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राजनीति में कुछ लोग जनसेवा से पहचान बनाते हैं, कुछ संघर्ष से, और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी पहचान कैमरे के एंगल, रीलों और पीआर मैनेजमेंट से बनती है। कहते हैं कि एक विधायक महोदय पर "महादेव" की ऐसी असीम कृपा हुई कि देखते ही देखते अपना भव्य मीडिया हाउस खड़ा हो गया। राजधानी की एक पॉश कॉलोनी में स्थित आलीशान कार्यालय देखकर सहज ही प्रश्न उठता है कि यह पत्रकारिता का केंद्र है या फिर ब्रांड मैनेजमेंट का कॉरपोरेट स्टूडियो?
मिशन वाली पत्रकारिता कब लग्ज़री प्रोजेक्ट में बदल गई, इसका शायद सबसे जीवंत उदाहरण यही है। यहां खबरें कम और इमेज बिल्डिंग ज्यादा दिखाई देती है।
विधायक महोदय की सबसे बड़ी ताकत बताई जाती है—पीआर और इवेंट मैनेजमेंट। कहते हैं कि उन्होंने निजी दुख को भी सार्वजनिक आयोजन में बदलने की कला विकसित कर ली है। परिवार में शोक का अवसर आया तो श्मशान घाट तक में वीआईपी व्यवस्थाओं की चर्चा रही। संवेदना प्रकट करने वालों के फोन भी मानो इतिहास का हिस्सा बन गए—रिकॉर्ड हुए, संपादित हुए और सोशल मीडिया पर प्रसारित भी हुए।
ऐसा लगा कि संवेदना भी अब कंटेंट कैलेंडर का हिस्सा बन चुकी है। बस एक औपचारिकता बाकी रह गई थी—"इस शोक आयोजन को सफल बनाने के लिए आप सभी का हार्दिक धन्यवाद" वाला पोस्टर।
रीलों की दुनिया में शायद यही नया राजनीतिक दर्शन है—जो कैमरे में कैद नहीं हुआ, वह हुआ ही नहीं।
दिलचस्प बात यह भी है कि विधायक महोदय अक्सर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और जनप्रतिनिधियों पर अपरोक्ष टिप्पणियां करने से नहीं चूकते। शायद उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि पिछले लगभग 25 वर्षों में प्रदेश में करीब 20 वर्ष उनकी ही सरकार रही है और लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी लंबे समय से उनकी अपनी ही पार्टी के सांसद करते रहे हैं। ऐसे में अपनी ही राजनीतिक परंपरा, नेतृत्व और संगठन के योगदान को नज़रअंदाज़ कर तंज कसना राजनीतिक परिपक्वता कम और तात्कालिक लोकप्रियता की कोशिश अधिक प्रतीत होता है।
जनता नेताओं से संवाद चाहती है, स्व-प्रचार नहीं; जवाबदेही चाहती है, पटकथा नहीं; और सेवा चाहती है, स्टूडियो नहीं।
लोकतंत्र में कैमरे की चमक कुछ समय के लिए तालियां दिला सकती है, लेकिन इतिहास में जगह केवल वही बनाता है जो काम की रोशनी से पहचाना जाए। रीलें कुछ सेकंड चलती हैं, जबकि जनसेवा की असली पटकथा जनता वर्षों तक याद रखती है।
आम जनता उठा रही दोहरे मानदंड का मुद्दा; स्थानीय सरकारी बंगलों के आवंटन और उपयोग पर नियम स्पष्ट करने की मांग
शौर्यपथ लेख । नकटी गांव में विधायक निवास के लिए भूमि खाली कराए जाने को लेकर जारी विवाद के बीच अब एक नया सवाल राजनीतिक और जनचर्चा का विषय बन गया है। आम नागरिक यह जानना चाहते हैं कि यदि गांव की जमीन पर सरकारी आवास निर्माण के लिए कार्रवाई की जा रही है, तो ऐसे विधायक और मंत्री जो पहले से राजधानी रायपुर में शासन द्वारा आवंटित सरकारी बंगले में रह रहे हैं, वे अपने स्थानीय विधानसभा क्षेत्र में सरकारी आवास या बंगलों का उपयोग किस नियम के तहत कर रहे हैं।
इस पूरे मामले में स्थानीय विधायक अनुज शर्मा का कहना है कि प्रभावित 75 परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास आवंटित कर दिए गए हैं और किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। हालांकि, इस बयान के बावजूद स्थानीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि जनप्रतिनिधियों के लिए सरकारी आवासों के आवंटन संबंधी नियमों का पालन समान रूप से हो रहा है या नहीं।
चर्चा का केंद्र यह है कि यदि छत्तीसगढ़ शासन के नियमों के अनुसार विधायक एवं मंत्रियों को राजधानी में सरकारी आवास उपलब्ध कराया जाता है, तो क्या उन्हें अपने ही विधानसभा क्षेत्र में भी सरकारी बंगले के उपयोग की अनुमति है? यदि है, तो उसका कानूनी आधार क्या है, और यदि नहीं, तो ऐसे मामलों में अब तक क्या कार्रवाई की गई है?
जनता का कहना है कि कानून और नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। यदि आम नागरिकों के अतिक्रमण या शासकीय भूमि से जुड़े मामलों में बुलडोजर और सख्त कार्रवाई की जाती है, तो जनप्रतिनिधियों द्वारा स्थानीय स्तर पर सरकारी बंगलों के उपयोग की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विषय पर सरकार को स्पष्ट स्थिति सामने रखनी चाहिए। यदि स्थानीय सरकारी आवासों का आवंटन किसी विशेष नियम, प्रशासनिक आदेश या सुरक्षा कारणों से किया गया है, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।
अब सबकी नजर राज्य सरकार पर है। देखना होगा कि सरकार स्थानीय विधानसभा क्षेत्रों में जनप्रतिनिधियों द्वारा उपयोग किए जा रहे सरकारी आवासों की स्थिति स्पष्ट करती है या नहीं। यदि किसी प्रकार का नियम उल्लंघन पाया जाता है, तो क्या समान मानदंड अपनाते हुए कार्रवाई होगी, या फिर यह विवाद केवल राजनीतिक बहस तक ही सीमित रह जाएगा।
नोट: इस समाचार में व्यक्त प्रश्न और दावे सार्वजनिक चर्चा एवं जनभावनाओं पर आधारित हैं। यह आवश्यक है कि संबंधित नियमों, आवंटन आदेशों और शासन के आधिकारिक अभिलेखों की जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए।
लेख : राजनीतिक विश्लेषण
दुर्ग। दुर्ग नगर निगम की राजनीति इन दिनों विकास से अधिक गुटबाजी और शक्ति प्रदर्शन की चर्चाओं के केंद्र में दिखाई दे रही है। बरसात की शुरुआत के साथ जहां शहर के अनेक वार्ड जलभराव, सफाई व्यवस्था, गड्ढों, बदबू और मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निगम के बड़ी संख्या में पार्षदों का केरल भ्रमण राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे रहा है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पहले कुछ पार्षदों के साथ पुरी यात्रा की तैयारी चल रही थी, लेकिन अचानक केरल यात्रा का कार्यक्रम सामने आया और अधिकांश पार्षद उसी ओर रवाना हो गए। इसे लेकर तरह-तरह की राजनीतिक व्याख्याएं की जा रही हैं। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि आखिर यह केवल पर्यटन है या इसके पीछे भविष्य की राजनीतिक रणनीति भी आकार ले रही है?
यात्रा बनी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम?
इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें केवल एक दल के नहीं, बल्कि कांग्रेस, भाजपा और निर्दलीय पार्षद भी एक साथ दिखाई दिए। इससे यह संदेश गया कि स्थानीय राजनीति में वैचारिक सीमाओं से अधिक व्यक्तिगत समीकरण और गुटीय संतुलन प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी बड़े समूह का एक मंच पर आना भविष्य की राजनीतिक दिशा का संकेत माना जाता है। ऐसे में यह यात्रा केवल पर्यटन न होकर शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखी जा रही है।
खर्च को लेकर भी उठ रहे सवाल
यात्रा के खर्च को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं हैं। कुछ पार्षदों का दावा है कि प्रति व्यक्ति 10 से 15 हजार रुपये का योगदान लिया गया, जबकि सामान्य यात्रा व्यय का अनुमान इससे कहीं अधिक बताया जा रहा है। ऐसे में शहर में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि वास्तविक खर्च अधिक है तो शेष राशि की व्यवस्था किसने की?
हालांकि इन चर्चाओं की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर लगातार अटकलों का दौर जारी है।
वार्डों की चिंता या राजनीतिक गणित?
बरसात के मौसम में शहर के अनेक हिस्सों में जल निकासी, कचरा प्रबंधन और सड़क मरम्मत जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। ऐसे समय में बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों का एक साथ लंबी यात्रा पर जाना नागरिकों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है।
आलोचकों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों की पहली प्राथमिकता अपने वार्ड की समस्याओं का समाधान होना चाहिए, जबकि समर्थकों का तर्क है कि जनप्रतिनिधियों को भी समय-समय पर सामूहिक संवाद और विश्राम का अवसर मिलना चाहिए। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच जनता अपने सवालों के उत्तर तलाश रही है।
गुटबाजी का नया अध्याय?
दुर्ग निगम की राजनीति पिछले कुछ समय से लगातार गुटीय समीकरणों के कारण सुर्खियों में रही है। सामान्य सभा से लेकर विकास कार्यों तक कई बार मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं। अब केरल यात्रा ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में यदि निगम की राजनीति में कोई बड़ा घटनाक्रम होता है, तो इस यात्रा को उसके शुरुआती संकेतों में गिना जा सकता है। हालांकि यह केवल राजनीतिक विश्लेषण है और भविष्य की दिशा आने वाला समय ही तय करेगा।
जनता पूछ रही है...
जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता शहर का विकास है या राजनीतिक गुटों का विस्तार? आखिर वार्डों की समस्याओं के बीच पर्यटन को प्राथमिकता क्यों मिली? और यदि यह केवल निजी यात्रा थी, तो इतनी बड़ी संख्या में पार्षदों का एक साथ जाना संयोग है या किसी बड़े राजनीतिक समीकरण का हिस्सा?
अंतिम बात
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को यात्रा करने, संवाद करने और राजनीतिक रणनीति बनाने का पूरा अधिकार है। लेकिन उसी लोकतंत्र में जनता को यह अपेक्षा भी रहती है कि उसके प्रतिनिधि सबसे पहले उसके वार्ड, उसकी सड़क, उसकी नाली और उसकी मूलभूत समस्याओं को प्राथमिकता दें।
केरल यात्रा समाप्त हो जाएगी, तस्वीरें भी सोशल मीडिया से धीरे-धीरे गायब हो जाएंगी, लेकिन शहर की टूटी सड़कें, जलभराव, कचरे के ढेर और जनता के सवाल वहीं रहेंगे। अब निगाहें इस बात पर हैं कि यात्रा से लौटने के बाद जनप्रतिनिधि विकास की नई पटकथा लिखेंगे या फिर दुर्ग की राजनीति में किसी नए "ऑपरेशन" की शुरुआत होगी।
योग फॉर हेल्दी एजिंग: स्वस्थ और सक्रिय जीवन की दिशा में एक कदम
साभार - • डॉ. दानेश्वरी सम्भाकर
उप संचालक, जनसंपर्क
रायपुर, / भारत में प्राचीन काल से ही योग हमारी जीवनशैली और संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। ऋषि-मुनियों, योगियों और संतों ने योग के माध्यम से स्वस्थ शरीर, शांत मन और आध्यात्मिक चेतना का मार्ग दिखाया। भारतीय ज्ञान परंपरा की यह अमूल्य धरोहर आज विश्वभर में स्वास्थ्य और कल्याण का पर्याय बन चुकी है। इसी विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की पहल पर वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की, जो आज विश्वव्यापी जनआंदोलन का स्वरूप ले चुका है।
वर्ष 2026 के अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम “योग फॉर हेल्दी एजिंग” (स्वस्थ एवं सक्रिय वृद्धावस्था के लिए योग) रखी गई है। यह थीम योग के माध्यम से जीवन के प्रत्येक चरण में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का संदेश देती है। योग न केवल रोगों से बचाव का प्रभावी माध्यम है, बल्कि स्वस्थ और सक्रिय जीवनशैली की आधारशिला भी है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने योग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में योग आज विश्व के करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका है। प्रधानमंत्री का मानना है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाली जीवन पद्धति है। योग व्यक्ति को स्वस्थ बनाकर परिवार समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने का माध्यम बनता है इस वर्ष राष्ट्रीय स्तर का मुख्य आयोजन कोलकाता में आयोजित किया जा रहा है जहां प्रधानमंत्री स्वयं योगाभ्यास का नेतृत्व करेंगे।
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का राज्य स्तरीय मुख्य समारोह अंबिकापुर में आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय स्वयं योगाभ्यास में सहभागिता करेंगे और प्रदेशवासियों को नियमित योग अपनाकर स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का संदेश देंगे। राज्य सरकार द्वारा योग को जन-जन तक पहुंचाने के लिए विभिन्न विभागों, शैक्षणिक संस्थानों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों के सहयोग से व्यापक स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री श्री साय का मानना है कि स्वस्थ नागरिक ही विकसित छत्तीसगढ़ और विकसित भारत के निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति हैं। योग शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास को भी बढ़ाता है। यही कारण है कि राज्य सरकार स्वास्थ्य संवर्धन और जनजागरूकता अभियानों में योग को विशेष महत्व दे रही है।
प्राकृतिक संसाधनों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ में योग का संदेश लोगों के जीवन से सहज रूप से जुड़ता है। प्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली योग के मूल सिद्धांतों को प्रतिबिंबित करती है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों और शासकीय संस्थानों में नियमित योग गतिविधियों के माध्यम से स्वस्थ समाज निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं।
वर्तमान समय में बढ़ते तनाव, अनियमित जीवनशैली और विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के बीच योग एक सरल, सुलभ और प्रभावी समाधान के रूप में उभरा है। नियमित योगाभ्यास शरीर को निरोग, मन को शांत और जीवन को संतुलित बनाता है। यह व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करता है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि योग को केवल एक दिवस का आयोजन न मानकर दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं। स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए योग को अपनाना समय की आवश्यकता है। आइए, योग के माध्यम से स्वस्थ छत्तीसगढ़, विकसित भारत और समृद्ध विश्व के निर्माण में अपना योगदान दें।
दुर्ग। राजनीति में भीड़ केवल संख्या नहीं होती, बल्कि वह जनस्वीकृति, संगठनात्मक शक्ति और भविष्य की संभावनाओं का संकेत भी मानी जाती है। प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के 49वें जन्मदिवस पर दुर्ग के सेवा सदन में उमड़ा जनसैलाब अब केवल जन्मदिन समारोह तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने शहर की राजनीति में कई नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
15 जून को आयोजित जन्मदिन समारोह में हजारों लोगों की उपस्थिति, घंटों तक बधाई देने के लिए लगी कतारें और पूरे शहर में दिखाई दिए बैनर-पोस्टर अब राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन चुके हैं। स्वयं मंत्री गजेंद्र यादव ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि शायद ही किसी नेता के जन्मदिन पर इतनी बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए होंगे। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस आयोजन की चर्चा लगातार जारी है।
भाजपा में वर्चस्व की नई तस्वीर?
दुर्ग भाजपा की राजनीति में लंबे समय तक डॉ. सरोज पांडे को सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेताओं में गिना जाता रहा है। उनके समर्थकों की मजबूत टीम और संगठन पर पकड़ हमेशा चर्चा का विषय रही है। लेकिन इस बार मंत्री गजेंद्र यादव के जन्मदिन पर जो दृश्य देखने को मिला, उसने भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
विशेष रूप से यह चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि डॉ. सरोज पांडे के परंपरागत समर्थक माने जाने वाले कई कार्यकर्ताओं और नेताओं ने भी मंत्री गजेंद्र यादव के जन्मदिन पर बड़े पैमाने पर बधाई संदेश, पोस्टर और बैनर लगाए। पूरा शहर मानो गजेंद्र यादव के जन्मोत्सव के रंग में रंगा दिखाई दिया।
अब राजनीतिक पर्यवेक्षकों की निगाहें 22 जून पर टिक गई हैं, जब डॉ. सरोज पांडे का जन्मदिवस मनाया जाएगा। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि दोनों आयोजनों की तुलना स्वाभाविक रूप से होगी और इससे भाजपा के भीतर लोकप्रियता तथा जनाधार को लेकर नए निष्कर्ष निकाले जाएंगे।
कांग्रेस में भी बढ़ी बेचैनी
मंत्री गजेंद्र यादव की बढ़ती लोकप्रियता का असर केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। कांग्रेस के भीतर भी इसे गंभीरता से देखा जा रहा है। दुर्ग की राजनीति में चार दशकों तक प्रभावशाली रहे वोरा परिवार के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
पूर्व विधायक अरुण वोरा लंबे समय तक कांग्रेस का प्रमुख चेहरा रहे हैं। हालांकि वर्तमान राजनीतिक माहौल में उनकी स्वीकार्यता और प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। भाजपा समर्थकों का दावा है कि प्रदेश और केंद्र में कांग्रेस की सरकारें रहने के बावजूद दुर्ग शहर को वह विकास नहीं मिला, जिसकी जनता अपेक्षा करती थी। दूसरी ओर वर्तमान सरकार के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों को भाजपा अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
इसी बीच कांग्रेस के युवा और सक्रिय चेहरों में धीरज बाकलीवाल का नाम तेजी से उभर रहा है। लगातार जनसंपर्क, सामाजिक गतिविधियों और आम जनता के बीच सक्रिय उपस्थिति के कारण उन्हें कांग्रेस का संभावित मजबूत चेहरा माना जा रहा है। राजनीतिक चर्चाओं में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि भविष्य में भाजपा पुनः गजेंद्र यादव को उम्मीदवार बनाती है, तो कांग्रेस की ओर से मुकाबले के लिए कौन सबसे सक्षम प्रत्याशी होगा।
क्या भीड़ भविष्य की राजनीति तय करती है?
राजनीतिक इतिहास बताता है कि किसी आयोजन में उमड़ी भीड़ हमेशा चुनावी जीत की गारंटी नहीं होती, लेकिन यह जनभावना और संगठनात्मक क्षमता का महत्वपूर्ण संकेत अवश्य देती है। गजेंद्र यादव के जन्मोत्सव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान समय में उनका जनसंपर्क और राजनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।
साथ ही यह भी सत्य है कि विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं और राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं। आने वाले समय में भाजपा और कांग्रेस दोनों की रणनीतियां, उम्मीदवार चयन और जनसंपर्क अभियान राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करेंगे।
निष्कर्ष
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मंत्री गजेंद्र यादव का जन्मदिन समारोह केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि उसने दुर्ग की राजनीति में वर्चस्व, लोकप्रियता और भविष्य के नेतृत्व को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। भाजपा में कौन सबसे बड़ा जननेता है और कांग्रेस का अगला मजबूत चेहरा कौन होगा—इन दोनों सवालों के उत्तर भविष्य देगा।
लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यदि कोई नेता सबसे अधिक चर्चा के केंद्र में है, तो वह निस्संदेह प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव हैं, जिनके जन्मोत्सव ने दुर्ग की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है।
प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं एवं उनके उज्ज्वल राजनीतिक भविष्य की मंगलकामनाएं।
दिल्ली के उमराव सिंह ज्वैलर्स में 2023 की सनसनीखेज चोरी का खुलासा, दुर्ग और दिल्ली पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में 18.5 किलो सोना-हीरा बरामद, आरोपी लोकेश श्रीवास गिरफ्तार।
दुर्ग/नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में वर्ष 2023 की सबसे चर्चित और दुस्साहसिक ज्वेलरी चोरी की वारदातों में शामिल ‘उमराव सिंह ज्वैलर्स मेगा हेइस्ट’ का खुलासा करते हुए दुर्ग और दिल्ली पुलिस ने महज चार दिनों के भीतर मास्टरमाइंड लोकेश श्रीवास को भिलाई के स्मृति नगर से गिरफ्तार कर लिया था। करीब 20 से 25 करोड़ रुपये मूल्य के सोने, हीरे के आभूषण और नकदी की चोरी करने वाले इस शातिर अपराधी को पकड़कर पुलिस ने लगभग शत-प्रतिशत माल बरामद कर लिया था।
यह मामला न केवल चोरी की बड़ी वारदात के कारण बल्कि आरोपी की पेशेवर कार्यशैली, डिजिटल ट्रैकिंग और पुलिस के तेज़ एवं समन्वित ऑपरेशन के कारण पूरे देश में चर्चा का विषय बना था।
पुलिस जांच के अनुसार, 24 सितंबर 2023 (रविवार) की रात लगभग 10:45 बजे लोकेश श्रीवास दिल्ली के भोगल इलाके में स्थित प्रतिष्ठित उमराव सिंह ज्वैलर्स के समीप पहुंचा। उसने पहले से की गई रेकी के आधार पर शोरूम के बगल की इमारत की छत से प्रवेश का रास्ता चुना।
हाथ में हथौड़ी, छीनी और कटर मशीन लेकर वह छत से नीचे उतरा और शोरूम की मजबूत कंक्रीट दीवार में बड़ा सुराख कर अंदर प्रवेश कर गया। अंदर पहुंचते ही उसने सीसीटीवी कैमरों और सुरक्षा अलार्म सिस्टम को निष्क्रिय कर दिया ताकि उसकी गतिविधियां रिकॉर्ड न हो सकें।
25 सितंबर 2023 (सोमवार) को पूरा बाजार बंद था। इसी का फायदा उठाकर लोकेश करीब 15 से 18 घंटे तक शोरूम के भीतर ही मौजूद रहा।
उसने स्ट्रॉन्ग रूम की दीवार काटकर अंदर प्रवेश किया और बेहद सुनियोजित तरीके से सोने के आभूषण, हीरे-जवाहरात तथा नकदी समेटता रहा। पुलिस के अनुसार आरोपी ने अकेले ही इस पूरी वारदात को अंजाम दिया।
शोरूम के भीतर कई घंटे बिताने के बाद वह करोड़ों रुपये का माल लेकर फरार हो गया और बस के माध्यम से छत्तीसगढ़ की ओर निकल पड़ा।
26 सितंबर 2023 (मंगलवार) को सुबह लगभग 10:30 बजे जब शोरूम के संचालक दुकान खोलने पहुंचे तो स्ट्रॉन्ग रूम में सेंधमारी और करोड़ों के माल की चोरी का पता चला।
घटना की सूचना मिलते ही दिल्ली पुलिस की कई टीमें सक्रिय हो गईं। शोरूम के कैमरे बंद होने के कारण शुरुआती जांच चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन पुलिस ने तकनीकी जांच का सहारा लिया।
हालांकि आरोपी ने शोरूम के सभी कैमरे बंद कर दिए थे, लेकिन भागते समय वह कश्मीरी गेट आईएसबीटी के एक बाहरी सीसीटीवी कैमरे में दिखाई दे गया।
दिल्ली पुलिस ने फुटेज से प्राप्त तस्वीरों का तकनीकी विश्लेषण किया। जांच के दौरान आरोपी की तस्वीर पुराने आपराधिक रिकॉर्ड और छत्तीसगढ़ पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ी तस्वीरों से मेल खा गई।
इसके बाद मोबाइल सर्विलांस, कॉल डिटेल्स और डिजिटल लोकेशन ट्रैकिंग के जरिए पुलिस को यह महत्वपूर्ण सुराग मिला कि आरोपी दिल्ली छोड़कर छत्तीसगढ़ पहुंच चुका है।
जांच के दौरान मिले इनपुट के आधार पर दिल्ली पुलिस की टीम छत्तीसगढ़ पहुंची। दुर्ग पुलिस को जानकारी मिली कि आरोपी ने भिलाई के स्मृति नगर क्षेत्र में पुलिस चौकी के पास ही किराए का कमरा लिया हुआ है।
29 सितंबर 2023 की सुबह दुर्ग जिला पुलिस और दिल्ली पुलिस की संयुक्त टीम ने उसके ठिकाने पर दबिश दी।
पुलिस को देखते ही लोकेश श्रीवास ने खिड़की से कूदकर भागने का प्रयास किया, लेकिन पहले से घेराबंदी कर चुकी पुलिस टीम ने उसे मौके पर ही दबोच लिया।
गिरफ्तारी के बाद की गई तलाशी में पुलिस ने आरोपी के कब्जे से लगभग 18.5 किलोग्राम सोना, बड़ी मात्रा में हीरे के आभूषण और करीब 12.5 लाख रुपये नकद बरामद किए।
चोरी का अधिकांश माल सूटकेस और बोरों में भरकर छिपाया गया था। बरामदगी की मात्रा इतनी अधिक थी कि इसे देश की हालिया सबसे बड़ी और सफल रिकवरी में शामिल माना गया।
इस हाई-प्रोफाइल मामले में दुर्ग पुलिस की सक्रियता और स्थानीय स्तर पर जुटाई गई खुफिया जानकारी निर्णायक साबित हुई। दिल्ली पुलिस के साथ समन्वय स्थापित कर आरोपी को पकड़ने और करोड़ों का माल बरामद करने में दुर्ग पुलिस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
महज 96 घंटे के भीतर देशभर में चर्चा का विषय बनी इस चोरी का खुलासा कर पुलिस ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की थी।
? 24 सितंबर 2023, रात 10:45 बजे – लोकेश श्रीवास शोरूम में दाखिल हुआ।
? 25 सितंबर 2023 – बंद बाजार का फायदा उठाकर स्ट्रॉन्ग रूम से करोड़ों की ज्वेलरी चोरी की।
? 26 सितंबर 2023, सुबह 10:30 बजे – शोरूम खुलने पर चोरी का खुलासा।
? 29 सितंबर 2023, तड़के – भिलाई के स्मृति नगर से आरोपी गिरफ्तार।
? 18.5 किलो सोना, हीरे और ₹12.5 लाख नकद बरामद।
? कुल चोरी का मूल्य: लगभग ₹20 से ₹25 करोड़।
शौर्यपथ विशेष विश्लेषण
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। उसकी भूमिका सरकार का प्रचारक बनने की नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का सेतु बनने की होती है। लेकिन जब किसी पत्रकार, एंकर या मीडिया संस्थान पर निष्पक्षता खोने के आरोप लगने लगते हैं, तब उसका असर केवल उसकी व्यक्तिगत साख तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सरकार, लोकतंत्र और पूरे मीडिया जगत पर पड़ता है।
पिछले कुछ वर्षों में देश में एक नई बहस उभरी है। बहस यह कि क्या कुछ टीवी एंकरों की शैली और प्रस्तुति ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाया है? सोशल मीडिया पर बार-बार यह आरोप लगाया जाता रहा है कि कुछ प्रमुख चेहरे सत्ता से कठिन सवाल पूछने के बजाय विपक्ष को घेरने में अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं।
हालिया शिक्षा संबंधी विवाद ने इस बहस को और तेज कर दिया। लाखों छात्रों और डिजिटल शिक्षा मंचों से जुड़े लोगों ने इसे केवल एक टिप्पणी का मामला नहीं माना, बल्कि इसे उस मानसिकता का प्रतीक बताया जिसमें जमीनी मुद्दों से अधिक महत्व टीवी बहसों को दिया जाता है।
सरकार को भी हो सकता है नुकसान
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी सरकार के लिए सबसे उपयोगी मीडिया वह होता है जो उसकी उपलब्धियों को दिखाने के साथ-साथ कमियों की ओर भी ईमानदारी से ध्यान दिलाए। जब जनता को यह महसूस होने लगता है कि मीडिया का एक वर्ग केवल बचाव की भूमिका निभा रहा है, तब उसका असंतोष केवल मीडिया तक सीमित नहीं रहता बल्कि सरकार तक भी पहुँचता है।
यही कारण है कि कई बार सरकार के समर्थक माने जाने वाले कुछ मीडिया चेहरों की कार्यशैली अंततः सरकार की छवि के लिए भी चुनौती बन सकती है। जनता सवाल पूछने वाले पत्रकार को सम्मान देती है, लेकिन पक्षकार बनते दिखने वाले पत्रकार पर संदेह करने लगती है।
डिजिटल युग में बदल गया समीकरण
आज सूचना का स्रोत केवल टीवी चैनल नहीं हैं। यूट्यूब, सोशल मीडिया और स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म लाखों लोगों तक सीधे पहुँच रहे हैं। ऐसे माहौल में यदि मुख्यधारा मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं तो उसका लाभ वैकल्पिक मंचों को मिलता है।
यही वजह है कि अब पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी टीआरपी नहीं बल्कि भरोसा बन चुकी है।
लोकतंत्र के लिए चेतावनी
पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि सत्ता से जवाबदेही सुनिश्चित करना है। उसी प्रकार पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता का बचाव करना भी नहीं है। जब मीडिया किसी एक छवि में बंध जाता है तो उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है और लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता है।
निष्कर्ष
देश में प्रेस की स्वतंत्रता, मीडिया की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करने के लिए आवश्यक है कि पत्रकारिता तथ्यों, संतुलन और जवाबदेही के सिद्धांतों पर कायम रहे। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत आलोचना से बचना नहीं, बल्कि आलोचना सुनकर स्वयं को बेहतर बनाना होती है। और किसी भी पत्रकार की सबसे बड़ी पहचान सत्ता के निकट होना नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के योग्य बने रहना है।
शौर्यपथ विशेष रिपोर्ट
ब्रिटेन को दुनिया की सबसे मजबूत बैंकिंग और सुरक्षा व्यवस्थाओं वाले देशों में गिना जाता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज कुछ ऐसी डकैतियां भी हैं जिन्होंने इस दावे को चुनौती दी। करोड़ों पाउंड की नकदी, सोना और वित्तीय दस्तावेज लूटने वाली इन घटनाओं ने न केवल ब्रिटेन की सुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया, बल्कि अपराध की दुनिया में भी नए अध्याय लिख दिए।
इनमें से कुछ डकैतियां इतनी बड़ी थीं कि आज भी उन्हें अपराध जगत की सबसे साहसिक और चर्चित घटनाओं में गिना जाता है।
सिटी बॉन्ड्स डकैती (1990): इतिहास की सबसे बड़ी वित्तीय लूट
2 मई 1990 को लंदन की एक व्यस्त सड़क पर हुई घटना ने पूरे वित्तीय जगत को स्तब्ध कर दिया। कूरियर एजेंट जॉन गोडार्ड से एक लुटेरे ने चाकू की नोक पर उसका ब्रीफकेस छीन लिया।
यह कोई साधारण ब्रीफकेस नहीं था। इसमें बैंक ऑफ इंग्लैंड के 301 बियरर बॉन्ड्स और ट्रेजरी बिल रखे थे, जिनकी कुल कीमत 291.9 मिलियन पाउंड आंकी गई। वर्तमान मूल्य के अनुसार यह राशि लगभग 720 मिलियन पाउंड के बराबर मानी जाती है।
यह डकैती आज भी ब्रिटेन के इतिहास की सबसे बड़ी डकैती और दुनिया की सबसे बड़ी एकल सड़क लूट की घटनाओं में शामिल है।
सिक्यूरिटास डिपो डकैती (2006): नकदी की सबसे बड़ी चोरी
फरवरी 2006 में दक्षिण-पूर्वी इंग्लैंड के टोनब्रिज स्थित सिक्यूरिटास डिपो पर अपराधियों ने बेहद सुनियोजित हमला किया।
लुटेरों ने पहले डिपो के प्रबंधक और उसके परिवार को बंधक बनाया। इसके बाद वे सुरक्षा केंद्र के भीतर प्रवेश करने में सफल रहे और नोटों से भरी बोरियां लेकर फरार हो गए।
इस डकैती में करीब 53 मिलियन पाउंड नकद लूटे गए, जो ब्रिटेन के इतिहास की सबसे बड़ी नकदी डकैती मानी जाती है।
हालांकि बाद में पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया, लेकिन पूरी राशि कभी बरामद नहीं हो सकी।
ब्रिंक्स-मैट डकैती (1983): जब लुटेरों के हाथ लगा 3 टन सोना
26 नवंबर 1983 को हीथ्रो हवाई अड्डे के निकट स्थित ब्रिंक्स-मैट गोदाम पर कुछ अपराधियों ने एक सुरक्षा गार्ड की मिलीभगत से धावा बोला।
लुटेरों को उम्मीद थी कि उन्हें केवल नकदी मिलेगी, लेकिन उनके सामने सोने का खजाना खुल गया।
डकैत लगभग 3 टन वजन की 6,800 सोने की छड़ों और हीरों के साथ फरार हो गए। उस समय इसकी कीमत लगभग 26 मिलियन पाउंड आंकी गई थी।
यह घटना ब्रिटेन के इतिहास की सबसे बड़ी स्वर्ण डकैती के रूप में दर्ज है और आज भी अपराध विज्ञान के छात्रों के लिए अध्ययन का विषय बनी हुई है।
द ग्रेट ट्रेन रॉबरी (1963): 15 मिनट में इतिहास रचने वाली डकैती
8 अगस्त 1963 की रात ब्रिटेन के अपराध इतिहास की सबसे चर्चित रातों में से एक बन गई।
15 अपराधियों के एक गिरोह ने ग्लासगो से लंदन जा रही रॉयल मेल ट्रेन के सिग्नल सिस्टम के साथ छेड़छाड़ कर ट्रेन को रोक दिया।
मास्टरमाइंड ब्रूस रेनॉल्ड्स के नेतृत्व में गिरोह ने महज 15 मिनट के भीतर इंजन और हाई-वैल्यू कोच को अलग किया और नोटों से भरे 120 बैग लेकर फरार हो गया।
डकैतों ने लगभग 2.6 मिलियन पाउंड लूटे, जिसकी वर्तमान कीमत 53 मिलियन पाउंड से अधिक आंकी जाती है।
यह डकैती केवल चोरी की रकम के कारण नहीं, बल्कि उसकी योजना, निष्पादन और बाद की पुलिस जांच के कारण भी विश्वभर में प्रसिद्ध हुई।
अपराध से सुरक्षा सुधार तक
इन सभी घटनाओं में एक समानता थी—अत्यंत सुनियोजित योजना, सुरक्षा तंत्र की कमजोरियों का फायदा और अंदरूनी सूचनाओं का उपयोग।
इन डकैतियों के बाद ब्रिटेन में बैंकिंग सुरक्षा, नकदी परिवहन, स्वर्ण भंडारण और उच्च मूल्य के वित्तीय दस्तावेजों की सुरक्षा संबंधी नियमों में व्यापक बदलाव किए गए।
अत्याधुनिक निगरानी प्रणाली, कड़े सत्यापन मानक, बेहतर सुरक्षा प्रशिक्षण और आधुनिक ट्रैकिंग तकनीकों को लागू किया गया ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
इतिहास का सबक
ब्रिटेन की ये चार डकैतियां केवल अपराध की घटनाएं नहीं थीं, बल्कि उन्होंने यह साबित किया कि दुनिया की सबसे मजबूत सुरक्षा व्यवस्था भी तब कमजोर पड़ सकती है जब अपराधी योजना, धैर्य और अंदरूनी जानकारी के साथ हमला करें।
इन घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों को एक महत्वपूर्ण सबक दिया—सुरक्षा केवल ताले, हथियार और कैमरों से नहीं, बल्कि सतत निगरानी, जवाबदेही और तकनीकी सतर्कता से सुनिश्चित होती है।
आज भी सिटी बॉन्ड्स डकैती, सिक्यूरिटास डिपो लूट, ब्रिंक्स-मैट स्वर्ण चोरी और ग्रेट ट्रेन रॉबरी अपराध इतिहास के ऐसे अध्याय हैं, जिन्हें दुनिया कभी भूल नहीं पाएगी।
विशेष लेख | शौर्यपथ
13 दिसंबर 2009 की सुबह पाकिस्तान के आर्थिक केंद्र कराची में हुई एक ऐसी घटना ने पूरे बैंकिंग तंत्र को झकझोर दिया, जिसे आज भी देश के इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे संगठित बैंक डकैतियों में गिना जाता है। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी वास्तविक घटना थी जिसमें बैंक की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाला व्यक्ति ही करोड़ों की लूट का मास्टरमाइंड निकला।
कराची स्थित Allied Bank Limited की मुख्य शाखा में हुई इस डकैती ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि किसी भी संस्थान के लिए सबसे बड़ा खतरा कई बार बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से होता है।
31 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा पर हाथ साफ
रविवार की सुबह बैंक बंद था। इसी अवसर का फायदा उठाते हुए सुरक्षा एजेंसी SPS में तैनात गार्ड शाहिद महमूद के नाम से कार्यरत व्यक्ति अपने 4-5 साथियों के साथ बैंक परिसर में पहुंचा। बैंक में पहले से मौजूद सुरक्षाकर्मियों और चौकीदारों को हथियारों के बल पर बंधक बना लिया गया।
इसके बाद लुटेरों ने गैस कटर की मदद से बैंक के स्ट्रॉन्ग रूम में स्थित उस लॉकर को निशाना बनाया, जिसमें विदेशी मुद्रा रखी गई थी। लगभग तीन घंटे तक चले इस ऑपरेशन में गिरोह करीब 31 करोड़ पाकिस्तानी रुपये मूल्य की विदेशी मुद्रा और नकदी लेकर फरार हो गया।
लूटी गई रकम में ब्रिटिश पाउंड, यूरो, अमेरिकी डॉलर और पाकिस्तानी मुद्रा शामिल थी। बिना गोली चले और बिना किसी बड़े संघर्ष के इतनी बड़ी रकम का गायब हो जाना पाकिस्तान के बैंकिंग इतिहास की सबसे सनसनीखेज घटनाओं में दर्ज हो गया।
जांच में खुला सबसे बड़ा राज
पुलिस जांच में सामने आया कि कथित सुरक्षा गार्ड का असली नाम हामिद अली था। उसने नौकरी पाने के लिए एक गुमशुदा व्यक्ति के राष्ट्रीय पहचान पत्र (CNIC) का इस्तेमाल कर अपनी पहचान छिपाई थी।
यही नहीं, उसे बैंक की सुरक्षा व्यवस्था, स्ट्रॉन्ग रूम की संरचना और विदेशी मुद्रा रखने वाले लॉकर की पूरी जानकारी थी। यही जानकारी इस डकैती की सफलता का सबसे बड़ा कारण बनी।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि बैंक में मौजूद एक अन्य गार्ड इमरान ने भी मौके का फायदा उठाकर लूट की रकम का एक हिस्सा अपने पास छिपा लिया था और पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की थी। बाद में उसे भी सह-आरोपी बनाया गया।
सिर्फ 6 दिन में पुलिस की बड़ी सफलता
कराची पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन यूनिट (SIU) ने तेजी से कार्रवाई करते हुए डकैती के महज छह दिन बाद मुख्य आरोपी हामिद अली और उसके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया।
छापेमारी के दौरान पुलिस ने लूटी गई रकम का लगभग 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा बरामद कर लिया। हालांकि पूरी राशि कभी बरामद नहीं हो सकी और शेष रकम की तलाश में पुलिस ने विभिन्न प्रांतों में अभियान चलाया।
अदालत ने दिखाई सख्ती
मामले की सुनवाई आतंकवाद विरोधी अदालत (ATC) और बाद में उच्च न्यायिक मंचों पर हुई। मुख्य सरगना हामिद अली और उसके सहयोगियों को दोषी ठहराते हुए कठोर कारावास और भारी जुर्माने की सजा सुनाई गई। अदालतों ने आरोपियों की जमानत याचिकाओं को भी लगातार खारिज किया।
यह फैसला इस संदेश के रूप में देखा गया कि वित्तीय संस्थानों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों के प्रति न्यायपालिका किसी प्रकार की नरमी नहीं बरतेगी।
एक डकैती जिसने बदल दिए पूरे सिस्टम के नियम
इस घटना ने पाकिस्तान की बैंकिंग और निजी सुरक्षा व्यवस्था की कई गंभीर खामियों को उजागर कर दिया। परिणामस्वरूप सरकार, पुलिस प्रशासन और स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान को व्यापक सुधारात्मक कदम उठाने पड़े।
सुरक्षा एजेंसी पर कार्रवाई
लापरवाही और बिना पर्याप्त सत्यापन के गार्ड नियुक्त करने के आरोप में SPS सुरक्षा एजेंसी का लाइसेंस निलंबित कर दिया गया और उसके कार्यालय को सील कर दिया गया।
गार्डों का अनिवार्य सत्यापन
पूरे सिंध प्रांत में कार्यरत 60 हजार से अधिक निजी सुरक्षा गार्डों का बायोमेट्रिक और पुलिस सत्यापन शुरू किया गया। बैंकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि बिना सरकारी अनुमति और जांच के किसी गार्ड की नियुक्ति नहीं की जाएगी।
CCTV व्यवस्था का आधुनिकीकरण
जांच में पता चला कि बैंक के सीसीटीवी कैमरों की गुणवत्ता इतनी कमजोर थी कि संदिग्धों की पहचान करना मुश्किल हो रहा था। इसके बाद सभी बैंकों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले HD कैमरे, सुरक्षित डेटा बैकअप और आधुनिक निगरानी प्रणाली अनिवार्य कर दी गई।
सुरक्षा ऑडिट और जवाबदेही
बैंकों को नियमित सुरक्षा ऑडिट, थर्ड पार्टी मूल्यांकन और आपातकालीन परिस्थितियों में तय मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन करने के निर्देश दिए गए। बैंक प्रबंधन की जवाबदेही भी पहले की तुलना में कहीं अधिक कठोर कर दी गई।
इतिहास का सबक
कराची की यह ऐतिहासिक बैंक डकैती केवल करोड़ों रुपये की चोरी की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा उदाहरण है जिसने यह साबित किया कि सुरक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी अक्सर वही व्यक्ति हो सकता है जिस पर सबसे अधिक भरोसा किया जाता है।
2009 की इस घटना ने पाकिस्तान के बैंकिंग क्षेत्र को एक कठोर सबक दिया—सुरक्षा केवल हथियारों, ताले और कैमरों से नहीं आती, बल्कि सही सत्यापन, पारदर्शिता और जवाबदेही से सुनिश्चित होती है।
आज भी जब बैंकिंग सुरक्षा की चर्चा होती है, तो कराची की यह डकैती एक चेतावनी के रूप में याद की जाती है कि एक अंदरूनी साजिश किस तरह पूरे सुरक्षा तंत्र को ध्वस्त कर सकती है और करोड़ों की संपत्ति को कुछ घंटों में गायब कर सकती है।
शौर्यपथ लेख /
माँ... मैं एक माँ हूँ। कैसे कह सकती हूँ कि मुझे कुछ चाहिए?
क्यों मुझे कभी कुछ नहीं चाहिए होता... सिर्फ बच्चों की खुशी के अलावा?
दर्द, भूख, प्यास मुझे भी तो लगती है। स्त्री घर की धुरी है, तो उसकी महत्ता अपेक्षित क्यों? मुझे कहते हुए डर क्यों लगता है कि माँ को भी कभी कुछ चाहिए होता है? ये कहते ही अपराधबोध और हीनता मुझमें कहाँ से आई? ये डर किसने और कब भरा मुझमें?
क्या सच में माँ को कुछ नहीं चाहिए होता?
प्रकृति जन्म देती है, तो स्त्री भी जन्म देती है। पर प्रकृति तो छीन भी लेती है... और माँ से माँगने तक का अधिकार छीन लिया गया। उसे समर्पण, त्याग की मूरत बनाकर देवी बना दिया गया। फिर देवी कुछ माँग कैसे सकती है? वो इंसान जो बन जाएगी।
इस डर को 'गिल्ट' बनाकर समाज ने स्त्री के जेहन में गहराई से भर दिया।
माँ अपना अस्तित्व भूल गई और सिर्फ 'माँ' बनकर रह गई। उसे समझा दिया गया कि जिस दिन वह अपने लिए सोचेगी, उस दिन स्वार्थी कहलाएगी। माँ को इतने ऊँचे पद पर बैठा दिया गया जहाँ से वह खुद को देख ही नहीं पाती।
माँ एक जिम्मेदारी है... इस संसार को सही सोच देने की। माँ सिर्फ एक शब्द नहीं... सोच है। माँ के कर्तव्य के साथ अधिकार होते हैं, ये सिखाने की जिम्मेदारी भी तो माँ की ही है। फिर 'अधिकार' कहते ही गिल्ट क्यों?
त्याग, समर्पण, ममता, स्त्रीत्व से सीमित नहीं... उसकी एक असीमित दुनिया होती है। उसकी असीमितता का बोध किसने छीन लिया उससे? इन बातों का कभी उत्तर ही नहीं मिला।
खुद को लुटाते-लुटाते वो ममता से खाली नहीं होती, पर तड़पती रहती है प्यार और अपनेपन के लिए। उसके पास इतना खजाना कहाँ से आता है जो कभी खत्म ही नहीं होता? और ना कभी थकती है वो... लुटाते-लुटाते।
माँ ऐसी क्यों होती है... पूरी दुनिया से अलग?
क्योंकि ममता साँस होती है, और साँस लेने से कोई थकता नहीं। दुनिया से अलग इसलिए है क्योंकि दुनिया हिसाब माँगती है... और माँ बेहिसाब है। क्योंकि जिस दिन वो माँ बनती है, उस दिन से वो सिर्फ 'माँ' ही बचती है।
माँ के प्यार पर कभी जिरह नहीं होती... क्योंकि माँ हर स्पंदन का सबूत होती है। माँ पर बुरा लिखना... किसी कलम के बस की बात नहीं।
माँ इंसान है... तो उसमें इतनी हिम्मत कहाँ से आती है?
और भगवान है... तो वो रोती क्यों है?
वो क्यों कभी खुद के लिए जीना नहीं चाहती? क्यों अपनी खुशियों को त्यागती रहती है? एक माँ में हीन भावना किसने भरी? किस कूटनीति के तहत भरी? हर व्यक्ति का दिल इसका गवाह और उत्तर दोनों है। और फिर माँ को किसी के साक्ष्य की जरूरत क्या?
समाज ने बेटी को परिस्थिति के साथ चलना सिखाया, बहू को घर जोड़ने की सलाह दी, और माँ को ममता की मूरत बनाकर कहा... "तेरे पास तो खजाना है, तुझे क्या चाहिए? तेरी खुशी तो बच्चों की खुशी में है।" और उससे माँगने का हक छीन लिया।
माँ ने भी अपने सपने बुनना छोड़ दिया। ख्वाब दफन कर, ममता ही लुटाती रह गई। माँ से कहा... "तू भगवान है... तू रोटी देगी।" उसकी पूजा करने लगे... वो रोटी खिलाने लगी और उसने खुद को इंसान समझना छोड़ दिया।
माँ की आजादी को छीन, एक सोने के पिंजरे में कैद कर दिया।
देवी बनाकर कहा... "देखो माँ कितनी महान होती है, कभी कुछ नहीं माँगती।" किसी का ध्यान नहीं गया कि माँ इंसान है... और इंसान थकता है, उसकी जरूरतें होती हैं।
समाज ने एक जाल बिछाया है अपने बोनेपन का। माँ को इतना ऊँचा बिठाया कि वो नीचे उतर कर अपना हक ही ना माँग ले। माँ चुप हो गई... क्योंकि उसे लगा कि उसने कुछ माँगा तो वह देवी से गिरकर 'औरत' हो जाएगी।
माँ होना मतलब... गंगा होना। माँ होना मतलब... सिर्फ देना।
दुनिया ने उसकी थकान का हिसाब रखना बंद कर दिया, क्योंकि माँ तो... बेहिसाब है ना! फिर माँ ने माँगना छोड़ दिया। उसे लगा कि यदि वह एक पल अपने लिए निकाल लेगी, या कहीं किसी से कुछ माँग लेगी, तो उसकी ममता पर उँगलियाँ उठ जाएँगी।
माँ को वही चाहिए होता है, जिसे हम माँ से छीन लेते हैं।
बीबीमैं एक माँ हूँ, इसलिए कह सकती हूँ कि... माँ को भी भूख लगती है, थकान होती है, नींद आती है। उसके भी सपने होते हैं, जो बच्चे होने के बाद दफन हो जाते हैं। माँ का ध्यान सिर्फ बच्चे पर रहता है, क्योंकि उसे सिखाया गया है कि वो भगवान है, इंसान नहीं।
पर माँ इंसान है... भगवान नहीं।
मैं उसे इंसान का दर्जा वापस दिलाना चाहती हूँ, जो उससे छीन लिया गया है। इंसान कहलाना माँ का अपमान नहीं... उसका सम्मान है। माँ को महान नहीं... माँ को इंसान कहो।
आज जब मेरी बेटियाँ माँ बनने वाली हैं, तो मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटियाँ खुद को भूलें। वो कर्तव्य के साथ माँगने का अधिकार रखें, और माँगते समय खुद को स्वार्थी ना समझें। क्योंकि जो माँ खुद से प्यार करती है, वह अपने बच्चों को प्यार करना भी सिखाती है।
वो सिखाएगी कि... "माँगूंगी तो माँ नहीं रहूंगी"... इस तरह से उसे जज ना किया जाए। उसे महसूस किया जाए, उसके जज्बात का ख्याल रखा जाए। ऐसा करते समय वो 'माँ' ही रहेगी, ये भरोसा दिलाया जाए।
मैं एक माँ हूँ और माँ के लिए आवाज़ उठा रही हूँ। 'माँ को कुछ नहीं चाहिए'... ये अंतःकरण में बैठा दिया गया है, उसे शुद्ध करने की जरूरत है। ये माँ को बताने की जरूरत है कि कुछ न माँगना उसका नेचर नहीं, एक साजिश है।
;;जो कई हाथों से अपनी गृहस्थी संभाल लेती है, एक जीवन को जन्म दे सकती है, वो इतनी कमजोर नहीं हो सकती कि अपने लिए जीने से अपराधबोध में चली जाए। ये उसका नहीं... समाज द्वारा माँ के मन में भरा गया गिल्ट है।
माँ से सिर्फ 'देना' मत सीखो, माँ को 'देना' भी सीखो।
माँ से उससे माँगने का डर छीन लो। उसे बताओ कि तू माँगेगी, तब भी सबसे पवित्र रहेगी। उसे बताओ कि माँगना इंसान होने का सबूत है, कमजोर होने का नहीं।
माँ अपने बच्चों के लिए पूरा आसमान होती है और पूरी ज़मीन भी। उसका किरदार बहुत वृहद है। बात एक माँ की छवि से आजादी की नहीं... माँ को आजाद करने की है, उस गिल्ट से जो उसे कुछ माँगने से रोकता है।
रोटी ना बनाए तो उसकी इज्जत कम नहीं होगी। उसे इतना अपनापन मिले कि उससे कह सकें... "सिर्फ खाना बनाना ही आपका काम नहीं।" और उसे अपने सपने दफन करने की जरूरत नहीं।
हाँ, तू भी थकती है... ये हम जानते हैं। बस इतनी सी परवाह... कि माँ बेपरवाह नहीं होती। क्योंकि माँ के हिसाब और प्रवाह का कोई समकक्ष नहीं।
लेखिका.. डॉक्टर अनुराधा बक्शी "अनु" अधिवक्ता
पोलसाय पारा गली नंबर 1
दुर्ग छत्तीसगढ़
491 001
मो. नं. 91792 80257
शौर्यापथ लेख
आज का इंसान दुनिया की सबसे तेज़ दौड़ में शामिल है। कोई दौलत के पीछे भाग रहा है, कोई शोहरत के पीछे, कोई सत्ता और पहचान की तलाश में भटक रहा है। लेकिन इस अंधी दौड़ में वह सबसे महत्वपूर्ण चीज़ को पीछे छोड़ देता है — खुद को।
यही कारण है कि जीवन के शोर में आत्मा की आवाज़ दब जाती है और इंसान बाहर की दुनिया जीतते-जीतते भीतर से हार जाता है।
सूफ़ी दर्शन और संत परंपरा सदियों से एक ही बात कहती आई है कि ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता बाहर नहीं, भीतर से होकर जाता है। जब तक मनुष्य स्वयं को नहीं पहचानता, तब तक वह परम सत्य को नहीं पा सकता।
इसी गहरी अनुभूति को मशहूर शायर सदा अम्बालवी ने बेहद खूबसूरती से कहा—
"कैसे मिले ख़ुदा से जो ख़ुद से मिला नहीं"
यह सिर्फ एक शेर नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी का दर्शन है।
क्योंकि जो व्यक्ति अपने मन की परतों से अनजान है, जो अपनी आत्मा की खामोशी को नहीं सुन पाया, वह ईश्वर की आवाज़ कैसे सुन सकेगा?
मनुष्य अक्सर मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और तीर्थों में ईश्वर को तलाशता है, जबकि असली इबादत अपने भीतर झाँकने से शुरू होती है।
जब इंसान अपने अहंकार, लालच, क्रोध और झूठ की धूल हटाकर दिल के आईने को साफ करता है, तब उसे एहसास होता है कि जिसे वह बाहर खोज रहा था, वह तो उसके भीतर ही मौजूद था।
तलाश-ए-अक्स में अपनी, वो उम्र भर भटकता रहा,
मिला सब कुछ जहाँ में, बस खुद से मिलना रह गया।
आज समाज में तनाव, अवसाद और अकेलेपन की सबसे बड़ी वजह यही है कि इंसान ने दुनिया से रिश्ता जोड़ लिया, लेकिन खुद से रिश्ता तोड़ लिया।
मोबाइल, भीड़, सोशल मीडिया और कृत्रिम चमक ने इंसान को इतना व्यस्त कर दिया कि उसे अपने भीतर उतरने का समय ही नहीं मिला।
आध्यात्मिकता का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है, बल्कि संसार के बीच रहकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना है।
जब इंसान खुद को समझने लगता है, तब उसे यह भी समझ आने लगता है कि नफरत व्यर्थ है, अहंकार क्षणिक है और प्रेम ही सबसे बड़ा सत्य है।
खुदा को ढूंढने निकले हो और खुद से ही बेगाने हो,
मिलेगा क्या तुम्हें हासिल, जब अपने घर से अनजाने हो।
मन का सबसे पवित्र मंदिर इंसान का हृदय है।
यदि वहाँ प्रेम, करुणा और सच्चाई का दीप जल जाए, तो हर दिशा में ईश्वर दिखाई देने लगता है।
फिर धर्म दीवार नहीं बनता, बल्कि आत्मा को जोड़ने वाला पुल बन जाता है।
दिल के आईने को साफ कर, फिर देख तमाशा,
वही खुदा का घर है, जिसे तू बाहर ढूंढता रहा।
आख़िरकार, जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि ईश्वर तक पहुँचने की यात्रा स्वयं तक पहुँचने से शुरू होती है।
जिस दिन इंसान अपने भीतर के अंधेरे को पहचान लेगा, उसी दिन उसे रौशनी का असली अर्थ समझ आएगा।
और शायद तभी वह यह महसूस कर पाएगा कि खुदा कहीं दूर आसमान में नहीं, बल्कि उसकी अपनी आत्मा की गहराइयों में बसता है।
शौर्यपथ विशेष लेख।
पद की गरिमा बनाम व्यक्तिगत संबंध : दुर्ग कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल
दुर्ग की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। एक ओर शहर कांग्रेस संगठन वर्षों बाद सक्रियता, ऊर्जा और संगठन विस्तार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ता नजर आ रहा है, तो दूसरी ओर उसी संगठन के भीतर पद की गरिमा और अनुशासन को लेकर कई ऐसे दृश्य सामने आ रहे हैं, जो आत्ममंथन की मांग करते हैं।
शहर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में धीरज बकरीवाल की नियुक्ति के बाद दुर्ग कांग्रेस की कार्यशैली में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई दिया है। लंबे समय तक “रिमोट कंट्रोल” शैली के आरोप झेलने वाले संगठन में अब मैदान में सक्रिय नेतृत्व दिखाई दे रहा है। मंडल स्तर तक बैठकों का विस्तार, युवाओं की भागीदारी, पुराने कार्यकर्ताओं का पुनर्सक्रिय होना और आंदोलनों में बढ़ती भीड़ इस बात का संकेत है कि संगठनात्मक स्तर पर धीरज बकरीवाल लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं।
18 मई को “शहरी सरकार” के खिलाफ हुए कांग्रेस आंदोलन ने भी यह साबित किया कि दुर्ग कांग्रेस अब केवल औपचारिक राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। पहले जहां आंदोलनों में गिने-चुने चेहरे नजर आते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति संगठन सृजन की दिशा में सकारात्मक संकेत देती है।
लेकिन इसी आंदोलन के दौरान एक ऐसा दृश्य भी सामने आया जिसने कांग्रेस की अंदरूनी संस्कृति पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से “ए धीरज… ओ धीरज…” जैसे संबोधन इस्तेमाल किए गए। यह संबोधन व्यक्तिगत रिश्तों के स्तर पर सामान्य लग सकता है, लेकिन जब वही व्यक्ति संगठन का अधिकृत शहर अध्यक्ष हो, तब प्रश्न केवल नाम पुकारने का नहीं, बल्कि पद की गरिमा का बन जाता है।
राजनीतिक संगठनों की मजबूती केवल भीड़, नारों या आंदोलनों से तय नहीं होती। किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके अनुशासन, संरचना और पदों के सम्मान से निर्मित होती है। यही वह बिंदु है जहां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की कार्यशैली में बड़ा अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।
भाजपा में पद पर बैठा व्यक्ति उम्र में छोटा हो या बड़ा, व्यक्तिगत संबंध चाहे जैसे हों, सार्वजनिक मंच पर उसे उसके पद के अनुरूप संबोधित किया जाता है। यही कारण है कि संगठनात्मक अनुशासन भाजपा की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। कार्यकर्ता यह समझता है कि वह केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि संगठनात्मक व्यवस्था का सम्मान कर रहा है।
दुर्ग शहर भाजपा का उदाहरण सामने है। भाजपा जिला अध्यक्ष सुरेंद्र कौशिक के अधीन पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं। शायद ही ऐसा कोई अवसर देखने को मिला हो जब किसी विधायक या वरिष्ठ नेता ने सार्वजनिक रूप से अध्यक्ष पद की गरिमा को कमतर करने वाला व्यवहार किया हो। यही संगठनात्मक संस्कृति भाजपा को बूथ से लेकर सत्ता तक मजबूती प्रदान करती है।
कांग्रेस के भीतर समस्या यह नहीं कि वरिष्ठ नेता धीरज बकरीवाल को व्यक्तिगत रूप से “धीरज” कहकर संबोधित करते हैं। समस्या यह है कि सार्वजनिक मंच पर अध्यक्ष पद की गरिमा को किस नजर से देखा जा रहा है। यदि वरिष्ठ ही पद की औपचारिक मर्यादा का पालन नहीं करेंगे, तो नए कार्यकर्ताओं में संगठनात्मक अनुशासन की भावना कैसे विकसित होगी?
आज कांग्रेस जिस दौर से गुजर रही है, उसमें केवल विचारधारा या विरोध की राजनीति पर्याप्त नहीं है। संगठन को मजबूत करने के लिए आंतरिक अनुशासन, पदों का सम्मान और सामूहिक नेतृत्व की संस्कृति विकसित करना अनिवार्य हो गया है।
यह भी सच है कि धीरज बकरीवाल स्वयं शायद इन संबोधनों पर कोई आपत्ति न रखते हों। संभव है कि वे इसे वरिष्ठों का स्नेह मानते हों। लेकिन राजनीति में कई बार व्यक्ति की व्यक्तिगत सहजता से अधिक महत्वपूर्ण संस्था और पद की गरिमा होती है। अध्यक्ष केवल “धीरज” नहीं रहते, वे उस समय पूरे संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं।
कांग्रेस को यह समझना होगा कि परिवारवाद, गुटबाजी और “मैं” केंद्रित राजनीति से ऊपर उठे बिना संगठनात्मक पुनर्जीवन संभव नहीं है। यदि भाजपा के संगठनात्मक मॉडल में कुछ सकारात्मक तत्व हैं, तो उन्हें अपनाने में वैचारिक हार नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता दिखाई देती है।
आज जरूरत इस बात की है कि कांग्रेस कार्यकर्ता यह महसूस करें कि संगठन किसी व्यक्ति विशेष का मंच नहीं, बल्कि सामूहिक राजनीतिक व्यवस्था है। जहां पद का सम्मान व्यक्ति से बड़ा होता है।
आंदोलन हजारों हो सकते हैं, भीड़ लाखों की हो सकती है, लेकिन यदि संगठन के भीतर ही पद और जिम्मेदारी का सम्मान कमजोर पड़ जाए, तो राजनीतिक ताकत धीरे-धीरे खोखली होने लगती है।
“ए धीरज… ओ धीरज…” से “अध्यक्ष साहब” तक का यह सफर केवल संबोधन बदलने का नहीं, बल्कि कांग्रेस की संगठनात्मक सोच बदलने का सवाल है। और शायद यही वह परिवर्तन है जिसकी दुर्ग कांग्रेस को आने वाले समय में सबसे अधिक आवश्यकता है।
कभी-कभी कुछ आवाज़ें सिर्फ गीत नहीं गातीं, वे इंसानियत, हौसले और जीवन के सबसे गहरे दर्द को महसूस करा जाती हैं।
असम के तिनसुकिया जिले के रहने वाले 17 वर्षीय युवा गायक ऋषभ दत्ता की आवाज़ भी ऐसी ही थी, जो आज उनके जाने के वर्षों बाद भी लोगों की आंखें नम कर रही है।
इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें ऋषभ अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए हाथ में गिटार थामे बेहद शांत और भावुक अंदाज़ में सदाबहार गीत “लग जा गले” और “चन्ना मेरेया” गाते दिखाई दे रहे हैं।
वीडियो में उनके चेहरे पर दर्द साफ दिखाई देता है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा दिखाई देता है — संगीत के प्रति उनका जुनून और जिंदगी से आखिरी पल तक लड़ने का साहस।
ऋषभ दत्ता एक गंभीर और दुर्लभ बीमारी “अप्लास्टिक एनीमिया” (Aplastic Anemia) से पीड़ित थे।
इस बीमारी में शरीर नई रक्त कोशिकाएं बनाना बंद कर देता है, जिससे मरीज की हालत लगातार कमजोर होती चली जाती है।
परिवार ने उन्हें बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। बेंगलुरु के एक अस्पताल में उनका महंगा बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी कराया गया। डॉक्टरों और परिवार को उम्मीद थी कि ऋषभ फिर से सामान्य जिंदगी जी पाएंगे, लेकिन लंबी लड़ाई के बाद 8 जुलाई 2020 को यह युवा कलाकार जिंदगी की जंग हार गया।
अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान ऋषभ ने डॉक्टरों और नर्सों के सामने गिटार बजाते हुए जो गीत गाए, वही वीडियो आज फिर इंटरनेट पर लोगों को भावुक कर रहा है।
मौत से कुछ कदम दूर खड़ा एक लड़का… लेकिन चेहरे पर शिकन नहीं, बल्कि मुस्कान…
कमजोर शरीर… लेकिन सुरों में वही आत्मविश्वास…
यही दृश्य लाखों लोगों के दिलों को छू रहा है।
सोशल मीडिया पर लोग उन्हें
“रियल फाइटर”,
“म्यूजिक वॉरियर”
और
“हौसले की मिसाल”
बताकर श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
ऋषभ अपनी मधुर आवाज और सादगी की वजह से वर्ष 2019 के अंत में ही इंटरनेट पर लोकप्रिय हो चुके थे। उनके गाए गीतों को हजारों लोगों ने पसंद किया था।
लेकिन किसी ने शायद यह नहीं सोचा था कि इतनी छोटी उम्र में यह प्रतिभाशाली गायक दुनिया को अलविदा कह देगा।
ऋषभ दत्ता अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज आज भी सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंच रही है।
उनका वायरल वीडियो सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि जिंदगी के आखिरी पल तक उम्मीद, साहस और मुस्कान बनाए रखने का संदेश बन चुका है।
जब भी कोई “लग जा गले…” की वह धीमी और कांपती हुई आवाज सुनता है, तो एहसास होता है कि कुछ कलाकार शरीर से चले जाते हैं, लेकिन उनकी आत्मा उनकी कला में हमेशा जिंदा रहती है।
शौर्यपथ लेख / यूक्रेन में जारी युद्ध के खत्म होने के कोई संकेत नहीं दिखने और मध्य-पूर्व के 'न युद्ध, न शांति' के दलदल में फंसे होने के बावजूद, हाल के समय के दूसरे संघर्षों के मुकाबले 'ऑपरेशन सिंदूर' को एक मानक अभियान के तौर पर देखना महत्वपूर्ण है। 'ऑपरेशन सिंदूर' की सबसे खास बातें थीं— सैन्य ताकत का तीव्र और नियंत्रित तरीके से निर्णायक इस्तेमाल, ताकि प्रबंधन करने योग्य संघर्ष-विस्तार में रहते हुए ऐसे रणनीतिक नतीजे हासिल किए जा सकें, जिनकी 'बाहर निकलने की रणनीति' स्पष्ट हो और जो मोदी सरकार के राजनीतिक लक्ष्यों के अनुरूप हों। इस संघर्ष की शुरुआत का उद्देश्य था - पाकिस्तान के भारत-विरोधी आतंकवादी नेटवर्क के गढ़ पर सीधा हमला करना और अगर पाकिस्तान की सेना भारत के शुरुआती आतंकवाद-रोधी हमले का सैन्य जवाब देती है, तो उसे भारी नुकसान पहुंचाना। ये ऐसे बड़े लक्ष्य नहीं थे, जिनके लिए बहुत बड़े पैमाने पर और हर तरफ सैन्य ताकत के इस्तेमाल की ज़रूरत पड़ती। यह एक ज़िम्मेदार ताकत द्वारा, राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के बार-बार दोहराए जाने वाले कृत्यों को सज़ा देने के लिए चलाया गया एक सटीक, सक्रिय और संयमित प्रतिरोधी अभियान था।
हालांकि भारत ने 2019 में बालाकोट में आतंकवाद-रोधी अभियानों में आक्रामक हवाई शक्ति के इस्तेमाल का प्रयोग किया था, लेकिन इस बार जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के मुख्यालयों पर—जो क्रमशः बहावलपुर और मुरीदके में स्थित हैं—हमला करने की उसकी तत्परता ने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए जोखिम उठाने की एक नई प्रवृत्ति और संघर्ष को बढ़ाने की इच्छाशक्ति को उजागर किया। फिर भी, राजनीतिक स्तर पर सोच में पूरी स्पष्टता थी कि एक व्यापक संघर्ष भारत के हित में नहीं है, भले ही पाकिस्तान की सैन्य परिसंपत्तियों को और अधिक नुकसान पहुँचाने का सैन्य प्रलोभन मौजूद था।
समझदारी और संयम, ज़िम्मेदार राज-काज और सैन्य अभियानों के दो ऐसे साथ-साथ चलने वाले पहलू हैं, जिन्हें भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान अच्छी तरह प्रदर्शित किया; खासकर इस मामले में कि उसने अपने हमलों के दौरान कोई भी अतिरिक्त नुकसान नहीं होने दिया और सैन्य श्रेष्ठता होने के बावजूद पाकिस्तान के युद्धविराम के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। अब पीछे मुड़कर देखने पर, एक लंबे और बड़े संघर्ष से मिलने वाले फ़ायदे, उसके संभावित आर्थिक और मानवीय नुकसानों के मुकाबले बहुत ही मामूली लगते हैं। चार दिनों के भीतर ही संघर्ष को समाप्त कर देने से जो सैकड़ों करोड़ रुपये की बचत हुई, उसने मध्य-पूर्व में चल रहे मौजूदा संघर्ष के दौरान भारत की आर्थिक सहनीयता में योगदान दिया है। दूसरी ओर, मध्य-पूर्व के संघर्ष में अमेरिका के 27 अरब डॉलर से भी ज़्यादा खर्च हो चुके हैं और इस संघर्ष का कोई अंत भी नज़र नहीं आ रहा है।
भारत के मौजूदा उच्च रक्षा संगठन ने संघर्ष के दौरान अच्छी तरह काम किया। ऑपरेशन के नीति-निर्माण और तैयारी के चरण में 'केंद्रीकृत और निर्देशात्मक नियंत्रण' का एक स्पष्ट मॉडल देखने को मिला; इसके पहले स्तर पर प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और रक्षा मंत्री थे, जबकि दूसरे स्तर पर सीडीएस और तीनों सेना के प्रमुख इसे समर्थन दे रहे थे। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सेना प्रमुखों और खुफिया एजेंसियों को स्पष्ट और ठोस रणनीतिक परिणाम बताए गए थे, जिसके बाद उन्हें एक व्यावहारिक 'कार्ययोजना’ तैयार करने की जिम्मेदारी दी गयी।
भले ही हज़ारों सालों में युद्ध के स्वरूप में कई बदलाव आए हों, लेकिन कौटिल्य, सुन त्ज़ू, क्लॉज़विट्ज़ और लिडेल हार्ट जैसे प्राचीन और आधुनिक रणनीतिकारों द्वारा बताए गए युद्ध के अधिकांश मूल सिद्धांत समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। कुल मिलाकर, 'ऑपरेशन सिंदूर' की भारत की सफलता ने तनाव बढ़ाने और प्रतिरोध करने की सीमाओं का विस्तार किया, भारत ऐसा इसलिए कर पाया क्योंकि इसने समय की कसौटी पर खरे उतरे युद्ध के कुछ सिद्धांतों और संकट के समय फ़ैसले लेने के तरीकों का पालन किया। इनमें से, लक्ष्य का चयन और उसे बनाए रखना, शक्ति का केंद्रीकरण, आक्रामक कार्रवाई, अचानक हमला, कमान की एकता, सुरक्षा, सरलता, मनोबल और अनुकूलनशीलता ऐसे सिद्धांत हैं, जिन पर और अधिक विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
परिचालन स्तर पर, भारत की उभरती हुई बहु-क्षेत्रीय सैन्य रणनीति के 'तलवार' के रूप में आईएएफ का इस्तेमाल करने का फ़ैसला एक साहसी कदम था, जो आज के दौर के संघर्षों के बदलते स्वरूप को दिखाता है और जिस पर बारीकी से नज़र रखने और विश्लेषण करने की ज़रूरत है। पाकिस्तान की चीन से मिली वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा देने और उन्हें जाम करने के बाद, भारत ने 7 मई को पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में घुसकर हमला किया। इस हमले में पाकिस्तान और पीओजेके में मौजूद 9 अहम आतंकवादी ठिकाने तबाह हो गए, और लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज़्बुल मुजाहिदीन के प्रमुख केंद्र नष्ट हो गए। 10 मई को, कुछ ही घंटों के भीतर, भारत ने अपने हमले का दायरा और बढ़ाया तथा 11 प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया, जिनमें नूर खान एयरबेस, रफ़ीक़ी एयरबेस, मुरीद एयरबेस, सुक्कुर एयरबेस, सियालकोट एयरबेस, पसरूर एयरबेस, चुनियां एयरबेस, सरगोधा एयरबेस, स्कार्दू एयरबेस, भोलारी एयरबेस और जैकोबाबाद एयरबेस शामिल थे। इस कार्रवाई से पाकिस्तान की हवाई और युद्ध संबंधी क्षमताओं को गंभीर नुकसान पहुँचा। आईएएफ की हवाई हमलों की तीव्रता से यह ज़ाहिर हो गया है कि इन हवाई अड्डों, विमानों और वहाँ तैनात हथियार प्रणालियों को पहुँचाया गया नुकसान, 1971 के युद्ध में पश्चिमी मोर्चे पर आईएएफ द्वारा पीएएफ के हवाई अड्डों को पहुँचाए गए कुल नुकसान से कहीं ज़्यादा है। 'ऑपरेशन सिंदूर' ने भारत की एकीकृत हवाई रक्षा प्रणाली की परिपक्वता को भी साबित कर दिया, जो दुश्मन की मिसाइल और ड्रोन-केंद्रित रणनीति का मुक़ाबला करने में सक्षम है। हालाँकि, आईएएफ को भविष्य में, अधिक शक्तिशाली दुश्मनों के ख़िलाफ़ किसी भी सीमित संघर्ष की स्थिति में अपने प्लेटफ़ॉर्म, हथियारों और प्रणालियों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने के लिए, तेज़ गति से लगातार सीखते रहने की आवश्यकता होगी।
भविष्य के युद्ध-क्षेत्रों में, लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों का सामना करने के लिए, ज़्यादा एकीकरण और तालमेल की ज़रूरत होगी। वर्तमान में चल रहे सुधारों और संरचनात्मक पहलों पर शायद फिर से विचार करना पड़े, ताकि एक ऐसा संगठनात्मक ढांचा तैयार किया जा सके जो 'भारत-विशिष्ट' हो और 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान सीखे गए अनुभवों पर आधारित हो। हालांकि, दुनिया भर में चल रहे संघर्षों से कई रणनीतिक और परिचालन संबंधी सबक मिलते हैं, लेकिन भारत को दूसरी जगहों से युद्ध-लड़ाई के मॉडल उठाने और उन्हें अपने रणनीतिक और परिचालन वातावरण पर लागू करने के प्रति सावधान रहना चाहिए। उदाहरण के लिए, हवाई परिचालन में मिसाइल और ड्रोन पर ज़्यादा ज़ोर देने के समर्थकों को अपने विचार पर फिर से सोचना चाहिए। भारत के पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर जैसा हवाई माहौल है, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे को कड़ी टक्कर देते हैं, वहाँ सिर्फ़ 'बहु-क्षेत्रीय परिचालन' ही सफल होंगे।
भारत के सशस्त्र बलों ने एक जटिल युद्धक्षेत्र के माहौल में खुद को साबित किया है—भले ही सीमित पैमाने पर —जिसने उन्हें कई तरह के ऑपरेशन चलाने और सरकार द्वारा तय किए गए राष्ट्र के सर्वोत्तम हितों के अनुसार, सही समय पर पीछे हटने का अवसर दिया। भारत के रणनीतिक और राष्ट्रीय डीएनए में अलग-अलग पहलू शामिल हैं, जो 21वीं सदी में अब तक राजनीतिक सोच और रणनीतिक अभिव्यक्तियों के संयोजन के रूप में सामने आए हैं। ज़िम्मेदारी और संयम के साथ सक्रिय प्रतिरोध की नींव पर निर्मित 'संपूर्ण राष्ट्र दृष्टिकोण' की ओर एक स्पष्ट बदलाव देखने को मिला है। 'ऑपरेशन सिंदूर' इसी धीरे-धीरे उभरते डीएनए की अभिव्यक्ति था।
**साभार -एयर वाइस मार्शल (डॉ.) अर्जुन सुब्रमण्यम (सेवानिवृत्त)
(लेखक एक सैन्य इतिहासकार और रणनीतिक विश्लेषक हैं। वे नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय में 'राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में राष्ट्रपति उत्कृष्टता पीठ' के पूर्व अध्यक्ष हैं। वर्तमान में वे कौटिल्य स्कूल ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी में सहायक संकाय सदस्य हैं और भारत के सभी युद्ध महाविद्यालयों में अतिथि संकाय के रूप में कार्यरत हैं।)
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
