोशनी में उन तमाम रक्षा खरीद और निर्माण योजनाओं में तेजी आनी चाहिए, जिनसे अपना देश और मजबूत होगा।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
