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March 10, 2026
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शौर्य की बाते ( सम्पादकीय )

शौर्य की बाते ( सम्पादकीय ) (226)

विशेष लेख

छत्तीसगढ़ की पावन धरती ने समय-समय पर ऐसे महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने कर्म, सेवा और त्याग से समाज को नई दिशा दी। इन्हीं महान विभूतियों में एक नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान से लिया जाना चाहिए—महादानी दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल का।

4 अप्रैल 1876 को जन्मे दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल न केवल अपने समय के अत्यंत समृद्ध उद्यमी थे, बल्कि उससे कहीं बढ़कर वे समाज सेवा, परोपकार और मानव कल्याण के प्रतीक थे। आज भी रायपुर और आसपास के अनेक महत्वपूर्ण संस्थान उनकी दानशीलता के प्रमाण हैं, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि समय के साथ उनका नाम धीरे-धीरे जनस्मृति से ओझल होता चला गया।

डी.के. अस्पताल से जुड़ा नाम, लेकिन योगदान उससे कहीं बड़ा

रायपुर का प्रतिष्ठित डी.के. (दाऊ कल्याण) अस्पताल आज भी उनके नाम से जाना जाता है। बहुत से लोग उन्हें केवल इसी अस्पताल की जमीन के दानदाता के रूप में जानते हैं, जबकि उनकी दानशीलता का दायरा इससे कहीं अधिक विशाल था।

1944 में दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल ने डी.के. अस्पताल के लिए जमीन के साथ भवन निर्माण हेतु 1,25,000 रुपये नकद दान किए, जो आज के मूल्यांकन में लगभग 70 करोड़ रुपये के बराबर माने जाते हैं।

एम्स सहित कई संस्थानों की नींव में उनका योगदान

रायपुर में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) भी उसी भूमि पर बना है, जिसे दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल ने समाज के हित में दान किया था। यह तथ्य उनकी दूरदर्शिता और समाज के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

शिक्षा और कृषि के क्षेत्र में भी उदार योगदान

दाऊ जी ने केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक ही अपने दान को सीमित नहीं रखा।

उन्होंने लभांडी क्षेत्र की जमीन के साथ कृषि महाविद्यालय और गरीब छात्रों के लिए छात्रावास निर्माण हेतु 1,12,000 रुपये दान किए, जो आज के मूल्य में लगभग 62 करोड़ रुपये के बराबर माने जाते हैं।

इसके अतिरिक्त उन्होंने—

टीबी अस्पताल के लिए 323 एकड़ भूमि दान की

बरोंडा ग्राम में कृषि अनुसंधान के लिए भूमि प्रदान की

भाटापारा में कृषि विज्ञान के लिए विशाल भूमि दान दी

धार्मिक और सामाजिक सेवा में भी अग्रणी

दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल की आस्था और सेवा भाव धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में भी दिखाई देता है।

उन्होंने रायपुर के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के संचालन हेतु पूरा खैरा गांव दान कर दिया।

भाटापारा में अकाल के समय लोगों की पीड़ा को देखते हुए उन्होंने “कल्याण सागर” जलाशय का निर्माण कराया, जिससे हजारों लोगों और पशुओं को पानी की सुविधा मिली।

पशु सेवा और ज्ञान के प्रसार में योगदान

भाटापारा में विशाल पशु चिकित्सालय का निर्माण

गरीबों और विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय की स्थापना

ये सभी कार्य इस बात का प्रमाण हैं कि दाऊ जी का दृष्टिकोण केवल तत्कालीन समाज तक सीमित नहीं था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के कल्याण की सोच से जुड़ा था।

छत्तीसगढ़ से बाहर भी उदार दान

उनकी परोपकारिता केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रही। देश के विभिन्न हिस्सों में भी उन्होंने जरूरत के समय उदारतापूर्वक सहयोग किया।

प्रमुख योगदानों में शामिल हैं—

नागपुर के लेडी इरविन अस्पताल के निर्माण में सहयोग

सेंट्रल महिला कॉलेज के निर्माण में प्रमुख दान

बिहार के भूकंप पीड़ितों के लिए सहायता

वर्धा की भीषण बाढ़ में उदार दान

अपने समय के अत्यंत समृद्ध उद्यमी

दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल अपने समय के अत्यंत संपन्न उद्यमियों में गिने जाते थे।

1937 में उन्होंने लगभग 70,000 रुपये का राजस्व भुगतान किया, जो आज की गणना में लगभग 39 करोड़ रुपये से अधिक के बराबर माना जा सकता है।

आज क्यों धुंधला पड़ गया यह नाम?

इतने विशाल और ऐतिहासिक योगदान के बावजूद आज यह विडंबना है कि छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी तो दूर, बहुत से लोग इस महान माटीपुत्र के नाम और कार्यों से परिचित भी नहीं हैं।

यह केवल इतिहास की भूल नहीं, बल्कि उस विरासत के प्रति हमारी उपेक्षा भी है जिसने इस प्रदेश की सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूत नींव रखी।

स्मरण और सम्मान की आवश्यकता

आज आवश्यकता है कि छत्तीसगढ़ की जनता, सामाजिक संस्थाएं और सरकार मिलकर दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल जैसे महादानी व्यक्तित्वों को पुनः जनस्मृति में स्थापित करें।

क्योंकि किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी वर्तमान उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन महान व्यक्तियों से होती है जिन्होंने अपना सर्वस्व समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया।

दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल न केवल छत्तीसगढ़ के गौरव हैं, बल्कि वे भारतीय परोपकार की परंपरा के एक उज्ज्वल अध्याय भी हैं।

   रायुपर / शौर्यपथ / श्रीमती सगो तेता स्व-सहायता समूह और बिहान से जुड़कर न केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल की है, बल्कि अपने स्वाभिमान और आत्मविश्वास को भी नई पहचान दी है। आज कांकेर जिला के गांव ग्राम गढ़पिछवाड़ी की अन्य महिलाएं भी उनसे प्रेरणा लेकर आजीविका गतिविधियों से जुड़ रही हैं। श्रीमती तेता ने अपनी इस सफलता का श्रेय भारत सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन योजना और छत्तीसगढ़ शासन की पहल बिहान को देते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इन योजनाओं ने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने और ‘लखपति दीदी’ बनने का अवसर प्रदान किया है। बिहान योजना ने श्रीमती सगो तेता के जीवन में नवा बिहान ला दिया।

श्रीमती सगो तेता ‘लखपति दीदी’ के रूप में अपनी पृथक् पहचान बना चुकी
कुछ कर गुजरने का जुनून और उस इच्छाशक्ति को शासन की छोटी सी मदद मिल जाए, तो कामयाबी की बुलंदी को फर्श से अर्श तक पहुंचने में देर नहीं लगती। कांकेर जिले की महिलाएं शासन के सहयोग से प्रशिक्षण तथा सहायता प्राप्त कर अपने हुनर को अंजाम दे रही हैं। ऐसी ही एक मिसाल जिला मुख्यालय से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम गढ़पिछवाड़ी की आदिवासी महिला श्रीमती सगो तेता आज ‘लखपति दीदी’ के रूप में अपनी पृथक् पहचान स्थापित कर चुकी हैं। उनकी कामयाबी यह साबित करती है कि मेहनत, लगन, आत्मविश्वास और उचित अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं भी खुद के दम पर अपने समूह, परिवार और समाज के लिए मिसाल कायम कर सकती हैं।

समूह ने बढाया आगे श्रीमती सगो को
एक समय था जब आर्थिक तंगी के कारण श्रीमती सगो को छोटी-छोटी जरूरतों को पूरी करने के लिए भी दूसरों का मुंह ताकना पड़ता था। आजीविका के एकमात्र साधन के रूप में खेती-बाड़ी तो थी, लेकिन सीमित संसाधनों और पारंपरिक तरीकों के कारण आय बहुत कम होती थी। वहीं बच्चों की पढ़ाई और घर के खर्चों की चिंता उन्हें अक्सर परेशान करती थी। इसी दौरान उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ की जानकारी मिली। इससे प्रेरित होकर सगो बाई ने गांव की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर गायत्री स्व-सहायता समूह बनाया, जिसमें 10 महिलाएं शामिल हैं।

खेतों में द्विफसली सिंचाई की मिली सुविधा
समूह से जुड़ने के बाद उन्हें बिहान के अंतर्गत 60 हजार रुपये की सामुदायिक निवेश राशि प्राप्त हुई, जिसने उनके जीवन को नई दिशा दे दी। श्रीमती सगो तेता बताती हैं कि पहले उनके खेत में मोटरपंप (बोरवेल) नहीं था, जिसके कारण खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर थी और साल में धान की केवल एक ही फसल ले पाती थीं। फिर उन्होंने स्व-सहायता समूह से ऋण लेकर अपने खेत में बोर करवाया, जिससे अब उन्हें सिंचाई की सुविधा मिल गई है। इसका सकारात्मक परिणाम यह रहा कि अब वे अपने खेतों में साल में दोनों फसलें (खरीफ और रबी) ले रही हैं, जिससे उनकी आय में काफी वृद्धि हुई है।

आजीविकामूलक गतिविधियों ने बनाई लखपति दीदी
इसके साथ ही सगो बाई ने कई आजीविकामूलक गतिविधियां भी शुरू कीं। उन्होंने मशरूम पालन, छेना (कंडा) निर्माण, गोबर से जैविक खाद तैयार करना, रुई से तकिये बनाना, सब्जी उत्पादन, ईंट निर्माण और कपड़ों के विक्रय जैसे कार्य प्रारंभ किए। उनकी सतत् मेहनत रंग लाई और आज वे इन अलग-अलग गतिविधियों से प्रतिमाह लगभग 18 से 20 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं। इसी निरंतर आय और बचत के कारण पूरे क्षेत्र में वह आज ‘लखपति दीदी’ के रूप में पहचानी जा रही हैं।

जीवन में आया बड़ा बदलाव, महतारी वंदन योजना का भी मिल रहा लाभ
लखपति दीदी श्रीमती सगो तेता बताती हैं कि स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया है। इसी आय के सहारे उन्होंने अपने तीनों बच्चों की पढ़ाई करवाई, साथ ही अपने दो बच्चों की शादी भी करवा ली है। इसके बाद अब वे अपनी आजीविका से होने वाली आय से अपनी छोटी बेटी की शादी करने की तैयारी कर रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वह महतारी वंदन योजना का भी लाभ ले रही हैं, जिससे मिली रकम को वह बेटी के विवाह में किसी बड़े खर्च के लिए बचत कर रही हैं।

  
साभार - धनंजय राठौर, सयुक्त संचालक,
ताराशंकर सिन्हा, सहायक संचालक जनसंपर्क

 

नक्सलवाद की छाया से बाहर निकलता छत्तीसगढ़, विकास की राह पर बस्तर

(मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के जन्मदिवस विशेष)

लेखक : शरद पंसारी
संपादक – शौर्यपथ दैनिक समाचार


21 फरवरी—छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री माननीय विष्णु देव साय का जन्मदिन—सिर्फ एक राजनीतिक व्यक्तित्व का जन्मदिवस नहीं, बल्कि उस नेतृत्व का उत्सव है जिसने बीते ढाई वर्षों में छत्तीसगढ़ की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नए सिरे से परिभाषित किया है।

आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व जब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेश की कमान संभाली, तब उनके सामने अनेक चुनौतियाँ थीं—किसानों की उम्मीदें, महिलाओं का सशक्तिकरण, आवासहीन गरीबों की पीड़ा और सबसे बड़ी चुनौती, वर्षों से नक्सलवाद की छाया में जी रहा बस्तर।

चुनावी वादों से आगे, भरोसे की सरकार

मुख्यमंत्री साय की सरकार ने सत्ता संभालते ही यह स्पष्ट कर दिया कि यह सरकार केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि कार्यान्वयन की सरकार होगी।

  • किसानों से ₹3100 प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी कर अन्नदाता के सम्मान को पुनर्स्थापित किया गया।

  • महतारी वंदन योजना के तहत महिलाओं को प्रतिमाह ₹1000 की आर्थिक सहायता देकर महिला सशक्तिकरण को जमीनी मजबूती दी गई।

  • प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से हजारों परिवारों को पक्की छत का सपना साकार हुआ।

ये सभी वादे केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि धरातल पर उतरते हुए सरकार की नीयत और नेतृत्व की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक नेतृत्व

परंतु इन उपलब्धियों के बीच एक ऐसा ऐतिहासिक कार्य है, जो मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व को अमर पहचान दिलाता है—
? छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्त करने की दिशा में ठोस और निर्णायक पहल।

वर्षों तक छत्तीसगढ़ के नागरिकों को अन्य राज्यों में एक ही सवाल का सामना करना पड़ता था—
“आप छत्तीसगढ़ में कैसे रह लेते हैं? वह तो नक्सली क्षेत्र है।”

मुख्यमंत्री साय के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार ने इस मानसिकता को जड़ से बदलने का काम किया। सुरक्षा बलों के मनोबल को बढ़ाना, विकास को सुरक्षा के साथ जोड़ना और संवाद व आत्मसमर्पण नीति को प्रभावी बनाना—इन सभी कदमों ने नक्सलवाद के मजबूत किले को कमजोर किया है।

बस्तर: भय से विश्वास की ओर

जो बस्तर कभी “नक्सलगढ़” कहा जाता था, आज वही बस्तर विकास की नई कहानी लिख रहा है।

  • दूरदराज के गांवों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की योजनाएं पहुंच रही हैं।

  • बड़ी संख्या में नक्सलियों का आत्मसमर्पण, समाज की मुख्यधारा में लौटने की ऐतिहासिक प्रक्रिया का प्रमाण है।

  • सड़क, संचार, मोबाइल नेटवर्क और प्रशासनिक पहुंच ने दशकों पुरानी दूरी को समाप्त किया है।

यह सब संभव हुआ है मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की उस सोच से, जिसमें सुरक्षा और संवेदनशीलता दोनों का संतुलन है।

पर्यटन और संस्कृति का नया केंद्र बनता बस्तर

आज बस्तर केवल शाही दशहरे तक सीमित नहीं रहा।
प्राकृतिक सौंदर्य, जनजातीय संस्कृति, जलप्रपात, वन संपदा और शांत वातावरण—बस्तर अब देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में अपनी पहचान बना रहा है।
यह बदलाव बताता है कि बस्तर अब बंदूक नहीं, भविष्य की संभावनाओं से पहचाना जाएगा।

इतिहास में दर्ज होगा यह नेतृत्व

निस्संदेह, भविष्य में जब छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के अंत की चर्चा होगी, तो मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, संवेदनशील प्रशासन और विकासोन्मुख दृष्टि से असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी संभव हो सकते हैं।

जन्मदिन पर बस्तर की दुआएं

आज, मुख्यमंत्री के जन्मदिन के अवसर पर, बस्तर की धरती—जिसने सबसे अधिक दर्द सहा—उन्हें सबसे अधिक दुआएं दे रही है।
यह दुआ कि शासन की योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे,
यह दुआ कि विकास की यह यात्रा कभी न रुके,
और यह दुआ कि छत्तीसगढ़ हमेशा शांति, समृद्धि और सम्मान के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे।

21 फरवरी केवल जन्मदिन नहीं,
यह उस नेतृत्व का उत्सव है जिसने छत्तीसगढ़ को नई पहचान दी।

दुर्ग। शौर्यपथ।

शहर की राजनीति में कई बार छोटी दिखने वाली घटनाएँ भी बड़े सवाल खड़े कर जाती हैं। गंजपारा चौक के नामकरण को लेकर हालिया घटनाक्रम ने यही साबित किया है। चौक का नाम “महेश चौक” घोषित होते ही शहर की फिजा में चर्चा का दौर तेज हो गया—क्या यह महज़ एक नामकरण है, या फिर शहरी सरकार की कार्यप्रणाली और प्राथमिकताओं का आईना?

लंबित आवेदन और अचानक निर्णय

पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल के कार्यकाल में साहू समाज द्वारा “कर्मा माता चौक” और राजस्थानी ब्राह्मण समाज द्वारा “परशुराम चौक” नामकरण के लिए आवेदन दिए गए थे। दोनों प्रस्ताव एमआईसी में लंबित रहे। इसके अतिरिक्त, समीप निर्माणाधीन जगन्नाथ मंदिर को देखते हुए “जगन्नाथ चौक” नाम की भी चर्चा थी।

लेकिन परिषद के औपचारिक निर्णय से पहले ही गंजपारा चौक को “महेश चौक” के रूप में संबोधित किए जाने की खबर सामने आई। कार्यक्रम में राम रसोई के संरक्षक चतुर्भुज राठी की उपस्थिति ने इस पूरे घटनाक्रम को और राजनीतिक रंग दे दिया।

सवालों के घेरे में शहरी सरकार

वर्तमान महापौर अलका बाघमार ने पूर्व सरकार की त्रुटियों को सुधारने का संकल्प लेकर पदभार संभाला था। शपथ ग्रहण के समय निष्पक्षता और पारदर्शिता की जो बात कही गई थी, वह अब गंजपारा चौक के नामकरण प्रकरण में सवालों के घेरे में है।

यदि परिषद द्वारा अब तक औपचारिक निर्णय नहीं हुआ, तो “महेश चौक” नाम की घोषणा किस अधिकार से और किस प्रक्रिया के तहत हुई?

क्या यह निर्णय प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरकर लिया गया, या फिर प्रभावशाली वर्गों के दबाव में जल्दबाजी में?

राम रसोई और दोहरे मापदंड का आरोप

बस स्टैंड स्थित राम रसोई के अनुबंध को लेकर भी पूर्व में अनियमितताओं की चर्चा रही है। स्वयं महापौर ने पूर्व सरकार की गलतियों का उल्लेख करते हुए दूरी बनाई थी। किंतु वर्तमान कार्यकाल में भी अनुबंध की शर्तों के पालन पर सवाल उठ रहे हैं। इसके बावजूद संचालन जारी है और निगम की प्रेस विज्ञप्ति में संचालक को “समाजसेवी” के रूप में प्रस्तुत किया जाना विरोधाभास पैदा करता है।

यही कारण है कि गंजपारा चौक के नामकरण को लेकर यह धारणा बल पकड़ रही है कि कहीं न कहीं प्रभावशाली और संपन्न वर्ग की आवाज़ अन्य समाजों की अपेक्षा अधिक प्रभावी रही।

भावनाएँ बनाम राजनीति

साहू समाज, राजस्थानी ब्राह्मण समाज और उड़िया समाज की ओर से लंबे समय से चली आ रही मांगों पर विचार न करते हुए अचानक एक नाम को आगे बढ़ाना सामाजिक संतुलन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। शहर की विविध सामाजिक संरचना में संतुलन बनाए रखना शहरी सरकार की जिम्मेदारी है।

नामकरण मात्र औपचारिकता नहीं—यह भावनाओं, पहचान और सम्मान का विषय होता है। ऐसे में यदि प्रक्रिया पारदर्शी न हो, तो अविश्वास जन्म लेता है।

निष्पक्षता की कसौटी पर बाघमार सरकार

पिछले एक वर्ष में कई ऐसे प्रसंग सामने आए हैं, जिनमें शहरी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर आलोचना हुई है। गंजपारा चौक प्रकरण ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।

क्या यह निर्णय प्रशासनिक पारदर्शिता के तहत हुआ?

क्या परिषद की सहमति ली गई?

क्या सभी समाजों की भावनाओं का सम्मान किया गया?

इन सवालों के जवाब अभी भी स्पष्ट नहीं हैं।

गंजपारा चौक का नाम चाहे जो भी हो, शहर की जनता निष्पक्ष और पारदर्शी शासन की अपेक्षा रखती है। यदि निर्णय प्रक्रिया स्पष्ट और सर्वसम्मति से हो, तो विवाद की गुंजाइश कम होती है। लेकिन यदि जल्दबाजी और प्रभाव का आरोप लगे, तो चर्चा का बाजार गर्म होना स्वाभाविक है।

अब देखना होगा कि शहरी सरकार इन उठते सवालों का जवाब कैसे देती है—और क्या निष्पक्षता की कसौटी पर स्वयं को सिद्ध कर पाती है, या यह प्रकरण भी राजनीतिक गलियारों में एक और बहस बनकर रह जाएगा।

रायपुर। छत्तीसगढ़ की परती भूमि अब सोना उगलने लगी है। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस राज्य में किसानों का रुझान राई-सरसों की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इससे न केवल किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिलना शुरू हुई है, बल्कि देश को खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने की राह भी आसान होती नजर आ रही है। बता दें कि यहां के किसान धान कटाई के बाद खेतों को खाली छोड़ देते हैं, यानी रबी फसल की बुवाई नहीं करते हैं।
इस कारण उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। किसानों के इन हालातों को देखते हुए आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, रायपुर ने ठोस रोडमैप के साथ प्रयास शुरू किए। परिणामस्वरूप परती भूमि पर अब सरसों की फसल लहलहाने लगी है। संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि राज्य की भूमि में खजाना छिपा हुआ है। यदि किसान धान कटाई के बाद देर से पकने वाली राई-सरसों किस्मों की बुवाई करें तो उनकी आर्थिक स्थिति में असम के किसानों के समान बदलाव देखने को मिल सकता है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में कुल कृषि क्षेत्र 4.78 मिलियन हेक्टेयर है। इसमें केवल 23 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है। वार्षिक वर्षा लगभग 1190 मिमी है, जिसमें लगभग 88 प्रतिशत वर्षा मानसून (मध्य जून से सितंबर) के दौरान होती है। इस दौरान किसान धान का बड़े पैमाने पर उत्पादन लेते हैं। वहीं रबी में गेहूं और थोड़े क्षेत्रफल में दलहनों की बुवाई करते हैं, लेकिन राई-सरसों का उत्पादन हाशिए पर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि परती भूमि, बस्तर के पठारी और उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में राई-सरसों की खेती की अच्छी संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि संस्थान का यह शुरुआती प्रयास है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
उन्होंने बताया कि धान कटाई के बाद कृषि भूमि परती रह जाती है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता और किसानों की आय बढ़ाने के अवसर सीमित हो जाते हैं। राई-सरसों की फसल परती भूमि को उत्पादक बनाने में मददगार बन सकती है।
परती भूमि की चुनौती
छत्तीसगढ़ में लगभग 3.9 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है, जबकि धान उत्पादन लगभग 9.8 मिलियन टन है। खरीफ में अधिक वर्षा और चिकनी मिट्टी के कारण धान का उत्पादन भरपूर होता है, लेकिन रबी में यही खेती सीमित रह जाती है। धान के कुल क्षेत्र का लगभग 32 प्रतिशत भाग ही सिंचित है, जिससे कटाई के बाद पठारी और पहाड़ी क्षेत्रों के लगभग 40–60 प्रतिशत खेत परती रह जाते हैं। इस स्थिति में राई-सरसों का बुवाई क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।
31 हजार हेक्टेयर में खेती
संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने बताया कि यहां की जलवायु रबी तिलहन के लिए अनुकूल है, बशर्ते खरीफ के बाद मृदा में नमी का संरक्षण और उचित कृषि तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया जाए। क्योंकि राई-सरसों को कम पानी में उगाया जा सकता है और यह कम समय में पक जाती है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में महज 31 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सरसों की खेती होती है। करीब 17,260 टन उत्पादन और उत्पादकता 563 किग्रा प्रति हेक्टेयर है, जिसे वैज्ञानिक तकनीकों के समावेश से और बढ़ाया जा सकता है।
20 प्रतिशत ज्यादा उपज
उन्होंने बताया कि अनुसंधान परीक्षण के आधार पर धान के परती खेतों में राई-सरसों की अच्छी पैदावार मिलती है। इस फसल की लगभग 20 प्रतिशत अधिक पैदावार प्राप्त हुई है। प्रदर्शन के दौरान सरसों की किस्म डीआरएमआर-150-35 ने उत्साहजनक परिणाम दिए। यह किस्म 95–110 दिनों में पक जाती है, जिससे धान की कटाई के बाद मध्य नवंबर से दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक इसकी बुवाई सहजता से की जा सकती है। इसके अलावा किसान छत्तीसगढ़ सरसों, टीबीएम, एनआरसीएचबी-101 और बीबीएम-1 जैसी किस्मों का उपयोग कर सकते हैं।
किसानों को आजीविका सुरक्षा
धान परती क्षेत्रों में राई-सरसों को शामिल करने से किसानों की आय और आजीविका सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार संभव है। वर्षा आधारित धान पारिस्थितिकी तंत्र में किए गए प्रदर्शनों से यह सिद्ध हुआ है कि शून्य जुताई के तहत राई-सरसों से 8–14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। इससे प्रति हेक्टेयर 27 हजार रुपये से अधिक का शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। साथ ही सरसों के साथ मधुमक्खी पालन करके किसान अपनी आमदनी को और भी बढ़ा सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में राई-सरसों की खेती किसानों को त्रिस्तरीय लाभ दे सकती है, जिसमें आय वृद्धि, परती भूमि का उपयोग और खाद्य तेल उत्पादन में बढ़ोतरी शामिल है। इस फसल से राज्य के कृषि परिदृश्य को बदला जा सकता है। इस फसल पर अनुसंधान के काफी उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं।

डॉ. पी.के. राय, निदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद –राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान

 

लेख / 
भारत जब 2047 में अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है, तब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने महिला-नेतृत्वित विकास को राष्ट्रीय प्रगति का केंद्र बिंदु बनाया है। महिलाओं की समावेशी आर्थिक वृद्धि में निर्णायक भूमिका को स्वीकार करते हुए सरकार ने ऐसा सुरक्षित, सम्मानजनक और संवेदनशील कार्य वातावरण तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया है, जिससे महिलाएं आत्मविश्वास के साथ कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ सकें। इसी दिशा में कार्यस्थल पर महिलाओं का उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ के रूप में कार्य करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बीते एक दशक में महिला सशक्तिकरण को केवल एक नारा नहीं, बल्कि नीति, संरचना और प्रभावी क्रियान्वयन का विषय बनाया है। “नारी शक्ति” को राष्ट्र की उन्नति का आधार मानते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में व्यापक संस्थागत सुधार किए गए हैं। इसी दूरदर्शी दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक उदाहरण है महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा वर्ष 2017 में प्रारंभ किया गया SHe-Box पोर्टल, जो कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और न्याय तक सहज पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक सशक्त डिजिटल मंच के रूप में उभरा है।

आज भारत में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी लगातार बढ़ रही है। महिला श्रम बल भागीदारी दर 2017-18 में 23.3% से बढ़कर 2023-24 में 41.7% हो गई। सरकारी और निजी क्षेत्रों के साथ-साथ स्टार्टअप्स, सेवा क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य और असंगठित क्षेत्रों में भी महिलाएँ बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि कार्यस्थल सुरक्षित, सम्मानजनक और भय-मुक्त हों। कार्यस्थल पर महिलाओं का उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act) इसी उद्देश्य से बनाया गया था। मोदी सरकार ने कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए डिजिटल गवर्नेंस के तहत SHe-Box पोर्टल को 29 अगस्त 2024 को तकनीकी सुधारों के साथ पुनः लॉन्च किया, जिससे यह अधिक उपयोगकर्ता-अनुकूल और पारदर्शी बन सके।

यह पोर्टल देशभर में गठित आंतरिक समितियों (Internal Committees – IC) और स्थानीय समितियों (Local Committees – LC) से संबंधित सूचनाओं का एक केंद्रीकृत भंडार (Central Repository) प्रदान करता है।

SHe-Box पोर्टल का उन्नत संस्करण महिलाओं को सीधे संबंधित IC या LC के पास शिकायत दर्ज करने की सुविधा देता है। इससे शिकायत प्रक्रिया में होने वाली देरी और अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप में कमी आती है। शिकायतकर्ता अपनी शिकायत की स्थिति को ऑनलाइन ट्रैक भी कर सकती हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मंच सरकारी या निजी, संगठित या असंगठित - हर क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं के लिए समान रूप से सुलभ है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मोदी सरकार की महिला सुरक्षा की नीति किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि समावेशी है।

प्रधानमंत्री मोदी के “डिजिटल इंडिया” विज़न के अनुरूप, SHe-Box महिलाओं को सुरक्षित, सरल और गोपनीय तरीके से शिकायत दर्ज करने और उसकी प्रगति ट्रैक करने की सुविधा देता है। पोर्टल पर दर्ज की गई शिकायत सीधे संबंधित कार्यस्थल की आंतरिक समिति या जिले की स्थानीय समिति तक पहुँचती है। गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए यह व्यवस्था की गई है कि आंतरिक समिति की अध्यक्ष के अलावा कोई अन्य व्यक्ति शिकायत का विवरण नहीं देख सकता, जिससे पीड़िता की पहचान सुरक्षित रहती है।

POSH Act के तहत सरकार का दायित्व है कि वह शिकायतों से संबंधित आंकड़ों का संधारण और निगरानी करे। इस अधिनियम के अंतर्गत किसी भी शिकायत की जाँच के लिए 90 दिनों की समय-सीमा निर्धारित की गई है, जिसका पालन सुनिश्चित करने में SHe-Box पोर्टल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समयबद्ध निपटारे को सुनिश्चित करने के लिए मंत्रालय द्वारा डैशबोर्ड अलर्ट, ईमेल और मेसेज के माध्यम से नियमित रिमाइंडर भेजे जा रहे हैं। यह सक्रिय प्रणाली मोदी सरकार की उत्तरदायित्व और परिणाम आधारित शासन की सोच को दर्शाती है।

SHe-Box की प्रभावशीलता में नोडल अधिकारियों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक कार्यस्थल पर नियुक्त नोडल अधिकारी, नियोक्ता, आंतरिक/स्थानीय समिति और शिकायतकर्ता के बीच समन्वय स्थापित करते हैं। यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि शिकायतें केवल दर्ज न हों, बल्कि उन पर समय पर और नियमानुसार कार्रवाई भी हो।

महिला-केंद्रित नीतियों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो आज देश में 10 करोड़ से अधिक महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं, और लखपति दीदी जैसी पहल के माध्यम से लाखों महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। वहीं नमो ड्रोन दीदी जैसी अभिनव योजनाएँ महिलाओं को आधुनिक तकनीक, कृषि सेवाओं और उद्यमिता से जोड़ते हुए उन्हें नए और औपचारिक कार्यक्षेत्रों में प्रवेश का अवसर दे रही हैं। ऐसे में जब बड़ी संख्या में महिलाएँ पहली बार संगठित और औपचारिक कार्यस्थलों का हिस्सा बन रही हैं, SHe-Box जैसे प्लेटफॉर्म उन्हें यह भरोसा देते हैं कि सरकार उनके साथ खड़ी है - न केवल कानून बनाकर, बल्कि उसे ज़मीन पर प्रभावी और जवाबदेह ढंग से लागू करके।

बहुभाषी समर्थन, रीयल-टाइम ट्रैकिंग और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से SHe-Box पोर्टल कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा को केवल एक कानूनी प्रावधान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे एक व्यवस्थित, भरोसेमंद और जवाबदेह संस्थागत ढांचे में परिवर्तित करता है।

SHe-Box वास्तव में एक दूरदर्शी विज़न का सशक्त प्रतिबिंब है, जहाँ नारी शक्ति को भय से मुक्त कर, सम्मान और आत्मविश्वास के साथ कार्यस्थलों में आगे बढ़ने का अवसर दिया जा रहा है, ताकि महिलाएँ अपनी पूरी क्षमता के साथ विकसित भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकें।

सावित्री ठाकुर
(लेखक महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री, भारत सरकार, हैं)

 

 लेखक -डॉ. दीपक जायसवाल


          पीढ़ियों से, भारत के श्रमिकों ने एक पुरानी और टुकड़ों में बंटी श्रम प्रणाली का बोझ उठाया है, जो अक्सर उनके वेतन, सुरक्षा और कार्यस्थल पर गरिमा की रक्षा करने में विफल रही है। असंगठित, संविदा और उभरते गिग क्षेत्रों के करोड़ों श्रमिक नीति-परिदृश्य में अदृश्य रहे हैं और बुनियादी सामाजिक सुरक्षा से वंचित रहे हैं। चार श्रम संहिताएँ इन ऐतिहासिक अन्यायों का सुधार करने के लिए लंबे समय से प्रतीक्षित प्रयास का प्रतिनिधित्व करती हैं। लगभग तीन दर्जन अलग-अलग कानूनों को एक सुसंगत, एकल ढांचे में लाकर, ये संहिताएँ न्यायसंगत वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल और उन लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करती हैं, जो लंबे समय से वंचित रहे हैं। वर्षों के परामर्श और बहस के बाद इनका कार्यान्वयन, श्रमिकों के अधिकारों को मजबूत करने तथा अधिक स्थिर और मानवतापूर्ण रोजगार वातावरण बनाने में निर्णायक क्षण का प्रतीक है।

एक जिम्मेदार ट्रेड यूनियन संगठन के रूप में, भारतीय ट्रेड यूनियनों का राष्ट्रीय मोर्चा (एनएफआईटीयू), कामगारों की दीर्घकालिक भलाई, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। मोर्चा दृढ़ता से मानता है कि 12 फरवरी को श्रम संहिताओं के खिलाफ हड़ताल में भाग लेना न तो आवश्यक है और न ही वर्तमान समय में श्रमिक वर्ग के सर्वोत्तम हित में है।

श्रम संहिताएं कोई अचानक या एकतरफा हस्तक्षेप नहीं हैं। ये दो दशकों से अधिक समय तक चली सुधार प्रक्रिया का परिणाम हैं। 29 अलग-अलग श्रम कानूनों को चार व्यापक संहिताओं में समेकित करने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी, ताकि अनुपालन को सरल बनाया जा सके, अस्पष्टता को कम किया जा सके तथा कार्य और रोजगार की बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप भारत की श्रम रूपरेखा को आधुनिक बनाया जा सके।

श्रम संहिताओं को पूरी तरह खारिज करना उन मौलिक लाभों की उपेक्षा करता है, जो वे श्रमिकों को प्रदान करने का प्रयास करती हैं। वेतन संहिता सार्वभौमिक न्यूनतम वेतन कवरेज और समय पर वेतन भुगतान सुनिश्चित करती है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में लंबे समय से मौजूद वेतन सुरक्षा के अंतर को दूर किया जा सकता है। सामाजिक सुरक्षा संहिता, पहली बार, असंगठित, संविदा, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा की विधायी रूपरेखा तैयार करती है। इन श्रमिकों की संख्या लगभग 40 करोड़ है और पहले ये श्रमिक औपचारिक सुरक्षा व्यवस्था से बाहर थे। ये प्रावधान भारत में श्रमिकों के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा कवरेज का ऐतिहासिक विस्तार प्रस्तुत करते हैं।

औद्योगिक संबंध संहिता तथा पेशे से जुड़ी सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-परिस्थिति संहिता का उद्देश्य औद्योगिक सद्भाव, तेज विवाद निवारण और सुरक्षित, स्वस्थ व अधिक सम्मानजनक कार्यस्थलों को बढ़ावा देना है। कुछ प्रावधानों को लेकर चिंताएँ हो सकती हैं, अनुभव बताते हैं कि व्यापक विरोध और हड़तालों से शायद ही रचनात्मक परिणाम मिलते हैं। संवाद, नियम-आधारित सुधार और मुद्दा-विशेष पर चर्चा के जरिये श्रमिकों के हित बेहतर तरीके से पूरे किये जा सकते हैं, बजाय इसके कि आपस में टकराव हो, जिससे पारिश्रमिक हानि, उत्पादन में रुकावट और रोजगार असुरक्षा का जोखिम पैदा होता है—विशेष रूप से श्रम बल के सबसे कमजोर वर्गों के लिए।

यह दावा करना भी गलत है कि श्रम संहिताएँ बिना परामर्श के लागू की गई हैं। सुधार प्रक्रिया में त्रिपक्षीय चर्चाओं के कई दौर, संसद की स्थायी समितियों में विचार-विमर्श और विभिन्न हितधारकों के साथ संवाद शामिल थे। एक लोकतांत्रिक प्रणाली में, मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन इन्हें बातचीत और संस्थागत संवाद के माध्यम से हल किया जाना चाहिए, न कि उन व्यवधानों के द्वारा जो अंततः स्वयं श्रमिकों को ही नुकसान पहुंचाते हैं।

जब भारतीय अर्थव्यवस्था संरचनात्मक रूपांतरण के दौर से गुजर रही है और राष्ट्र विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है, श्रमिक संघों को विघटन के बजाय जिम्मेदार कार्रवाई का चयन करना चाहिए। हमारी भूमिका केवल सुधारों का विरोध करना नहीं है, बल्कि उन्हें इस तरह आकार देना है कि श्रमिकों के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल पर गरिमा को प्रभावी क्रियान्वयन और सतत सुधार के माध्यम से व्यावहारिक तौर पर मजबूत किया जा सके।

श्रमिक संघों की वास्तविक जिम्मेदारी केवल विरोध करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि मजदूरों को वास्तविक रूप में जमीनी स्तर पर लाभ हो। अब ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि श्रम संहिताओं को न्यायपूर्ण तरीके से लागू किया जाए और इन्हें हर उस मजदूर तक पहुँचाया जाए, जिसे सुरक्षा की आवश्यकता है। हड़ताल की बजाय संवाद, सहयोग और निरंतर सुधार चुनकर, श्रमिक संघ एक ऐसा प्रणाली बनाने में मदद कर सकते हैं, जो श्रमिकों के लिए नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और गरिमा प्रदान करती हो और साथ ही 2047 तक विकसित भारत की ओर देश की यात्रा का भी समर्थन करती हो।
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(लेखक, भारतीय ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रीय मोर्चा (एनएफआईटीयू) के अध्यक्ष हैं)

साभार - लेखक सौरभ गर्ग

महंगाई देश के सबसे अहम आर्थिक संकेतकों में से एक है, जिसे आम लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सीधे महसूस करते हैं, जैसे घर का राशन, किराया और पेट्रोल-डीज़ल के खर्च में बढ़ोतरी से।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) इसी महंगाई को मापता है। यह उन चीज़ों और सेवाओं के दाम देखता है, जिनका इस्तेमाल आम परिवार रोज़ करता है। सरल शब्दों में, सीपीआई आम आदमी की ज़िंदगी का आईना है। यह बताता है कि थाली में खाने का खर्च कितना बढ़ा, घर का किराया कितना हुआ, और काम पर जाने के लिए ईंधन कितना महंगा हुआ।

सीपीआई भले ही एक आंकड़ा लगता हो, लेकिन यह सरकार को यह समझने में मदद करता है कि लोगों पर महंगाई का असली असर क्या है। इसी आधार पर वेतन, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े फैसले किए जाते हैं, ताकि ज़रूरी चीज़ें आम लोगों की पहुंच में बनी रहें।

भारतीय रिज़र्व बैंक भी ब्याज दर और महंगाई को नियंत्रित करने जैसे फैसलों के लिए सीपीआई आधारित महंगाई को ही सबसे मुख्य पैमाना मानता है। इसलिए जब सीपीआई ज़मीन की हकीकत सही तरीके से दिखाता है, तब सरकार और आरबीआई की नीतियाँ भी लोगों की असली परेशानियों के अनुसार बेहतर बन पाती हैं।

महंगाई सिर्फ दाम बढ़ने का नाम नहीं है, बल्कि यह भी है कि दामों में बदलाव से घर के बजट पर कितना असर पड़ता है। इसलिए जितना ज़रूरी दामों को मापना है, उतना ही ज़रूरी यह भी है कि महंगाई का सूचकांक लोगों की आज की खर्च करने की आदतों को सही तरीके से दिखाए। इसी संदर्भ में भारत में सीपीआई के आधार वर्ष को 2012 से बदलकर 2024 किया जा रहा है।

पिछली बार आधार बदले जाने के बाद देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बदलाव आया है। शहरों की आबादी बढ़ी है, सेवाओं का क्षेत्र बढ़ा है, डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण खरीदारी का तरीका बदला है और घरों का खर्च अब कई नई चीजों पर होने लगा है।

इसीलिए नया सीपीआई 2024 तैयार करने में 2023-24 के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।
समय के साथ लोगों की ज़रूरतें और खर्च बदलते हैं, इसलिए सीपीआई में अलग-अलग वस्तुओं और सेवाओं को दी जाने वाली अहमियत भी बदली गई है। जिन चीजों पर अब परिवार ज़्यादा खर्च करते हैं, उन्हें सीपीआई में ज़्यादा महत्व दिया गया है,
और जिन पर खर्च कम हो गया है, उन्हें कम महत्व दिया गया है।

इससे सीपीआई वही महंगाई दिखाता है, जो सच में आम परिवार के बजट को प्रभावित करती है। साथ ही, उपभोग की टोकरी (कंजम्पशन बास्केट) को भी बदला गया है, ताकि सेवाओं पर बढ़ते खर्च जैसे नए रुझान दिखाई दे सकें, जो बढ़ती आय और बदलती जीवनशैली की वजह से बढ़ रहे हैं। सीपीआई को मापने का तरीका अपडेट करना भी उतना ही ज़रूरी है, जितना यह तय करना कि उसमें क्या-क्या शामिल किया जाए।

नया संशोधित सीपीआई अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के ज्यादा करीब है, लेकिन इसमें भारत से जुड़ी खास बातें भी बनी हुई हैं। इससे भारत की महंगाई की तुलना दूसरे देशों से करना आसान हो जाता है।

आम परिवार के लिए इसका मतलब यह है कि सरकार और नीति बनाने वाले लोग यह बेहतर समझ पाते हैं कि भारत में दामों में होने वाला बदलाव दुनिया के हालात से कैसे जुड़ा है, और साथ ही यह भी ध्यान रहता है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ रहा है।

सीपीआई के लिए आंकड़े जुटाने का तरीका भी अब लोगों की बदलती खरीदारी और खर्च की आदतों के अनुसार बेहतर बनाया गया है। जहां पहले की तरह बाजारों से दाम इकट्ठा किए जाते रहेंगे, खासकर खाने-पीने और ज़रूरी चीज़ों के, वहीं 2024 के नए ढांचे में अब कुछ सेवाओं के ऑनलाइन दाम भी शामिल किए जा रहे हैं। जैसे मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं, हवाई टिकट और कुछ अन्य सेवाओं के दाम अब ऑनलाइन स्रोतों से भी लिए जाएंगे।

नई सीपीआई श्रृंखला में अब कंप्यूटर की मदद से दाम इकट्ठा किए जा रहे हैं। इससे हाथ से होने वाली गलतियाँ कम हुई हैं और तुरंत जाँच भी हो जाती है। इससे दामों से जुड़े आंकड़ों की गुणवत्ता और समय पर उपलब्धता दोनों बेहतर हुई हैं। सीपीआई के आंकड़े सही और समय पर मिलना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इसी के आधार पर ऐसे फैसले होते हैं, जो सीधे आम आदमी की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं, जैसे कर्ज कितना महंगा होगा, बचत पर कितना ब्याज मिलेगा, और बढ़ती महंगाई से घर का बजट कैसे प्रभावित होगा।

नए आधार वर्ष की सीपीआई में अब कई मामलों में सरकारी स्रोतों से मिलने वाले आधिकारिक आंकड़ों का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे रेल किराया, डाक शुल्क, ईंधन के दाम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बिकने वाली चीजें। इससे इन दामों को पहले से ज्यादा सही तरीके से दर्ज किया जा रहा है और बाजार सर्वे में होने वाली गलती या पक्षपात की संभावना भी कम हो जाती है।

अब सर्वे के आंकड़े, सरकारी रिकॉर्ड और डिजिटल माध्यमों से मिलने वाले दाम, तीनों को मिलाकर सीपीआई तैयार की जा रही है। यह पुरानी व्यवस्था की तुलना में बड़ा सुधार है और इससे दामों में होने वाले बदलाव की ज्यादा भरोसेमंद तस्वीर मिलती है।

इतने बड़े स्तर पर सीपीआई के आधार वर्ष में बदलाव करना एक बहुत बड़ा संस्थागत प्रयास होता है। इसमें देश भर के फील्ड दफ्तरों, सांख्यिकी विभागों और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ संस्थाओं के बीच तालमेल जरूरी होता है। इस पूरी प्रक्रिया में मेथडोलॉजी की गहराई से जाँच की जाती है, अलग-अलग विकल्पों को परखा जाता है और अर्थशास्त्रियों व विषय-विशेषज्ञों से सलाह ली जाती है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने विशेषज्ञ समूहों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अन्य संबंधित पक्षों से बातचीत की है, ताकि किए गए बदलाव साफ, समझने में आसान और वैज्ञानिक रूप से सही हों।

टोकरी, वेटेज और आंकड़ों के स्रोत बदलने के बाद भी सीपीआई का मूल उद्देश्य वही रहता है-यानी एक परिवार की नज़र से दामों में होने वाले बदलाव को दिखाना। यह निरंतरता इसलिए ज़रूरी है, ताकि हम समय के साथ महंगाई की तुलना कर सकें।

सीधे शब्दों में, सीपीआई को बेहतर बनाया जा रहा है, लेकिन उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़कर ही रखा गया है, ताकि वह नीति बनाने वालों के लिए एक भरोसेमंद मार्गदर्शक बना रहे।सीपीआई हमें यह याद दिलाता है कि हर आंकड़े के पीछे करोड़ों लोगों की असली ज़िंदगी छिपी होती है। आखिरकार, आंकड़े लोगों के लिए ही होते हैं। यह चुपचाप यह दिखाता है कि दामों में बदलाव हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को कैसे प्रभावित करता है और सरकार की नीतियों को दिशा देता है।

आधार वर्ष में चल रहे संशोधन के ज़रिये सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने यह सुनिश्चित किया है कि सीपीआई सही, समय के अनुसार अपडेट और लंबे समय तक एक-जैसे तरीके से मापा गया रहे। ताकि सीपीआई सिर्फ एक संख्या न होकर, पूरे देश के लोगों की असली ज़िंदगी की सच्चाई दिखाने वाला आईना बना रहे।


(लेखक सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव हैं, यह उनके निजी विचार हैं)

संपादकीय |( शरद पंसारी )

व्यापार केवल आयात–निर्यात का खेल नहीं होता, वह राष्ट्रों की रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक हैसियत और भविष्य की दिशा तय करता है।
3 फरवरी 2026 को अमेरिका और भारत के बीच हुआ नया व्यापार समझौता इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब 2025 में लगाए गए 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय निर्यात की रीढ़ तोड़ दी थी। उस पृष्ठभूमि में 18 प्रतिशत पर पहुँचना निश्चित रूप से राहत है—लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भारत की जीत है, या हालात के आगे झुककर निकाला गया रास्ता?


राहत को जीत कह देना जल्दबाज़ी होगी

इस समझौते के बाद अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत का दंडात्मक शुल्क पूरी तरह हट गया है और पारस्परिक टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत रह गया है।
कपड़ा, रत्न-आभूषण, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए यह जीवनदान से कम नहीं।

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि
2024 तक यही टैरिफ मात्र 3 प्रतिशत के आसपास था।
इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत आज भी उस स्थिति से नीचे खड़ा है, जहाँ वह दो साल पहले था।


व्यापार युद्ध से बाहर निकलना—यही असली उपलब्धि

संपादकीय दृष्टि से इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि टैरिफ 18 प्रतिशत हुआ,
बल्कि यह है कि भारत 50 प्रतिशत के दंडात्मक व्यापार युद्ध से बाहर निकल पाया

2025 में अमेरिकी प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब व्यापार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुका है।
ऐसे माहौल में भारत का समझौते की मेज़ पर लौटना एक व्यावहारिक निर्णय था।


जहाँ भारत मजबूत हुआ

यह समझौता भारत को एक ऐसे लाभकारी मोड़ पर ले आया है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती—

  • चीन पर आज भी 30–35% या उससे अधिक अमेरिकी टैरिफ लागू है

  • वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों पर लगभग 20% शुल्क है

  • जबकि भारत अब 18% पर है

यह स्थिति भारतीय निर्यात को अमेरिकी बाज़ार में स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देती है।
यह बढ़त 2024 में भारत के पास नहीं थी।


लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ी है

हर समझौते की एक कीमत होती है—और यह डील भी अपवाद नहीं।

भारत ने:

  • रूसी तेल की खरीद धीरे-धीरे बंद करने

  • अमेरिकी LNG और तकनीक के आयात बढ़ाने

  • तथा लगभग 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता ली है

यह सब भारत की ऊर्जा लागत और व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ा सकता है।
सस्ती ऊर्जा छोड़कर महँगे विकल्प अपनाना, अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।


रणनीतिक प्रश्न यहीं से शुरू होता है

यह समझौता भारत की उस रणनीतिक स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े करता है,
जिस पर वह लंबे समय से गर्व करता आया है।

क्या वैश्विक दबावों के सामने भारत को बार-बार आर्थिक रियायतें देनी पड़ेंगी?
और क्या भविष्य में व्यापारिक फैसले विदेश नीति के दबाव में लिए जाते रहेंगे?

इन सवालों के उत्तर आसान नहीं हैं।


निष्कर्ष: न पराजय, न पूर्ण विजय—एक परिपक्व समझौता

यह कहना गलत होगा कि भारत इस समझौते में हार गया।
यह कहना भी सच नहीं होगा कि भारत ने सब कुछ जीत लिया।

सच्चाई यह है कि—

भारत ने टकराव के दौर से निकलकर समझौते का रास्ता चुना है।

यह रास्ता महँगा है, समझौतों से भरा है,
लेकिन वैश्विक व्यापार की वर्तमान वास्तविकताओं में
शायद यही सबसे व्यावहारिक विकल्प भी था।

अब चुनौती यह है कि भारत इस मिली हुई प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को
निर्यात विस्तार, घरेलू उद्योग संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा में बदल पाए—
वरना यह समझौता केवल राहत बनकर रह जाएगा, उपलब्धि नहीं।

 

lwriter - श्री पंकज जोशी

कुशल शासन की दिशा में भारत की यात्रा अक्सर एक विशाल संघीय ढांचे के तहत कार्यान्वयन से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों को रेखांकित करती है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 2015 में स्थापित ‘प्रगति’ [सक्रिय शासन और समयबद्ध कार्यान्वयन (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन)] नामक पहल, नौकरशाही की पेचीदगियों को दूर करने के एक शक्तिशाली तंत्र के रूप में कार्य करती है। एक ओर जहां यह विभिन्न राष्ट्रीय परियोजनाओं को गति प्रदान करती है, वहीं इसका प्रभाव शायद राज्य स्तर पर सबसे अधिक स्पष्ट होता है। आर्थिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण विशिष्ट क्षेत्रीय परियोजनाओं की सटीक निगरानी राज्य स्तर पर की जाती है। गुजरात में, ‘प्रगति’ के तहत की गई समीक्षाओं ने बुनियादी ढांचे, ऊर्जा तथा सामाजिक कल्याण से जुड़ी प्रमुख परियोजनाओं में आने वाली अड़चनों को व्यवस्थित रूप से दूर किया है और सहकारी संघवाद के एक मजबूत मॉडल को मूर्त रूप दिया है।
‘प्रगति’ ने न सिर्फ समीक्षा के एक मंच, बल्कि एक पूर्वानुमानित शासन के रूप में भी कार्य किया है। महीने की शुरुआत में अग्रिम रूप से एजेंडा का वितरण राज्य के संबंधित विभागों, जिला प्रशासन और कार्यान्वयन एजेंसियों की केन्द्रित भागीदारी को बढ़ावा देने में सहायक रहा। सक्रिय अनुवर्ती कार्रवाई के परिणामस्वरूप, ‘प्रगति’ की निर्धारित बैठकों से पहले ही कई समस्याओं का निराकरण हो गया। लिहाजा, ऐसे एजेंडा मदों को अंतिम समीक्षा से हटा दिया गया। यह उच्चस्तरीय हस्तक्षेप से पहले ही राज्य स्तर पर उनके समाधान को दर्शाता है।
राज्य-आधारित तेजी हेतु एक डिजिटल समन्वय

‘प्रगति’ की सफलता का मूल राज्य और केन्द्रीय प्रशासन के शीर्ष स्तरों को जवाबदेही-आधारित एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की इसकी क्षमता में निहित है। हर महीने, यह इंटरफ़ेस उन परियोजनाओं की विस्तृत समीक्षा को संभव बनाता है जो अंतर-विभागीय मतभेदों या भूमि अधिग्रहण संबंधी अड़चनों की वजह से रुक सकती हैं।
रणनीतिक विकास हेतु विभागीय सीमाओं को तोड़ना: दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारा (डीएमआईसी)

डीएमआईसी को सीधे प्रधानमंत्री की समीक्षा के अधीन रखकर, ‘प्रगति’ ने धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण, विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों और निजी हितधारकों से जुड़ी समस्याओं पर वास्तविक समय में चर्चा किया जाना सुनिश्चित किया। इस प्रक्रिया ने निर्णय लेने की कवायद को गति दी, नौकरशाही में व्याप्त लालफीताशाही को कम किया और सभी संबंधित पक्षों को स्पष्ट व समयबद्ध दिशा-निर्देश प्रदान किए, जिससे भारत के औद्योगिक भविष्य की बुनियाद मानी जाने वाली इस परियोजना को गति मिली।
‘प्रगति’ के तहत होने वाली समीक्षाओं ने धोलेरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और अहमदाबाद-धोलेरा एक्सप्रेसवे के बुनियादी ढांचे के समयबद्ध विकास को सुनिश्चित किया है। यह 109 किलोमीटर लंबी एक महत्वपूर्ण ग्रीनफील्ड परियोजना है, जिसे अहमदाबाद को धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (एसआईआर) से जोड़ने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया है। सेमीकंडक्टर निर्माण संयंत्र हेतु कुल 91,000 करोड़ रुपये के मुख्य परियोजना निवेश के साथ, यह इलाका भारत का सेमीकंडक्टर हब बनने के लिए तैयार है और यहां देश के पहले स्वदेशी चिप्स का उत्पादन होगा। इस राज्य की सीमाओं के भीतर संचालित होने वाली ऐसी उच्च-मूल्य वाली केन्द्रीय परियोजनाएं उस ‘प्रगति’ तंत्र का हिस्सा बनने की आदर्श हकदार हैं, जो राज्य के कार्यान्वयन और राष्ट्रीय दृष्टिकोण के बीच तालमेल सुनिश्चित करती हैं।
गुजरात की हरित ऊर्जा क्रांति को गति

गुजरात नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी है और ‘प्रगति’ इसकी विशाल क्षमता को मूर्त रूप देने में अहम भूमिका निभा रही है। बड़े पैमाने की विविध सौर एवं पवन परियोजनाएं इस लक्ष्य को रेखांकित करती हैं। कुल 1200 मेगावाट क्षमता वाली खावड़ा सौर पीवी परियोजना (6284 करोड़ रुपये) और 1255 मेगावाट क्षमता वाली खावड़ा सौर पीवी परियोजना (7180 करोड़ रुपये) इस पहल की प्रमुख घटक हैं। कुल 300 मेगावाट क्षमता वाली भुज सौर पीवी परियोजना (1443 करोड़ रुपये) और खावड़ा नवीकरणीय ऊर्जा पार्क से अतिरिक्त 7 गीगावाट बिजली की निकासी से संबंधित पारेषण प्रणाली (4231 करोड़ रुपये) की भी समीक्षा की गई। इस समीक्षा में ऊर्जा, राजस्व और वन एवं पर्यावरण विभागों ने भाग लिया।
इस प्लेटफॉर्म की व्यवस्थित निगरानी प्रणाली राज्य के विभिन्न विभागों और केन्द्रीय संस्थाओं के बीच निर्बाध समन्वय सुनिश्चित करती है, जोकि भूमि और पर्यावरण संबंधी जटिल मंजूरियों की जरूरत वाली परियोजनाओं के लिए बेहद अहम है।
सरदार सरोवर कमान क्षेत्र के विकास को सुव्यवस्थित करना

सरदार सरोवर परियोजना (एसएसपी) और व्यापक राष्ट्रीय सिंचाई परियोजनाओं के संदर्भ में, माननीय प्रधानमंत्री द्वारा ‘प्रगति’ के तहत की गई समीक्षा पारंपरिक बाढ़ सिंचाई से हटकर सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों की दिशा में बदलाव में निर्णायक कारक साबित हुई है। ‘प्रगति’ के नीति निर्देशों के अनुसार, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का परियोजना अनुमोदन और वित्तपोषण अनिवार्य कर दिया गया। साथ ही, सरदार सरोवर परियोजना, जिसे जल संकट को दूर करने में इसकी भूमिका के कारण अक्सर गुजरात की जीवनरेखा कहा जाता है, ने ‘प्रगति’ के तहत होने वाली समीक्षाओं के परिणामस्वरूप भूमिगत पाइपलाइन (यूजीपीएल) प्रणाली को अपनाया। पारंपरिक खुली नहरों से हटकर हुए इस बदलाव का उद्देश्य जल संरक्षण, भूमि विखंडन को कम करने और निर्माण में लगने वाले समय को घटाकर दक्षता एवं जलापूर्ति को बेहतर बनाना था।
बुनियादी ढांचे से परे: सामाजिक दायित्व

‘प्रगति’ का दायरा भौतिक बुनियादी ढांचे से कहीं आगे जाता है। यह पहल समाज कल्याण की प्रमुख योजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी करने और अंतिम छोर तक उनकी सुलभता सुनिश्चित करने में भी समान रूप से प्रभावी है।
* प्रधानमंत्री-आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम-अभीम): स्वास्थ्य संबंधी इस महत्वपूर्ण पहल की समयबद्ध और प्रभावी कवरेज सुनिश्चित करने हेतु निगरानी की गई। नागरिकों को मिलने वाले प्रमुख लाभ हैं: उन्नत आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम) के जरिए स्वास्थ्य सेवा तक बेहतर पहुंच; देखभाल की बेहतर गुणवत्ता; वित्तीय बोझ में कमी; आईटी-आधारित रोग निगरानी प्रणाली तथा प्रयोगशालाओं के नेटवर्क के विकास द्वारा महामारी से निपटने की बेहतर तैयारी एवं प्रतिक्रिया; व्यापक प्राथमिक देखभाल; और डिजिटल स्वास्थ्य एकीकरण।
* पीएम स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया (पीएमश्री): स्कूली अवसंरचना के आधुनिकीकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस योजना की प्रगति की समीक्षा ‘प्रगति’ के जरिए की जाती है। परिणामस्वरूप, गुजरात के 448 सरकारी स्कूलों में स्कूल अवसंरचना का तेजी से उन्नयन हो रहा है।
* “लखपति दीदी” योजना: ग्रामीण विकास के जरिए महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से शुरू की गई इस महत्वपूर्ण पहल की निगरानी भी ‘प्रगति’ प्लेटफॉर्म पर की जाती है। गुजरात में 6 लाख से अधिक लखपति दीदियों को कौशल विकास, वित्तीय समावेशन, डिजिटल साक्षरता और बाजार के संपर्क जैसे विभिन्न उपायों के जरिए स्थायी आय प्राप्त हो रही है।
शीर्ष स्तर पर इन योजनाओं की समीक्षा करके, ‘प्रगति’ जवाबदेही तय करती है और गुजरात के लक्षित लाभार्थियों को समय पर सरकारी सेवाएं सुलभ होना सुनिश्चित करती है।
गुजरात का सशक्तिकरण: प्रगति के जरिए भारत सरकार का परिवर्तनकारी समर्थन

राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति की सफलता के बाद, गुजरात सरकार ने शिकायतों एवं परियोजनाओं के प्रबंधन हेतु एक उन्नत प्रणाली के रूप में ‘स्वागत 2.0’ की शुरुआत की। यह ऑटो एस्केलेशन मैट्रिक्स से लैस है, जो महत्वपूर्ण बाधाओं से संबंधित ‘प्रगति’ की व्यवस्थित एस्केलेशन प्रणाली पर आधारित है। ‘प्रगति’ की परियोजना निगरानी संबंधी खूबियों से प्रेरित, संशोधित ‘स्वागत’ में अब समर्पित निगरानी और प्रदर्शन डैशबोर्ड शामिल हैं। ये डैशबोर्ड मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) को अधिकारियों की व्यक्तिगत कार्यकुशलता का आकलन करने और उन जिलों की पहचान करने में सक्षम बनाते हैं जहां बड़ी संख्या में अनसुलझी शिकायतें हैं। परियोजना संबंधी समीक्षाओं के जरिए प्रणालीगत सुधार लाने की ‘प्रगति’ की क्षमता की तरह, नई ‘स्वागत’ प्रणाली डैशबोर्ड डेटा का उपयोग करके बार-बार उभरने वाली उन समस्याओं की पहचान करती है जिनके लिए सिर्फ शिकायत समाधान के बजाय नीति-स्तर पर बदलाव की जरूरत होती है। ‘स्वागत 2.0’ के जरिए, गुजरात के मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से मासिक रूप से जटिल मामलों - जैसे आवास परियोजनाएं और बुनियादी ढांचे में देरी - की समीक्षा करते हैं और समाधान के लिए सख्त व समयबद्ध निर्देश जारी करते हैं, जो ‘प्रगति’ के “समयबद्ध कार्यान्वयन” के मूल उद्देश्य का अभिन्न अंग है।
गुजरात की उल्लेखनीय विकास यात्रा माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रदान किए गए दूरदर्शी समर्थन और सहयोगात्मक नेतृत्व का उत्कृष्ट प्रमाण है। ‘प्रगति’ नामक एक अग्रणी कदम के जरिए, केन्द्र सरकार ने इस राज्य को अमूल्य सहयोग प्रदान किया है। इससे इस राज्य को अपनी पूरी क्षमता का दोहन करने हेतु आवश्यक तकनीकी अवसंरचना और रणनीतिक मार्गदर्शन हासिल हुआ है।

(लेखक आईएएस (सेवानिवृत्त), जीईआरसी के अध्यक्ष/गुजरात के पूर्व मुख्य सचिव हैं)

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