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एनएसटीआई से मिलेगी कौशल को नई पहचान, 45 वर्ष की आयु सीमा से अनुभव को लाभ-मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में अवसरों का विस्तार
रायुपर / छत्तीसगढ़ की पहचान लंबे समय तक ‘धान के कटोरे’ के रूप में रही है। खेतों में लहलहाती फसलें प्रदेश की समृद्धि की कहानी कहती हैं, लेकिन बदलते समय के साथ छत्तीसगढ़ ने विकास की अपनी यात्रा में नए आयाम जोड़े हैं। अब कृषि के साथ उद्योग, तकनीक के साथ कौशल और रोजगार के साथ उद्यमिता भी प्रदेश की नई पहचान बन रही है। इस बदलाव की सबसे बड़ी ताकत प्रदेश के युवा और अनुभवी मानव संसाधन हैं।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद के हालिया निर्णय इसी सोच को आगे बढ़ाते दिखाई देते हैं। एक ओर नवा रायपुर अटल नगर में नेशनल स्किल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एनएसटीआई) की स्थापना होने से युवाओं को आधुनिक कौशल का मंच मिलेगा, वहीं दूसरी ओर विभिन्न शासकीय एवं संबद्ध संस्थाओं में कार्यरत वर्गों के लिए अधिकतम आयु सीमा 38 से बढ़ाकर 45 वर्ष किया जाना अनुभव और क्षमता को नए अवसर देने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय है।
सपनों को डिग्री के साथ हुनर भी चाहिए
आज का युवा केवल शिक्षा नहीं, रोजगारपरक कौशल चाहता है। उद्योगों की बदलती जरूरतों के बीच ज्ञान के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण का महत्व बढ़ गया है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ग्राम तेंदुवा में एनएसटीआई की स्थापना के लिए भारत सरकार के कौशल विकास एवं उद्यमशीलता निदेशालय को 10 एकड़ भूमि निःशुल्क आवंटित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है।
करीब 200 करोड़ रुपये की लागत से विकसित होने वाले इस संस्थान में आधुनिक शैक्षणिक, प्रशासनिक और छात्रावास सुविधाएं होंगी। यहां दीर्घकालीन पाठ्यक्रमों में हर वर्ष करीब एक हजार तथा अल्पकालीन कार्यक्रमों में लगभग तीन हजार प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण दिया जा सकेगा। हजारों युवाओं के सपनों से जुड़ा अवसर है। इससे कोई तकनीकी कौशल हासिल करेगा, कोई उद्योग से जुड़ेगा, तो कोई अपना उद्यम शुरू कर दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा करेगा।
कौशल से रोजगार और आत्मनिर्भरता की राह
एनएसटीआई की स्थापना होने से युवाओं को प्रशिक्षण के साथ बदलती तकनीक और उद्योग की जरूरतों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल होगी। आज कौशल केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने की क्षमता है। गांव और कस्बे के युवा को भी उद्यमशील बनने का अवसर मिलेगा। एक प्रशिक्षित युवा नौकरी तलाशने वाला बनने के साथ नौकरी देने वाला उद्यमी भी बन सकता है। यही कौशल से उद्यमिता और रोजगार से आत्मनिर्भरता की यात्रा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी देश के युवाओं से अक्सर कहते हैं कि ऐसा कार्य करें जो युवाओं को रोजगार देने वाला बने, ताकि उनकी नई पहचान बन सके।
उम्र बढ़ी तो अवसरों का दायरा भी बढ़ा
अधिकतम आयु सीमा को 38 से बढ़ाकर 45 वर्ष करने का निर्णय उन लोगों के लिए नई संभावनाएं लेकर आया है, जिनके पास अनुभव, कार्यकुशलता और जिम्मेदारियों का व्यावहारिक ज्ञान है। उम्र बढ़ने के साथ अनुभव बढ़ता है और अनुभव किसी भी व्यवस्था की महत्वपूर्ण पूंजी है। वर्षों तक काम कर चुके लोगों ने व्यवस्था को करीब से समझा है और चुनौतियों का सामना किया है। ऐसे अनुभव का बेहतर उपयोग नई जिम्मेदारियों में किया जाना संस्थाओं को अधिक सक्षम बना सकता है।
युवा ऊर्जा और अनुभवी हाथ साथ चलें
विकास की मजबूत तस्वीर तब बनती है, जब युवा ऊर्जा और अनुभवी सोच साथ आती है। युवा नई तकनीक और नए विचार लाते हैं, जबकि अनुभवी वर्ग व्यावहारिक समझ और परिस्थितियों से निपटने का अनुभव देता है। एनएसटीआई युवाओं के हुनर को मंच देगा, तो आयु सीमा में वृद्धि अनुभवी वर्ग की क्षमता को अवसर। दोनों निर्णय मिलकर प्रदेश की मानव पूंजी को मजबूत करने की दिशा दिखाते हैं।
छत्तीसगढ़ का भविष्य केवल उसकी प्राकृतिक संपदा से नहीं, बल्कि उसके लोगों की क्षमता से तय होगा। जब हुनर को मंच, अनुभव को अवसर और सपनों को सही दिशा मिलेगी, तब विकास आंकड़ों से निकलकर लोगों की जिंदगी में दिखाई देगा। यही नए छत्तीसगढ़ की तस्वीर है, जहां कौशल से रोजगार, अनुभव से अवसर और अवसर से आत्मनिर्भरता की राह तैयार हो रही है। इसी तरह के निर्णयों से छत्तीसगढ़ सरकार सेवा करने के लिए संकल्पबद्ध हैं।
साभार - (एल.डी. मानिकपुरी, सहायक जनसंपर्क अधिकारी)
शासकीय बंगलों में कार्यालय या सत्ता का विशेषाधिकार? स्व. हेमचंद यादव के परिवार के कब्जे वाले आवास पर भी सवाल
दुर्ग// जिला मुख्यालय दुर्ग की सिविल लाइन और आसपास का इलाका अधिकारियों के लिए बनाए गए शासकीय आवासों के कारण जाना जाता है। दूसरे जिलों से पदस्थ होकर आने वाले अधिकारियों के लिए ये आवास प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन जब यही शासकीय आवास जनप्रतिनिधियों के कार्यालय अथवा ऐसे लोगों के कब्जे में दिखाई दें, जिनकी पात्रता पर सवाल उठ रहे हों, तो व्यवस्था और नियम दोनों पर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है।
सबसे ज्यादा चर्चा दुर्ग ग्रामीण विधायक ललित चंद्राकर को लेकर है। ग्रामीण क्षेत्र से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे विधायक का कार्यालय जिला मुख्यालय की सिविल लाइन स्थित शासकीय आवासीय परिसर में संचालित होना अब ग्रामीण क्षेत्र में भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है। स्थानीय चर्चाओं में सवाल उठ रहा है कि जिस जनता ने ग्रामीण क्षेत्र से अपना प्रतिनिधि चुना, उसके बीच कार्यालय खोलने के बजाय शहरी क्षेत्र के शासकीय परिसर को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है?
बताया जा रहा है कि सिविल लाइन में लगभग तीन बंगलों के बड़े भूभाग को कार्यालय के रूप में उपयोग किए जाने की स्थिति बनी हुई है। यदि यह वास्तव में शासकीय आवासीय परिसरों का उपयोग है, तो बड़ा सवाल यह है कि क्या नियमों के तहत किसी विधायक को इस प्रकार शासकीय आवासीय संपत्ति का कार्यालय के लिए उपयोग करने की अनुमति है? यदि अनुमति है तो उसका आधार, अवधि और शर्तें क्या हैं? और यदि अनुमति नहीं है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
मामला केवल विधायक के कार्यालय तक सीमित नहीं है। जिला मुख्यालय में वर्षों से कुछ शासकीय आवास ऐसे भी बताए जाते हैं, जिनका आवंटन स्थानांतरित हो चुके अधिकारियों के नाम पर बना हुआ है। सवाल यह है कि जब कोई अधिकारी दूसरे जिले में पदस्थ हो चुका है, तो उसके नाम पर दुर्ग का शासकीय आवास कितने समय तक रखा जा सकता है? ऐसे आवास खाली नहीं होने से नए पदस्थ होने वाले अधिकारियों को किराए के मकान में रहने की मजबूरी क्यों आती है?
इसका उदाहरण नगर निगम के पूर्व आयुक्त के मामले से भी जुड़ता है, जिन्हें पदभार ग्रहण करने के बाद शुरुआती दौर में किराए के आवास का सहारा लेना पड़ा और बाद में प्रयासों के बाद शासकीय आवास उपलब्ध हो सका। अब नए अधिकारियों की पदस्थापना के साथ फिर वही स्थिति सामने आने की आशंका प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।
इसी कड़ी में स्वर्गीय हेमचंद यादव को आवंटित शासकीय आवास को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि वर्षों बाद भी उक्त आवास उनके परिवार के उपयोग में है। यदि वर्तमान में परिवार का कोई सदस्य शासकीय आवास की पात्रता रखने वाले संवैधानिक अथवा विभागीय पद पर नहीं है, तो प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि आवास किस नियम और किस आदेश के आधार पर अब तक आवंटित है।
चार आवास खाली हों तो कितने अधिकारियों को मिल सकती है सुविधा?
यदि सिविल लाइन के ऐसे शासकीय आवास, जिनका उपयोग वर्तमान पात्र अधिकारियों के बजाय अन्य प्रयोजनों के लिए हो रहा है, नियमानुसार मुक्त कराए जाएं तो जिला मुख्यालय में पदस्थ कई वरिष्ठ अधिकारियों को आवास की सुविधा मिल सकती है। इससे अधिकारियों को किराए के मकान की तलाश से राहत मिलेगी और शासन द्वारा निर्मित आवासों का वास्तविक उद्देश्य भी पूरा होगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि शासकीय आवास अधिकारियों के लिए हैं या सत्ता से जुड़े लोगों के प्रभाव के लिए?
चुनाव के दौरान जनता, व्यवस्था और सिद्धांतों की बात करने वाले जनप्रतिनिधियों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि सत्ता में आने के बाद भी वे उन्हीं सिद्धांतों का पालन करें। ग्रामीण क्षेत्र से चुने गए प्रतिनिधि का जिला मुख्यालय के शासकीय परिसर में कार्यालय होना यदि नियमसम्मत है तो प्रशासन को आदेश सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि नियमसम्मत नहीं है तो कार्रवाई कौन करेगा?
ग्रामीण जनता के बीच अब यह सवाल भी उठने लगा है—विधायक ग्रामीण क्षेत्र से जीते हैं, लेकिन कार्यालय के लिए पसंद शहरी सिविल लाइन ही क्यों?
दुर्ग प्रशासन को अब शासकीय आवासों के आवंटन, कब्जे, पात्रता और वर्तमान उपयोग की निष्पक्ष समीक्षा कर स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि शासकीय संपत्ति का उपयोग नियमों के अनुसार हो रहा है या फिर सत्ता और प्रभाव के चलते नियमों की परिभाषा बदल रही है।
साभार - धनंजय राठौर
संयुक्त संचालक, जनसंपर्क
रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ के पूर्व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में दो दशकों के लंबे इंतजार के बाद स्कूलों में घंटियां बजने लगी हैं, जो इस शिक्षक दिवस पर बस्तर और उसके आस-पास के क्षेत्रों के लिए एक ऐतिहासिक और भावुक बदलाव का प्रतीक है। जहाँ कभी बारूद की गंध और बंदूक की आवाजें हुआ करती थीं, वहाँ अब बच्चे राष्ट्रगान गा रहे हैं।
5 सितंबर को देशभर में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर ‘शिक्षक दिवस’ की धूमधाम रहेगी। इस पावन अवसर पर छत्तीसगढ़ का बस्तर और अन्य दूरस्थ अंचल एक नई उम्मीद के साथ मुस्कुरा रहा है। कभी बंदूक के साए और नक्सली खौफ के कारण दशक भर से बंद पड़े स्कूल आज फिर से गुलजार हो चुके हैं। दूर-दराज के गांवों में जब वर्षों बाद फिर से स्कूल की घंटी बजती है, तो वह केवल पढ़ाई की शुरुआत नहीं होती, बल्कि उस क्षेत्र में लौटते लोकतंत्र, शांति और सुरक्षा की गूंज होती है।
बंद पड़े स्कूल फिर से हुए संचालित
छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास, सुरक्षा और जन कल्याणकारी नीतियों (‘नियद नेल्ला नार’ जैसी योजनाओं) के प्रभाव से दक्षिण बस्तर के सुदूर नक्सल प्रभावित इलाकों में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है। बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जैसे जिलों में लगभग दो से ढाई दशकों से बंद पड़े 600 से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को जिला प्रशासन और पुलिस बल के सहयोग से दोबारा खोल दिया गया है। जो इमारतें कभी नक्सलियों द्वारा ध्वस्त कर दी गई थीं या सुरक्षा बलों के कैंप के लिए इस्तेमाल होती थीं, उन्हें फिर से संवारकर बाल-सुलभ रूप दिया गया है।
शिक्षकों का अदम्य साहस और समर्पण
नक्सलमुक्त होते क्षेत्रों में शिक्षा की लौ जलाने का वास्तविक श्रेय उन स्थानीय शिक्षकों को जाता है, जिन्होंने विपरीत और भयावह परिस्थितियों के बावजूद अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा।
• स्थानीय भाषा में अध्यापन: दूरस्थ वनांचल में नियुक्त शिक्षक न केवल बच्चों को बुनियादी अक्षर ज्ञान दे रहे हैं, बल्कि गोंडी, हलबी और डोरली जैसी स्थानीय बोलियों में संवाद कर बच्चों का स्कूल से जुड़ाव मजबूत कर रहे हैं।
• समुदाय से संवाद: शिक्षकों ने ग्रामीणों और नक्सलियों के डर से सहमे अभिभावकों के बीच जाकर उनका विश्वास जीता, जिससे आज सैकड़ों बच्चे वापस ब्लैकबोर्ड और किताबों से जुड़ चुके हैं।
तकनीक और नवाचार से जुड़ रहा बस्तर का बचपन
बस्तर संभाग के बीजापुर (जैसे पीड़िया, गंपूर, तमोड़ी गांव) और सुकमा के कई अंदरूनी इलाकों में सालों से बंद पड़े स्कूलों को दोबारा खोला गया है। नक्सलियों द्वारा जिन पक्के स्कूल भवनों को आईईडी से उड़ा दिया गया था, वहाँ ग्रामीणों ने प्रशासन के साथ मिलकर अस्थायी बांस और तिरपाल की झोपड़ियां (छप्पर) तैयार की हैं ताकि बच्चों की पढ़ाई न रुके। स्थानीय भाषाओं (जैसे गोंडी, हल्बी) की चुनौती से निपटने और बच्चों में विश्वास जगाने के लिए स्थानीय शिक्षित युवाओं को शिक्षा दूत के रूप में नियुक्त किया गया है, जो इस शिक्षक दिवस के असली नायक हैं। पुनः संचालित हो रहे स्कूलों में अब केवल पुरानी लीक पर पढ़ाई नहीं हो रही है। राज्य शासन द्वारा इन स्कूलों में आधुनिक सुविधाएं सुनिश्चित की जा रही हैं:
• स्मार्ट क्लासेस और टैबलेट: कई वनांचल स्कूलों में डिजिटल कंटेंट और टैबलेट के माध्यम से बच्चों को पढ़ाया जा रहा है।
• खेलकूद और न्योता भोजन: स्कूलों में मध्याह्न भोजन (न्योता भोजन) के साथ-साथ खेल सामग्री उपलब्ध कराई गई है, जिससे बच्चों की उपस्थिति में भारी उछाल आया है।
• सुरक्षित माहौल: नियद नेल्ला नार (आपका अच्छा गांव) योजना के तहत कैंपों के आसपास सुरक्षा का दायरा बढ़ने से शिक्षक बिना किसी खौफ के रोजाना स्कूल पहुंच रहे हैं।
शिक्षक दिवस पर संदेश
छत्तीसगढ़ में इस बार का शिक्षक दिवस उन शिक्षकों को समर्पित है जो राज्य के सबसे कठिन और दुर्गम क्षेत्रों में 'शिक्षादूत' बनकर कार्य कर रहे हैं। बंदूक की आवाज को दबाकर जब कलम और किताब की ताकत आगे बढ़ती है, तो समाज की नई तस्वीर बनती है। छत्तीसगढ़ के नक्सलमुक्त इलाकों मं। गूंजती स्कूलों की घंटी इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि शिक्षा ही बदलाव और शांति की सबसे मजबूत नींव है।
जंतर-मंतर से निकली नई पीढ़ी की आवाज अब स्कूलों के दरवाजे तक पहुंची, शिक्षा व्यवस्था की हर कमी पर नजर—गजेंद्र यादव के राजनीतिक भविष्य की भी होगी परीक्षा
शौर्यपथ विशेष /रायपुर/दुर्ग।
कभी शिक्षा विभाग की खबरें सरकारी विज्ञप्तियों, परीक्षा परिणामों और नियुक्तियों तक सीमित रहती थीं। लेकिन बदलते भारत में तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब स्कूल शिक्षा केवल विभागीय फाइलों का विषय नहीं रह गई है, बल्कि अखबारों, सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और युवाओं की सीधी आवाज का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
जंतर-मंतर और देश के विभिन्न हिस्सों में Gen Z के आंदोलनों के बाद अब Gen Alpha भी शिक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल पूछने सड़क तक पहुंच रही है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार से लेकर छत्तीसगढ़ तक छात्रों की आवाज में एक समान सवाल दिखाई दे रहा है—स्कूल में शिक्षक कहां हैं, मूलभूत सुविधाएं कब मिलेंगी और व्यवस्था की जिम्मेदारी कौन लेगा?
छत्तीसगढ़ में इसकी सबसे ताजा तस्वीर दुर्ग जिले के धमधा क्षेत्र में देखने को मिली, जहां Gen Alpha से जुड़े विद्यार्थियों और अभिभावकों के आंदोलन के बाद स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव स्वयं स्कूल पहुंचे और छात्रों की समस्याएं सुनीं। आंदोलन में शिक्षकों की कमी और अन्य प्रशासनिक समस्याओं को लेकर सवाल उठाए गए थे।
अब शिक्षा विभाग की हर कमी मोबाइल कैमरे की नजर में
आज का विद्यार्थी केवल शिकायत नहीं करता—वह उसे रिकॉर्ड करता है, सोशल मीडिया पर डालता है और कुछ ही घंटों में वह मुद्दा हजारों लोगों तक पहुंच जाता है।
कहीं शिक्षकों की कमी, कहीं स्कूल भवन की समस्या, कहीं मध्यान्ह भोजन को लेकर शिकायत, कहीं परीक्षा और पेपर से जुड़े विवाद, तो कहीं विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल—शिक्षा व्यवस्था की छोटी से छोटी कमी अब बड़ी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन सकती है।
यही बदलाव स्कूल शिक्षा विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी।
क्योंकि अब सरकार के सामने केवल विभागीय रिपोर्ट नहीं है, बल्कि जमीन पर खड़ा विद्यार्थी और उसके हाथ में मोबाइल कैमरा भी है।
गजेंद्र यादव के सामने दो रास्ते—आलोचना या समाधान?
छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी मंत्री गजेंद्र यादव के पास है। हाल के दिनों में शिक्षा विभाग को लेकर उनकी सक्रियता और विभागीय समीक्षा लगातार चर्चा में रही है। 25 अगस्त को भी उनकी अध्यक्षता में राज्य स्तरीय समीक्षा बैठक में शैक्षणिक गतिविधियों, अधोसंरचना, डिजिटल शिक्षा और विभागीय योजनाओं की समीक्षा की गई।
ऐसे समय में Gen Alpha का मैदान में उतरना उनके लिए सामान्य राजनीतिक चुनौती नहीं है।
यह वह दौर है जब मंत्री के सामने यह साबित करने का अवसर है कि शिक्षा विभाग केवल योजनाओं और घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले बदलावों से चलता है।
अगर किसी स्कूल में शिक्षक नहीं हैं और मंत्री वहां शिक्षक पहुंचा देते हैं, अगर भवन जर्जर है और उसका समाधान होता है, अगर किसी व्यवस्था में गड़बड़ी है और उस पर कार्रवाई होती है—तो उसका प्रभाव केवल उस स्कूल तक सीमित नहीं रहेगा।
उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर जाएगी, उसका वीडियो वायरल होगा और जनता यह देखेगी कि सरकार सवाल सुनती ही नहीं, उनका समाधान भी करती है।
यही गजेंद्र यादव के लिए राजनीतिक अवसर है।
पिछली सरकारों का हिसाब या वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी?
राजनीति में यह आसान रास्ता होता है कि वर्तमान समस्या के लिए पिछली सरकार को जिम्मेदार बता दिया जाए।
छत्तीसगढ़ में भाजपा की मौजूदा सरकार से पहले भूपेश बघेल सरकार का लगभग पांच वर्ष का कार्यकाल रहा। उससे पहले डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा सरकार करीब 15 वर्षों तक सत्ता में रही। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था की कमियों की पूरी जिम्मेदारी किसी एक सरकार पर डालना आसान नहीं है।
लेकिन जनता का सवाल भी उतना ही सीधा है—
“गलती किसी की भी रही हो, अब सुधार कौन करेगा?”
यहीं से गजेंद्र यादव की राजनीतिक परीक्षा शुरू होती है।
यदि मंत्री हर समस्या के लिए पिछली सरकारों को जिम्मेदार बताते हुए दिखाई देंगे, तो सवाल उठेगा कि वर्तमान सरकार आखिर कब तक अतीत का हिसाब गिनाएगी?
इसके विपरीत यदि वे पुराने विवादों को किनारे रखकर समस्याओं के समाधान पर फोकस करते हैं, तो यही शिक्षा विभाग उनके राजनीतिक भविष्य के लिए सबसे मजबूत मंच बन सकता है।
नरेंद्र मोदी का उदाहरण—छोटे अवसर से बड़ी मंजिल तक
राजनीति में अवसर हमेशा बड़े मंच पर नहीं मिलता। कई बार किसी नेता को ऐसा विभाग या जिम्मेदारी मिलती है, जहां उसके काम का सीधा असर जनता पर दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक सफर इसका बड़ा उदाहरण है। संगठन में लंबे समय तक जमीन पर काम करने के बाद वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने और फिर देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे।
यानी राजनीति में अवसर वही बड़ा बनता है, जिसे नेता अपनी कार्यक्षमता से बड़ा बना दे।
आज गजेंद्र यादव के सामने भी ऐसा ही अवसर दिखाई देता है।
स्कूल शिक्षा विभाग प्रदेश के लाखों बच्चों, अभिभावकों और हजारों शिक्षकों से सीधे जुड़ा हुआ विभाग है। यदि यहां सुधार दिखाई देता है, तो उसका राजनीतिक लाभ भी व्यापक हो सकता है।
लेकिन Gen Alpha को नजरअंदाज करना भारी भी पड़ सकता है
दूसरी तरफ तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।
Gen Alpha वह पीढ़ी है जो सूचना के लिए सरकारी दफ्तरों की प्रतीक्षा नहीं करती। उसके पास मोबाइल है, इंटरनेट है और अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने का माध्यम है।
इसीलिए स्कूल शिक्षा मंत्री के सामने चुनौती अब केवल विधानसभा, विपक्ष या मीडिया की नहीं है—एक ऐसी पीढ़ी भी सामने है जो सवाल पूछने से नहीं डरती।
हाल के छत्तीसगढ़ आंदोलन ने यह संकेत दे दिया है कि यदि स्कूल की समस्या का समाधान समय पर नहीं हुआ तो विद्यार्थी और अभिभावक अपनी आवाज सामूहिक रूप से उठा सकते हैं।
और इस आवाज को सोशल मीडिया की ताकत मिल जाए तो किसी छोटे गांव की समस्या भी पूरे प्रदेश की चर्चा बन सकती है।
धर्मेंद्र प्रधान का घटनाक्रम भी देता है बड़ा राजनीतिक संदेश
शिक्षा के मुद्दे की राजनीतिक संवेदनशीलता का राष्ट्रीय उदाहरण भी सामने है। 25 जुलाई 2026 को राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सलाह पर धर्मेंद्र प्रधान का केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा स्वीकार किया, जिसके बाद शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार प्रल्हाद जोशी को सौंपा गया।
इस घटनाक्रम से यह संदेश जरूर निकलता है कि शिक्षा जैसा विभाग केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील राजनीतिक जिम्मेदारी भी है।
हालांकि किसी मंत्री के पद से हटने के कारणों को केवल छात्र आंदोलन या किसी एक मुद्दे से जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि शिक्षा से जुड़े विवाद जब राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा राजनीतिक दबाव बनाते हैं, तो उसका असर सत्ता और नेतृत्व के फैसलों तक पहुंच सकता है।
गजेंद्र यादव के लिए फैसला जनता की नजरों के सामने होगा
आज गजेंद्र यादव के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि Gen Alpha उनके समर्थन में है या विरोध में।
बड़ा सवाल यह है कि—
क्या Gen Alpha को यह महसूस होगा कि उसकी आवाज सत्ता तक पहुंच रही है?
यदि बच्चों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई होती है, शिक्षक पहुंचते हैं, स्कूल सुधरते हैं, भवन बनते हैं, योजनाओं में पारदर्शिता आती है और विभागीय जवाबदेही तय होती है, तो आज जो आंदोलन चुनौती दिखाई दे रहा है, वही कल गजेंद्र यादव की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि बन सकता है।
लेकिन यदि शिकायतों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझा दिया गया, समस्याओं के लिए केवल पिछली सरकारों को जिम्मेदार ठहराया गया और जमीन पर बदलाव दिखाई नहीं दिया, तो यही डिजिटल पीढ़ी सरकार के कामकाज का सबसे बड़ा आईना भी बन सकती है।
क्योंकि Gen Alpha को न किसी नेता को वोट देना है, न किसी दल का झंडा उठाना है। उसे सिर्फ बेहतर स्कूल, पर्याप्त शिक्षक और बेहतर शिक्षा चाहिए।
और यही बात इस पूरे घटनाक्रम को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है।
अवसर भी, चुनौती भी… और फैसला काम करेगा
राजनीति में हर नेता को अपने आपको साबित करने के लिए बार-बार मौका नहीं मिलता।
गजेंद्र यादव के पास आज प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण विभागों में से एक की जिम्मेदारी है। शिक्षा व्यवस्था पर पूरे प्रदेश की नजर है। मीडिया देख रहा है, अभिभावक देख रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण—नई पीढ़ी खुद देख रही है।
अब आने वाला समय तय करेगा कि Gen Alpha का आंदोलन—
गजेंद्र यादव के लिए राजनीतिक चुनौती बनता है या उनके राजनीतिक करियर को नई ऊंचाई देने वाला अवसर।
फिलहाल गेंद स्कूल शिक्षा मंत्री के पाले में है।
सवाल आंदोलन का नहीं, अब जवाब कार्रवाई का है।
भिलाई। कभी समाजसेवा, कभी कारोबारी गतिविधियां, कभी खेल और सामाजिक आयोजनों में सहभागिता—इंद्रजीत सिंह उर्फ ‘छोटू’ की सार्वजनिक पहचान लंबे समय से अलग-अलग रूपों में शहर के सामने आती रही है। उनके समर्थकों और शुभचिंतकों की ओर से उन्हें समाजसेवी और कारोबारी के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। लेकिन अब इसी चमकदार सार्वजनिक छवि के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जिसे नजरअंदाज करना शायद आसान नहीं होगा—आखिर ‘समाजसेवी’ की पहचान के साथ ‘लोहा चोरी’ जैसे गंभीर आरोपों की चर्चा क्यों जुड़ रही है?
सवाल इसलिए भी बड़ा हो गया है क्योंकि हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार विजया पाठक की सोशल मीडिया पोस्ट में इंद्रजीत सिंह ‘छोटू’ को लेकर बेहद गंभीर आरोपात्मक भाषा का इस्तेमाल किया गया है। उनके पोस्ट में “लोहा चोर ट्रांसपोर्ट कारोबारी” जैसे शब्द लिखे गए हैं और साथ ही GST कार्रवाई का उल्लेख किया गया है। यह पोस्ट अब भिलाई में चर्चा का विषय बनी हुई है।
हालांकि यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी पत्रकार की पोस्ट या मीडिया रिपोर्ट में लगाए गए आरोप अपने आप में न्यायिक रूप से अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं हैं। अंतिम सत्य जांच एजेंसियों की जांच, आधिकारिक दस्तावेज और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा।
GST की दस्तक ने बढ़ाई बेचैनी
24 अगस्त 2026 से इंद्रजीत सिंह ‘छोटू’ से जुड़े हैवी ट्रांसपोर्ट कंपनी के ठिकानों पर स्टेट GST की टीम द्वारा जांच की खबर सामने आई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार हथखोज स्थित कंपनी परिसर के साथ बलौदाबाजार स्थित यार्ड में भी कारोबारी दस्तावेजों, लेन-देन और GST से संबंधित रिकॉर्ड की पड़ताल की गई। कंपनी के कारोबार में बड़ी संख्या में ट्रकों के संचालन की जानकारी भी सामने आई है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि GST विभाग की ओर से जांच की अंतिम वजह, कथित अनियमितता और जांच का निष्कर्ष अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
फिर सवाल उठता है—जब तक जांच का निष्कर्ष सामने नहीं आया है, तब तक इतनी बड़ी चर्चा क्यों?
जवाब शायद उसी सार्वजनिक छवि में छिपा है, जिसे वर्षों से पोस्टर, बैनर, सामाजिक आयोजनों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के जरिए मजबूत किया गया।
पोस्टर की चमक से आरोपों की धूल तक?
भिलाई में यह कोई छिपी बात नहीं कि बड़े कारोबारी और प्रभावशाली सामाजिक चेहरों के कार्यक्रमों की तस्वीरें और बधाई संदेश अक्सर शहर के पोस्टर-बैनरों में दिखाई देते हैं। सवाल यह नहीं कि किसी कारोबारी को सामाजिक कार्य करने का अधिकार है या नहीं—बिल्कुल है।
सवाल यह है कि क्या सामाजिक सेवा की चमक किसी व्यक्ति से जुड़े गंभीर आरोपों पर सवाल पूछने की पत्रकारिता को रोक सकती है?
यदि किसी व्यक्ति पर आरोप सामने आए हैं तो उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा का सम्मान करते हुए भी सवाल पूछे जाने चाहिए।
और अगर आरोप निराधार हैं तो जवाब भी उतनी ही मजबूती से सामने आना चाहिए।
क्योंकि पोस्टर से बनी छवि को पोस्टर ही बचा पाएगा, यह जरूरी नहीं; कई बार एक जांच की फाइल पूरी तस्वीर बदल देती है।
भिलाई में सवाल बहुत हैं, जवाब अभी बाकी
वरिष्ठ पत्रकार विजया पाठक की पोस्ट ने जो सवाल उठाए हैं, वे अब स्थानीय चर्चाओं का हिस्सा बन चुके हैं। दूसरी ओर इंद्रजीत सिंह ‘छोटू’ की सामाजिक गतिविधियों और विभिन्न संस्थाओं से जुड़ाव की चर्चा भी होती रही है। उपलब्ध रिपोर्टों में उन्हें ट्रांसपोर्ट व्यवसाय के साथ सामाजिक और खेल संगठनों से जुड़ा बताया गया है।
यानी तस्वीर के दोनों पहलू मौजूद हैं।
एक तरफ समाजसेवा और कारोबारी पहचान, दूसरी तरफ लोहा चोरी जैसे गंभीर आरोपों की चर्चा और GST जांच।
अब असली परीक्षा पोस्टर-बैनर की नहीं, दस्तावेजों की है।
‘10 हजार करोड़’ की चर्चा भी जांच के दायरे में क्यों नहीं?
भिलाई स्टील प्लांट से कथित बड़े पैमाने पर लोहा चोरी को लेकर अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में हजारों करोड़ रुपये के आंकड़े और दावे सामने आते रहे हैं। कुछ रिपोर्टों में लगभग 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक की कथित चोरी का दावा भी किया गया है। लेकिन ऐसे आंकड़ों को आधिकारिक जांच या न्यायिक निष्कर्ष के बिना स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
इसलिए सवाल होना चाहिए—दावा कितना बड़ा है और उसके पीछे दस्तावेज कितने मजबूत हैं?
अब भिलाई को ‘चर्चा’ नहीं, खुलासा चाहिए
इंद्रजीत सिंह ‘छोटू’ वास्तव में केवल एक समाजसेवी और कारोबारी हैं या उनके कारोबार से जुड़े आरोपों में भी कोई सच्चाई है—इसका फैसला सोशल मीडिया, चौक-चौराहे या पोस्टर-बैनर नहीं करेंगे।
फैसला जांच की रिपोर्ट करेगी।
यदि आरोप गलत हैं तो उन्हें सामने आकर तथ्य और दस्तावेजों के साथ खारिज करने का पूरा अधिकार है।
और यदि जांच में कोई गंभीर अनियमितता सामने आती है तो फिर समाजसेवा की चमकदार तस्वीर के पीछे छिपे सवालों का जवाब भी देना होगा।
फिलहाल भिलाई की जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—
“नाम समाजसेवी का, पहचान कारोबारी की और अब ‘लोहा चोर’ जैसे आरोपों की सुर्खियां... आखिर असली चेहरा कौन सा है?”
इस सवाल का जवाब पोस्टर नहीं देगा।
जवाब जांच देगी, दस्तावेज देंगे और अंततः कानून देगा।
तब तक सवाल पूछना भी पत्रकारिता का अधिकार है और आरोपों का जवाब देना संबंधित व्यक्ति का अधिकार।
क्योंकि समाजसेवा की असली कसौटी पोस्टर पर छपी तस्वीर नहीं, बल्कि जांच की कसौटी पर खरे उतरने वाले दस्तावेज होते हैं।
आस्था अपनी जगह, शिक्षा अपनी जगह... लेकिन जब आस्था के नाम पर मेहनत, पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी को गौण बताया जाने लगे, तब सवाल उठना लाजिमी है।
शौर्यपथ लेख।
देश में लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसी घटनाओं से उनका भविष्य प्रभावित हो रहा है। ऐसे दौर में विद्यार्थियों को हौसला देने, मेहनत करने और शिक्षा के महत्व को समझाने की जरूरत है। लेकिन यदि किसी लोकप्रिय कथावाचक के मंच से यह संदेश जाए कि परीक्षा में सफलता के लिए पढ़ाई से ज्यादा कोई धार्मिक विधि कारगर हो सकती है, तो यह केवल आस्था का विषय नहीं रह जाता—यह सामाजिक जिम्मेदारी का सवाल बन जाता है।
पंडित प्रदीप मिश्रा के एक कथित वक्तव्य में परीक्षा में सफलता के लिए शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने की विधि बताए जाने और इसे करने से पढ़ाई की जरूरत न होने जैसी बात कही गई। यदि वक्तव्य का आशय वास्तव में यही है, तो सवाल बेहद सीधा है—क्या वर्षों तक किताबों के बीच मेहनत करने वाले विद्यार्थियों की जगह अब परीक्षा की तैयारी के लिए पूजा-पाठ को पर्याप्त मान लिया जाए?
अगर बेलपत्र चढ़ाने से बिना पढ़े परीक्षा पास होना संभव है, तो फिर स्कूल-कॉलेज, कोचिंग संस्थान, शिक्षक, किताबें और शिक्षा पर सरकार द्वारा खर्च किए जा रहे करोड़ों रुपये किस काम के?
क्यों न परीक्षा से पहले विद्यार्थियों को किताबों की जगह बेलपत्र थमा दिया जाए?
क्यों न मेहनत, अनुशासन और अध्ययन की जगह धार्मिक विधि को परीक्षा की तैयारी का ‘शॉर्टकट’ घोषित कर दिया जाए?
लेकिन हकीकत यह है कि परीक्षा की उत्तर पुस्तिका में विद्यार्थी की आस्था नहीं, उसका ज्ञान और उसकी तैयारी उसके उत्तर लिखती है।
आस्था व्यक्ति को मानसिक शक्ति दे सकती है, विश्वास दे सकती है, सकारात्मक सोच दे सकती है—इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन आस्था को शिक्षा का विकल्प बनाकर प्रस्तुत करना एक अलग बात है। यही वह सीमा है, जिस पर जिम्मेदार सार्वजनिक व्यक्तियों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
पंडित प्रदीप मिश्रा कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं। उनके प्रवचन सुनने वाले लाखों अनुयायी हैं। ऐसे में मंच से निकला प्रत्येक शब्द केवल व्यक्तिगत विचार नहीं रह जाता, उसका प्रभाव समाज के बड़े वर्ग तक पहुंचता है। खासकर विद्यार्थी यदि यह संदेश ग्रहण कर लें कि पढ़ाई किए बिना भी किसी धार्मिक उपाय से परीक्षा में सफलता हासिल की जा सकती है, तो इसका नुकसान सीधे उनके भविष्य को हो सकता है।
आज का छात्र पहले ही परीक्षा प्रणाली, प्रतियोगिता, बेरोजगारी और पेपर लीक जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में उसे यह बताने की जरूरत है कि “मेहनत करो, ज्ञान हासिल करो, असफलता से मत डरो और दोबारा प्रयास करो।”
न कि यह कि “पढ़ाई छोड़ो और किसी विधि के भरोसे परीक्षा देने चले जाओ।”
कटाक्ष यह भी है कि यदि वास्तव में कोई ऐसी धार्मिक विधि है जो बिना अध्ययन के परीक्षा में सफलता दिला सकती है, तो फिर शिक्षा मंत्रालय को पाठ्यक्रम बदल देना चाहिए। किताबों की जगह बेलपत्र, नोट्स की जगह पूजा की विधि और परीक्षा की तैयारी की जगह कथा का आयोजन कर देना चाहिए!
लेकिन क्या ऐसा संभव है?
नहीं।
क्योंकि वास्तविक जीवन में सफलता के पीछे मेहनत, ज्ञान, अभ्यास, अनुशासन और निरंतर प्रयास होता है।
धार्मिक आस्था किसी व्यक्ति की निजी शक्ति हो सकती है, लेकिन उसे विद्यार्थियों के भविष्य का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
पंडित प्रदीप मिश्रा जैसे लोकप्रिय कथावाचक से अपेक्षा इसलिए अधिक है क्योंकि उनके शब्दों का प्रभाव सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक है। लाखों लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी बातों को महत्व देते हैं और उनके बताए रास्ते पर चलने का प्रयास करते हैं। इसलिए सार्वजनिक मंच से विद्यार्थियों और परीक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर कही गई बातों में जिम्मेदारी और सावधानी अपेक्षित है।
क्योंकि किसी विद्यार्थी की एक गलत धारणा उसके वर्षों की मेहनत पर भारी पड़ सकती है।
और यदि कोई छात्र पढ़ाई छोड़कर केवल किसी धार्मिक उपाय के भरोसे परीक्षा देने बैठ जाए और असफल हो जाए, तो उस असफलता की जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्या तब उसके हाथ में किताब होगी या केवल बेलपत्र?
यही असली सवाल है।
आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन शिक्षा का स्थान शिक्षा ही ले सकती है। परीक्षा में सफलता का सबसे विश्वसनीय मंत्र आज भी वही है—पढ़ो, समझो, अभ्यास करो और मेहनत करो।
कथावाचक का काम समाज में विश्वास जगाना है; लेकिन ऐसा विश्वास नहीं, जो विद्यार्थी को मेहनत से दूर कर दे।
क्योंकि भगवान पर भरोसा रखने में कोई बुराई नहीं, मगर परीक्षा की कॉपी में उत्तर लिखने के लिए कलम भी चलानी पड़ती है और उसके पीछे पढ़ाई भी करनी पड़ती है।
सुरक्षित श्रम, सामाजिक सुरक्षा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार और डिजिटल सेवाओं का व्यापक विस्तार
साभार - छगल लाल लोन्हारे
संयुक्त संचालक, जनसंपर्क
रायपुर / शौर्यपथ / राष्ट्र निर्माण में श्रमिकों का योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। श्रमिकों के सम्मान, सुरक्षा और समग्र विकास के बिना विकसित राज्य की कल्पना संभव नहीं है। इसी सोच को आधार बनाकर छत्तीसगढ़ शासन का श्रम विभाग श्रमिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। श्रम मंत्री श्री लखन लाल देवांगन के निर्देशन में श्रमिकों के हितों की रक्षा, सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता तथा आधुनिक तकनीक के माध्यम से सेवाओं को सरल बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहल की गई हैं। राज्य सरकार के ढाई साल में श्रम विभाग की उपलब्धियाँ राज्य सरकार की श्रमिक हितैषी सोच और संवेदनशील प्रशासन का परिचायक हैं।
प्रशासनिक ढांचे का विस्तार, सेवाओं की बेहतर पहुंच
श्रम कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन तथा श्रमिकों को त्वरित और गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने पाँच नए जिलों में श्रम पदाधिकारी कार्यालय स्थापित किए हैं। मंत्री श्री लखन लाल देवांगन ने बताया कि पाँच श्रम पदाधिकारी कार्यालयों को सहायक श्रमायुक्त कार्यालय के रूप में उन्नत किया गया है। अब प्रदेश में 10 सहायक श्रमायुक्त कार्यालय एवं 23 श्रम पदाधिकारी कार्यालय सहित कुल 33 श्रम कार्यालय संचालित हैं। इससे श्रमिकों की समस्याओं के त्वरित निराकरण और योजनाओं के प्रभावी संचालन को नई गति मिली है।
समय के अनुरूप श्रम कानूनों में सुधार
औद्योगिक विकास और श्रमिक हितों के संतुलन को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने श्रम कानूनों में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। छत्तीसगढ़ कारखाना नियम, 1962 में संशोधन कर निर्धारित सुरक्षा प्रावधानों के साथ महिलाओं के रोजगार के अवसरों का विस्तार किया गया है। वहीं छत्तीसगढ़ दुकान एवं स्थापना नियम, 2021 में संशोधन के माध्यम से श्रम पहचान पंजीयन प्रमाण-पत्र अब 24 घंटे के भीतर जारी किए जाने का प्रावधान किया गया है। इससे उद्योगों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सरल एवं पारदर्शी सेवाएँ उपलब्ध होंगी तथा ष्ईज ऑफ डूइंग बिजनेसष् को भी बढ़ावा मिलेगा।
56 लाख से अधिक श्रमिक सामाजिक सुरक्षा के दायरे में
श्रम विभाग के अंतर्गत संचालित छत्तीसगढ़ श्रम कल्याण मंडल, भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल तथा असंगठित कर्मकार राज्य सामाजिक सुरक्षा मंडल के माध्यम से अब तक लगभग 56.83 लाख संगठित, निर्माण एवं असंगठित श्रमिकों का पंजीयन किया जा चुका है।
3.48 लाख श्रमिकों को बीमा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं कौशल उन्नयन जैसी सुविधाओं का लाभ
वर्ष 2026 में 30 जून तक विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से लगभग 3.48 लाख श्रमिकों को बीमा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं कौशल उन्नयन जैसी सुविधाओं का लाभ प्रदान किया गया है। इन योजनाओं पर लगभग 173.32 करोड़ रुपये व्यय किए गए हैं, जो श्रमिक कल्याण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
निर्माण श्रमिकों को बढ़ी आर्थिक सहायता
मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक आवास सहायता योजना के अंतर्गत आवास निर्माण अथवा घर खरीदने के लिए दी जाने वाली सहायता राशि एक लाख रुपये से बढ़ाकर डेढ़ लाख रुपये कर दी गई है। यह निर्णय निर्माण श्रमिकों के अपने घर के सपने को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
महिला श्रमिकों को स्वरोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए अवसर
इसी प्रकार दीदी ई-रिक्शा सहायता योजना के अंतर्गत पंजीकृत महिला निर्माण श्रमिकों एवं उनके समूहों को ई-रिक्शा खरीदने के लिए सहायता राशि भी एक लाख रुपये से बढ़ाकर डेढ़ लाख रुपये कर दी गई है। इससे महिला श्रमिकों को स्वरोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए अवसर मिल रहे हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई पहल
राज्य सरकार ने श्रमिक परिवारों के भविष्य को संवारने के उद्देश्य से अटल कैरियर निर्माण योजना प्रारंभ की है। इसके माध्यम से पंजीकृत निर्माण श्रमिकों के बच्चों को इंजीनियरिंग एवं मेडिकल जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए गुणवत्तापूर्ण निःशुल्क कोचिंग उपलब्ध कराई जाएगी।
पंजीकृत निर्माण श्रमिकों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण
वहीं मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक स्वास्थ्य परीक्षण योजना के माध्यम से पंजीकृत निर्माण श्रमिकों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण किया जाएगा। इस पहल से बीमारियों की प्रारंभिक पहचान, समय पर उपचार तथा स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।
उत्कृष्ट शिक्षा से उज्ज्वल भविष्य की ओर
श्रमिक परिवारों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अटल उत्कृष्ट शिक्षा योजना संचालित की जा रही है। इस योजना के तहत पात्र निर्माण श्रमिकों के प्रथम दो बच्चों को कक्षा 6वीं से 12वीं तक उत्कृष्ट निजी आवासीय विद्यालयों में निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जा रही है।मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप वर्ष 2026-27 से इस योजना के अंतर्गत लाभान्वित बच्चों की संख्या 100 से बढ़ाकर 200 कर दी गई है। यह पहल श्रमिक परिवारों के बच्चों के भविष्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का माध्यम बनेगी।
पाँच रुपये में पौष्टिक भोजन
शहीद वीर नारायण सिंह श्रम अन्न योजना के माध्यम से पंजीकृत निर्माण, संगठित एवं असंगठित श्रमिकों को मात्र 5 रुपये में गरम एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। वर्तमान में प्रदेश के 18 जिलों में 39 भोजन केन्द्र संचालित हैं, जो हजारों श्रमिकों के लिए राहत का माध्यम बने हुए हैं।
डिजिटल सेवाओं से बढ़ी पारदर्शिता
श्रम विभाग द्वारा विकसित 'ई-श्रम साथी मोबाइल एप' श्रमिकों और नियोजकों के लिए एक महत्वपूर्ण डिजिटल प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है। इस एप के माध्यम से स्वयं पंजीयन, श्रमिक एवं नियोजक के बीच सीधा संपर्क तथा रोजगार संबंधी जानकारी आसानी से उपलब्ध हो रही है। इससे पारदर्शिता के साथ रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि हो रही है।
मॉडल लेबर चौक से मिलेगा सम्मानजनक वातावरण
राज्य सरकार द्वारा मॉडल लेबर चौक फेसिलिटेशन सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। इन केन्द्रों पर श्रमिकों के पंजीयन, विभिन्न योजनाओं के आवेदन, भोजन, पेयजल, विश्राम एवं अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। इससे श्रमिकों को सम्मानजनक एवं सुरक्षित कार्य वातावरण उपलब्ध होगा।
सामाजिक सुरक्षा को मिला नया विस्तार
मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक मृत्यु एवं दिव्यांग सहायता योजना के अंतर्गत सामान्य मृत्यु पर आश्रितों को 1 लाख रुपये, कार्यस्थल दुर्घटना में मृत्यु होने पर 5 लाख रुपये तथा स्थायी दिव्यांगता की स्थिति में 2.50 लाख रुपये की सहायता प्रदान की जाती है। साथ ही अपंजीकृत निर्माण श्रमिकों की कार्यस्थल दुर्घटना में मृत्यु होने पर भी उनके आश्रितों को 1 लाख रुपये की सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।
पंजीकृत श्रमिकों की मृत्यु पर आश्रितों को 1 लाख रुपये की सहायता
इसी प्रकार असंगठित कर्मकार राज्य सामाजिक सुरक्षा मंडल के अंतर्गत पंजीकृत श्रमिकों की मृत्यु पर आश्रितों को 1 लाख रुपये तथा दिव्यांगता की स्थिति में 50 हजार रुपये की सहायता राशि प्रदान की जाती है।
सुरक्षित कार्यस्थल की दिशा में प्रयास
राज्य के विभिन्न कारखानों में श्रमिकों को उनके कार्य के अनुरूप वरिष्ठ अधिकारियों एवं सुरक्षा अधिकारियों द्वारा नियमित प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। इससे कार्यस्थलों पर सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित होने के साथ-साथ दुर्घटनाओं में कमी और उत्पादकता में वृद्धि हो रही है।
श्रमिक कल्याण की नई पहचान
छत्तीसगढ़ में श्रम विभाग द्वारा किए जा रहे व्यापक सुधार यह सिद्ध करता है कि राज्य सरकार श्रमिकों को केवल योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास यात्रा का महत्वपूर्ण सहभागी मानती है। प्रशासनिक ढाँचे का विस्तार, श्रम कानूनों का आधुनिकीकरण, डिजिटल सेवाओं का विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सामाजिक सुरक्षा एवं सम्मानजनक रोजगार जैसी पहलें श्रमिकों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला रही हैं। श्रमिकों के कल्याण और सशक्तिकरण के इन प्रयासों से छत्तीसगढ़ समावेशी और संवेदनशील विकास की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है।
साभार : धनंजय राठौर
संयुक्त संचालक, जनसंपर्क
शिशु जीवन का वह नाजुक चरण है, जहाँ सही पोषण और स्वास्थ्य देखभाल उनके भविष्य की दिशा तय करती है। भारत जैसे विकासशील देश में 0 से 5 वर्ष तक के बच्चों में कुपोषण, एनीमिया और विभिन्न संक्रामक बीमारियों की दर को कम करने के उद्देश्य से स्वास्थ्य एवं महिला-बाल विकास विभाग द्वारा 'शिशु संरक्षण माह' का आयोजन किया जाता है। यह एक विशेष स्वास्थ्य अभियान है, जो नवजात और छोटे बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए एक मजबूत कवच का कार्य करता है। बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण स्तर को सुधारने के लिए चलाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण अभियान है। छत्तीसगढ़ राज्य में इस अभियान का नया चरण 18 अगस्त 2026 से शुरू हो गया है, जिसके तहत 9 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों की विशेष देखभाल की जा रही है।
अभियान का मुख्य उद्देश्य
इस विशेष माह को मनाने का प्राथमिक लक्ष्य बाल मृत्यु दर और 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में कमी लाना है। इसके साथ ही, बच्चों में समय पर बीमारियों की पहचान करना, उन्हें आवश्यक विटामिन और खनिज प्रदान करना, तथा माताओं को सही पोषण और स्वच्छता के प्रति जागरूक करना इस अभियान के प्रमुख उद्देश्य हैं।
प्रमुख स्वास्थ्य सेवाएं और गतिविधियाँ
शिशु संरक्षण माह के दौरान गांव-गांव और शहरों में स्वास्थ्य केंद्रों व आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से सेवाएं प्रदान की जाती हैं:
• विटामिन 'ए' का अनुपूरण: 9 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों को रतौंधी (Night Blindness) जैसी आंखों की बीमारियों से बचाने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए विटामिन 'ए' की खुराक दी जाती है।
• एनीमिया से बचाव 6 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों को खून की कमी (एनीमिया) से सुरक्षित रखने हेतु आयरन एवं फॉलिक एसिड (IFA) सिरप का वितरण किया जाता है।
• पूर्ण टीकाकरण: जिन बच्चों के नियमित टीके छूट गए हैं, उन्हें खसरा, रुबेला, पोलिया, काली खांसी और टिटनेस जैसी घातक बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकृत किया जाता है।
• कुपोषण की पहचान व उपचार: आंगनवाड़ी स्तर पर सभी बच्चों का वजन और लंबाई नापकर गंभीर रूप से कुपोषित और मध्यम कुपोषित बच्चों को चिह्नित किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर गंभीर बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र भेजा जाता है।
• दस्त नियंत्रण और ओआरएस वितरण: बच्चों में डिहाइड्रेशन रोकने के लिए माताओं को ओआरएस पैकेट और जिंक की गोलियां दी जाती हैं।
जागरूकता एवं परामर्श सत्र
केवल दवाएं देना ही इस अभियान का हिस्सा नहीं है, बल्कि माताओं और परिवारों का व्यवहार परिवर्तन भी इसका महत्वपूर्ण अंग है:
• स्तनपान का महत्व: जन्म के तुरंत बाद (1 घंटे के अंदर) मां का पहला गाढ़ा पीला दूध (कोलस्ट्रम) और शुरुआती 6 माह तक केवल स्तनपान कराने के लिए माताओं को प्रेरित किया जाता है।
• ऊपरी आहार की शुरुआत: 6 माह की आयु पूरी होने के बाद बच्चे को स्तनपान के साथ-साथ सही मात्रा और गुणवत्ता वाला पूरक आहार (ऊपरी आहार) देने की सलाह दी जाती है। 6 से 12 महीने की उम्र के बीच, आपका शिशु पौष्टिक ठोस आहार खाना शुरू कर देगा, लेकिन माँ का दूध फिर भी पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत बना रहेगा। जब आपका शिशु माँ का दूध या फार्मूला दूध पीना छोड़ दे, तो उसे धीरे-धीरे और धैर्य से खिलाएँ। उसे नए स्वाद चखने दें, लेकिन ज़बरदस्ती न करें। जब आपका बच्चा ठोस आहार खाना शुरू करे, तो उसे भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खाने से रोकें ताकि वह गले में न अटके।
• अपने शिशु के मस्तिष्क के विकास में मदद करने के लिए उसे पढ़ें, उससे बातें करें और उसके लिए गाएं।
• अपने शिशु को सोने के पर्याप्त अवसर प्रदान करें - 4 से 12 महीने के शिशुओं के लिए अनुशंसित नींद की मात्रा प्रतिदिन 12 से 16 घंटे (24 घंटे की अवधि में, झपकी सहित) है।
• शिशु को सक्रिय रखना उसके विकास के लिए महत्वपूर्ण है। दिन भर उसके हाथ-पैर हिलाते रहने के लिए उसके साथ शारीरिक गतिविधियाँ करें। ज़मीन पर बैठकर हिलने-डुलने से शिशु मजबूत बनता है और साथ ही वह दुनिया को समझने और जानने की कला सीखता है।
• स्वच्छता व सैनिटेशन: हाथ धोने की सही आदत और बच्चे की देखभाल में साफ-सफाई के महत्व पर चर्चा की जाती है, जिससे संक्रमण से बचाव संभव हो सके।
• शिशु को सक्रिय रखना उसके विकास के लिए महत्वपूर्ण है। दिन भर उसके हाथ-पैर हिलाते रहने के लिए उसके साथ शारीरिक गतिविधियाँ करें। ज़मीन पर बैठकर हिलने-डुलने से शिशु मजबूत बनता है और साथ ही वह दुनिया को समझने और जानने की कला सीखता है।
• शिशु को बांधकर रखने वाले उपकरण उसके विकास में बाधा डाल सकते हैं। शिशु को झूले, स्ट्रोलर, बाउंसिंग सीट, एक्सरसाइज़ सॉसर या अन्य किसी भी बांधकर रखने वाले उपकरण में लंबे समय तक न रखें। उन्हें बाहर निकालें और घूमने-फिरने दें।
शिशु संरक्षण माह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह हर परिवार और समाज के लिए अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी का अहसास कराने वाला समय है। जब समाज का हर वर्ग—स्वास्थ्य कार्यकर्ता, मितानिन/आशा, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और अभिभावक—एक साथ मिलकर प्रयास करेंगे, तभी हम एक स्वस्थ, कुपोषण-मुक्त और सशक्त पीढ़ी का निर्माण कर सकेंगे।
शौर्यपथ लेख / 15 अगस्त 2026 को भारतवासी आजादी के 80 वां पर्वोल्लास से सराबोर होंगे।खुले आसमान में लहराते तिरंगा तले जयहिन्द, भारत माता की जय का उद्घोष जनमन को भावविभोर कर देगा। यह विशेष दिवस आत्मविश्लेषण-आत्मचिंतन की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण दिवस होता है। यही वजह है कि देशभर में आजादी के पूर्व और बाद की स्थिति "अतीत से अद्यतन" की चर्चा इस पर्व पर विविध माध्यमों से की जाती है। वीर-वीरांगनाओं के त्याग- समर्पण का स्मरण करके उन्हे शत शत नमन् किया जाता है।
स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बताता है कि 15 अगस्त 1947 के पहले अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों और बढ़ते अत्याचारों के सामने हर हिंदुस्तानी दासत्व में जीने को विवश हो चला था। दिन में भी घटाटोप अंधियारी रात का अहसास होता था। ऐसे दमघोटू माहौल से आक्रोशित देशभक्त हिंदुस्तानियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विरोध का बिगुल फूंक दिया। 1857 की क्रांति के साथ ही हर ओर भारत छोड़ो का नारा गूंज उठा था। उस दौर में क्रांतिकारियों के हृदय में धधकती ज्वाला को ओजस्वी शब्दों में चित्रित करते हुए कविश्री लिखते हैं उठो जवानों नाम मिटा दो,पापी और शैतान का, दुश्मन की छाती में गाड़ो झण्डा हिन्दुस्तान का।
स्वतंत्र भारत की पवित्र धरा पर खुली हवा में सांस लेते हुए देशवासियों ने आज तक जो कुछ भी अर्जित किया है, वह प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से तीन सौ वर्षों की गुलामी की पीड़ा सहे वीर पूर्वजों की देन है। फिरंगियों के खिलाफ विद्रोह की मशाल लेकर क्रांति में कूदे, शहीद हुए माँ भारती के सपूतों की कुर्बानी का सुफल है।
इस नाते सदैव नवपीढ़ी को यह स्मरण रखना होगा कि उन्हें विरासत में मिली आजादी की पूंजी खैरात की नहीं है। यह वीर वीरांगनाओं की कठोर तपस्या से तैयार की गई फसल से उपजी पूंजी है। इसकी हिफाजत हर हाल में किसी भी कीमत पर करने के लिए युवा वर्ग को तत्पर रहना होगा।
प्रदेशवासियों के लिए गर्व की बात है कि आजादी की लड़ाई में छत्तीसगढ़ के सपूतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वर्ष 1824 में ही छत्तीसगढ़ के वीर आदिवासी सपूतों ने फिरंगियों के खिलाफ जंग छेड़ दी थी। आदिवासी सेनानियों की हुंकार से ताकतवर अंग्रेज हुकुमत थरथर कांपती थी।
ऐसे पारंपरिक शौर्य का प्रदर्शन करने वालों में छत्तीसगढ़ महतारी के महावीर बेटो में वीर गेंदसिंह, गुंडापुर, इंदरू केवट, वीरनारायण सिंह, राजा भेरम देव आदि शामिल है। उन दिनों सोना खान के सपूत वीर नारायण सिंह का शौर्य और साहस जनगीत बनकर गुंजता था- परन ठान के,कफन बांध के,भारत माँ के करीन बिचार,गरजिस बधवा बीर नारायण, लिन तलवार निकाल।
स्वराज पथ गामियों में अग्रणीय ऐसे आदिवासी समाज की विशेषताओं को अभिव्यक्त करती हैं ये पंक्तियां- छत्तीसगढ़ के आदिवासी भाईयों के मिजाज लाजवाब है, गणित की किताब में ये रखते गुलाब है।
फिरंगियों के राज को नेस्तनाबूत करने के लिए छत्तीसगढ़ की वीरांगनाओं ने भी ब्रिटिश हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी थी। रणचंडी की तरह हूंकार भरती रौद्ररुपा डॉ. राधाबाई, रोहणी बाई परगनिहा, केतकी बाई, बेला बाई, फूलकुंवर बाई और मीनाक्षी देवी (मिनीमाता) की राष्ट्रवादी भावना के आगे अंग्रेजों के नापाक ईरादे ताश के पत्तों से बने मीनार की भांति भरभरा कर गिरते-टूटते चले गए थे।
अंततः अंग्रेजों को मां भारती के वीर लाल और ललनाओं के सामने झुकना पड़ा। पराधीनता की बेड़ियों से माँ भारती को मुक्ति मिल गई। मां भारती की आन- बान- शान के लिए सब कुछ न्यौछावर करने वाले शूरवीरों की शहादत की कीमत चुकाना असंभव है। इसे अजर अमर बनाए रखने के लिए महान विभूतियों की तस्वीरें केवल शासकीय कार्यालयों में ही नहीं घर-घर में भी लगनी चाहिए।
स्वतंत्रता सेनानियों ने देशवासियों पर जो उपकार किया है, वह अमूल्य है। अतुल्य है। वे पूज्य है अतः आजादी के पर्व पर एक नया संकल्प लें कि घर घर तिरंगा फहराएंगे। दीवारों पर परिवार के पूज्य सदस्यों की भांति कम से कम एक महान विभूति की तस्वीर लगाएंगे। यह नई पहल आत्मसुख देगी। नई पीढ़ी के मानस पटल पर देशभक्ति का बीजारोपण करने में अवश्य कारगर होगी। शूरवीरों को नमन करते हुए कहें दिल से - यही पूजा सुबह-शाम कर लें, देश के अमर शहीदों को बस प्रणाम कर लें।
विजय मिश्रा 'अमित' अग्रोहा कॉलोनी रायपुर (छग) 492013 मो.9893123310
शौर्यपथ लेख :(शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार एवं shouryapathnews.in)
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य को देश का सबसे भरोसेमंद निवेश केंद्र (Investment Hub) बनाने के लिए ऐतिहासिक नीतियां लागू की हैं। राज्य ने सुरक्षा और सुशासन के दम पर पुरानी चुनौतियों को पीछे छोड़ दिया है और हाल ही में 8.22 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव (MoUs) हासिल कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।छत्तीसगढ़ की इस औद्योगिक क्रांति, नई निवेश नीति (2024-2030), और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के शानदार सफर पर एक विस्तृत एवं संपूर्ण लेख नीचे दिया गया है।
लाल आतंक से औद्योगिक वैश्विक पहचान तक: बदलते छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा
1. नक्सलवाद से मुक्ति और शांति का नया सवेरा
एक समय था जब छत्तीसगढ़ का नाम सुनते ही देश-दुनिया के मानस पटल पर नक्सली हिंसा का अक्स उभरता था। लेकिन साय सरकार और केंद्र की डबल-इंजन सरकार की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है।
//नक्सल-मुक्त राज्य का संकल्प: बस्तर सहित सुदूर जनजातीय क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के कड़े अभियानों और समानांतर विकास कार्यों (जैसे सड़कें, स्कूल और अस्पताल) के चलते नक्सलवाद अंतिम सांसे ले रहा है।
//शांति और सुरक्षा का भरोसा: अब बस्तर और आस-पास के क्षेत्र 'रेड कॉरिडोर' से निकलकर कनेक्टिविटी, पर्यटन और उद्योगों के नए हब बन रहे हैं। निवेशकों के लिए सबसे पहली शर्त "सुरक्षित वातावरण" होती है, जिसे साय सरकार ने पूरी तरह सुनिश्चित किया है।
2. देश का पहला 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अधिनियम, 2026'
छत्तीसगढ़ ने हाल ही में 'छत्तीसगढ़ ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (छूट और सुगमता) अधिनियम, 2026' को विधानसभा से पारित कराकर देश में एक नया राष्ट्रीय कीर्तिमान बनाया है। छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जिसने उद्योगों के लिए 'जोखिम और विश्वास आधारित' (Risk & Trust-Based) अनुमति प्रणाली लागू की है।
3. औद्योगिक विकास नीति (2024-2030): समृद्धि का महामार्ग
1 नवंबर 2024 से लागू हुई राज्य की औद्योगिक विकास नीति 2024-30 का मुख्य विजन छत्तीसगढ़ को 'अमृतकाल: छत्तीसगढ़ विजन @ 2047' के अनुरूप आर्थिक महाशक्ति बनाना है। इस नीति के प्रमुख आकर्षक वित्तीय और प्रशासनिक लाभ निम्नलिखित हैं:
// वन-क्लिक सिंगल विंडो पोर्टल: राज्य सरकार ने OneClick Single Window System की शुरुआत की है, जिससे जमीन आवंटन, बिजली-पानी कनेक्शन और पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance) जैसी सभी औपचारिकताएं पूरी तरह डिजिटल और समयबद्ध हो गई हैं।
// भारी वित्तीय प्रोत्साहन (Subsidies): नए उद्योगों को फिक्स्ड कैपिटल इन्वेस्टमेंट (FCI) सब्सिडी, ब्याज सब्सिडी, और बिजली शुल्क (Electricity Duty) में शत-प्रतिशत तक की छूट दी जा रही है। इसके अलावा नेट SGST प्रतिपूर्ति (Reimbursement) की भी विशेष व्यवस्था है।
// भविष्य के सेक्टर्स (Thrust Sectors) पर फोकस: छत्तीसगढ़ पारंपरिक खनिज और इस्पात उद्योगों (जैसे देश का 20% लोहा और कोयला भंडार) से आगे बढ़कर अब हाई-टेक क्षेत्रों में कदम रख चुका है। नीति के तहत फार्मास्युटिकल्स, गारमेंट/टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ग्रीन हाइड्रोजन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
// समावेशी विकास: इस नीति में महिला उद्यमियों, आत्मसमर्पित माओवादियों, अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) के उद्यमियों, अग्निवीरों और दिव्यांगजनों के लिए विशेष सब्सिडी पैकेज और औद्योगिक क्षेत्रों में भूमि आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
// स्थानीय रोजगार पर जोर: नीति के तहत उद्योगों में स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के लिए कौशल विकास (Skill Development) केंद्रों की स्थापना और रोजगार-लिंक्ड प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं।
4. नीति आयोग और रेटिंग्स में छत्तीसगढ़ का डंका
साय सरकार के इन प्रशासनिक और नीतिगत सुधारों का असर अब राष्ट्रीय स्तर पर दिखने लगा है:
// नियामक सुगमता में नंबर 1: CRISIL और NITI Aayog Index की हालिया रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ को रेगुलेटरी ईज (नियामक सुगमता) और मजबूत संस्थागत माहौल में देश में प्रथम स्थान मिला है।
// पर्यावरणीय लचीलापन (Environmental Resilience): औद्योगिक विस्तार के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में छत्तीसगढ़ पूरे देश में दूसरे स्थान पर है।सशक्त कार्यबल: राज्य में महिला कार्यबल भागीदारी दर (Female Workforce Participation Rate) 58.1% है, जो देश के बड़े राज्यों के औसत से 41% अधिक है।
निष्कर्ष: एक नए 'इन्वेस्टमेंट हब' का उदयनक्सलवाद के अंधकार को चीरकर छत्तीसगढ़ आज सुशासन, सुरक्षा और पारदर्शी नीतियों के दम पर देश के अग्रणी औद्योगिक राज्यों की कतार में खड़ा हो चुका है। साय सरकार द्वारा उठाए गए ये कदम न केवल राज्य की जीडीपी (GSDP) को तेजी से बढ़ा रहे हैं, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए लाखों नए रोजगार सृजित कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ की 2024-2030 की निवेश नीति निश्चित रूप से इसे एक आत्मनिर्भर, समृद्ध और विकसित राज्य बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रही है।
शौर्यपथ लेख
नई दिल्ली/रायपुर। भारत की सदियों पुरानी हथकरघा परंपरा आज भी देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक कौशल और रोजगार का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन भारत सरकार के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़े इस क्षेत्र के सामने एक गंभीर चुनौती की ओर भी संकेत करते हैं। वर्ष 2009-10 की तीसरी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना में देश में 43.31 लाख हथकरघा बुनकर एवं संबद्ध श्रमिक दर्ज किए गए थे। इसके बाद उपलब्ध चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना 2019-20 में यह संख्या घटकर 35.22 लाख रह गई। यानी दोनों जनगणनाओं के बीच कुल कार्यबल में 8.09 लाख की कमी, लगभग 18.68 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई।
भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय ने 2009-10 की तीसरी हथकरघा जनगणना के आधार पर 43.31 लाख बुनकरों एवं संबद्ध श्रमिकों का आंकड़ा संसद और सरकारी दस्तावेजों में दर्ज किया था। वर्ष 2013-14 तथा 2014 के आसपास के मंत्रालय के दस्तावेजों में भी हथकरघा क्षेत्र में 43.31 लाख व्यक्तियों के रोजगार का उल्लेख मिलता है।
इसके विपरीत, चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना 2019-20 में देशभर में कुल 35.22 लाख हथकरघा कामगार दर्ज किए गए। इनमें 26,73,891 मुख्य बुनकर और 8,48,621 संबद्ध श्रमिक शामिल हैं। वस्त्र मंत्रालय के हालिया आधिकारिक उत्तरों में भी यही आंकड़ा देश के हथकरघा कार्यबल का Census-based आधार बताया गया है।
इस तुलना से स्पष्ट है कि 2014 के आसपास के 43.31 लाख के मुकाबले चौथी जनगणना के 35.22 लाख कामगारों तक संख्या पहुंचने पर करीब 18.7 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। यह गिरावट केवल बुनकरों की संख्या में नहीं, बल्कि बुनाई से जुड़ी संबद्ध गतिविधियों में काम करने वाले लोगों को मिलाकर कुल हथकरघा कार्यबल में दिखाई देती है।
लेकिन कहानी केवल गिरावट की नहीं है
हथकरघा क्षेत्र की तस्वीर का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। चौथी जनगणना में दर्ज 35.22 लाख कामगारों में 26.74 लाख मुख्य बुनकर और 8.49 लाख संबद्ध श्रमिक हैं। यानी हथकरघा आज भी करोड़ों परिवारों की पारंपरिक आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 31.45 लाख हथकरघा परिवार इस क्षेत्र से पूर्ण या आंशिक रूप से आजीविका प्राप्त करते हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि हथकरघा क्षेत्र मुख्यतः असंगठित क्षेत्र है और इसमें काम करने वाले लोग पारंपरिक कौशल के आधार पर स्वरोजगार से जुड़े हैं।
महिलाओं की बड़ी भूमिका
हथकरघा क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसकी महिला भागीदारी है। चौथी हथकरघा जनगणना के अनुसार कुल हथकरघा कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 72.3 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है कि हथकरघा केवल कपड़ा उत्पादन का माध्यम नहीं बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और पारंपरिक कौशल का भी महत्वपूर्ण आधार है।
2014 से 2026 तक का सवाल—क्या संख्या फिर बढ़ रही है?
यहीं आंकड़ों को लेकर सावधानी जरूरी है। 2026 में उपलब्ध 35.22 लाख को 2026 की वास्तविक कुल संख्या नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह संख्या 2019-20 की चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना से प्राप्त हुई है।
हालांकि, केंद्र सरकार ने 28 जनवरी 2025 को e-Pehchan पोर्टल शुरू किया है। इसका उद्देश्य चौथी जनगणना में छूट गए लोगों तथा उसके बाद क्षेत्र में जुड़े नए बुनकरों और संबद्ध श्रमिकों का पंजीयन करना है। मंत्रालय के अनुसार इस प्रक्रिया में नए पंजीयन, मौजूदा विवरणों में संशोधन और e-Pehchan कार्ड डाउनलोड की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस प्रक्रिया के कारण जोड़ने, हटाने और विवरण अपडेट करने का काम लगातार चलता रहता है।
इसलिए नए e-Pehchan कार्ड जारी होना हथकरघा कार्यबल में नई भागीदारी का संकेत जरूर है, लेकिन इसे सीधे 2019-20 के 35.22 लाख में जोड़कर 2026 की कुल संख्या घोषित करना सांख्यिकीय रूप से सही नहीं होगा।
डिजिटल बाजार से नई संभावनाएं
हथकरघा क्षेत्र को पारंपरिक बाजारों से निकालकर डिजिटल बाजार से जोड़ने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। सरकारी Handloom पोर्टल पर e-Pehchan, India Handmade, GeM और India Handloom Brand जैसे डिजिटल एवं विपणन प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं।
इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि बुनकरों की आय और रोजगार की स्थिरता केवल करघे की संख्या पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उनके उत्पाद को उचित बाजार, बेहतर मूल्य, डिजाइन, ब्रांडिंग और सीधे ग्राहक तक पहुंच मिलने पर भी निर्भर करती है।
आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश
सरकारी आंकड़ों की तुलना एक स्पष्ट तस्वीर सामने रखती है—2009-10 में 43.31 लाख से चौथी जनगणना 2019-20 में 35.22 लाख तक हथकरघा बुनकर एवं संबद्ध श्रमिकों की संख्या में 8.09 लाख की कमी आई।
यह कमी लगभग 18.68 प्रतिशत है। इससे यह सवाल जरूर उठता है कि पारंपरिक हथकरघा व्यवसाय से लोगों के दूर होने के पीछे कम आय, बाजार में प्रतिस्पर्धा, पावरलूम और मशीन आधारित उत्पादन, कच्चे माल की लागत, विपणन की कठिनाइयां और नई पीढ़ी का दूसरे रोजगारों की ओर बढ़ना कितना जिम्मेदार है।
दिलचस्प बात यह है कि यह गिरावट नई नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड में दूसरी हथकरघा जनगणना 1995-96 में 65.50 लाख बुनकर एवं संबद्ध श्रमिक थे, जो तीसरी जनगणना 2009-10 में घटकर 43.31 लाख रह गए थे। सरकार ने उस समय मशीन आधारित मिल और पावरलूम क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा, सहकारी संस्थाओं की कमजोरी, ऋण की कठिन उपलब्धता और विपणन संबंधी समस्याओं को हथकरघा क्षेत्र की गिरावट के प्रमुख कारणों में गिना था।
इस लिहाज से 43.31 लाख से 35.22 लाख की गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारत की पारंपरिक हथकरघा अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी दीर्घकालीन चुनौती का संकेत है।
अब सरकार के सामने चुनौती केवल नए बुनकरों का पंजीयन करने की नहीं, बल्कि मौजूदा बुनकरों को टिकाऊ रोजगार, बेहतर पारिश्रमिक, सस्ता कच्चा माल, आधुनिक डिजाइन, बाजार तक सीधी पहुंच और डिजिटल बिक्री के अवसर उपलब्ध कराने की है।
यही तय करेगा कि आने वाले वर्षों में भारत का हथकरघा केवल अपनी गौरवशाली परंपरा के रूप में याद किया जाएगा या फिर यह परंपरा नई पीढ़ी के लिए सम्मानजनक और टिकाऊ रोजगार का मजबूत माध्यम भी बन पाएगी
(विशेष लेख )
लेखक : शरद पंसारी
संपादक, शौर्यपथ दैनिक समाचार
"कोई भी राज्य केवल प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध नहीं बनता, बल्कि उन संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग, निवेशकों के विश्वास, सुशासन और दूरदर्शी नीतियों से आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा तय करता है।"
इसी सोच को केंद्र में रखकर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने "औद्योगिक विकास नीति 2024-30" के माध्यम से प्रदेश के आर्थिक भविष्य की नई रूपरेखा प्रस्तुत की है। यह केवल एक औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि "अमृतकाल : छत्तीसगढ़ विजन 2047" की आधारशिला है, जिसका उद्देश्य प्रदेश के प्रत्येक जिले, प्रत्येक विकासखंड और अंतत: प्रत्येक नागरिक तक विकास का लाभ पहुँचाना है।
पिछले वर्षों में छत्तीसगढ़ को प्राय: केवल खनिज संपदा वाले राज्य के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन नई सरकार की सोच इससे कहीं आगे की है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की परिकल्पना स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ केवल खनिज निकालने वाला प्रदेश नहीं रहेगा, बल्कि मूल्य संवर्धन (Value Addition), आधुनिक उद्योग, तकनीकी नवाचार और रोजगार सृजन का राष्ट्रीय केंद्र बनेगा।
यही सोच इस औद्योगिक नीति के प्रत्येक प्रावधान में दिखाई देती है।
विकास का नया मॉडल : केवल उद्योग नहीं, समग्र आर्थिक परिवर्तन
औद्योगिक नीति 2024-30 का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें केवल बड़े उद्योगों की स्थापना पर जोर नहीं दिया गया है, बल्कि उन क्षेत्रों की पहचान करने का प्रयास किया गया है जो आज भी औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं।
सरकार की मंशा स्पष्ट है कि प्रदेश के प्रत्येक जिले में स्थानीय संसाधनों के आधार पर उद्योग विकसित हों ताकि क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त हो और रोजगार के अवसर लोगों के घर के आसपास ही उपलब्ध हों।
यह सोच केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे पलायन कम होगा, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
प्राकृतिक संपदा से आर्थिक शक्ति तक का सफर
छत्तीसगढ़ देश के उन राज्यों में शामिल है जहाँ प्रकृति ने भरपूर संपदा प्रदान की है।
लगभग 44 प्रतिशत वन क्षेत्र, विशाल खनिज भंडार, कृषि उत्पादन, लघु वनोपज, औषधीय पौधे, जल संसाधन और भौगोलिक दृष्टि से देश के मध्य में स्थित होना—ये सभी ऐसी विशेषताएँ हैं जिन्हें यदि योजनाबद्ध तरीके से उपयोग में लाया जाए तो प्रदेश राष्ट्रीय औद्योगिक मानचित्र पर अग्रणी स्थान प्राप्त कर सकता है।
मुख्यमंत्री साय की सरकार ने इसी सोच के अनुरूप नीति तैयार की है कि केवल खनिजों का दोहन न हो बल्कि उनका स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण (Processing) किया जाए, जिससे रोजगार भी यहीं उत्पन्न हो और उद्योगों का लाभ भी प्रदेश को मिले।
कोर सेक्टर से लेकर हाई-टेक उद्योगों तक व्यापक दृष्टिकोण
नई औद्योगिक नीति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी व्यापकता है।
सरकार ने केवल पारंपरिक उद्योगों तक स्वयं को सीमित नहीं रखा है बल्कि—
फार्मास्यूटिकल उद्योग
टेक्सटाइल
सूचना प्रौद्योगिकी
इंजीनियरिंग
रक्षा उत्पादन
खाद्य प्रसंस्करण
कृषि आधारित उद्योग
वनोपज आधारित उद्योग
लॉजिस्टिक्स
सेवा क्षेत्र
जैसे अनेक क्षेत्रों को समान प्राथमिकता प्रदान की है।
यह दर्शाता है कि सरकार आने वाले वर्षों की अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप औद्योगिक ढाँचा तैयार करना चाहती है।
स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार : नीति का सबसे मानवीय पक्ष
नई औद्योगिक नीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देना है।
सरकार ने निवेश प्रोत्साहन को स्थानीय रोजगार से जोड़ते हुए यह संदेश दिया है कि औद्योगिक विकास का वास्तविक लाभ प्रदेश के युवाओं तक पहुँचना चाहिए।
यदि उद्योग आएँ लेकिन स्थानीय लोगों को रोजगार न मिले तो विकास अधूरा माना जाएगा।
साय सरकार की यह सोच इस नीति को केवल उद्योग केंद्रित नहीं बल्कि जन-केंद्रित औद्योगिक नीति बनाती है।
ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस : निवेशकों का भरोसा बढ़ाने की ऐतिहासिक पहल
आज निवेशक केवल कर छूट या भूमि उपलब्धता नहीं देखते।
वे यह भी देखते हैं कि—
अनुमति कितनी जल्दी मिलेगी।
सरकारी प्रक्रियाएँ कितनी सरल हैं।
पारदर्शिता कितनी है।
समयबद्ध निर्णय होते हैं या नहीं।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने Ease of Doing Business (EoDB) को नई ऊँचाई देने का प्रयास किया है।
विभिन्न विभागों की अनुमतियों, सहमतियों, पंजीकरण और स्वीकृतियों को ऑनलाइन, समयबद्ध और सरल बनाना निवेशकों के लिए अत्यंत सकारात्मक संदेश है।
यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि निवेशकों के प्रति सरकार का विश्वास प्रस्ताव है।
विश्वास की नई पूंजी
निवेश केवल पूंजी से नहीं आता।
निवेश का सबसे बड़ा आधार होता है—विश्वास।
जब सरकार स्पष्ट नीति, पारदर्शी व्यवस्था, समयबद्ध निर्णय और उद्योग-अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराती है तब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का विश्वास स्वत: बढ़ता है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार की यह नीति उसी विश्वास को मजबूत करने का प्रयास करती दिखाई देती है।
आगे की दिशा
यह औद्योगिक नीति केवल वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने का दस्तावेज नहीं है।
यह वर्ष 2047 तक विकसित छत्तीसगढ़ की परिकल्पना का प्रारंभिक रोडमैप है।
यदि नीति का प्रभावी क्रियान्वयन होता है तो आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ केवल खनिज उत्पादक राज्य नहीं बल्कि औद्योगिक उत्पादन, रोजगार, निवेश, निर्यात और आर्थिक आत्मनिर्भरता का नया केंद्र बन सकता है।
(क्रमश:...)
अगले भाग में पढि़ए—
"औद्योगिक विकास नीति 2024-30 में निवेशकों को मिलने वाले प्रोत्साहन, एमएसएमई, लॉजिस्टिक्स, रक्षा उत्पादन, उद्योग विस्तार (Diversification), स्टार्टअप, जिला-विशेष औद्योगिक संभावनाएँ और प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर इनके दूरगामी प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण।"
— शरद पंसारी
संपादक, शौर्यपथ दैनिक समाचार
निलंबन नहीं, जवाबदेही तय करने का समय
शासकीय विद्यालयों में अनैतिक आचरण के मामलों पर कठोर और पारदर्शी कार्रवाई की अपेक्षा
— शरद पंसारी
संपादक, शौर्यपथ दैनिक समाचार पत्र
शिक्षक केवल एक सरकारी कर्मचारी नहीं होता, बल्कि समाज का वह स्तंभ होता है जिसके कंधों पर आने वाली पीढ़ी के चरित्र, संस्कार और भविष्य की नींव टिकी होती है। इसलिए जब किसी विद्यालय से शिक्षक के कथित अनैतिक आचरण, विद्यालय परिसर में अनुचित व्यवहार, नशे की हालत में ड्यूटी करने अथवा विद्यार्थियों के समक्ष अशोभनीय गतिविधियों के वीडियो और समाचार सामने आते हैं, तो यह केवल किसी एक कर्मचारी का मामला नहीं रह जाता, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है।
हाल के समय में सोशल मीडिया पर ऐसे अनेक वीडियो और घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने समाज को झकझोर दिया है। यदि किसी मामले में जांच के बाद आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल सेवा नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि उस नैतिक जिम्मेदारी का भी हनन है, जिसे निभाने की शपथ एक शिक्षक लेता है।
चिंता का विषय केवल घटनाएं नहीं हैं, बल्कि उनके बाद होने वाली कार्रवाई भी है। अधिकांश मामलों में प्रथम दृष्टया निलंबन की कार्रवाई होती है, जिसके बाद विभागीय जांच की लंबी प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। कई बार ऐसे मामलों में वर्षों तक अंतिम निर्णय नहीं हो पाता। इससे समाज में यह संदेश जाता है कि गंभीर आरोपों के बावजूद कठोर दंड की संभावना सीमित है। यदि जांच में गंभीर अनैतिक आचरण सिद्ध हो जाए, तो केवल निलंबन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में सेवा नियमों के अनुरूप कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि विद्यालय का वातावरण बिगड़ने तक स्थिति पहुंची कैसे? क्या विद्यालय प्रमुख और संबंधित अधिकारी पूरी तरह अनभिज्ञ थे? किसी भी संस्था में अनुशासन बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी केवल एक कर्मचारी की नहीं, बल्कि नेतृत्व की भी होती है। यदि किसी विद्यालय में लंबे समय से अनुशासनहीनता या गंभीर शिकायतें थीं और समय रहते उनका संज्ञान नहीं लिया गया, तो संबंधित प्रशासनिक स्तर पर भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। हालांकि यह जवाबदेही प्रत्येक मामले के तथ्यों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही निर्धारित होनी चाहिए।
विडंबना यह भी है कि निजी विद्यालयों में छोटी-सी अनियमितता पर भी कठोर प्रशासनिक कदम उठाने की मांग तेज हो जाती है। वहीं शासकीय विद्यालयों में गंभीर आरोपों के मामलों में अक्सर कार्रवाई की गति और कठोरता पर प्रश्न उठते हैं। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि नियम सभी संस्थानों पर समान रूप से लागू हों। सरकारी और निजी विद्यालयों के लिए अलग-अलग मानदंड लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं माने जा सकते।
आज अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय इसलिए भेजते हैं कि वहां उन्हें ज्ञान, अनुशासन और संस्कार प्राप्त हों। यदि विद्यालय का वातावरण ही विवादों और अनुचित आचरण का केंद्र बनने लगे, तो इसका सबसे गहरा दुष्प्रभाव विद्यार्थियों के मनोविज्ञान पर पड़ता है। शिक्षा केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि शिक्षकों के आचरण से भी मिलती है। इसलिए शिक्षक का चरित्र ही उसकी सबसे बड़ी योग्यता माना जाता है।
छत्तीसगढ़ में नए स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के सामने शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता सुधारने के साथ-साथ अनुशासन और नैतिकता को मजबूत करने की भी बड़ी चुनौती है। प्रदेश की जनता उनसे यह अपेक्षा कर रही है कि ऐसे मामलों में त्वरित, निष्पक्ष और नियमसम्मत जांच सुनिश्चित हो तथा जहां आरोप सिद्ध हों, वहां ऐसा निर्णय लिया जाए जो भविष्य में किसी भी कर्मचारी के लिए स्पष्ट संदेश बने कि विद्यालय की गरिमा से खिलवाड़ किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
यह किसी व्यक्ति या पूरे शिक्षक समुदाय पर प्रश्न उठाने का विषय नहीं है। प्रदेश के अधिकांश शिक्षक पूरी निष्ठा और समर्पण से अपने दायित्व निभा रहे हैं तथा समाज के लिए प्रेरणा हैं। किंतु कुछ मामलों में सामने आने वाला कथित अनैतिक आचरण पूरे शिक्षक समाज की प्रतिष्ठा को आहत करता है। इसलिए ईमानदार शिक्षकों के सम्मान और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कानून और सेवा नियमों के अनुसार कठोर तथा पारदर्शी कार्रवाई हो।
शिक्षा का मंदिर तभी पवित्र रह सकता है जब वहां ज्ञान के साथ-साथ अनुशासन, नैतिकता और जवाबदेही भी सर्वोच्च मूल्य बने रहें। समाज की नजर अब केवल कार्रवाई पर नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और प्रभावी परिणाम पर है।
विशेष लेख
नंदनवन जंगल सफारी नवाँ रायपुर में पर्यटकों के लिए कई प्रकार की रोमांचक सफारी राइड्स उपलब्ध हैं, जिनमें शाकाहारी सफारी, टाइगर सफारी, भालू सफारी और लायन सफारी प्रमुख हैं। इसके अलावा यहाँ एक छोटा चिड़ियाघर (नंदनवन जू) भी है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी नवा रायपुर (अटल नगर) के सेक्टर-39 में स्थित नंदनवन जंगल सफारी राज्य के प्रमुख पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण केंद्रों में शामिल है। 320.15 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह विशाल परिसर प्रकृति प्रेमियों, वन्यजीव प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यहां वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ पर्यटकों को प्राकृतिक वातावरण में वन्यजीवों को देखने और उनके बारे में जानने का अवसर मिलता है।
मिनी जू से जंगल सफारी तक का सफर
नंदनवन की शुरुआत वर्ष 1979 में रायपुर में ‘नंदनवन मिनी जू’ के रूप में हुई थी। यह वन्यजीवों के रेस्क्यू और राहत केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। वर्ष 2008 में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) ने इसे आधिकारिक रूप से ‘मिनी जू’ की मान्यता दी।
इसके बाद नवा रायपुर में आधुनिक और विशाल जंगल सफारी विकसित करने के लिए वर्ष 2012 से 2015 के बीच 320.15 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई। 1 नवंबर 2016 को छत्तीसगढ़ राज्य के 16वें स्थापना दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने नंदनवन जंगल सफारी का उद्घाटन किया।
वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा पर विशेष जोर
नंदनवन जंगल सफारी का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों का संरक्षण, दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण एवं प्रजनन और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यहां वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप सुरक्षित और तनावमुक्त आवास उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। विद्यार्थियों और पर्यटकों को वन्यजीवों तथा जैव विविधता के महत्व की जानकारी देने के लिए यहां विभिन्न पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
पांच प्रमुख सफारी जोन हैं आकर्षण का केंद्र
नंदनवन जंगल सफारी को वन्यजीवों की सुरक्षा और पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग जोन में विकसित किया गया है।
शाकाहारी सफारी
30.89 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस जोन में चीतल, सांभर, नीलगाय और काला हिरण जैसे वन्यजीव प्राकृतिक वातावरण में विचरण करते हैं।
भालू सफारी
20.03 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित भालू सफारी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। यहां भालुओं को प्राकृतिक वातावरण में देखने का अवसर मिलता है।
बाघ सफारी
20.04 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली बाघ सफारी में पर्यटक देश के राष्ट्रीय पशु बाघ को करीब से देखने का रोमांचक अनुभव प्राप्त करते हैं।
सिंह सफारी
20.01 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित सिंह सफारी में एशियाई शेरों का संरक्षण किया जा रहा है।
जू जोन
50 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जू जोन में विभिन्न प्रजातियों के पक्षी, सरीसृप और अन्य वन्यजीव आकर्षण का केंद्र हैं।
दुर्लभ और विशेष वन्यजीवों का भी संरक्षण
नंदनवन जंगल सफारी में विभिन्न चिड़ियाघरों के साथ पशु विनिमय कार्यक्रम के माध्यम से कई दुर्लभ और विशेष वन्यजीवों को लाया गया है। यहां सफेद बाघ, दरियाई घोड़ा, घड़ियाल और क्लोन जंगली भैंसा ‘दीपाशा’ जैसे वन्यजीव पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण हैं।
देश-विदेश से पहुंचते हैं पर्यटक
वनमंडलाधिकारी थेजस शेखर ने बताया कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप की मंशानुरूप नंदनवन जंगल सफारी पर्यटकों के बीच लगातार लोकप्रिय हो रहा है। गौरतलब है कि वर्ष 2018-19 में ही देश-विदेश से 1 लाख 74 हजार 611, वर्ष 2019-20 में 1 लाख 60 हजार 767 ,वर्ष 2020-21 में 1 लाख 60 हजार 32, वर्ष 2021-22 में 1 लाख 73 हजार 72, वर्ष 2022-23 में 2 लाख 77 हजार 881, वर्ष 2023-24 में 2 लाख 62 हजार 486, वर्ष 2024-25 में 2 लाख 70 हजार 942, वर्ष 2025-26 में 3 लाख 24 हजार 785, से अधिक पर्यटकों ने जंगल सफारी का भ्रमण किया। यह आंकड़ा इसकी बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।
जैव विविधता संरक्षण के प्रति जागरूकता का केंद्र
नंदनवन जंगल सफारी में अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस, विश्व बाघ दिवस और वन्यजीव सप्ताह जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से लोगों, विद्यार्थियों और पर्यटकों को वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है।
रायपुर से आसान पहुंच
नंदनवन जंगल सफारी नवा रायपुर (अटल नगर) के सेक्टर-39 में स्थित है। यह स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे, रायपुर से लगभग 15 किलोमीटर और रायपुर रेलवे स्टेशन से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जंगल सफारी प्रत्येक सोमवार को बंद रहती है।
वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा का ऐसा अनूठा केंद्र
नंदनवन जंगल सफारी आज छत्तीसगढ़ में पर्यटन, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा का ऐसा अनूठा केंद्र बन चुका है, जहां प्रकृति के करीब पहुंचकर वन्यजीवों को देखने के साथ-साथ उनके संरक्षण का संदेश भी मिलता है .
साभार
धनंजय राठौर (संयुक्त संचालक, जनसंपर्क )
अशोक कुमार चंद्रवंशी (सहायक जनसंपर्क अधिकारी)
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
