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April 15, 2026
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शौर्यपथ

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बाकलीवाल की ‘नई कांग्रेस’ की मुहिम को झटका? निष्क्रिय और विवादित चेहरों की एंट्री से कार्यकर्ताओं में असंतोष

दुर्ग / शौर्यपथ / विशेष रिपोर्ट

दुर्ग शहर कांग्रेस में चार दशक तक वोरा परिवार के वर्चस्व के बाद जब प्रदेश नेतृत्व ने बड़ा फैसला लेते हुए संगठन की कमान धीरज बाकलीवाल को सौंपी, तब कार्यकर्ताओं के बीच एक नई ऊर्जा और बदलाव की उम्मीद जगी थी। लंबे समय से उठ रहे “परिवारवाद और अवसरवाद” के आरोपों के बीच यह बदलाव कांग्रेस के लिए एक नई शुरुआत माना गया।

धीरज बाकलीवाल ने अध्यक्ष पद संभालते ही जिस तरह जमीनी और सक्रिय कार्यकर्ताओं को जिला कांग्रेस कमेटी में जगह दी, उसने न केवल संगठन में नई जान फूंकी, बल्कि वर्षों से उपेक्षित कार्यकर्ताओं को भी एक मंच दिया। इस फैसले की शहरभर में सराहना हुई और इसे कांग्रेस के पुनरुत्थान की दिशा में अहम कदम माना गया।

लेकिन…

यह “नई सोच” ब्लॉक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर पड़ती नजर आ रही है।

? दक्षिण ब्लॉक की सूची: बदलाव या पुनरावृत्ति?

हाल ही में घोषित दुर्ग शहर दक्षिणी ब्लॉक कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी सूची ने एक बार फिर संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूची सामने आते ही कांग्रेसी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया।

आरोप है कि—

कई ऐसे नाम शामिल किए गए हैं जो लंबे समय से निष्क्रिय रहे हैं

कुछ पदाधिकारी विवादित छवि के माने जाते हैं

और कुछ ऐसे चेहरे भी हैं जिनकी जनाधार क्षमता पर ही सवाल खड़े हैं

यहां तक कि संगठन के भीतर ही यह चर्चा है कि कुछ नाम ऐसे हैं जो “अपने घर या मोहल्ले के चार वोट तक कांग्रेस के पक्ष में नहीं ला सकते।”

? कार्यकर्ताओं में निराशा, सवालों की भरमार

जिस जोश और उम्मीद के साथ जिला स्तर पर नई टीम का गठन हुआ था, वह ब्लॉक स्तर पर आते-आते फीका पड़ता दिखाई दे रहा है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर ब्लॉक स्तर पर ही “पुरानी और निष्क्रिय सोच” हावी रही, तो संगठन की मजबूती केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी।

कई कार्यकर्ता इसे “अवसरवाद की वापसी” भी बता रहे हैं, जहां सक्रियता और संघर्ष की बजाय समीकरण और व्यक्तिगत हित हावी हो रहे हैं।

? क्या बाकलीवाल की रणनीति को लगेगा झटका?

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो धीरज बाकलीवाल ने जिस साहस के साथ संगठन में नई शुरुआत की थी, उसे जमीनी स्तर पर लागू करना सबसे बड़ी चुनौती है।

अगर ब्लॉक इकाइयों में पुराने और निष्क्रिय चेहरों को ही तवज्जो मिलती रही, तो यह न केवल संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि आगामी चुनावों में कांग्रेस की स्थिति को भी कमजोर कर सकता है।

? आगे क्या?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

? क्या दक्षिण ब्लॉक के पदाधिकारी संगठन को मजबूत करने के लिए काम करेंगे?

? या फिर यह नियुक्तियां केवल “पद और प्रभाव” तक सीमित रह जाएंगी?

दुर्ग कांग्रेस के भीतर उठती यह असंतोष की लहर आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक रूप ले सकती है। फिलहाल, सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या संगठन इन आलोचनाओं को गंभीरता से लेगा या फिर “पुरानी राह” पर ही आगे बढ़ेगा।

(विशेष टिप्पणी):

दुर्ग कांग्रेस के लिए यह समय आत्ममंथन का है—क्योंकि बदलाव केवल चेहरे बदलने से नहीं, सोच बदलने से आता है।

दुर्ग // शौर्यपथ समाचार

दुर्ग नगर निगम के सबसे व्यस्ततम बस स्टैंड क्षेत्र में अवैध कब्जों का खेल अब खुलकर सामने आने लगा है। आरोप है कि निगम के बाजार विभाग के संरक्षण में प्रवीण ऑटो इंजीनियरिंग द्वारा लगातार नियमों को ताक पर रखकर कब्जा बढ़ाया जा रहा है। पहले बरामदे में स्टेट (ढांचा) खड़ा किया गया, फिर बिना अनुमति के जनरेटर स्थापित कर लिया गया और अब पूरे घरनुमा हिस्से पर कब्जा कर लेने का मामला चर्चा का विषय बन गया है।

इस पूरे प्रकरण ने निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासतौर पर महापौर श्रीमती अलका बाघमार और बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की भूमिका को लेकर शहर में तीखी चर्चाएं हैं।

बाजार विभाग की कार्यशैली पर सवाल

स्थानीय लोगों का आरोप है कि बस स्टैंड जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्र में अवैध कब्जों का विस्तार बिना विभागीय संरक्षण के संभव नहीं है। बाजार विभाग की अनुमति से विस्थापन की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है, जहां व्यवस्थित पुनर्वास के बजाय मनमाने ढंग से स्थान आवंटन किए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

निगम परिसर के बरामदों से लेकर सड़कों तक अतिक्रमण फैलता जा रहा है, जिससे यातायात व्यवस्था और आम नागरिकों की सुविधा दोनों प्रभावित हो रही हैं।

‘टालमटोल’ या ‘संरक्षण’?

बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा पर आरोप है कि वे लगातार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई करने के बजाय टालमटोल की नीति अपना रहे हैं। इससे यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं न कहीं यह मामला केवल लापरवाही नहीं बल्कि आर्थिक अनियमितताओं से भी जुड़ा हो सकता है।

फ्लेक्स-बैनर घोटाले, राम रसोई अनुबंध विवाद और अन्य अतिक्रमण मामलों के बाद यह नया प्रकरण विभागीय पारदर्शिता पर और बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

शहर में बढ़ती अव्यवस्था, जिम्मेदारी किसकी?

बस स्टैंड, जो जिले का प्रमुख परिवहन केंद्र है, वहां अवैध कब्जों के कारण अव्यवस्था चरम पर पहुंचती जा रही है। ऐसे में शहरी सरकार की मुखिया होने के नाते महापौर अलका बाघमार और संबंधित विभागीय अधिकारी की जवाबदेही तय होना स्वाभाविक है।

आयुक्त की भूमिका पर नजर

वर्तमान में निगम की प्रशासनिक कमान आईएएस अधिकारी सुमित अग्रवाल के हाथों में है। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि वे इस पूरे मामले में क्या सख्त कदम उठाते हैं और बाजार विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार ला पाते हैं या नहीं।

राजनीतिक गलियारों में भी गर्माहट

इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। शहर में यह चर्चा जोरों पर है कि अव्यवस्था और अवैध कब्जों का असर आगामी चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। जहां एक ओर महापौर के भविष्य को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं, वहीं क्षेत्रीय विधायक और मंत्री गजेंद्र यादव की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं।

निष्कर्ष:

दुर्ग बस स्टैंड में बढ़ते अवैध कब्जे केवल अतिक्रमण का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह नगर निगम की प्रशासनिक क्षमता, पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुका है। यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में “जोगी” नाम केवल एक व्यक्ति या परिवार का प्रतीक नहीं, बल्कि एक पूरे दौर, एक सोच और एक राजनीतिक प्रयोग का प्रतिनिधित्व करता है। अजीत जोगी ने जिस राज्य को जन्म के शुरुआती वर्षों में दिशा दी, उसी राज्य में उनके परिवार की राजनीति आज अस्तित्व के संकट और कानूनी लड़ाइयों के बीच खड़ी है। यह कहानी सिर्फ उत्थान और पतन की नहीं, बल्कि सत्ता, संघर्ष और विवादों के जटिल संगम की है।


नींव के शिल्पकार: अजीत जोगी

जब छत्तीसगढ़ का गठन हुआ, तब प्रशासनिक ढांचा कमजोर था, संसाधन सीमित थे और उम्मीदें आसमान छू रही थीं। ऐसे समय में अजीत जोगी ने एक मजबूत प्रशासक के रूप में राज्य की नींव रखी।

उन्होंने किसानों के लिए समर्थन मूल्य, गरीबों के लिए “काम के बदले चावल”, आदिवासियों के लिए भूमि सुरक्षा और जल प्रबंधन के लिए “जोगी डबरी” जैसी योजनाओं से एक जन-नेता की छवि बनाई। यह वह दौर था जब जोगी को छत्तीसगढ़ का “निर्माता मुख्यमंत्री” कहा जाने लगा।

लेकिन राजनीति में केवल योजनाएं ही पर्याप्त नहीं होतीं—विश्वास और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी होती है।


सत्ता का केंद्रीकरण और गिरती साख

जोगी सरकार पर सबसे बड़ा आरोप था—सत्ता का केंद्रीकरण
सरकार के फैसले कुछ लोगों और परिवार के इर्द-गिर्द सिमटते नजर आए। इसी दौरान “सुपर सीएम” जैसी उपाधियों ने जन्म लिया, जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।

कांग्रेस के भीतर गुटबाजी, वरिष्ठ नेताओं का अलग होना और “जोगी टेप कांड” जैसे विवादों ने जनता के बीच यह संदेश दिया कि सत्ता सेवा से ज्यादा नियंत्रण का माध्यम बनती जा रही है।

परिणाम स्पष्ट था—2003 में सत्ता हाथ से निकल गई, और 15 साल तक वापसी नहीं हो सकी।


अमित जोगी: विवादों की परछाई में राजनीति

जहां अजीत जोगी ने संघर्ष से पहचान बनाई, वहीं अमित जोगी का राजनीतिक सफर शुरुआत से ही आरोपों और विवादों से घिरा रहा।

“केबल वॉर” हो या प्रशासनिक हस्तक्षेप के आरोप—इन सबने उनकी छवि को एक आक्रामक और प्रभावशाली लेकिन विवादित नेता के रूप में स्थापित किया।

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब रामावतार जग्गी हत्याकांड में हाई कोर्ट ने 2026 में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
हालांकि अंतिम फैसला अभी न्यायिक प्रक्रिया के अंतिम चरण (सुप्रीम कोर्ट) पर निर्भर करेगा, लेकिन इस निर्णय ने जोगी परिवार की राजनीतिक जमीन को हिला कर रख दिया है।


झीरम घाटी: सवाल जो आज भी जिंदा हैं

2013 का झीरम घाटी कांड छत्तीसगढ़ की राजनीति का सबसे काला अध्याय रहा।
इसमें जोगी परिवार पर सीधे आरोप सिद्ध नहीं हुए, लेकिन राजनीतिक संदेह और आरोपों ने उनकी छवि को प्रभावित जरूर किया।

राजनीति में कभी-कभी सिर्फ दोषी होना जरूरी नहीं होता, संदेह भी काफी होता है।


जनता कांग्रेस (जे): एक प्रयोग, जो सिमट गया

अजीत जोगी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई—जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे)।
2018 में यह पार्टी “किंगमेकर” बनी, लेकिन 2023 तक पूरी तरह हाशिए पर चली गई।

आज स्थिति यह है कि:

  • संगठन कमजोर
  • नेता बिखर चुके
  • और अस्तित्व बचाने के लिए कांग्रेस में विलय की कोशिश

यह दिखाता है कि व्यक्ति आधारित राजनीति, संगठन के बिना लंबे समय तक टिक नहीं पाती।


निष्कर्ष: विरासत बनाम वास्तविकता

जोगी परिवार की कहानी हमें एक बड़ा राजनीतिक सबक देती है—

? विकास की योजनाएं विरासत बनाती हैं, लेकिन विवाद उसे कमजोर कर देते हैं।
? सत्ता का केंद्रीकरण अल्पकालिक लाभ देता है, लेकिन दीर्घकाल में नुकसान करता है।
? और सबसे महत्वपूर्ण—जनता अंततः छवि और विश्वास के आधार पर फैसला करती है।

आज जोगी परिवार एक ऐसे मोड़ पर है जहां:

  • अतीत की उपलब्धियां सम्मान दिलाती हैं
  • लेकिन वर्तमान के विवाद भविष्य तय कर रहे हैं

छत्तीसगढ़ की राजनीति में “जोगी युग” एक अधूरा अध्याय बन चुका है—जिसमें उपलब्धियों की चमक भी है और विवादों की छाया भी।


दुर्ग।

दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में “ट्रिपल इंजन सरकार” के नाम पर जिस तेज़ विकास की उम्मीद आम जनता ने लगाई थी, वह अब राजनीतिक खींचतान की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। एक ओर प्रदेश सरकार के मंत्री एवं स्थानीय विधायक गजेंद्र यादव बस स्टैंड के विस्तार और शहर के समग्र विकास के लिए सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शहरी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

बस स्टैंड विस्तार बनाम अव्यवस्था

मंत्री गजेंद्र यादव ने हाल ही में जिला प्रशासन के अधिकारियों के साथ बस स्टैंड का दौरा कर इसके विस्तार की स्पष्ट मंशा जताई थी। यह बस स्टैंड जिले का प्रमुख यातायात केंद्र है, जहां प्रतिदिन हजारों यात्रियों का आवागमन होता है। ऐसे में विस्तार की योजना को शहर के विकास के लिए अहम माना जा रहा था।

लेकिन इसके विपरीत, बस स्टैंड क्षेत्र में अवैध कब्जों पर कार्रवाई न होना और “राम रसोई” जैसे मामलों में लगभग 2000 वर्गफुट जमीन पर कब्जा बने रहना शहरी सरकार की नीतियों पर सवाल खड़ा कर रहा है।

विस्थापन के नाम पर नया विवाद

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब बस स्टैंड के मोड़ के पास, पार्किंग मार्ग पर दो दुकानों के विस्थापन के नाम पर नए निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। यह स्थान पहले से ही यातायात के लिहाज से संवेदनशील है। जानकारों का मानना है कि इससे भविष्य में जाम और अव्यवस्था बढ़ेगी।

आरोप यह भी हैं कि इस तरह के निर्णय न केवल शहर की यातायात व्यवस्था को बिगाड़ेंगे, बल्कि अवैध कब्जों को अप्रत्यक्ष रूप से वैधता देने का काम करेंगे।

अवैध बाजार पर भी नरमी?

सेवा सदन के सामने लग रहे अवैध बाजार को लेकर भी शहरी सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में है। अब तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं होना यह संकेत दे रहा है कि अवैध व्यापारियों के प्रति नरमी बरती जा रही है।

राजनीतिक खींचतान खुलकर सामने

दुर्ग की राजनीति में अब यह चर्चा आम हो चली है कि प्रदेश सरकार के मंत्री गजेंद्र यादव और नगर निगम की महापौर अलका बाघमार के बीच तालमेल की कमी विकास में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। सामान्य सभा में भाजपा पार्षदों द्वारा ही अपनी सरकार को घेरना इस आंतरिक असंतोष का खुला प्रमाण माना जा रहा है।

स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लग रहे हैं कि मंत्री के प्रयासों की अनदेखी कर शहरी सरकार अलग दिशा में काम कर रही है, और कई मामलों में “झूठा श्रेय” लेने की होड़ भी देखी जा रही है।

जनता के बीच बढ़ती नाराजगी

इन सब घटनाओं के बीच सबसे ज्यादा प्रभावित आम जनता हो रही है। बस स्टैंड की बदहाल व्यवस्था, अवैध कब्जे और अव्यवस्थित विस्थापन के कारण लोगों को रोजाना परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

अब सवाल यह उठ रहा है कि जब केंद्र, राज्य और नगर—तीनों स्तर पर एक ही पार्टी की सरकार है, तो फिर विकास कार्यों में यह टकराव क्यों?

आगे क्या?

नजरें अब प्रदेश नेतृत्व और भाजपा संगठन पर टिकी हैं। क्या वे इस आंतरिक खींचतान को समाप्त कर शहर के विकास को प्राथमिकता देंगे, या फिर राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में दुर्ग की जनता यूं ही परेशान होती रहेगी?

फिलहाल, दुर्ग में “ट्रिपल इंजन” की रफ्तार विकास से ज्यादा विवादों में फंसी नजर आ रही है।

दुर्ग।

शहर के व्यस्ततम बस स्टैंड क्षेत्र में स्थित “राम रसोई” को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है, जिसमें नगर निगम के बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि अनुबंध समाप्ति के बाद भी पिछले 6 महीनों से राम रसोई अवैध रूप से संचालित हो रही है, लेकिन न तो शिकायतों की जांच हो रही है और न ही संबंधित फाइल का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सामने आ रहा है।

बताया जा रहा है कि बस स्टैंड जैसे प्राइम लोकेशन पर, जहां जमीन की कीमत हजारों रुपए प्रति वर्गफुट आंकी जाती है, वहां लगभग 2000 वर्गफुट क्षेत्र पर राम रसोई के संचालक चतुर्भुज राठी द्वारा कब्जा बनाए रखा गया है। इस पूरे मामले में बाजार विभाग की निष्क्रियता अब संदेह के घेरे में आ गई है।

विस्थापन के नाम पर नया खेल?

मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब बस स्टैंड स्थित शौचालय के पास की दो दुकानों को तोड़ने और उनके विस्थापन का आदेश जिला कलेक्टर द्वारा दिया गया। हालांकि कलेक्टर ने “उपयुक्त स्थान” पर विस्थापन की बात कही थी, लेकिन बाजार अधिकारी द्वारा जिस स्थान का चयन किया गया है, वह यातायात व्यवस्था के लिहाज से बेहद संवेदनशील और अव्यवस्थित माना जा रहा है।

स्थानीय सूत्रों का दावा है कि जिस मोड़ पर नई दुकानों के निर्माण की तैयारी की जा रही है, वहां पहले से ही यातायात का दबाव रहता है। ऐसे में यह निर्णय न केवल आम जनता के लिए परेशानी का कारण बन सकता है, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से राम रसोई के वर्तमान कब्जे को स्थायी करने की दिशा में भी कदम माना जा रहा है।

6 महीने से जांच ठंडे बस्ते में, फाइल का अता-पता नहीं

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि राम रसोई से जुड़ी शिकायतों को करीब 6 महीने बीत चुके हैं, लेकिन बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा न तो जांच पूरी कर पाए हैं और न ही फाइल की स्थिति स्पष्ट कर पा रहे हैं। इससे प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

पर्दे के पीछे सौदेबाजी की चर्चा तेज

इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह चर्चा भी जोरों पर है कि विस्थापन और जमीन आवंटन के इस खेल में मोटी रकम का लेन-देन हुआ है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से नियमों की अनदेखी और देरी हो रही है, उसने संदेह को और गहरा कर दिया है।

आयुक्त की भूमिका पर नजर

अब नजरें नगर निगम आयुक्त सुमीत अग्रवाल (आईएएस) पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि वे इस मामले में जमीनी स्तर पर निष्पक्ष जांच कराएंगी और बस स्टैंड की व्यवस्था को सुधारने की दिशा में ठोस कदम उठाएंगी।

आम जनता की चिंता बढ़ी

यदि समय रहते इस मामले में हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो बस स्टैंड की यातायात व्यवस्था और अधिक प्रभावित हो सकती है, जिसका खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ेगा।

अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है या फिर “आदेश की आड़” में चल रहा यह खेल यूं ही जारी रहता है।

व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए बाजार, अतिक्रमण और राजस्व शाखा में व्यापक बदलाव—तत्काल प्रभाव से आदेश लागू

दुर्ग | शौर्यपथ

नगर पालिका निगम दुर्ग में प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से आयुक्त सुमित अग्रवाल (IAS) ने बड़ा निर्णय लेते हुए कई अधिकारियों और कर्मचारियों के दायित्वों में व्यापक फेरबदल किया है। जारी आदेश (दिनांक 07 अप्रैल 2026) के अनुसार यह परिवर्तन तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है।

अतिक्रमण और बाजार शाखा में अहम बदलाव

आदेश के तहत सबसे महत्वपूर्ण बदलाव अतिक्रमण शाखा और बाजार विभाग में देखने को मिला है—

श्री ईश्वर वर्मा (राजस्व उपनिरीक्षक) को बाजार विभाग से मुक्त करते हुए अब प्रभारी अतिक्रमण शाखा का अतिरिक्त दायित्व सौंपा गया है।

श्री परमेश्वर कुमार (सहायक राजस्व निरीक्षक) को अतिक्रमण शाखा में पदस्थ करते हुए बाजार शाखा का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।

यह स्पष्ट संकेत है कि निगम अब अतिक्रमण नियंत्रण को लेकर सक्रिय मोड में आने की तैयारी में है।

राजस्व और बाजार प्रबंधन में पुनर्संतुलन

श्री अभ्युदय मिश्रा (सहायक ग्रेड-03) को केवल प्रभारी अधिकारी बाजार शाखा का दायित्व सौंपा गया है, साथ ही राजस्व विभाग का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया है।

वहीं श्री थानसिंह यादव (राजस्व उपनिरीक्षक) को सहायक राजस्व अधिकारी के प्रभार से मुक्त किया गया है।

स्टोर और भवन शाखा में भी बदलाव

श्रीमती साक्षी चौहान (सहायक राजस्व निरीक्षक) को उनके मूल कार्यों के साथ-साथ नोडल अधिकारी, स्टोर शाखा का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।

एक अधिकारी का स्थानांतरण

श्री चंदन मनहरे (राजस्व उपनिरीक्षक) को राजस्व विभाग से स्थानांतरित कर सचिवालय में पदस्थ किया गया है।

“तत्काल प्रभाव” का संदेश

आदेश में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि

? यह सभी परिवर्तन तत्काल प्रभाव से लागू होंगे,

जिससे यह संकेत मिलता है कि निगम प्रशासन अब कार्यप्रणाली में तेजी और जवाबदेही लाने के मूड में है।

क्या अब दिखेगा असर?

इस फेरबदल को ऐसे समय में किया गया है, जब

? शहर में अतिक्रमण और प्रशासनिक निष्क्रियता को लेकर सवाल उठ रहे हैं

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या यह प्रशासनिक बदलाव जमीनी स्तर पर असर दिखाएगा, या फिर यह भी सिर्फ कागजी कवायद बनकर रह जाएगा?

निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल के इस फैसले से स्पष्ट है कि प्रशासन अब “एक्शन मोड” में आने का संकेत दे रहा है—अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि बदलाव का असर शहर की सड़कों और व्यवस्था में कितना दिखता है।

बस्तर के लिए 360° प्लान-टूरिज्म, स्टार्टअप, इंफ्रा और इनोवेशन पर फोकस

पीएम का बस्तर दौरा बनेगा टर्निंग पॉइंट, बड़े प्रोजेक्ट्स की सौगात

नई दिल्ली / रायपुर / छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर बस्तर के भविष्य की एक नई तस्वीर पेश की। इस मुलाकात में मुख्यमंत्री ने न केवल नक्सलवाद के अंत के बाद प्रदेश में आई शांति के लिए प्रधानमंत्री का आभार जताया, बल्कि बस्तर के समग्र विकास का एक विस्तृत और दूरदर्शी ब्लूप्रिंट भी सौंपा। साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री को मानसून के बाद बस्तर आने का आमंत्रण दिया, जहां उनकी मौजूदगी में कई बड़ी परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण प्रस्तावित है।

उन्होंने बताया कि बस्तर समेत पूरे राज्य में नक्सलवाद समाप्त हो चुका है और अब शांति स्थापित है। शिक्षा व स्वास्थ्य सुधार के तहत नए एजुकेशन सिटी, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बनाए जा रहे हैं, जबकि इंद्रावती नदी पर बैराज, रेल लाइन और एयरपोर्ट विस्तार से कनेक्टिविटी मजबूत हो रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस ब्लूप्रिंट के जरिए बस्तर में अब विकास, रोजगार और बेहतर सुविधाओं का नया दौर शुरू होगा।

मुख्यमंत्री ने अपने विकास दस्तावेज़ में उल्लेख किया कि एक दशक पहले प्रधानमंत्री द्वारा बस्तर के लिए देखा गया शांति और विकास का सपना अब जमीन पर साकार हो रहा है। नक्सलवाद खत्म होने के बाद अब लोगों में डर नहीं, बल्कि उम्मीद और विकास की नई चमक है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन से बस्तर को नई दिशा और गति मिलेगी, जिससे क्षेत्र में विश्वास और उत्साह बढ़ेगा।

मुख्यमंत्री द्वारा प्रस्तुत विकास ब्लूप्रिंट ‘सैचुरेशन, कनेक्ट, फैसिलिटेट, एम्पावर और एंगेज’ रणनीति पर आधारित है। इसके तहत बस्तर में बुनियादी सुविधाओं को तेजी से विस्तार देने का लक्ष्य रखा गया है। सड़कों के व्यापक जाल के माध्यम से दूर-दराज के गांवों को जोड़ा जाएगा। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अधूरे कार्यों को 2027 तक पूरा करने के साथ-साथ नई 228 सड़कों और 267 पुलों का निर्माण प्रस्तावित है। इसके अलावा 61 नई परियोजनाओं के लिए विशेष केंद्रीय सहायता की मांग भी की गई है।

ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भी बड़े बदलाव की योजना है। हर घर तक बिजली पहुंचाने के कार्य तेज होंगे। शिक्षा के क्षेत्र में 45 पोटा केबिन स्कूलों को स्थायी भवनों में बदला जाएगा। युवाओं के लिए 15 स्टेडियम और 2 मल्टीपर्पज हॉल बनाए जाएंगे, जबकि स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार और डॉक्टरों के लिए ट्रांजिट हॉस्टल बनाए जा रहे हैं।

कृषि और सिंचाई के क्षेत्र में इंद्रावती नदी पर दो बड़े प्रोजेक्ट देउरगांव और मटनार में स्वीकृत किए गए हैं, जिनसे 31,840 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। यह परियोजनाएं बस्तर की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगी।

आजीविका और आय बढ़ाने के लिए सरकार ने तीन वर्षीय योजना तैयार की है, जिसका लक्ष्य 2029 तक 85% परिवारों की मासिक आय 15,000 रुपये से बढ़ाकर 30,000 रुपये करना है। ‘नियद नेल्ला नार 2.0’ योजना के तहत अब अधिक जिलों को जोड़ा जा रहा है, जिससे विकास का लाभ व्यापक स्तर पर पहुंचेगा। 10 जिलों में शुरू की गई यह योजना अब 7 जिलों और 3 नए जिलों (गरियाबंद, मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई) तक विस्तारित हो रही है।

‘अंजोर विजन 2047’ और ‘विकसित भारत@2047’ के तहत स्टार्टअप नीति भी लागू की गई है, जिसमें 2030 तक 5,000 स्टार्टअप तैयार करने का लक्ष्य है।

पर्यटन के क्षेत्र में बस्तर की पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में भी तेजी से काम हो रहा है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी नेशनल पार्क, एडवेंचर टूरिज्म, कैनोपी वॉक और ग्लास ब्रिज जैसी परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे आयोजन क्षेत्र को नई पहचान दे रहे हैं। वहीं, एक लाख से अधिक युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिनमें से 40 हजार को रोजगार भी मिल चुका है।

नक्सलवाद से मुक्त बस्तर के विकास के लिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज प्रधानमंत्री के सामने जो कार्ययोजना प्रस्तुत की, उसमें ‘बस्तर मुन्ने’ (अग्रणी बस्तर) कार्यक्रम एक अहम पहल है। इस कार्यक्रम के तहत हर ग्राम पंचायत में शिविर लगाए जाएंगे, जहाँ अधिकारियों की मौजूदगी में लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे दिया जाएगा, जरूरी दस्तावेज वहीं बनाए जाएंगे और उनकी समस्याओं का मौके पर ही समाधान किया जाएगा। इसका उद्देश्य है कि हर व्यक्ति तक सरकार की योजनाएँ आसानी से पहुँचें और बस्तर तेजी से विकास की राह पर आगे बढ़े।

प्रधानमंत्री के प्रस्तावित दौरे के दौरान जिन प्रमुख परियोजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण की योजना है, उनमें रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन, जगदलपुर एयरपोर्ट का विस्तार, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, दंतेवाड़ा में मेडिकल कॉलेज, जगरगुंडा और ओरछा में एजुकेशन सिटी जैसी महत्वपूर्ण पहल शामिल हैं। ये परियोजनाएं बस्तर को शिक्षा, स्वास्थ्य और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगी।

महापौर अलका बाघमार के सख्त निर्देश कागजों तक सीमित? रसूखदारों पर खामोशी, गरीबों पर कार्रवाई तेज—निगम की कार्यशैली पर उठे सवाल


दुर्ग | शौर्यपथ

दुर्ग नगर निगम की कार्यप्रणाली अब सिर्फ सवालों के घेरे में नहीं, बल्कि कटाक्ष का विषय बनती जा रही है। एक ओर जहां महापौर श्रीमती अलका बाघमार खुद इंच-टेप लेकर पेवर ब्लॉक के काम की नाप-जोख कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर शहर में रसूखदारों द्वारा किए गए अवैध कब्जे बिना नापे-तौले ही फल-फूल रहे हैं।


इंच-टेप का ‘चयनात्मक इस्तेमाल’?

हाल ही में सामने आए दृश्य में महापौर
? ठेकेदार को गुणवत्तापूर्ण कार्य के लिए सख्त निर्देश देती नजर आईं,
? इंच-टेप से काम की बारीकी जांच करती दिखीं।

लेकिन बड़ा सवाल यही है—
क्या यही इंच-टेप अवैध कब्जों की नाप-जोख के लिए कभी इस्तेमाल होगी?


अवैध कब्जों पर क्यों नहीं चलती ‘माप-तौल’?

शहर में कई ऐसे मामले हैं जहां

  • बिना अनुमति दो मंजिला इमारतें खड़ी हो गईं
  • सरकारी जमीन पर खुलेआम व्यवसाय शुरू होने की तैयारी
  • नोटिस के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं

आदिनाथ केयर सेंटर का मामला इसका ताजा उदाहरण बनकर सामने आया है।


गरीबों पर बुलडोजर, अमीरों पर ‘मौन व्रत’?

आरोप यह है कि
? ठेला-गुमटी वालों पर तत्काल कार्रवाई,
? लेकिन बड़े अतिक्रमणकारियों पर सिर्फ नोटिस और खामोशी

यह “चयनात्मक सख्ती” अब आम जनता की नजरों से छिपी नहीं है।


प्रेस विज्ञप्ति बनाम जमीनी सच्चाई

निगम द्वारा समय-समय पर जारी
? “सख्त प्रशासन” की प्रेस विज्ञप्तियां,
जमीनी हकीकत से मेल नहीं खातीं।

हकीकत यह है कि
? छोटे कार्यों को उपलब्धि बताकर प्रचार किया जा रहा है,
? जबकि बड़े अवैध कब्जे जस के तस खड़े हैं।


सुशासन पर सवाल खड़े करती तस्वीर

प्रदेश स्तर पर जहां
मुख्यमंत्री सुशासन और पारदर्शिता की बात कर रहे हैं,
वहीं दुर्ग में
? नीतियों पर अमल में भेदभाव के आरोप
उन दावों को कमजोर करते नजर आ रहे हैं।


जनता पूछ रही—“नाप कब होगी?”

अब शहर में एक ही सवाल गूंज रहा है—

  • क्या इंच-टेप सिर्फ पेवर ब्लॉक के लिए है?
  • क्या रसूखदारों के अवैध कब्जे “माप” से बाहर हैं?
  • क्या बुलडोजर सिर्फ गरीबों के लिए आरक्षित है?

दुर्ग में अब मुद्दा सिर्फ अतिक्रमण का नहीं, बल्कि न्याय और निष्पक्षता का बन चुका है।
यदि शहरी सरकार सच में “सख्त प्रशासन” दिखाना चाहती है, तो
? इंच-टेप और बुलडोजर दोनों का इस्तेमाल समान रूप से करना होगा।


अब देखना यह होगा कि महापौर अलका बाघमार ‘माप-तौल’ की इस राजनीति से बाहर निकलकर निष्पक्ष कार्रवाई करती हैं या फिर यह मामला भी केवल सवाल बनकर रह जाएगा।

नकद वसूली के साथ आयुष्मान कार्ड भी किया एक्टिवेट, रसीद तक नहीं—परिजनों ने लगाया गंभीर भ्रष्टाचार का आरोप, स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी पर सवाल

दुर्ग | शौर्यपथ

शहर में निजी अस्पतालों की मनमानी और स्वास्थ्य विभाग की कथित निष्क्रियता अब खुलकर सामने आने लगी है। ओम परिसर स्थित गंगोत्री हॉस्पिटल पर एक ऐसा गंभीर आरोप लगा है, जो न केवल चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना की विश्वसनीयता पर भी चोट करता है।

मामला दुर्ग निवासी आकाश वर्मन से जुड़ा है, जिन्होंने आरोप लगाया है कि उनकी बहन के इलाज के दौरान अस्पताल प्रबंधन ने नकद राशि भी वसूली और साथ ही आयुष्मान कार्ड को बिना जानकारी के एक्टिवेट कर दिया। यह दोहरा खेल तब उजागर हुआ, जब मरीज को दूसरे अस्पताल में शिफ्ट किया गया।

3 दिन तक “इलाज” या सिर्फ खानापूर्ति?

बताया गया कि 28 तारीख को सड़क दुर्घटना में घायल आकाश वर्मन की बहन और नानी को गंगोत्री हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।

परिजनों का आरोप है कि तीन दिनों तक इलाज के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई गई, जबकि मरीज की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।

स्थिति बिगड़ने पर परिजनों ने मरीज को शंकराचार्य हॉस्पिटल, दुर्ग में शिफ्ट किया, जहां डॉक्टरों ने तुरंत गंभीरता को देखते हुए आईसीयू में भर्ती किया। यह वही मरीज थी, जिसे गंगोत्री में सामान्य वार्ड में रखा गया था।

40-45 हजार कैश… फिर भी आयुष्मान चालू!

परिजनों के अनुसार, गंगोत्री हॉस्पिटल प्रबंधन ने इलाज के नाम पर 40 से 45 हजार रुपये नकद लिए, लेकिन कोई रसीद नहीं दी गई।

चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब शंकराचार्य हॉस्पिटल में आयुष्मान कार्ड इस्तेमाल करने की कोशिश की गई—

? सिस्टम में दिखा कि कार्ड पहले से ही किसी अन्य अस्पताल में एक्टिव है।

यानी,

नकद भी लिया गया और सरकारी योजना का लाभ भी उठाया गया!

“यह सीधे-सीधे आयुष्मान योजना पर डाका”

परिजनों का आरोप है कि गंगोत्री हॉस्पिटल ने जानबूझकर कहा कि आयुष्मान कार्ड से इलाज संभव नहीं, जबकि अंदर ही अंदर कार्ड को एक्टिवेट कर लिया गया।

यदि यह आरोप सही है, तो यह सरकारी योजना में संगठित भ्रष्टाचार का स्पष्ट मामला बनता है।

कमीशनखोरी और झोला-छाप कनेक्शन?

स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कुछ ग्रामीण क्षेत्रों के अप्रमाणित (झोला-छाप) डॉक्टरों द्वारा कमीशन के लालच में मरीजों को इस अस्पताल में रेफर किया जाता है।

यदि यह नेटवर्क सक्रिय है, तो यह मामला और भी गंभीर हो जाता है।

रसीद मांगी तो विवाद का प्रयास?

आकाश वर्मन का आरोप है कि जब उन्होंने नकद भुगतान की रसीद मांगी, तो अस्पताल संचालक गराडे द्वारा न केवल टालमटोल किया गया, बल्कि माहौल को विवादित बनाने की कोशिश भी की गई, ताकि मामले को दबाया जा सके।

हालांकि, परिजनों ने शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराया।

थाने में शिकायत, अब प्रशासन की परीक्षा

इस पूरे मामले की लिखित शिकायत मोहन नगर थाना में की गई है।

अब बड़ा सवाल यह है कि:

? क्या स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन इस मामले में सख्त कार्रवाई करेगा?

? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

पहले भी विवादों में रहा अस्पताल

गंगोत्री हॉस्पिटल पहले भी नियमों के उल्लंघन और संदिग्ध संचालन को लेकर चर्चा में रहा है।

सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े दावे करने वाला यह अस्पताल, जमीनी हकीकत में कई सवालों के घेरे में है।

सबसे बड़ा सवाल

जब एक अस्पताल

नकद वसूली करता है

रसीद नहीं देता

और साथ ही सरकारी योजना का लाभ भी उठाता है

तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि

? “मरीजों की जिंदगी से सीधा खिलवाड़” है।

अब नजरें प्रशासन पर टिकी हैं—क्या गंगोत्री हॉस्पिटल पर गिरेगी कार्रवाई की गाज, या फिर सिस्टम की चुप्पी सब कुछ ढंक देगी?

रायपुर / बस्तर संभाग के नक्सल मुक्त घोषित होने के बाद अब हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा में लौटने वाले युवाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन दिखने लगा है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल बीजापुर की शर्मिला पोयामी बनकर उभरी हैं, जिन्होंने कभी हाथों में बंदूक थामी थी, लेकिन आज वे लाइवलीहुड कॉलेज में सुई-धागे से अपने और अपने परिवार के भविष्य के सपने बुन रही हैं।

*हिंसा के रास्ते से मुख्यधारा का सफर*

          बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लॉक की रहने वाली 19 वर्षीय शर्मिला कभी भैरमगढ़ एरिया कमेटी की सक्रिय सदस्य थीं। गुरिल्ला युद्ध और हथियारों का प्रशिक्षण लेने वाली शर्मिला को जल्द ही अहसास हो गया कि प्रगति का मार्ग बंदूक से नहीं, बल्कि शांति और शिक्षा से निकलता है। इसी संकल्प के साथ उन्होंने 07 फरवरी 2026 को आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का निर्णय लिया।

*कौशल विकास से आत्मनिर्भरता की ओर*

        राज्य शासन की पुनर्वास नीति के तहत शर्मिला को दंतेवाड़ा के लाइवलीहुड कॉलेज में प्रवेश दिलाया गया। बीते 45 दिनों से वे यहाँ सिलाई का गहन प्रशिक्षण ले रही हैं। अब वे आधुनिक परिधान जैसे सूट और ब्लाउज सिलने की बारीकियां सीख रही हैं। प्रशिक्षण के बाद उनका लक्ष्य अपने गाँव लौटकर सिलाई केंद्र खोलना और अपनी 4 एकड़ पुश्तैनी जमीन पर आधुनिक खेती (टमाटर, मूली व भाजियाँ) कर परिवार को आर्थिक संबल प्रदान करना है।

*सुविधाओं ने बदला नजरिया*

         शर्मिला ने बताया कि मुख्यधारा में लौटने के बाद उन्हें पहली बार शासन की ओर से इतनी बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं, पौष्टिक आहाररू कॉलेज में नियमित रूप से अंडा, मछली, चिकन और हरी सब्जियां दी जा रही हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य में बड़ा सुधार हुआ है। सक्रिय सहभागितारू बढ़ते आत्मविश्वास का ही परिणाम है कि उन्होंने हाल ही में जगदलपुर में आयोजित मैराथन दौड़ में भी हिस्सा लिया। पारिवारिक प्रेरणा- शर्मिला की दीदी मुड़ो पोयामी (पूर्व नक्सल सदस्य) भी मुख्यधारा में लौटकर आत्मनिर्भरता की राह पर हैं।

*गाँव के विकास की उम्मीद*

         शिक्षा और कौशल की ताकत को समझने के बाद शर्मिला अब अपने क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं के प्रति भी सजग हैं। वे चाहती हैं कि उनके गाँव की कच्ची सड़कों और पेयजल की समस्याओं का जल्द निराकरण हो ताकि विकास की यह लहर सुदूर अंचलों तक पहुँचे। शर्मिला पोयामी का यह संघर्षपूर्ण सफर हिंसा से विकास की ओर बढ़ते नए छत्तीसगढ़ की एक सशक्त पहचान बन गया है।

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