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May 31, 2026
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मेलबॉक्स / शौर्यपथ / बुलंदशहर की छात्रा सुदीक्षा के साथ जो कुछ हुआ, वह शर्मनाक है। यह घटना बताती है कि देश में अब भी छेड़खानी और बलात्कार मानो सामान्य बात है। लेकिन दुख की बात यह है कि हम अब भी अपने जन-प्रतिनिधियों से कानून-व्यवस्था में सुधार लाने या लड़कियों की सुरक्षा आदि की मांग नहीं करते, बल्कि हमारे लिए जरूरी कुछ अन्य मुद्दे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि कानूनी धाराओं के बेहतर क्रियान्वयन न हो पाने की वजह से ऐसे अपराध दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। अगर पुलिस राह चलते छेड़खानी करने वाले शोहदों को सख्त धाराओं के तहत गिरफ्तार करे और सजा दिलाए, तो संभव है कि उनकी लड़कियों को छेड़ने की फिर कभी हिम्मत नहीं हो। मगर ऐसा हो, तब तो? कुछ दायित्व समाज को भी निभाने होंगे। हरेक माता-पिता को यह बात बचपन में ही अपनी संतान के मन में डालनी होगी कि उन्हें लड़कियों का सम्मान करना चाहिए, अपमान नहीं। अगर हम सब ऐसा कुछ कर सके, तो यकीनन किसी और प्रतिभाशाली सुदीक्षा को यूं अपनी जान नहीं गंवानी पड़ेगी।
शिवानी गांधी
बहराइच, उत्तर प्रदेश

सबक हम लेते नहीं
लगता है कि लोगों ने निर्भया कांड से सबक नहीं लिया है। तभी तो महिलाओं और बच्चियों के साथ दरिंदगी अनवरत जारी है। आए दिन अखबारों में प्रमुखता से छपने वाली ऐसी खबरें पीड़ा पहुंचाती हैं। सरकार ने कठोर कानून जरूर बनाए हैं, अपराधियों को सजा भी मिल रही है, लेकिन शैतान की हैवानियत जारी है। निर्भया के दरिंदों को जब फांसी दी गई थी, तब यह अनुमान लगाया गया था कि अब इस तरह की घटनाएं कम होंगी। मगर लगता है कि इससे कोई सबक नहीं लिया गया। सुदीक्षा के साथ हुई छेड़खानी इसका ताजा उदाहरण है। इन घटनाओं के अपराधी पकड़े भी जाते हैं, तो उन्हें सजा मिलने में इतना अधिक वक्त लग जाता है कि इंसाफ काफी पीछे छूट जाता है। ऐसे मामलों में तुरंत कार्रवाई और दोषियों को त्वरित सजा वक्त का तकाजा है।
अमृतलाल मारू
धार, मध्य प्रदेश

सराहनीय काम
बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में अच्छी इंटरनेट-सेवा मुहैया कराने के लिए ‘ऑप्टिकल फाइबर केबल’ की शुरुआत की। यह निश्चय ही लाभदायक और सराहनीय काम है। इससे अंडमान-निकोबार द्वीप की सुरक्षा में भी मदद मिलेगी और पर्यटन को भी खासा बढ़ावा मिलेगा। अब तक यहां आने वाले पर्यटक अच्छी इंटरनेट-सेवा की कमी महसूस करते रहे हैं। अब ऐसा नहीं हो सकेगा। यहां इंटरनेट की अच्छी सुविधा मिलने से ज्ञान-विज्ञान की शाखाएं भी खुल सकेंगी। इन सबसे डिजिटल इंडिया अभियान को विशेष गति मिलेगी।
सोनू कुमार गोस्वामी, अररिया, बिहार

डॉक्टरों से भेदभाव
कोरोना मरीजों, डॉक्टरों, नर्सों आदि के साथ हमारे समाज में जैसा बर्ताव किया जा रहा है, उसका कारण मानव का स्वार्थी और असंवेदनशील होना है। सच तो यह है कि हमें निरंतर असंवेदनशीलता सिखाई जाती है। जन्म लेते ही बच्चा परिवार में स्व-केंद्रित होना सीखता है, इसलिए भविष्य में यह भूल जाता है कि समाज के प्रति भी उसके कुछ दायित्व हैं। इसका खामियाजा बच्चे के मां-बाप को भी भुगतना पड़ता है। कोरोना के संक्रमण-काल में लोगों का यह भेदभाव इसी का संकेत है। हालांकि, इसमें कुछ लोग अपवाद भी हैं, जिनसे ही यह धरती बेहतर ढंग से चल रही है। इन्हीं अपवादों में कोरोना वॉरियर्स हैं, जो अपनी जान की परवाह किए बिना संक्रमित लोगों का जीवन बचा रहे हैं। इसलिए उनके साथ किसी भी तरह का भेदभाव मानवता के खिलाफ है। हमें इससे बचना चाहिए।
अभिषेक सिंह, जौनपुर

 

ओपिनियन / शौर्यपथ / राजनीति में जितने काम जनता के सामने किए जाते हैं, उससे कहीं ज्यादा मेहनत परदे के पीछे की जाती है। अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव इसका अपवाद नहीं है। वहां भारतीय मूल की कमला हैरिस को डेमोक्रेटिक पार्टी ने उप-राष्ट्रपति पद का अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के दौरान अपना दावा पेश करते हुए वह जो बिडेन के खिलाफ आक्रामकता की हद तक मुखर हो चुकी हैं। जाहिर है, डेमोक्रेटिक पार्टी ने जो बिडेन और कमला हैरिस की जोड़ी चुनावी मैदान में उतारकर अमेरिकी मतदाताओं को एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है।
अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नवंबर में होने जा रहे हैं। कमला हैरिस अधिक से अधिक भारतीय मतदाताओं को डमोके्रटिक उम्मीदवार जो बिडेन के पक्ष में लुभा सकती हैं। साल 2016 के चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, वहां करीब 41 लाख भारतीय मूल के नागरिक हैं, जिनमें से लगभग 18 लाख मतदान के योग्य हैं। माना यही जाता है कि भारतीय मूल के मतदाता पारंपरिक तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में अपना वोट गिराते रहे हैं, लेकिन व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के प्रवेश के बाद से माहौल कुछ हद तक बदला है। अब कयास यह लगाया जाने लगा है कि डेमोक्रेटिक के ये पारंपरिक वोटर उससे छिटककर रिपब्लिकन पार्टी के पाले में जा सकते हैं। ‘हाउडी मोदी’ जैसे आयोजन के बाद इस फेरबदल के अनुमान में कहीं ज्यादा तेजी आई है।
लिहाजा, ऐसे किसी उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतारने का दबाव डेमोक्रेटिक पर था, जो उसके पारंपरिक गढ़ को मजबूत करते हुए रिपब्लिकन की ‘सपोर्ट बेस’ में सेंध लगा सकें। कमला हैरिस का व्यक्तित्व इसमें पार्टी की मदद करता दिखता है। वह पुराने दिनों में एक चर्चित वकील रह चुकी हैं। सेक्स हिंसा के खिलाफ उनकी टिप्पणी काफी सुर्खियों में रही। बेशक आलोचकों की नजर में वह एक उलझी हुई दावेदार हैं, क्योंकि राष्ट्रपति पद के लिए अपना दावा पेश करते समय वह जिन ‘प्रगतिशील’ नीतियों की हिमायती दिखीं, उनमें से कई को वह वकालत के अपने शुरुआती वर्षों में खारिज कर चुकी हैं। बहरहाल, देर से ही सही, पर अश्वेतों के प्रति पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ वह जिस तरह से मुखर हुईं, उससे भी उनकी एक सकारात्मक छवि बनी है। इसी तरह, स्वास्थ्य-सेवा में सुधार, बिना दस्तावेज के रह रहे आप्रवासियों को नागरिकता मुहैया कराने, बंदूकों की खुली बिक्री पर पाबंदी लगाने, तर्कसंगत कर सुधार जैसे मसलों पर भी वह खुलकर अपनी राय रखती रही हैं। इन सबसे उनका अपना एक मतदाता-वर्ग तैयार हुआ है।
कमला हैरिस का मुखर होना भी उनके पक्ष में जाता है। राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के वक्त जो बिडेन पर की गई उनकी टिप्पणी तो अब भी कई लोगों के जेहन में ताजा होगी। उन्होंने जो बिडेन को तब घेरा था, जब उनकी बिडेन के दिवंगत बेटे से खूब बनती थी। इससे यह धारणा बनी है कि कमला चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवारों पर हमलावर होने में जो बिडेन की खासा मदद कर सकती हैं। जो बिडेन ने उनकी दावेदारी पेश करते हुए कहा भी कि काम करने के तरीके पर हमारे आपसी मतभेद हो सकते हैं, लेकिन रणनीति पर नहीं।
मगर हमारे लिए अहमियत यह रखती है कि भारत के प्रति वह क्या सोचती हैं? अभी तक यह साफ-साफ नहीं कहा जा सकता कि वह नई दिल्ली से कितनी करीब हैं, लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी को भारत का हितैषी माना जाता है। चूंकि जो बिडेन पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी प्राथमिकता में भारत शीर्ष पर होगा, इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि कमला हैरिस नई दिल्ली और वाशिंगटन की मित्रता को एक नए मुकाम पर पहुंचाने में मददगार साबित हो सकेंगी। बेशक डोनाल्ड ट्रंंप के अब तक के कार्यकाल में भारत और अमेरिका के रिश्ते आगे बढ़े हैं, लेकिन एच1-बी वीजा पर उनका सख्त रुख नई दिल्ली के मुफीद नहीं माना गया, जबकि जो बिडेन यह एलान कर चुके हैं कि अगर वह राष्ट्रपति के रूप में चुने गए, तो इस वीजा पर लगी पाबंदी हटा ली जाएगी।
कमला अमेरिकी समाज में गहरा रहे विभाजन को थामने में भी सहायक हो सकेंगी। वह अश्वेत डोनाल्ड हैरिस और श्यामला गोपालन की संतान हैं। अमेरिका में, और खासतौर से अश्वेतों में जिस तरह से बेरोजगारी बढ़ी है, उससे रिपब्लिकन सरकार के प्रति उनमें नाराजगी तेज हुई है। रही-सही कसर कोरोना महामारी ने पूरी कर दी है। कोविड-19 से जान-माल की भारी कीमत चुका रहे अमेरिका में अश्वेत इस बीमारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। और माना जाता है कि श्वेतों-अश्वेतों के बीच का सामाजिक भेद इसकी एक बड़ी वजह है। कमला हैरिस को चुनाव मैदान में उतारकर डेमोक्रेटिक पार्टी अमेरिकी समाज को एकजुट करने का संकेत दे रही है। अगर ऐसा होता है, तो यकीनन यह भारत के हित में भी होगा। वहां जिस तरह से भारतीय मूल के आप्रवासियों की आमद बढ़ी है, उसके कारण से भारत सरकार पर यह दबाव भी बढ़ा है कि भारतीय अनिवासी वहां किसी तरह के भेदभाव का शिकार न बनें।
बहरहाल, कमला हैरिस असल अर्थों में भारत के लिए कितनी सहायक हो सकेंगी, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इसका अनुमान चुनावी अभियान में पार्टी द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों से जरूर लगाया जा सकेगा। कश्मीर-विवाद, पाकिस्तान में जड़ जमा चुके आतंकवाद, चीन की विस्तारवादी नीति, मध्य एशिया में बढ़ता तनाव जैसे मसलों को लेकर पार्टी की रणनीति का खुलासा चुनावी मैदान में हो सकता है। फिर, परमाणु मसलों पर भी डेमोक्रेटिक पार्टी का रुख भारत के खिलाफ रहा है। ऐसे में, यह देखना होगा कि पार्टी अब इस बारे में क्या सोचती है? सही-सही जवाब के लिए अभी हमें कुछ इंतजार करना होगा, मगर इतना तो तय है कि कमला हैरिस का दांव खेलकर डेमोक्रेटिक ने वहां की चुनावी बिसात को बदल दिया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) शशांक, पूर्व विदेश सचिव

 

// नवाचार के माध्यम से बच्चों को शिक्षा जोड़ने के लिए किए जा रहे प्रयास सराहनीय: मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम
// जशपुर जिले की समीक्षा बैठक में दिए निर्माणाधीन कार्यों को तेजी से पूर्ण करने के निर्देश

जशपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ के नगर पालिका क्षेत्र जशपुर में नवाचार करते हुए सोशल डिस्टेंश के साथ केबल टीव्ही के द्वारा 1100 घरों के लगभग 2200 बच्चों को शिक्षा से जोड़ा गया है। नगर पालिका क्षेत्र के 2600 घरों में केबल कनेक्शन का उपयोग किया जा रहा है। इससे यहां के 6000 बच्चों को नवाचार माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाएगी। स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम को यह जानकारी आज जिला मुख्यालय जशपुर के कलेक्टोरेट सभाकक्ष में आयोजित समीक्षा बैठक में दी गई। डॉ. टेकाम ने बच्चों को शिक्षा देने के लिए किए जा रहे नवाचारों की सराहना करते हुए इसे अन्य विकासखंडो में भी संचालित करने के निर्देश दिए। डॉ. टेकाम आज उन्होंने आदिमजाति विभाग द्वारा निर्माणाधीन भवनों को शीघ्र पूर्ण करने और वन अधिकार प्राप्त पट्टों के हितग्राहियों को भूमि में लाख की खेती करने के लिए प्रोत्साहित करने के भी निर्देश दिए।
मंत्री डॉ. टेकाम को स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बताया कि कोई भी बच्चा कोरोना महामारी के दौरान अपनी शिक्षा से वंचित न हो, इसके लिए जिले में बच्चों को शिक्षा से जोड़ने एवं उनकी नियमित पढ़ाई जारी रखने के लिए जिला प्रशासन के सहयोग से विभिन्न माध्यम, केबल टी.व्ही., मोटर सायकिल गुरूजी, मोहल्ला क्लास, लाउडस्पीकर शिक्षा तथा राज्य शासन की पढ़ई तुहर दुआर योजना के तहत् वर्चुअल कक्षा का संचालन किया जा रहा है। मोटर सायकिल गुरूजी के माध्यम से शिक्षक गांव-गांव पहुंचकर मोटरसायकल पर ही बोर्ड रखकर किसी सुरक्षित स्थान पर निश्चित संख्या में बच्चों की कक्षाएं संचालित कर रहे हैं। बगीचा विकासखंड में भी पहाड़ी कोरवा परिवार के बच्चों को गिटार, हारमोनियम एवं अन्य वाद्य यंत्र का भी उपयोग कर शिक्षा दी जा रही है।
मंत्री टेकाम ने आदिम जाति विकास विभाग की समीक्षा करते हुए छात्र-छात्राओं के लिए निर्मित किए जा रहे समस्त आश्रम-छात्रावास भवनों एवं अन्य निर्माण कार्य को जल्द से जल्द पूर्ण कराने के निर्देश दिए। पोस्ट-मैट्रिक एवं प्री मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के संबंध में बच्चों के खातों को बैंक से पुष्टि कराकर छात्र-छात्राओं के खातों में सीधे छात्रवृत्ति प्रदान करने की बात कही। उन्होंने अल्पसंख्यक एवं अंतर्राज्यीय छात्रवृत्ति का भी समय पर भुगतान करने, वन अधिकार मान्यता पत्र के संबंध में पात्र हितग्राहियों की जांच कराकर उन्हें योजना से लाभांवित करने के निर्देश दिए। डॉ. टेकाम ने कहा कि जिन हितग्राही को वन अधिकार पत्र प्राप्त हो गया है उनकी आय बढ़ाने के लिए लाख की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। उन्होंने सरगुजा विकास प्राधिकरण एवं मध्य क्षेत्र विकास प्राधिकरण के तहत् स्वीकृत कार्यों को समय-सीमा में पूर्ण कराने के निर्देश दिए।
मंत्री डॉ. टेकाम ने खाद-बीज, ऋण वितरण, धान उठाव, चबुतरा निर्माण, गोधन न्याय योजना की समीक्षा करते हुए सोसायटी के लिए स्थान का चिन्हांकन कर चबुतरा निर्माण कार्य शीघता से पूर्ण करने के निर्देश दिए। सहकारिता विभाग के अधिकारी ने बताया कि जिले में 8907 किसानों को 7776 मीट्रिक टन खाद का वितरण कर दिया गया है। 11,123 क्विंटल धान बीज का वितरण किया गया है। जिले में खरीफ फसल के लिए 20 करोड़ 21 लाख 67 हजार ऋण वितरण वितरण किया गया है। उन्होंने बताया कि सहकारी समितियों से धान उठाव का कार्य पूर्ण कर लिया गया है। उन्होंने बताया कि जिले में वर्तमान में 17 सोसायटी संचालित है और 7 नए सोसायटी के प्रस्ताव भेजे गए हैं। गोधन न्याय योजना के तहत् ग्रामीण क्षेत्रों के 64 गौठान एवं 5 नगरीय क्षेत्र में 5 अगस्त तक 849 क्विंटल गोबर खरीदी की गई जिसके एवज में हितग्राहियो ंको 1 लाख 69 हजार का भुगतान उनके खाते में किया गया है।
बैठक में जशपुर विधायक विनय भगत, माध्यमिक शिक्षा मंडल बोर्ड के सदस्य पवन अग्रवाल, कलेक्टर महादेव कावरे, पुलिस अधीक्षक बालाजी राव, जिला पंचायत सीईओ के.एस. मण्डावी सहित अन्य विभागों के जिला अधिकारी उपस्थित थे।

लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / एक शोध की मानें तो बगैर लक्षण वाले मरीजों की भूमिका कोरोना पर नियंत्रण पाने में मददगार हो सकती है। ऐसे मरीजों की उच्च दर समाज के लिए अच्छी बात है। दुनिया भर में कोरोना वायरस से संक्रमित ऐसे मरीज बड़ी संख्या में हैं, जिनमें इस बीमारी के कोई भी लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं।

हॉपकिंस विश्वविद्यालय के अनुसार, पिछले सात महीनों में कोविड-19 जैसी महामारी ने विश्व स्तर पर दो करोड़ से अधिक लोगों को संक्रमित किया है, जबकि सात लाख से अधिक लोगों की इस वासरस से मौत हो चुकी है। सैन फ्रांसिस्को में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ मोनिका गांधी द्वारा हाल ही में एक शोध किया गया।

उन्होंने अपने इस अध्ययन में यह खुलासा किया कि एसिम्प्टोमैटिक यानी बगैर लक्षण वाले मरीज कोविड-19 के खात्मे में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के बगैर लक्षण वाले मरीजों की उच्च दर अच्छी बात है। यह निजी तौर पर और समाज के लिए एक अच्छा संकेत है।

जर्नल ऑफ इंटरनल मेडिसिन में इस महीने प्रकाशित एक लेख में मोनिका गांधी ने बताया कि महामारी की शुरुआत में जब लोगों ने मास्क पहनना शुरू नहीं किया था, तब 15 फीसदी लोग एसिम्प्टोमैटिक(बगैर लक्षण वाले) थे, लेकिन बाद में जब लोगों ने मास्क पहनना शुरू किया तो आंकड़ा बढ़ गया। इसके 40 से 45 फीसदी लोग बगैर लक्षण वाले हो गए।

कोरोना पर जारी रिसर्च के बीच यह भी सामने आया है कि इसका असर बच्चों पर कम है। ज्यादातर मरीजों में या तो कोई लक्षण नहीं है या फिर सामान्य लक्षण हैं। अमेरिका की शोधकर्ता मोनिका के मुताबिक दुनिया में अब 40 फीसदी कोरोना मरीज बगैर लक्षण वाले हैं, जिन्हें उम्मीद की किरण के रूप में देखा जा सकता है।

फिलहाल यह भी पता लगाया जा रहा है कि उम्र और शरीर के जीन भी क्या यह तय करते हैं कि वायरस कितना हमला करेगा। यह भी देखा जा रहा है कि क्या मास्क लगाने की वजह से ही लोगों में मामूली या बिना लक्षण वाला कोरोना हो रहा है।

 

सेहत / शौर्यपथ / भारतीय मूल के एक शोधकर्ता सहित वैज्ञानिकों के दल ने एक अध्ययन में दावा किया है कि एन-95 मास्क को 50 मिनट तक इलेक्ट्रिक कुकर में बिना पानी गर्म कर रोगाणु मुक्त किया जा सकता है और इससे मास्क की वायरस से बचाव करने की क्षमता में भी कोई कमी नहीं आती है।

इनवायरमेंटल साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी लेटर नामक जर्नल में प्रकाशित शोध के नतीजों के मुताबिक सीमित आपूर्ति होने पर मास्क को सुरक्षित तरीके से बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है जबकि मौजूदा समय में इनका एक बार ही इस्तेमाल किया जाता है।

हवा में मौजूद वायरस से युक्त वाष्प की बूंदों और कण से बचाव के लिए एन-95 मास्क सबसे प्रभावी है। इन्हीं से कोविड-19 होने का खतरा होता है। अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय अर्बारना-शैम्पेन में प्रोफेसर थान्ह न्गुयेन ने कहा, 'Ó कपड़े का मास्क या सर्जिकल मास्क पहनने वाले के मुंह से निकलने वाली बूंदों से अन्य लोगों का बचाव करता है लेकिन एन-95 मास्क उन बूंदों को फिल्टर कर पहनने वाले को बचाता है, जिसमें वायरस हो सकते हैं।

इलिनॉय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विशाल वर्मा ने कहा, 'Ó रोगाणु मुक्त करने के कई अलग-अलग तरीके हैं लेकिन अधिकतर में एन-95 मास्क के विषाणु युक्त वाष्प कणों को छानने की क्षमता नष्ट हो जाती है। उन्होंने कहा, 'Ó रोगाणु मुक्त करने की किसी भी प्रक्रिया में मास्क को पूरी सतह को संक्रमण मुक्त करने की जरूरत होती है लेकिन साथ ही यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उसके फिल्टर करने की क्षमता बनी रहे और इसे पहनने वाले के लिए सुरक्षित रहे। अन्यथा इससे सही सुरक्षा नहीं होगी।

शोधकर्ताओं ने इलेक्ट्रिक कुकर पद्धति में मास्क को रोगाणु मुक्त करने की संभावना देखी जो स्वास्थ्य कर्मियों के लिए लाभदायक हो सकती है, खासतौर पर छोटे क्लीनिक और अस्पतालों के लिए जहां पर ऊष्मा आधारित रोगाणु मुक्त करने के बड़े उपकरण मौजूद नहीं है।

शोधकर्ताओं ने ऐसी पद्धति की परिकल्पना की जो तीनों मानकों- रोगाणुमुक्त, फिल्ट्रेशन (छानने की क्षमता), फिट (इस्तेमाल करने योग्य)- को बिना किसी विशेष प्रक्रिया अथवा रसायन को छोड़े पूरा करे। वह ऐसी पद्धति की खोज करना चाहते थे जिसका इस्तेमाल लोग अपने घर में कर सकें। इसके मद्देनजर शोध दल ने इलेक्ट्रिक कुकर को लेकर परीक्षण किया, जो लोगों के रसोई घर में उपलब्ध रहता है।

शोधकर्ताओं ने इसकी पुष्टि की कि कुकर में 50 मिनट तक 100 डिग्री सेल्सियस पर मास्क को गर्म करने से कोरोना वायरस सहित चार तरह के वायरस नष्ट हो जाते हैं। यह पैराबैंगनी रोशनी से रोगाणु मुक्त करने की पद्धति से भी अधिक प्रभावी है।

वर्मा ने बताया, 'Óएयरोसोल (हवा में मौजूद वाष्प कण) जांच प्रयोगशाला में चैम्बर बनाया और उसमें एन-95 मास्क से गुजरने वाले कणों की गणना की। हमने पाया कि 20 बार इलेक्ट्रिक कुकर में रोगाणु मुक्त करने की प्रक्रिया किए जाने के बावजूद मास्क ठीक से काम कर रहा था। शोधकर्ताओं ने कहा कि मास्क को बिना पानी कुकर में गर्म किया जाना चाहिए न कि पानी में। कुकर के तल पर एक छोटी तौलिया रखनी चाहिए ताकि मास्क सीधे गर्म धातु के संपर्क में नहीं आए।

 

मोटापे के शिकार लोगों में कोरोना संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। अब एक अमेरिकी अध्ययन में आशंका जताई गई है कि सार्स-कोव-2 वायरस से लडऩे वाला टीका उन लोगों की सुरक्षा में ज्यादा असरदार नहीं साबित होगा, जिनके शरीर में भारी मात्रा में चर्बी जमी हुई है।
फ्लू, हैपेटाइटिस की वैक्सीन भी कम कारगर-
अलबामा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने फ्लू और हैपेटाइटिस-बी के टीके का हवाला दिया, जो 2017 में हुए शोध में सामान्य से अधिक वजन वाले लोगों में संबंधित संक्रमण का मुकाबला करने में सक्षम एंटीबॉडी पैदा करने में कुछ ज्यादा कारगर नहीं मिले थे। यही कारण है कि मोटे लोग न सिर्फ दोनों संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, बल्कि उनके गंभीर अवस्था में पहुंचने के साथ ही अंग खराब होने और जान जाने का खतरा भी ज्यादा रहता है। कोविड-19 से बचाव में कारगर टीके के मामले में भी कुछ ऐसी ही स्थितियां पनप सकती हैं।
टी-कोशिकाओं और मैक्रोफेज की कमी जिम्मेदार-
मुख्य शोधकर्ता डॉ. चाड पेटिट के मुताबिक मोटापे से जूझ रहे लोगों में संक्रमण रोधी टीके के कम असरदार होने के दो मुख्य कारण हैं। पहला, टी-कोशिकाओं का ठीक तरह से काम नहीं करना। प्रतिरोधक तंत्र को एंटीबॉडी पैदा करने का संदेश टी-कोशिकाएं ही देती हैं। दूसरा, प्रतिरोक्षक क्षमता के सक्रिय होने से शरीर में सूजन बढऩा। इससे 'मैक्रोफेजÓ नाम की विशेषज्ञ कोशिकाओं का उत्पादन घट जाता है, जो खतरनाक तत्वों को नष्ट करने के लिए अहम मानी जाती हैं। फ्लू और हैपेटाइटिस-बी के टीके का प्रभाव भी इन्हीं वजहों से घट जाता है।
सुई का आकार अहम-
-वैंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के शीर्ष संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. विलियम शैफनर ने कहा कि मोटे लोगों में टीकाकरण के समय सुई का आकार काफी मायने रखता है। पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होने वाली एक इंच लंबी सुई से टीका लगाने पर मोटे लोगों में मजबूत प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने की संभावना बेहद कम हो जाती है। ऐसे में डॉक्टरों को थोड़ी बड़े आकार की सुई से टीकाकरण करना चाहिए, ताकि दवा मांसपेशियों तक पहुंच सके।
टीकाकरण बेहद जरूरी-
-शैफनर ने स्पष्ट किया कि फ्लू और हैपेटाइटिस-बी की तरह ही कोरोना का टीका भले ही मोटे लोगों में संक्रमण रोकने में ज्यादा मददगार न हो, लेकिन उनमें कुछ हद तक सुरक्षा कवच तो जरूर विकसित होता है। यानी अगर वे वायरस की जद में आते हैं तो उनके गंभीर अवस्था में पहुंचने या फिर काल के गाल में समाने का जोखिम घट जाता है। ऐसे में टीका कोविड-19 से बचाव में मदद करेगा या नहीं, इस बारे में सोचे बगैर टीकाकरण जरूर करवाना चाहिए।
महामारी बनता मोटापा-
-1.9 अरब से ज्यादा वयस्कों का वजन सामान्य से अधिक
-65 करोड़ लोग इनमें से गंभीर रूप से मोटापे से जूझ रहे हैं
-3.8 करोड़ बच्चे (पांच वर्ष तक के) भी अधिक वजनी या मोटे
-34 करोड़ के करीब आंकी गई है किशोर उम्र के लोगों में यह संख्या
जानलेवा बीमारियों को दावत-
-28 लाख लोग औसतन हर साल मोटापे और उससे होने वाली बीमारियों के चलते दम तोड़ देते हैं।
-44त्न डायबिटीज, 41त्न कैंसर, 23त्न हृदयरोग के मामलों के लिए मोटापे को ठहराया जाता जिम्मेदार।

शौर्यपथ / हर साल भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। इस बार यह अष्टमी तिथि 11 अगस्त सुबह 09:06 बजे से शुरू होकर 12 अगस्त सुबह 11:16 बजे समाप्त हो रही है। यानी अष्टमी तिथि मंगलवार की सुबह से बुधवार 11 बजे तक है। जन्माष्टमी के दिन श्री कृष्ण को 56 भोग का प्रसाद लगाने का विधान है। लेकिन इनमें सबसे खास है धनिए की पंजीरी का भोग। माना जाता है कि कान्हा को प्रसाद में धनिए की पंजीरी सबसे अधिक प्रिय है। कृष्ण जन्माष्टमी पर धनिया पंजीरी के बिना प्रसाद अधूरा माना जाता है। धनिया पंजीरी को जन्माष्टमी के अवसर पर फलाहार के रूप में व्रत खोलने के लिए बनाया जाता है। यह पंजीरी खाने में जितनी स्वादिष्ट होती है, बनाने में उतनी ही आसान है। तो देर किस बात की आइए जानते हैं कैसे बनाई जाती है यह स्वादिष्ट पंजीरी।

धनिए की पंजीरी बनाने के पीछे धार्मिक मान्यता-
जन्माष्टमी पर धनिए की पंजीरी बनाने के पीछे ऐसी मान्यता है की कान्हा जी को माखन-मिश्री बहुत पसंद था। माखन-मिश्री का अधिक सेवन कान्हा को किसी तरह की हानि न पहुंचाएं इसके लिए मां यशोदा उन्हें प्रसाद में धनिए की पंजीरी बनाकर खिलाती थीं। तभी से जन्माष्टमी के दिन धनिए की पंजीरी का भोग जन्माष्टमी पर कान्हा को लगाने की परंपरा शुरू हो गई। आयुर्वेद में भी धनिया की पंजीरी का सेवन करने के कई फायदे बताए गए हैं। धनिए की पंजीरी त्रिदोष यानी वात, पित्त कफ के दोषों से बचाने का काम करती है।

धनिए की पंजीरी बनाने का तरीका-
धनिया की पंजीरी बनाने के लिए कढ़ाई में 1 चम्मच घी गर्म कर इसमें धनिया पाउडर डालें। इसे अच्छी तरह से भूनें और इसके बाद इसमें कटे हुए मखाने डाल दें। आप चाहें तो को मखाने को दरदरा पीस कर भी धनिया पाउडर में डाल सकते हैं। अब इसमें काजू और बादाम के छोटे-छोटे टुकड़े डालकर मिला दें। धनिया की पंजीरी बनाने के बाद कान्हा जी को भोग लगाकर उसे प्रसाद के रूप में घर में मौजूद लोगों को भी बांट दें।

 

धर्म संसार / शौर्यपथ / भगवान कृष्ण की पूजा में तुलसी का विशेष महत्व है। मान्यताओं के अनुसार इनके बिना पूजा का पूर्ण फल नहीं मिलता है। जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण को तुलसी का भी भोग लगाया जाता है। भगवान श्री विष्णु के चरण पर दूध व पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद तुलसी अर्चना की जाती है

दरअसल शास्त्रों में तुलसी जी को देवी कहा जाता है। भगवान विष्णु को ये अत्यंत प्रिय हैं। तुलसी जी का विवाह शालिग्राम से हुआ था, इसलिए कहा जाता है कि जो तुलसी जी की भक्ति करता है, उसको भगवान की कृपा मिलती है। तुलसी का जिक्र धर्मग्रंथों में भी मिलता है। स्कन्द पुराण के अनुसार जिस घर में तुलसी का पौधा होता है और हर दिन उसकी पूजा होती है तो ऐसे घर में यमदूत प्रवेश नहीं करते।

पुराणों के अनुसार तुलसी की पूजा रोज करनी चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि तुलसी जी की पूजा और सेवा करने वालों पर महालक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। दरअसल कहा जाता है कि विष्णु जी ने तुलसी जी को वरदान दिया था कि मुझे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा और जो व्यक्ति बिना तुलसी जी मेरी पूजा करेगा, उसका भोग मैं स्वीकार नहीं करुंगा। तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है।

 

          नजरिया / शौर्यपथ / राजस्थान विधानसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी ने जब अशोक गहलोत और सचिन पायलट को जिम्मेदारी सौंपी थी, तब उन्होंने दोनों नेताओं को अपने साथ खड़ा करके एक खुशनुमा तस्वीर ट्वीट की थी। इस तस्वीर को उन्होंने राजस्थान का मिला-जुला रंग करार दिया था। पर इस तस्वीर कोे बरकरार रखने के लिए पौने दो साल बाद भी पहले दिन की तरह उन्हें दोनों नेताओं की लड़ाई में बीच-बचाव करना पड़ रहा है। एक माह तक चली रस्साकशी के बाद राजस्थान सरकार का संकट फिलहाल टल गया है, पर अशोक गहलोत व सचिन पायलट के बीच टकराव अभी भी बरकरार है। गहलोत की तमाम कोशिशों के बावजूद पार्टी में पायलट की वापसी से साफ है कि कांग्रेस अपने नेताओं को खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहती। इससे गहलोत को भी एहसास हो गया कि संगठन से जुड़े मामलों में उनका निर्णय अंतिम नहीं है।
करीब एक माह तक चली इस लड़ाई में सचिन पायलट को भी वह सब हासिल नहीं हुआ, जिसके लिए उन्होंने बगावत का झंडा बुलंद किया था। पायलट को अपने साथ 30 विधायक होने का भरोसा था, पर बगावत के ऐलान के साथ ही कई भरोसेमंद विधायकों ने उनका साथ छोड़ दिया। आखिर में सिर्फ 19 विधायक उनके साथ गुरुग्राम के होटल पहुंचे। इनमें से भी कई विधायक मुख्यमंत्री के संपर्क में थे। गहलोत ने संख्या कम होने के बावजूद करीब 102 विधायक जुटा लिए थे। बसपा विधायकों के कांग्रेस में विलय का मामला अदालत में है और कई विधायकों पर उन्हें पूरा भरोसा नहीं था। दो-तीन विधायक भी इधर-उधर हुए, तो खेल पलट सकता था। उनकी रणनीति भाजपा पर टिकी थी। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के रुख को गहलोत अपने लिए फायदेमंद मान रहे थे, पर वह आश्वस्त नहीं थे। यही वजह है कि पार्टी अपने विधायकों को कभी एक होटल, तो कभी दूसरे होटल में घेराबंदी कर रोकने की कोशिश करती रही।
इस पूरे मामले में अशोक गहलोत ने सरकार गिराने की साजिश करने वाले लोगों को मात देकर कांग्रेस को रणनीतिक बढ़त दिलाई है। मध्य प्रदेश के बाद पार्टी के हौसले पस्त थे। शुरुआत में तो लगा था कि राजस्थान भी हाथ से फिसल गया, पर गहलोत ने जिस तरह रणनीति को अंजाम दिया, उससे पार्टी की ताकत बढ़ गई है।
पायलट को भी पता था कि गहलोत ने एक बार बहुमत साबित कर दिया, तो उनके लिए पार्टी में वापसी मुश्किल हो जाएगी। इसके साथ विधायकों की सदस्यता भी खत्म हो सकती है। पूरी कवायद में कांग्रेस एक विजेता के तौर पर उभरी है। पार्टी जहां राजस्थान में अपनी सरकार बचाने में सफल रही, वहीं टूट से भी बच गई। कांग्रेस लगातार कहती रही कि पायलट और उनके समर्थकों के लिए दरवाजे खुले हैं। गहलोत ने पायलट पर सीधा हमला बोला, तो सफाई देने में भी देर नहीं की।
सचिन पायलट अब वापस आ चुके हैं। पार्टी ने उनकी शिकायतों पर विचार करने के लिए तीन सदस्यीय समिति के गठन के अलावा कोई वादा नहीं किया है। समिति पायलट और गहलोत के साथ विधायकों से चर्चा करके अपनी रिपोर्ट देगी। कमेटी की सिफारिशों के आधार पर कदम उठाए जाएंगे। पायलट समर्थक विधायकों को सरकार में पहले के मुकाबले ज्यादा लालबत्ती मिल सकती है। शुरुआती तौर पर ऐसा लगा कि पायलट ने राजनीतिक गलती की है, पर उन्होंने शुरू में जो बात कही, उसी पर कायम रहे। उन्होंने अपने हमले को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक सीमित रखा। यही सावधानी उनकी वापसी की वजह बनी। हो सकता है, पायलट कुछ दिन कमजोर नजर आएं, पर पार्टी में उनका कद बढे़गा।
गहलोत को राजनीति का जादूगर कहा जाता है। कुछ हद तक यह बात सही भी है, क्योंकि अभी तक वह अपने सभी विरोधियों को मात देते हुए आगे बढ़ते रहे हैं। हरिदेव जोशी, परसराम मदेरणा, नवल किशोर शर्मा, शीशराम ओला और रामनिवास मिर्धा जैसे नेताओं को प्रदेश की राजनीति में दरकिनार कर गहलोत आगे बढे़ हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि पार्टी हाईकमान के निर्णय उनके लिए अंतिम हैं। ऐसे में, यह मामला उनके लिए इम्तिहान से कम नहीं है। गहलोत किस तरह पायलट के साथ अपनी अदावत भुलाकर उन्हें सम्मान देते हैं, यह राजस्थान में कांग्रेस सरकार की स्थिरता का पैमाना होगा और सचिन को अब एक नई शुरुआत करनी होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) सुहैल हामिद, विशेष संवाददाता, हिन्दुस्तान

 

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / देश के दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ अपनी कल की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अधिक से अधिक जांच की बात पर जिस तरह से जोर दिया, वह महामारी से निपटने में इस कदम की अहमियत को स्पष्ट कर देता है। उन्होंने उन राज्यों से खास तौर से अपील की कि वे अपने यहां जांच की रफ्तार और दायरा बढ़ाएं, जहां संक्रमण-दर और मृत्यु-दर अधिक हैं। बैठक के बाद प्रधानमंत्री ने ट्वीट करके बाकायदा बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना सरकारों से इस काम में तेजी लाने को कहा। इसमें कोई दोराय नहीं कि जांच की संख्या और दायरे के विस्तार के साथ संक्रमण के आंकडे़ बढ़ेंगे, लेकिन संक्रमितों को वक्त पर उपचार मुहैया कराकर ही मृत्यु-दर को कम किया जा सकता है। अब यह वैश्विक स्तर पर स्थापित तथ्य है कि जिन देशों ने बचाव के अन्य उपायों के साथ शुरुआती दौर में ही ज्यादा से ज्यादा जांच का रास्ता अपनाया, वे आज बेहतर स्थिति में हैं।
हमारे लिए राहत की एक बात यह है कि मृत्यु-दर दो फीसदी के नीचे आ गई है। जाहिर है, रिकवरी रेट बढ़ रहा है। लेकिन महामारी से हमारी लड़ाई अभी काफी कठिन मोड़ पर है। चूंकि संक्रमण के मामले अब ग्रामीण इलाकों से भी काफी मिल रहे हैं, इसलिए हमें पहले से अधिक चिकित्सकों, अस्पतालों और अन्य संसाधनों की जरूरत पड़ेगी, जबकि हम अब तक इस जंग में तकरीबन 200 डॉक्टरों की शहादत दे चुके हैं और पहली कतार के कोरोना वॉरियर्स व अस्पतालों पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है। यही नहीं, लंबे लॉकडाउन और आर्थिक सुस्ती के कारण आम लोगों पर भी एक अलग किस्म का दबाव है। खुद प्रधानमंत्री ने कल की बैठक में इसका संकेत किया था। ऐसे में, एक राष्ट्र के तौर पर यह हमारे धैर्य की परीक्षा की घड़ी है। और महामारी को परास्त करने के लिए हमें इस परीक्षा में पास होना ही होगा।
कल की बैठक में कुछ मुख्यमंत्रियों ने राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ) से कैप हटाने की भी मांग की, ताकि वे अपने सूबे में महामारी की चुनौतियों का मुकाबला अच्छे तरीके से कर सकें। अभी इस कोष से अधिकतम खर्च-सीमा 35 फीसदी है। पंजाब, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने केंद्र से इससे अधिक राशि निकालने की इजाजत मांगी है। राज्यों की यह मांग जायज लगती है, क्योंकि पिछले छह महीनों से उनकी राजस्व-उगाही बुरी तरह प्रभावित हुई है, और फिर बिहार व केरल जैसे राज्य तो बाढ़ की आपदा का भी सामना कर रहे हैं। स्वाभाविक है, उन्हें इस कैप की वजह से दुश्वारियां पेश आ रही हैं। बहरहाल, केंद्र और राज्यों ने जिस समन्वय के साथ अब तक इस महामारी का मुकाबला किया है, उसकी यकीनन सराहना की जानी चाहिए। तब तो और, जब अमेरिका जैसा मजबूत संघीय ढांचा इस महामारी में चरमराता हुआ दिखा और राष्ट्रपति ट्रंप व विपक्ष शासित राज्यों की तनातनी की कीमत हजारों अमेरिकियों को जान देकर चुकानी पड़ी। भारत में राज्यों के मुख्यमंत्री के साथ प्रधानमंत्री शुरुआत से ही लगातार बैठकें करते रहे हैं और इससे समस्याओं के मूल तक पहुंचने की एक समझ बनी है। यह एक मुश्किल लड़ाई है और विभिन्न शासकीय इकाइयों के बीच बेहतर तालमेल, अधिकतम जांच एवं व्यापक जन-जागरूकता से ही इसमें फतह मिल सकती है।

 

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